रविवार, 6 अक्तूबर 2013

और ज़िंदगी चल पडी .....(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )

चिनहट में 'सादा जीवन उच्च विचार' का सिद्धांत परिस्थितियोंवश ही सही व्यवहार में आ गया था। पत्नी भी खुश थीं . रोटी कपडा और रहने को एक मकान - इस दुनियां में भला और क्या चाहिए? ज़िंदगी चल पड़ी थी . मेरे एक रिश्तेदार जो इंजीनियर थे और ज़ाहिर है समाज में उनका मान सम्मान मुझसे कहीं ज्यादा रहा है -यह सुनकर कि मुझे रहने को सरकारी मकान मिल गया है और हम चैन की वंशी बजा रहे हैं तो अगली लखनऊ मीटिंग के बाद असलियत जानने ही आ पहुंचे -उन्हें किंचित  भरोसा न था . हमने उनकी प्रथम अतिथि के रूप में देवोपम आवाभगत की -अब वे जब भी लखनऊ आते तो सीधे चिनहट आ जाते और यह अवसर महीने में एक बार तो आता ही कभी कभी दो बार भी. वे पता नहीं एक लम्बी सांस लेकर क्यों कहते अब तो आपका सब काम ही फिट हो गया . . अब यहीं आप जमीन ले लेगें और मकान बन जाएगा और यही आराम से रहते एक दिन आप इस संस्थान के प्राचार्य भी बन जायेगें - मैं इस दुनियादारी की बात समझ न पाता और जमीन जायदाद के पचड़े में तो मैं पड़ा ही नहीं कभी .
हर सप्ताह केवल तीन लेक्चर लेने होते थे . दूसरे व्याख्याता आर सी श्रीवास्तव जी थे जो रिटायरमेंट के कगार पर थे और अनुभवों का बड़ा जखीरा उनके पास था . मैं बुजुर्ग होने के नाते और उनके व्यावहारिक ज्ञान के कारण उनकी बड़ी कद्र करता था .संस्थान के प्राचार्य ऐ के राय साहब बंगाली भद्र पुरुष थे और ईमानदार थे. मुझे सरकारी नौकरी की तमाम बातों को बताते . अब चूँकि चिकित्सा के पुश्तैनी धंधे वाले परिवार से पहले सदस्य के रूप में मैं सरकारी नौकरी में आया था तो मुझे इन सीखों की बड़ी आवश्यकता सी लगती थी . जबकि खुद के अनुभव ने सिखाया कि कोई नौकरी हो सरकार की या किसी की भी -नौकरी चाकरी ही है -आप स्वतंत्र नहीं है और फन्ने खां नहीं बनना चाहिए . सबते सेवक धरम कठोरा! सेवक तो सेवक ! उसे मालिक बंनने के उपक्रम नहीं करने चाहिए . और अगर सेवकाई रास नहीं आ रही है तो सरकारी सुख सुविधाओं का त्याग कर सार्वजनिक जीवन में आकर अपनी किस्मत आजमानी चाहिए . यह मैं आज कह रहा हूँ -जबकि मैंने भी सेवा के दौरान कई बार इस विवेक को खोया और हर बार यही सीख पाया हूँ .
मुझमें भौतिकता के प्रति कोई लगाव नहीं रहा है -ऐसा बचपन से नहीं है बल्कि किशोरावस्था से ही मुझे चमक दमक, गाडी घोडा, वैभव भरी जिन्दगी से अरुचि रही है -मैंने कभी किसी से अपनी सुख सुविधा के लिए कुछ नहीं माँगा है -आज तक उधार तो किसी से लिया ही नहीं भले ही मुसीबतें झेल ली हैं . यह अकारण नहीं है बल्कि एक समृद्ध परिवार में परवरिश ने मुझमें किसी भी चीज की 'हाही' उत्पन्न नहीं होने दी थी ...चेतक स्कूटर था हमारे पास और उस पर नवविवाहिता पत्नी को बिठा चिनहट से पंद्रह किलोमीटर दूर लखनऊ शहर -हजरतगंज ,अमीनाबाद हर हप्ते के दो तीन दिन तो जरुर ही घूमता था -अनगनित फिल्म देखता रहा . कभी कभी तो रात नौ दस बजे लौट पाता -मुझे आश्चर्य है कि तब इतना अपराध भी नहीं था . रात होते ही लखनऊ से बाराबंकी रोड तब वीरान सी होने लगती थी . लखनऊ -चिनहट के मध्य में हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड का कारखाना (एच ऐ एल ) पड़ता था -यहाँ तक तो कुछ प्रकाश भी रहता मगर आगे बढ़ते ही घुप अँधेरा और हमारी हिमाकत देखिये कि ऐसे हालत में पत्नी को बिठाये हम चिनहट और वहां से तीन किलोमीटर और दूर मत्स्य प्रशिक्षण संस्थान की निपट वीरान सड़क और घर पहुँचने के ठीक पहले के कब्रिस्तान से गुजरते थे -सच है मूर्खता में अतिशय वीरता भी छुपी होती है ! :-)
एक रात अप्रत्याशित घटना हो ही गयी . अभी हम आधे रास्ते यानि गंतव्य से आठ नौ किलोमीटर दूर ही रहे होंगे कि ऐकसीलेरेटर का तार टूट गया . घुप अँधेरा! स्कूटर खडी हो गयी -अब क्या करें ?बुद्धि ने जवाब दे दिया -दूर दूर तक अँधियारा . अब डर लगने लगा -अकेला होता तो कोई बात नहीं, नयी उम्र थी स्कूटर खींच लाता मगर साथ में पत्नी थीं और सहज बुद्धि ने कहा कि उन्हें साथ लेकर इतनी दूर की चहलकदमी तो समस्याओं का आमंत्रण ही थी . बुद्धि तेजी से रास्ता तलाश रही थी और वह रास्ता सूझा भी -स्कूटर की लाईट ठीक थी . उससे रोशनी मिली तो देखा तार ऊपर से टूटा था और उसका आख़िरी छोर उसकी कवरिंग के नीचे दिख रहा था . अब उपाय सूझा . मैंने पत्नी को समझाया कि एकिसेलेरेटर के इस तार को अच्छी तरह पकड़ के वे बस थोडा तनाव उस पर बनाएं रखें .तार  खीच कर उन्हें थमा स्कूटर स्टार्ट कर क्लच के सहारे नियंत्रण बनाकर हम आगे बढे . अब कुछ मत पूछिए कि वह आठ नौ किमी की दूरी कैसे पूरी हुयी मगर यह युक्ति कारगर रही और यह दूरी करीब एक घंटे में पूरी कर रुकते रुकाते हम रात यही कोई साढ़े दस बजे आवास पर पहुँचे . कुछ ऐसी ही कथा देवासुर  संग्राम   में  लड़ते हुए चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ की नहीं  थी?.. जब रथ के पहिये की धुरी टूटी और कैकेयी ने अपना  हाथ धुरी की जगहं दे दिया ....वह मिथक था मगर यह सच :-) .... यह घटना मुझे और पत्नी को आज तक याद है और वह खौफ भी जिससे हमें गुजरना पड़ा था . हमने अब आगे जल्दी ही गंजिंग (हजरतगंज विहार आज भी गंजिंग कहलाती है वैसे यह टर्म मेडिकल स्टूडेंट में ज्यादा पापुलर है ) पूरा कर लौटने का कार्यक्रम बना लिया था . और अपना लेक्चर लेने के बाद अपराह्न ही हजरतगंज पहुँच यदि फिल्म भी देखनी हो तो साहू, मेफेयर से शो छह बजे ख़त्म होते ही चल पड़ते थे . चौधरी या मोतीमहल से खाने वाने को कुछ पैक करा लेते थे .. एक शानदार ज़िंदगी थी वो, अच्छे बॉस और अच्छे लोग . मगर हालात बदलने वाले थे ...

26 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी नौकरी व अच्छी जगहें कुछ अधिक आनन्द नहीं लाती हैं, जितनी अच्छे वरिष्ठ ले आते हैं। नौकरी के १७ साल तो मैंने भी पूरे कर लिये, आपसे प्रेरणा पाने की इच्छा बलवती हो रही है।

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  2. स्कूटर वाली घटना वाकई न भूलनेवाली है।

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    1. एक रात हम शहर से अपनी कालोनी की तरफ वापस लौट रहे थे , उस रास्ते में लगभग दो किलोमीटर अँधेरा पड़ता था ! देखा कि प्रोफ़ेसर मिश्रा , बड़े बाबू वर्मा को स्कूटर से उतार के, स्कूटर की हेड लाईट के सहारे सड़क पर कुछ कुछ ढूंढ रहे थे ! पता चला कि वर्मा जी स्कूटर के पीछे बैठे हुए थे और किसी बात पर इतना जोर से हँसे कि उनकी बत्तीसी उस अंधेरी सड़क पर गिर गई थी ;) आशय ये कि मिश्रा जी जो ना करें :)

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  3. प्राइवेट चाकरी के चौदह साल तो मैंने भी पूर कर लिए...सही मानिए लिखने को इत्ता है कि फिलहाल लिख नहीं सकता..क्योंकि वर्तमान लिखने से छुट्टी नहीं मिल रही....आपसे सीखने को बहुत कुछ मिलेगा..क्यों ये हम आपको फिर कभी बताएंगे संस्मरण पढ़ते-पढ़ते....

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  4. एक नए सरकारी अधिकारी के एडवेंचर्स पढ़कर मज़ा आ रहा है. एक अनुरोध है - संभव हो तो वार्ताओं को थोड़ा विस्तार दीजिये, खासकर बुज़ुर्ग अधिकारियों की क्या शिक्षाएं आगे कितनी काम आईं, किस अच्छाई ने कितना साथ दिया, कहाँ, कैसी कुशलता अर्जित की आदि ...

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  5. परिस्थितियों में यदि ट्विस्ट न हो जीवन बेमज़ा हो जाता है । चित्रात्मक -ध्वन्यात्मक - मनोरंजक अभिव्यक्ति । मज़ा आ गया ।

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  6. चेतक स्कूटर की सवारी की दास्ताँ ख़ासा रोमांचक है।
    आज का समय ज्यादा असुरक्षित है !

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  7. तब इतनी आधुनिक सुविधाएँ न होने के कारण परिवार को और अपने शौक को ज्यादा समय दे पाते थे.. रोचक है.. श्रंखला..

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  8. आपके अनुभव हमारे लिए भी महत्वपूर्ण होंगे...

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  9. लखनऊ से चिनहट का रास्ता अब वीरान नहीं रहा। पूरा शहरी ठाट पसर गया है चिनहट के आगे तक। एच.ए.एल. तो इंदिरानगर जैसे व्यस्त मुहल्ले के बीच में हो गया है। चौबीसो घंटे ऑटोरिक्शा, सिटीबस और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है।

    आपका वृत्तान्त अत्यन्त रोचक है। अनुराग शर्मा की सलाह ध्यातव्य है।

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  10. रोचक...मुर्खता में अतिशय वीरता छिपी रहती है...शत प्रतिशत सहमत...आपका ये किस्सा पढ़कर अपनी वीरता सह मुर्खता की कहानियां याद आ रही है :p

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  11. आपकी खट्टी मीठी यादें रोचक हैं .

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-08/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -20 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  14. आपके इंजीनियर रिश्तेदार की तरह अपने एक पुलिसिया बुज़ुर्ग रिश्तेदार थे , जिन्हें हमारी पहली पगार सुन के विश्वास ही नहीं हुआ कि 700 - 1600 का कोई पे स्केल भी हो सकता है :)

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  15. रोचक सफ़र है आगे भी लिखते रहें, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. गनीमत है वक्त पर दिमाग चल गया और स्कूटर ठीक हो गया वर्ना रात के समय ऐसी मुसीबत में अच्छे अच्छों की होश उड़ते देर नहीं लगती .....रोचक प्रस्तुति ..

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  17. बिंदास अंदाज़ संस्मरण का। अनुभव बोलता है एक उम्र के बाद।

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  18. बढ़िया संस्मरण ...आसपास रहने या हमारे साथ कम करने वाले लोगों का माहौल और व्यवहार भी हमें प्रभावित तो करता ही है

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  19. ज़वानी मे मूर्खता ही वीरता होती है. अब ऐसा दुस्साहस करके दिखाइये तो ! :)
    सप्ताह मे तीन लेक्चर -- यह तो मज़े की नौकरी है मिश्र जी.
    बढिया संस्मरण .

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  20. बढ़िया संस्मरण, ऐसे समय पर बन्दा बुरी तरह फँस जाता है खासकर जब महिला साथ में हो।

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