शनिवार, 26 सितंबर 2015

भ्रष्टाचार के देवता:एक आईएएस का सेवाकाल संस्मरण

दावात्याग: प्रस्तुत पोस्ट 'गॉड्स आफ करप्शन' पुस्तक की संक्षिप्त  समीक्षा मात्र  है और  इसमें व्यक्त विचार लेखिका के हैं, उनसे मेरी सहमति का कोई प्रत्यक्ष या  परोक्ष आग्रह  नहीं है।  

मैंने जब १९७६ बैच की सीधी भर्ती किन्तु अब सेवानिवृत्त आईएएस आफीसर श्रीमती प्रोमिला शंकर की संस्मरणात्मक पुस्तक गॉड्स आफ करप्शन की चर्चा सुनी तो उसे पढने की तत्काल इच्छा हो आयी  और आनन फानन फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक  मंगा भी ली गई। इस तत्परता के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण थे -एक तो मैं जब श्रीमती प्रोमिला शंकर जी  झांसी में 1987 में  ज्वाइंट डेवेलपमेंट कमिश्नर थी,और उनके  पति श्री पी उमाशंकर आईएएस वहीं के जिला मजिस्ट्रेट थे ,मैं एक मातहत अधिकारी था। 

मैं पी उमाशंकर जी का सीधा मातहत था और मुझे  कहने में सदैव फ़ख्र रहता है कि वे मेरे अब तक के सेवाकाल के बहुत अच्छे जिलाधिकारियों में से  एक रहे. तमिलनाडु राज्य का  होने  के नाते  हिन्दी के नए नए शब्दों को सीखने की उनकी उत्कंठा ने मुझे उनके करीब होने का सौभाग्य दिया।वे सदैव विनम्र और प्रसन्नचित्त रहते. उन्होंने मुझ पर बहुत भरोसा किया और जनहित में कुछ अत्यंत गोपनीय कार्य भी मुझे सौंपे. आगे चलकर प्रोमिला जी हमारी यानि मत्स्य विभाग की प्रमुख सचिव  भी रहीं  (वर्ष,२०००) इसलिए पुस्तक  को पढने के लिए मैं और भी प्रेरित हुआ।  

 इस पुस्तक को यथाशीघ्र पढने की उत्कंठा का दूसरा कारण यह भी रहा कि एक जनसेवक के रूप में संभवतः मुझे कोई महत्वपूर्ण मार्गदर्शन इसके पढने से मिल सके।  पुस्तक इतनी रोचक है कि एक सांस  में ही खत्म हो गयी मगर मन  तिक्तता से  भर उठा । यह पुस्तक शासकीय व्यवस्था के घिनौने चेहरे को अनावृत करती है -लेखिका ने पूरी प्रामाणिकता  और  वास्तविक नामोल्लेख के साथ अपने ३६ वर्षीय सेवाकाल के दौरान भ्रष्टाचार में लिप्त उच्च पदस्थ कई आईएएस अधिकारियों के कारनामों, उनके  पक्षपातपूर्ण व्यवहार, चाटुकारिता के साथ ही नेताओं और भ्रष्ट आईएएस के दुष्चक्रपूर्ण गंठजोड़, दुरभिसंधियों का उल्लेख किया है। 

इस अपसंस्कृति का साथ न देने के कारण और अपने मुखर  निर्णयों  के कारण श्रीमती शंकर को पग पग पर बाधाएं ,हतोत्साहन और अनेक ट्रांसफर झेलने पड़े।  महत्वहीन पदों पर पोस्टिंग दी जाती रही। सीधी भर्ती की आईएएस होने के बावजूद न तो इन्हे कभी डीएम बनाया गया और न ही कभी  कमिश्नर(मण्डलायुक्त) बन पाईं।  और तो और जब सेवाकाल के मात्र ६ माह शेष रह गए तो अचानक एक महत्वहीन से कारण को दिखाते हुए निलंबित कर दिया गया। 



भारत सरकार के द्वारा सेवानिवृत्ति के मात्र ६ दिन पहले बहाली मिली भी तो इन्हे तत्कालीन पोस्ट से तुरंत हटाकर लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया।  गनीमत रही कि लोकसभा  निर्वाचन आरम्भ हो  गए थे और भारत निर्वाचन आयोग के हस्तक्षेप से श्रीमती शंकर को अपने सेवाकाल के आख़िरी पद ,कमिश्नर (एनसीआर) पर ही रहकर सेवानिवृत्ति मिल गयी,हालांकि इनके विरुद्ध जांच चलते रहने का आदेश भी पकड़ा दिया गया। प्रोमिला जी उस समय उत्तर प्रदेश की सबसे सीनियर आईएएस थीं.  

सूबे में नयी सरकार बन गयी और दुर्भावनापूर्ण लंबित जांच निरर्थक हो गयी। अपनी इस संस्मरणात्मक पुस्तक में लेखिका ने पूरी बेबाकी और निर्भयता से गुनहगारों  के नामों का उल्लेख किया है जिन्होंने अपने न्यस्त स्वार्थों के चलते एक ईमानदार अधिकारी को जनहित में काम न करने देने के लिए पूरे सेवाकाल हठात रोके रखा।  कालांतर में कुछ तो उनमें से जेल गए और एक कथित आततायी  असामयिक कालकवलित भी हो चुके।  पुस्तक का एक एक पन्ना आँखों को खोल देने वाला विवरण लेकर सामने आता है। 

शासकीय व्यवस्था में खुलेआम भ्रष्टाचार ,भाई भतीजावाद, पक्षपात ,जातिवाद और योग्यता के बजाय चापलूसों  की बढ़त का जिक्र है।  खुद लेखिका को उनकी स्पष्टवादिता और मुखरता के चलते अच्छी वार्षिक प्रविष्टियों के न मिलने से केंद्र सरकार में भी जाने का मौका नहीं मिल सका।  लेकिन  इस स्थिति को लेखिका ने  पहले ही भांप लिया था।  मगर उन्होंने भ्रष्ट तंत्र  के आगे घुटने नहीं टेके ,संघर्ष करती रहीं।  उन्हें यह  एक बेहतर ऑप्शन लगता था कि अच्छी वार्षिक प्रविष्टियों के लेने  के लिए अनिच्छा से जीहुजूरी के बजाय मानसिक शांति के साथ कर्तव्यों का निर्वहन करती चलें।

 न्यायपालिका के भी उनके अनुभव  बहुत खराब रहे।  एक  न्यायालय की अवमानना भी झेलनी पडी और उनके अनुसार एक फर्म को गलत भुगतान किये जाने को लेकर अपना पक्ष प्रस्तुत करते समय न्यायाधीश महोदय द्वारा कहा गया कि वे जेल जाना चाहती हैं या फर्म को भुगतान करेगीं? वे जड़वत हो गयीं।उनकी एक विभागीय देयता के औचित्य को  पहले तो न्यायालय ने स्वीकार कर उनके पक्ष में निर्णय दिया किन्तु तत्कालीन मुख्य सचिव की बिना उन्हें सूचित किये पैरवी किये जाने पर अपने निर्णय को बदल दिया।  

लेखिका प्रोमिला  जी ने भारत की सर्वोच्च सेवा के लिए चुने जाने वाले अभ्यर्थियों  में बुद्धि, अर्जित ज्ञान और अध्ययन के साथ ही उच्च नैतिक आदर्शों ,चारित्रिक विशेषताओं  के साथ ही दबावों के  आगे न झुकने वाले व्यक्तित्व पर बल दिया है। उन्होंने राष्ट्प्रेम को भी अनिवार्य  माना है और क्षद्म धर्मनिरपेक्षता से  आगाह किया है। एक जगह  वे लिखती हैं कि स्वाधीनता दिवस कहने के बजाय इस अवसर को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए।हमें गुलामी का बोध कराने वाले प्रतीकों से अब दूर हो जाना चाहिए। उन्होंने सारे भारत में शिक्षा का माध्यम अंगरेजी होने  की वकालत की है। जिससे भाषायी विभिन्नताओं को बल न मिलें और हम  वैश्विक स्तर पर तमाम चुनौतियों के लिए बेहतर तौर पर तैयार हो सकें. 

पुस्तक दो खंडो में है -एक में उनके द्वारा विभिन्न विभागों  में अपने कार्यकाल  के दौरान उठायी गयी समस्याओं/कठिनाइयों  का विवरण दिया गया है और दूसरे खंड में अपने कार्यकाल में जो सीखें मिलीं उनका जिक्र है।  २३२ पृष्ठ की संस्मरण पुस्तक का मूल्य रूपये ५९५ है और इसे दिल्ली के मानस पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।  इसे नेट पर आर्डर देकर मंगाया जा सकता है.   

16 टिप्‍पणियां:

  1. आज के इस भ्र्ष्टाचारी माहौल में जो घट रहा है , जो घटता है उसका आग्रह रहित ब्यौरा दे पाना कठिन तो है पर इस समीक्षा से पूर्वाग्रही सोच को एक सच भी मिलता है .

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  2. श्रीमती प्रोमिला शंकर जी ने 'गॉड्स आफ करप्शन' पुस्तक के माध्यम से समाज के सामने एक साहसी कदम उठाया है, इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई! किसी ने सच ही कहा है आईएएस यानि आई. एम. सेल्फ.
    इसका हिंदी अनुवाद हो तो यह ज्यादा से ज्यादा आम लोगों तक पहुँच सकेगी .. आखिर आम जनता भी देखें जिन्हें हम सर पर बिठाते हैं वे क्या सोचते हैं, क्या करते हैं .....प्रस्तुति हेतु आपका आभार!

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आए हाए तेरी अंग्रेजी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. रुचिकर जानकारी, प्रोमिला जी को मंगलकामनाएं !

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  5. आपने इस किताब को पढ़ने की उत्कंठा जगा दी। देखता हूँ कैसे मिलती है। :)

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  6. प्रोमिला जी के बारे में जानकार लगा कि सच में प्रजातंत्र की परिभाषा को हमारे देश के 'नायकों' ने कितना विकृत कर रखा है. तंत्र बनाने वाले दूसरे ग्रह के लोग तो नहीं, हम ही है. कानून के हाथ में तराजू तो है ही लेकिन हमने उसके हाथ ही बाँध दिए हैं. दुखद था इनके संघर्ष के बारे में जानना .

    जो एक बात सुखद है..वो है इतनी प्रवाहमयी हिंदी को बहुत दिनों के बाद फिर से पढना.

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  7. बहुत ही उम्दा समीक्षा |सर आभार आपका इस पुस्तक और लेखिका की जानकारी देने हेतु |

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  8. प्रोमिला उमाशंकर जी को सलाम । काफी जिगरा चाहिये ऐसी किताब लिखने के लिये और सही को सही और गलत को गलत अपने सेवा काल में कहने के लिये।

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  9. भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद पर सुश्री प्रोमिला जी ने बेबाकी से लिख कर निश्चय ही देशप्रेम की भावना उजागर की है । उम्दा समीक्षा

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  10. भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद पर सुश्री प्रोमिला जी ने बेबाकी से लिख कर निश्चय ही देशप्रेम की भावना उजागर की है । उम्दा समीक्षा

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