मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मेरी रणनीति कामयाब रही,अनूप जी दूसरे कक्ष में धरे गए(वर्धा -2)

नागार्जुन सराय का अतिथि कक्ष इतना कम्फर्ट देने वाला था कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ गयी . हाँ कमरे का ऐ सी इन दिनों प्रचलित नए माडल का था -जिसके रिमोट से तापक्रम को नियमित करना था . बिस्तर पर पड़ने के पहले ही एक उचित तापक्रम फिक्स करना था ..अचानक ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का एक फेसबुक अपडेट याद आया जिसमें उन्होंने अनुकूल तापक्रम को रिमोट के 16 अंक पर रखने का प्रस्ताव किया था -मैंने झट से रिमोट पर 16 अंक नियत कर बिस्तर गामी हुआ -इतनी ठंडक हुई कि कम्बल ओढने के बाद भी ठंडा महसूस होता रहा -वो तो बाद में मीडिया डाक्टर के डॉ चोपड़ा ने बताया कि सबसे कम्फर्टेबल 26 है . अब  ज्ञानदत्त जी इतने सीनियर ब्लॉगर हैं उनकी बात की अवहेलना भला कैसे उचित थी? -सो आगे भी मेरे कक्ष की ऐ सी 16 पर ही रही और मैं ज्ञान जी की याद करते कपकपांता रहा . वैसे राज की बात बताऊँ मैं वैज्ञानिक चेतना वाला भले हो सकता हूँ मगर प्रौद्योगिकी चेतना मुझमें बिलकुल शून्य है . मुझे अवचेतन में भी लगता रहा कि जितना हम ऊपर के नंबर बढाते जायेगें कमरा और ठंडा होता जाएगा ...सो ज्ञान जी का नंबर ही हर हाल में उचित है :-)
थोड़ी कंपकपाहट और सुबह वाईस चांसलर साहब के साथ मार्निंग वाक का कमिटमेंट, नींद सुबह पांच बजे काफूर हो गयी . एक बारगी तो मन हुआ कि सिद्धार्थ जी जो नागार्जुन में ही ठहरे हुए थे को खबर कर जाने की असमर्थता प्रगट कर दूं पर इतने सुबह फोन करना उचित नहीं लगा तो एस एम् एस किया ...रिग्रेट मार्न वाक ..मगर वह फेल हो गया . अनमने मन से उठा , दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त हुआ और कमरे में पांच सितारा होटल की चाय बनाने के उपक्रम से डिप टी का आनंद लिया .तब तक पौने छह बज गए थे .मैं ताजगी महसूस कर रहा था . सो कमरे पर ताला जड़ा और चाभी रिसेप्शन पर न देकर(ताकि अनूप जी कक्ष -प्रवेश न कर जायं )जेब के हवाले किया. 
चौकीदार से वी सी साहब के बारे में दरियाफ्त किया तो पता लगा कि वे तो पंद्रह मिनट पहले ही निकल चुके हैं . सिद्धार्थ जी को फोन किया तो जैसे वे चढ़ाई पर चढ़ रहे हों, साँसों को नियंत्रित करते हुए जवाब दिया कि वे गांधी हिल टाप तक का आधा रास्ता नाप चुके हैं और मुझे साथ इसलिए नहीं लिए कि मैं इसके लिए अन्यमनस्क सा था ....इस बातचीत को ध्यान से देख रहे चौकीदार ने मुझे बाईक राईड का आकर्षक पॅकेज आफर कर दिया -आईये सर वी सी साहब तक मैं आपको पहुंचा देता हूँ . वाह, मजा आ गया -सुबह का मलयज समीर -हल्की धुंध ....और पहाडी की चढ़ाई बाईक पर ....-पूरा विश्वविद्यालय पहाड़ियों और उनकी घाटियों में बहुत ही नियोजित ,सुरुचिपूर्ण और सौन्दर्य बोध के साथ स्थापित किया गया है . अगले ही दो मिनट में हमने वी सी साहब विभूति नारायण राय आई पी एस, भूतपूर्व डी जी (विजिलेंस) उत्तर प्रदेश शासन का काफिला पा लिया . 
प्रसंगवश बताता चलूँ कि इतने ऊँचे ओहदों पर रह चुके वी एन राय साहब को अभिमान रत्ती भर भी छू नहीं पाया है -मैंने जैसा उन्हें पहले (मेरी पहली मुलाक़ात 2001 में हुयी थी ) पाया -देखा था वाईस चांसलर होने पर भी वे वैसे ही सहज सरल और आमंत्रित करते हुए दिखे -पहाडी पर चढ़ाई करते हुए उनकी ही नहीं साथ के सभी प्रातः घुमक्कड़ों की साँसे तेज थीं और इस असहजता के बावजूद भी उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में मेरे आने को उत्साह से लिया और मेरे साथ के संस्मरणों को साथ के साहित्यकार मित्रों को बताने लगे -महाशेर मछली के बारे में इलाहाबाद में अपने भ्रम का मेरे साथ निवारण का भी रोचक हिस्सा सुनाया . और अपने प्रातः भ्रमण पथ से जुड़े पशु पक्षियों, और आँखों देखे मनु पुत्रों के अस्थायी प्रणय कुटीरों जहाँ अब विश्वविद्यालय के निर्माण वजूद में हैं के मजेदार संस्मरण भी सुनाये . प्रातः भ्रमण पर दृश्यों का विहगावलोकन मुझे सुधा अरोड़ा की इन पंक्तियों को यहाँ उद्धृत करने को उकसा रहा है -"बेहद कलात्मकता, सलीके और आत्मीयता से बनाए गए गांधी हिल, कबीर हिल पर भारत की पूरी सांस्कृतिक-साहित्यिक विरासत ताज़ा हो उठती है और हमें भावुक बनाने के साथ-साथ एक गर्व से भर देती है। सड़कों, संकुल और कार्यालयों के नामकरण भारत के गणमान्य रचनाकारों के नाम पर! कुल मिला कर ज्ञान के इस अपरिमित भण्डार में आना एक अनोखा सुख देता है! यहाँ के कुलपति विभूति नारायण राय और उनकी सहयोगी टीम को इसका श्रेय जाता है, जिन्होंने एक असंभव से सपने को सच कर दिखाया!"

                                                 गांधी हिल से गुजरते हुए मार्निंग वाक पर
रास्ते में उनका एक छात्र जो संभवतः पूर्विया (यू पी का ईस्टर्न बेल्ट ) ही था अपनी पत्नी के साथ सामने से आता दिखा और राय साहब को देखते ही और पति के बताने पर सद्य व्याहता घूंघट ओढ़ कर ओट में हो गयी ....राय साहब ने छात्र को तुरंत एक मीठी झिड़की दी -यह सब गाँव के लिए भले ठीक हो मगर यहाँ घूंघट नहीं .... और आगे बढ़ चले . रास्ते में हो रहे अनेक निर्माण कार्यों को वे दिखाते जा रहे थे जिसमें कुछ अभी भी प्रगति के विभिन्न चरणों में थे और ये कार्य उनके विगत पांच साल से भी कम समय में पूरे हो गए थे -बमुश्किल दो वर्ष पहले ही सिद्धार्थ शंकर जी विश्वविद्यालय में प्रतिनियुक्ति पर थे और इस अल्प काल में ही पूरी हो गयी बिल्डिगों को चकवत देख रहे थे .....बहरहाल वी सी साहब का बंगला आ गया जो नागार्जुन सराय से ही लगा हुआ है और उन्होंने एक कप चाय पर आमंत्रित किया तो भला हम उसे रिफ्यूज करने की हिमाकत कैसे कर सकते थे ....
चाय के साथ कांफ्रेंस चर्चा शुरू हुयी . वी सी साहब ने आ चुके प्रतिभागियों की संख्या पूछी . सिद्धार्थ जी ने कहा कि लगभग दस लोग नहीं आ पा रहे हैं मगर उनके स्थान पर कुछ नए ब्लागरों ने आने की इच्छा जतायी हैं . यही उचित मौका था जब मैंने सीनियर ब्लागर्स के लिए सिंगल रूम की इच्छा जतायी -इस विश्वास के साथ कि वी सी साहब मेरे अनुरोध को नहीं टालेगें . और वही हुआ . उन्होंने सिद्धार्थ जी को कहा कि कुछ लोग जब नहीं आये हैं तो सिंगल कमरा दिया जा सकता है और बाद में आयेगें भी तो उन्हें बगल के फादर कामिल बुल्के गेस्ट हाउस में ठहरा दिया जाय . मुझे अपार खुशी हुयी (जिसे मैंने प्रदर्शित नहीं होने दिया ), जब सिद्धार्थ जी ने इस प्रस्ताव का कोई प्रतिवाद नहीं किया -भले ही दो टक्कर के ब्लागरों के एक साथ ठहराने की उनका मनोरथ विफल हो गया था .....सतोष त्रिवेदी के फेसबुक के अपडेट के मुताबिक़ अनूप शुक्ल और उन सभी को नागार्जुन पहुँच जाना चाहिए था -अनूप शुक्ल ने पोस्ट में लिखा भी है कि वे अपना सामान मेरे कमरे से अडा चुके थे। अनूप जी, मैं आपसे स्मार्ट निकला .. :-) आप करते भी क्या, कमरे की एकमात्र चाभी तो मैं जानबूझ कर अपनी जेब में लिए फिर रहा था ताकि आप प्रवेश न ले सकें .इस सारी रणनीति से अनभिज्ञ अनूप जी से जब अगले पलों हम मिले तो मैंने सीनियर ब्लागरों को पृथक कक्ष देने के उद्घोष से उन्हें गौरवानुभूति का एक अवसर अता किया और सामने के कक्ष में उन्हें प्रवेश दिला ,सुनिश्चित हो राहत की सांस लेते अपने कमरे का ताला खोल खुद को अन्दर कैद कर लिया .कांफ्रेंस शुरू होने में वक्त कम था ......
जारी ......

37 टिप्‍पणियां:

  1. लो भैया यहाँ भी सीनियरी फ़ंसे पड़ी है :)

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  2. ऐसे अवसर पर ख़ुशी न दिखाना ही सही है :) बढ़िया रिपोर्ट

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  3. सभी लोग कुछ ही फ़ोटो की वही कॉपि‍यां क्‍यों लगा रहे हैं जी

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  5. अच्छा.. इतने षडयंत्र चल रहे थे वहाँ.. हमें तो पता भी नहीं चला..

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  6. अच्छा लग रहा है.. अनूपजी को भी तो अलग कमरा मिल गया ।

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  7. “रिसेप्शन पर एक गतिशील युवा था -आदर से नाम पूछा -और सामने की सूची पर दृष्टि दौडाने लगा -और मैं भी लगभग उसी तीव्रता से सूची पर निगाह दौडाई -मेरा नाम कम्प्यूटर से प्रिंट दिखा ....अरे अरे यहाँ हाथ से लिखा अनूप शुक्ल का भी नाम दिखा -मेरे साथ? मन में तुरंत कौंधा कि यह तो शरारत हो गयी -मैंने सूची पर फिर सायास नज़र दौडाई -दिखा कि अनूप जी का नाम प्रवीण पांडे जी के साथ कमरा संख्या 206 के सामने प्रिंट है जिसे हाथ से काटकर मेरे साथ किया गया है !”

    इससे एक बात तो साफ है कि मूल योजना बिल्कुल वही थे जो आप चाहते थे लेकिन तब शायद आपको यह भान नहीम हो पाता कि आयोजक को कितनी छोटी-छोटी बातों के बारे में सोचना पड़ता है। इसे इस छोटे से प्रयोग से समझने की कोशिश मैंने की थी ताकि असली बात खुलकर सामने आ सके। आप कबःई कुलपति जी से पूछिएगा तो बताएंगे कि आप जैसे वरिष्ठों को पहले से ही अकेले कमरा देने की योजना थी। बगल का कामिल बुल्के छात्रावास लगभग खाली ही रह गया। मैंने जब देखा कि केवल एक-या दो लोगों के लिए ही नागार्जुन सराय में सिंगल कमरा कम पड़ रहा है तो उन्हें दूसरी जगह टिकाने के बजाय कुछ मित्रवत लोगों को एक साथ रखने का विकल्प मुझे बेहतर लगा।

    इसी सेटिंग में मुझे इस प्रयोग की सूझी और उम्मीद से ज्यादा आपकी बेचैनी इतनी बढ़ी हुई मिली कि आपको रणनीति बनाकर अपनी फरियाद कुलपति जी तक ले जाने की जरूरत महसूस हो गयी। वर्ना आप ने देखा होगा कि आपसे बहुत जूनियर अतिथियों के लिए भी सिंगल कमरा उपलब्ध था। आपके लिए तो था ही। :)

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  8. आप लोगों के अकेले कमरे की कवायद पर सिद्दार्थ जी की टिप्पणी मजेदार रही :)

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  9. हे राम.............. पता नहीं कब सुधरेंगे ये सीनियर्स......... :)

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  10. आखिर इतनी संगाष्ठियो का अनुभव भी काम ना आता भला ?
    :)

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  11. दो पोस्ट खर्चा कर दी एक ठो कमरा जुटाने में। बलिहारी है।

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    1. एक ठो कमरा जुटाने में नहीं उस पर अपना एकमेव कब्ज़ा बनाये रखने में :)

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    2. रचना जी एक नहीं दो ठो कम से कम :-)

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  12. सबसे जूनियर अपनी टिप्‍पणी भी सब सीनियर्स के बाद ही देते हैं ताकि कहीं रैगिंग के लिए धर न लिए जाएं। फिर भी वही हो जाता है जिससे बचना चाहते हैं। मैं मेरे से लिए जा रहे इंटरव्‍यू को किसी सहकक्षीय ब्‍लॉगर ने हैक करने का मौका नहीं गंवाया और खूब खुलकर बलात अपनी राय इंटरव्‍यूकर्ता को ठूंस दी। खैर ....

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  13. अभी तक रुकने , ठहरने तक का ही मामला निपटा , ब्लॉगिंग से सम्बंधित चर्चा किस किश्त में होगी !!

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    1. आपमें धैर्य का इतना अभाव क्यों है ?

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  14. जो सहज है वह सदैव ही सहज है सहजता उसका स्वभाव है वह निरंतर अपने स्वभाव में है। निरभिमान। बहुत बढ़िया संस्मरण।

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  15. आखिर आप चुहुलबाजी से बाज नहीं आये अनूप सुकुल जी काफी वरिष्ठ व गरिष्ठ ब्लागर है लगभग महर्षि बाल्मीकि की तरह .....
    आपको उनका सानिध्य स्वीकारना चाहिए था जो कुछ गंधी देत नहीं तो भी वास सुवास जरूर चरितार्थ होती फिर आप इस तरह से इस गोपनीय आख्यान को पोस्ट कर दिया धन्य हो प्रभु

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  16. रोचक जानकरी, पढकर आनंद ले रहे हैं.

    रामराम.

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  17. बिना कमरा शेयर किए भी वैज्ञानिक चेतना पर व्यंग्य चेतना का प्रभाव दिख रहा है।
    संभावना है कि सापेक्ष प्रभाव उधर भी हो रहा होगा।

    प्रणाम

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  18. :) क्या बात ! क्या बात ! क्या बात! :)
    सुनाते रहिये। पढ़ रहे हैं और खूब मजा आ रहा है। :)

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    1. आप मजे लेते रहिये हम सुनाते जायेगें! :-)

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  19. एक ही कमरा ठहर जाते तो कुछ पोस्ट का और मटेरियल बन जाता :)

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  20. सीनियर्स जब बच्चों सी बात करते हाँ तो भले लगते हैं. :)

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