शनिवार, 15 अगस्त 2009

ई मुई पी एच डी जो जो न कराये !

मेरे दो तीन ब्लागर मित्र इन दिनों पी एचडी में बुरी तरह मुब्तिला हैं -ज़ाकिर ,रीमा और अभिषेक ! ज़ाकिर से आज ही बात हुई और मजे की बात यह कि इस पोस्ट को लिखने का एक मसाला मिल गया ! ज़ाकिर जो बाल कहानियों में पिछले तीन साल से पी एच डी में रमे हैं ने अपनी पीड़ा कुछ यूँ व्यक्त की -
ज़ाकिर :तीन साल हो गए मगर अब जाकर शुरुआत कर पाया हूँ -बस शुरुआत ही तो मुश्किल होती है ।
मैं : हाँ ,ठीक कहते हैं ज़ाकिर भाई ,लेकिन मेरे विचार से जब शुरुआत समझ में न आए तो अंत से शुरू करना चाहिए !
समवेत ठहाका .....
जाकिर : लेकिन मेरी तो शुरुआत हो गयी है ......
मैं : तो अंत भी निकट मानिए ....और आज स्वतंत्रता दिवस पर क्या कर रहे हैं ?
ज़ाकिर : जी ,यही पी एच डी ही में लगा हूँ ॥
मैं: हद है यार ,पी एच डी के अलावा भी जीवन में कुछ होना चाहिए । चलिए पी एचडी को लेकर कुछ यह भी सुन लीजिये -
एक आधुनिक कहावत : किसी भी विश्वविद्यालय के परिसर में एक ढेला -पत्थर ऐसे ही उछाल फेकिये वह किसी कुत्ते को लगेगा या फिर किसी पी एच डी डिग्री धारक को ...
जाकिर :ओह हो हो हो हो .....
मैं : अब इसे भी सुन ही लीजिये -
बात अमेरिका की है ! एक घुड़दौड़ के प्रेमी रईस को उसके दोस्तों ने यह कहकर दुखी कर दिया कि उसके पास समृद्धि ,ऐश्व्यर्य सब कुछ है बस एक पी एच डी की डिग्री की कमी रह गयी है ..और बिना पी एच डी की डिग्री के यह ऐश्वर्य भी कुछ अधूरा अधूरा सा लगता है । यह सुन उस रईस को धक्का सा लगा .मगर उसने तुंरत प्रतिवाद भी किया -" मेरे घोडे को भी तो यह डिग्री नही मिली है ...कितना प्यार करता हूँ मैं उससे ! तो पहले मैं क्यों न उसी को पी एचडी दिलवाऊँ ? " अब चाटुकार मित्रों की बारी थी ," हाँ हाँ यह तो बड़ा नेक विचार है -शुभस्य शीघ्रम ...क्यों नही ? क्यों नहीं ?" फिर तो रईस के घोडे को पी एच डी दिलवाने की कवायद शुरू हो गयी ! आख़िर एक विश्वविद्यालय ने लम्बी चौड़ी कैपिटेशन फी लेकर उस घोडे को पी एच डी अवार्ड कर ही दी -अब रईस का घोड़ा डाक्टर बन गया था ! मगर दोस्तों ने एक बार फिर आवाज बुलंद की कि मित्र आपको भी पी एच डी ले ही लेनी चाहिये -अपने घोडे को पी एच डी दिलाकर रईस का हौसला बुलंद था -अब उस मनबढ़ ने फिर से उसी विश्वविदयालय को आवेदन किया ख़ुद को पी एच डी की डिग्री के लिए .......विश्वविदयालय का उत्तर भी जल्दी ही आ गया था -
" विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद् ने आपके आवेदन पर गंभीरता पूर्वक विचार किया और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हम घोडों को तो पी एच डी दे सकते हैं मगर गधों को नही ..इसलिए खेद सहित आपका आवेदन अस्वीकृत किया जाता है "

ये तो रही मजाक की बातें - सच यह है कि पी एच डी के नाम पर भारत में छात्रों के शोषण की की पुरानी परम्परा रही है .गाईड की साग सब्जी लाने के साथ साथ कभी कभी उनकी होनहार बेटियों से शादी करने पर ही डिग्री हासिल हो पायी है .अपने शोध छात्र के घोर परिश्रम से प्राप्त आंकडे को गाईड महोदय अपने नाम से छापते भये हैं ! उसको मिलने वाली आकस्मिक धनराशि में मुंह मारने के साथ ही कभी कभार फेलोशिप से भी हवाई जहाज टिकट का जुगाड़ भी शिष्य को करना पड़ जाता है ...सबसे बढ़ कर पीएच डी स्कालर की हैसियत किसी बंधुआ मजदूर से भी गयी गुजरी हो जाती है ! उसके मुंह से सहज मुस्कान गायब रहती है ! कुछ लोग तो ब्लॉग लिखना तक भी छोड़ देते हैं ताकि उनकी पी एच डी निर्विघ्न पूरी हो जाय ! सहज मानवीय रिश्तों से भी लोग दरकिनार हो लेते हैं !

हे पी एच डी आकांक्षियों ! यह ध्यान रहे कि पी एच डी ज्ञान और स्वाध्याय की शुरुआत मात्र है अंत नही -इसलिए इसे एक प्रोजेक्ट के तौर पर लीजिये -प्रोजेक्ट का मतलब है जिसकी एक शुरुआत हो और अंत भी ! पी एच डी को अंतहीन सिलसिले का रूप न दें -अब आप पद्मभूषण डॉ .कामिल बुल्के ही हैं तो बात अलग है जिन्होंने रामकथा पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएच डी के लिए विभिन्न भाषाओं के तीन सौ राम कथा साहित्य/दस्तावेजों का आद्योपांत अध्ययन मनन किया था ! उन सभी को जो इस महान कार्य -साधना में लगे हैं मेरी कोटि कोटि शुभकामनाएं -जल्दी आपकी पी एच डी पूरी हो -दुनिया में और भी बहुत कुछ है करने को ! समय आपको पुकार रहा है !

22 टिप्‍पणियां:

  1. "मेरे दो तीन ब्लागर मित्र इन दिनों पी एच में बुरी तरह मुब्तिला हैं"

    उपरोक्त गद्यांश की सन्दर्भ सहित व्याख्या की जाय ! इसमें 'मेरे' शब्द पर विशेष बल दिया जाय !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जसपाल भट्टी की फ्लॉप शो नाम के सिरियल की पीएचडी वाली कडी याद आ रही है। उसमें भी पीएचडी के लिये सिलेंडर भरवाने, गाईड की साली से शादी करवाने और होनहार छात्र की थिसिस अपने नाम करवाने की घटनाएं काफी मजाकिया अंदाज में दिखाई गईं थी।

    आज की यह पोस्ट भी मजेदार है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हम कम्प्यूटरी कीडे अपेक्षाक्रित अच्छी दशा में हैं :-)...अच्छी पोस्ट.

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक ही पोस्‍ट में मजाक भी .. और गंभीरता भी .. पर दोनो ही सही हैं .. यूनिवर्सिटी से पी एच डी की डिग्री लेना कभी आसान नहीं .. इसी कारण इसमें कभी दिलचस्‍पी नहीं रही .. मैं स्‍वतंत्र तौर पर ही शोधों में लगी हूं .. क्‍या करना डिग्रियों का .. वैसे भी किसी से शुरूआती परिचय में डिग्रियों का महत्‍व अवश्‍य होता है .. पर अपनी प्रतिभा दिखा देने के बाद .. कहीं भी कागजी सर्टिफिकेट्स का कोई महत्‍व नहीं दिखता !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आगे कुछ कहने के पहले यह मांग की जाती है कि विवेक सिंह की मांग पूरी की जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  6. "कुछ लोग तो ब्लॉग लिखना तक भी छोड़ देते हैं ताकि उनकी पी एच डी निर्विघ्न पूरी हो जाय !"

    ब्लॉग को पी एच डी केन्द्रित समस्याओं में सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद। :)

    रिसर्च छात्रों की संगति में रहने का (सौभाग्य/दुर्भाग्य/प्लेन भाग्य, जो समझ में आए लगा लीजिए) मुझे मिला है। इंजीनियरिंग के एक पी एच डी स्कॉलर आप की बात को ऐसे कहते थे ,"जाड़े की कड़कड़ाती ठंड, आधी रात का कुहासा। लाइब्रेरी के सामने वाली सड़क की टिमटिमाती रोशनी में कोई हिलती हुई छाया सी दिखे तो या तो वह गली का खुजैला कुत्ता होता है या ..." समझ ही गए होंगे। ;)

    बेचारे को सिविल इंजीनियरिंग से कविता की तरफ ठेल दिया था पी एच डी ने। जिस दिन पूरी हुई, उस दिन बड़े प्रसन्न थे। बताते क्या मैं सुनने की स्थिति में नहीं था, एम ई का डिसर्टेशन बाइंडिंग के बाद खुलवा रहा था। गाइड महोदय को मेरी स्थापनाएँ क्रांतिकारी सी लगी थीं और मैंने उछाह में उपसंहार का अध्याय उपसंहार की जल्दी में बिना उन्हें दिखाए बँधवा दिया था।. .

    उसके बाद पी एच डी करने का साहस नहीं कर पाया।

    उत्तर देंहटाएं
  7. "दुनिया में और भी बहुत कुछ है करने को"...एकदम सहमत और पहले से ही गांठ में बांधे हुए लोगों में से एक...

    उत्तर देंहटाएं
  8. कभी कभी मेरे दिले में (भी यह PHD हो जाने का) ख़याल आता है. मगर आपके किस्से पढ़कर तो भय ज़्यादा हुआ.

    उत्तर देंहटाएं
  9. हमने भी शुरु की थी - पर पूरी न हुई । अब फिर से लगना चाहते हैं, पर ब्लॉगिंग न छूटेगी । हमारी ब्लॉगिंग का ब्रेक तो बिजली या बीएसएनएल लगाते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या कहें? ये पी.एच.डी. - एल.एस.डी. तो विद्वानों की बातें हैं। :)

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत अच्छा विषय बहुत अच्छे ढंग से उठाया गया है. मुझे ज़ाकिर से ज़्यादा हमदर्दी है क्यों कि यह मुझसे मिल कर भी अपनी पी.एच.डी की चर्चा कर चुके हैं.
    मन कर रहा है इन सबकी पी.एच.डी के लिए कहीं से कोई वरदान मुहैया कराने का प्रयास करूँ पर फिर सोचती हूँ क्या मुझे ऐसा करने का अधिकार है जिसकी खुद की ही पी.एच.डी पूरी नही हो सकी....

    वैसे सबको शुभकामनाएँ व स्वतंत्रता दिवस की बधाइयाँ.

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने! स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  13. क्या कहूँ, ये गहन अध्ययन शोध वाली बाते मेरी समझ में नहीं आतीं

    उत्तर देंहटाएं
  14. ये Phd क्या होती है जी? कोनु खाने की चीज अहि क्या?:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  15. Aapke gambheer vishay ko achhe trike se uthaya hai...... ye baat bilkul cash hei PHD karne valoe apni vyatha kisi se bayaan hi nahi kar paate.... PHD kane ke tarike par punarvichaart ki jaroorat hai........bahoot sundar lekh

    उत्तर देंहटाएं
  16. उसके मुंह से सहज मुस्कान गायब रहती है ! सहज मानवीय रिश्तों से भी लोग दरकिनार हो लेते हैं ! Ph D aakankshiyon ke dil ke bhavon ko abhivyakti de di hai aapne. Hardik dhanyavad.

    उत्तर देंहटाएं
  17. Vishay to ati shaandaar chuna aapne...ik baar mere man main bhee aya thaa ye veechaar....fir iske badle shadi kee degree mil gayi ...:)

    mere blog par Aapke sarahneya shabdon ka bahut shukriya !!

    उत्तर देंहटाएं
  18. Bahut sahi kaha aapne....main bhi bhuktbhogi hun..bahut nikat se is karobar ko dekha hai..maine to beech raste se hi wapas loutkar aisi kaan pakdee ki abhi tak us raaste par fir se pair badhane ki himmat nahi padi hai...

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव