मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

एक अजूबा यह भी-दास्तान एक विषखोर पक्षी की .....सोनभद्र एक पुनरान्वेषण (3)

कुदरत के करिश्में भी गजब होते हैं -अभी परसों के दैनिक जागरण अखबार के सोनभद्र संस्करण में एक रोचक खबर पढी . धनेश पक्षियों द्वारा कुचिला के बीज खाये जाने की तो चौक उठा -कारण कुचिला वृक्ष का फल/बीज बहुत विषैला होता है। कुचिला वृक्ष लोगेनियेसी (Loganiaceae) कुल का है और जिसे स्ट्रिक्नोस नक्स-बोमिका (Strychnos nux vomica) कहते हैं।कुचिला बहुत विषैला होता है। क्योंकि इसमें स्ट्रिक्नीन और ब्रूसीन दो तीव्र जहरीले ऐल्कालायड रहते हैं। अगर कोई बड़ा जानवर भी इसे खा ले तो वह निश्चित मर ही जायेगा . मगर धनेश इसे चाव से खाते हैं और उन पर इनका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता . धनेश पक्षी इसके बीज को बिना कवच तोड़े समूचा निगल लेते हैं। यही कारण है कि कुचिला के विषैलेपन का प्रभाव इन पर नहीं पड़ता।
 कुचिला  फल और फूल 

सोनभद्र के पुनरान्वेषण श्रृंखला की  एक पोस्ट में मैंने लोकनायक लोरिक की गाथा के दौरान स्थानीय अगोरी किले और कुचिला  का जिक्र किया था जहाँ आज बसरा देवी का मंदिर भी है . वहां कुचिला के वृक्षों में फूल और फल लग गए हैं जिन्हें धनेश पक्षियों द्वारा चाव से खाए जाने की खबर है . यह एक अद्भुत सहजीवी सम्बन्ध है -कुचिला के फल धनेश पक्षियों को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाता और बदले में इसे धनेश पक्षी के नियंत्रित पाचन क्षमता से यह उपहार मिलता है कि इसके बीज का कवच नरम पड जाता है जिससे इनके अंकुरण में सहजता हो जाती है . मतलब इन दोनों प्राणियों -एक जंतु दूसरी वनस्पति के बीच एक अद्भुत सहजीवी सम्बन्ध है। अब सोचिये अगर धनेश पक्षी लुप्त हो जाएँ और जो वे तेजी से हो रहे हैं तो क्या होगा? एक दिन कुचिला की प्रजाति लुप्त हो जायेगी। पारिस्थतिकी सम्बन्ध ऐसे ही होते हैं . सारे जीव जंतु ऐसे ही ज्ञात अज्ञात रिश्तों के अदृश्य धांगों से बंधे हैं -यह पारिस्थितिकी विवेक मनुष्यों में जागृत हो रहा है और इस दिशा में आम लोगों की पहल के शुभ संकेत पिछले दशकों से मिलने लगे हैं -चाहें वे पहाड़ के चिपको आन्दोलन हों या फिर केरल की घाटी का अप्पिको आन्दोलन या फिर विश्नोई समाज का हिरनों -मृगों के प्रति अनन्य प्रेम ..

 मुझे खुशी हुयी कि अगोरी के आस पास के लोगों में धनेश पक्षी को न मारने देने की मुहिम यहाँ के निवासी श्री शिवनन्दन खरवार जी ने ग्राम सभा द्वारा एक आम सहमति के प्रस्ताव के जरिये चला रखी है जिसमें धनेश पक्षी को मारने पर पांच सौ का जुर्माना भी है . धनेश पक्षियों का बड़े पैमाने पर शिकार इसकी चर्बी से निकलने वाले कथित औषधीय गुणों के कारण होता रहा है . अगर इनकी रक्षा नहीं हुयी तो अगोरी किले के समीप के अब मात्र पचास की संख्या में बचे कुचिला के वृक्षों का  आगे फैलाव रुक जाएगा।इन विषय पर पर्यावरण प्रेमियों का ध्यान आकर्षित करना भी  इस पोस्ट का उद्येश्य है -ख़ास तौर पर वन विभाग का भी जो धनेश पक्षी की वंश संरक्षा के कड़े उपाय कर सकता  हैं।
मुझे है पता है कि कैसे मारिशस के विशालकाय डोडो पक्षियों के विलुप्त हो जाने से कैवेलेरिया पादप प्रजाति का समूल नाश हो गया . इस प्रजाति के वृक्षों के बीज का कठोर कवच भी इन्ही डोडो पक्षियों की जठराग्नि में नरम पड़ता था और अंकुरण सहज हो जाता था -डोडो गए फिर यह पादप प्रजाति भी धरा से लुप्त हो गयी .यही कहानी ब्राजील और कुछ अन्य देशों की है जहाँ कतिपय पक्षी प्रजातियों के  ख़त्म कर देने से कई फलदार वृक्ष भी कालान्तर में लुप्त हो गए। दुर्भाग्य से यह दुखद गाथा अभी भी विश्व के अनेक भागों में दुहराई जा रही है -भारत भी उनमें एक है। 
मुझे हाथियों और कपित्थ (कैंत= Elephant apple) फल -वृक्षों के रोचक अंतर्सबंध की भी जानकारी  है . हाथी को कपित्थ बहुत पसंद है .गणेश जी की प्रार्थना में वो संस्कृत का श्लोक है न "कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणं" . हाथी कपित्थ के कठोर कवच वाले फलों को समूचा निगल जाते हैं -मगर बिना फल को पचाए अपने व्यर्थ के साथ बाहर कर देते हैं . निश्चय ही इससे कपित्थ के फलों के अन्दर बीज को अंकुरित होने में सहजता होती होगी .इधर कपित्थ के पेड़ भी तेजी से कम हो रहे हैं . क्या इसका कारण हाथियों की तेजी से घटती संख्या तो नहीं है -मुझे इस विषय पर किसी भी शोध की जानकारी नहीं है .आपमें किसीको हो तो जरुर बताईयेगा। यह पर्यावरणीय शोध का एक अच्छा विषय हो सकता है .
कोई आगे आएगा ?


46 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया जानकारी...रोचक प्रस्तुति...
    मगर कैथ जिसे हमारे यहाँ कबीट कहते हैं(?)कहाँ विलुप्त हो रहा है...
    यहाँ मध्यप्रदेश में तो खूब वृक्ष हैं इसके...शहर के भीतर भी...
    हाँ संख्या कम हुई हो तो ज्ञात नहीं.

    सादर
    अनु

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    1. अभी हाथी ही कहाँ विलुप्त हुए हैं अनु जी ?

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  2. "परस्परोपग्रहो जीवानाम्" प्राचीन सिद्धाँत है,जीव न केवल एक दूसरे पर निर्भर है बल्कि एक दूसरे के जीवन चक्र मेँ भी सहायक है.

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  3. यह जानकरी बिलकुल नई है मेरे लिए पर इतना तो समझ ही सकते हैं कि पर्यावरण की हर इकाई परस्पर निर्भरता तो है ही.... शायद कोई कड़ी जुड़ी हो

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  4. बहुत अच्छी और नयी जानकारी. मुझे वैज्ञानिक लेख तो वैसे भी अच्छे लगते हैं. पर महाराज, ये तो बताइए कि यहाँ विज्ञान लेख लिखेंगे तो साई
    ब्लॉग को शिकायत नहीं हो जायेगी ?

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    1. महारानी, मुझसे ज्यादा तो आपको फिक्र है साईब्लाग की :-) कोई पुराना आग्रह ? व्यामोह?? :-)

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    2. है ना, आपको पता है :) पाँच साल पुराना नाता है...ब्लॉग लिखने-पढ़ने से बहुत पहले से वो ब्लॉग पढ़ रहे हैं हम.

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  5. होम्योपैथी की जानी मानी दवा शायद इसी फल की देन है !
    पर्यावरण की रक्षा एवं दुर्लभ पौधों के बचाव में पक्षियों के योगदान की रोचक जानकारी प्राप्त हुई !

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    1. होम्योपैथी में नक्स वोमिका नाम से और आयुर्वेद में इसे शोधित करने के बाद कई विकारों में इस्तेमाल में लाया जाता है!

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    2. शायद नहीं आपने सच कहा ...
      नक्स वोमिका , बेहद मशहूर गुणवान दवा है ..

      नेतृत्वगुण युक्त,तेज तर्रार,चिडचिडे,कार्यशील,लम्बे समय तक आफिस में कार्यरत रहना , मस्तिष्क थकावट,दूसरों में दोष निकालने वाला/वाली, भौतिक सुखों की चाह,चटपटे भोजन एवं शराब, नशे आदि के शौकीन लोगों के लिए यह दवा नया जीवन दे सकती है !

      शर्त है कि व्यक्तित्व ऊपर दिए स्वभाव जैसा होना चाहिए ! विभिन्न प्रकार के शरीरदर्द, अजीर्ण, पेट के बीमार,किडनी, लीवर आदि का उपचार इसके ज़रिये संभव हैं !

      डॉ अरविन्द मिश्र के कमर दर्द में यह उपयोगी होगी !

      शुभकामनायें

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  6. सार्थक और प्रेरक जानकारीपूर्ण चिंतन.

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  7. एक दम नयी और रोचक जानकारी इस पर शोध अपेक्षित है।

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  8. रोचक प्रस्तुति...

    आप भी पधारें
    ये रिश्ते ...

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  9. बहुत ही रोचक जानकारी की प्रस्तुति,आभार.

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  10. रोचक परन्तु जागृत करती पोस्ट ... प्राकृति ने सामजस्य बैठाया हुवा है तभी शायद पृथ्वी है करोड़ों वर्षों से ... पर जितनी तेज़ी से मानव का विकास हो रहा है प्राकृति का उतना ही विनाश हो रहा है ... कहीं प्राकृति जल्दी ही करेक्शन न कर ले ...

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  11. दुर्लभों को न बचायेंगे तो प्रकृति हमें कभी क्षमा नहीं करेगी।

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  12. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 02/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  13. अद्भुत पारिस्थितिक संबंध। प्रकृति में एक दूसरे से जुड़ाव के प्रति और भी संवेदनशील होने की जरूरत है।

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  14. दुर्लभों को बचाने के लिए अब कुदरत तो कोई करिश्मा करने वाली नहीं है तो आप जैसे ही सबों को जगा सकते हैं और बता सकते हैं इनका महत्व..

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  15. - ओह !!
    बहुत चिंताजनक तथ्य बताये आपने ....

    इस तरह से तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि कोई कोई पादप किसी एक ही प्रजाति के जंतुओं के द्ववारा अपने बीजों को दूर पहुंचा सकते होंगे । ....

    इस स्थिति का कोई उपाय नहीं हो सकता ? :( :(

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  16. research ka to pata nahin par ye dekhiyega: http://en.wikipedia.org/wiki/Kopi_Luwak

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    1. आपने नयी जानकारी दी -बहुत आभार !

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  17. आपने बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी है
    कुचिला वृक्ष के बार में अभी अध्ययन किया तो मालुम चला ये तो अत्यंत उपयोगी वनस्पति है !

    Strychnos nux vomica is recommended for upset stomach, vomiting, abdominal pain, constipation, intestinal irritation, hangovers, heartburn, insomnia, certain heart diseases, circulatory problems, eye diseases, depression, migraine headaches, nervous conditions, problems related to menopause, and respiratory diseases in the elderly. In folk medicine, it is used as a healing tonic and appetite stimulant. Nux vomica is a common homeopathic medicine prescribed for digestive problems, sensitivity to cold, and irritability. The senses of smell, touch, hearing and vision are rendered more acute, it improves the pulse and raises blood pressure and is of great value as a tonic to the circulatory system in cardiac failure. It is used in pruritis and as a local anodyne in inflammations of the external ear. The powdered seeds are employed in atonic dyspepsia. The leaves are applied as a poultice on sloughing wounds and ulcers. They are also used in the preparation of medicated product for the hair and scalp.

    सचमुच विचारणीय विषय है
    आपका आभार

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  18. आज की पोस्ट तो साइंटिफिक ब्लॉग पर जानी चाहिए थी, ज्ञान वर्धक पोस्ट.

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    1. दीपक जी -वहां आप शायद न आते :-) बस यही कारण है!

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  19. यह गुत्थी समझ नहीं आने वाली।
    वैसे कोबरा सांप भी ज़हर मूंह में लिए घूमता है बेफिक्र।

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  20. रोचक जानकारी. अपने यहाँ की वृक्षों का भी जवाब नहीं. नीम का उदहारण याद आ रहा है. औषधीय गुण तो हैं ही साथ ही तीन दशक से ज्यादा हो गए हैं इसके रासायनिक संरचना का पता चले लेकिन अभी तक रसायनशास्त्री इसका पूर्ण संश्लेषण नहीं कर पाए है. इसकी रासयनिक सरंचना बहुत जटिल है.

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  21. अरविन्द भाई साहब इस परम सूक्ष्म लेख नहीं शोध कथा के लिए प्रणाम स्वीकारें लम्बे समय से मैं और आदरणीय राहुल सिंह जी श्री राजेश सिंह जी [तथागत] आपस में विलुप्त होते गिद्धों के बारे में विचार विमर्श कर रहे थे आपके लेख ने लिखने को दिशा दी आभार .शुभ प्रभात

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    1. @ विलुप्त होते गिद्धों के बारे में...

      गंभीर और चिंताजनक विषय पर आपके लेख का इंतज़ार रहेगा रमाकांत सिंह जी ..

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  22. सहजीवन ,परस्पर जीवन संवर्धन पर बेहतरीन पोस्ट जो सिम्बियोतिक लिविंग का मतलब खोलके समझाती है .आभार आपकी टिपण्णी का .आपकी टिपण्णी हमारी शान .

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  23. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  24. अद्भुत है कुचिला और धनेश की यह गाथा।

    काश, इस सहजीवन से कुछ सीख मनुष्‍य भी ले पाता...

    .............
    सिर चढ़कर बोला विज्ञान कथा का जादू...

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  25. यहाँ तो आलम यह है ,बीज निगम ही शोध करता हैं वहीँ की परिश्तिथियों में ट्रायल होते हैं .भारत तो इनका प्रवक्ता बना हुआ है ,दिग्विजय सिंह सा .पर्यावरण पर आपकी चिंता वाजिब है पृथ्वी का हरेक प्राणी परस्पर किसी न किसी विध अवलंबित है .शूकर की पीठ पे बैठा काग उसका मित्र बन जाता है उसके कान की सफाई कर देता है .प्रकृति परस्पर सहजीवन की मिसाल से भरी परी है।बस आदमी ही आदमी को खा रहा है .

    हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी ,जिसको भी देखना बार बार देखना .

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  26. सहेजने लायक सुन्दर और ज्ञानवर्धक पोस्ट |सर आभार आपका |

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  27. Peculiar article, just what I wanted to find.


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  28. बहुत ही बढ़िया जानकारी के साथ ज्ञानवर्धक प्रस्तुति ...

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  29. नयी जानकारी मिली.
    ज्ञानवर्धक पोस्ट है ,अच्छी लगी.

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  30. किसी भी पर्यावरण एवं प्रकृति प्रेमी को यहाँ आ कर सार्थक ही महसूस होगा ... सार्थक एवं विचारणीय आलेख ...

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  31. प्रकृति में पारस्परिक निर्भरता को रेखांकित करता ज्ञानवर्धक आलेख. आभार.

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  32. बेहद नई सूचना हासिल कर पाया हूं

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