बुधवार, 8 सितंबर 2010

आखिर कौन हैं शिव ?

मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर लिखी पोस्ट पर डॉ.दिनेश राय द्विवेदी जी ने अनुरोध किया था कि मैं आदि देव शिव पर कुछ लिखूं -अब बनारस में रहकर अगर भोले बाबा पर कुछ नहीं लिखा तो शायद मेरा बनारस प्रवास निष्फल ही चला जाएगा -बनारस वासी का जीवन तो पूरी तरह  शिवमय और शिव आश्रित है -पुराण कहते हैं कि बनारस नगरी शिव के त्रिशूल पर बसी है .मैं शिव या रूद्र या शंकर पर कुछ भी अकादमीय स्तर का लिखने का अधिकारी नहीं हूँ ..इसलिए विद्वानों को इस लेख ,बल्कि छोटी सी पोस्ट से ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए -यह विनम्र अनुरोध है.

भारतीय लोकजीवन में जितना शंकर लोकप्रिय हैं उतना कोई भी देवता प्रिय नहीं है .इन्हें आदि देव माना जाता है -अगर हम मिथकों पुराणों से अलग हट कर बात करें तो इस चमत्कारी व्यक्तित्व के उदगम का पता लगाना और भी टेढ़ी खीर हो जाता है .महादेव से जुड़े इतने वृत्तांत ,इतनी जन श्रुतियां हैं कि उनके बीच से इनके असली रूप को निकाल पाना असम्भव सा है .कौन थे शिव -क्या द्रविण मूल का  कोई बहुत प्रभावी ,शक्तिशाली नेतृत्त्व/कोई मसीहा -मगर जन श्रुतियों में तो वे कपूर सरीखे शुभ्र हैं -कर्पूर गौरम .....और रावण जो शिव का अनन्य भक्त है -महा विराट कज्जल गिरि ,काले रंग का  है ...किरातार्जुनीयम के शिव कोई मंगोल से लगते हैं ....जो किरात  भेष में अर्जुन से युद्ध कर उनका दंभ भंग करते हैं ..तो क्या वे आर्य हैं ? गौरवर्ण हैं ,कैलाश वासी हैं मगर फिर वे रावण का साथ क्यों देते हैं -उनके पुत्र कार्तिकेय राम के विरुद्ध रावण की ओर से लड़ने जाते हैं .फिर आखिर कौन हैं शिव ..?

रूद्र आर्यों के प्रमुख सृजन ऋगवेद  के भी कोई प्रमुख देवता नहीं हैं ...सैन्धव सभ्यता में लिंग पूजा की परम्परा थी और इसलिए आर्य लिंग देवो भव कहकर सैन्धव परम्परा का उपहास उड़ाते हैं ...मुझे तो लगता है कि शिव एक सैन्धव हैं -एक लोकनायक ,चक्रवर्ती सैन्धव जिन्होंने पहली बार दक्षिण से लेकर उत्तर तक एक विशाल साम्राज्य तैयार किया और बाहरी यायावरों को रोकने में हिमालय सरीखी  दृढ़ता दिखाई -बिना उनसे सामंजस्य किये तत्कालीन भारत  /सिन्धु प्रदेश /हिंद प्रदेश के किसी भी भू भाग पर कोई अधिपत्य नहीं कर सका -उनके अनुयायी सैन्धव उनकी विजय  ध्वजा आगे भी फहराते रहे - कालांतर में आर्यों /वैष्णवों (?) का प्रवेश हुआ,घोर संघर्ष ,मेल मिलौवल  से  एक मिश्र संस्कृति विकसित हुई -कुछ विचार स्फुलिंग ऐसे भी हैं जो संकेत करते हैं कि तत्कालीन आक्रान्ता  वैष्णव बहुत आक्रामक रहे होंगें और उन्होंने भीषण जन संहार में सैन्धव पुरुषों का समूल नाश ही कर डाला -वे ढूंढ ढूंढ  कर मारे गएँ -उनकी श्याम वर्णी औरतों को वैष्णवों /आर्यों ने अपनाया -मगर उन औरतों की शिव भक्ति -पूजा पद्धतियाँ सब अपरिवर्तित रहीं बल्कि अगली वंशावलियों में उन्होंने सैन्धव संस्कार ही डाले -शिव तिरोहित नहीं हो सके -जनन   प्रजनन के भी उपास्य बने रहे -आज भी भारत में लिंग पूजा  खासकर औरतों में जितनी प्रिय है विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं है -ललही छठ के पर्व पर  लाल कंद को लिंग प्रतीक के तौर पर पूजा जाता है और शिव पार्वती की रति लीला का सांगोपांग  वर्णन औरते करती हैं जहाँ पुरुष प्रवेश वर्जित रहता है ....

चूंकि शिव बहुत प्राचीन देवता हैं इसलिए अत्यंत पुरानी किंवदंतियों /मिथकों के चर्चित चरित्र शिव ही हैं ...वे पुरुष पुरातन हैं . समूचा उत्तर भारत मूलतः शैव है -इसलिए तुलसी को राम की प्रतिष्ठापना में बहुत बुद्धि चातुर्य दिखाना पड़ा ....आज भी जहाँ आधुनिक जीवन शैली /विधि विधानों का संस्पर्श  तक नहीं है शिव का प्रभाव बदस्तूर कायम है ..जन मानस में वे बड़े भोले देवता के रूप में जाने जाते हैं -पूरे बौड़म हैं ,सहज है ,कृपालु हैं ..मगर मजे की बात है कि वे सहसा दूसरा रूप भी धारण  कर लेते  हैं -रौद्र रूप ,तीसरा नेत्र खोल  तांडव नृत्य कर सारी सृष्टि का लय करने पर उद्धत हो जाते हैं  -सुन्दर हैं तो कुरूप भी कम नहीं हैं ... भोगी हैं तो बड़े त्यागी भी हैं -सती तक का परित्याग कर दिया .....लगता है एक लम्बे काल ,कालांतर में शिव के  प्रेमी जन  जो कुछ उच्चतम स्तर का मानव  व्यवहार प्रतिरूप था उनमें आरोपित करते गए अन्य देवता गण से उनकी श्रेष्टता दिखाने के लिए ....हिन्दू त्रिदेवों में वे सृष्टि संहारक है ,विष्णु पालनकर्ता हैं और ब्रह्मा सर्जक हैं -लेकिन जो संहार करता है उसी को पुनर्सृजन का भी श्रेय मिलता है .

शिव  का सबसे प्रिय रूप उनका लोक मंगलकारी रूप है -कहते हैं वे अपने नंदी बैल पर पार्वती के साथ बैठ मृत्युलोक की  सैर करते रहते हैं और जहां भी कोई  दुखिया मिलता है उसकी फ़ौरन मदद करते हैं -पार्वती भी कम दयावान नहीं हैं!इस दम्पति की छवि घर घर के आदर्श दम्पति की छवि है -लोग भोले जैसा वर चाहते हैं और पार्वती जैसी बिटिया ..जरा भोले बाबा के परिवार का एक चित्र देखिये -बैल को पार्वती का सिंह डरा रहा है ..गणेश के चूहे पर सापों की पैनी नजर है ...और सापों पर कार्तिकेय के वाहन  मोर की गृद्ध दृष्टि लगी है -अजीब माहौल है -आपा धापी ,चिल्ल पों और इस बीच निर्विकार भोले बैठे हैं - एक भारतीय परिवार के मुखिया को इससे बढियां सीख कहाँ मिलेगी .


शिव पर जितनी स्तुतियाँ ,स्तवन -प्रार्थनाएं कही लिखी गयी हैं  किसी और देवता पर नहीं -वे कोई साधारण  देवता तो नहीं -महादेव हैं ...देवताओं तक के भी तारण हार ,उनके कष्ट का हलाहल खुद पी लेने वाले महादेव  -एक चुनिन्दा  श्लोक जो शिव आराधना में बचपन से ही याद है लिख कर यह शिवांक आप सब को समर्पित करता हूँ -
                       कल्पान्तक क्रूर  केलिः क्रतु कदनकरःकुंद कर्पूर कांति                      
 कैलाश कूटे कलित कुमुदनी  कामुकः कान्तकायः  
कंकालक्रीडनोंत्कः कलित कलकलः कालकाली कलत्रह 
कालिंदी कालकण्ठः कलयतु कुशलं कोपि कापालिकः कौ

39 टिप्‍पणियां:

  1. देवो के देव महादेव के बारे में सुंदर वर्णन किया है आपने .....
    जय हो महादेव की ...

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  2. भोले औघड़ दानी के बारे में काफी कुछ नया जानने को मिला, आभार।

    ………….
    साँप काटने पर क्या करें, क्या न करें?

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  3. शिव का सबसे प्रिय रूप उनका लोक मंगलकारी रूप है -कहते हैं वे अपने नंदी बैल पर पार्वती के साथ बैठ मृत्युलोक की सैर करते रहते हैं और जहां भी कोई दुखिया मिलता है उसकी फ़ौरन मदद करते हैं -पार्वती भी कम दयावान नहीं हैं!इस दम्पति की छवि घर घर के आदर्श दम्पति की छवि है -लोग भोले जैसा वर चाहते हैं और पार्वती जैसी बिटिया ..जरा भोले बाबा के परिवार का एक चित्र देखिये -बैल को पार्वती का सिंह डरा रहा है ..गणेश के चूहे पर सापों की पैनी नजर है ...और सापों पर कार्तिकेय के वाहन मोर की गृद्ध दृष्टि लगी है -अजीब माहौल है -आपा धापी ,चिल्ल पों और इस बीच निर्विकार भोले बैठे हैं - एक भारतीय परिवार के मुखिया को इससे बढियां सीख कहाँ मिलेगी

    बहुत अच्छा लगा ये आलेख.

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  4. @माधव ,आपको यह लेख क्लिष्ट और दुर्बोधपूर्ण लगा -अपनी इस कमी के लिए मुझे खेद है !
    @शिखा जी ,आपने लेख के एक मौलिक अंश पर संवाद किया जो आपकी बौद्धिक प्रखरता और उत्कृष्ट संवेदना संवेदना स्टार को दर्शाता है -शुक्रिया !

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  5. Bahut khojpoorn lekh hai Arvind par main Shiv ke bare men bhee usee tarah sochata hoon, jaise Ram, Krishn ke bare men. shiv ka ek alag tarah kaa varnan ramdhaaree singh dinkar ne apnee charchit pustak sanskriti ke char adhyay men bhee kiya hai, par main usse bhee poorn sahamat nahee hoon. mera shiv meree supt chetana hai, jaise shiv tabhee jaagrat hota hai jab parvatee ko kisee anisht kee ashanka hotee hai aur ve unhen sandesh detee hain. usee tarah hamaree chetana bhautik chintan men lagee rahatee hai, yah aadamee ka tamas roop hai, supt avastha hai. jab shakti ka sandesh us chetana ko milata hai, tab vah apne shiv roop men jaagatee hai. hamaare tantr saahity men isaka bahut vishad aur sateek varnan hai. main use sahee maanata hoon. shaivon ne isee chintan ke aadhaar par pratybhigya darshan vikasit kiyaa tha, jo kashmir men bahut lokpriy raha.

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  6. महादेव को कोटि कोटि नमस्कार.
    आलेख का आभार.

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  7. डॉ.दिनेश राय द्विवेदी जी?

    I know doctor are on strike in Rajasthan, but have they started appointing lawyers in place? :o)

    about post..... later.

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  8. शिव का नाम भोलेबाबा है, सरलता से प्रसन्न होने वाले।

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  9. महादेव शिव पर एक उत्कृष्ट लेख ...जानकारी देने के लिए आभार

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  10. आदि देव को समर्पित इस उत्कृष्ट आलेख के लिए धन्यवाद !

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  11. बहुत सुंदर लेख मेरे लिये तो, क्योकि मै तो वेसे ही जीरो हुं इन मामलो मै

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  12. शिव के बारे में जितना भी कहा और सुना जाय कम है. एक बढ़िया लेख के लिए धन्यवाद. रामलीलाओं का मौसम नजदीक है. वहीँ से एक डायलाग " जय शंकर की".

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  13. .
    .
    .

    मुझे भी इंतजार था इस पोस्ट का...

    शिव इस मामले में अनूठे हैं कि उनके चरित्र में सब रंग हैं...आसानी से प्रसन्न होने वाले...तो पल ही में कुपित भी होने वाले...मस्त, एकदम मस्त...जहाँ बाकी देव रत्नजड़ित आभूषण पहन श्रंगार करते दिखते हैं...वहाँ शिव का श्रंगार है भभूत और सर्प...वे उपेक्षित, पददलित, शोषित, पराजित और अक्षम के भी साथी हैं...यह विशेषता उन्हें सब से अलग करती है...

    संहारक तो वह हैं ही...संहार वही कर सकता है जिसे या तो यह पूरी तरह से पता हो कि जिसको मिटाने जा रहा है...उसकी उपयोगिता अब नहीं रही...या फिर जिसमें जरूरत पड़ने पर पुन: सृजन कर पाने का आत्मविश्वास हो...

    कुछ इसी लिये देवों के देव हैं भोले...


    आभार!


    ...

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  14. क्या यह सम्भव नही कि शिव , शंकर और रूद्र तीनो अलग अलग हो ?
    शिव और शंकर वेदो मे नही है लेकिन रूद्र है ! त्रिमुर्ती मे विष्णु और शिव मुख्य है लेकिन उनके उपासको शैवो और वैष्णवो का एक दूसरे से विरोध भी जग जाहिर है ! कैसा विरोधाभाष है ?
    शिव और अघोरपंथ , तन्त्र मन्त्र का रिश्ता ! शिव और चिता भश्म, शराब , जंगली फूल ! साथ् ही शिव लिंग का जलाभिषेक, क्षिराभिषेक! ऐसा लगता है कि काफी सारे व्यक्तित्व चिजे एक दूसरे मे मिश्रीत हो गए है !
    लिंग पूजा (मातृ शक्ति पूजा) तो भारत् ही नही भारत् के बाहर पेगन सभ्यता मे भी प्रचलित थी !

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  15. शिव और पार्वती के आख्यानों में जो सबसे प्रभावित करता है , वह है उनकी एकनिष्ठता ...एक दूसरे के प्रति अद्भुत समर्पण ...
    पार्वती का सीता का क्षद्म रूप धरना, शिव द्वारा उन्हें त्यागना ...मगर सती द्वारा हर जन्म में शिव को ही पाने के लिए की गयी भीषण तपस्या ...
    सती अपने पति का अपमान अपने पिता द्वारा किया जाना भी सहन नहीं कर पाती ...
    भोले शिव वह सब धारण करते हैं , जो कोई नहीं करता ..

    उत्कृष्ट पोस्ट ..!

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  16. प्रवीण शाह के कमेन्ट बहुत अच्छे लगे :-) शुभकामनायें !

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  17. भक्ति काव्य के तीनों प्रमुख आराध्य देवों से प्रवाहित भाव में,शैव धारा अनेक वैशिष्ट्यों से सम्पन्न है क्योंकि वह लोकमानस को सहज रूप में प्रतिबिंबित करती रही है।

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  18. "भारतीय लोकजीवन में जितना शंकर लोकप्रिय हैं उतना कोई भी देवता प्रिय नहीं है"

    क्यों न हो.... आखिर तीसरे नेत्र से कौन नहीं डरत :)

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  19. पता नहीं पूरी तरह विज्ञान को मानू या आपकी तरह विज्ञान+भगवान को ....
    विज्ञान प्रगति सितम्बर -१० के मुखपृष्ट पर आपका लेख छपा है
    बहुत ही उत्तम ज्ञानवर्धक लेख है
    इंसान बना भगवान -अरविन्द मिश्र(बधाइयां सवीकारे जी)
    उस लेख को और कभी इस लेख को पढ़ कर दुविधा
    कभी मिलेंगे तभी चर्चा करेंगे जी
    आभार

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  20. अत्यंत रोचक और सहज भाषा शैली में आपने शिव को अभिव्यक्त करने की कोशीश की और मेरी समझ से इतने सीमित से आलेख में आपने बखूबी उनका चित्रण किया है, आपकी लेखन शैली अदभुत है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  21. जरा भोले बाबा के परिवार का एक चित्र देखिये -बैल को पार्वती का सिंह डरा रहा है ..गणेश के चूहे पर सापों की पैनी नजर है ...और सापों पर कार्तिकेय के वाहन मोर की गृद्ध दृष्टि लगी है -अजीब माहौल है -आपा धापी ,चिल्ल पों और इस बीच निर्विकार भोले बैठे हैं - एक भारतीय परिवार के मुखिया को इससे बढियां सीख >कहाँ मिलेगी .

    उपरोक्त कथन से याद आया कि शिव की उपरोक्त पारिवारिक जटिलाताएं हमको सिखाती हैं कि शिव यानि श्रेष्ठतम इंसान विषम परिस्थितियों में भी मस्त रहता है और उपरोक्त वर्णित स्थितियां कमोबेश हर मानव की स्थितियां है. शायद ब्लागजगत भी इसका अपवाद नही है.

    रामराम.

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  22. क्या कहें भैया? शिव तो मुझे हमेशा गलदश्रु कर देते हैं। मुझे मूर्तिमान भारत लगते हैं। रूप हो, प्रिवार हो, व्यवहार हो ...कुछ भी। शास्त्रीय विमर्श नहीं कर पाऊँगा। कहने को बहुत कुछ है। फिर कभी। अभी तो विश्वनाथ मन्दिर गली में स्वयं को आँसू बहाता देख रहा हूँ। राग यमन गाना सीखा था कभी - नमामि शमीशान निर्वाण रूपम ....
    बाउ गाथा से उद्धृत कर रहा हूँ (http://girijeshrao.blogspot.com/2009/08/blog-post_03.html)(जारी)

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  23. पिछ्ले भाग से जारी..
    सदानन्द की व्याख्या विशुद्ध वितण्डा ही थी लेकिन एक नई दिशा में तथ्य लिए हुए। खड़े हो उन्हों ने वर पक्ष से उठते कोलाहल को शांत किया।
    महेशानन्द की भंगिमा देख उन्हों ने चुनौती प्रस्तुत की। “ठीक है आप मंगल पढ़ें – शिव पर ही होना चाहिए। देखें आप की ‘पारिवारिक’ मंगल कामना कैसी है?”
    सुद्धन ने हरिहर को इशारा किया।
    “रामाद् याञ्चय मेदिनिम् धनपते बीजम् बलालांगलम्।
    प्रेतेशान महिष: तवास्ति वृषभम् त्रिशूलेन फालस्तव।
    शक्ताहम् तवान्न दान करणे, स्कन्दो गोरक्षणे।
    खिन्नाहम् तवान्न हर भिक्ष्योरितिसततं गौरी वचो पातुव:।
    पार्वती जी शंकर जी को उनकी दरिद्रता पर उलाहना दे रही हैं। आप का भिक्षाटन ठीक नहीं है इसलिए आप भगवान राम से थोड़ी सी भूमि, कुबेर से बीज और बलभद्र से हल माँग लीजिए। आप के पास एक बैल तो है ही, यमराज से भैंसा माँग लीजिए। त्रिशूल फाल का काम देगा। मैं आप के लिए जलपान पहुँचाऊँगी। कार्तिकेय पशुओं की रक्षा करेंगे। खेती करिए, आप के निरंतर भिक्षाटन से मैं खिन्न हूँ। इस प्रकार कहते सुनते भवम भवानी सबका मंगल करें।"
    सुद्धन ने हरिहर का छोड़ा हुआ जारी रखा:
    ”शंकर हमारा देश है। हिमालय उसकी जटाएँ हैं जिनसे गंगा बहती है। वह बैल की सवारी करता है- घूमता है हमारे साथ हमारे खेत खलिहानों में। खेतों में पाए जाने वाले खर, पतवार, भाँग, धतूरे सबको अपना लेता है। हमारे चूल्हे और चिता दोनों की भस्म को वह अपने शरीर पर रमा लेता है। हमारी लोक गाथाएँ उसके परिवार में पनपती हैं। उसके निर्धन घर में कोई सम्पदा नहीं। लेकिन उस दरिद्र के घर में सबको आश्रय है – चूहे, साँप, मोर, बिच्छू, बाघ, बैल । हमारी सारी विसंगतियों को वह अपने में समाहित किए हुए है। हमारी विविधता को अगर कोई देव अपने पूरे अस्तित्त्व में समेटे है तो वह है – महादेव।
    महादेव नवदम्पति को जीने की राह दिखाए और अपनी कृपा दृष्टि ‘नए घर’ पर बनाए रखे।"

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  24. बेहद उम्दा खोजपरक आलेख!
    सच में, शिव ही हैं जो भारतीय संस्कृ्ति के अनुपम प्रतीक है..जिनकी गौर देह सत्व की विभूति, तृ्तीय नेत्र ओजस्वी ज्ञान, त्रिशूल के दंड में त्रिगुणात्मक प्रकृ्ति का निवास है. सर्पाहार पहने बाबा नीलकंठ तामसिक विकृ्तियो को संतुलित कर जीवन में सहिष्णुता की अनिवार्यता दर्शाते हैं; जिनका वैराग्य भारतीय संस्कृ्ति द्वारा प्रस्तुत आत्मज्ञान तक पहुंचने का माध्यम है; प्रलयंकर का तांडव सम्पूर्ण जीवन की सक्रियता बनाए रखने का अदभुत विधान है....वृ्ष रूपी धर्म पर सजे ऎसे भोले बाबा की कृ्पा सब पर बनी रहे.....जय भोलेनाथ!

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  25. दर्शन जी
    चलिए किसी दिन कृष्ण का भी आह्वान करते हैं जिन्होंने अर्जुन का मोह भंग किया था ...
    अपनी जड़ों को जानने और और विज्ञान की चर्चा में कहीं कोई अंतर्विरोध नहीं हैं .
    जब तक आप खुद को भलीभांति नहीं जन पायेगें विज्ञान का संव्हार प्रभावी तरीके से नहीं कर पायेगें !

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  26. सॉरी, 'परिवार' 'प्रिवार' हो गया।

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  27. रामांक व शिवांक के पोस्‍ट व टिप्‍पणियों से भक्‍त की आस्‍था और प्रगाढ़ हुई, धन्‍यवाद डॉक्‍टर साहब.

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  28. आप की रचना 10 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  29. रोचक विवेचना की है आपने...
    इस आनंद दाई पोस्ट के लिए आपका आभार...
    जय बम भोले..

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  30. शिव के बारे में आप का ज्ञान अधूरा है .

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  31. आदि देव, प्रथम पुरुश, और स्वयं प्रक्रिति शिव के बारे में और अधिक विस्तार से वैग्यानिक द्रिस्टिकोण के साथ जानना जरूरी लगता है आज।

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  32. जीव से शिव या "जीव ही शिव" .. या फिर...मैं ही शिव ..आपको पढ़कर.

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