शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

दिल्ली से वापसी और वर्षा ऋतु में गगन विहार!

 इस बार की दिल्ली यात्रा में एक दोस्त से जिनसे हम काफी दिनों से दूर दूर हो गए थे मुलाकात हो गयी -मुलाकात क्या हुई बाहं पकड़ घर तक ले गए ..दुखवा सुखवा  हुआ ...डॉ.कृष्णानन्द पाण्डेय हमारे विश्वविद्यालयी दिनों के लंगोटिया  यार हैं ..अब ये बात दीगर है कि तब हम लंगोट पहनना छोड़ चुके थे और रूपा का अंडरवीयर भी उन दिनों प्रचलन में नहीं था ..हम शाम निर्वाचन सदन के  गेट के बाहर निकले तो डॉ.पांडे जी  सामने कार  सहित  विराजमान थे ..खुद चला के आये थे ..आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था ..उन्हें स्कूटर भी चलाते कभी जो देखा नहीं था ...और दिल्ली में ड्राईविंग भी कम मुश्किल तलब नहीं -पक्के  दिल्ली वाले सतीश भाई अभी कल ही तो दो बार दिल्ली पुलिस द्वारा टोके(ठोकें नहीं!)  गए थे ..वह तो उनके परिचय पत्र पर भारत सरकार की बड़ी सी सुनहली अशोक लाट हर मौके पर अभयदान दे देती है वरना ....वैसे तो डाक्टर पाण्डेय जी भी बड़े ओहदे पर हैं -आई सी एम् आर में डीडीजी  हैं मगर अब सतीश भाई के  बुद्धि चातुर्य और ब्लॉगर - रसूख की कोई सानी नहीं है!
डॉ.पाण्डेय के फ़्लैट में फुर्सत के क्षण 
  
पहले तो हम पांडे साहब की कार में थोडा हिचके मगर फिर आराम से बगल बेल्ट लगाकर सहज हो गए और दिल्ली की सडको पर उनकी कार फर्राटा हो ली ...वाकई बहुत अच्छा ड्राइव कर रहे थे डॉ.पांडे ....अब मुझे अम्बेसडर के अलावा कोई कार तो पहचानी नहीं जाती (सच में,बच्चों से पूछ लीजिये!) मगर उनकी कार भी शानदार थी ..कार चलाते समय पाण्डेय जी की नज़र  इतनी पैनी कि आजू बाजू के  दूर खड़े पोलिस को भी देख मुझे  बताते जा रहे थे  कि यहाँ कार चालकों पर पुलिस की गिद्ध दृष्टि रहती है गलत लेंन या मोबाईल पर बात करते ही धराने की पूरी आशंका है और बिना चालान -जुर्माने के बचना मुश्किल ...इसलिए मुझे उनकी कुछ मोबाईल काल  को खुद अटेंड  करना पड़ा ...पहले मुझे वे दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर ले गए जहां मेरी बहन ज्योत्स्ना  रहती है और उसके श्वसुर और मेरे पिता तुल्य इंजीनियर मिश्र जी की ओपन  हार्ट सर्जरी हुयी थी ..उन्हें देखने और शुभकामनाएं देने के बाद डॉ पांडे  एक लम्बी ड्राईव पर मुझे लेकर चले -नोयडा ....जहाँ उनका अपना आशियाना है ...डॉ.अमिता पांडे जी अब उनकी सहचरी हैं जो  कभी  विश्वविद्यालयी सहपाठी थीं  ..अब पांडे साहब और वे एक दूसरे से वहीं विश्वविद्यालय में शोध के दौरान  ही प्रणय -परिणय आबद्ध हो गए थे ..हम ठगे से रह गए ...यह एक अलग कहानी है ..फिर कभी!

अब दो पुरनियां  दोस्त मिल बैठे तो बस उस नज़ारे की कल्पना ही कीजिये ...सुस्वादु भोजन हुआ रात १ बजे तक हम गपियाते रहे ...कुछ इधर कुछ उधर की ..कुछ गोपन कुछ खुले आम ..मुझे तो हिचक नहीं मगर खुद पाण्डेय जी बुरा मान जायेगें अगर मैंने कुछ भी ईलाबोरेट किया  तो... कितने ही पुराने दोस्तों की यादे हो आयीं कोई सुधा पाण्डेय,कोई इंदु श्रीवास्तव कोई के के सिन्हा ,कोई प्रदीप श्रीवास्तव.. कोई.... छोडिये अब गए दिनों के  दोस्त कब से ब्लागिंग मैटेरियल होने लगे ..कहीं बुरा न मान जायं!सुबह हम जल्दी उठ भी गए और डॉ पाण्डेय जी फिर मुझे एक लम्बी मगर खुशनुमा ड्राइव पर ले अपने संस्थान आई सी ऍम आर  पहुंचे  ....दिल्ली का मेरा यह  चौथा दिन था ....
आई  सी एम् आर  परिसर में एक फोटो सेशन -रणबीर ,के एन और मैं   
आई सी एम् आर में मेरे काबिल दोस्तों का  जमघट सा है ...ये लगभग सभी एक ही कालखंड के प्राणी विज्ञान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणी ...ओह सारी ,सहपाठी हैं -डॉ .विजय कुमार श्रीवास्तव ,डॉ .रजनीकांत ...अब एक ही कालखंड के इत्ते सारे लोग एक ही प्रीमियर संस्थान में? ..इसके बारे में हम अभी नहीं  अपनी आत्मकथा में बताएगें...आपको इंतज़ार करना होगा! यहीं मेरी मुलाकात एक और भूले बिसरे साथी से हुयी, हर दिल अजीज सदाबहार रणबीर जी से जो एक महान संस्थान के पी आर ओ है..एक बढ़िया व्यक्तित्व के मालिक ....पुरातत्व , धरोहरों और संस्कृति के दीवाने ..धरोहर वाले अभिषेक मिश्र से गुजारिश है कि वे डॉ. रणबीर जी की शागिर्दगी जरुर कर लें ..मेरे परिचय का पासपोर्ट इस्तेमाल में लाये ...रणबीर जी खुद ब्लॉगर नहीं है यह मुझे अच्छा नहीं लगा ..मगर वे भी  कम नहीं -मुझे  ब्लागिंग/गूगलिंग  से मस्तिष्क की क्षमता का क्षरण होने वाला एक  वैज्ञानिक लेख थमा दिया... वे ऐसे ही हैं! 

डॉ पांडे जी ने अपने संस्थान से एक दक्ष ड्राईवर का इंतजाम किया और मैं १२.३० तक एअरपोर्ट पहुँच गया ...उड़ान टर्मिनल एक से थी ..यह टर्मिनल ३ के मुकाबले तो शानदार नहीं मगर फिर भी साफ़ सफाई और चमक दमक में कुछ कम भी नहीं ...स्पाईसजेट के इस  एयर क्राफ्ट का नाम 'सिन्नामोंन' -दालचीनी था -स्पाईसजेट के विमान किसी न किसी मसाले के नाम पर हैं -पिछली बार मेरी यात्रा लौंग नामधारी विमान में हुयी थी ....२ बजकर १० मिनट पर हम बनारस को उड़ चले ...  
अब कैमरा साथ नहीं था इसलिए यह एक उधार का दृश्य जहाज से बादलों का 
हाईस्कूल में प्रायः  पूछे जाने वाले  मशहूर निबंध 'चांदनी रात में नौका विहार ' शीर्षक की याद दिला गया हवाई यात्रा का सफ़र ...क्योकि यह  वर्षा ऋतु में गगन विहार का अवसर था  ..घने काले और सफ़ेद बादलों की अठखेलियों के बीच विमान का उड़ना मुझे एक घंटे से कुछ अधिक की यात्रा में निरंतर रोमांचित करता रहा ..कभी लगा हम एक विशाल नीले सागर में फैले ढेर सारे शुभ्र धवल हिम खण्डों के  ठीक ऊपर से हम गुजर रहे हों और कभी जैसे हिमालय श्रृंखला के ऊत्तुंग पहाड़ों के ठीक ऊपर से जा रहे हों ...और कभी काले कलूटे लघु बादलों का समूह हमारी और झपटता रावण की मिथकीय सेना का प्रतीति करा रहा था जिसका नेतृत्त्व मानो ' महाविराट कज्जल गिरि  जैसा कुम्भकर्ण कर रहा हो -अद्भुत अविस्मरणीय   ..मैं मंत्रमुग्ध सा ही रहा कि विमान के बनारस लैंड करने की घोषणा हो गयी ..  ..सिफारिश यह कि कभी वर्षा ऋतु  में गगन विहार का यह लुत्फ़ जरुर लें अगर अभी न लिया हो तो...पैसा वसूल की गारंटी ...अब हवाई सेवायें सस्ती भी हो गयी हैं ...कुल मिलाकर  दिल्ली की यह यात्रा शानदार और जानदार रही ....अनेक कारणों से यादगार भी! 

33 टिप्‍पणियां:

  1. एक यात्रा, कितने सुख, रेल को छोड़कर।

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  2. आप अपने हर क्षण का उपयोग खुश होकर करने में माहिर हैं और शायद यही कारण आपकी जिन्दादिली का है !
    शुभकामनायें आपको !

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  3. मतलब आप अपना 'लक' पहन कर गये थे :)

    रोचक विवरण, मजइत ढंग से प्रस्तुतिकरण।

    आनंदम आनंदम।

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  4. ...अब एक ही कालखंड के इत्ते सारे लोग एक ही प्रीमियर संस्थान में? ..

    यह बात तो निश्चय ही आश्चर्यजनक है

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  5. अंत भला तो सब भला!!

    अन्तिम दिन सुखद अनुभूति भरा रहा। और यात्रा भी।

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  6. न जाने कितनों के मन के भाव मेल खा रहे होंगे इससे-
    ''अब मुझे अम्बेसडर के अलावा कोई कार तो पहचानी नहीं जाती (सच में,बच्चों से पूछ लीजिये!)''
    हमारे मन का भेद तो खुला ही जानिए.

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  7. पुराने मित्रों से मुलाक़ात की बात ही कुछ और है।

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  8. पुराने मित्रों से मिलने का अनुभव अलग ही होता है. "रातें छोटी होती हैं - बातें नहीं."

    डॉ. रणवीर जी से मिलने को अब मैं भी उत्सुक हूँ.

    'गगन विहार' का काफी आकर्षक वर्णन किया है आपने, मगर यह नहीं बतलाया कि बाबतपुर से बनारस पहुँचने में कितना वक्त लगा ! :-)

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  9. यात्रा तो रोचक रही ही होगी-- पुराने साथिओं का मिलना सुखद अनुभव देता है। शुभकामनायें\

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  10. ठगे जाने का अवर्णीय सुख भोग, हम तदानुभूत हुए .लक्ष्य केन्द्रित होती हैं अति महत्वकांक्षी नव -युवतियां .फिर वे वायुवीय दिन किसके सगे साथ रहे हुए हैं .पंख लगा के उड़ जातें हैं .दिल्ली आपके पधारने पर दिल्ली कुछ बा -सलीका हुई .आभार आपका .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    कृपया इसे ज़रूर बांचें और टिपियाएँ .आपकी कही हमारी धरोहर बन जाती है .

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  11. यात्रा सकुशल और सोल्लास सम्पन्न हुई। मेरी बधाइ भी स्वीकारें।

    आप पांडेय दंपति के प्रणय-परिणय में ठगे रह गये यह तो आपके प्रति संवेदना जगाता है; लेकिन जिस दिलेरी से आप यह बयान कर गये उसे देखकर ईर्ष्या होती है।

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  12. इत्तेफाक की बात है , आई सी एम् आर में पाण्डे जी के सहकर्मी हम भी हो सकते थे । बस स्वैच्छिक हुए नहीं ।

    बढ़िया रही दिल्ली यात्रा अरविंद जी । बधाई और शुभकामनायें ।

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  13. "हम ठगे से रह गए"
    जानदार संस्मरण

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  14. @सिद्धार्थ जी और सुब्रमन्यन साहब ,
    "हम ठगे से रह गए" अभिव्यक्ति कुछ स्पष्टीकरण की मांग सी करती लग रही है -
    निश्चय ही प्रेम विवाह की उदात्तता हमें भी तब भी और आज भी आकर्षित करती है -
    हम जिस आकाश कुसुम को पा नहीं सके डॉ पाण्डेय जी को वह हासिल हो गया -उन दिनों हमारे क्लास का जेंडर अनुपात बहुत ही विषम था ...करीब ६-७ छात्र और ३० छात्राएं -सबके हिस्से का अनुपात १:४ का था और फंतासियों का बाजार गर्म था -कई वायवीय जोड़े मूर्तमान हुए मगर वास्तविकता का धरातल पा सके -पाण्डेय जी ने फंतासी को मूर्तमान किया मैं ही नहीं कई और मित्र समाज और परिस्थितियों से पार नहीं पा सके -और इस अधीर संसार में कौन किसका इंतज़ार ही करता है -अब तो सब इतिहास हो गया है !

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  15. @वास्तविकता का धरातल न पा सके

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  16. आप अम्बेसिडर को पहचान लेते हैं!! अरे, हम तो लैंडमास्टर वाले हैं :) यकीन न हो तो अकर देख लीजिए॥

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  17. प्रेम का सफर रुकता कहाँ है ?और प्रेम कोई एक बार ही नहीं होता है .वह जो था वह तो वायुवीय ही था .

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  18. ज़मीन से १०-११ किलोमीटर ऊपर विमान में उड़ने का मज़ा ही और है ख़ास कर यदि फ्लाईट अल्प कालिक घंटा भर की हो .और मन स्मृतियों में पगा हो अपनों को छोडके चलने की .बादलों से ऊपर बहुत ऊपर आप .बादल क्या आइस बर्ग हिम खंड से नीचे आसमान पर तैरते (ऊपर जाकर आसमान की परिभाषा बदल जाती है .हम आसमान हो जातें हैं) ,आइस बर्ग के ऊपर इधर से उधर उधर से इधर उड़ते बादल महीन छितराए से मट मैले विचार भी तो ऐसे ही अठखेली खेलते हैं मनवा के साथ .अपने जो पीछे छूट गए संग साथ चलतें हैं बादलों से बिछड़ने के लिए उड़ने के लिए .हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ था देट रोइट से शिकागो तक की अल्प काली उड़ान के दरमियान जिसकी कुल अवधि थी एक घंटा पांच मिनिट .अपनों का मानसिक कुन्हान्सा हमें घेरे रहा .कब आ गया शिकागो पता ही नहीं चला .नोर्थ मिशिगन एवेन्यू की ऊंची ऊंची इमारतों की कतार देखने के बाद कोई भ्रम नहीं रह गया था -देट रोइट छूट चुका ,पीछे बहुत पीछे इस सात समुन्दर पार अब आना हो न हो .जीवन खेल है अ -निश्चितताओं का .यहाँ कब क्या हो जाए इसका कोई निश्चय नहीं .मिलना बिछड़ना सब समय का संयोग है सम्मलेन है अरविन्द जी .आप आये हम चंद घंटे ज़िन्दगी की मुश्किलात भूले रहे .गए तो फिर उन्हीं से रु -बा -रु हैं .

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  19. वर्षा ऋतु में गगन विहार अति सुन्दर!
    .........
    अच्छा लगा जानकार कि इस बार की आप की दिल्ली यात्रा यादगार रही .

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  20. http://veerubhai1947.blogspot.com/http://veerubhai1947.blogspot.com/
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/गगन विहारी धरती कहे पुकार के ,कब आवोगे सांवरिया
    क्वचिदन्यतोSपि...

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  21. आपके इन यात्रा वृतान्तों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है .....आप बहुत सी अर्थहीन और निरर्थक चींजो मे अर्थ खोज लेते हैं ......अनेक वायवीय और उबाऊ चीजों को रोचक यथार्थ बना कर प्रस्तुत कर देते हैं .......

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  22. आपके आने की खबर आपके घोर शुभचिंतक माननीय अनूप शुक्ल जी से पता चली थी,बाद में अवधी के घनघोर-उपासक अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने भी बताया की ,बाकायदा आप दिल्ली में टहल रहे हैं.इच्छा थी कि ब्लॉगर-जगत के पहुँचे हुए मठाधीश से हम भी मिल लें,तो कुछ चर्चा हमरी भी हो जाएगी,पर भाई अमरेन्द्र ने बताया कि आप के पास समय कम पड़ गया है.
    बहुत जानदार और शानदार चित्रण किया है आपने.ऐसा लगा कि हम भी आपके सहयात्री थे !वैसे मालवीयनगर में ही खाकसार रहता है,पहले पता होता तो हम अदबदाय के मिल लेते !

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  23. बहुत अच्छी रिपोर्ट आभार मिश्र जी

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  24. कुल मिलाकर दिल्ली की यह यात्रा शानदार और जानदार रही ....अनेक कारणों से यादगार भी!

    इसका कारण आपने पहली पोस्ट में बताया ही था-

    अपने फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल जी का सुमिरन कर मैं ट्रेन में १८ जुलाई को सवार हुआ!

    बधाई हो!

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  25. सर रोचक ढंग से लिखी बहुत ही सुंदर पठनीय पोस्ट पढ़ने में मजा आ गया |

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  26. सर रोचक ढंग से लिखी बहुत ही सुंदर पठनीय पोस्ट पढ़ने में मजा आ गया |

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  27. बढ़िया शब्द है गगन विहार! मैं तो उसी पर लटक लिया! :D

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