शनिवार, 25 जून 2011

बहुत बलवती है मनुष्य की आशा

मनुष्य मूलतः एक आशावादी प्राणी है ...निराशा उसका स्थायी भाव नहीं है....सब कुछ ख़त्म होने के बाद भी उसकी आँखों में भविष्य की चमक/झलक  देखी जा सकती है ..विवेकानंद ने एक बार कहा था कि अगर तुम्हारा सब कुछ ख़त्म हो गया है तो देखो भविष्य  अभी भी तुम्हारे  पास है ,अक्षत और सुरक्षित! मनुष्य की आशावादिता ही उसकी वह थाती है जिससे वह आज धरती पर सर्वजेता बना हुआ है .करोडो वर्ष के विकास की यात्रा में उसकी इसी आशावादिता और जिजीविषा ने दीगर पशुओं से उसे बढ़त दिलाई है...यह भी प्रकृति के अनेक चमत्कारों में से एक है कि मनुष्य का दिमाग ख़ास तौर पर आशावादिता के लिए 'प्रोग्राम्ड' है -नए वैज्ञानिक अध्ययन  तो यही खुलासा करते हैं

मनुष्य की प्रबल आशावादिता का एक उदाहरण महाभारत से है जो भले ही एक मिथक हो मगर  मनुष्य की मूल सोच का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता  है ...  महाभारत का युद्ध अंतिम दौर में था ..कौरवों के धुरंधर सेनापति पराजित/हत  हो चुके थे..ऐसे में अंतिम सेनापति के रूप में दुर्योधन ने अपने सारथी शल्य को ही रण भूमि में सेनापति बनाकर भेजा ...संजय यह दृश्य देखकर किंचित उपहासात्मक लहजे में  धृतराष्ट्र से कहते हैं ,'राजन ,देखिये तो मनुष्य की आशा कितनी बलवान है कि अब शल्य पांडवों को जीतने चला है ..' कहाँ भीष्म और द्रोण जैसे महायोद्धा और कहाँ एक अदना सा  सारथि शल्य ...भले ही कौरवों की पराजय हुयी मगर दुर्योधन की जीतने की आशा तो अंतिम घड़ी तक बनी रही ...ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण भारतीय पुराण इतिहास में देखे जा सकते हैं ...



भारतीय जीवन दर्शन तो आशावादिता से भरा ही हुआ है -भले ही यह सच है कि उसमें बहुत सा घोर अतार्किक आशावाद है . हमारे अधिकाँश साहित्य सुखांत है ...अगर मनुष्य का मस्तिष्क ऐसा न होता तो प्रायः पूरी प्रजाति ही थक हार कर बैठ जाती...कोई प्रयास ही न करती ...कोई उद्यम ही न करती ....मगर केवल आशावादिता ही पर्याप्त नहीं है उस दिशा में प्रयत्न भी किये जाने चाहिए -ज्ञान विज्ञान के अकूत भारतीय वांगमय बार बार यह बताते रहे हैं  ..गीता तो मनुष्य के कर्म को ही प्रधान मानती है ...भगवान में आस्था भी मनुष्य की  आशावादिता का ही एक रूप है ...सब कुछ ख़त्म हो गया है मगर एक सर्व शक्तिमान तो है जो सब कुछ ठीक कर देगा ..इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में ठीक कर देगा ...फिर चिंता की क्या बात ...संतोष रखिये... होयिहें वही जो राम रचि राखा .... कुतर्क मत करो ईश्वर पर भरोसा रखो ...यह प्रबल आशावादिता नहीं तो और क्या है ?  और यह आशावाद भले ही अतार्किक हो मनुष्य जाति का परचम बुलंद रखने में इसका बड़ा योगदान रहा है ...

कभी कभी सोचता हूँ मेरे जैसे वे सभी लोग कितना बदनसीब हैं जिनके पास आस्था का कोई ऐसा आधार नहीं है.जो नास्तिक हैं ,अज्ञेयवादी हैं ..ईश्वर जैसी सत्ता में जिनका विश्वास नहीं है ...जीवन की कतिपय बड़ी विपदाओं के समय उत्पन्न   निराशा के समय इनके पास खुद अपनी इच्छाशक्ति के  अलावा  आशा और विश्वास का कोई अतिरिक्त आधार नहीं होता ....कितने अकेले और असहाय से नहीं हो जाते हैं ऐसे लोग? तमाम अन्यायों और दुश्वारियों का मुकाबला इन्हें खुद अपने दम पर करना होता है ..इनके मस्तिष्क के अग्र  गोलार्ध में स्थित आशावादी केंद्र ही ऐसे में उनकी मदद करता होगा! 

रहीम का एक दोहा याद आ रहा है-रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन का फेर ,जब अइहें नीक दिन बनत लगिहें देर ...यह हमारा आशावाद ही तो है जो कवियों की वाणी बन गया है ...एक शायर ने मौत के वजूद की भी अनदेखी कर दी ..कहा -मौत से आप नाहक परीशां है आप जिन्दा कहाँ है जो मर जायेगें :) लीजिये जनाब यहाँ तो मौत को भी हंसी मजाक समझ लिया गया ...

..तो मित्रों ,आशा ही जीवन है और निराशा है मृत्यु  और यही है मूलमंत्र मनुष्य के जीवन की सार्थकता का ....





52 टिप्‍पणियां:

  1. ... मृत्योर्मामृतम् गमय! आशा बचनी ही चाहिये! और फिर संकल्प का बीज आशा की किरण होने पर ही कर्म और फल में पल्लवित होता है। आशा के बिना जीवन में सुगन्धि कहाँ! एक ईमानदार विमर्श।

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  2. नैराश्य में जीने वाला व्यक्ति जीता ही कब है...

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  3. .
    .
    .
    आशा ही जीवन है और निराशा है मृत्यु और यही है मूलमंत्र मनुष्य के जीवन की सार्थकता का ....

    सही है कबहुं न तजिये आस... :)

    एक दिन जरूर ऐसा आयेगा कि जब धरती का हर इंसान मस्तिष्क के अग्र गोलार्ध में स्थित आशावादी केंद्र से ही शक्ति लेगा बजाय खुद के गढ़े 'सर्वशक्तिमानों' से... इसी आस में जी रहे हैं हम तो... :(



    ...

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  4. मृत्यु मुझे निराशा नहीं देती..जीवन के बाद फिर से एक नई आशा का द्वार खोलती है...

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  5. हृदय रोग से पीडित, अशांत, अनिद्रा के रोगी, डिप्रेशन के मरीज, यहां तक कि छोटी छोटी बीमारी हाजमा आदि की का गहन अध्ययन किया जाये तो रोगी कहीं न कही निराशा से पीडित पाया जायेगा। इस लिये कर्ता अकर्ता अन्यथा कर्ता उसे मान कर और समर्पण भाव से रहना बताया गया है कि किसी तरह व्यक्ति आशावान बने । आपने तो इस बात को उदाहरण सहित ही समझा दिया है। लेख पढने लायक भी और समझने लायक भी और मानने लायक भी

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  6. भविष्य साथ है हमारे, तभी तो हर दिन एक नया जीवन प्रारम्भ रखने का दम रखते हैं हम सब।

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  7. यह तो प्रमाणित है कि आशावाद, मृत्यु से भी लड सकता है। कई लोग मृत्यु सैया से आशावादिता के कारण लौट आते है।

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  8. हम भी आशा में जिये जा रहे हैं।

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  9. पंडित जी!

    ये आशा वास्तव में कमाल की चीज़ है.. बगल वाले घर में बाल बच्चों द्वारा निकाल दिये गये माँ बाप को देखकर भी यही सोचना कि मेरा बेटा ऐसा नहीं हो सकता.. पड़ोसी का घर जलता देखकर भी इत्मिनान में पड़े रहना अपना तो नहीं जलेगा.. देश की दुर्दशा के बावजूद भी यह सोचना कि कोई न कोई अण्णा या बाबा बचा ही लेगा इस देश को.. और आम के पेड़ के नीचे लेटे हुए आम के मुँह में टपकने की प्रतीक्शा में कुत्ते द्वारा मुँह चाटेजाने का विरोध न करना भी आशा है.. दरसल आशा को कई लोगों ने आलस्य का बहाना बना लिया है!! ख़ुद लेटे रह्ना और एक आर्त्त पुकार, हे त्रिपुरारी! रक्षा करो! और सो जाना...

    ख़ैर आखिर में चचा ग़ालिब का आशावाद से भरा निराशावादी शेर:

    तेरे वादे पे जिये हम तो ये जान झूठ जाना
    कि खुशी से मर न जाते, अगर ऐतबार होता!

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  10. यह जगत गतिमय है। उस की गति को जान, समझ विश्वास और आशा दोनों ही नास्तिक के मस्तिष्क में सदैव जीवित रहते हैं।

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  11. झूठी आशा के साथ जीना भी तो खुद के साथ एक छलावा है ।
    ऐसा नहीं है कि नास्तिक लोग बदनसीब होते हैं । बल्कि ज्यादा प्रेक्टिकल होते हैं । कम से कम धोखे में तो नहीं रहते ।

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  12. @सलिल भाई ,
    यही तो इन सारी बिडम्बनाओं और विसंगतियों के बाद भी मनुष्य खुद अपने ताई आशावाद का दामन नहीं छोड़ता !

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  13. अपने एक भाग्यवादी, मगर मेहनती मित्र को किसी भी असफलता में दोष मंगल-राहू पर थोप अगले संघर्ष के लिए जुट जाते देखा है और दूसरे नास्तिक मित्र को असफलता की सारी जिम्मेवारी अपने उपर ले अवसादित हो जाते भी.
    आशा के लिए कोई आधार तो होना ही चाहिए, मगर आलस्य उस आधार की जगह नहीं ले सकता.
    मगर क्या वाकई " मनुष्य का दिमाग ख़ास तौर पर आशावादिता के लिए 'प्रोग्राम्ड' है" - या फिर यह अभ्यास और अनुभव से विकसित की जाने वाली प्रवृत्ति है.

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  14. मेरे जैसे निराशवादी के लिए बहुत बढ़िया आलेख.

    मुझे लगता है की जो लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते वो भी अपने लिए आस्था और आशा का कोई न कोई आधार ढूंढ़ ही लेते हैं. इस दुनिया में बिना सहारे के कोई नहीं टिक पाता.

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  15. सही कहा.....आशा एक गहरी आस्था ही है जो आप दूसरों पर न करें तो अपने अन्दर जीवित रखना पड़ता है. फिर सहस जूनून हो तो सोने पर सुहागा . जैसे आपका ये पोस्ट .....आभार.

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  16. Maut kaa ek din muaiyan hai, neend kyon raat bhar nahin aati .
    Man ke haare haar hai man ke jite jeet ,
    man jite jagjeet .
    Sach hai aas kaa pallu aadmi aakhir aakhir tak bhi nahin chhodtaa ,aas hi chhod jaati hai vyakti ko ,ansunaa karke .
    A very Good write up sir high lighting positivity ,optimism and beauty of the cosmos .Namste Bhaaisaahab (veeru bhai ,Fountain Ville ,PA i.e Pennsilvania ).

    उत्तर देंहटाएं
  17. Maut kaa ek din muaiyan hai, neend kyon raat bhar nahin aati .
    Man ke haare haar hai man ke jite jeet ,
    man jite jagjeet .
    Sach hai aas kaa pallu aadmi aakhir aakhir tak bhi nahin chhodtaa ,aas hi chhod jaati hai vyakti ko ,ansunaa karke .
    A very Good write up sir high lighting positivity ,optimism and beauty of the cosmos .Namste Bhaaisaahab (veeru bhai ,Fountain Ville ,PA i.e Pennsilvania ).

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  18. Arvind sir "Hope and positive thought is now an auxillary medicine in Modern Medicine .".Hope plays the role of a Potent placebo .

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  19. जीवन की सार्थकता का मूलमन्त्र 'आशा' ही नहीं बल्कि उसका खुद में विश्वास भी है.
    मनुष्य का यह विश्वास ,आशा के साथ जुड़ा होता है तभी दुनिया आगे प्रगति करती चलती है.
    कहते हैं 'आशा पलती है..निराशा जलती है'.
    ...............
    **मेरे विचार में १००% नास्तिक तो कोई नहीं होता होगा**

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  20. तभी कहते हैं न ..उम्मीद पर दुनिया कायम है ..

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  21. Zindagee ka anjaam to mrityu hee hai...jis se kaun kab mooh pher paya hai?

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  22. " जो नास्तिक हैं ,अज्ञेयवादी हैं ..ईश्वर जैसी सत्ता में जिनका विश्वास नहीं है ...जीवन की कतिपय बड़ी विपदाओं के समय उत्पन्न निराशा के समय इनके पास खुद अपनी इच्छाशक्ति के अलावा आशा और विश्वास का कोई अतिरिक्त आधार नहीं होता ... "

    आपका यह कथन सत्य है, पर यह भी सच है कि... आशा उस बेल की तरह है..जो सदैव एक सँबल के सहारे की मोहताज़ होती है.... एक भरोसो, एक बल, एक आस विस्वास !
    अनादिकाल से मनुष्य अदृश्य प्राकृतिक शक्तियों में तलाशता आया है, वैदिक काल तक यही था । उसने अपरिभाषेय सर्वशक्तिमान सत्ता को अपना सँबल बनाया ।

    कालाँतर में पौराणिक युग के आस-पास हमने और विभिन्न देवी देवताओं को और उनके मूर्ति विग्रहों को गढ़ लिया । बहुसँख्यक अशिक्षित जनता के लिये यह आसान रास्ता था ... यहीं पर घोर अतार्किक आशावाद का प्रादुर्भाव हुआ होगा ।

    ( यह मेरे निजी विचार हैं, सुधार की सँभावनाओं का स्वागत है )

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  23. कठिन दिनों में आशा ही संभावनाओं की राह दिखाती है , घोर तार्किकता में भी कही न कही आशा छिपी ही होती है ..दो- तीन दिन पहले मालवीय नगर अंडरपास से गुजरते पानी के तीव्र बहाव में एक कार फंस गयी ...कार सवार काफी देर तक दूर खड़े लोगों से मदद की गुहार करता रहा , आखिर खुद ही हिम्मत कर किनारे तक पहुंचा , इस दौरान किनारे खड़े लोंग उसे आस बंधाते रहे और किनारे पहुँचने पर हाथ बढाकर उसे बाहर खींच लिया , किनारे खड़ी भीड़ के सहारे यदि उसने प्रयास नहीं किया होता तो डूबना निश्चित था और किनारे खड़े व्यक्ति ने अगर हाथ ना पकड़ा होता तो भी डूब ही जाता ...

    आप नास्तिक हैं , ईश्वर को नहीं मानते मगर राम , कृष्ण को मानते हैं , तुलसीदासजी के प्रशंसक है जिसने जीवन राम को ही समर्पित किया !

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  24. आशा ही जीवन का आधार है , निराशा वादी व्यक्ति जीवन के आनंद से खुद तो दूर रहता ही है मित्रों और सम्बंद्धियों को भी अनचाहे में कष्ट देता है !
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  25. आशाओं के यही थपेड़े तो ज़िन्दगी को आगे बढ़ाते हैं....
    वरना ज़िन्दगी भी ठहरे हुए पानी की तरह हो जायेगी जो कुछ दिनों बाद किसी काम का नहीं रहता....

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  26. @अभिषेक जी ,
    आप दिए हुए लिंक की पूरी स्टोरी पढ़ें अगर समय मिले तो ..
    मनुष्य के मस्तिष्क के अग्रभाग में रोस्ट्रल एन्टेरियर सिंगुलेट कार्टेक्स और एमायिग्देला ऐसी दो संरचनाएं हैं
    जो बहुत आशावादी संवेगों/स्फुलिंगों को निःसृत करती रहती हैं ..आशावाद मनुष्य की वैकासिकता से जुडा हुआ है .
    @प्रवीण शाह जी ,
    हाँ तभी तो मनुष्य ऐसी पराशक्तियों और अतार्किक आशावाद के चक्कार में पड़ा रहता है -यह सब करतूत ऊपर इंगित दोनों संरचनाओं का है ...
    @वर्ज्य नारी स्वर ...
    अभी कल ही तो चीनी मिली थी न ..अब रोज रोज चीनी! मधुमेह नहीं हो जाय :)
    आगे भी मिलेगी वादा रहा !

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  27. @वाणी जी,
    नास्तिक होने का यह मतलब कतई नहीं है कि मैं अपने गर्वित अतीत और संस्कृति से विमुख हूँ ...
    मैं ईश्वर के किसी भौतिक रूप काया-सशंख चक्रम सक्रीट कुण्डलं ...को भले नहीं मानता मगर एक
    अलौकिक सत्ता और परम सत्य को समझने बूझने के आह्लाद और रोमांच से कहाँ वंचित होना चाहता हूँ -
    इसलिए मुझे वाल्मीकि ,तुलसी और सूरदास ,कबीर सभी अच्छे लगते हैं क्योकि उस परम सत्ता को
    समझने बूझने और जन जन तक उन्हें साक्षात करने में अपने अपने तई इन्होने जो अवदान दिया है वह
    अद्भुत है ,अनिर्वचनीय है ...

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  28. @अल्पना जी
    **मेरे विचार में १००% नास्तिक तो कोई नहीं होता होगा**
    बिलकुल ...सहमत हूँ !

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  29. लिंक के माध्यम से विस्तृत जानकारी मिली. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  30. आशा' को एक दूसरे अर्थ में शास्त्र ने 'आशा को गतः' कहकर उससे सावधान रहने की छिपी सीख दी है. 'संतोष' को परम धन बतलाया है.
    वहाँ 'आशा' का अर्थ 'इच्छा' से लिया गया है.
    "सौ वाला हज़ार चाहता है, हजार वाला लाख चाहता है, लाख वाला करोड़, करोड़ वाला राजा (मनमोहन) होना चाहता है, राजा भी असली राजा (सोनिया पद) पाना चाहता है. असली राजा भी जगत पालक (जगत लुटेरा) हो जाना चाहता है..... इसलिये कहा गया है कि आशा का कहीं अंत नहीं."
    यदि इस सन्दर्भ का संस्कृत श्लोक मिल जाता तो अवश्य देता. पूरा याद नहीं आ रहा.

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  31. इस आशा पर तो मेरा सब कुछ दांव पर लगा हुआ है :)

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  32. सच है कि आशावादी के हाथ में भविष्य तो है। तभी तो शायर ने कहा है- गम की अंधेरी राम मे, --- सुबह ज़रूर आएगी, सुबह का इंतेज़ार कर :)

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  33. आशावाद को लेकर बढ़िया लेख। लिंक से अतिरिक्त जानकारी मिली।

    कबीर साहित्य तो सद्व्यवहार की खान हैं, उन्हें पढ़ते हुए आनंद आता है।

    रहीम को पढ़ते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि बहुत जगह रहीम ने दैनंदिन जीवन को जहां एक ओर सरल सहज ढंग से समझाया है तो कहीं कहीं प्रेम रस को जीवन रस से पिरोते समय वह कुछ ज्यादा ही बोल्ड हो गये हैं। बाकि ढेर सारे उनके उपयोगी दोहे हैं ही।

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  34. .
    @ प्रतुल वशिष्ठ said...

    क्षमा करें, वशिष्ठ साहब !
    मैं आपकी टिप्पणी से असहमत होने की अनुमति चाहूँगा... क्योंकि मेरी दृष्टि में आपकी टिप्पणी मूल पोस्ट को नकारात्मक राह पर ले जा रही है.. ’ आशा को गतः’ और ’ सँतोष परम धन’ का सँदर्भ हमारे वर्तमान विमर्श का विषय नहीं है ।
    सौ वाला हज़ार चाहता है... जैसे उदाहरण लिप्साजनित अपेक्षाओं से भले ही परिभाषित हो लें.. परन्तु इन्हें आशा अथवा इच्छा से जोड़ कर देखना असँदर्भित होगा । इसे आप Hope और Expectation से फ़र्क करके समझ सकते हैं... You can expect to become a millionare... but driving force behind it may be hope.. and on other hand ..it may not be related to it !
    आशायाः ये दासास्ते दासाः सर्वलोकस्य ।
    आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥

    यहाँ आशा पूरी तरह Desire या इच्छा को लेकर सँदर्भित किया गया है । जबकि गुरुकुल सुभाषित यह सिखाते हैं, कि...
    क्षुध् र्तृट् आशाः कुटुम्बन्य मयि जीवति न अन्यगाः।
    तासां आशा महासाध्वी कदाचित् मां न मुञ्चति ॥

    भूख, प्यास और आशा मनुष्य की पत्नियाँ हैं जो जीवनपर्यन्त मनुष्य का साथ निभाती हैं। इन तीनों में आशा महासाध्वी है क्योंकि वह क्षणभर भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती, जबकि भूख और प्यास कुछ न कुछ समय के लिए मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं।
    साथ ही यहाँ आपकी टिप्पणी में मनमोहन और सोनिया का उल्लेख आश्चर्यचकित करता है !

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  35. डॉ. अमर जी,
    आपने मेरी विषयांतर टिप्पणी पर अपनी स्वस्थ राय दी. मुझे भी भान था कि मैं 'आशा' के दूसरे पक्ष की बात लिख रहा हूँ. जिस उत्तर की 'आशा' मुझे आदरणीय सतीश जी से थी उसे आपने पूरा किया. यही तो स्वस्थ विमर्श का परिचायक है. चर्चा यदि बहुकोणीय होती है तो वह वृहत उद्देश्य को पूरा करती है. मेरे मन में बीस वर्षों से आशा का दूसरा पक्ष प्रभावी था सो मैंने कहा.. इसका मतलब यह नहीं कि मुझे पहले (उजले) पक्ष से कोई एतराज है. आशा के उजले पक्ष का विस्तार तो सतीश जी पहले ही कर चुके थे.... उससे मेरी असहमती नहीं है.... फिर भी गुरुजनों से बौद्धिक छेड़खानी करने में आनंद लेना ही मुझे रुचता है.
    दूसरी बात, सोनिया और मनमोहन के नाम तो इसलिये लिये कि वे 'आशा' के दूसरे पक्ष के अच्छे उदाहरण बन गये हैं. 'आशा' का दूसरा पक्ष समझाने के लिये इन दोनों के नाम लेना जरूरी सा समझा.

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  36. जिस उत्तर की 'आशा' मुझे आदरणीय सतीश जी से थी उसे आपने पूरा किया
    @@ उपर्युक्त वाक्य में मैंने 'आशा' का एक तीसरा अर्थ 'अपेक्षा' लिया है.

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  37. @ प्रतुल वशिष्ठ,
    विद्वानों की कही बातों के कई अर्थ और उद्देश्य होते हैं ऐसे में न बोलना भी गलत नहीं है गुरुवर !
    डॉ अमर कुमार जब विस्तार में बात करते हैं तो तब आगे बात करने की संभावना बहुत कम हो जाती है ! कई बार उन्हें मुग्ध होकर पढना अच्छा लगता है ! मैं यहाँ उनसे सहमत हूँ !
    :-)

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  38. @डॉ अमर जी ,प्रतुल जी .
    यहाँ उस आशा से मतलब था जो बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य
    को यह अहसास दिलाती रहती है कि 'सब कुछ ठीक हो जाएगा " और यह मनुष्य प्रजाति के साथ जन्मजात है .
    यही नए शोध अध्ययन भी बताते हैं --जापान का उदाहरण सबसे मौजू है !
    आभार !

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  39. आदरणीय अरविन्द जी,
    सम्पूर्ण रूप से सहमत. आपने दुर्योधन-शल्य दृष्टांत से जिस आशा को उदघाटित किया है. उससे श्रेष्ठ कुछ हो नहीं सकता.
    किन्तु पढ़कर और उससे सहमत होकर मैं बात को वहीं समाप्त नहीं करना चाहता था. इसलिये कुछ विषयांतर कहा.
    मैं काफी समय से 'सतीश सक्सेना जी पोस्टों का विशेष अध्ययन कर रहा था इस कारण उनके बादल मानस पर चाहए हुए थे... अपनी पिछली दो टिप्पणियों में आपका नाम लेने की बजाय 'सतीश जी' का नाम ले गया. भूल हुई... किन्तु 'सतीश जी ने आकर बात संभाल ली और मेरी भूल नज़रंदाज़ हो गयी. फिर भी आपने 'आशा' का अच्छे से विस्तार किया है... मैंने तो मात्र जिज्ञासावश विद्वता-घट को छेड़खानी की थी.

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  40. डॉ अमरकुमार और प्रतुल जी की वार्ता में आनन्द आया। ऐसे विचार-विनिमय चलते रहें, यही आशा है।

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  41. आशा-यन देखकर याद आया , लीजिये आपौ-जन सुनें :
    http://www.youtube.com/watch?v=TAsrjRF5BfY&feature=related

    वैसे टीपक-विशेष से काव्यात्मक-वीर्यपात की आशा(जो जगह-विशेष पर खूब दिखती/जंचती भी है) भी 'आशा' का एक ही प्रकार है ;-)

    उत्तर देंहटाएं
  42. .
    .
    .
    @ " वैसे टीपक-विशेष से काव्यात्मक-वीर्यपात की आशा "

    ओह अमरेन्द्र,

    आप तो ऐसे न थे... ;)

    वैसे 'श्रंखलाबद्ध टिप्पणी-पात' क्या एक सही शब्द प्रयोग है, बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ जानकारी के लिये...


    ...

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  43. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  44. @ प्रवीण शाह जी ,
    हा हा हा
    बिलकुल जी , समीकरण जैसा ही समझ लेवें;
    श्रंखलाबद्ध टिप्पणी-पात = काव्यात्मक-वीर्यपात + ''आशा''
    'आशा' शब्द रखना जरूरी है, नहीं तो अप्रासंगिकता आयेगी और अन्विति का अभाव भी!! ;-)

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  45. सबको पढ़ने के बाद मै क्या कहूँ वैसे आशावादी होने में कोई हानि नहीं दिखती ....

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  46. आशा ही जीवन है और निराशा है मृत्यु ....

    सदैव याद रहेंगें ये शब्द .....

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  47. इंसान सब कुछ छोड़ देता है तब भी आशा साथ नहीं छोडती. वैसे लाइटर मूड में मुझे आशा से किसी 'आशा' की भी याद आ गायी. उस हिसाब से मुझे लगता है कि इंसान आशा छोड़े ना छोड़े आशा इंसान को छोड़ सकती है :)

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  48. क्या बात है अभिषेक जी !:)किस आशा आने छोड़ा आपको ? बतायें अभी खोज खबर लेते हैं !

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