मंगलवार, 15 जनवरी 2013

मित्रों की फरमाईश ,समय से द्वंद्व और नल दमयंती आख्यान


मित्रों के स्नेहादेश शिरोधार्य किये बैठा हूँ कि सोनभद्र में कर्मनाशा नदी का निन्दित पुराण और अभिशप्त वर्तमान का मौके पर जाकर रपट तैयार कर यहाँ पोस्ट करूँगा, नल दमयंती की अमर कथा का जिक्र करूँगा ,राजा पुरुरवा और उनकी प्रयाग स्थित प्रतिष्ठानपुरी पर भी एक पोस्ट करूँगा , एक आधुनिक प्रणय कथा भी इस ब्लॉग पर प्रस्तुत करूँगा -मगर एक तो नया स्थान दूजे राज काज नाना जंजाला,चाह कर भी इन फरमाईशों को पूरा नहीं कर सका हूँ मगर मेरी नए वर्ष की संकल्प सूची में ये हैं जरुर और देर सवेर यहाँ दर्शित भी होंगी . आज शिल्पा मेहता जी एक आग्रह पूरा करने का प्रयास कर रहा हूँ . उन्हें नल दमयंती की अमर प्रेम कथा सुनने का मन है -मैंने उन्हें कहा कि यह कथा इतनी मशहूर है कि अंतर्जाल पर सहज ही उपलब्ध   है तो उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें मेरे शब्दों में यह कथा सुननी है -मैं इस स्नेहपूर्ण आग्रह बल्कि स्नेहादेश कहिये के आगे अति विनम्र होकर आज्ञानुपालन के सिवा बच पाने की कोई राह नहीं देख पा रहा हूँ सो खुद को इन पुराण कथाओं के परिप्रेक्ष्य में अल्पज्ञ पाते हुए भी यह नल दमयन्ती आख्यान का जिक्र यहाँ करने की धृष्टता कर रहा हूँ . पुराणकथा मर्मज्ञ त्रुटि को क्षमा कर निवारण करगें -यही अनुरोध है . 
नल दमयंती आख्यान आर्यों के प्रसिद्ध प्राचीन दंतकथाओं में से एक है . यह उदात्त और अमर प्रेम की आदि कथा है। यह कथा महाभारत में भी (महाभारत, वनपर्व , अध्याय 53 से 78 तक) वर्णित है और इतनी सुन्दर,सरस और मनोहर है कि कई विद्वान् इसे व्यासकृत मानते हैं . इस कथा पर राजा रवि वर्मा के साथ ही अनेक चित्रकारों ने अपने चित्र/तैलचित्र बनाये हैं . यह अमर कथा अपनी नाट्य प्रस्तुतियों से कितनी बार ही मंचों को सुशोभित कर गयी है . 
दमयंती विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री थी और नल निषध के राजा वीरसेन के पुत्र। दोनों बहुत सुंदर थे। एक दूसरे की प्रशंसा सुनकर बिना देखे ही वे एक-दूसरे से अनुरक्त हो गए। एक हंस के जरिये दोनों ने एक दूसरे तक अपना प्रेम-संदेश पहुंचाया। वह समय स्वयम्बर का था यानि स्त्री को अपना पति स्वयं चुनने की आजादी थी . दमयंती के स्वयंवर का भी आयोजन हुआ तो देवतागण इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम भी स्वयंबर में जाने को   इच्छुक हो गए . किन्तु इन्हें जानकारी हो गयी थी कि दमयंती नल के अलावा किसी और का वरण नहीं करेगी तो उन्होंने छल किया -वे चारों भी  नल का ही रूप धारण करके स्वयम्बर में आए नल भी स्वयम्बर में उपस्थित हुए।अब दमयंती के सामने एक विषम स्थिति थी किन्तु उसने राजा नल को पहचान लिया। दोनों का विवाह हो गया . यहाँ तक तो सब कुछ ठीक रहा किन्तु अब मुश्किल का वक्त आने वाला था और दोनों बेखबर थे। 
स्वयम्बर के पश्चात देवतागण जब देवलोक वापस जा रहे थे उन्हें मार्ग में कलियुग और द्वापर साथ-साथ जाते हुए मिले। वे लोग भी दमयंती के स्वयंवर में सम्मिलित होने को लालायित थे । मगर इन्द्र से दमयंती द्वारा नल के वरण की बात सुनकर कलियुग क्रोधित हो गया , उसने नल को दंड देने के विचार से उनमें काया प्रवेश करने का निश्चय किया। उसने द्वापर से कहा कि वह जुए के पासे में चला जाय और उसकी सहायता करे।यही हुआ। नल के शरीर में प्रवेश कर कलि  दूसरा रूप धारण करके  नल के भाई पुष्कर के पास गया . कलियुग ने उसे  प्रेरित किया कि वह जुए में नल को हरा दे।उन दिनों जुए का भी बड़ा प्रचलन था . पुष्कर से खेले गए जुए में नल ने अपना समस्त राज पाट गँवा दिया। भावी की आशंका से दमयंती ने अपने दोनों बच्चों को अपने भाई के पास विदर्भ देश भेज दिया। सब कुछ हारकर मात्र एक-एक वस्त्र में नल और दमयंती ने राज्य छोड़ दिया। वे एक जंगल में जा पहुंचे। एक जगह नल ने देखा कि पेड़ों पर कई स्वर्ण पक्षी बैठे हैं जिनकी आंखें सोने की थीं। नल ने अपना वस्त्र फेंक कर उन चिड़ियों को पकड़ना चाहा ताकि उन्हें पकड़कर भूख मिटा सकें और उनकी आंखों के स्वर्ण को बेंचकर कुछ धन भी प्राप्त कर सकें किंतु चिड़िया वस्त्र ले उड़ीं तथा यह भी रहस्योद्घाटन कर गयीं कि चिड़ियों के रूप में वस्तुतः वे वे जुए की पासें थीं . अब एकमात्र वस्त्र गँवा कर नल लज्जित और  व्याकुल हो उठे। अब तक दोनों बहुत थक गए थे। दमयंती को नींद आ गयी। नल ने उनकी साड़ी का आधा भाग फाड़ कर धारण कर लिया और उसे जंगल में अकेले छोड़कर इस बिना पर चल दिए कि एक सतीत्व युक्त नारी का कुछ बिगड़ नहीं पायेगा और वे अपने मायके पहुँच ही जायेगीं . 
ऐसा  हुआ भी ...दमयंती एक अजगर की गिरफ्त में आ गयीं । विलाप सुनकर एक व्याध ने अजगर से तो उनकी जान बचा दीं किंतु  कामुक आग्रह किया . दमयंती ने देवताओं का स्मरण किया , कहा कि यदि वह पतिव्रता है तो उसकी रक्षा हो । व्याध तत्काल भस्म हो गया। आगे दमयंती की भेंट कुछ ऋषियों से हुयी उन्होंने आश्वस्त किया कि एक दिन अवश्य ही उनकी भेंट नल से होगी . आगे चलकर दमयंती की भेंट शुचि नामक व्यापारी की अगुवाई में व्यापारियों के दल से हुयी . रास्ते के अनेक संकटों को भोगते हुए दमयंती आखिर चेदिराज सुबाहु की राजधानी जा पहुँची . उनकी  दयनीय हालत देख राजमाता ने उसे आश्रय दिया। किन्तु दमयंती ने राजमाता से कहा कि वह उनके राज्य में  अपनी शर्तों पर रहेगी . किसी की जूठन नहीं खायेंगी, किसी के पाँव नहीं धोयेगी, ब्राह्मणेतर पुरुषों से बात नहीं करेगी, और कोई उसे प्राप्त करने की चेष्टा करेगा तो दण्डित होगा। यह शर्तें अपने और नल के नामोल्लेख के बिना ही दमयंती ने रखीं । वह वहां की राजकुमारी सुनंदा की सखी बनकर रहने लगी। इधर दमयंती के भाई के मित्र सुदैव नामक ब्राह्मण ने उसे खोज ही निकाला। दमयंती राजमाता की आज्ञा लेकर विदर्भ निवासी अपने बंधु-बांधवों, माता-पिता तथा बच्चों के पास चली गयी। अब उसके पिता नल की खोज के लिए आकुल हो उठे।
दमयंती से बिछुड़ जाने के बाद नल को कर्कोटक नामक सांप ने डस लिया , उनका रंग काला पड़ गया था। कर्कोटक ने नल को बताया कि उसके शरीर में कलि निवास कर रहा है, उसका निवारण उसके विष से ही संभव है। विष के कारण काले रंग के राजा नल को लोग पहचान नहीं पाए । कर्कोटक की राय के अनुसार नल ने अपना नाम बाहुक रखा और इक्ष्वाकु वंश के अयोध्यावासी ऋतुपर्ण नाम के राजा के पास गए । राजा को अश्वविद्या का रहस्य सिखाया और उनसे उससे द्यूतक्रीड़ा का रहस्य सीखा। इसी समय विदर्भ राज का पर्णाद नामक ब्राह्मण नल को खोजता हुआ अयोध्या जा पहुंचा। उसे वाहुक नामक सारथी का क्रियाकलाप संदेहास्पद लगा क्योकि वह नल से बहुत मिलता जुलता था । यह बात उसने दमयंती से बतायी . अपने पिता से गोपनीय रखते हुए मां की अनुमति से दमयंती ने सुदेव नामक ब्राह्मण के द्वारा ऋतुपर्ण को दमयंती के दूसरे स्वयंवर की सूचना दी । ऋतुपर्ण ने बाहुक से सलाह किया और विदर्भ देश के लिए बाहुक के साथ रवाना हो गया । विदर्भ देश में स्वयंवर की कोई तैयारी नहीं थी । ऋतुपर्ण विश्राम करने चला गया किंतु दमयंती ने दूतिका केशिनी के माध्यम से बाहुक की परीक्षा ली। नल को पहचानकर दमयंती ने उसे बताया कि उसे ढूंढ़ने के लिए ही दूसरे स्वयंवर की झूठी चर्चा की गयी थी। अब नल ने अपने भाई पुष्कर से पुन: जुआ खेला। जीतकर नल ने पुन: अपना राज्य प्राप्त किया। 
नोट: यह केवल नल दमयंती की कथा का वर्णन मात्र  -हाँ, सुधीजन पाठक वृन्द द्वारा  इस कहानी पर टीका टिप्पणी, भाष्य आदि का स्वागत है! 

70 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर वर्णन पहली बार सूनी यह कथा क्या इस पर कोई फिल्म भी बनी है ?

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    1. हाँ नल दमयंती पर 1945 में फिल्म बनी थी .... टीवी सीरिअल भी मुज़फ्फर अली ने निर्देशित किया था

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  2. बचपन में नानी से कई बार यह कहानी सुनी है पर इतने विस्तार से कभी नहीं. सुन्दर वर्णन.

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  3. बचपन में माँ से ये कहानी सुनी है लेकिन आपकी प्रस्तुति शास्त्र गत आहा आनंद आ गया . हमारे छत्तीसगढ़ में एक बात कही जाती है की बुरा समय आता है तो रजा नल के समान भुनी हुई मछली भी गहरे पानी में कूद जाती है

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    1. जी रमाकांत जी ,
      हमारे यहाँ भी यह कहावत है-
      भूनी मछली जल में पड़ी राजा नल पर विपत्ति पड़ी

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  4. कथा की रोचकता बार-बार आकर्षित करती है।

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  5. ...फिर से यह कहानी जेहन में ताज़ा हो गई !
    .
    .पर दमयंती को जिस तरह दैवीय-लाभ मिला,वर्तमान में तो कतई नहीं !अब आपने स्वयं ही इस तरह की चर्चा पर विराम लगा दिया है,सो केवल कथा का रस-पान कर रहा हूँ .
    .
    .हम तो यह भी सुने थे कि आप कोई वर्तमान कथा भी पढ़ाना चाह रहे थे ?

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    1. हाँ आपकी भी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी

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  6. इस कथा से ये बातें पता चलती हैं:
    १. नल और दमयन्ती ने एक दूसरे को सुनी-सुनाई बातों के आधार पर चुन लिया। आज यह काम फ़ेसबुक और अन्य माध्यमों से हो रहा है।
    २. देवता लोग नल के प्रतिद्वंदी थे। वे धूर्त भी थे जब उनको पता था कि दमयन्ती नल को चाहती है फ़िर भी उसको परेशान करने के लिये वे स्वयंवर में आये। इससे पता चलता है कि देवगण पुराने छलिये हैं।
    ३. दमयंती ने बचाव के लिये उन्हीं देवताओं से पुकार लगाई जो उनको छलावा देना चाहते थे।
    ४. दमयंती ने अपने बचाव के लिये अपने सतीत्व की ही दुहाई दी वह भी उन लोगों के सामने जिन्होंने उससे छल करना चाहा। इससे पता चलता है कि उस समय भी भले ही स्वयंवर-सुविधा मिली हो लेकिन स्त्री की सबसे बड़ी पूंजी उसका सतीत्व ही था। सतीत्व गया स्त्री खलास।
    ५. ब्राह्मणेतर पुरुषों से बात न करते की बात से पता चलता है कि उस समय भी जाति व्यवस्था जोरों पर थी।

    वर्तमान कथा किधर गयी?

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    1. शुकुल महराज का अभिनन्दन -चर्चा छेड़ने का ......मौजू सवाल हैं ,उत्तर चाहिए क्या ? यहीं या अन्यत्र ? :-)

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    2. शुकुल महराज जी आप नहीं आये यह सोचकर कि बन्दे की टी आर पी काहें बढ़ायी जाय :-)
      बहरहाल ,देवताओं की दुष्टता के चलते क्या क्या न हुआ? अहिल्या भ्रष्ट हुईं ,जयंत ने जगत जननी को भी बुरी निगाहों से देखा ....इंद्र तो महा पातकी ही है ......ये वे देवता हैं जो कभी आर्यों के एक वर्ग द्वारा पूज्य थे मगर आर्यों के दूसरे समूह के लिए अत्याचारी, कालान्तर में सब मिल जुल गए ......इसलिए देवताओं के इन रूपों का भी दर्शन पुराणों में हो जाता है -ईरानियों के पवित्र ग्रन्थ अवेस्ता में इंद्र सरीखा एक देव पतित है -
      सतीत्व का तात्विक अर्थ तो मुझे नहीं पता -मगर जब अमानवीय सती प्रथा ही राज राम मोहन राय सरीखे सुधारवादियों के सतत प्रयास से मिट गयी तो फिर सतीत्व का प्रश्न ही इस बदले समाज में कहाँ रह गया -हाँ तत्कालीन सामाजिक परिवेश में नारियों की एकनिष्ठता की बड़ी वैल्यू थी यह तो इंगित ही होता है .
      और ब्राह्मण उस समय कितने अविवादित और पूज्य थे यह भी इंगित है!

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    3. फेसबुक वाली बात मेरे दिमाग में भी आयी :)

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  7. - ओह - तो यह कहानी थी नल दमयंती की :) :)।

    बहुत समय से उत्सुक थी यह कहानी पढने को, लेकिन कुछ समय की परेशानियां तो कुछ दुसरे विषयों पर पढने की ललक मुझे इस कथा तक आने ही न दे रही थी । कभी बचपन में अमर चित्र कथाओं में शायद यह कहानी पढ़ी थी, कुछ भी याद नहीं था । तो उस दिन वह शकुन्तला वाला चित्र साझा करने पर जब आपने पूछा कि क्या ये दोनों नल दमयंती हैं - तो अनायास आप ही से कहानी पूछ बैठी । आपके बिजी शेड्यूल में हस्तक्षेप के लिए क्षमा चाहूंगी ।

    इसे साझा करने के लिए आपका आभार सर । अब मुझे राजा पुरुरवा की कथा का इंतज़ार रहेगा , कोई जल्दी नहीं है - जब आपको समय मिले तब ।

    "कहानी पर" कोई टिप्पणी मैं तो कम से कम कर ही नहीं सकती - क्योंकि मुझमे पात्रता ही नहीं है इसकी । कहानी का "अ ब स ...." भी नहीं जानते हुए - क्या टिपण्णी कर पाऊंगी ? सिर्फ इसे सुनाने का आभार प्रकट करती हूँ ।

    वैसे वह चित्र शकुन्तला वाला चित्र जिससे इस कहानी की बात हुई - वह मैंने अपनी "महाभारत श्रंखला" के उस भाग में में प्रयुक्त किया था जब आश्रम के पास अंगूठी का वर्णन आता है । अपने पुराने ब्लॉग पर - जो ब्लॉग मेरी ही मूर्खता से चला गया :( :( :( नए ब्लॉग पर चित्र नहीं रखे, तो वह चित्र अब ब्लॉग पर नहीं है । किसी दिन लगा दूँगी ।

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    1. अब नल दमयंती पर एक चित्र बनाएं और मुझे यहाँ लगाने को अनुमति दें -यह मेरी फरमाईश है :-)

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    2. ab to painting karne ko samay hi nahi milta - pichhle 4 saal se ek bhi nahi banaai - pataa nahi paintbrush bhi chala paaoongi ya nahi ab ? :(

      paints kee bottles bhi sookh chuki hain rakhi hui

      kisee din pencil sketch banaatee hoon - usme samay kam lagta hai ....

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  8. waah bahut sundar Arvind ji..is kahaani ko share karne k lie aapka aabhaar. yah meri pasandida kahaani hai.

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  9. रोचकता लिए नल दमयंती की कथा का सुंदर वर्णन,,,लाजबाब प्रस्तुति,,,आभार अरविन्द जी,,,

    recent post: मातृभूमि,

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  10. पहली बार ही पढ़ी ये कहानी ... ओर मज़ा आ आया ...
    रोचक ओर बहुत कुछ विचारणीय है इस कहानी में ...

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  11. आभार यह कथा सुनाने का, इसके पहले जो सुनी थी, अस्पष्ट सी थी।

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  12. आज कहाँ ऐसी दमयंतियाँ जो पलायनवादी का भी सतीत्व के साथ कठिन श्रमयुक्त इन्तजार करे। :)
    हां, नल आज भी ऐसे ही है, सत्वहीन, साहसविहिन, पलायनवादी, कलिकाल के प्रभाव से लूटे-पीटे, विषबुझे काले-कलूटे अपमान भय से डरे डरे……… दूसरे स्वयंवर आयोजन की सफाईयाँ देना तब भी मजबूरी रहा होगा।

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    1. गहरी बात कर गए सुज्ञ जी :-)

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    2. :):):)
      @@आज कहाँ ऐसी दमयंतियाँ जो पलायनवादी का भी सतीत्व के साथ कठिन श्रमयुक्त इन्तजार करे। :) :) n n n - ab ham aisee nahi hain, aur hamaaree prem-kathaa bhi aaj se 10,000 varsh baad koi nahi kahega, jaise nal damyanti kee kahi jaa rahi hai .... :)

      vaise ab to kaanoonan bhi patni palaayan ke adhaar par talaak maaang sakti hain - http://shalinikaushikadvocate.blogspot.in/2012/12/blog-post_18.html

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    3. जानकारीपूर्ण लिंक

      हटाएं
    4. .
      .
      .
      ..... :)

      महामना सुज्ञ जी 'सत्वहीन, साहसविहिन, पलायनवादी, कलिकाल के प्रभाव से लूटे-पीटे, विषबुझे काले-कलूटे अपमान भय से डरे डरे' नलों से जमाना भरा होते हुऐ भी आज भी 'पलायनवादी का भी सतीत्व के साथ कठिन श्रमयुक्त इन्तजार' करने वाली दमयंतियों को तलाश रहे हैं... जमाना बदल गया है बदल कर रहेगा... यही सार्वभौम सत्य है आदरणीय... :)


      ...

      हटाएं
    5. .
      .
      .
      हाँ, 'रोल रिवर्सल' अभी भी मिलता है... मैं कुछ आधुनिक नलों को जानता हूँ जो अपनी दमयंतियों का पुरातन दमयंती की तरह ही अपना सतीत्व बचाये रख कभी कभी जीवन पर्यंत इंतजार करते रहते हैं...


      ...

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    6. @ मैं कुछ आधुनिक नलों को जानता हूँ जो अपनी दमयंतियों का पुरातन दमयंती की तरह ही अपना सतीत्व बचाये रख कभी कभी जीवन पर्यंत इंतजार करते रहते हैं...

      भावदक्ष प्रवीण जी, शायद पिछले भव के पलायन-पाप का ॠणानुबंध हो, और इसी तरह जीवन पर्यंत इंतजार कर वही कर्जा चुका रहे हो ये नल!! महोदय… :)

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  13. ईमानदारी से कहूँ तो मैं ने इनका नाम सुना था लेकिन विस्तार से कथा पहली बार जानी.
    दयमंती ..उस समय की स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है ..यकीनन बहादुर रही होगी जो अकेले उस जंगल में अपने सतीत्व की रक्षा कर सकी..लेकिन ...ऐसे कैसे राजा नल उन्हें अकेला वन में छोड़ गए?यह कैसा पुरुषार्थ था?अकेले छोड़ जाने का जो तर्क कहानी में दिया है मैं उस से सहमत नहीं हूँ .

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    1. अल्पना जी ,
      सच कह रही हैं -यह कहानी नल नहीं दमयंती के एकनिष्ठ समर्पित प्रेम के लिए जानी जानी चाहिए ..
      नल के उस बर्ताव का औचित्य नहीं जा सकता -सारी वक्तृता धरी रह जायेगी .....
      विपत्ति काल में राज नल का ऐसा निर्णय -मगर कलिकाल जो न करा दे -बुद्धि फेर देता है ज्ञानीजन का भी!

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  14. नल दमयंती की कथा कई बार सुनी, पुराने समय की मंडलियों का भी यह कथा प्रिय विषय रहा है, आपकी कलम से पढकर भी आनंद सा आया. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  15. सर इसे एक ही साँस में पढ़ गया |आभार

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  16. मैने कहीं पढ़ा था कि शनि महाराज की साढ़े साती के कारण राजा नल की यह दशा हुयी थी!

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    1. आशीष जी ,
      राजा नल मनुष्य के ऊपर विपत्ति पड़ने की स्थितियों के यादगार हैं -यह कहानी लोक जीवन में यह सीख देती है कि मनुष्य को विपत्ति काल में आशा नहीं छोड़नी चाहिए -कलि का क्रूर प्रभाव तो उन पर था ही शनि की साढे साती भी क्यों न हो ? एक तरफ तो ये बातें अन्धिविश्वास हैं मगर सोचिये ये जीवन की आस जगाती थीं कभी और आज भी -विज्ञान ने हमरा जीवन सुखमय बनाया है मगर बहुसंख्य लोगों के आस और जीवन के मोह को गहरे तोडा भी है! आज विज्ञान सम्मत दृष्टिकोण समाज में उत्पन्न हो यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है !

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  17. नल दमयंती के बारे में पढ़ा जरुर था , मगर इससे पहले इतने विस्तार से नहीं .
    आपके मित्रों का शुक्रिया !

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    1. आप ही क्यों धन्यवाद से वंचित रहें -आपको पढने के लिए धन्यवाद !

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  18. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 19/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  19. ...गुरुवर ! इसमें दमयंती द्वारा दूसरी बार स्वयम्बर क्या इसलिए रचा गया कि उसने नल को यह समझ लिया था कि वह हमेशा के लिए खो गया है ?नल विष-प्रभाव के कारण क्या किसी की पहचान में नहीं आ रहा था और यह भी कि दमयंती में धैर्य या पातिवृत्य की कई थी ?

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    1. अच्छा प्रश्न वत्स!
      ऐसा ही प्रश्न नल ने उस दूसरे स्वयम्बर में पहुँच कर दमयंती से पूछा -
      कथं तु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम
      उत्सृज्य वरयेदन्यम यथात्वम भीरु कर्हिचित
      दूताश्चरन्ति पृथ्वीम कृत्स्नां नृपतिशासनात
      भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति
      स्वैरवृता यथाकाम मनुरूपमिवात्मन:
      (वनपर्व , अध्याय 76)
      अर्थात "भर्ता के लिए अनुव्रत रही हुई कौन सी स्त्री दूसरे पुरुष से विवाह करेगी? तेरे दूत तो पृथ्वी पर कहते फिर रहे हैं कि स्वतंत्र व्यवहार करने वाली दमयंती अपने अनुरूप दूसरा भर्ता करेगी "
      मगर दमयंती ने यह स्पष्ट किया कि नल को बुलाने के लिए उनकी यह महज एक चाल भर थी .......
      मेरा मंतव्य: यह कथा ईसा के लभभग तीन हजार वर्ष के आस पास महाभारत काल की है ......उस समय पातिव्रत्य का बड़ा महत्व था ....दमयंती के दुसरे स्वयम्बर की खबर सभी को हैरान करने वाली थी ..... अगर वह सचमुच पुनर्विवाह कर लेती तो तत्कालीन व्यवस्था के अंतर्गत वह पापतुल्य और अस्वीकार्य होता -उस समय आर्य क्षत्रियों में पुनर्विवाह वर्जित था .......
      समाधान हुआ वत्स?

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    2. ...उत्तम के अस बस मन माँहीं,सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ....यह है पतिव्रत धर्म का उत्तम उदाहरण ।

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  20. पुनर्पाठ भी आह्लादित कर रहा है और एक सवाल भी उठ रहा है ...आज के प्रेम को क्या हो गया है ?

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    1. नल दमयंती का गंधर्व विवाह था -यानी दमयंती ने नल को चुना था ..अब लड़की की मर्जी कहाँ चलती है ?

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  21. नल-दमयंती के कथा बचपन में पढ़ी थी, यहाँ भी अच्छी लगी। कुछ ऐसा ध्यान में आता है कि तथाकथित स्वयंवर में पहुँचने के लिये समय बहुत कम था और उस उपलब्ध समय में इतनी दूरी से रथ द्वारा पहुँचने में मिली सफ़लता अश्व-संचालन में नल की अद्वितीय क्षमता होने के कारण उसकी पहचान का एक कारक थी।
    शिल्पा जी से अनुरोध करूंगा कि आपसे कच-देवयानी-ययाति की कथा का भी अनुग्रह करें:)
    आपका सोनपुर प्रवास ब्लॉगिंग को बहुत कुछ देगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

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    1. संजय जी ,
      लगता है पुराण कथाओं का बढियां पारायण किया है आपने -
      हाँ नल अश्व विद्या में पारंगत थे और जब अपने क्षद्म रूप में जब नल ने बताया कि स्वयम्बर में वह एक दिन में ही सौ योजन दूरी से आ रहा है तो दमयंती आश्वस्त हो जाती है कि वही नल हैं!
      अपनी सुझायी कथा अपने ब्लॉग पर दें तो आनंद आएगा !

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    2. हम तो नमाज़ पढ़ने आये थे अरविन्द जी :)

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    3. सोनपुर (बिहार) नहीं.. सोनभद्र (ऊ.पी.)!!

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    4. हम ई सोचे कि काहें संजय भाई की शान में गुस्ताखी की जाय , मगर ननिहाल की बात तो आई तो सलिल भाई आपको आना ही पड़ा:-)

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    5. गलती करें और बड़े इस लायक समझें कि टोककर गलती सही करवाई जाये, अपनी शान तो इसीमें बहुत है।
      आपका सोनभद्र प्रवास ब्लॉगिंग को बहुत कुछ देगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

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    6. तो अब तो आप ही से फरमाइश हो गयी संजय@मोसम जी :) , और सर की फरमाइश में हमारी भी फरमाइश जोड़ ली जाए :)

      तो आपके ब्लॉग पर यह आख्यान कब पढने मिलेगा ?

      बहुत अच्छा है इस ब्लॉग जगत में आई - आप सब ज्ञानी महानुभावों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है :)

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    7. कच-देवयानी के अद्भुत प्रेमाख्यान को बहुत ढंग से औपन्यासिक स्वरूप दिया है मनु शर्मा ने अपनी रचना ’अभिशप्त कथा’ में। पढ़ें ज़रूर।

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    8. हिमांशु ,नेकी और पूछ पूछ -और मुझे आशीष देने की उम्र का तो न बनाईये! शुभस्य शीघ्रम -शुभकामनाएं !

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  22. बहुत देर हो गयी पंडित जी आने में.. मगर आनन्द ने विलम्ब का अवसाद दूर कर दिया.. एक बार पुनः यह कथा सुनकर समय पीछे चला गया मेरे लिए!!
    आपके कथा कहने का अन्दाज़ मुझे हमेशा से पसंद रहा है और इसकी चर्चा मैंने चैतन्य से भी की है!!

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  23. सलिल भाई ,
    प्रशंसा के बोल उत्साहित कर जाते हैं! हम तो सौति परम्परा के ही हैं !

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  24. aap apne pranmpara ke dhwaja-wahak bane rahen aur hame yun hi sundar katha ka prasad milta rahe.........

    pranam.

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  25. नल - दमयंती की पूरी कथा पढ़ने को मिली .... बहुत सुंदर वर्णन ... आनंद आया ... आभार ।

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  26. एक बार फिर से कथा पढ़ कर बचपन के दिनों की कथा की याद आ गई ...कुछ भूल से गए थे ,आज फिर से सब कुछ याद आ गया ......आभार

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  27. कथा पर कमेन्ट करना चाहा पर शायद यह उचित नही होगा !

    बहरहाल डाक्टर एस एम पंडित रचित चित्र में नल का चेहरा एक परिचित ब्लॉगर जैसा लग रहा है :)

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    1. [तब उचित नहीं लगा था पर आज , अनायास ही उस कमेन्ट को करने की इच्छा बलवती हो गई है ]

      अरविन्द जी ,
      आपने पाठक वृन्द की ओर से वर्णित कथा में टिप्पणी / टीका / भाष्य का स्वागत किया है सो लिखने का हौसला किया वर्ना ...
      (1)
      स्वयम्बर से देवता लौट रहे थे कि उन्हें कलियुग मिले जो स्वयं भी दमयंती कामी थे , वे नल के शरीर में प्रविष्ट हुए तो उनकी कामनाएं यूं भी पूरी हुईं कि नहीं ?
      (2)
      कलियुग चालित / प्रेरित नल जब तक जुए में अपना सब कुछ हारे तब दमयंती के दो बच्चे थे मतलब कलियुग ने नल दमयंती को गार्हस्थ्य / दाम्पत्य जीवन के लिए इतना समय तो दिया ही निश्चय ही बच्चे डेढ़ दो दिन / एकाध सप्ताह में तो पैदा नहीं हुए होंगे ?
      (3)
      इसका एक मतलब ये भी कि मति भ्रष्ट नल के स्वयम्बर और जुए में सर्वस्व हारने के बीच दो साल तो कम से कम गुज़रे ही होंगे सो कलयुग को काफी समय लगा नल पर काबू करने में ?
      (4)
      पुष्कर जो नल का अपना भाई था उसके असमय उसका ना हुआ...और नल स्वयं अपनी पत्नी / प्रेयसी को उसके सतीत्व के भरोसे छोड़ कर चल दिया ? यह कैसा राज समाज था ? और कैसा पातिवृत्य धर्म ?
      (5)
      अंततः एक सर्प / नाग (देवताओं और ब्राह्मणों की तुलना में हेय जाति) कलियुग से छुटकारे में नल के काम आई ,परिणामतः वो दमयंती को पा सके जबकि दमयंती के गर्वीले जातीय संस्कार नाग विरोधी थे !
      (6)
      जुए में हारे सो जुए में जीते , धन्य महाराज , गज़ब चलन था उन दिनों :)
      (7)
      पलायनवादी पति / विपदा में पत्नि त्यागी पति वर्ण में घनघोर काला हो गया तो भी पत्नि उसके लिए केवल उसके लिए समर्पित बनी रही अर्थात पति के कुकृत्य पत्नि के पतिवृत धर्म और सतीत्व पर आंच नहीं आने देते ?
      (8)
      एक तो पति अपनी पत्नियों के रक्षक नहीं थे और दूसरी ओर अजगर की विपदा में फंसी स्त्री के कथित सहायक कामुक 'व्याध' तो खैर उस युग में भी थे ही !

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  28. माहिरी का अंदाज़ लिए है आपकी किस्सागोई .भूमिका भाग अनेक जानकारियाँ देता है .बढ़िया प्रस्तुति .

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  29. इस कथा का नाट्य-रूप करने की इच्छा थी। आशीष दें तो शुरुआत करूँ।

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    1. हिमांशु ,नेकी और पूछ पूछ -और मुझे आशीष देने की उम्र का तो न बनाईये! शुभस्य शीघ्रम -शुभकामनाएं !

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