गुरुवार, 17 जून 2010

गृहिणी -लक्ष्मी ,सरस्वती या दुर्गा ? एक परिशिष्ट चिंतन!

पिछली पोस्ट गृह लक्ष्मी ही क्यों गृह सरस्वती क्यों नहीं पर खूब चिंतन मनन हुआ! विद्वान् ब्लागरों ने एक से एक नायाब और दुर्लभ संदर्भ दिए ..मनुस्मृति तक से उद्धरण दिए गए -गृहिणी को लक्ष्मी माने जाने और कहने की परम्परा बहुत पुरानी लगती है .दूसरी देवियाँ भी हैं मगर गृहिणी  लक्ष्मी के रूप में साक्षात है .प्रवीण जी ने चुटकी ली -दुर्गा पर भी विचार कर लिया जाय .मुझे अपने युवा -काल की याद आ गयी -मेरे एक मित्र जो आज एक नामी गिरामी वकील हैं की शादी जिस कन्या से तय हुई उनका नाम दुर्गा ही था ....बड़े धूम धाम से शादी हुई थी ..बलिया से आसाम तक का रिश्ता जुड़ गया था ...बाद में रोजी रोटी के चक्कर में मित्र गण अलग थलग हो गए -कई वर्षों बाद मेरे वे मित्र अचानक कहीं दिखे तो कुशल क्षेम के क्रम में मैंने उनसे भाभी का हालचाल पूछा तो वे अनमने हो गए -गहरा निःश्वास ले के बोले मिश्रा जी वे तो यथा नामो तथा गुणों ही थीं -हमारा तलाक हो गया है ...तो दुर्गा की छवि गृहिणी के रूप में लोकमानस में स्वीकार्य नहीं -वे प्रातः स्मरणीया हैं ,शक्ति की अधिष्टात्री हैं मगर पत्नी के रूप में स्वीकार्य नहीं -कौन चाहेगा एक रणचंडी स्वरूपा पत्नी ? तो दुर्गा देवी तो घर से आउट! वे केवल और केवल माँ के रूप में ही स्वीकार्य हैं ! 

सरस्वती और दरिद्रता का चोली दामन का साथ रहा है -वे विपन्न साहित्यकारों ,सृजनकर्मियों ,रचनाकर्मियों पर ही उदार रहती आई हैं -अब भले ही बौद्धिकता को संपत्ति का दर्जा दे  दिया गया हो मगर सम्पत्ति से केवल लक्ष्मी का ही आदिम रिश्ता रहा है -अगर कोई सर्वे किया  गया हो या फिर फिर किया जाय तो बार बार यही तथ्य उजागर होगा कि लक्ष्मी रुपायें आँख के अंधे और गांठ के पूरे का ही वरण करने को उद्यत रहती हैं -जीर्ण शीर्ण विपन्न को भला कौन लक्ष्मी चुनना चाहेगी ? और पहले से ही सरस्वती कृपा पात्र कोई भी सुयोग्य वर भी क्यों दरिद्रता की द्योतक सरस्वती की चाह रखेगा ! भले ही सौतिया रार ठनती रहेगी मगर पत्नी के रूप में लक्ष्मी ही आज भी पहली पसंद हैं ..कुछ विचार यह भी आये कि आज सरस्वती और लक्ष्मी का समन्वयन जरूरी है -अच्छा विचार है ,मैं भी इससे अपनी सहमति व्यक्त करता हूँ ! मगर कोई परफेक्ट समन्वयन तो संभव नहीं है या तो सरस्वती का भाव अधिक होगा या फिर लक्ष्मी का ...लक्ष्मी भाव प्रबल हुआ तो वह धनाढयता की चाह करेगीं और सरस्वती भाव प्रबल हुआ तो वह बौद्धिकता की चाहना  करेगीं -दूसरी स्थिति ज्यादा लोगों के लिए कई कारणों से स्वीकार्य नहीं रही है -एक घर में पहले से ही सरस्वती का वरद हस्त प्राप्त भला दूसरी सरस्वती क्यों चाहेगा ? फिर तो दरिद्रता और भी हावी होती जायेगी !इसलिए जनमानस में गृहिणी सरस्वती नहीं लक्ष्मी की ही प्रतिमूर्ति बनी रही है ..सरस्वती के वरण से रोज रोज कौन वाद विवाद खिच खिच पसंद करेगा ..उभय पक्ष की शांति समृद्धि केवल लक्ष्मी की ही कृपा से संभव है !

लक्ष्मी की एक और रूढ़ छवि भी जनमानस को आनन्दित करती रही है -उनका सेवा भाव! धन धान्य से पूर्ण घर में आराम की जिन्दगी और सेवा रत पत्नी किसी भी के लिए एक आदर्श /यूटोपिया सदृश ही है -जैसे क्षीरसागर में शयन करते विष्णु का पैर दबाते अनन्य सेवा भाव में डूबी लक्ष्मी का चित्र दिमाग में हमेशा कौधता रहता है ...इस कारण भी पत्नी लक्ष्मी स्वरूपा हुईं ...भला किसी ने सरस्वती को कभी ब्रह्मा का पैर दबाते देखा है ? मगर आज सामाजिक जीवंन के प्रतिमान बदल रहे हैं -आज सरस्वती लक्ष्मी प्राप्ति का जरिया बन रही हैं ....आज पति की चड्ढी बनियान साफ़ करने के पारम्परिक  सेवा भाव का तिरोहन भी स्पष्ट दीखने लगा है ...कुछ भी हो लक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही स्वीकार्य हो सकती हैं ..मगर देवी दुर्गा को घरेलू झमेले में खींचना ठीक नहीं है वे रण की ही चंडी बनी रहें .....शक्ति रूपा बन लोक मंगल का मार्ग निर्विघ्न बनाए रहें बस! 

 या देवी सर्वभूतेषु गृहिणी रूपेण संस्थिता नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः 

ब्लॉग जगत में भी यह रायशुमारी करा लेने में कोई असंगत बात नहीं लगती कि एक गृहिणी के रूप में नारी आज लक्ष्मी के पारम्परिक रूप में रहकर आँख के अंधे गांठ के पूरे को अपना पहला पसंद देती है या फिर किसी बुद्धिजीवी को तरजीह देगी ? उसी तरह पुरुषों में कितने लोगों की पसंद लक्ष्मी और कितनो की सरस्वती होंगीं ? अपना विचार व्यक्त करें न !

46 टिप्‍पणियां:

  1. अपना विचार व्यक्त करें न !

    good
    none should miss this line

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  2. डॉक्टर साहब!
    मैं फिर यही कहूँगा कि पत्नी को पत्नी और पति को पति दोनों का एक दूसरे के जीवनसाथी बनना चाहिए, न कि लक्ष्मी, सरस्वती या दुर्गा।
    यही मनुष्य जीवन के लिए बेहतर है। पत्नी लक्ष्मी, सरस्वती या दुर्गा हो यह चर्चा ही पूरी तरह से बेमानी है। यदि ऐसा है तो पति को विष्णु, ब्रह्मा या शंकर होने पर भी विचार कर लिया जाए, वह भी पूरी तरह बेमानी होगा।

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  3. अरविन्द जी, समय बदल गया है ।
    न लक्ष्मी, न सरस्वती , न दुर्गा , पहले माएं बेटे के लिए सुन्दर, सुशील , सुशिक्षित और गृह कार्य में दक्ष कन्या ही ढूंढती थी । आजकल मां बेटे से कहती है --बेटा शादी तो लड़की से ही करना ।

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  4. पति पत्नी पूरक हों तो ही सुन्दर । पति पत्नी यदि दोनों ही सज्जन हों तो बड़ा कष्ट हो जायेगा जीवन व्यतीत करना । एक व्यक्ति में सब गुण मिलना कठिन है । दो मिलकर परिवार में धारणीय गुण लायें ।
    परिवार को अपने व्यक्तित्व पर धारण कर सके ऐसी हो धर्मपत्नी हो ।

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  5. विषय तो विचारणीय है...लेकिन क्या केवल पुरुषों को ही सारे हक मिले हुए हैं? मैं द्विवेदी जी की बात से इत्तेफ़ाक रखती हूँ ..

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  6. छत्तीसगढ़ी इलाकों में जहाँ ईसाई समुदाय अधिक है, सुनने को मिल जाएगा. एक सहेली दुसरे को कहते "ये एलिज़ाबेथ गोबर बिने बर जाबे वो"

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  7. यदि किसी पुरुष ने ज्ञान सागर में गोता ना भी लगाया हो और सिर्फ अपनी शादी में फेरों के सारे क्रिया-कलाप ध्यान से समझे होते तो तर्क-वितर्क की गुन्जायिश ही नहीं बचती है. अगर पत्नी को लक्ष्मी कहा जाता है, तो पति को भी विष्णु के रूप में ही अभिहित करके सारे वैवाहिक संस्कार संपन्न किया जाते है. किसी शादी में अब ध्यान से सुनियेगा वर को विष्णु मानकर ही कन्या का पिता अपनी लक्ष्मी स्वरुप कन्या का हाथ वर के हाथ में थमाता है. विष्णु को सारे जगत के स्वामी के रूप में भी पुकारा जाता है, जो सृष्ठी के पालन पोषण का जिम्मा सँभालते है.
    पुरुष भी घर का स्वामी-या मुखिया माना जाता है और परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाता है.
    इसलिए विष्णु स्वरुप पुरुष के लिए गृहस्वामी शब्द और लक्ष्मी स्वरुप स्त्री के लिए गृहलक्ष्मी शब्द प्रचलित है .
    इसमें इतने विवाद की स्थिति उत्पन्न होने की बात समझ में नहीं आई.
    नारी हो या पुरुष इंसान इंसान ही रहता है, वौसे ही पति पति ही रहेगा और पत्नी पत्नी ही. लेकिन जैसे वकील शब्द से किसी की विशेष योग्यता का परिचय होता है, लेकिन वोह रहता इंसान ही है . उसी तरह से गृहलक्ष्मी कहने से पत्नी की महान और विराट योग्यता का परिचय मिलता है, और पति को गृहस्वामी (विष्णु) कहने से उसकी जिम्मेदारी और कर्तव्यों का बोध होता है.

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  8. गृह लक्ष्मी , गृह सरस्वती इत्यादि पर काफी चर्चा होती हैं

    कभी गृह - राम ,
    गृह - रावण ,
    गृह - गणेश


    या गृह ब्रह्मा , गृह विष्णु , गृह महेश
    इत्यादि पर बात नहीं होती !!!!!!! ये गृह के साथ क्यूँ नारी ही को जोड़ा जाता हैं ???


    pichhli post par maere kament kaa anumodan ho rahaa haen ab kyaa kehtey haen dr mishra "who should have the last laugh "

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  9. अमित जी आपकी बात से मैं शब्दशः सहमत हूँ -अपने बहुत सहज और सरल तरीके से अपनी बात और इस पोस्ट के मर्म को स्पष्ट कर दिया है !

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  10. दिनेश जी की बात से सहमत हूँ, लक्ष्मी के विष्णुजी के पैर दबाते हुए स्वरूप का वर्णन करके आपने बता दिया की आप क्या अपेक्षा रखते हैं? यदि पुरुष विष्णु स्वरूप हो सकता है तो स्त्री लक्ष्मी स्वरूप स्वीकार्य है, लेकिन काल और परिवेश के अनुरुप सभी की भूमिका में परिवर्तन हो रहा है. अगर सिर्फ गृह तक सीमित रहे तो लक्ष्मी सही किन्तु अगर चाहरदीवारी से बाहर निकल कर कंधे से कन्धा मिलाकर चलना हैं तो उसे दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी सभी का रूप धरना पड़ेगा. रही बात आपके मित्र की दुर्गा से शादी की तो अभी हम भूले नहीं है की दुर्गा भाभी ने स्वतंत्रता संग्राम में किस तरह से शहीदोंका साथ दिया था और वे अपने पति के कार्यों में पूर्ण सहायक थीं. वे भी दुर्गा नामधारी थीं.

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  11. @ सुब्रमनियन जी
    ये एलिजाबेथ .......... :) आप भी कमाल कर देते हैं !

    @अरविन्द जी
    आपकी चर्चा और सारे सन्दर्भों में वह स्त्री सम्मिलित नहीं है ,जिसका संकेत सुब्रमनियन जी ने दिया , एक बड़ी आबादी , आपकी चर्चा से परे !

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  12. मैं द्विवेदी जी की बात से सहमत हूँ...बस.

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  13. अली सा ,इंगित एलिज़ाबेथ संदर्भ को तनिक विस्तार से बताएं आप या सुब्रमन्यन साहब लेकिन आप दोनों विज्ञ जन एक दूसरे का इंतजार न करें! लोहा गरम है!

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  14. @रेखा जी ,
    भला दुर्गा भाभी के अवदानो ने कौन अपरिचित होगा ,आभार !

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  15. मुझे लगता है हमको आज की स्त्री को पौराणिक दृष्टीकोण से परे देखने की जरुरत है, मैंने आपके पिछले पोस्ट पर भी लिखा था की आज की स्त्री और पौराणिक युग की स्त्री में तुलना बेमानी है , जहा तक बात दुर्गा नाम की है , अगर हमको दुर्गा, मा के रूप में स्वीकार्य है तो भार्या के रूप में क्यू नहीं?? . वैसे अगर 50 -50 लक्ष्मी और सरस्वती हो तो?? हा हा. , और हा अगर भार्या दुर्गा हो तो प्रातः स्मरण करने में क्या बुराई है??
    प्रातः उठकर "कराग्रे बसते लक्ष्मी कर मध्ये सरस्वती " वाला श्लोक तो पढ़ते होगा ना??

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  16. वैसे चिंतन तो आपका सही है .. दुर्गा मां के रूप में ही स्‍वीकायर् हो सकती है .. परिवार की समृद्धि की इच्‍छा से गृहिणी को लक्ष्‍मी की संज्ञा दी गयी है .. पत्‍नी सरस्‍वती का रूप हो तो उसकी उदारता के कारण सिर्फ परिवार का कल्‍याण तो होगा नहीं .. हर युग में धन को महत्‍व तो दिया ही जाता रहा है !!

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  17. @ अरविन्द जी
    देश की बहुसंख्यक ग्रामीण महिलाओं के भीषण सामाजिक हालात किसी से छुपे हुए नहीं हैं वहां देवी होना मायने कोई नहीं रखता फिर लक्ष्मी या सरस्वती ब्रांड का प्रश्न ही कहां उठता है आपकी चर्चा शहरी और कस्बाई स्त्रियों को संबोधित हो सकती है पर ग्रामीण स्त्रियों से बिलकुल भी नहीं ! इसी परिद्रश्य को आगे बढाते हुए सुब्रमनियन जी ने इशारा किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपनी अपनी परिस्थितियों और अपने अपने कारणों से धर्मान्तरण कर लेते है और उम्मीद करते हैं कि लेबल बदलते ही हालात बदल जायेंगे पर वास्तव में ऐसा होता नहीं ! वहां कोई लछन देई ( लक्ष्मी का ग्रामीण नाम ) एलिजाबेथ बन कर भी अपनी संगिनी / पड़ोसन से गोबर बीनने के दैनिक कृत्य साथ में करने का आह्वान करने के लिए अभिशप्त बनी ही रहेगी !
    आशय ये कि धर्मान्तरित होकर ईसाई होना / एलिजाबेथ होना प्रत्यक्ष रूप से आधुनिक होने जैसा भले लगे पर जमीनी सत्य यह है "संबोधनों " / "लेबलों" / और "ब्रांड" से स्त्रियों की दशायें नहीं बदलती वे यथावत बनी हुई है ! तो क्यों ना हम इन मुद्दों को संबोधित करें ?

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  18. interesting debate..............waiting for final conclusion.........................

    regards

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  22. पुरुषों का तो पता नहीं किन्तु लक्ष्मी जी तो हमेशा उल्लू को ही पसंद फरमायेंगी.

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  23. जैदी जी, आप अगर हलके फुल्के माहौल में कुछ बोल रहे है तोभी ध्यान रखिये की आप क्या बोल रहे है. उल्लू लक्ष्मी जी का वाहन माना गया है. पसंद उन्होंने विष्णुजी को किया था. और अगर आप लक्ष्मी जी के विष्णु को पसंद करके अपनाने को लक्ष्य करके कुछ बोल रहे है तो आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी.
    फिर आप लोगों के लिए भी बोलना पड़ेगा की उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता तो इसका मतलब यह नहीं की दिगंत में ही अंधकार छाया रहता है. उसी प्रकार हिन्दू आस्था के केन्द्रों पर सीधे सीधे उल्लू जैसे शब्दों का प्रयोग करके अपनी कौन सी संस्कृति का प्रदर्शन करना चाहते है समझ से बाहर है .

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  24. दिनेशराय द्विवेदी se sahmat.

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  25. भाई- बहन लोग समझ रहे हैं कि ये कोई स्त्री-पुरुष के वर्चस्व का विवाद है , ऐसा नहीं है |

    और कुछ हो न हो विषय बहुत अच्छा दिमाग में आया है | और बहस भी रोचक हो गयी है | एक अच्छी पोस्ट |

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  26. माननीय दिनेश राय द्विवेदी जी से सहमत ....

    जरा कम गंभीरता से लें तो
    ब्लॉगर्स की बहुसंख्यक आबादी जिसे चुनना था चुन चुकी है ....
    और जो नयी पीढ़ी है वह खुद सोच लेगी
    अब इस विचार विमर्श का क्या फायदा ...:):):):)

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  27. निर्मला कपिला जी की टिप्पणी
    रोचक पोस्ट है दिवेदी जी की बात बिलकुल सही है
    पत्नी लक्ष्मी, सरस्वती या दुर्गा हो यह चर्चा ही पूरी तरह से बेमानी है। यदि ऐसा है तो पति को विष्णु, ब्रह्मा या शंकर होने पर भी विचार कर लिया जाए, वह भी पूरी तरह बेमानी होगा।
    धन्यवाद

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  28. वैसे तो अमित शर्मा जी ने पत्नी के लक्ष्मी स्वरूपा होने की विद्वतापूर्ण व्याख्या कर दी है.लेकिन कभी सरस्वती और कभी दुर्गा का रूप भी धारण कर लेती है.

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  29. मिश्र जी!
    नारी किसी एक रूप तक सीमित शक्ति नहीं है। हर दायित्व के अनुरूप क्षमताओं का आवाहन और शक्तियों को धारण करने की सामर्थ्य है उनमें। संसार पुरुष पर आधारित है - परन्तु शक्ति नारी की ही है।
    गृहणी के लक्ष्मी होने के अर्थ तभी समझे जा सकते हैं जब संदर्भ पौराणिक हों, अन्यथा पौराणिक संदर्भों को कुतर्कों के चश्मे से देखा जाय तो ज्ञानी बहुत हैं यहाँ। हिन्दू मिथकीय अवधारणा के तहत तीन देवों के साथ ही तीन सहचरी देवियाँ भी पौराणिक दायित्वों की पूर्ति करती हैं - जिनमें से नारायण-लक्ष्मी का जोड़ा जगत के भरण-पोषण के दायित्व का निर्वहन करता है। पति को 'भर्ता' का दायित्व निभाना है और भरण-पोषण के लिए नारायण का बराबर का भागीदार बन कर लक्ष्मी को ही आना पड़ता है - वर्ना दरिद्र को भी भूखा न रखने का नारायण का दायित्व कैसे पूरा होगा।
    गृह'लक्ष्मी' से ही जुड़ा है 'श्री'मती होना और इसीलिए विवाहिता-सधवा के अतिरिक्त श्रीमती संबोधन शास्त्र-सम्मत नहीं है।
    वास्तव में रोचक तो यह है कि किसी भी पौराणिक युगल में पहले नारी-यानी आदिशक्ति का ही नाम आता है - नर-रूप का नहीं। उन्हीं की प्रधानता है। सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मी-नारायण आदि। शिव-पार्वती कैसे? बस इसीलिए तो पुरुष की काम्या 'गौरी' जैसी पत्नी हैं। जो अपने से पहले आप का नाम 'बर्दाश्त' कर लें - खुशी-खुशी।
    तो नारी में किसी एक देवी की कल्पना ही उन्हें अधूरी कर के देखना है। वे अभीप्सिता किस रूप में हैं? भार्या हैं या गृहणी या सहचरी या अर्द्धांगिनी या प्रेरणा या शक्ति - किस रूप में चाहते हैं आप उन्हें? जिस रूप में चाहेंगे - उसी रूप में आएँगी और उसी देवी की शक्तियाँ लेकर। हैं तो एक महादुर्गा ही!

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  30. हिमांशु जी आपका मंतव्य मनमाफिक है -गृहिणी अन्नपूर्ण भी है !

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  31. नमस्कार सर
    अपनी समझ से बाहर का मैटर
    लक्ष्मी, सरस्वती या दुर्गा

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  32. अपने बैठे देख रहे हैं बस कि क्या बात चल रही है!

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  34. नारी विमर्श कुछ अधिक ही हो चला है। अब कुछ 'लिंग विहीन' हो जाय।
    बुद्धिजीवियों को क्या स्त्री क्या पुरुष कोई पसन्द नहीं करता। मज़बूरी में निभाते जाते हैं।

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  35. आज की स्त्री में क्यों न जीजाबाई, सावित्रीबाई, इंदिरा गाँधी, लक्ष्मी बाई जैसी आधुनिक महिला की छवि ढूँढी जाए...! अब कोई ये न कहना की मेरे द्वारा उल्लेखित नामो को पढ़ने भर से ही माता का भाव जहन में आता है... :)
    भई हमारी माता भी किसी की पत्नी, बहन या बेटी भी तो होंगी ही न...!

    यदि लोग वास्तव में स्त्री को लक्ष्मी का रूप समझते या मानते तो दहेज़ में लाखों-हजारों की 'मांग' से उसकी 'मांग' न भरते... अथवा मांग पूरी न होने या अधूरी रहने पर उसी तथाकथित स्त्री की बलि न चढाते... अपनी पुत्री को पराया धन न कहते...

    बाकी दिनेशराय जी से संपूर्णतया सहमति रखता हूँ...

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  36. सरस्वती और दरिद्रता का चोली दामन का साथ रहा है -वे विपन्न साहित्यकारों, सृजनकर्मियों, रचनाकर्मियों पर ही उदार रहती आई हैं

    यह सच होता तो हर भिखारी न सही अधिकाँश भिखारी सरस्वती के पुजारी होते जबकि असलियत में भिखारी सिर्फ लक्ष्मी के पुजारी होते हैं. न मानें तो कल से कुछ भिखारियों को पैसे और कुछ को कवितायें बाँट कर देख लीजिये

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  37. I would to be my husband's Saraswati and Durga for Society.

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  38. मेरी राय -:
    -नज़र अपनी अपनी ख्याल अपना अपना.
    -चिंता चिता सामान होती है ऐसा कहते हैं इसलिए चिंता न किया करें..
    जो जैसे खुश रहे /रहने दिजीये..

    ..... पत्नी जिस रूप में जिसे मिल जाये बस जीवन साथी समझ कर साथ चलें/ रहें /एक दूसरे को समझें.....वैसे भी पुरुष के भाग्य का किसने जाना ..?कब उसकी पत्नी जो लक्ष्मी है दुर्गा बन जाये..जो दुर्गा है वो कब सरस्वती...?
    मैं तो एक अति साधारण मनुष्य हूँ....लक्ष्मी /दुर्गा /..कोई भी देवी बन सकूँ इतने गुण नहीं हैं ..इसलिए अधिक कुछ कह नहीं सकती.

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  39. @ Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    हा हा हा, बिलकुल सही कहा जी आपने...

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  40. कहाँ से ढूंढ़ लाते हैं आप चर्चा के टॉपिक... बढ़िया है :)

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  41. ;-))

    Books - No one wants them unless they r Free ..........Rare are those who respect Others & their feelings in society.

    UTOPIA is merely a word.

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  42. तीनों ही गुण आवश्यक हैं एक पत्नी में बस संतुलन होना चाहिये ।
    खाली लक्ष्मी के गुण होकर नही चलेगा बच्चों को पढाना उनकी रक्षा करना भी तो अब मां पर ही आ ग या है तो सरस्वती और दुर्गा के गुण भी जरूरी हैं। पति को भी ज्यादा हावी नही होने देना चाहिये ।

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