रविवार, 8 अगस्त 2010

कबीर तुलसी श्रीराम त्रयी और मानस का बोनस -1

मेरी पिछली पोस्ट कौन और क्यूं हैं राम  पर अली सा ने टिप्पणी की है कि मैं कबीर ,तुलसी और /के राम पर कुछ क्रमबद्ध लिखूं जो यहाँ  ब्लॉग पर चल रहे ईशनिंदा के माहौल से अलग हो ....मैंने इस विषय पर उन्हें अपने सीमित अध्ययन के चलते  टिट्टिभ प्रयास का वायदा किया था तो आज ही 'काल करे सो आज कर आज करे सो अब ' के अनुसार कबीर साहब पर कुछ लिख रहा हूँ -पहले ही कह दूं कि कबीर तुलसी के पहले आये तो यह भारतीय जनमानस के लिए मंगलकारी साबित हुआ .ऐसा क्यों हुआ आप खुद इस श्रृखला के समापन पर समझ जायेगें .

जैसा सब जानते ही हैं ,कबीर के जन्म के विषय में जो भी किवदन्ती हो इतना तो तय है कि उनका लालन पालन मुस्लिम परिवार में हुआ .-उनके जन्म के पहले काशी में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था... आज जो कबीर साहित्य उपलब्ध है उसके बारे में यह कहना मुश्किल है कि कितना मूल कबीर साहब का है और कितना उनके अनुयायियों का ..कबीर पंथियों को लोक जीवन ने लम्बे समय तक हाथो हाथ लिया -क्योंकि तत्कालीन पाखंडियों की कबीर ने जम कर खिचाई की थी ...कबीरपंथी पोंगापंथियों और सामाजिक शोषण कर्ताओं पर भारी पड़ने लगे ..कबीर ने कूप मंडूकता,और अतार्किक गतिविधयों पर गहरी चोटें की ..लोगों को ललकारने की भाषा में उनकी बेवकूफियों की खबर ली ..पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजु पहाड़ ,तासे यह चकिया भली पूजि खाय संसार और काकर पाथर  जोरि के मस्जिद लई बनाय  ता चढि मुल्ला  बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय .....आदि आदि  मगर इन चार पॉँच  सौ सालों में भी कोई फर्क आया है भला ?...कबीर तल्ख़ से और तल्ख़ होते गए ..कबीरपंथी भी  अक्खड़ होते रहे ,कबीर के बाद तो और भी ....उनके संदेशों की एक अलग सधुक्कड़ी भाषा ही बनती गयी ,जिसमे भोजपुरी ,अवधी ,मैथिली ,उड़िया ,राजस्थानी ,पंजाबी के पुट भी आते चले गए .कबीरपंथ का इतना व्यापक फैलाव होने के बाद भी आज भी बड़े पैमाने पर कर्मकांडों  और कट्टरता का बोलबाला बना हुआ है.
इस छोटे से आलेख /पोस्ट में कबीर के व्यक्ति,काव्य क्षमता -रस निष्पत्ति  और पंथ का विस्तार से वर्णन संभव नहीं है ...कई मनीषी इस पर पहले लेखनी चला चुके हैं ..हिन्दी साहत्य के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर पर आधिकारिक तौर पर लिखा -अंतर्जाल पर भी प्रभूत सामग्री उपलब्ध है .कबीर अपने काल के चारण कवियों के भांति  तो नहीं थे ....वह ऐसा काल था  जब चारो ओर हठवाद,पाखंडवाद ,और तमाम तरह की कुरीतियाँ फ़ैली हुई थीं ..एक तरफ इस्लामिक साम्राज्यवाद का अहम् जोर पकड़ रहा था तो दूसरी ओर हिन्दुओं का जर्जरित पोंगापंथ -धर्म को "तिजारत" बना दिया गया ..आज भी कहाँ बदला है कुछ ??  ..
कबीर ने पोंगापंथी हिन्दुओं ,कठमुल्ले मुसलमानों को तर्क के आधार पर चुनौतियाँ दी  ..और दोनों में सामंजस्य स्थापित करने के गंभीर प्रयास किये  .संत नानक के अनुयायियों ने कबीर को पूरा सम्मान दिया -गुरु ग्रन्थ साहब में इसकी झलक भी दिखती है ..हिन्दुओं में भी आज कबीर पंथी यत्र तत्र सर्वत्र दिखते हैं मगर मुसलमानों में कबीरपंथी नहीं दिखते यद्यपि कबीर की ईश्वर में अगाध श्रद्धा थी ...एक मुसलमान परिवार के होने के बाद भी आज मुसलमान "कबीर साहब" को वह सम्मान नहीं देते दिखाई देते जिसके वे वास्तविक हक़दार हैं .

कबीर का अध्ययन सम्पूर्ण संत साहित्य के अध्ययन की आधारशिला है -सच तो यह है कि तुलसी साहित्य की चरम वास्तविकता को बिना कबीर को समझे आत्मसात नहीं किया जा सकता ..कबीर का प्रादुर्भाव  लोक साहित्य के  इतिहास में कई सुनहले पन्ने जोड गया है ....
.अगली बार तुलसी ...
कबीर तुलसी श्रीराम त्रयी और मानस का बोनस -1

26 टिप्‍पणियां:

  1. लिखने को बहुत सी बातें हैं, विषय ही ऐसा है। एक तो यह कि गुरु रामानन्द का शिष्य होने के नाते मुसलमानों के लिये कबीर भी कोई पीर-मौलवी नहीं हो सकते। समंवयवादी सनातन भारतीय परम्पराओं में कबीर जैसे अक्खडों को अपनाने में धार्मिक या सामाजिक कोई बाधा नहीं है। परंतु कट्टर मुस्लिम दृष्टिकोण से देखने पर वे जस्ट अनदर पैगन/काफिर ही हैं।

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  2. कबीरपंथ का इतना व्यापक फैलाव होने के बाद भी आज भी बड़े पैमाने पर कर्मकांडों और कट्टरता का बोलबाला बना हुआ है.
    लोग सुन सब लेते हैं .. पर नियम को तोडने से हिचकते हैं !!

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  3. पंडित जी... आपकी ज्ञान वर्षा में नहाकर जो आनंदानुभूति हुई वह वर्णनातीत है! जारी रखिए!!

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  4. कबीर संगत साधु की नित प्रति कीजै जाय ।
    दुरमति दूर बहावसी देशी सुमति बताय ।।

    इसी कारण आपकी सोहबत में आया हूं ।

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  5. बहुत आभार इस आलेख के लिए.

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  6. स्मार्ट इंडियन से सहमत।
    वैसे आप ने बीड़ा उठा लिया है तो घोर अध्ययन भी अपेक्षित है।

    @ मुसलमानों में कबीरपंथी नहीं दिखते।
    यह इस लेख की पंच लाइन है। अगर वाकई ऐसा है तो कब्र, औलिया, मज़ार, अस्ताना वगैरह में विश्वास रखने वाले 'एकेश्वरवादी' मुस्लिम कबीर से परहेज क्यों करते हैं, विचारणीय है।

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  7. @गिरिजेश भाई ,
    अध्ययन का क्या किया जाय उसके लिए तो एक पूरा जीवन भी छोटा है .
    मैं विज्ञान का मनई हूँ ,उसी पद्धति के अनुरूप लिखता पढता हूँ -जाहन गलितयाँ होंगी
    प्रतिक्रियायें या सम वयी समीक्षा (पीयर रिव्यू ) उसे दुरुस्त करती चलेगी ..
    बहुत कुछ मैं भी सीखूंगा इसलिए ही यह संत समीरा या बतरस की लालच में बिच्छू विद्या के जाने बिना सीधे सर्प के मुंह में उंगली डाल दी है -किसी ईश्वरीय प्रेरणा से ही -और वही अन्टी डोट भी देगा यह विश्वास प्रबल है .
    मैं आम बोलचाल की बोली भाषा के विमर्श को पसंद करता हूँ ,पंडितई के सख्त खिलाफ हूँ ...

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  8. aapka lekh bahut hi gyanvardhak laga.
    bahut hisamyik aalekh.
    poonam

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  9. antidote तो मिलेगाही, इसमें हमें पूर्ण विश्वास है. जहां तक आस्था का प्रश्न है, साईं बाबा भी एक उदहारण हो सकते हैं.

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  10. 'कबीर' एक समाज व्यवस्था है ! 'कबीर' एक दर्द है जो भारत के प्रत्येक आम आदमी में बस्ता है ! 'कबीर' फटेहाल में भी अक्खडपन से जीने और समाज-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध खड़े रहने की अदम्य प्रेरणा है ! 'कबीर' हमारे समय में सदियों पुराना वह विचार है जिसे अच्छा तो सत्ताधारी वर्ग ने हमेशा कहा परन्तु कभी अपनाया नहीं ! 'कबीर' हमारे समाज की वह सच्चाई है जिसे हम याद रखना नहीं चाहते ! वह सच्चाई लगातार हमारे नकलीपन से हमें मुक्त कर हमसे एक मानवीय मनुष्य बनने की जिरह करती है !
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    "ऐसा कोई ना मिलै जासूं रहिये लागि
    सब जग जलता देखिया अपनी-अपनी आगि!"


    सब तो अलग-अलग जल रहे हैं अपने-अपने ठिकानों पर अपना-अपना ठाठ रचकर अपने-अपने वाणिज्य व्यापार, हिसाब-किताब, नफा-नुकसान के गणित में फसे हुए ! कबीर उन्हें देख रहे ! देख रहे हैं उनका जलना और अपना भी जलना, और रात-दिन इस दुनिया को देखकर बेचैन हैं !
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    कबीर सम्पूर्ण ज्ञान को "सहज" की श्रेणी में ले आते हैं ! इस सहज की भी अपनी साधना है ! शर्त है अहंकार का परित्याग ! अहंकार कोई एक तरह का नहीं ! कुलीनता का अहंकार है ; धन का अहंकार है ; ज्ञान का अहंकार है ; वर्ण या जाति, धर्म का, मजहब का अहंकार है !
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    अरविन्द जी आपकी यह पोस्ट अच्छी लगी!

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  11. स्मार्ट इंडियन जी के कमेंट से पूरी तरह सहमत हूँ।

    कबीर जी के बारे में पढ़ाते समय मेरी क्लास में हिंदी के अध्यापक श्री एम पी सिंह जी कहते थे कि - मेरी समझ में कबीर से बड़ा क्रांतिकारी कोई न रहा होगा जो कि कालक्रम के हिसाब से अपनी सोच को चार सौ-पांच सौ साल आगे रखकर चलता था।

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  12. मेरे गुरु मेरे पिता जी थे, जिन्होने मुझे हमेशा अच्छि अच्छि किताबे पढने को दी, जिन मै कबीर जी की भी किताबे थी, ओर कबी झी ने सच ही कहा है कि अगर पत्थर पुजने से मुझे भगवान मिलता हो तो मै पुरे पहाड को ही पुजू.... आज भी लोग पत्थर को ही दुध पिला रहे है?? यानि कुछ नही बदला...... बहुत सुंदर लिखा आप ने, कबीर मुस्लिम थे, लेकिन लिखते सही थे, आज कल के लोगो की तरह से नही जिन्हे सिर्फ़ हिन्दूयो मै बुराई दिखे बाकी सब पाक, कबीर कि तरह बने ओर फ़िर लिखे...
    इस अति सुंदर लेख के लिये आप का धन्यवाद

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  13. @ कबीरपंथ का इतना व्यापक फैलाव होने के बाद भी...
    क्यूंकि फैलाव पंथियों का होता है ...पंथ का नहीं ...

    अच्छी पोस्ट ...!

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  14. @ अरविन्द जी
    सबसे पहले तो आभार कि आप एक नई लीक पर चल निकले हैं ! अनावश्यक आरोपों /प्रत्यारोपों से दूर !
    कबीर के मूल...उनके पालक माता पिता के धर्म और गुरु धर्म के लेबल लगा कर कबीर को देखना शायद ज्यादती है ! जिन विकट सामजिक परिस्थितियों में कबीर मौजूद थे उन्हें भी ध्यान में रखना होगा !
    ऐसा नहीं कि सनातन भारतीय परंपरा में'प्रोटेस्टर' कबीर पहले थे ! बुद्ध और महावीर को भी इसी प्रोटेस्टेंट परम्परा में गिना जाये , हां यह जरुर कि इनमें से हर एक , दूसरे से अलग है !

    आपके आलेख की श्रीवृद्धि के लिये दर्ज किये गये अच्छे कमेन्ट में से,दो कमेन्ट ज्यादा अच्छे लगे !
    जरा गौर कीजियेगा @ के.एम.मिश्रा ,@ प्रकाश गोविन्द !

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  15. मित्रों, दक्षिण के आडवार संत, नाथों में गोरखनाथ और सिद्धों में सरहपा अपने समय की जिस धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उसके महानायक की तरह कबीर का प्रदुर्भाव हुआ. कबीर जिन सुत्रों के सहारे आगे बढे वे पहले से ही विद्यमान थे. जब वैष्णवी पाखंड सॆ भर गये तो आड्वारों ने आवाज उठायी, जब नाथ योगियों का पतन शुरू हुआ तो गोरख ने विगुल बजाया और जब बौद्ध सिद्धों ने वामाचार का रास्ता अपनाया तो सरहपा ने हांक लगायी. इसी आवाज को बुलन्द स्वर दिया कबीर ने. कबीर सच के अलावा कुछ भी सहने को तैयार नहीं थे. उन्होंने युगांतरकारी काम किया. पर अब कबीरपंथी सब गुड़-गोबर करने में जुटे हुए हैं. भगवान बचाये.

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  16. आज भी बड़े पैमाने पर कर्मकांडों और कट्टरता का बोलबाला बना हुआ है.

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  17. .".वह ऐसा काल था जब चारो ओर हठवाद,पाखंडवाद ,और तमाम तरह की कुरीतियाँ फ़ैली हुई थीं ..एक तरफ इस्लामिक साम्राज्यवाद का अहम् जोर पकड़ रहा था तो दूसरी ओर हिन्दुओं का जर्जरित पोंगापंथ -धर्म को "तिजारत" बना दिया गया ..आज भी कहाँ बदला है कुछ ?? .."


    सच में मिश्रा जी , मुझे भी आश्चर्य होता है कि हम हिन्दुस्तानी किस हाड-मांस के बने है जो ५०० साल में भी ज़रा भी नहीं बदले !

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  18. समय पर ही छुट्टी से वापिस आयी हूँ। बहुत अच्छा लगा आलेख। पता नही कबीर को हम अपने आचर्5ाण मे आत्मसात क्यों नही कर पाये? जब आपने सांम्प के मुंम्ह मे अंगुली डाली है तो जरूर इस पर भी विचार होगा। अगली कडी का इन्तजार रहेगा।

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  19. कबीर पर सारगर्भित निबन्ध। पढ़कर आनन्द आ गया।

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  20. बढ़िया श्रंखला, आनंद आ रहा है ! दूसरे की आस्थाओं पर चोट करते लोगों के मध्य कबीर की बहुत याद आती है , तब और आज में कुछ ख़ास नहीं बदला लगता !

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  21. 'हिन्दुओं में भी आज कबीर पंथी यत्र तत्र सर्वत्र दिखते हैं मगर मुसलमानों में कबीरपंथी नहीं दिखते यद्यपि कबीर की ईश्वर में अगाध श्रद्धा थी ...एक मुसलमान परिवार के होने के बाद भी आज मुसलमान "कबीर साहब" को वह सम्मान नहीं देते दिखाई देते जिसके वे वास्तविक हक़दार हैं .'
    -हिन्दुओं में जन्मजात यह गुण है. मैं इसे हिन्दुओं की विशाल हृदयता कहता हूँ.अगर अपवादों को छोड़ दें तो आम हिन्दू किसी भी धर्म के संत का अनुसरण कर लेता है और खरी खरी कहने वाले को भी आदर देता है.हिन्दुओं ने शिर्डी के साईं बाबा को अपना लिया. इसलिए वे मुसलमानों के लिए त्याज्य हो गए.

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  22. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  23. थोड़े में बहुत कुछ कहता हुआ कबीर जी के बारे me कहता हुआ अच्छा आलेख \
    आभार

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  24. .
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    "पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजु पहाड़ ,
    तासे यह चकिया भली पूजि खाय संसार

    काकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय
    ता चढि मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय"



    *** कबीर के मूल...उनके पालक माता पिता के धर्म और गुरु धर्म के लेबल लगा कर कबीर को देखना शायद ज्यादती है ! जिन विकट सामजिक परिस्थितियों में कबीर मौजूद थे उन्हें भी ध्यान में रखना होगा !

    *** यह एक ऐसा काल है जब चारो ओर हठवाद,पाखंडवाद ,और तमाम तरह की कुरीतियाँ फ़ैली हुई हैं ..एक तरफ इस्लामिक साम्राज्यवाद का अहम् जोर पकड़ रहा है तो दूसरी ओर हिन्दुओं का जर्जरित पोंगापंथ -धर्म को "तिजारत" बना दिया गया है... आज भी इस सबको बदलने की जरूरत है !!!

    *** कबीर ने पोंगापंथी हिन्दुओं ,कठमुल्ले मुसलमानों को तर्क के आधार पर चुनौतियाँ दी थीं !

    *** कबीर सच के अलावा कुछ भी सहने को तैयार नहीं थे... उन्होंने युगांतरकारी काम किया...

    *** 'कबीर' एक समाज व्यवस्था है ! 'कबीर' एक दर्द है जो भारत के प्रत्येक आम आदमी में बस्ता है ! 'कबीर' फटेहाल में भी अक्खडपन से जीने और समाज-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध खड़े रहने की अदम्य प्रेरणा है ! 'कबीर' हमारे समय में सदियों पुराना वह विचार है जिसे अच्छा तो सत्ताधारी वर्ग ने हमेशा कहा परन्तु कभी अपनाया नहीं ! 'कबीर' हमारे समाज की वह सच्चाई है जिसे हम याद रखना नहीं चाहते ! वह सच्चाई लगातार हमारे नकलीपन से हमें मुक्त कर हमसे एक मानवीय मनुष्य बनने की जिरह करती है !

    *** कबीर सम्पूर्ण ज्ञान को "सहज" की श्रेणी में ले आते हैं ! इस सहज की भी अपनी साधना है ! शर्त है अहंकार का परित्याग ! अहंकार कोई एक तरह का नहीं ! कुलीनता का अहंकार है ; धन का अहंकार है ; ज्ञान का अहंकार है ; वर्ण या जाति, धर्म का, मजहब का अहंकार है !



    एक बार फिर से लौट आओ बाबा कबीर...
    तुम्हारी याद आ रही है शिद्दत से...
    आज तुम्हारी ज्यादा जरूरत है !



    (लेखक व टिप्पणीकारों को आभार सहित)



    ...

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    "पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजु पहाड़ ,
    तासे यह चकिया भली पूजि खाय संसार

    काकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय
    ता चढि मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय"



    *** कबीर के मूल...उनके पालक माता पिता के धर्म और गुरु धर्म के लेबल लगा कर कबीर को देखना शायद ज्यादती है ! जिन विकट सामजिक परिस्थितियों में कबीर मौजूद थे उन्हें भी ध्यान में रखना होगा !

    *** यह एक ऐसा काल है जब चारो ओर हठवाद,पाखंडवाद ,और तमाम तरह की कुरीतियाँ फ़ैली हुई हैं ..एक तरफ इस्लामिक साम्राज्यवाद का अहम् जोर पकड़ रहा है तो दूसरी ओर हिन्दुओं का जर्जरित पोंगापंथ -धर्म को "तिजारत" बना दिया गया है... आज भी इस सबको बदलने की जरूरत है !!!

    *** कबीर ने पोंगापंथी हिन्दुओं ,कठमुल्ले मुसलमानों को तर्क के आधार पर चुनौतियाँ दी थीं !

    *** कबीर सच के अलावा कुछ भी सहने को तैयार नहीं थे... उन्होंने युगांतरकारी काम किया...

    *** 'कबीर' एक समाज व्यवस्था है ! 'कबीर' एक दर्द है जो भारत के प्रत्येक आम आदमी में बस्ता है ! 'कबीर' फटेहाल में भी अक्खडपन से जीने और समाज-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध खड़े रहने की अदम्य प्रेरणा है ! 'कबीर' हमारे समय में सदियों पुराना वह विचार है जिसे अच्छा तो सत्ताधारी वर्ग ने हमेशा कहा परन्तु कभी अपनाया नहीं ! 'कबीर' हमारे समाज की वह सच्चाई है जिसे हम याद रखना नहीं चाहते ! वह सच्चाई लगातार हमारे नकलीपन से हमें मुक्त कर हमसे एक मानवीय मनुष्य बनने की जिरह करती है !

    *** कबीर सम्पूर्ण ज्ञान को "सहज" की श्रेणी में ले आते हैं ! इस सहज की भी अपनी साधना है ! शर्त है अहंकार का परित्याग ! अहंकार कोई एक तरह का नहीं ! कुलीनता का अहंकार है ; धन का अहंकार है ; ज्ञान का अहंकार है ; वर्ण या जाति, धर्म का, मजहब का अहंकार है !



    एक बार फिर से लौट आओ बाबा कबीर...
    तुम्हारी याद आ रही है शिद्दत से...
    आज तुम्हारी ज्यादा जरूरत है !



    (लेखक व टिप्पणीकारों को आभार सहित)



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