गुरुवार, 26 सितंबर 2013

वर्धा सम्मलेन पार्ट 4...कुछ और अब तक अनकहा!

 पार्ट -1,  पार्ट -2, पार्ट -3
कुलपति महोदय ने सुबह चाय पर ही जोर देकर कहा था कि मिनट टू मिनट प्रोग्राम पहले ही तैयार होकर लोगों में बट जाना चाहिए .समय कम था लिहाजा सिद्धार्थ जी के साथ मैं भी बैठकर पल प्रतिपल कार्यक्रम को अंतिम रूप देने लगा . ...उद्घाटन सत्र के बाद मैंने एक चाय ब्रेक की बात कही तो सिद्धार्थ जी ने कहा कि तनवीर प्रेक्षागृह में तो वी सी साहब ने चाय पर रोक लगा रखी है और उसी वक्त मुझे एक डेजा वू सा हो आया .वर्धा के पहले सम्मलेन में बेड टी का मसला उछला और लोगों ने उसे इतना हयिलायिट किया था कि मुझे असहजता सी होती जब इस बात को लेकर लोग मेरी चुटकी लेते . वर्धा प्रथम के बाद अब यह नया चाय प्रसंग सामने था . मैं असहज होने लगा . मैंने सिद्धार्थ जी को कहा कि उद्घाटन सत्र के बाद चाय पान तो एक परिपाटी है .मगर वी सी साहब की निषेधाज्ञा के आगे मैं भी निरुत्तर हो रहा . शायद बात यह थी कि वहां चाय पीने के बाद लोग कप -कुल्हड़ इधर उधर फेंक देते थे जिससे परिसर गन्दा हो जाता था . सो, वी सी साहब ने तनवीर प्रेक्षगृह में चाय पर पूर्ण पाबंदी लगा दी थी .
 वही हुआ जिसकी आशंका थी -उद्घाटन सत्र के बाद लोग चाय ढूंढते नज़र आये . जिन अनूप जी ने  वर्धा के पहले सम्मलेन में इस मुद्दे को उठाने पर आसमान सिर उठा, पानी पी पीकर मुझ पर चुटकी ली -वे अब खुद मुझसे चाय के बारे में पड़ताल कर रहे थे .मैं तटस्थ हो लिया . अब झेलिये न, खूब  उडाई थी मेरी खिल्ली  . भोजनावकाश के बाद के सत्र के पश्चात भी वहां चाय नहीं मुहैया हुयी . शायद लोगों की चाय विषयक पृच्छाओं से तंग आकर सिद्धार्थ जी ने क्राईसिस मैनेज किया और दूसरे  दिन एक सत्रावसान के बाद मंच से चाय ब्रेक की घोषणा कर दी . लोग इतनी तेजी से बाहर लपके जैसे पिछले दिन की भी कसर पूरी कर लेना चाहते हों . मगर इस बार तो एक और गहरी संवाद हीनता थी जो लोगों को एक घंटे तो जरुर ही चाय के लिए बिठाए रही -मगर इसका एक उज्जवल पक्ष यह रहा कि प्रेक्षागृह की औपचारिक बतकही यहाँ अब अनौपचारिक हो गयी थी .छोटे छोटे मनचाहे दलों और कैमरों के चमकते फ़्लैश में कई चेहरे चमक दमक रहे थे .अनूप जी नवयुवा ब्लागरों को ब्लागिंग के गुर समझा रहे थे .एक ब्लॉगर को मेरे पास भी लाये परिचय कराने के लिए -अहोभाग्य! :-) इस बार तो बेड टी के लिए हर मेहमान कक्ष में पांच सितारा इंतजाम था मगर सम्मलेन स्थल पर चाय फिर एक मुद्दा बनी -क्यों अनूप जी, बनी या नहीं?
मैं सम्मलेन के अकादमीय पहलुओं की तो अभी चर्चा ही नहीं कर हूँ - अब तक और लोगों की कई बेहतरीन पोस्ट आ चुकी हैं . एक संक्षिप्त किन्तु सार गर्भित पोस्ट तो चेले की है . शकुंतला शर्मा ने विवेच्य विषय बिन्दुओं को अच्छा समेटा है . अनूप शुक्ल जी ने अब तक विविध पहलुओं को समोए दो पोस्ट, यहाँ और यहाँ लिख मारी है , तो मुझे नहीं लगता कि अब उनका पिष्ट पेषण किया जाय . हाँ दूसरे दिन चर्चा में ब्लागिंग एवं साहित्य के सत्र की कुछ टटकी यादें है जिन्हें मैं साझा कर लूं . इस चर्चा के पैनेल में मैं भी था और सत्र संचालक इष्टदेव सांकृत्यायन थे -मेरे शरीर सौष्ठव की तुलना में एक क्षीण काया पुरुष! .. तो उन्होंने माईक संभाला और मंचीय गुरुता बनी रहे इसलिए उनके ठीक बगल में मैंने अपना आसन जमाया . मगर फिर भी एक गड़बड़ हो गयी . इष्टदेव जी ने मेरे ठीक बगल में बैठने को ललित शर्मा जी को आमंत्रित कर लिया -यानी दो दो मूछों के विद्वान साथ हो लिए -अब चोटी के विद्वान् तो फिर भी साथ बैठ लें मगर न जाने क्यूं मुझे यह लगा कि दो मूछों के विद्वानों को अलग अलग बैठना चाहिए . मैंने सत्र संचालक से प्रतिवाद भी किया मगर उन्होंने इसकी कोई नोटिस ही नहीं ली बस कई इंच की मुस्कान बिखेर दी -खैर मैंने पूरी कोशिश जारी रखी कि ललित जी की मूछें मुझसे टकराने न पायें अन्यथा जाने क्या न  हो जाता ..... :-) 
 और बस ठीक उसी समय हाल में मनीषा पाण्डेय ने  प्रवेश किया ...और सीधे अग्रिम लाईन में मेरे ठीक सामने विराजमान हुईं . ठीक उसी तरह हमारे बीच स्वागत की भाव भंगिमा का आदान प्रदान हुआ जैसा कि वर्धा के  इलाहाबाद के पहले सम्मलेन में हुआ था - पता नहीं तब या अब भी मुझे वे पहचानती जानती थीं या नहीं मगर उनका यह शिष्टाचार मुझे तब भी और इस बार भी बहुत  अच्छा लगा . बिल्कुल वही सिचुएशन/ लोकेशन तब भी थी -मैं मंचासीन था और वे अगली पंक्ति में बैठी थी, अगले सत्र में इन्होने भी मंच -माईक संभाला और लैंगिक विभेद के मुद्दे पर बेलौस और  बिंदास बोलीं . अब मैं श्रोता था -मनीषा ने किसी बात पर कहा कि वे सोशल साईटों पर खुद के नियोक्ता का पता नहीं देतीं -अकस्मात मेरे  मुंह से तेज आवाज में निकल पड़ा -'को नहिं जानत है जग में प्रभु .....नाम तिहारो " लोग मुस्कुराए और ऐसा लगा मनीषा सकुचाईं भीं . मनीषा में कथनी और करनी मतलब पाखण्ड नहीं दीखता और यह बड़ी बात है . 
 मनीषा मगर  बहुत भुलक्कड़ या  बेपरवाह सी  दिखीं . उतरना था सेवाग्राम और चली गयीं लगभग सौ किमी दूर बल्लारशाह और इसलिए कार्यक्रम में देर से पहुँचीं -अपना बेशकीमती कैमरा विश्वविद्यालय में न जाने कहाँ छोड़ आयीं और शाम को कुलपति महोदय की  चाय पर जब मैंने संतोष को कुहनियाया कि चेले मनीषा के साथ एक ग्रुप फोटो कर लो तो उन्हें सहसा कैमरे की याद आयी और वे सरपट  बाहर को भागीं .कई पलों के बाद जाकर माजरा समझ में आया -कुलपति जी ने कहा अब मसला हमारे विश्वविद्यालय की साख का है -एक एक पल बोझिल हो रहा था -कुलपति जी ने फोन  पर ही कैमरा बरामदगी के निर्देश दे रखे थे और करीब आधे घंटे बाद मनीषा विजयी मुस्कान के साथ कैमरा लिए फिर कमरे में आ पहुँची -सबने राहत की सांस ली और मनीषा ने दनादन कई फोटो  उतार डाली मानों कैमरे की बरामदगी को सेलिब्रेट  कर रही हों .मनीषा सरीखी प्रतिभा पर मुझे बस यही उद्धरण याद आ रहा है -  देयर इज नो जीनियस विदाउट द मिक्सचर आफ मैडनेस :-) 
जारी है .......

32 टिप्‍पणियां:

  1. ओहो, तो टिप्पणियों का श्रीगणेश मुझे ही करना है...!
    चाय वाला प्रकरण मुझे भी परेशान करता रहा, बल्कि अभी भी उलझन सुलझी नहीं है। यह तो निश्चित है कि इसपर रोक लगाने का कोई वित्तीय कारण नहीं होगा।

    प्रशासनिक दुर्व्यवस्था के पूर्व अनुभव या सुविधा के दुरुपयोग को देखते हुए ही शायद यह निर्णय लिया गया होगा। बाहरी अतिथि और स्थानीय विद्यार्थी/ श्रोता आपस में मिले-घुले थे इसलिए बाहरी अतिथियों के लिए अलग से कोई इन्तजाम करना कठिन था। यदि सबके लिए इन्तजाम होता तो घोर अव्यवस्था फैलती और गन्दगी अलग से। शायद इसी लिए कुलपति जी ने यह व्यवस्था दी हो कि जिसे चाय पीनी है वह अपने कमरे में अपने हाथ से बनाकर भरपूर ग्रहण कर ले, सभागार में इसकी तलब दबाकर वह काम करे जिसके लिए इतनी दूर से बुलाया गया है। नींद भगाने के लिए पानी की बोतलें थीं ही।

    आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। :)

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    1. सिद्धार्थ जी ,मुझे कोई असुविधा नहीं हुई ,जिन्हें हुयी होगी वे आपके इस खेद प्रकाश को ग्रहण करें ..

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  2. मनीषा पांडेय ने छोटी भूल की और हमने बहुत बड़ी।हमें मनीषा ने ही ज्यादा ढाँढस भी बँधाया।
    बढ़िया आँखों देखा हाल।

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    1. महराज मांसाहार की अपनी मासूम भूल को मनीषा की हडबडिया भूलों से इक्वेट मत करें !

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    2. संतोष जी, आप भूल नहीं पा रहे हैं तो हिन्दी ब्लागरों को दिल्ली बुला कर दावत दे डालो। प्रायश्चित हो जाएगा।

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    3. दिवेदी जी की सलाह पर गौर करो और ब्लॉगर भोज का आयोजन कर डालो, माट साब

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    4. मैं द्विवेदी जी के प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करता हूँ। :P

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    5. खाने पीने के मामले में अक्सर हम प्रस्तावों का समर्थन करते पाए जाते हैं ! यहाँ भी यही समझा जाए !

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    6. kinhi ek se sahmat hoyen ya sabse kya fark parta hai baat to ek hi hogi





      pranam.

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    7. संतोष जी दिनेश जी और उससे जुड़े सहमति के सारे स्वरों में मेरा भी स्वर मजबूती से शामिल हो। कब कहां आना है बताएं।

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  3. @संतोष त्रिवेदी
    अगली बार चिकन टिक्का खा कर देखो ...फिर शिकायत नहीं करोगे पंडित !!

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  4. चाय की चहास ने ब्लॉगरों के चेहरे पर पीड़ामयी प्रतीक्षा के भाव ला दिये थे, उन्हे कैसे भुलाया जा सकता है।

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  5. @संतोष त्रिवेदी जी,
    आपको चिकन का स्वाद कैसा लगा,ये तो आपने बताया ही नही,,,,

    नई रचना : सुधि नहि आवत.( विरह गीत )

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    1. उन्हें अच्छा लगा था तभी तो आधा माल सुडुक लिए थे :-)

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  6. अरविंद जी, आंख तो मेरी सेवाग्राम गुजरते ही खुल चुकी थी। डेढ़ सौ किलोमीटर आगे इसलिए जाना पड़ा क्‍योंकि उसके पहले कोई स्‍टॉप ही नहीं था। ये भुलक्‍कड़ी से ज्‍यादा नींद का मसला था। सुबह उठना मेरे लिए काल है। फिर चाहे ट्रेन या फ्लाइट पकड़ने के लिए ही क्‍यों न उठना पड़े। लेकिन हां, भुलक्‍कड़ भी मैं हूं। दिमाग कहीं खोया रहता है, कुछ न कुछ सोचती रहती हूं और यहां वहां चीजें भूल जाया करती हूं। रूटीन बात है। वैसे बहुत अच्‍छा लगा आपका ये संस्‍मरण। वर्धा की सुहानी यादों के साथ।

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  7. को नहिं जानत है जग में प्रभु .....नाम तिहारो " लोग मुस्कुराए,बुद्ध मुस्काए और हम भी मुस्काए

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  8. अरविन्द जी लगता है चाय ने साहित्यकारों को बहुत चक्कर में डाला ..यह तो हाला प्याला से कम नहीं रहा :)
    नई पोस्ट साधू या शैतान
    latest post कानून और दंड

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  9. आपके संस्मरण पढकर वर्धा सम्मलेन की जानकारीयाँ तो मिल रही है !!

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  10. चाय से कहीं हाय तो नहीं निकली ?

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  11. बहुत खूब !बहुत खूब !बहुत खूब !

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  12. बहुत खूब !बहुत खूब !बहुत खूब !

    कई नैन चले ,कई बैन चले ,

    बखिया कइयन की उधड़न लागी।

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  13. सम्मलेन की अनौपचारिक कथा ज्ञात हुई।
    एक- दो चिट्ठाकार चर्चा का माहौल बन गया है !

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  14. वाह इन अनौपचारिक बातों, संस्मरणों का अपना एक अलग आनंद है..

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  15. रोचक संस्मरण साझा कर रहे हैं आप यदि लाईव टेलिकास्ट किया होता तो आनंद आता. अबकि बार यह व्यव्स्था क्यों नही की गयी?

    रामराम.

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  16. चाय पीड़ितों की हाय
    किसी को खा ना जाए

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  17. सत्र संचालक इष्टदेव सांकृत्यायन थे -मेरे शरीर सौष्ठव की तुलना में एक क्षीण काया पुरुष!
    VLCC वाले चाहें तो अपने विज्ञापन में इस्तेमाल कर सकते हैं। आपकी फोटो पहले वाली और इष्टदेव जी की बाद वाली :)

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  18. और भी अनकही सुनने के लिए उत्सुकता जाग्रत हो उठी..

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  19. सभागारों में चाय पीने की अनुमति नहीं होती है। यह सबको जान लेना चाहिए1 बशर्ते कि पीने वाले, अध्‍यादेश फाडूओं के समकक्ष न हों।

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