रविवार, 17 नवंबर 2013

चिनहट से विदाई (सेवा संस्मरण -11)

चिनहट से विदाई का वक्त आ गया था।  झांसी जल्दी ज्वाइन करना था।  चिनहट के दो ढाई साल के प्रवास में कोई सामान वगैरह तो था नहीं इसलिए एक ट्रेलर वाली जीप पर पलंग रजाई गद्दा बर्तन आदि लाद  फांद और उसी पर खुद बैठ हम अपने जौनपुर के पैतृक गाँव आ गए। सामान व पत्नी को वहीं छोड़ा। और खाली हाथ झाँसी को चल पड़े। मगर रुकिए अभी कुछ बची खुंची यादें चिनहट की रह गयीं हैं, उन्हें निबटा लूं। चिनहट से बस कुछ किलोमीटर की दूरी पर कुकरैल का वन था/है।  वहाँ घड़ियालों की सैंक्चुअरी तब स्थापित हो रही थी। वन्य जीव अधिनियम 1972 के अधीन घड़ियाल और मगरमच्छ अबध्य प्राणी हैं।  इनकी तेजी से घटती संख्या को देखकर इनकी प्रजाति को बढ़ावा देने के उद्येश्य से कुकरैल में उनके प्रजनन स्थल की स्थापना की गयी. भारत में एलीगैटर नहीं मिलते।  मगरमच्छ और घड़ियाल मिलते हैं।  घड़ियाल तो गंगा और सहायक नदियों का एक मुख्य निवासी है। मैंने जब इन विशाल सरीसृपों के पुनरुद्धार की परियोजना कुकरैल में देखी थी तो सहज ही रोमांच हो आया था।  आप भी जब लखनऊ जाएँ तो कुकरैल जाकर इनका साक्षात्कार कर सकते हैं। 

चिनहट में ही पर्यटन विभाग ने एक 'पिकनिक स्पाट ' बना  रखा था।  यह शहर से काफी दूर निर्जन में होने के कारण प्रेमी जोड़ों की पहली पसंद था।  यहाँ अब तो पर्यटन विभाग ने मान्यवर काशीराम इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म मैनेजमेंट खोल दिया  है, मगर तब पर्यटन के नाम  पर एक कमरा था बस।  हमारे प्राचार्य महोदय ने उधर जाने की  प्रशिक्षुओं को मनाही कर रखी थी. और इसकी सूचना मुझे भी मेरे ज्वायनिंग के समय ही दे दी गयी थी।  मैं विस्मित  कि पब्लिक प्लेस पर जाने की आखिर मनाही क्यों ?कारण पूछा तो एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट और यह कहकर टाल दिया गया था कि मैं खुद जान जाऊँगा।  मगर उत्कंठा भी तो कोई चीज है। शाम होते होते मुझे पता लग गया था।  दरसअल वहाँ जोड़े एक ख़ास मकसद से आते थे और घंटे आधे घंटे कमरे में रहकर चल देते थे।  कई बार उम्र की कई बेमेल जोड़ियां भी आती थीं।  उन्हें सामने सड़क से प्रायः स्कूटर से आते और जाते हुए मैं खुद भी देखता था।  वहाँ पर्यटन विभाग का एक चौकीदार भर था।  अब आपसी सहमति से प्रगाढ़ संबंध पर किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए यह बात मेरे दिमाग में आती तो थी मगर खुद भी उधर जाने की इच्छा ही नहीं रहती थी। मेरे प्रिसिपल साहब का आदेश मेरे लिए काफी था -उनके निर्देश से वह एक प्रतिबंधित स्थान था तो था -मंजूर।  और फिर उस अंगने में मेरा क्या काम था? 

मगर घर से तीन माहों या अधिक की ट्रेनिंग पर आये युवा या अधेड़ प्रशिक्षुओं के लिए यह स्थल आकर्षण का केंद्र था। वे गाहे बगाहे उधर हो आते और प्रिंसिपल साहब की डांट  भी खाते। एक दो बार मैंने वहाँ के सेट अप ,इंतजाम आदि के लिए सरकारी शिष्टता के साथ मुआइना भी किया तो यही पाया कि लोगों की जैवीय प्रवृत्ति के शमन के बहाने से वहाँ का चौकीदार अवैध कमाई में लिप्त था।  बाद में चिनहट थाने के एक  सिपाही को भी अपना हिस्सा लेने की लत पड़  गयी तो वह अक्सर उधर ही मंडराता रहता और कमाई की फिराक में रहता।  आने वाले जोड़ों को डराता धमकाता और रकम वसूलता।  एक बार वही सिपाही  हमारे  एक प्रशिक्षु को पकड़े लगभग घसीटते प्रिंसिपल के पास ले आया।  और कहा इन्हे संभालिये।  माजरा समझने में वक्त तो नहीं लगना था मगर मेरे हस्तक्षेप पर प्राचार्य साहब ने सुनवाई शुरू की।  

गलती हमारे प्रशिक्षु की यह थी कि सिपाही अपने स्टीरियोटाइप के अनुसार जब जोड़े को डांट धमकाकर यह सुना  रहा था कि अगर उसकी (महिला ) साथी को इतना ही शौक है तो ट्रेनिंग संस्थान के सारे ट्रेनीज को वह बुला देगा -तब अपने वे अपने  प्रशिक्षु  महाशय न जाने  किस आशा और उत्साह से यह सुनते ही दूर से भाग कर वहाँ पहुँच कर व्यग्र हो उठे थे। और सिपाही हतप्रभ।  बहरहाल प्रिंसिपल साहब ने प्रशिक्षु को तो डांटा फटकारा ही मगर सिपाही को धमकाया कि अगर वह फिर इधर दिखा तो जिले के एस पी साहब से लिखित शिकायत कर दी जायेगी।इसका असर हुआ और सिपाही का दिखना बंद हो गया।  मेरे चिनहट से प्रस्थान तक वह पर्यटन स्थल बदस्तूर जीवंत था।  मगर अभी कुछ माह पहले जब मैं वहाँ गया  तो वहाँ एक विशाल बिल्डिंग वजूद में थी और  मान्यवर काशीराम इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म मैनेजमेंट  स्थापित हो गया है। प्रणयोत्सुक जोड़ों के प्रणय  स्थल का नामो निशान मिट गया था।

चिनहट की इन कुछ भूली बिसरी यादें आपसे साझा कर अब आपको हम  लिए चलते हैं झांसी जहाँ से मेरे नौकरी का एक नया फेज शुरू होने जा रहा था। … जारी ... 

13 टिप्‍पणियां:

  1. अतीत के चल-चित्र मानव को, उज्ज्वल भविष्य की ओर बढने में, प्रेरक की भूमिका निभाते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुकरैल पिकनिक स्पॉट के बारे में आपने बहुत रोचक जानदारी थी। देखिए न, मैं उस स्थान से ज्यादा दूर नहीं रहता हूँ लेकिन इधर जाना नहीं हो पाया। जब इंदिरानगर में कोषाधिकारी के रूप में पाँच महीने का प्रशिक्षण (१९९९ में) ले रहा था उसी दौरान अपनी नयी नवेली दुल्हन को लेकर लखनऊ के तमाम घूमने लायक स्थानों का चक्कार लगाया था। उसी क्रम में कुकरैल भी जाना हुआ था जहाँ के कीचड़ में सने मगरमच्छों को देखने के बाद बोरियत हो गयी थी और हम जल्दी ही वहाँ से लौट गये थे।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हा हा इस तरह की कई जगहें प्रसिद्ध रहती हैं अपने अपने जमाने की, और कुछ अब भी प्रसिद्ध होती है.. बढ़िया संस्मरण चल रहा है, हम भी वैसे कहीं नई जगह जाते हैं तो केवल १ सूटकेस में अपने जरूरत की चीजें आ जाती हैं और एक अदद लेपटॉप बैग..

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह आपने बढ़िया किया कि सरकारी कार्यकाल को लिपिबद्ध कर दिया , अन्यथा बहुत सी बातें याद ही नहीं रहतीं !
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  5. देख सब माया वादी खेल ,

    झेल रे प्राणी अब तू झेल।

    संमरन बढ़िया चाल अकड़े है रे भाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत से रंग समेटे है आपके ये संस्मरण ..... पढ़ रहे हैं , शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  7. ऐसे पिक्मिक स्पोट पे जाने मन तो जरूर करता होगा ... छुप छुप के जाते तो यादें कुछ और होतीं ... हा हा ... कई रंग लिए जीवन के आपका संस्मरण रोचक चल रहा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. देश के हर जगह में कमोबेश यही हाल है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. रोचक रहा ये चिनहट संस्मरण । घडियाल सेंक्चुअरी के बारे में कबी विस्तार से बतायें। बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आ पाई। पीछे का भी पढूंगी आराम से।

    उत्तर देंहटाएं
  10. अच्छी रही चिनहट की विदाई..

    उत्तर देंहटाएं
  11. यह सबकुछ स्मृति से ही लिखा जा रहा है तो गज़ब है स्मरण शक्ति !

    उत्तर देंहटाएं
  12. एक अकेला इस शहर में, ऐसे हजारों अकेलों से भरा शहर और चिनहट।

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव