बुधवार, 27 जून 2012

एक आर्त अपील -लिव एंड लेट लिव!


भ्रष्टाचार पर मैंने कभी नहीं लिखा .बेमन टिप्पणियाँ जरुर की हैं इस विषय पर ब्लॉग पोस्टों पर . जल में रहकर मगर से बैर या आ बैल मुझे मार सरीखी बात ही नहीं है यह एक सरकारी मुलाजिम के लिए बल्कि उससे भी बढ़कर कि उसे  इस लाईलाज महारोग का कोई हल नहीं दीखता ..यह मनुष्य के आचरण,उसके संस्कार अर्थात लालन पालन, घर परिवार और दृष्टि-विवेक से जुड़ा मसला है. केवल सरकारी मुलाजिम ही नहीं भारत में भ्रष्टाचार घर घर तक पहुँच कर हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. कभी कभी तो  लगता है यह जैसे कोई आनुवंशिक बीमारी सा है जो पीढी दर पीढी चलता जा रहा है मगर इसके दीगर भी उदाहरण अक्सर मिलते रहते हैं .दो सगे भाईयों में एक बड़ा ईमानदार और दूसरा महाभ्रष्ट .एक ही मां बाप परिवार, संस्कार मगर फिर भी बड़ा  अंतर . यहाँ कुदरत के विभिन्नता का सिद्धांत समझ आता है :)  .कई ज्ञानी इस महारोग का औचित्य तक सिद्ध करते दिखाई देते हैं .दाल में नमक भर तो चलता है भाई? पता नहीं नैतिकता की किस तराजू से भ्रष्टाचार का माशा तोला ऐसे लोग तौलते हैं .फिर एक जुमला  यह भी अक्सर सुनाने को मिल जाता है कि अरे मन से और मूलतः तो भ्रष्ट  सभी हैं -जिसे मौके नहीं मिलते वे खुद को हरिश्चन्द्र दिखाने पर तुल जाते हैं -जाहिर है यह एक भ्रष्टाचारी का उद्धत वक्तव्य है . 

ईमानदारी के प्रवक्ता कहते हैं और अब यह एक बहु -उद्धृत वक्तव्य बन उठा है कि ईमानदारी होनी ही नहीं प्रदर्शित भी होनी चाहिए .गोया आज के दिखावे के युग में या महाभ्रष्ट युग में यह भी एक प्रदर्शन की वस्तु हो गयी है :) फिर तो यह प्रदर्शन कब ढोंग बन जाय कौन कह सकता है?. ईमानदारी भी एक जीवन मूल्य है .आज भी राजकीय सेवा में ऐसे अधिकारी मिल जाते हैं जो इस मूल्य के साथ किसी तरह जी ले रहे हैं बाकी तो कितने हिमालय की कंदराओं में या असमय ही अपने कुल पूर्वज (हरिश्चन्द्र ) से मिलने उनके नाम -प्रसिद्ध गंगा घाट की शरण लेते भये हैं . कुछ इस महामारी से अडजस्ट करने की अपनी मुहिम में यह दलील देते फिरते हैं कि जब जाड़ा अधिक पड़ने लगे तो जिद करने के बजाय रजाई न सही कम्बल तो ओढ़ ही लेना चाहिए ..नहीं तो कोई ऐसा धर्म नहीं है जो आत्मविनाश की हिदायत देता हो . मैं इन्ही विचारों की उहापोह में अपने सरकारी मुलाजिम होने के लगभग तीस वर्ष तो बिता चुका ....सेवा निवृत्ति की ओर बढ़ रहा मगर मुझे कोई निवृत्ति मार्ग नहीं सूझ रहा ...
और जब तक कोई हल न हो, समस्यायों को उठाना एक गैर उत्तरदायित्वपूर्ण काम है .इसलिए इस विषय पर कभी नहीं लिखा और फिर व्यवस्था के एक चाकर को इन विषयों पर लिखने की अनुमति नहीं है -कई भृकुटियाँ तन उठती हैं . मगर वो क्या है न जब जब दंश गहरे होते हैं एक कलम सेवी को कलम (अब की बोर्ड! ) का सहारा लेना ही पड़ जाता है . खुद के लिए नहीं भी तो उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता के नाते . लिहाजा मैंने सोचा आज से अपने सुधी पाठकों और मित्रजनों को और उनके जरिये समाज के और लोगों को जहां तक पहुँच हो सके इस मामले पर संवेदित कर सकूं . यह कोई अछूत विषय क्यों होना चाहिए? आज जब पूरे भारत में, खासकर युवाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता तथा जवाबदेही के प्रति एक जुनूनी रुझान उठती दिखाई दे रही है तो शायद एक संभावना भी झलक रही है कि इस कोढ़ के विरुद्ध भी एक बड़ा जनमत उठ खड़ा होगा  और हम और अगली पीढियां इसके प्रभाव से मुक्त हो सकेंगी ..आशा ही तो जीवन है . 
भ्रष्टाचार एक छतरी शब्द है जिसके अधीन तरह तरह के भ्रष्टाचार हो सकते हैं - नैतिक, चारित्रिक, आर्थिक...इनमें तो अनेक बिलकुल निजी वैयक्तिक स्तर के हैं और समाज या राष्ट्र को इतना नुकसान नहीं पहुंचाते जितना आर्थिक किस्म का भ्रष्टाचार। आर्थिक भ्रष्टाचार में लगे लोग दीमकों की तरह हैं जो गरीब टैक्स पेयर के धन को तो हजम करते ही हैं, किसी भी राष्ट्र के आधार स्तंभों को खोखला करने की माद्दा रखते हैं। इनके समूल विनाश का कोई भी कृमनाशी नहीं बना है - ये कहीं भी किसी भी जगह पाए जा सकते हैं - मगर इनका जमाव टॉप पर अधिक है और इनकी इल्लियां तल पर भी मौजूद हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार का मॉडल टॉप टू बॉटम का है। इस वैतरणी का उद्गम भी ऊपर से ही है। अगर ऊपर का भ्रष्टाचार मिट जाए तो मैदान की वैतरणी भी साफ़ पवित्र हो जाए। मिथकों में तो वैतरणी कभी भी साफ़ न होने वाली नदी बतायी गयी है। यहां तक कि इसके जल के स्पर्श मात्र से मनुष्य को अपवित्र होने की चेतावनी है। यह ऊपर अधर में लटके त्रिशंकु के लार से प्रवाहित हुई है। भ्रष्टाचार की लार भी ऐसे ही ऊपर से टपकती है। यह मॉडल टॉप टू बॉटम का है।
सरकार की नौकरियों के बारे में यही कहना ज्यादा उपयुक्त है कि यह काजल की कोठरी है। इस घटाटोप में ईमानदारी दिया बाती लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगी। अब खुद भी एक ऐसे ही सिस्टम में काम करते हुए बहुत सी बाते मुझे व्यंजना और लक्षणा में कहनी पड़ रही हैं। सरकारी कर्मचारी की आचार संहिता आड़े हाथ आती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस समस्या का मूलोच्छेदन कैसे हो...सबसे पहले वैतरणी के उद्गम को साफ करना होगा। भारी कीचड़ और कचरा वहीं से बहकर नीचे आ रहा है।
गीता में कहा गया है - यद्यदाचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते मतलब जैसा आचरण 'श्रेष्ठ ' लोग करते हैं वैसा लोग अनुसरण करते हैं। अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।
आज यद्यपि भ्रष्टाचार एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है मगर भारत में स्थिति बदतर है। यहां विसल ब्लोअर की बातें तो होती हैं मगर एक विसल ब्लोअर का मतलब है खुद अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना...भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर खुद शहीद हो जाना। यानी मेसेज साफ है - खबरदार! सीटी मत बजाना। और अब तो यह अपना पूरा समाज ही भ्रष्ट हो चुका है। अपने समाज परिवार में से ही कोई न कोई इसी व्यवस्था के पोषण और औचित्य को सिद्ध करने में लगा है। बिना कुछ दिए लिए काम नहीं होता, जैसे जुमले अक्सर सुनने को मिलते रहते हैं। जाने माने कवि कैलाश गौतम ने अपनी एक कविता में यही बात बड़ी ख़ूबसूरती से सामने रखी थी -
काम नहीं होता है केवल अर्जी देने से
कुर्सी कुर्सी पान फूल पहुचाने पड़ते हैं
कैसे कैसे तलवे अब सहलाने पड़ते हैं...
आज भ्रष्टाचार का चिंतन भी हरि अनन्त हरि कथा अनंता सरीखा हो गया है। क्या मैं आर्त अपील करूं शिखरासीन भातृत्व से कि लिव एंड लेट लिव...!

32 टिप्‍पणियां:

  1. "....सरकार की नौकरियों के बारे में यही कहना ज्यादा उपयुक्त है कि यह काजल की कोठरी है। इस घटाटोप में ईमानदारी दिया बाती लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगी।..."

    सही है. वैसे भी जब कोई व्यक्ति सरकारी कार्यालय में पहली मर्तबा नियुक्त होकर पदभार ग्रहण करता है तो वो ईमानदार होता है. मगर सिस्टम उसे छः महीने से ज्यादा ईमानदार (अपवादों को छोड़ दें तो,) नहीं रहने देता.

    वैसे भी सरकारी महकमे में एक कहावत प्रचलित है - ईमानदार वो होता है जिसे मौका नहीं मिलता, या उस पद पर कोई गुंजाइश नहीं होती है. :)

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  2. @सहमत हूँ रतलामी जी ,सिस्टम सिखाता है इस काली क़ला को ...

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  3. जिसके बारे में नहीं पता वही ईमानदार है ...

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  4. बहुत कहे सुने गये के बारे में और कित्ता कहा सुना जाये :)

    वह हमारे आचार का हिस्सा है , हम नहीं सुधरेंगे तो जग कैसे सुधरेगा :)

    अब एक सौ पच्चीस करोड़ को डिलीट करके नये तो नहीं पैदा किये जा सकते :)

    'बुरा जो देखन मैं चल्या बुरा ना मिल्या कोय'

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  5. आपकी आजकी पोस्ट से हद दर्जे तक सहमत| कुछ बातें कहना चाहूँगा -
    - भ्रष्टाचार को प्रायः लोग सरकारी विभागों तक सीमित मान लेते हैं, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा मिथ है|
    - सरकारी व्यवस्था में ईमानदार आदमी कांटे की तरह ही होता है|
    - भ्रष्टाचार का प्रभाव इतना व्यापक है कि आप अपने स्तर पर ईमानदार बने भी हैं तो बहुत संभावना है कि आपके नाम पर दुसरे खा कमा रहे हैं|
    - whistle blower concept पर ज्यादा नहीं कहूँगा लेकिन अपने देश में जिस बंदे के हाथ में थोड़ी ताकत आ जाती है, वही बहती गंगा में हाथ धोने लगता है| और स्पष्ट कर देता हूँ, अपने आस पास देखियेगा तो RTI का दुरूपयोग ज्यादा होता दिखेगा बजाय सदुपयोग के|
    इन सब बातों का ये मतलब न निकाला जाए कि इस रौ में बहना स्वाभाविक है, मतलब ये है कि ईमानदार होने के लिए ज्यादा काम, ज्यादा गलती, ज्यादा सजा के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना बहुत जरूरी है| आप तो बड़े अधिकारी हैं, आप का तरीका सोच अलग हो सकती है लेकिन मैं एक साधारण सा मुलाजिम हूँ और मैंने यह पहले दिन से तय कर रखा है कि मुझे घूस नहीं लेनी है, किसी से undue benefit नहीं लेना है और जब और जहां मौक़ा मिलता है अपने डीस्क्रीशन का अपनी समझ में जेनुईन जगह पर प्रयोग करता हूँ, उसके लिए नियमों को गीता-कुरआन नहीं मान लेता|ये वो बातें हैं जिन्हें मैं खुद पर लागू कर सकता हूँ और इस सबके लिए किसी अन्ना, केजरीवाल या किसी और मसीहा का इंतज़ार नहीं करता| सौ प्रतिशत ईमानदारी की गारंटी नहीं देता, सौ प्रतिशत प्रयास की गारंटी देता हूँ| घूस लेता नहीं हूँ लेकिन कई बार देनी जरूर पड जाती है:(
    'सम्वेदना के स्वर' पर डा.पी.सी.चरक वाली कड़ियाँ आपने पढ़ी हैं? न पढ़ी हों तो पढ़ देखियेगा, जिस व्यवस्था के हम पुर्जे हैं उसका एक अलग ही नजरिये से अवलोकन है|
    आपकी 'नारी देह नारी मन' विषय विशेषज्ञता से इतर यह पोस्ट पसंद आई|

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  6. नैतिकता की तुला पर, छुपा पड़ा पासंग ।

    अपना पलड़ा साजते, दूजे का बदरंग ।

    दूजे का बदरंग, आइना खुद ना ताके ।

    चीज हुई ईमान, घूमिये इसे दिखा के ।

    चुका रहे हम चौथ, लूटते भ्रष्टाचारी ।

    सही मित्र अरविन्द, मिटे ना यह बीमारी ।।

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  7. मेरा विश्वास है, अभी भ्रष्टाचार खून में है सॉफ हो सकता है. आनुवांशिक होने पर हमे सॉफ कर देगा.
    मूल कारण हमारे समाज मे देश और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा का न होना.
    आज़ादी के बाद एक ऐसी स्वतंत्रता मिली जिसने स्वतंत्रता के मायने ख़त्म कर दिये.

    यहाँ माँ, बाप अपने बच्चे को इंजिनियर, डॉक्टर या आइ. ए. एस. बनाना चाहते हैं, इस लिए कि वो पैसा कमा सके, कहते भी हैं कि मेरा बेटा बड़ा होकर बहुत अमीर बनेगा. अच्छा इंसान, अच्छा नागरिक बने न बने. तो बच्चा पैसा खूब कमाता है, नं. एक का कमाये या दो का क्या फ़र्क पड़ता है.

    मुझे इसका एक उपाय तो समझ आता है पर उसके लिए बहुत अड़चने हैं, पहली अड़चन है हमारे नेता जो इसे लागू नही होने देंगे.
    अगर इस देश में प्राथमिक शिक्षा के बाद सभी ह को ४-५ साल के लिए, एक कठिन परिश्रम के साथ काम करते हुए शिक्षा प्राप्त करने को निर्देशित किया जाए, जहाँ देश के प्रति ज़िम्मेदारी, अच्छे इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी जैसे मूल्य रोपित किए
    जाए,और सरकार प्रतिबध हो की इस शिक्षा के दौरान रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था हो और बाद में उन्हें रूचि अनुसार इंजिनियरिंग मेडिकल विज्ञान कला खेल के क्षेत्र में पढ़ाई करने का पूरा मौका दिया जाए.

    देश की नागरिकता सिर्फ़ उन्हें दी जाए जो इस शिक्षा से गुजरें तो अगले २० सालों मे स्थिति मे सुधार हो सकता है. फिर चाहे वो नेता का लड़का हो या अंबानी बिरला का सबको इस देश की नागरिकता के लिए इस शिक्षा पद्धति से होकर जाना होगा.
    इसके लिए मजबूत इरादों और प्रतिबद्धता की ज़रूरत होगी.
    ऐसा मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं.

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  8. इतना आर्त न होइये। जहां कमजोर भ्रष्टाचार मिले वहां पकड़कर रगड़ दीजिये। जहां मजबूत दिखे वहां से बगलिया के निकल लीजिये। अगर पढ़ न चुके हों तो उत्तर प्रदेश सरकार में अधिकारी रहे हरदेव सिंह की किताब बांचिये -क्यों बेईमान हो जाती है नौकरशाही। भ्रष्टाचार तमाम कारण/विवारण पता चलेंगे।

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  9. भ्रष्टाचार की लार भी ऐसे ही ऊपर से टपकती है। यह मॉडल टॉप टू बॉटम का है।

    बिलकुल सही कहा है ... बचते बचाते भी काफी कुछ कह गए

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  10. सब कुछ कह कर कह रहे हैं --हम कुछ नहीं कहते . :)
    अभी तो इतना ही , शेष शाम को .

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  11. अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।
    सौ बात की एक बात तो यही है ...और यह इतना मुश्किल भी नहीं बस एक तबियत तबियत से उछालने भर की देर है.
    फिर भी काफी कुछ कह डाला आपने.

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  12. भ्रष्टाचार से हम बचके निकल भी तो नहीं सकते.इसलिए सीधा उपाय है कि जानबूझकर पंगा मत लो पर यदि इससे सीधे टकराहट हो तो मुकाबले के अलावा कोई विकल्प नहीं है !


    ...अपन तो कम से कम आर्थिक-भ्रष्टाचार से मुक्त हैं,पता नहीं किसी अन्य तरह में संलिप्त भी हो सकते हैं !

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  13. सही बात है. लिव एंड लेट लिव पर ही तान टूटती है.

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  14. No body is corrupt.. who is going to admit that he sports corruption but in reality 98% of them are..

    Intensity may vary.. !!
    I think sometimes the Live and let live approach encourages corruption... because those who r doing... no longer bother..

    Interesting read..

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  15. ये अब एक ऐसा सर्कल बन गया है जिसको तोड़ने से आगे पीछे के पेच ढीले हो जायंगे इसलिए ये चलता रहता है ... हां जब भी टूटे इसे ऊपर से ही तोड़ने पे कोई गुंजाइश है की शायद नीचे आने आने तक कुछ सफाई हो सके ...

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  16. मुश्‍कि‍ल तो है पर एक बार छवि‍ लठैत की बन गई तो लोग दबाने की हि‍म्‍मत नहीं करते हालांकि‍ हो सकता है महत्‍वपूर्ण दायि‍त्‍व न सौंपे जाएं

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  17. आर्थिक भ्रष्टाचारियों की किस्में :
    * एक वो जो जन्म से भ्रष्ट हैं . ऐसे लोग रिटायर होने से पहले जेल नहीं जाते .
    * दूसरे वो जो लालायित रहते हैं और अवसर मिलते ही पैसे में खेलने लगते हैं .
    * तीसरे प्रलोभन को ठुकरा नहीं पाते . लेकिन हमेशा डरते भी रहते हैं .
    * चौथे इतने डरपोक होते हैं --कभी ले नहीं पाते . सारी जिंदगी डरते ही रहते हैं .
    * पांचवें जन्म से बेबाक और निडर होते हैं . वे कभी लेते नहीं .

    अब देखा जाए तो यह तो जींस में ही घुला है --आप किस केटेगरी में आते हैं . हालाँकि कभी कभी परिस्थितयां और संगत भी मनुष्य को प्रभावित कर सकती हैं .
    इस विषय पर साहसी लेख .

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  18. @डॉ.दराल साहब ,
    बहुत अच्छा विश्लेषण ..आपने मेरी कटेगरी पूछी है .
    कुछ और विचार आये हैं -अंत में ही बताता हूँ!

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  19. तंत्र सर्वदा (आमतौर पर) अपने अनुकूल करने पर आमादा रहता है.
    और फिर आप ही का सूत्र हैं न कि
    आशा ही तो जीवन है

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  20. भाई साहब अमरीका की राष्ट्रीय बीमारी फ्ल्यू है इसकी नै स्ट्रेंन हर बरस प्रकट होतीं हैं .टीका बन नहीं पाता इसीलिए .हमारी राष्ट्रीय बीमारी है भ्रष्टाचार .हम भ्रष्टों के भ्रष्ट हमारे .इसी रूप हमारी पहचान भी है .यहाँ बहुत जल्दी तिहाड़ एक विधानसभाई क्षेत्र बनने जा रहा है .आप नाहक परेशान न हों .हर चीज़ का शिखर आता है उसके बाद .......गंगा का प्रदूषण है भ्रष्टा चार जितना दूर करोगे बढ़ता जाएगा .लोग हाथ धोना नहीं छोड़ते गंगा जी में .यहाँ तो भ्रष्टाचार गंगोत्री से ही आ रहा है गौ मुख से ऊपर से नीचे की ओर जैसा अरविन्द जी आपने कहा है .
    इस गंगा को अब नाला रहने दो ,
    हम नै गंगोत्री लाएंगे ....

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  21. देखता है,
    दुखी होता
    और
    फिर बढ़ जाता भँवर में,
    व्यथा की अनिवार्यता में।

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  22. आशा ही कहाँ है इस गर्त से निकल पाने की ....सच है हर कोई इसका भागीदार है | कोई जानते बूझते और कोई मजबूरी में ....

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  23. हम शुक्रगुजार हैं उस प्रभु के जिन्होंने हमें अब तक ऐसी जगह नहीं जाने दिया जहाँ भ्रष्ट होने का मौका मिले :)

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  24. मुझे इस विषय में कोई बात करना बेमानी लगता है. आपसे सहमत.
    चेन्नई से...

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  25. @मित्रों,
    आपने इस मुद्दे पर अपने स्पष्ट विचार व्यक्त किये आभारी हूँ .रवि रतलामी जी ने जहाँ एक प्रचलित वक्तव्य की और ध्यान दिल्या तो मुसाफिर ने इसकी गहरी जड़ों और उसका एक समाधान भी सुझाया मगर इस देश और मौजूदा नीति नियोजकों के रहते शायद यह संभव नहीं -संजय ने भी अपने अनुभव शेयर किये ....और एक बड़ी पते की बात की कि हमें दूसरों के लिए भ्रष्टाचार करना पड़ता है .डॉ. दराल साहब ने भ्रष्टाचार की कई श्रेणियां गिनाई -सब सही हैं ,मगर ब्लागरी धर्म का निर्वाह करते हुए मेरी कटेगरी भी पूछी -मेरी कटेगरी तो संजय पहले ही बात चुके हैं -अपने लिए नहीं दूसरे "बड़ों " के लिए हमें इसके लिए विवश होना पड़ता रहा है -रविकर फैजाबादी के पास तो निसर्ग ने अद्भुत काव्य शक्ति दी है -अपनी बात वे कितने सुन्दर पद्य रूप में कह देते हैं .
    आप सभी का पुनः आभार!

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  26. अरविन्द जी,
    मेरी टिप्पणी पर आपने गौर किया, धन्यवाद लेकिन मुझे लगता है कि मेरा मंतव्य स्पष्ट नहीं हो पाया| हालांकि जो अर्थ आपने निकाला, वो भी निकलता ही है लेकिन मेरा कहने का अभिप्राय भ्रष्टाचार की व्यापकता और इसको मिल रही मान्यता पर था| मेरा मतलब सिर्फ ये था कि अपने तईं पूरी ईमानदारी बरतने के बाद भी कई बार पता चलता है कि आपके नाम पर कोई दूसरा चूना लगा चुका है और लगवाने वाले के लिए भी ये एकदम सहज हो चुका है|
    बड़ों के लिए घूस लेनी पड़ी हो, ऐसी नौबत अपने साथ अभी\कभी नहीं आई है इसलिए विवशता का कोई सवाल उठा नहीं है और आगे भी नहीं उठेगा| दुश्वारियां उठाने के लिए अपन तैयार रहते हैं|
    इस कमेंटीय गलतफहमी के चलते ही सही, डाक्टर दराल की उत्कंठा का समाधान तो हुआ:)

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  27. स्पष्टीकरण के लिए आभार ..गलतफहमी आपके इस वाक्यांश से हुयी -
    घूस लेता नहीं हूँ लेकिन कई बार देनी जरूर पड जाती है:(

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  28. हरि अनन्त हरि कथा अनंता ... sachhi me

    cancer jaisa la-ilaz hai ye 'vrashtachar'.......

    alakh jagaye rakhiye aise aalekh se..

    pranam.

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  29. अब तो भ्रष्टाचार के मुख पर रंग-रोगन कर ईमानदार दिखाने का मुहीम चल रहा है...सरकारी-तंत्र में ऊपर से कुछ और ऑर्डर दिया जाता है भीतर से कुछ और .. फिर ईमानदारी को डंके की चोट पर बखाना जाता है ..विकास है ये...

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