गुरुवार, 30 जुलाई 2009

इस कविता को बहर /बहार में कौन लायेगें ?

गे विषयों पर आधिकारिक लेखनी के लिए जाने माने मेरे मित्र ने यह कविता मुझे भेजी है की इसे बहर में ला दूँ -आख़िर इस ब्लॉग जगत में एक से बढ़ कर एक काव्य शास्त्र महारथियों के होते हुए मैं इस चुनौती को स्वीकार भी करुँ तो क्यों ? वैसे भी कुछ मित्रों को मेरे 'साहित्यिक दोगलेपन' पर एतराज है ! आप कुछ मदद करें प्लीज -

अब यह गे कविता है या उभयलिंगी प्रेम को समर्पित ,इस पर भी मेरी टिप्पणी करना मुनासिब नही हैं - हाँ यह लफडा इसी ब्लॉग जगत से जरूर उपजा है -यह तो तय ही लगता है !
तो कविता का शीर्षक (यह मैंने दिया है ) है -
तुम्हारा प्रेम

आभासी दुनिया में पला पगा तुम्हारा प्रेम
महज आभासी ही है ,
इसमें कहाँ है सामीप्य की ऊष्मा
और सानिध्य का अहसास
यह महज मृग मरीचिका है
बस मरुथल में झरने की खोज
का महज एक निरर्थक प्रयास
जैसे सिर पे आ गए सूरज की
प्रचंड दुपहरी में खुद की छाया
खोजने का एक विकल उपक्रम
छाया मत छूना मन होगा दुःख दूना मन
जैसी शाश्वत सतरों की याद दिलाता
तुम्हारा यह प्रेम केवल एक छलावा है
हकीकत से दूर ,बहुत दूर !!
तुम्हारा प्रेम ............

अब यह कविता है भी या नहीं ? मुझे मेरे मित्र का डर है -मैं तो इसे कविता ही मानता हूँ ! दोस्ती जिंदाबाद ! पर आप भी क्या इसे कविता मानते/मानती हैं / हैं ? सच सच बताईये न ! और इसमें अपेक्षित सुधार भी कीजिये ताकि मित्र का काम पूरा हो !

21 टिप्‍पणियां:

  1. इस रचना में कविता तो है। बस उसे तराशना शेष है।

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  2. दोस्ती जिंदाबाद !
    यह कविता ही है ।

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  3. दोस्त का दोस्त-दोस्त..इस आधार पर डरे हुए हम भी इसे कविता मान लेते हैं..वैसे अगर पूछो कि न मानोगे तो क्या मानोगे..उसका जबाब तो साहित्यकार भी न दे पायेंगे दावे के साथ. :)

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  4. बहर वगैरह के मुआमले में तो मैं बहरा हूँ सो क्या कहूँ!


    कविता वाकई अच्छी है। 'गे' के बारे में मेरा कोई 'से' नहीं है। 'गे से' वगैरह गम्भीर मनुष्यों के कर्म हैं। हम जैसे छिछोरों के पल्ले नहीं पड़ते।

    कविता में एक 'लय' है, जो कि कविता होने के लिए पर्याप्त है। अपने मित्र (अगर आप खुद नही हैं) से कहें कि अब आगे बढ़ें, और लिखें। अगर स्वयं हैं तो इतना लजा काहे रहे हैं?

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  5. रापके होते हम ये दुस्साहस कैसे कर सकते हैं अपनी कलम मे इतनी ताकत नहीं मगर कविता मुझे पसंद आयी धन्यवाद्

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  6. दोस्ती जिंदाबाद

    यह कविता है की नहीं यह आप बड़े बुजुर्ग ही तय करिए .

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  7. गेयता नहीं है लेकिन यह है कविता ही ,निर्विवाद रूप से .

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  8. हुजुर बहाने नहीं चलेंगे , होसकता है वह मित्र आभासी शब्दों से आपको ही कुछ आभास देना चाहता हो तभी उसने बहर की बहार के बहाने लिख कर आप को ही '' समर्पित'' कर दी |
    तेरा करूँ तुझ को अर्पित ,
    केवल लगता है आभासी,
    मत समझ प्रेम को कल्पित

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  9. कविता के दिग्गज आते होंगे विचार व्यक्त करने।

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  10. आज की तारीख में निश्चित ही कविता है । अधिकांशतः ऐसा ही तो लिखना जरूरी है कविता होने के लिये । असली कविता का फैशन पुराना हो गया है अब ।

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  11. लो जी आप भी पहेली बूझने लगे !!!

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  12. कविता ही है...आजकल तो वैसे भी चंद पंक्तियां ऊपर-नीचे लिखकर ऊपर कविता लिख देने से वो कविता हो जाती है...
    जो भी है, है भावपूर्ण!

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  13. यह खूबसूरत भावाभिव्यक्ति अकविता में क्यों रखी जाय ?

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  14. यह खूबसूरत भावाभिव्यक्ति अकविता में क्यों रखी जाय ?
    एप्रूव भले न करो, दद्दा ! पर, इसमें काट-छाँट किये जाने पर कष्ट होगा !

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  15. जनाब कविता लाजवाब है.......... कोई गुन्जायेश नहीं है.......... लाजवाब लिखा है ......... प्रेम सच में छलावा है

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  16. समझ में आ जाए वो कविता नहीं होती आजकल :) उस हिसाब से पूरी कविता नहीं है.

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