मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बचपन से ही पड़ती है यौन कुंठाओं की नींव (प्रौढ़ों को है यौन शिक्षा की ज्यादा जरुरत-२)



लड़के  या लडकी दोनों  किशोरावस्था के पहले से ही यौनिक अहसासों से गुजरने लगते हैं.यह बहुत कुछ मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते ही है .भारत जैसे गरम देश में यौन लक्षणों का प्रगटन भी जल्दी ही -१० वर्षों से ही आरंभ होकर १४-१५ वर्ष तक आते आते बिल्कुल स्पष्ट हो रहता है -यद्यपि बाह्य और आंतरिक  यौनांग अभी भी विकास की अवस्था में होते हैं ,मगर यौनिक अनुभूति  अब मुखर होने लगती है -यौन रसायनों का ऐसा प्रभाव होता है कि लड़के और लडकियां दोनों का विपरीत सेक्स की ओर झुकाव तीव्रतर होने लगता है ...ऐसे ही समय लड़के प्रायः परिवार के भी विपरीत लिंगी लोगों -माता पिता या समतुल्य व्यक्तियों का अधिक स्नेह सामीप्य चाहते हैं.यह सहज और स्वाभाविक है.ऐसे वक्त उनके जैवीय विकास और मनोविज्ञान की समझ अभिभावकों के लिए जरुरी है.ऐसे वक्त एक बेटे का माँ द्वारा अनदेखा किया जाना या उपेक्षित करना भावी जीवन में विपरीत लैंगिक आकर्षण के बजाय विकर्षण उत्पन्न कर सकता है. कई समलैंगिकों ने अपनी जीवनी में माँ या किन्ही मदर फिगर द्वारा बचपन के तिरस्कार को भी अपनी समलैंगिकता एक कारण बताया है और मनोविज्ञानियों ने इसकी पुष्टि की है. इसी तरह बेटियों का पिता के भी प्रति आकर्षण बहुत सहज और निर्मल भाव लिए होता है -वह पिता से प्यार दुलार ,अपनत्व की अपेक्षा रखती है -यहाँ केवल एक आकर्षण ,आईडल वरशिप का भाव होता हैजो  सहज है,वह भी पिता या किसी फादर फिगर  का स्नेह सामीप्य पाना चाहती है ..मगर कई बार इसे माँ बाप या अभिभावकों द्वारा सही ढंग से समझा  नहीं जाता और ऐसे सहज नैसर्गिक झुकाओं के प्रति बहुत ही रोषपूर्ण तिरस्कार का भाव दिखाया जाता है.ऐसे "अनुपयुक्त'' से  व्यवहार को ठीक से समझ  पाने के कारण माता  पिता प्रायः बच्चों को  तिरस्कृत करते है ,उपेक्षा करते हैं और यहीं से उसके अवचेतन में विपरीत लिंग के प्रति एक तरह का दुराग्रह जन्म ले लेता है ..यही वक्त है जब बच्चों को अधिक केयर ,स्नेह दुलार चाहिए ....
 किशोरावस्था के ठीक पूर्व के एक दो वर्षों और किशोरावस्था के  अनुभव किसी भी के भावी यौन व्यवहार को नियमित करने ,प्रभावित करने की माद्दा रखते हैं .चाहे वह समलैंगिकता हो या फिर विपरीत लैंगिक अरुचि .....एक शिक्षक  ने ११ वर्षीय  कक्षा  के छात्र को अपने साथ की लड़कियों से घुलमिल कर बात करते देख उसे बुलाया और बहुत डांटा..कहा कि लड़कियों से इस तरह बात करना अच्छे घरों के बच्चों को शोभा नहीं देता -बहुत खराब माना माना जाता है .बच्चे के कोमल मन पर इसका इतना दुष्प्रभाव हुआ कि वह लड़कियों की उपस्थिति मात्र से असहज होने लगा,उनसे दूर रहने लगा   -उसने बाद में स्वीकार किया कि एक उस घटना से ही उसका भावी यौन  जीवन  एबनार्मल होता  गया ..वह कुछ सालों तक समलैंगिकता की ओर मुड़ा और विवाह के उपरान्त ही  कुछ हद तक उसका यौन जीवन सहज हुआ मगर आज अपनी प्रौढावस्था में भी वह लड़कियों ,युवतियों के संपर्क -सम्बन्ध में असहजता का अनुभव करता है ....उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता... वह उन्हें मात्र सेक्स आब्जेक्ट  के ही रूप में देखता है .आकर्षित विकर्षित होता रहता है. एक शिक्षक के अविवेकपूर्ण निर्णय से कैसे किसी का पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है यह मात्र एक उदाहरण है मगर ऐसे अनेक उदाहरण भारतीय समाज में मिल जायेगें .अब  इन विषयों पर चर्चा 'सभ्य ' समाज में प्रत्यक्षतः ठीक नहीं मानी जाती और यहाँ असहज यौन व्यवहार पर  परामर्श का उतना चलन नहीं है इसलिए समाज की इन यौन ग्रंथियों का अमूमन कोई निवारण भी नहीं है ..

किशोरावस्था के दौरान के ही पहले यौन अनुभव जीवन के स्थाई भाव बनते हैं -एक 'सब्जेक्टने कहा कि उसे पहले स्खलन का अनुभव नर्तकी के कामुक नृत्य और उसके उन्नत वक्षों की गति को  देखकर हुआ था सो वह ताउम्र नारी वक्षों से ही  विशेष रूप से उद्वेलित होता रहा .किशोरावस्था या आरम्भिक युवावस्था के अप्रिय और अनचाहे यौन संसर्ग से भावी जीवन के सहज सेक्स के प्रति भी तीव्र विकर्षण ,दहशत की प्रतिक्रिया का एक स्थायी भाव मन में घर कर जाता है ....और अन्यथा पूरी तरह सामान्य जीवन जीने के बावजूद भी ऐसे लोगों की सेक्स लाईफ सामान्य नहीं रह पाती ....जोड़े के  एक पार्टनर के लिए सहचर /सहचरी का अनपेक्षित व्यवहार एक अबूझ पहली बन जाता है ....कई बार इनसे घर के टूटने और तलाक तक की नौबत आ जाती है .
अभी जारी है ....


25 टिप्‍पणियां:

  1. यह विषय भी उपेक्षित रहा है. सार्थक पहल. माता पिताओं का मार्गदर्शन करेगी.

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  2. तार्किक, बढ़िया विश्लेषण।

    मलाई की आशा मे आने वालों को निराशा होगी। शुगर का तड़का नहीं है।:)

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  3. यह एक ऐसा विषय है जिस पर खुली बहस कर हम अपनी प्रौढ़ता का परिचय तो दे देते हैं लेकिन अपने बच्चों के सामने अपनी संकीर्णता को ही जाने-अनजाने में प्रकट कर देते हैं.. जिसे अब समझने और बदलने की जरुरत है .. बाकी आपसे सहमती...

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  4. वैचारिक विमर्श और बच्चों के मन को समझना और उन्हें समझाना ही हल हो सकता है....... सहमती आपके विचारों से ....

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  5. ...यह चर्चा ज़्यादा विमर्शपूर्ण रही.एक तथ्य यह भी है कि सह-शिक्षा में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियाँ ज़्यादा सहज होते हैं,बनिस्पत इसके कि उन्हें अलग-अलग पढ़ाया जाये.जितनी दूरी रहती है उतना ही आकर्षण बढ़ता है और तरह-तरह की भ्रान्तियाँ बढती हैं.


    ...गंभीर-विवेचन है !

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  6. अच्छी क्लास लगायी गुरुजी।

    आपने सही कहा कि किशोरावस्था से पहले बचपन में ही सैक्स के प्रति अज्ञात जिज्ञासा होने लगती है। बच्चे को समझ तो नहीं आता परन्तु इन परिवर्तनों से वह अछूता नहीं रहता।

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  7. बुजुर्ग तो आ रहे हैं यहां, लेकिन बच्‍चे कहां हैं?

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  8. किशोरावस्था की मनोस्थिति का यथार्थ विवेचन, मिश्रा जी!!
    चिंतन आवश्यक है- किशोरावस्था में प्राकृतिक रूप से प्रकट होता विपरित सेक्स आकृषण क्या माता-पिता के लाड़-दुलार से सन्तुष्ट होकर शमित हो सकता है? या तुच्छताबोध व तिरस्कार से नियंत्रित सावधान हो सकता है? दोनो ध्रूव है। पर मध्यम मार्ग तो और भी बडा जटिल है, सामान्य सोच और विकृत सोच का परीक्षण कठिन है्।
    आकर्षण आवेगों का कौनसा किनारा उचित है? वह किनारा है भी या नहीं? अथवा नदी को निर्बाध बहने दिया जाय? तटबंध का टूटना सहज लिया जाय?
    कुल मिलाकर सबसे चरम लक्ष्य है अच्छा जीवन प्राप्त करना। सुनियोजित सुदृढ़ जीवन के प्रति लक्ष्यवान कैसे किया जाय?

    व्यस्क और गम्भीर विमर्श हो, अगली कडी का इन्तजार……

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  9. आपका धन्यवाद भाई जी ,
    ब्लॉग जगत के लिए लगभग अनूठे और बेहद आवश्यक विषय पर लेख के लिए !

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  10. महत्वपूर्ण विषय पर...अच्छी जानकारी!...आभार!

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  11. आपकी पोस्ट का समर्थन करती हूँ भाईसाहब। हम जिस स्टेज़ से गुजरे हैं वो आज बच्चों की नही होनी चाहिये। हर सवाल पर छिः गंदा या चुप रहो ऎसे ही शब्द सुनने को मिले। दोस्तों से मिला अधकचरा ज्ञान। आज समय बदल गया है बच्चों को दूसरे के सामने शर्मिंदा न होना पडे इसलिये जरूरी है ज्यादा नही तो उन्हे इतना समझा दिया जाये ताकि वो इस बदलते हुए परिवर्तन के साथ समझौता कर समय बर्बाद न करें और पढ़ाई की तरफ़ ध्यान दें। मेरे भी दो बेटॆ है जब-तब कुछ न कुछ ऎसे ही सवाल किया करते थे। किन्तु उनके पिता ने हर सवाल का जवाब उन्हे दिया।
    लिहाजा बालमन में कोई उथल-पुथल नही।
    सादर

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  12. बहुत विस्तृत विषय है .
    आपने अच्छा प्रयास किया है इस दिशा में .
    किशोर अवस्था में तन और मन में होते हुए परिवर्तन बड़ा कष्ट देते हैं . ऐसे में सही ज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक है .

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  13. यौन विकृतियों की शुरुआत अक्सर किशोरावस्था में ही होती है , यह भी सोचना पड़ता है कि जिन देशों में कोई पर्दा नहीं है , क्या वहां ये विकृतियाँ नहीं है बल्कि अक्सर कुंठित मनोवृतियाँ उन देशों से ही आयातित प्रतीत होती हैं !
    पूरी श्रृंखला से शायद सहमत ना रहू मगर यह एक सच्चे विज्ञानी का संतुलित आलेख लगा !

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  14. कहीं मैने पढ़ा था कि पुराने समय में और ग्रामीण इलाके में बच्चो को अक्सर पूरे कपडे नहीं पहनाते है इस से बच्चो में विपरीत सेक्स के प्रति उत्सुकता नहीं रहती है और ये बाद में फायदेमंद होता है

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  15. देर सबेर तो यह समझना और समझाना ही होगा।

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  16. बहुत ही वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण..
    पंडित जी! इस बार आपकी पोस्ट के फोर्मेट में कुछ समस्या दिख रही है.. शब्द टूट गए हैं!!

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  17. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सेक्स से जुड़े जो सवाल छाए रहते हैं,उनमें से अधिकतर के लिए ऐसा माहौल ही ज़िम्मेदार है।

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  18. यौन ग्रंथियों के इनते आयाम हैं कि सारा विश्व ही इनसे ग्रसित मालूम होता है. सब इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा सब्जेक्ट किन अनुभवों से गुज़रा है. किसी की परिस्थितियों और मानसिक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करना असंभव है. तथापि सही यौन व्यवहार की जानकारी इस बात में निहित है कि व्यक्ति यह समझे कि यौन का प्रयोजन बच्चे पैदा करना है और कि विपरीत सेक्स हमेशा स्वाद लेने के लिए नहीं है.

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  19. विषय पर आपने बहुत अच्छी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या की है।

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  20. इस विषय पर आपके द्वारा प्रेषित दोनों पोस्ट पढ़ीं ... अच्छी तार्किक जानकारी ... यह जानकारी हर माता - पिता के लिए आवश्यक है ...

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  21. ek mahtwapoorn lekh sahaj evam saral
    tarike se prastoot karne ke liye....
    sadhuwad cha abhar..

    gurujan ispar samyak vivechna karen..


    pranam.

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