गुरुवार, 26 सितंबर 2013

वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन -जो किसी ने नहीं लिखा!

  पहला भाग
  दूसरा भाग
हबीब तनवीर सभागार में नाट्य विधा में दीक्षित छात्र छात्राओं के द्वारा विश्वविद्यालय के नवरचित कुल गीत के गायन की मनोहारी प्रस्तुति के साथ सम्मलेन की रंगारंग शुरुआत हुई ।कवि नरेश सक्सेना जी द्वारा रचित यह कुलगीत बहुत अर्थपूर्ण है और विश्वविद्यालय के सौन्दर्य, बहुआयामी विस्तार और संकल्पों को भावपूर्ण अभिव्यक्ति देता है -हम मंत्रमुग्ध हो कुलगीत के नाट्य प्रस्तुति में रमे रहे . कुलगीत के उपरान्त सम्मलेन का भव्य उद्घाटन हुआ -पुष्प गुच्छ भेंट किये गए . कार्तिकेय मिश्र ने विषय प्रवर्तन के गुरुतर दायित्व का निर्वाह किया और मैं आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता के साथ उनके मुखारविंद से निकले एक एक शब्द को बड़े ध्यान से सुनता रहा . मैंने अभी तक तमाम गोष्ठियों,सम्मेलनों में विषय प्रवर्तन या बीज वक्तव्य किसी पुरायट पेर्सोनालिटी द्वारा ही देते/करते सुना देखा है . मगर कार्तिकेय जैसे नवयुवा द्वारा इतनी संजीदगी और संयत होकर इस दायित्व के निर्वहन से इस बात को बल मिला कि प्रतिभा और उम्र का कोई समानुपाती रिश्ता नहीं है . बड़े बूढ़े तो दीगर सभागार में उपस्थित युवाओं खासकर छात्राओं ने इस कार्तिकेय - प्रस्तुति को बड़े मनोयोग से सुना सराहा . बाद में विश्वविद्यालय के एक बड़ी अथारिटी ने निजी चर्चा में बताया कि कार्तिकेय के इस जानदार प्रस्तुति और उनके सुदर्शन व्यक्तित्व  से सम्मोहित हो कई छात्राओं ने उन्हें प्रपोज तक कर दिया . सिद्धार्थ जी का अभिनव प्रयोग या कार्तिकेय का डेबू अपीयरेंस हिट हो गया .बधाई कार्तिकेय!
मैंने पहले ही सिद्धार्थ जी से अनुरोध कर लिया था कि मैं सम्मलेन में केवल श्रोता ही बना रहकर सभागार की एम्बियेंस को फील करना चाहता हूँ और उन्होंने इसका ध्यान रखा . अनेक सत्र संचालनों से मुझे मुक्त रखा मगर शाम की कवि गोष्ठी का मुझे संयोजक घोषित कर दिया . आज जिस तरह घणे साहित्य से लोगों की दूरी बढ़ रही है तो मुझे यह आसार तो लग गया था कि कवि गोष्ठी के नाम पर शायद ही लोग इकट्ठे हों . मैं यह शिद्दत से मानता हूँ कि श्रेष्ठ साहित्य -कविता,कहानी और संगीत भी लोगों को अनेक मानसिक संत्रास और अवसाद से तात्कालिक ही सही मुक्ति दिल सकती है बशर्ते लोगों की इन विधाओं में रूचि विकसित हो सके .मैं तमाम लोगों को जिन्हें कविता कहानी में रूचि नहीं है बहुत प्रवंचित मानता हूँ-बिचारे आज की इस आपाधापी भरी ज़िंदगी को सहज बनाने /सहज ही झेल जाने के गुर से अनछुए हैं . मैं गंभीरता से सांध्य कवि गोष्ठी के आयोजन के प्रबंधकीय पहलुओं पर विचारमग्न रहा और सोचता रहा कि क्यों न इसे गांधी हिल के खुले निसर्ग में आयोजित करूँ .कुलपति जी का अनुमोदन भी इसके लिए ले लिया .मगर शाम को चाय के समय अचानक और अप्रत्याशित रूप से सिद्धार्थ जी ने कहा कि  कवि गोष्ठी निरस्त हो गयी है . मैं अवाक! एक बार फिर मुझे एक और रणनीति बनाने की चुनौती मिल चुकी थी .मैंने माहौल बनाना शुरू कर दिया .
 मैंने कविता कला में रूचि वालों को संवेदित करना शुरू किया . शैलेश भारतवासी जी दिखे तो उन्हें न्योता मगर वे कुछ  अनमने से दिखे और कहीं लुप्त हो गये . फिर अपने ट्रस्टेड चेले संतोष त्रिवेदी को बुलाया ,प्रियरंजन जी मिले ,डॉ चोपड़ा जी भी जुटे और इन सभी को सहेजे नागार्जुन बाबा की मूर्ति को प्रमाण /प्रणाम कर मैंने कुछ गुनगुनाना शुरू किया . सुखद आश्चर्य आस पास के लोगों में उत्कंठा,खुसर पुसर शुरू हो गयी . लोग आकर्षित हो लिए . मुझे बहुत अच्छा लगा जब बगल से गुजर रही टूटी फूटी ब्लॉग की सर्जक मगर प्रशस्त व्यक्तित्व की धनी रचना त्रिपाठी जी पास आ गईं और कहा कि वे सुरीली स्वर लहरियों से आकृष्ट हो उधर आ गयीं हैं -मतलब कविता ने रचना को खींच लिया था . यह कविता की शक्ति और सामर्थ्य है . मैं भाव विभोर ही था कि फरमान आ गया कुलपति महोदय डिनर को पधार रहे हैं .आज का डिनर  उनके द्वारा ब्लागरों के सम्मान में था ,मगर रस भंग हो गया .रचना त्रिपाठी जी फिर सुनूगीं के आश्वासन के साथ ये गयीं  वो गईं -उन्हें भी डिनर के लिए तैयार  होना था .
फिर सभी सुधी जन तितर बितर हो गए . और प्रथम तल के डाईनिंग हाल की ओर  बढ़ चले . मैं भी अनमना वहां पहुंचा . मगर फिर रणनीति पर काम शुरू कर दिया . कुलपति महोदय जैसे ही सीढ़ियों से आते दिखे मैं लपक कर उनके सामने पहुंचा और काव्य गोष्ठी का प्रस्ताव रख ही तो दिया . वे सहर्ष मान गए और डायनिंग हाल के सामने के बरामदे में बैठ गए . उन्हें देख कविता से अधिक भोजन उत्कंठित जन भी आ पहुंचे . मैंने कविवर सोम ठाकुर के गीत को राग से छेड़ा -क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं ,सूरज के आसन पर बैठे घने अँधेरे देखे हैं . मेरी स्वर लहरियाँ सराय में रुके अनेक जाने माने साहित्यकारों ,विचारकों के कानों तक जा पहुँची जिसमें एक तो राजकिशोर जी थे.. वे कमरे से बाहर आ गए और भी अनेक प्रतिभागी कमरों से बाहर आ गये और गीत का आनंद उठाने लगे . अब तक व्यंजनों की सुगंध भी आने लगी थी तो कुलपति जी ने एक पोस्ट डिनर काव्य सेशन की घोषणा कर दी और सब लोग डायनिंग हाल में प्रवेश कर गए .
लोग बाग़ खाने की प्लेट पर व्यंजन सजा रहे  थे कि एक कोने से कुछ हलचल सी हुयी . शकुंतला शर्मा जी ने एक डोंगें में सामिष व्यंजन देखकर बाकी  आईटमों से भी तोबा कर ली कि हाय राम इन सभी को पकाने में तो एक ही कलछुल इस्तेमाल हुयी होगी .मैंने उन्हें कुछ और लेने का अनुग्रह किया मगर वे  रोटी  और सलाद लेकर बैठ गयीं।  वे शाकाहार  अतिवादी हैं, मुझे आभास हो गया तो मैं निरुत्तर हो गया .मगर एक बड़ी आफत आनी तो अभी  शेष थी .मेरे बगल में अच्छॆ खासे जीम रहे संतोष त्रिवेदी जी कोई और आईटम लेने को उठे और फिर थोड़ी देर बार बहुत उत्तेजित और आक्रोशित बडबडाते हुए सामने से दिखे -हाय हाय रे मैं विधर्मी हो गया .मुझे मांस खिला  दिया गया ....इन लोगों ने चिकेन के डोंगें पर सामिष की चिपकी नहीं लगायी ,. बड़ा कुहराम मचा . मुझे खरी खोटी सुनाई -अरे गुरु जी आपने भी नहीं टोका . मैंने कहा कि मेरे बगल ही तो तुम मुर्गे की टांग इत्मीनान से खींच रहे थे तो सोचा कि खाते होगे .वे  मासूमियत से बोले कि मुझे लगा कटहल है. अब इस मासूमियत पर कौन बलि न हो जाय?. धन्य हो चेले . अभी तक यह मामला गरमाया हुआ है -फेसबुक पर लगभग सौ टिप्पणियाँ इस काण्ड पर संतोष जी बटोर चुके हैं -और यह तय हुआ है कि सोने की मुर्गी न सही  कम से कम एक सोने का अंडा श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देकर ही इस पाप से मुक्ति  मिल सकती है -चेले इस गुरु से बढ़कर श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हे कहाँ मिलेगा? अब  गुरु मत बदल लेना .यह गुरु दक्षिणा का वक्त है और खान पान के व्यामोहों से छूटने का वक्त है -वर्धा में तुम्हारी आहारीय मुसलमानी तो हो ही गयी ..बिस्मिल्लाह हुआ तो अब बेधड़क हो जाओ  एक और  सज्जन प्रतिभागी चिकेन को घुयियाँ /अरवी की रसेदार सब्जी समझ खा गए मगर  इतना टंटा नहीं मचाये . ये खान पान के अतिवादी :-( उफ़!

खैर खाने के बाद कवि गोष्ठी जमी और खूब जमी . शकुंतला शर्मा, प्रवीण पाण्डेय ,सिद्धार्थ शंकर , अनूप शुक्ल और प्रियरंजन आदि ने अपनी चुनिन्दा कवितायें सुनाकर लोगों का मन मोहा ,खूब तालियाँ बटोरी और इस शाम को यादगार बना गए .अनूप शुक्ल की जब ब्लॉगर  स्थानान्तरण पर घर छोड़ता है खूब जमी ,प्रवीण जी की मेरी बिटिया  पढ़ा करो और भीष्म पर उनकी चर्चित कविता ने समां बाँधा . हर्षवर्धन ने समकालीन दर्द को कविता में उकेरा .सिद्धार्थ जी ब्लॉगर पति पत्नी के मन मुटाव पर तालियाँ बटोरी .....यह खुशनुमा अहसास सचमुच एक यादगार है .
जारी ....


38 टिप्‍पणियां:

  1. सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया ?
    .
    .चलो गाँधी और विनोबा की भूमि में मैं पुनः संस्कारित हुआ।
    कार्यक्रम बढ़िया रहा।बाद में काव्य गोष्ठी भी हुई अब मालूम चला।उस वक्त तो हमारे ऊपर पहाड़ गिर पड़ा था,इसलिए मन अवचेतन में रहा।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. पहाड़ गिर पड़ा, अब तो निकल पड़िए पहाड़ के नीचे से...

      हटाएं
  2. बढिया चर्चा!

    अभी तो लिखना-पढ़ना चल रहा है। अभी से " जो किसी ने नहीं लिखा" लिख दिया?

    कविता सम्मेलन के दौरान अनूप शुक्ल के जबरियन गाकर सुनाये बेसुरे गीत की चर्चा कैसे छूट गयी जिससे प्रताणित होकर डॉ अरविन्द मिश्र ने अनुरोध किया कि अनूप शुक्ल गाकर कवितायें न सुनाया करें? :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अब कुछ पब्लिक करने से छोड़ भी दिया जाता है अनूप जी और आगे भी छूटेगा ही .....यह कोई जब्तशुदा श्रृखला का प्रकाशन तो है नहीं !

      हटाएं
    2. अनूप जी आप गलत समझे बैठे इस मामले में ब्लॉगपोस्ट से ज्यादा "mouth campaigning" काम करती है :)

      हटाएं
  3. सच में ये किसी ने नहीं लिखा! , बड़ी बुराई करते हैं यूँ तो कविताओं की मगर मौका मिलते ही गुनगुना दिया।
    अच्छी लगी काव्य गोष्टी की चर्चा !

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह अनकहे पक्ष पूरे सम्मेलन को अत्यधिक रसमय कर जाते हैं। कुछ भी न छोड़ियेगा, चाय को भी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. @.वे मासूमियत से बोले कि मुझे लगा कटहल है. अब इस मासूमियत पर कौन बलि न हो जाय?

    Ha Ha Ha Ha

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैंने तो यही पाया है कि आपकी व्यंग्य चेतना हमेशा जागृत रहती है (और वैज्ञानिक चेतना पोस्ट के अनुसार). जैसे जैसे पंक्तियाँ गुजरती गयी मुस्कराहट बढती गयी. यहाँ तो नाम लिखे होने पर भी कई हिंदू धर्मावलंबियों को ग्लानि के अनुभव से गुजरना होता है. जैसे 'चीजबर्गर' या नाश्ते में "चिली' लोगों को अक्सर धोखा दे जाते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत रुचिकर लगी यह अनौपचारिक चर्चा .. …

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपको ईश्वर ने बहुत अच्छा गला दिया है। इतना अच्छा कि कि आपकी तान सुनकर दूर-दूर से लोग उल्टे पाँव चले आये।

    हमें तो गांधी हिल पर कवि-गोष्ठी की बहुत चाह थी; महीना भर पहले से तय यह कार्यक्रम बनाया तो मैंने ही था। लेकिन बारिश ने सब मजा खराब कर दिया। आखिरी वक्त तक संभावना तलाशने के बाद ही कुलपति जी से विचार-विमर्श करने के बाद मुझे इसे रद्द करने की घोषणा करनी पड़ी। आपने जब इसे दुबारा जिन्दा कर दिया तो सर्वाधिक खुशी मुझे ही हुई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वैसे जब भी कविता पाठ हो हमेशा उसकी रिकार्डिंग होनी चाहिये ।

    आप ने बहुत सारी चीजों को संजो लिया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. अरविन्द जी ,
    व्यक्तिगत रूप कवि गोष्ठी से मुझे वही अनुभूति होती है जो संतोष त्रिवेदी को आभासी कठहल खाने के उपरान्त हुई होगी :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सच्ची सहानुभूति के लिए आभार ,अली सा !

      हटाएं
  11. लेकिन संतोष को संतोष न हुआ-
    शुभकामनाएं आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. एक मुर्गे की टांग से, कंठी माला टांग |
      उटपटांग हरकत करे, कूद फांद फर्लांग |

      हटाएं
    2. पंडित जी से क्षमा के साथ-

      मुर्गे की इक टांग से, कंठी माला टांग |
      उटपटांग हरकत करे, कूद फांद फर्लांग |
      कूद फांद फर्लांग , बांग मुर्गा जब देता |
      पंडित करते स्वांग, ॐ बोले अभिनेता |
      अभिनय में उस्ताद, सोचते हैं आगे की |
      अगर गले ना दाल, तब टांग चले मुर्गे की ||

      हटाएं
    3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

      हटाएं
    4. संशोधन : शुक्रवारीय चर्चा मंच पर :

      हटाएं
  12. वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन -जो किसी ने नहीं लिखा!

    आपने लिख दिया और व्यंग्य विनोद बिखेर दिया। साईं बाबा की आज सबसे ज्यादा मंदिरमूर्तियाँ इन अर्थों में हैं कि सनातन धर्म की सर्व ग्राही धारा ने उन्हें सहज ही हिन्दू मंदिरों में जगह दे दी है वह सब जगह भी सुशोभित भी हैं अन्यत्र भी भले सामिष और निरामिष व्यक्तिगत रूचि का परचम हो लेकिन इसका धर्म भ्रष्ट होने से क्या लेना देना। साईं बाबा भिक्षा पात्र में जो भी सामिष निरामिष आ जाता था ईश्वर का प्रसाद समझ ग्रहण करते थे।

    ये ब्लॉगर क्या उनसे बड़े हो गए।

    आदमी आदमी को न खाए सामिष और निरामिष व्यक्तिगत अभी रूचि की बात है लेकिन अपवाद हर जगह चले आते हैं बिन बताये। तैयार शुदा खाद्य भी केमाफ्लेजिंग करते हैं यदि नाम पट्टिका न रखी हो डिश के सामने।

    हम आजकल प्याज लहसुन भी नहीं खाते लेकिन अगर कोई खिला दे तो खुद को विशिष्ठ कभी नहीं मानते खा लेते हैं।शुद्ध करके संकल्प से मन ही मन प्रसाद समझ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. भूल चूक लेनी देनी खा लिया तो खा लिया इतना हो हल्ला किसलिए ?

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं
  15. आनंद आ रहा है, पर शाकाहारी मानुष का धर्म भ्रष्ट करना उचित नही लगा, केटरर को चिपकी अवश्य लगानी चाहिये थी.:(

    उत्तर देंहटाएं
  16. एक बार फिर वहाँ की यादें ताजा हो गयीं। वाकई! बहुत ही जीवंत माहौल था।

    उत्तर देंहटाएं
  17. अच्छा है अनकहे पक्ष भी सामने आयें ..... जारी रहें

    उत्तर देंहटाएं
  18. आप चाहे जो भी कहें.. लेकिन आपकी व्यंग-चेतना अतिविकसित रूप में मुखर होकर हम जैसों को शरमाने पर मजबूर कर रही है.. :-)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. कार्तिकेय पोस्ट बड़ी ही शुद्ध और सात्विक भावना से लिखे गयी है -आश्चर्य है लोगों को इसमें छुपे श्लेशों का आभास हो रहा है !

      हटाएं
  19. आपकी कविता तो काबिले तारीफ थी ही किन्‍तु कविता को सस्‍वर प्रस्‍तुत करने का आपका अंदाज बहुत अच्‍छा लगा. अपने ट्रस्टेड चेले को भी ये गुर सिखायें :)

    उत्तर देंहटाएं
  20. बढ़िया संस्मरण ...

    " जो किसी ने नहीं लिखा" आपने लिख दिया। जारी रहिये

    उत्तर देंहटाएं
  21. बेचारे मुर्गे की जान गई
    और खाने वाले को मज़ा भी ना आया

    उत्तर देंहटाएं
  22. ये अच्छा है मैं भी कवि साबित हुआ।

    उत्तर देंहटाएं
  23. इतना सजीव चित्रण ... गुनगुनाहट की कल्पना भी सजीव सी है..

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव