Saturday, 25 April 2009

शुक्र है शुक्र दिखा मगर चाँद नदारद !

प्रातः दर्शनीय शुक्र और बृहस्पति -शुक्र उदय हो रहा है!
सौजन्य -अस्ट्रोनोमी गो गो
गत्यात्मक ज्योतिष के दावे की जांच के लिए मैं अपने ग्राम्य प्रवास की २४ अप्रैल की ब्राह्म बेला में उठा और तुरत फुरत पूर्वाकाश को निहारने भागा ! पूर्व दिशा में दो तारे बहुत ही तेज आभा बिखेर रहे थे ! अरे ये तारे नही दो ग्रह थे -बृहस्पति/जुपिटर ( देवताओं के गुरु ) और शुक्र /वीनस ( राक्षसों के राजा ) जिन्हें आम तौर पर इवेनिंग स्टार ( misnomer ! ) कहा जाता है क्योंकि ये अक्सर लोगों को शाम के समय दीखते हैं !

मैं पूर्वाकाश में इन दोनों ग्रहों के दृश्य सौन्दर्य से स्तंभित सा रह गया ! गत्यात्मक ज्योतिष के दावे के अनुसार चाँद को भी दिखना था मगर चाँद तो सिरे से नदारद था और सुबह होने तक उसका अता पता नही था ! जबकि दावा यह किया गया था कि यह शुक्र के साथ सुंदर युति बनाएगा ! महज पत्रा-पंचांग देख कर आकाशीय भविष्यवाणियों का कभी कभी यही हश्र होता है ! बहरहाल चाँद का न होना मेरे लिए तो छुपा हुआ वरदान ही साबित हुआ क्योंकि उसकी रोशनी न होने से शुक्र और बृहस्पति और भी दीप्तिमान हो रहे थे !

बृहस्पति जल्दी ही उदित होकर क्रान्तिवृत्त ( जिस तलपट्टी पर सारे ग्रह सूर्य की परक्रमा करते हैं ,क्रान्ति वृत्त है !यह आसमान में ऊत्तर पूर्व क्षितिज से एक रेखा में दक्षिण -पश्चिम क्षितिज तक विस्तारित है जिस पर सारे ग्रह चलते दीखते हैं ! ) की पट्टी पर काफी आगे निकल चुके थे ,आख़िर देवताओं के राजा जो ठहरे और शुक्र उनके नीचे मानों उनका तेजी से पीछा कर रहे हों ,ऐसे दिखे !


गावों में पूर्व में शुक्र को उगने को किसी महापर्व से कम नही माना जाता -लोक जीवन में शुकवा का यही उदय कई मांगलिक कामों खासकर व्याह शादी की शुरुआत की उद्घोषणा माना जाता है ! आजकल के फलित ज्योतिषी आसमान में न देखकर पत्रा में देखकर ही शुक्र उदय की घोषणा करते है और यह कैसी विडम्बना है कि वह आसमान में कहीं ज्यादा स्पष्ट और सुंदर दीखते है ! यह बहुत अजीब सा लगता है कि एक ओर तो शुक्र भारतीय मिथकों में राक्षसों के राजा हैं तो फिर वे लोकजीवन में मांगलिक कामों के मसीहा क्योंकर हुए ! किसी फलित ज्योतिषी से पूँछिये तो वह ऐसे सवालों का बस उल जलूल उत्तर देने लगेगा !


दरअसल आज की हमारी संस्कृति विभिन्न संस्कृतियों के मेल से विकसित एक मिश्रित और अपने में न जाने किन किन देशों के रीति रिवाज और यहाँ तक कि परस्पर विरोधी मान्यताओं को भी समेटे हुए है ! शुक्र (शुक्राचार्य ) हमारे यहाँ भले ही राक्षसों के राजा हैं वे यूनान में स्त्रीलिंग हो प्रेम की देवी के रूप में पूजित हैं ! अब कौन नहीं जानता की भारत के फलित ज्योतिष पर यूनानी और बेबीलोन सभ्यताओं की भी गहरी छाप है ! तो हमने इन दोनों मान्यताओं जिसमें एक ओर शुक्र दैत्यों के गुरुदेव हैं और दूसरी और प्रेम की देवी के रूप में प्रतिष्ठित भी हैं के बीच समन्वय कर लिया है ! आज जब शुक्रोदय से व्याह शादी के मूहूर्त तय होने लगते हैं तो बहुत संभव है की हम शुक्र के प्रेम की देवी वाले रूप के ही स्मृति शेष का स्तवन कर रहे होते हैं !

कृष्ण ने तो गीता में यहाँ तक कह दिया है -" कविनाम उसना कविः " -शुक्र के कई नाम हैं जिसमें एक नाम उसना भी है ! अब देखिये कृष्ण स्वयं कह रहे हैं की वे कवियों में शुक्राचार्य हैं -जैसे कि राग रंग .कविताई सभी आसुरी वृत्तियाँ हों ! मजे की बात है कि राग रंग नाचना गाना इस्लाम में वर्जित सा है ! क्या कभी कोई ऐसी विचारधरा भी भारतीय मनीषा में उपजी जिसने आमोद प्रमोद कविता कला ,अन्य विभिन्न कलाओं का प्रतिषेध किया हो -जैसे वे मानव के अंतिम अभीष्ट /श्रेय के मार्ग में रोड़ा अटकाती हों ! क्यों नहीं , इस्लामी मान्यताओं में ऐसा ही तो है ! प्रकारांतर से ये आसुरी वृत्तियाँ कही गयीं ! अब भला राक्षसों के गुरू शुक्राचार्य में इन का परिपाक क्यों न हुआ हो ! तो क्या प्रकारांतर से इस्लाम के अनुयायी असुर नहीं हैं -आदि देवता हैं ? कितना घालमेल है ना ? तभी कृष्ण यह उदघोषित कर देते हैं कि वे कविताई में शुक्राचार्य हैं ! बस इस्लामी मान्यता हो गयी तिरोहित ! अब कृष्ण भी हमारे पूज्य हैं तो उनकी हर बात हमें पूज्य है ! जाहिर है भारतीय चिंतन मनीषा में इसलामी विचारधारा को नकारने का यह भी एक प्रयास रहा होगा जब गाने बजाने को ,कविताई और आमोद प्रमोद को मुख्य धारा में समाहित कर लिया गया -भले ही वह आसुरी वृत्ति रही हो -इस्लाम विरुद्ध हो !

तो हे ब्लॉगर मित्रों ,शुक्र दर्शन ने मेरे मन में चिंतन की यह आंधी भी चलायी जिसके चपेट में आप भी आ गए ! हाँ अनुरोध यह है कि गत्यात्मक ज्योतिष की अधिष्ठात्री संगीता जी अपने काम को और भी मनोयोग और उत्तरदायिता के साथ करें ।

उनसे यह अनुरोध भी है और शुभकामना भी ! हाँ उनका मैं बहुत आभारी हूँ कि वही हेतु बनीं हैं इस शुक्र दर्शन और चिंतन का !

19 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यह दृश्य 23 अप्रेल को सुबह देखा जाना था। 24 अप्रेल को तो चंद्रकला अत्यन्त क्षीण हो कर सुबह की उषा की गिरफ्त में आ चुकी थी। वैसे इस दृश्य को मैं देख चुका था।

संगीता पुरी said...

यह जानकर मुझे बहुत अफसोस हुआ कि व्‍योम विहार में इतनी रूचि के बावजूद आप इस बार भी शुक्र चंद्र युति के दर्शन का आनंद नहीं ले सकें .. जैसा कि द्विवेदी जी कह ही रहे हैं 23 अप्रैल को मैने भी इसे देखा .. मैने अपने पहले वाले आलेख में इस बात की चर्चा की थी .. "वैसे इस दिन चांद दूज का होगा , दूज का चांद कभी कभी ही हमें दिखाई देता है , इसलिए 27 फरवरी की यह दृश्‍यावलि हमें दिखाई देगी या नहीं , इसमें शक की कुछ संभावना बनीं रह जाती है , पर 28 फरवरी को तृतीया का चांद कुछ उपर आ जाएगा और इस कारण इसे आराम से देखा जा सकता है।" पर इस बार दूसरे दिन चंद्रमा के दिखने में शक है , यह बात न बतलाकर मैने भूल की है , इससे जिनलोगों को भी तकलीफ हुई हो उसका मुझे दुख है .. पर मेरी इस गलती के लिए ज्‍योतिष के गणित क्षेत्र में किए गए शोधों को दोष देना कदापि उचित नहीं , जिसके सारे सिद्धांतों को अभी तक गलत नहीं ठहराया जा सका है .. 25 अप्रैल को अमावस्‍या थी , उस दिन सूर्य और चांद साथ साथ निकलते हैं , उसके बाद ही प्रतिदिन सूर्य के बाद चंद्रमा निकला करता है .. 24 अप्रैल को निश्चित तौर पर चंद्रमा सूर्य के 48 मिनट पहले पहले निकला था .. पर 24 अप्रैल को चंद्रमा इतना क्षीण था और सूर्य से इतनी कम दूरी पर था कि उसे देखना संभव नहीं हो सका .. बृहस्‍पति और शुक्र दोनो पूरे महीने प्रतिदिन भोर भोर में उदित होते रहेंगे इसलिए उन्‍हें देख पाना कठिन नहीं .. पर यदि शुक्र के साथ चंद्रमा को देखना हो तो सबों को 21 मई का इंतजार करना पडेगा .. जनवरी से ही हर 28 दिनों पर यह मौका आ रहा है और यह अंतिम मौका होगा .. उसके बाद 15 महीनों तक शुक्र सूर्य के साथ ही उदय और अस्‍त होगा इसलिए सूर्य की चमक में हम उसे नहीं देख सकेंगे .. शुक्र के प्रति आपके मन में जो भी विचार आए , वो अक्‍सर मेरे मन में भी आ जाते हें और मिथकों का सही जवाब दे पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं .. और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की अधिष्‍ठात्री मैं नहीं .. मेरे पिताजी ने जन्‍म दिया है इसे .. गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के लिए की गयी शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया।

Abhishek Mishra said...

सुबह एक तारे को देख मुझे भी लगा यह शुक्र ही है, मगर उजाला अपेक्षया ज्यादा होने की वजह से शायद गुरु नहीं दिखे.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह जानकारी काम की रही और संगीता जी की टिप्पणी भी ठीक है। बाकी देखते हैं कि हमें नक्षत्र-अवलोकन का बग कब काटता है! :)

अभिषेक ओझा said...

शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु (राजा ?) जरूर थे पर थे तो महर्षि भृगु के पुत्र, महान विद्वान् और एक सम्मानित तपस्वी ही. अपनी मातृभक्ति और अपनी माता के साथ हुए अन्याय के कारण राक्षसों के गुरु हुए. किसी भी प्रजाति का गुरु होना किसीकी विद्वता और अच्छाई को कम तो नहीं कर सकता? अगर तार्किक रूप से सोचा जाय तो बुरे तो वो हुए जिन्होंने राक्षसों का गुरु होना स्वीकार ना हो !

शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु जरूर थे पर इससे उनकी विद्वता को जोड़कर नहीं देखा जा सकता. कृष्ण ने कहा 'कवियों में मैं शुक्राचार्य हूँ !' जैसा कि 'सरसामस्मि सागरः' कहा. यहाँ भी तो सागर खारा होता है !

अगर कहीं राक्षसों का 'राजा' होने कि बात हो तो पता नहीं. मुझे तो बस इतना ही पता है की वे गुरु थे जैसे बृहस्पति देवताओं के गुरु थे और इन्द्र राजा. राक्षसों के राजा बदलते रहे ! और उस मामले में भी गुण तो गुण ही होते हैं दैत्यराज बलि कि महानता को कौन स्वीकार नहीं करता !

Hari Joshi said...

हम तो चांद का दीदार घर में ही कर लेते हैं। शुक्र तो हमारे इष्‍ट है हीं क्‍योंकि मानव और दानव के बीच बहुत महीन विभाजन रेखा है।

raj said...

aaj apke blog me aake mujhe wo jankari mili jo mujhe jara bhi pata nahi thi..boht interesting tha...thanx

ताऊ रामपुरिया said...

बडे काम की बात बताई आपने. पर क्या करें? आदत से मजबूर हैं ऊठ ही नही पाये.अब आपसे झूंठ क्या बोलना?:)

डॉ. मनोज मिश्र said...

चलिए एक तारीख संगीता जी नें और बताई है उस दिन देखतें हैं .

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Sorry to write in English - I am away from my PC --

Regarding, Guru Shukracharya jee,
Abhishek bhai has given good thoughts.

Shukracharya ji was the only GURU who knew the " MRIT Sanjeevani Vidhya " & Guru Brihaspati of Devta had send Kach to learn that secret & his story is also interesting - Kach, Devyani, Sharmistha's tale is among the oldest Love - Triangles ...

More later,
warm rgds,
- Lavanya

हिमांशु । Himanshu said...

अवलोकन को अनुभूति के धरातल से उठाकर चिन्तन के आकाश पर कैसे ले जाते हैं आप ? समझना मुश्किल है। ढंग से पढ़कर/समझकर टिप्पणी करुँगा ।

गौतम राजरिशी said...

इस सरल व्याख्याय का शुक्रिया...
अपने गांव में अक्सर देखा था कि शुकवा के उदय को शुभ माना जाता था, लेकिन इस ढंग से कभी सोच ही नहीं पाया कि सचमुच एक तरफ तो शुक्र राक्षसों का राजा है और दूसरी तरफ उसका उदय होना शुभ माना जाता है...तो ऐसे में आपका तर्क समझ में आता है..
शुक्रिया एकबार फिर से

नरेश सिह राठौङ said...

आपके माध्यम से ही इस बात कि जानकारी हो रही है । वरना तो सुबह उठना तो नामुमकिन है ।

hem pandey said...

शुक्र दर्शन के बहाने गुरु शुक्राचार्य पर आपके विचार और ओझा जी की टिप्पणि से ज्ञान वर्धन करवाने हेतु धन्यववाद,

रंजना [रंजू भाटिया] said...

देखा तो था यह पर सही चिंतन तो आपने किया इस का ..रोचक अदभुत लगा इसको पढना शुक्रिया

Science Bloggers Association said...

चलिए कुछ तो दिखा।
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सम्मोहन के यंत्र
5000 सालों में दुनिया का अंत

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

मैंने देखा तो नहीं, लेकिन इस झैं-झैं में मज़ा आ रहा है. वैसे पुराणों की बात करें तो अभिषेक ओझा की बात सही है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अभिषेक ओझा से पूर्णतया सहमत हूँ. शुक्र भारतीय मिथकों में राक्षसों के राजा नहीं बल्कि असुरों के गुरु हैं और राक्षसों से उनका कोई नाता नहीं है. वे इतने ज्ञानी थे कि देवताओं के गुरु बृहस्पति ने अपने पुत्र को उनके शिष्यत्व में भेजा था. उनका महत्त्व उनके ज्ञान और कुलीनता के कारण है जो कि असुरों के सान्निध्य में भी कम नहीं हुई.

M.A.Sharma "सेहर" said...

सुन्दर लेख !!

वैसे शुक्र देखने का सौभाग्य तो कई बार मिला .
पर इतनी तवज्जो नहीं दे पाए थे .

ज्ञानवर्धन का बहुत शुक्रिया ....

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