शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

देवता उसने कहा था ....

पता नहीं आप किसी के साथ ऐसा होता है या नहीं मगर मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि सुबह उठते ही किसी गीत ,कविता ,गजल की पंक्तियाँ मन में सहसा ही कौंध उठती हैं और दिन भर ग्रामोफोन के रिकार्ड के तरह मन में घुमड़ती रहती है -चाहे और अनचाहे भी ! कभी बेखुदी में कविता/गीत होंठो तक भी आ पहुंचता है और चैतन्यता में आते ही हठात मुंह सी लेना होता है -असहज सा चौर्य निगाह से इधर उधर देखने पर अक्सर अपने ड्राईवर के होंठो पर डेढ़ इंच मुस्कान पाकर किंचित सकुचा भी जाता हूँ !साथी टोकने लगते हैं और आग्रह करते हैं तो उन्हें गुनगुनाकर उपकृत भी कर देता हूँ !
आज की कविता हरिवंशराय बच्चन जी की है जो एक लम्बे अन्तराल के बाद सहसा ही याद हो आयी है और मेरा पीछा नहीं छोड़ रही है -सुबह से कम से कम दस बार इसे गुनगुना चुका हूँ ! अब यह रील दिन भर चलेगी -आशंकित भी हूँ ! बहरहाल कविता ये रही -
देवता उसने कहा था
रख दिए थे पुष्प लाकर
नत नयन मेरे चरण पर
देर तक अचरज भरा
मैं देखता खुद को रहा था
देवता उसने .....
गोद मन्दिर बन गयी थी
दे नए सपने गयी थी
किन्तु जब आँखे खुली तो
कुछ न था मंदिर जहां था
देवता उसने ....
प्यारा पूजा थी उसी की
है उपेक्षा भी उसी की
क्या कठिन सहना घृणा का
भार पूजा का सहा था
देवता उसने कहा था


अब मैं इसका भावार्थ यहा लिख नही पा रहा ,अपनी तईं समझ तो रहा हूँ -साहित्य का मेरा ज्ञान पल्लवग्राही और समझ अधकचरी सी ही है ! प्रायः श्रेष्ठ कृतियाँ पूरी समष्टि से मानों तादाम्य स्थापित कर लेती हैं ! अब देखिये न बच्चन जी की इस कविता ने मुझसे शिद्दत के साथ तादात्म्य बना लिया है -मानों अब यह मेरी ही अभिव्यक्ति बन बैठी है -इसलिए ही कभी कभी सोचता हूँ कि पूर्व कविजन जो पहले ही अभूतपूर्व बल्कि कालजयी कृतियाँ रच गए हैं तो नयी रचनाओं के सृजन की जरूरत ही क्या है ? हम उनकी पंक्तियों के जरिये अपनी बात शायद और भी प्रभावपूर्ण तरीके से कह सकते हैं ! है कि नहीं ?

बड़ों से आग्रह की गुस्ताखी नहीं कर सकता पर अनुज हिमांशु से गुजारिश की है कि वे इसका भावार्थ मित्रों के लिए कर दें -बाकी तो प्रबुद्धजन इसका अर्थ ,निहितार्थ ,भावार्थ तथा यथार्थ सभी कुछ समझ ही जायेंगें ! हिमांशु के उत्तर का इंतज़ार है -अगर उन्होंने काम पूरा कर भेज दिया तो इसी पृष्ठ पर ही वह भी प्रस्तुत हो जायेगा !

और यह रहा हिमांशु का जवाब जो किंचित देर से मगर दुरुस्त आया है बस जल्दी से कामा फुलस्टाप सहित यहाँ चेप रहा हूँ _आदरणीय,
बहुत क्षोभ का अनुभव कर रहा हूं, इतनी देर से आपकी यह मेल पढ़ने में। कल एक शादी में पूरी रात जागता रहा, इसलिये सुबह नेट पर नही आया, सोता रहा; पर जो 'सोवत है सो खोवत है'। समय से आपके आदेश का पालन नहीं कर सका -क्षमा-प्रार्थी हूँ।
केवल क्षमापन स्तोत्र ही बाँच कर छुट्टी पा जाता, पर अचानक डैशबोर्ड में आपकी नयी पोस्ट देखी। पढा तो पाया- कि मैं सार्वजनिक तौर पर दोषी हो जाऊंगा, तय काम न करने पर।
अपनी मंद-मति के सापेक्ष्य जितना हो सका वह मेल कर रहा हूँ -

कविता में व्यक्ति की अपनी निष्ठा और अपने भाव ही वरेण्य होते हैं, संकेत तो इसी ओर है । एक व्यक्ति किसी को अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहा है। वह व्यक्ति पूजार्ह है या नहीं है, इससे उसका कुछ लेना देना नहीं है । फूलों का उपहार वह पूज्य के चरणों पर रख देता है, क्योंकि पुजारी ने उसे देवता मानकर उसकी अर्चना की थी । उस व्यक्ति की गोद ही पूजा करने वाले के लिये मंदिर का गर्भ-गृह बन गयी थी ।

जिसकी पूजा हो रही है उसकी योग्यता पीछे हो गयी थी, पूजा करने वाले की श्रद्धा आगे खड़ी हो गयी थी । पूजा का उपहार अपने सम्मान में अर्पित देखकर पूजित व्यक्ति की आँखें स्वयं की ओर मुड़ गयीं । वह एक सपने में खो गया है, यह सोचते हुए कि क्या जिसे मंदिर समझा जा रहा है, वह मंदिर है । अगर पूजा से कुछ मुझे मिला तो वह मेरी नहीं पूजा करने वाले की विशेषता थी, श्रद्धा थी; और मुझे कुछ नहीं मिला तो वह भी पूजा न करने वाले की उपेक्षा या घृणा ही थी, श्रद्धा नहीं थी । मैं जो पाता हूँ, वह मेरी अपनी उपलब्धि कम, दाता की श्रद्धा ही अधिक है । मैं पूजा से प्रसन्न तो होता हूँ कि क्योंकि उसने मुझे देवता कहा था, तो क्या जब पूजा के स्थान पर उसने घृणा दी तो उसे भी क्या उसी मोद के साथ ग्रहण कर लूंगा ? यदि हाँ, तब तो उसने जो देवता कहा था वह सार्थक था । यदि नहीं, तब उसने चाहे जो कहा हो , मेरा कुछ भी होना न होना निरर्थक था ।

मैं उद्विग्न हुआ, यह मेरी तुच्छता थी, वह देता गया, यह उसकी महानता थी । अतः सार्थकता 'अहं ब्रह्मास्मि' की नहीं 'तत्वमसि' की है ।

कविता का भाव आत्मकेन्द्रित न होकर विश्ववन्दित दिशा की ओर बढ़ गया है। इनका मेल 'बच्चन' की स्वयं की इन भाव भरी पंक्तियों से स्वयं बैठ जाता है -

"पूछ मत आराध्य कैसा
जब कि पूजा भाव उमड़ा
मृत्तिका के पिण्ड से
कह दे कि तू भगवान बन जा,
जान कर अनजान बन जा ।"


स्नेहाधीन-
हिमांशु कुमार पाण्डेय

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत आभार आपका. श्री हि्मांशु जी के जवाब का इन्तजार करते हैं.

    रामराम.

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  2. इस कविता ने कुछ घटनाएँ याद आ रही है जो महेन्द्र नेह सुनाते हैं कि एक सज्जन के पूर्वजों का बनाया शिव मंदिर था। वे सट्टा लगाते थे। जिस दिन खुल गया उस दिन खूब पूजा होती थी महल्ले के सब बच्चों को दूध पिलाया जाता था। जिस दिन सट्टे में रकम हाथ से निकल जाती थी वे उस दिन की पूजा जूतों की जोड़ी से किया करते थे। दो चार दिन बाद फिर लाभ हुआ कि पूजा कायदे से होती थी।

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  3. सृजन से जुड़े लोगों के साथ ऐसा होता है शायद. यह सही कहा आपने कि कालजयी पंक्तियों के जरिये हम अपनी बात शायद और भी प्रभावपूर्ण तरीके से कह सकते हैं.

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  4. बच्चन जी की रचना पढ़वाने का शुक्रिया ।

    हिमांशु जी द्वारा किए जाने वाले भावार्थ का इंतजार रहेगा ।

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  5. अक्सर हमारे साथ भी हुआ है. लेकिन कविता कभी सर नहीं चढी. पुराने फ़िल्मी या गैर फ़िल्मी गीत सूरज के साथ साथ वे भी ढल जाते हैं. रात को याद करने की जित्ती भी कोशिश करो दुबारा याद नहीं आते.

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  6. इस कविता पर संक्षित टिप्पणी देने और यहां देने के लिए आभार।

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  7. बच्चन जी की यह कविता बहुत सुन्दर है...इसको पढ़वाने का धन्यवाद कुछ रचनाये यूँ ही जहन पर छाई रहती है ..

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  8. बहुत ही सुन्‍दर और जबरदस्‍त गेय कविता है, जो किसी भी युवा मन को आकृष्‍ट कर सकती है। बसंत के मौसम में ऐसे गीत याद आए, तो इसमें आपकी खता क्‍या है।

    आभार, इतना सुन्‍दर गीत पढवाने के लिए।

    जाकिर अली रजनीश

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  9. आपके अनुग्रह का सदैव आकांक्षी हूँ। देर से आया हूँ, नहीं जानता था, इस योग्य भी समझा जाउंगा। आपके स्नेह की शक्ति से इस क्षुद्र-मति ने जो भी किया उसे प्रेषित कर चुका हूँ । यद्यपि जानता हूँ कि ऐसे कार्य हम जैसे लोगों के लिये कालिदास की भाषा में 'तर्तुं उडुपेनापि सागरम्' जैसा प्रयास है, पर फिर भी…

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  10. मुझे भी हिमांशु जी के जवाब का ही इंतजार है ।

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  11. गोद मन्दिर बन गयी थी
    दे नए सपने गयी थी
    किन्तु जब आँखे खुली तो
    कुछ न था मंदिर जहां था
    देवता उसने ....
    " bhut sundr or bhavatmk panktiyan...aabhar aapka inhe yhan pdhvane ka ..hme bhi intjaar hai Himanshu ji ke bhavarth ka.."

    Regards

    regards

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  12. स्कूल में बच्चन साहब की कुछ कविताओ को धुन दी थी.. वो भी एक अलग रोमांच था.. उनके लिखे में एक कमाल का फ्लो होता है.. यकीन मानिए उनसे इस कदर इनस्पाइर हुआ था तब.. की नौंवी क्लास में स्कूल की लाइब्ररी से मधुशाला उठाकर ले आया... पर तब समझ में नही आई थी... पर शब्दो को ले में बाँधना बहुत बढ़िया था... आज की कविता को भी उसी लय में पढ़ा... पुरानी यादे ताज़ा हो गयी..

    शुक्रिया आपका.. इस पोस्ट को पढ़वाने के लिए..

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  13. द्विवेदी जी ,लगता है आप पर भी सांकृतायन जी के जूता पुराण का पूरा प्रभाव पड़ गया है -कैसा रसभंग किया है आपने ! (मजाक )

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  14. @सुधीजन ,हिमांशु ने भावानुवाद प्रस्तुत कर दिया है -उनका यह स्नेहार्पण मुझे कृत्यर्थ कर गया -भावानुवाद के तो कहने ही क्या और उस पर फिर से बच्चन जी की पंक्तियाँ मानो व्यक्त भावों में चार चाँद लगा रही हैं !

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  15. आप चाहे तो बच्हन की कई कविताएं एच एम् वी पर उपलब्ध है कुछ में मन्ना डे का स्वर है कुछ में अमिताभ का...

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  16. Bachchan jee ki kavita yaad karvane ka shukriya.

    ( sorry to comment in Eng. I'm away from my PC )

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  17. सब ने बहुत तारीफ़ कर दी हम तो यु कुछ कहे गे कि हर सुबह मै बहुत गुनगुनाता हुं कोई सुंदर सा गीत, कई बार इन गोरो को अच्छा नही लगता, लेकिन मुझे खुश देख कर पूछते जरुर है क्या बात है बहुत खुश हो... तो मै उन्हे कहता हूं, भगवान ने आज का दिन फ़िर से उपहार मै हमे दिया आओ तुम सब भी खुशियां मनाओ... बहुत सुंदर लगा आप का लेख.
    धन्यवाद, हिमांशु जी का भी धन्यवाद

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