मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मन की उम्र

मेरे मित्र ,सहपाठी ,पारिवारिक चिकित्सक और जार्जियन डॉ. राम आशीष वर्मा जी अक्सर समवयियों(पीयर ग्रुप )  को चेताते रहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ काया तो जरावस्था को प्राप्त होती रहती है मगर मन उसी तरह स्फूर्त और युवा बना रहता है-मतलब शरीर मन का साथ छोड़ने लगता है.आशय यह हुआ कि मन और देह का चोली दामन का साथ नहीं है . और इस लिए बहुत सावधान रहना चाहिए और मन की हर बात को मानने के पहले अपनी दैहिक समीक्षा अवश्य कर लेनी चाहिए और एक विज्ञ सुचिंतित निर्णय लेना चाहिए नहीं तो अपने  स्वास्थ्य को आप खतरे में डाल  देगें और चिकित्सकों की चांदी में और इजाफा ही होगा -मुझे नहीं मालूम कि हमारे ब्लॉगर चिकित्सक, डॉ.वर्मा की इस बात से इत्तेफाक रखेगें या नहीं मगर मेरा पूरा इत्तेफाक है -क्योकि मैं डॉ.वर्मा पर एक चिकित्सक और मित्र के नाते भी पूरा विश्वास रखता हूँ . उनकी डायग्नोसिस सटीक होती है -और मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि इधर वे कई बार यह बात मुझसे क्यों कह गए हैं? क्या मुझे भी उनकी सलाह पर गंभीरता से सोचना चाहिए या फिर इस बात को बस ऐसे ही कही जाने  वाली कतिपय बातों (प्लैटीचूड)   की तरह टाल दिया जाना चाहिए ..मगर मैं समझता हूँ कि उनकी बात में दम है!और इसलिए मैंने उनकी इस सलाह पर गंभीर चिंतन मनन किया है ..कुछ प्रेक्षण ब्लॉग जगत में भी किया है और खुद अपना भोगा हुआ यथार्थ तो है ही ... :) 

आखिर ऐसा क्यों है कि शरीर का साथ मन नहीं देता? बचपन में मन तो बच्चा रहता है किशोर और युवा भी होता चलता  है.. मतलब उम्र के सामयिक बढाव (क्रोनोलोजी) के साथ एक समय तक तो मन की  और देह की उम्र का सायुज्य -समन्वय बना रहता है मगर जैसे ही शरीर जरावस्था की ओर    अग्रसर होता है वह मानों जिद्दी बच्चे की तरह देह से किनारा करने लगता  है ....तुम जाओ भाड़ में अभी तो मैं जवान हूँ ..... एक अजीब सी कान्फ्लिक्ट शुरू हो जाती है ...शरीर बुढ़ाता जाता है मगर मन उसी तरह चंचल बना रहता है .....गीता में कृष्ण ने भी अर्जुन के माध्यम से जन जन को इसलिए ही आगाह किया -हे अर्जुन यह मन बड़ा चंचल है मगर हाँ , निरंतर स्व -अनुशासन   से इस पर नियंत्रण रखा जा सकता है ..मगर यह नियंत्रण वाली थियरी मानवता पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाई -कितनी ही शकुन्तलाओं और मत्स्यगंधाओं के जन्म इस बात के प्रमाण हैं ....मतलब आज तक न तो अध्यात्म और न ही विज्ञान या तकनीक के पास इस दुर्निवार समस्या का कोई स्थाई हल मिल सका है ....हाँ आत्म अनुशासन कुछ सीमा तक कारगर है मगर यह  परिवेश ,स्फुलिंग ,अंतरावस्था ,मनः स्थति आदि अन्यान्य बातों पर निर्भर है ....

पुराण कथा है है की राजा ययाति ने अपने एक पुत्र से युवावस्था की भीख तक मांग ली ...पितृभक्त पुत्र ने अपने मन का अर्पण कर दिया ..क्या आधुनिक चिकित्सा कोई ऐसा माजूम -मन्त्र मनुष्य को कभी सौंप सकेगी? एक कथा आती है अर्जुन की जब वे एक हिजड़े (बृहन्नला) के रूप से उन्मोचित हुए तो सचमुच बड़ी क्लैव्यता का अनुभव कर रहे थे तब दैव-चिकित्सकों ने उनको पुनः  उर्जित किया -वे मन से फिर युवा हो गए -क्या इस चिरयौवन की कुंजी मनुष्य को कभी मिल पायेगी? यह पोस्ट लिखते समय मेरे मन में बार बार यह एक असहज सी बात आ रही है कि देह और मन की यह बेमेलता पुरुषों के साथ ही क्यों ज्यादा है -वे ही इस अभिशाप से क्यों ज्यादा त्रस्त हैं?(ब्लॉग जगत के निरंतर प्रेक्षण ने इस अध्ययन में मेरी काफी मदद  की है -शुक्रिया ब्लॉग जगत! ) ..आखिर प्रकृति की क्या गुप्त अभिलाषा है?वह चाहती क्या है? एक जैविकी के अध्येता के रूप में मेरी कुछ संकल्पनाएँ हैं  -

मनुष्य अपनी अंतिम सांस तक प्रजनन -उर्वर रहता है जबकि नारी यह क्षमता जल्दी ही ,सामान्यतः ५० वर्ष के बाद ही त्याग देती है ....अब शरीर भले ही जरावस्था में है मगर कुदरत की खुराफात तो देखिये उसने नर की प्रजनन क्षमता -शुक्राणुओं को सक्रिय बनाए रखा है ...और यह बिना उद्येश्य के नहीं -यह प्रकृति चाहती है कि पुरुष मरते दम तक प्रजनन में योगदान देता रहे ....और यह तब तक क्रियात्मक नहीं होगा जब तक उसके मन को भी चंचल न रखा जाय! मगर विचारणीय यह है कि कुदरत की यह अपेक्षा पुरुष से ही क्यों है ? इन प्रश्न का उत्तर हमें जैविकी और मानव अतीत के कई अतीत -गह्वरों में ले जाएगा ....क्या संतति संवहन के लिए पुरुष(शुक्राणु )  का योगदान ज्यादा जरुरी है ? मगर बिना नारी के योगदान (अंडाणु ) के संतत्ति निर्वहन /संवहन संभव नहीं यह हम सभी जानते हैं ....क्या अतीत के किसी धुंधलके में पुरुषों की संख्या बहुत कम हो गयी थी -नारियां भोग्य थीं इसलिए  अबध्य थीं ..उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी ...पुरुष संख्या क्रांतिक सीमा तक कम होती जा रही थी... प्रकृति के पास कालान्तरों में   इसके बिना कोई चारा नहीं रहा कि वह पुरुष को अखंड उर्वरता दे दे ? सोचिये आप भी ....

मगर ऐसा परिहास कि मन के  ओज को बनाए रखने के बावजूद  भी शरीर को  प्रकृति  बुढापे से मुक्त नहीं कर पायी और पुरुष को प्रायः  उपहास का पात्र  बनाया :( ....यह ठीक नहीं हुआ ..सरासर नाइंसाफी ...मैं तो चाहता हूँ स्त्री और पुरुष दोनों को ही चिर यौवन की सौगात मिल जाय .
.
अब वैज्ञानिकों से हम यही   आस लगाए बैठे हैं!  




33 टिप्‍पणियां:

  1. @ मन की हर बात को मानने के पहले अपनी दैहिक समीक्षा अवश्य कर लेनी चाहिए ....

    क्यों डरा रहे हो ....??

    इसके आगे लेख की गंभीरता बढ़ गयी है सो अली सर की मदद मांगते हैं :-)

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  2. हम तो 37 में रोक कर खड़े हो गये हैं उम्र को।

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  3. हम तो मन के अधीन हैं पूरी तरह....शारीर बुढ़ा रहा है पर वही बच्चों जैसी हरकतें,बचपना समाया हुआ है अन्दर !
    कई बार गंभीर उपदेश मिलते हैं कि 'अब तो बड़े बन जाओ' पर दिल है कि मानता नहीं !
    सोचता हूँ,यही हमारी पूँजी है बुढापे से निजात पाने के लिए और वैज्ञानिकों की नज़र से दवा भी !

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  4. पुरुष-मन चंचल नहीं अपितु असीम ऊर्जा वान होता है जिसे संगृहित कर आविष्कार व अनुसन्धान आदि कार्यों में लगाया जाता है. इतिहास साक्षी है पृथ्वी पर जितने भी महान कार्य हुए हैं सभी पुरुषों ने ही किये हैं.अपवाद में कुछ ही स्त्री हैं. कालांतर में शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने आज का परिदृश्य ही बदल डाला है.तन भले ही जर्जर होता जाता है पर मन अपने लक्ष्य तक जीवन के आखिरी पड़ाव में भी पहुँच ही जाता है. ऐसा कई उदाहरण है.अब पुरुष जाने वे अपनी ऊर्जा का कैसे उपयोग करते है. चर्चा के गलियारे में अन्ना के अनशन को ब्रह्मचर्य से जोड़ा जा रहा है.संभवत गलत हो. लेकिन वेद-उपनिषद में कई उल्लेख मिलतें ही हैं. महात्मा गाँधी भी बहुत पहले बा को माँ तुल्य मानने लगे थे. ऐसा मैंने पढ़ा है. ज्यादा तो नहीं जानती हूँ.ये मेरा निजी विचार है.

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  5. अरविन्द जी , आपके मित्र डॉ वर्मा जी बिल्कुल सही कह रहे हैं . आदमी का तन तो थकने लगता है लेकिन मन नहीं .
    हालाँकि तन को भी अनुशासित जीवन शैली से काफी हद तक लम्बे समय तक सुचारू रूप से चलाया जा सकता है .
    रही बात पुरुष और नारी के अंतर की --तो यह प्राकृतिक चयन ही लगता है . प्रकृति ने आबादी को काबू में रखने के लिए नेचुरल कॉन्ट्रासेप्शन बना दिया है . यानि अनियंत्रित वृद्धि को रोकने के लिए बायोलोजिकल कंट्रोल .ताली एक हाथ से बज ही नहीं सकती . आखिर कुदरत बहुत बड़ी चीज़ है . उसके आगे हम कुछ नहीं .

    मनोभाव आयुनुसार बदलते रहते हैं . लेकिन बाहरी वातावरण का भी बहुत प्रभाव पड़ता है . एक गरीब मजदूर रोज़ी रोटी कमाने के चक्कर में बाकी सारे चक्कर भूल जाता है . लेकिन एक ८६ साल का खाली दिमाग भी शैतान का घर बन सकता है . समझ गए ना .

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  6. सोचना दिलचस्प है इस विषय पर।
    पुरुषों की देर तक की शुक्राणु-सामर्थ्य संभवतः उनकी नैसर्गिक शक्ति संबंधी वरीयता का प्रमाद हो।
    ---
    ब्लोग जगत में एकाध ब्लोग तो ऐसे हैं जहाँ कुछ ऐसी वृद्धजन मछिहर लगाए रहते हैं जो अन्य किसी ब्लोग पर नहीं जाते और वहाँ शृंखला-बद्धता में जमे रहते हैं, निश्चित रूप से प्रेक्षण के लिए चुनौती है जबकि उस ब्लाग का कंटेंट कुछ खास न हो..!
    ---
    बाकी ब्याग्रादि तो बहुतों को ययाति बना रही है, बिज्ञान संभव है अण्डाणु-पक्ष को भी इस नैसर्गिक पक्षपात से मुक्ति दिलाने में कुछ करे, आप वैज्ञानिक-चेतना से संपन्न हैं, इस दिशा में शोध-रत होइये देव :)

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  7. बहुत सार्थक जानकारी देती पोस्ट बधाई सर

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  8. बहुत सार्थक जानकारी देती पोस्ट बधाई सर

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  9. लेख तो बढिया और गंभीर है... पर अपन तो गंभीर होने से रहे....... अत: दुबारा यही कहेंगे..

    दिल है की मानता नहीं :)

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  10. डॉ. दाराल की टिप्पणी से सहमत हूँ.
    योग दर्शन में कहा गया है -- योगश्चित्तवृत्ति निरोध:. मन की चपलता और चंचलता को दूर करने से बढती उमर के साथ सामंजस्य स्थापित हो जाता है.....

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  11. तो क्या मन की उम्र सिर्फ़ 'प्रजनन - उर्वरता' पर ही आश्रित है, या यह सिर्फ़ एक पहलू है ! अमृता तन्मय जी की राय भी विचारणीय हैं.

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  12. मैं मन हूँ। युगों युगों से लोग मुझे कभी काबू में रखने के पक्षधर हैं तो कोई मन की कुंलाचे भरने देने के पक्षधर हैं।

    लेकिन ऐसा देखा गया है कि जो लोग मन को काबू में रखने के पक्षधर हैं वे आलरेडी मन को लिये लिये पता नहीं कहां कहां डोल आये हैं और अब थककर मन को काबू में रखने की बात करते हैं :)

    तो दूजी ओर मन को कुलांचे भरने देने के पक्षधर वो लोग हैं जो अब तक मन ही मन बेहद दबे दबे से रहे थे, अब जाकर एहसास हो रहा है उन्हें कि मन को कुलांचे भरने देता तो अच्छा था :)

    जैसे व्यक्तिगत अनुभव, वैसे विचार :)

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  13. प्रत्युत्तर :
    @सतीश सक्सेना जी ,
    आप डरेगें भला ?
    @प्रवीण पाण्डेय जी ,
    इश्वर करें ३७ का यह यौवन ही चिरस्थायी हो जाय.
    @संतोष जी
    बचपन तो ठीक है मगर बचपना नहीं
    @अमृता तन्मय जी ,
    आपके विचार सारवान हैं ,आभार !
    @डॉ, दराल साहब ,
    समझ गए जी समझ गए :)
    @अमरेन्द्र जी ,
    सटीक टिप्पणी है ,क्या मारा है पापड वालों को :)

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  14. @दीपक बाबा जी,
    जी यही तो, दिल है कि ससुरा मन को मानने नहीं देता :)
    @अभिषेक जी ,
    अब गुलदस्ते के सभी फूलों के बजाय किसी एक फूल पर एक समय केन्द्रित रहना
    ज्यादा उपयुक्त है ...अभी हम प्रजनन उर्वरा को ही लिए हैं -आपको कुछ कहना है तो खुल के कहिये न
    लजा क्यों रहे हैं :)
    @ललित शर्मा जी
    योगश्चित्तवृत्ति निरोध: बड़ा कठिन मार्ग है :)
    @सतीश पंचम जी ,
    "जैसे व्यक्तिगत अनुभव, वैसे विचार :)"
    मगर आप खीस खेमें में हैं-यह भी तो बताते जाईये

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  15. अरविन्द जी,
    एक सुंदर आलेख के लिये धन्यवाद। कुछ ही दिन पहले एक आलेख पढा है प्रकृति के इस अनोखे खेल पर उसी से मिली जानकारी पेश कर रहा हूँ, शायद आपको पहले से पता हो।
    स्त्री अपने सीमित अंडाणुओं के साथ ही जन्म लेती है और किशोरावस्था से लेकर प्रौढावस्था तक इन अंडाणुओं का प्रयोग होता रहता है। इसमें से ज्यादातर मासिक धर्म के समय व्यर्थ चले जाते हैं। लेकिन स्त्री का शरीर चाहकर भी अंडाणु बना नहीं सकता, जितने बचे हैं, बचे हैं।

    पुरूष का मामला पेचींदा है। पुरुष फ़ोटोकापी मशीन की तरह अपने शुक्राणुओं की रिप्लिका किन्ही किन्ही मामलों में ७०-७५ वर्ष की उम्र तक कर पाने में सक्षम होते हैं। लेकिन नये शोध बताते हैं कि ३५-४० की उम्र के बाद पुरुष संतान उत्पन्न करने में भले ही सक्षम हो लेकिन उसके शुक्राणुओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसका कारण है कि शरीर शुक्राणु की ओरिजनल कापी को सहेज कर नहीं रखता और फ़ोटोकापी से फ़ोटोकापी बनाते बनाते आप ओरिजनल से काफ़ी दूर आ चुके होते हैं। है न बडी दिलचस्प बात...
    इसी के चलते ४०-४५ से बडी उम्र के पुरूषों की सन्तानों में आनुवांशिक अवगुण आने की सम्भावना बढ जाती है।

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  16. वैसे गालिब ने क्या खूब कहा है,
    गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आंखो में तो दम है,
    रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे ।

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  17. बहुत सुंदर ज्ञानवर्धक प्रस्तुति,
    एक चीज और, मुझे कुछ धर्मिक किताबें यूनीकोड में चाहिये, क्या कोई वेबसाइट आप बता पायेंगें,
    आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  18. सच है मन को बांधना आसान नहीं है....... हर उम्र में उर्जावान होता रहता है मन

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  19. ओहो...! तो फिर लगे रहिये शव-साधना में और ..वो जो गिनीज बुक हैं न ..उसमे रिकार्ड-दर-रिकार्ड बनाते रहिये..

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  20. @नीरज भाई,
    टिप्पणी -विचार के लिए आभार .मगर बुढापे से शुक्राणु में आनुवांशिक विकृतियों वाले मामले पर
    शोध का लिंक चाहूंगा ताकि यह देख सकूं कि विकृतियाँ अगर आती भी हैं तो क्यों और कैसे ?
    बाकी ग़ालिब का शेर तो निचोड़ ही है ..
    @विवेक जैन जी ,
    मैं तो भईया खुद तलाश में हूँ मिलेगी तो साझा कर लेगें
    @डॉ. मोनिका शर्मा जी
    आभार
    @देवि वर्ज्या:)
    आप आयीं तो पोस्ट सार्थक हुयी :)

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  21. अब पुष जाने वे अपनी ऊजा का कैसे उपयोग करते है.
    Amrita ji ki is tippani par sare purush sathiyo ko vichat karna chahiye.
    Kripya atmanushashan par bhi koi aosi hi post awasya likhiyega.

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  22. यहीं आ कर तो फेल हो जाते हैं समाज शास्त्री। प्रकृति पर समाज का कठोर नियंत्रण। हम जब से सामाजिक प्राणी हुए, सभ्य होते गये, हमारे विचार भी बदलते रहे। पहले एक पुरूष की कई पत्नियाँ होती थीं..बाद में तुलसी दास जी ने भगवान राम के माध्यम से एक पत्नी व्रत का ऐसा पाठ पढ़ाया कि जिसे देखो वही पत्नी व्रता हो गया। फिर नई समस्या आने लगी..लीव टुगेदर पर सहमति बन गई। समाज इस बिंदु पर बड़ा कनफ्युजियाया लगता है। मुझे तो इस समस्या के समाधान के लिए ओशो की शरण में जाना अच्छा लगता है। ओशो के ध्यान और ज्ञान दर्शन से ही मन की चंचलता रोकी जा सकती है।

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  23. "ये जो मन है ना.. मन समझती हैं ना आप.."
    टू भी तो तड़पा होगा मनको बनाकर
    तूफ़ान ये प्यार का मन में बसाकर
    कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
    आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी.

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  24. क्यों आस लगाए बैठे हो
    शीशे का मसीहा कोई नहीं :)

    हमारे बुज़ुर्ग कह गए हैं कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। बदन साथ दे न दें, पर दिल को जवान रखिए ना॥

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  25. आदरणीय महोदय

    , आपने प्रश्न तो आपने बडा प्रासंगिक उठाया है, लेकिन मैं यह सोच रहा था कि वर्जय नारी स्वर ने यहाँ तो ‘लगे रहो मुन्ना भाई ’ की तर्ज पर ‘ तो फिर लगे रहो शव साधना में....’ की सलाह दी है और उधर साधक की श्रेष्ठता को ही प्रश्नचिन्हित कर रही हैं।

    सारवान विचार तो अमृता जी के ही हैं जिन्होंने इतिहास के खजाने से उठाकर सभी बहुमूल्य रत्न पुरूषों के खाते में ही डाल दिये हैं। मन का साथ छोडती शारीरिक क्षमताओं के संबंध में आत्मानुशासन पर आप जैसा कोई सधी कलम का चितेरा ही लिख सकेगा ।

    कृपया इसे भी अपने विचाराधीन विषयों के झोले में डाल लें। आभारी रहूँगा।

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  26. @अशोक कुमार शुक्ल जी,
    मन को चंचल रहने दीजिये उनकी लगाम संस्कारों ने थाम रखी है -मुझे और आपको चिंतित होने की जरुरत नहीं है :)
    हाँ उस पहलू पर जरुर लिखेगें मगर तभी जब खुद अपने मन पर नियंत्रण रख लें !

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  27. स्त्रियों की शारीरिक रचना , पुरुषों की तुलना में ज्यादा कमज़ोर होती है .एक प्रजनन उनके लिए शारीरिक शक्ति को घटाने के लिए ही काफी होता है अधिक प्रजनन होने पर उनकी शक्ति में क्षय होना स्वाभाविक है . शायद इसीलिए पृकृति ने उन्हें प्रजनन हेतु वह उम्र नहीं दी जो पुरुष को दी , जहाँ तक मन के चंचल होने की बात है , तो वही एक ऊर्जा है जो व्यक्ति को कर्म से बांधे रहती है .., चाहे फिर वह कोई भी कर्म क्योँ न हो !...,

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  28. स्त्रियों की शारीरिक रचना , पुरुषों की तुलना में ज्यादा कमज़ोर होती है .एक प्रजनन उनके लिए शारीरिक शक्ति को घटाने के लिए ही काफी होता है अधिक प्रजनन होने पर उनकी शक्ति में क्षय होना स्वाभाविक है . शायद इसीलिए पृकृति ने उन्हें प्रजनन हेतु वह उम्र नहीं दी जो पुरुष को दी , जहाँ तक मन के चंचल होने की बात है , तो वही एक ऊर्जा है जो व्यक्ति को कर्म से बांधे रहती है .., चाहे फिर वह कोई भी कर्म क्योँ न हो !...,

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