शनिवार, 18 अप्रैल 2009

चंदन की फिर चांदी !

निर्विघ्नं कुरुमे देव .............
बनारस में मतदान बीता -चुनावी व्यस्तताओं से निजात मिली मगर करीब दो महीने से छूटे नैत्यिक विभागीय काम अब सर चढ़ बोल रहे हैं ! ऐसे ही फाईलों में सर खपाए था कि एक मिमियाई आवाज सुनाई पडी,'सर मैं अन्दर आ सकता हूँ ' आगन्तुक को बिना देखे फाईलों में सर खपाए हुए ही मेरा स्टीमुलस बाउंड सा जवाब था -हाँ आ जाओ ! और ऐसा अनुभव हुआ की एक क्षीण सी काया सरकती हुयी मेरे पास तक पहुँच आयी है ! मजबूरन सर ऊपर करना पडा ! ओह तो यह मेरे ही विभाग का चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी चंदन था ! वह अपने हाथ में निमंत्रण कार्ड लिए हुए था ! हूँ ,तो यह एक और सीजनल कार्ड था और औपचारिकता वश अनुनय भरे शब्द बस सुनाई ही पड़ने वाले थे -दिमाग ने तुरत फुरत सोचा ! मैंने भी औपचारिकतावश चन्दन से पूंछ लिया कि क्या उसकी बहन की शादी का कार्ड है !

" नहीं सर यह मेरी शादी का कार्ड है ?"

"क्या " अचकचा कर मेरे मुंह से अकस्मात निकल पडा और दिमाग में मानों विचारों की एक आंधी सरपट दौड़ लगा गयी ! मैं प्रत्यक्षतः तो उसकी शादी में जरूर शरीक होने के अनुनय विनय को सुनने की भाव भंगिमा बनाए रहा मगर परोक्ष में मन मष्तिक पर कई दृश्य कौंधने लग गए थे ! अरे अभी बमुश्किल से दो वर्ष ही तो हुआ था जब इसकी शादी हुयी थी और साल भर भी नहीं बीता था कि नवविवाहिता ने कथित रूप से जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी ! पुलिस जांच में मामला और उलझ गया था ! और प्रथम दृष्टया यह बात मालूम हुयी थी कि फांसी मृतका ने ख़ुद नहीं लगाई थी बल्कि उसे फांसी किसी और के द्बारा दी गयी थी ! पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आते आते मामला और भी उलझ गया था -क्योंकि विसरा की जांच से जहर खाने की पुष्टि हुयी थी ! तो क्या मृतका ने ख़ुद जहर खाया था ! तो फिर वह ख़ुद फांसी पर क्यों चढ़ने लगी ? कहीं ऐसा तो नहीं था कि पहले उसे जहर दिया गया हो और फिर बाद में फांसी लगाई गयी हो ! चन्दन की नियुक्ति एक अनुकम्पा नियुक्ति थी -जो उसे उसके पिता की सरकारी सेवा में मृत्यु के कारण फोकट में ही मिल गयी थी ! बस केवल १८ वर्ष की ही उम्र में ! कच्ची उम्र के बिगडे हुए नौजवानों के तमाम दुर्गुण उसमे रहे हैं -लखैरागीरी ,नक्शेबाजी ,नशेबाजी ,बिना खून पसीना बहाए कमाई को यार दोस्तों में बस उडाते रहने का बुरा शौक -सारा आफिस उससे तंग रहता आया है ! उसके सुधार के सारे प्रयास विफल होते जा रहे थे ! कितनी बार मुझे उसे मजबूरन अर्थ दंड भी देना पडा था ! पर एक छुपी आस तो रहती थी कि शायद व्याह शादी के बाद यह सुधर जायेगा ! और आख़िर जल्दी ही उसका व्याह भी धूमधाम से निपट गया था ! तो क्या इसी नराधम ने अपनी सद्य परिणीता की हत्या कर डाली थी ? इतनी बड़ी क्रूरता ?

उस दिन तो सुबह सुबह यह समाचार पढ़कर दिल धक् से रह गया जब मेरे ही विभाग के कर्मी द्वारा पत्नी को मार दिए जाने की खबर स्थानीय अखबारों में प्रमुखता से छपी थी ! अरे यह तो चन्दन ही था ! अभी शादी के जुमा जुमा कुछ माह ही तो बीते थे ! क्या ऐसा नृशंस काम इस नराधम ने सचमुच कर डाला था ! पुलिस रिकार्ड में दहेज हत्या का मामला दर्ज हुआ था और इसके साथ ही सारा परिवार -माँ ,छोटा भाई सभी जेल के सींखचों के अन्दर जा चुके थे ! समय बीतता गया -जेल में होने के कारण यह निलम्बित भी हो गया ! बड़े दुर्दिन आए उस पर ! करनी का फल तो मिलना ही था ! और एक दिन वह जेल से छूट गया ! सुनाई दिया कि मृतका के पिता ने कुछ ले दे कर समझौता कर लिया था -बाकी थोड़ा बहुत पुलिस को समझाने बुझाने में खर्चा हुआ ! और मामला रफा दफा ! यह है समाज और व्यवस्था का एक और घिनौना चेहरा ! निलम्बन भी उच्चाधिकारियों ने बहाल कर दिया ! और वह फिर मेरे ही आफिस मे पोस्ट कर दिया गया ! मेरी और मेरे पूरे परिवार की उससे दूरी स्पष्ट हो चली थी ! मैंने उससे सरकारी काम भी लेना बंद सा ही कर दिया था ! समूचा आफिस उससे दूरी बना चुका था ! आखिर वह एक मुलजिम तो हो ही चुका था ! लोगों ने कुछ और गहराई से पूंछ तांछ की तो एक नयी कहानी सामने आयी ! यह कि जहर तो उसकी मृत पत्नी ने ख़ुद खाया था मगर इन बुद्धिहीनों ने उसे फांसी द्बारा ह्त्या दिखाने का कुचक्र रच डाला था !पता नही किस अंतर्बोध से ! बहरहाल !

उसकी शादी ,पत्नी की रहस्यमय स्थितियों में मौत ,उसका जेल जाना और सेवा से निलम्बित होना और फिर जेल से रिहा हो जाना और नौकरी पर बहाल हो जाना -ये सारे घटनापूर्ण दृश्यक्रम केवल दो वर्ष की अवधि में सिमटे हैं और आज फिर वह ख़ुद अपनी ही शादी का निमंत्रण पत्र मुझे यह अनुनय करके सौंप गया है कि मैं उसकी शादी में जरूर चलूँ ! और मेरे मन में अभी भी बहुत संताप भरा हुआ है -मन बिल्कुल नहीं है उसकी शादी में जाने का ! मगर परस्पर विरोधी विचार भी मन को बोझिल कर रहे हैं ! बच्चन जी की कविता भी मन में उमड़ घुमड़ रही है- नीड़ का निर्माण फिर ! पर ऐसे आततायियों के हाथ फिर कहीं कोई दुष्चक्र न रचा जाय ! पत्नी बोल रही हैं -कैसी बातें कर रहे हैं शुभ शुभ बोलिए ! पर मन है कि आशंकाओं से भरा जा रहा है !

मन हो उठा कि यह झंझावात आपसे थोड़ा बाँट लूँ तो जी हल्का हो जाए !

20 टिप्‍पणियां:

  1. अजीब लग रहा है यह प्रविष्टि पढ़कर । मैंने भी तो अखबार में पढ़ा होगा इसे कभी । पर नाम से संगति नहीं बैठा पा रहा हूँ ।

    सोच रहा हूँ, उसका नाम चन्दन क्यों है, कुछ और क्यों नहीं ?

    एक झिझक महसूस हो रही है कहते हुए, पर इस प्रविष्टि का शीर्षक मुझे बेचैन कर रहा है ।

    शीर्षक दूसरा है, और पोस्ट जैसे दूसरी ।

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  2. @उसका नाम ही चन्दन है और दहेज़ के सोना चांदी से उसकी फिर चांदी ही तो है हिमांशु ! शीर्षक इसी एंगल से है और व्यंजनात्मक है ! और किसी मानव मूल्य से उसका क्या लेना देना है !

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  3. हम समझ सकते हैं कि समाज में स्त्री की महत्ता कितनी है।

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  4. समाज में इस तरह की अनेको कहानियां है ... अंतर यही है कि अखबार में पढी बातें दिमाग में इतना हलचल नहीं लाती ... कुछ हद तक दोष लडकीवालों को दिया जा सकता है ... जो अपनी इतना होने के बाद भी अपनी लडकी को चंदन जैसों के हाथ में सौंपने को तैयार हो जाते हें ... खैर अब सबकुछ अच्‍छा रहे ... इसके लिए शुभकामनाएं तो दी ही जा सकती है।

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  5. यदि चन्दन न्यायालय से दोषसिद्ध नहीं करार दिया गया है और मामला समाप्त भी हो चुका है तो उसे पत्नी का ह्त्यारा मान ही लेना नैसर्गिक न्याय के खिलाफ़ है। हो सकता है कि पत्नी की म्रुत्यु के लिए इसके अतिरिक्त इसकी पत्नी या कोई अन्य व्यक्ति भी जिम्मेदार रहा हो।

    २. यदि इसकी भूमिका उस हत्या/आत्महत्या काण्ड में रही भी हो तो भी हमें बाल्मीकि और अंगुलिमाल की कहानी याद रखनी चाहिए। मनुष्य का हृदय परिवर्तन कभी भी हो सकता है।

    ३. भगवान ने अगर ठीक से जोड़ी तय की होगी तो इसकी नयी दुल्हन इसे या तो सुधार ही देगी या इस बार यही आत्महत्या कर लेगा। आखिर नया रिश्ता करने वाला लड़की का बाप इसकी कहानी तो जानता ही होगा। फिरभी उसने यदि अपनी बेटी का हाथ इसे देने का हौसला दिखाया है तो जरूर कुछ खास बात होगी।

    अच्छी विचारणीय पोस्ट।

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  6. क्या कहें? मैं बस इतना जानता हूँ की मैं होता तो ना जा पाता !

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  7. कैसे होते होंगे वे लोग जो हत्यारों को बेटियाँ सौंपते होंगे ?

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  8. बहुत मुश्किल है ऐसे न्योते को स्वीकार करना.
    जब तक वह व्यक्ति संदेह के घेरे में है,जैसा की उस का शुरू से चाल चलन बहुत लापरवाह किस्म का रहा है.ऐसे में सहजता से उस व्यक्ति को निर्दोष मन लेने को मन गवाही नहीं देता.और अगर उसे थोडा भी रंज हुआ होता तो इतनी जल्दी दूसरा विवाह नहीं रचता.
    मालूम नहीं क्या सोचकर लड़की वालों ने उसे लड़की दी..उनका न जाने कैसे इन लोगों ने ब्रेन वाश किया होगा..चाहे जो हो अगर मैं - आप की जगह होती तो ऐसे विवाह की गवाह न बनती जहाँ नयी दुल्हन को आशीर्वाद की जगह सहानुभूति देनी पड़ती..की कहीं इस के साथ भी ऐसा वैसा न हो!

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  9. मेरे विचार से लड़की/लड़की वालों को यह प्रकरण संज्ञान में होना चाहिये। शेष जो हो सो हो।

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  10. शायद आप तथा ऑफिस के अन्य लोगों का व्यवहार उसे अपने चरित्र के बारे में पुनर्विचार में सहायक हो सके. लड़की के साथ तो सहानुभूति ही प्रकट की जा सकती है.

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  11. in 1977 when in ashok vihar delhi a similar inscedent happend where the husband was found guilty of murdering his wife . after 6 months the parents of the girl willingly gave their second daughter to him .

    in 1977 in delhi aiims a very renowned lady doctor aged 54 committed suicide and her husband aged 56 , doctor by profession , married his patient aged 30 with whome he was having an affair { again they married with her parents permission }

    in india woman if woman survive female foetocide then they are given birth to die at the sweet will of society , husband , parents

    its pathetic we all should raise our voice

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  12. समाज के सामाजिक समरसता की यही तस्वीर आज -कल कई रूपों में दिख रही है .पोस्ट बहुत विचारणीय .

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  13. ऐसे नराधमों की इस धरती पर कमी नहीं। दुख की बात यह है कि ये छुटटा सांड की तरह घूमा करते हैं।

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    खुशियों का विज्ञान-3
    एक साइंटिस्‍ट का दुखद अंत

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  14. मिश्राजी

    पुरे काण्ड मे कर्मो का दोष है भाई, जो व्यक्ति मनुष्य जिवन को आनन्दम्य नही जी सकता उसका मानव योनि मे जन्म लेना ही व्यर्थ है फिर वो चन्दन हो या चान्दनी। आभार

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  15. अजीब सा मसला है यह तो ..दूसरी शादी की हिम्मत और जानते बुझते लड़की देने वालों की भी हिम्मत है .मैं भी यही दुआ करुँगी की सच में उसका ह्रदय परिवर्तन हो चूका हो ....

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  16. sir meri dushmni dohre se nhi hai mujhe to sirf unke namo par aptti hai

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  17. sir meri dushmni dohre se nhi hai mujhe to sirf unke namo par aptti hai

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  18. Jabtak samajik jaagruti nahee hogee, koyi qayde qaanoon, dahej pratha aur uske tehet huee hatya, in jurmon ko rok nahee sakte...miya beebee raazee to kya karega qaazee...aiseehee ye baat hai..
    Uprokt lekhme jaise kaha gaya hai ki, mrutkaake pitanehee paise leke maamlaa rafa dafa kar diya to aur teesra koyi kya kar sakta hai..

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  19. मन की विचित्र-सी हालत पूरी कथा पढ़ने के बाद..
    किंतु एक बात समझ में नही आयी कि जब न-विवाहिता ने जहर खा ही लिया था तो उसे फाँसी पर लटकाने की नौबत क्यों आन पड़ी?
    "पता नही किस अंतर्बोध से..." आप लिखते हैं और मन अजीब-सा हो उठता है

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