बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

देव डी-एक सेकंड थाट, ममता जी की टिप्पणी पोस्ट के उपलक्ष्य में !

उस दिन मैंने एक मिनी पोस्ट इस फिल्म पर इसलिए प्रकाशित की थी कि मित्रों को सहेज दूँ कि बच्चों को साथ लेकर देखने न जायं ! नाहक ही इम्बरैस्मेंट होगा ! अब तक तो ब्लॉग जगत में इस फिल्म को लेकर कई अच्छी समीक्षाएं भी आ चुकी हैं ! कुछ प्रतिक्रियाएं ! जिनमें एक मैंने कमेन्ट क्या कर दिया कि हंगामा ही हो गया है ।
इसलिए इस फ़िल्म पर एक सेकेण्ड थाट जरूरी हो गया है ।
अनुराग कश्यप भले ही बहुत विद्वान और अलग हट के निर्देशक हों मगर व्यावसायिकता का अपना पक्ष तो होता ही है । कहीं पढा था कि अनुराग कश्यप इस फिल्म के लिए महिलाओं की मिजारिटी वाला सेंसर बोर्ड चाहते थे वह शायद उन्हें मिल भी गया -सच मानिये मैं इस बात पर कायम हूँ कि यदि एक भी भद्र जन सेंसर बोर्ड में होता तो कई दृश्यों को जिस वीभत्स तरीके से दिखाया गया है कैंची चल गयी होती ! अतृप्त काम वासना को दिखाने के लिए जिस वीभत्सता के स्तर पर निर्देशक जा पहुंचा है वह उसकी शायद ख़ुद की (फर्स्ट हैण्ड ) विकृत भोगेच्छा फंतासी को मूर्त रूप देती है -नर नारी की देह को विकृत काम वासना से क्या इस तरह सार्वजनिक मंच पर प्रोजेक्ट / अपमानित करने लायक है ? फिर तो पॉर्न क्या बुरा है ? पॉर्न को सभ्य समाज सार्वजनिक करने का पक्षधर क्यों नही होता ?
फिल्म कुछ महिलाओं को इसलिए अच्छी लग सकती है कि निर्देशक ने इसमें उन्हें पुरूष के इमोशनल और यौनिक अत्याचार का शिकार होता दिखाया है और बहुत चालाकी से महिलाओं की सहानभूति बटोरने की कोशिश की है . आज जब अनेक उत्पादों को बेंचने के लिए उपभोक्ताओं के हर वर्ग और लिंग को साधा जा रहा है,गला काट संघर्ष में हर उत्पादक दूसरे उत्पादक के बधे बधाये ग्राहकों में सेंधमारी की फिराक में रहता है -अनुराग कश्यप ने भी फिल्म प्रेमियों की जमात की आधी दुनिया में सेंध लगाने की चालाक कोशिश की हैं -इमोशनल अत्याचार का जुमला लांच कर बन्दे ने ख़ुद यही हथियार आधी दुनिया पर चला दिया है -
पुरूष हर वक्त कामुक फंतासियों में डूबा होता है -नारी के कोमल मन को वह कभी समझना ही नहीं चाहता ! नारी तो बस अपने हमदम का हर वक्त हर घडी अच्छा ही चाहती है -शादी शुदा होकर भी वह अपने प्यार के लिए बिछ जाती है । यही दृश्य है शायद जिन पर भोली नारियां फिदा हो रही हैं ! और भी देखिये -फिल्म यह प्रतिपादित करती है कि नारी हर हाल में पुरूष की मारी बेचारी है पर फिर भी चरित्र के मामले में वह पुरूष पर भारी है -इस फिल्म में तो उसे नायक का दुखहर्ता ,तारणहार बना दिया गया है ! यही सब वे प्रायोजित पहलू हैं जिनके सहारे नारियों को बरगलाकर सिनेमा हाल तक ले आने की चालाकी फिल्म में हुयी है -और ख़ुद इमोशनल अत्याचार का सहारा लेकर निर्देशक फाईनेंसर की झोली भरने के लिए नारी मन का शोषण करने को उद्यत दीखता है .
ममता जी की टिप्पणी ने मुझे भी मर्माहत किया इसलिए यह पोस्ट कि मैं अपनी टिप्पणी को सही संदर्भ में सुधी जनों के समक्ष रख सकूं !
फिल्म विकृत सेक्स फंतासियों का कूड़ा दान है -यह मेरा दृढ़ मत है ! जिन्हें अच्छी लग रही वे भोले लोग हैं प्यारे प्यारे !

12 टिप्‍पणियां:

  1. चलिये आपने भी अपना मत और अपनी बात लिख ली. बढ़िया है.

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  2. हम तो फ़िल्म देखते ही नही. सब लोग अपना उल्लू सीधा करते हैं और व्यावसायिक पक्ष से बचना बडा मुश्किल है. आखिर आजकल काफ़ी बडा स्टेक लगा होता है कोई छोटी मोटी पूंजी का काम नही है.

    रामराम.

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  3. फ़िल्म -संगीत दरअसल ये सब एक निजी मसला है....हम कई तरह के नोवल पढ़ते है ..अच्छे अच्छे नामी सहितीयकारो के ..... उसमे ऐसे चरित्र -किरदार कई मिलते है .. ..तो इसे भी एक कहानी मानिये ...ऐसे भी कई भटके हुए चरित्र है हमारे समाज में ......ओर सच मुच है....अब जैसे देखिये मुझे स्लम डोग एक साधाहरण बॉलीवुड फ़िल्म लगी ..ओर तारे जमीन की अपेक्षा कही कमतर....हर मामले में .संगीत ,लेखन ,डाइरेक्शन ....पर लोग उसकी भी वाही-वाही कर रहे है ..तो ये उनकी निजी पसंद है.
    आप दोनों ने अपनी अपनी बात रख दी ....बस किस्सा खत्म ...

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  4. हम ने फिल्म नहीं देखी। इस लिए कुछ न कहेंगे।

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  5. फ़िल्म नहीं देखी, इसलिये क्या कहें? पर यह हिस्सा सच कहता है - "अनेक उत्पादों को बेंचने के लिए उपभोक्ताओं के हर वर्ग और लिंग को साधा जा रहा है,गला काट संघर्ष में हर उत्पादक दूसरे उत्पादक के बधे बधाये ग्राहकों में सेंधमारी की फिराक में रहता है -अनुराग कश्यप ने भी फिल्म प्रेमियों की जमात की आधी दुनिया में सेंध लगाने की चालाक कोशिश की हैं"..

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  6. हम तो मिश्राजी अब यही कहेंगे कि आपकी बात सिद्ध करने के लिए ही अब फ़िल्म देखेंगे। और ममता जी को भी एक्स्प्लेन कर देंगे कि असली चक्करवा क्या है ? हा हा ।

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  7. मिश्रा जी जेसा आप ने बताया तो हम तो कतई यह फ़िलम नहि देखेगे, क्योकि हम गन्दगी से जितना दुर रहे उतना ही अच्छा, चलिये अब दोनो ओर की बात खत्म , फ़िर से नार्मल
    धन्यवाद

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  8. जहाँ मैं रहती हूँ उस शहर में यह फ़िल्म लगी ही नहीं और लगने की कोई सम्भावना भी नहीं है.फ़िल्म 'फैशन ' या मेट्रो' [जिनके प्रीमीयर 'दुबई 'में ही हुए थे]के प्रदर्शन की अनुमति मिलने में जिस जगह इतनी कठिनाई हुई ..कांट छाँट कर PG-१५ की श्रेणी में रखी गई थी वे फिल्में---
    -वहां 'इस तरह की बोल्ड ' फ़िल्म का प्रदर्शन हो पायेगा..कोई सवाल ही नहीं!
    'सी डी' भी मिलने के कोई असार नहीं हैं.मैं ने तो अब तक वो गाना भी नहीं सुना जिस की इतनी चर्चा हो रही है..'इमोशनल अत्याचार! '

    chapter hi close!

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  9. फिल्म देखना ना देखना सबकी अपनी सोच है.. सबका अपना नज़रिया है.. आपने फिल्म के बारे में जो भी लिखा है मैं उसे सिरे से खारिज करता हू मुझे ऐसा लगता है जिन्हे फिल्म पसंद नही आई वो बहुत ही भोले इंसान है..

    उपरोक्त पंक्तियो में मैने बस अपना नज़रिया बताया है.. जिस प्रकार आपने अपनी पोस्ट में बताया है... हालाँकि मुझे लग रहा है अपने शब्दो में की मैं निर्णायक हो गया हू.. और जो मैने कहा वही अंतिम फ़ैसला है.. पर मैं जानता हू.. ऐसा नही है..

    खैर ममता जी के ब्लॉग पर आपने वापस कोई टिप्पणी नही की ये सोचकर हैरान हू..

    रही बात टिप्पणी को सही संदर्भ में रखने की. तो क्या इसका मतलब ये है की पहले टिप्पणी को सही सन्दर्भ में नही रखा गया था... :)

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  10. Hi Kush ,I am not on my pc so kindly pardon me for putting this in English.
    You are right -I am too an innocent man.Perceptions about the leterary works differ so there is nothing unusual about it.Your stand is also intelligible.
    Yes I felt that my earlier comment lacked the perspective a bit -so the second posting.
    Do you still feel that I should comment on Mamtaa ji's post ? I think it is not necessary now.
    Thanks for being bold ! I like that !

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  11. film to hamne dekhi nahi magar aapki baton me kuchh dam hai ye baajar vad hi hai jo aaj ke nange v dushcharitrik vatavaran ke liye jimedaar hai lekin mamta ji bhi apni jagah sahi hain kyon ki ye ek aisa pehlu hai jise purush kabhi samajh nahi sakta par har sachai ko nanga karna bhi shobha nahi deta

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