शनिवार, 21 जनवरी 2012

ब्लॉग जगत में एक अदद उद्धव की तलाश!

अब आप तो यह बात जानते ही हैं कि प्रेम का इज़हार कर पाने में कुछ लोग पैदाईशी कमज़ोर किस्म के होते हैं ...मतलब मिलो न मुझसे दिल घबराए मिलो तो आंख चुराए वाला मंज़र ..काजल कुमार और अभिषेक ओझा या देवांशु निगम सरीखे दीगर नौजवान लोग मेरी इस बात से इत्तिफाक नहीं करेगें मगर हम उस पीढी के हैं जब इजहारे इश्क को लेकर बड़ी जहमत होती थी ....लोग कह नहीं पाते थे मगर लम्बी लम्बी चिट्ठियाँ आहें भर भर कर जरुर लिख डालते थे और अक्सर यह भी हो जाता था वे गंतव्य तक न पहुच कर किसी रकीब या माशूका के पहलवान भाई आदि को मिल जाती थीं और बड़ा गुल गपाड़ा होता था ....अब आज शार्ट मेसेज सर्विस वाली पीढी शायद इजहारे इश्क को उतना तवज्जो नहीं देती या फिर बाकी का काम पहले ही निपटा कर बाद में जरूरत के मुताबिक़ इज़हार वैगेरह किया तो किया और न किया तो न किया, जैसा फार्मूला जो  अपने अनूप शुकुल जी टिप्पणी देने के मामले में करते हैं ....को अंजाम देती है .... 

काफी नामी गिरामी शायर या ग़ज़ल गायक भी इजहारे इश्क को लेकर काफी संजीदा रहे हैं ...जेहन में मेहदी हसन की वह ग़ज़ल अभी गूँज रही है ..बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी .....आखिर यह मुश्किल क्यों आन पड़ती है? मैंने खुद भी ऐसा शिद्दत के साथ महसूस किया है और दूसरों के मामले में भी देखा है कि कितनी ही साफगोई बरतने वाले ,खरी खरी मुंह पर सुना देने वाले मुहब्बत का इज़हार करने में टोटली फेल हो रहते हैं ....फिल्मों ,उपन्यासों में कई ऐसे बिचारे चरित्र नायकों के आख्यान भरे पड़े हैं.. और ऐसे मौकों पर भरोसेमंद दोस्त काम आते हैं और कभी तो वे भी ऐसा वाकया कर गुजरते हैं कि दुश्मन भी उनसे बेहतर लगते हैं ..लगता है भूमिका लम्बी खिंच रही है ....यह भी एक दिक्कत ही है इज़हार करने की ....बहरहाल ....

कभी कभी मुझे लगता है कि किशन कन्हाई के साथ भी कुछ ऐसा ही लफड़ा रहा होगा ..इजहारे इश्क में पूरी तरह फेल वे अपनी बासुरी का सहारा लेने पर बिचारे मजबूर होते थे.....लेकिन इससे मुश्किलें ही बढती गयीं ...कईयों को यह इल्म हो गया कि किशन कन्हाई तो असली वाला इश्क केवल उन्ही से करते हैं ....किस्सा कोताह यह कि उनकी अभिव्यक्ति की इस दिक्कत के चलते उनके इर्द गिर्द तमाम ऐसी भीड़ जुड़ने लगी जिसे वे बिलकुल भी नहीं चाहते थे मगर यहाँ भी कह नहीं पाते थे...अपने हाव भाव से यह जरुर दिखाते थे कि कोई एक ही उनकी चाहत है मगर यह भी उनका दिखावा मान लिया जाता था ...छलिया किशन ....और सब जन यही सोचती रहती थीं कि असली वाली मुहब्बत तो कान्हा  उन्ही से करते हैं ...मामला जब काफी संगीन हो गया तो किशन कन्हाई रोज रोज की चख चख से घबरा कर द्वारिका की ओर  रुख कर गए ...मगर मुसीबत ने यहाँ भी उनका दामन नहीं छोड़ा ...बिचारे  अपने एक विश्वसनीय मित्र उद्धव को अपनी असली वाली को प्रेम सन्देश के लिए नियुक्त किये ..गोकुल भेजे भी मगर यहाँ फिर वही मुसीबत ...हर गोपी यही समझे कि गोपेश्वर ने बस उन्ही के लिए सन्देश भेजा है .....उद्धव बिचारे की पूरी फजीहत हो गयी ..वो किस्सा तो आप सब जानते ही हैं ....यहाँ भी यही लगता है कि उद्धव बिचारे खुद भी अभिव्यक्ति -पटु नहीं रहे होंगे शायद और इसलिए मिशन में पूरी तरह असफल रहे ...सन्देश की डिलेवरी सही सही और सही गोपी तक नहीं पहुंचा पाए ....

मेरे जैसे अभिव्यक्ति -पंगु के लिए आज भी एक वाक्पटु उद्धव की तलाश जारी है और शायद यह एक शाश्वत खोज है .....

40 टिप्‍पणियां:

  1. @ मेरे जैसे अभिव्यक्ति -पंगु ,
    भयंकर , भीषण , हाहाकारी कथन :)

    @ उद्धव की तलाश ,
    अभिव्यक्तिपटु उद्धव तो हैं पर आप ही उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दे रहे हैं सो खाली रह रह के स्वयं ही गोपियों के चक्कर में पड़ गये हैं ! पुरानी का लिख लिख के नईकियों पे जाल फेंक रहे हैं ! एक आप हैं जो उन्हें समझाते नहीं कि पुराने गडमड गंठीले उलझाव युक्त जाल में कौन फंसने वाला है :)

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  2. अब तो कृष्ण भी ना उम्मीद हो गए होंगे,
    न गोपियाँ न उद्धव, मिलेंगे इस उमर !

    वैसे ब्लॉग-जगत में आपके कई उद्धव हैं पर उन्हें पता तो चले कि संदेशा किसे देना है ?

    मैं फिलहाल खाली हूँ,बज़रिये अली साब !

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  3. जब तक उद्गार की क्षमता विकसित हुयी, संभावना़यें सीमित हो गयीं।

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  4. लक्ष्‍य तो निर्धारित होगा... फिर संदेश पहुंच ही जाएगा.

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  5. सर्वश्री प्रवीण पांडे और राहुल सिंह जी की टिप्पणियों से बड़ी सहायता मिल गयी. संभावना़यें सीमित तो हैं फिर भी सन्देश पहुँच ही जाएगा.

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  6. इकीस्वीं सदी में उद्धव के हाथों सन्देश भेजेंगे तो देखते रह जायेंगे और उद्धव रास लीला करता नज़र आयेगा . :)

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  7. आपकी शाब्दिक अभिव्यक्ति ऐसी है की मौखिक अभिव्यक्ति में आपको सहायता चाहिए यह तो नहीं हो सकता ......मेरे जैसे अभिव्यक्ति -पंगु :)

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  8. किसी शायर ने कहा है ....

    ख़त कबूतर किस तरह ले जाए बामें यार तक
    पर कतरने को लगी हों, कैंचियाँ दीवार पर ..
    ख़त कबूतर इस तरह ले जाएँ, बामे यार तक
    ख़त का मजमूँ हो परों पर , पर काटें दीवार पर

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  9. जब कृष्ण के उद्धव सही सन्देश सही गोपी को नहीं पहुंचा पाए तो आज के उद्धव पर तो भरोसा मत ही कीजियेगा :)

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  10. अरे नहीं सर...आज भी इजहार-ए-मोहब्बत में बड़े लफड़े हैं, सोशल नेटवर्किंग है, मामला खुला हुआ है जनता के सामने | एस एम एस के नेटवर्क बिजी चलते हैं मुद्दे के टाइम पे | ग्लोबलाइजेशन का असर प्यार पे भी पड़ा है | "आई लव यू" कहने भर से कहाँ छुट्टी मिलती है | "विल यू बी माई वेलेंटाइन" "विल यू मैरी मी" का भी लफड़ा मार्केट में आ गया है | और केवल कहने भर से कहाँ काम चलता है | किस तरह से कहा इसके भी नए नए तरीके इजाद करो | फिल्म "सोचा ना था" का वो सीन याद आता है जब नायक अपनी गर्लफ्रेंड को शादी के लिए प्रपोज करता है तो वो बोलती है "वीरेन ऐसे करोगे मुझे शादी के लिए प्रपोज, दोस्त पूंछेंगे तो मै क्या बोलूंगी" |
    अरे बड़े लफड़े बरकरार हैं गुरुवर आज भी...एक निहायत ही घटिया और वाहियात शेर और चिपका देता हूँ...
    "मेरी लव स्टोरी का बड़ा ही ट्रेजिक एंडिंग था,
    एस एम एस किया था "आई लव यू" जो उसकी शादी तक पेंडिंग था"

    :) :) :) :)

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  11. संदेसा भी उद्धव के हाथ भेजेंगे और पूरा ठीकरा भी उन्हीं के सर फ़ोड़ा जाता है, ये गोपियाँ ऐसी ही थीं, हम भी प्रवीण जी की टीप से सहमत हैं।

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  12. हमारी टिप्पणी को स्पैम खा गया क्या !

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  13. हाँ, यह शाश्वत खोज तो मेरी भी है. कई अनकही भावनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति का आभार. इस आधार पर ये नहीं कह सकते कि 'उद्धव' की भूमिका आप ही क्यों नहीं ... !!!

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  14. संभावना़यें सीमित तो हैं फिर भी सन्देश पहुँच ही जाएगा|

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  15. इकीस्वीं सदी के उद्धव भी तो भरोसे लायक नहीं ना हैं । कहीं ऐसा न हो कि सन्देश आप भेजें और मौज उद्धव जी उड़ावें ।

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  16. अली साब कह रहे हैं किसी को ज़िम्मेदारी दो और दराल साब अपने अनुभवों से बता रहे हैं कि संदेशक भी गडबड कर सकता है !
    ...ऐसे में आप तो चुप ह्वै बैठो !

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  17. जो काम बचपने और जवानी में करने के होते हैं उनको स्थगित रखने पर ऐसई ऐरियर टाइप मामला बनता है या फ़िर इस तरह की पारिवारिक आदरपूर्ण पोस्ट बनेंगी:
    वे मुझसे मिलने आयीं भरत मिलाप देखने के बहाने !

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  18. कलि काल में मामला किशन कन्हाई और गोपियों तक सीमित नहीं रहा। उलट पुलट झाईं हो चुका है। एक कली खिली नहीं कि सभी भौंरे दौड़ पड़ते हैं..राधे राधे की पुकार लगाते।

    अब आप वाला मामला कौन सा है, आप जाने लेकिन उद्धव के चुनाव में सावधानी जरूरी तो है ही। राधे तक कौन कहै अक्सर उद्धव मकरंद में ही उलझ कर रह जाते हैं।

    अब तो कान्हां अली(भौंरा) को ही उद्धव समझने की भूल कर बैठते हैं जब कि यह सभी को पता है कि अली-कली का संबंध तो उर्वरा धरती के रहने तक बना ही रहने वाला है।:)

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  19. कृपया भूल सुधार कर पढ़ें..
    अली=अलि

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  20. @कृपया भूल सुधार कर पढ़ें..
    अली=अलि

    देवेन्द्र जी,वैसे आपने सही कहा है.अली साब भी अब सचेत हो जायेंगे !

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  21. पर आज का उद्धव भी तो इलेक्ट्रोनिक हो गया होगा न.

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  22. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
    सूचनार्थ!

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  23. इजहारे-मुहब्बत तो उस जमाने से मुश्किल है जब भाषा का आविष्कार भी नहीं हुआ था. और आपको लगता है कि एसेमेस, फोन और इंटरनेट से बदल जाएगा?

    दरअसल हर पीढ़ी को लगता है कि उसके बाद वाली पीढ़ी आगे निकल गयी. लेकिन कुछ बातें वैसी की वैसी रह जाती हैं :-) हमें लगता है कि या तो कुछ दिन पहले पैदा होना था या कुछ दिन बाद... ट्रांजिशन फेज में रह गए. और फिर लगता है कि हर पीढ़ी को ही शायद ऐसा लगता है :)

    कुछ मिस्ट्रीज विज्ञान और आविष्कारों से परे हैं :)

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  24. @ देवेन्द्र जी ,
    आपकी टिप्पणी पढ़के सोचा था कि आपको सफाई दे दूंगा कि भाई मैंने तो पहले ही किसी और नाम की अनुशंसा की हुई है पर आपने संशोधित टिप्पणी डालके मेरे हाथ से ये अवसर भी छीन लिया :)

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  25. @मित्रों,
    आप सभी की प्रतिक्रियाएं बहुत विचार और भावपूर्ण हैं मगर अत्यधिक व्यस्तता के चलते सबका जवाब चाहकर भी नहीं दे प् रहा ....प्रपोज करना ,इजहारे मोहब्बत करना हर कल में एक दिक्कत तलब बात ही रही है जैसा नौजवान साथियों ने भी स्वीकार किया है....बाकी तो सभी कृष्ण बन जाने की ख्वाहिश रखते हैं ..अब उद्धव कहाँ रहे ? इसीलिए तो तलाश में जुटा हूँ...अब उद्धव में कई क्वालिटीज होनी चाहिए ..वाक्पटुता,विश्वसनीयता,परोपकारिता की भावना और काम भर का सुदर्शन व्यक्तित्व भी .....मगर ऐसा कोई कहाँ है अब ?

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  26. संभव है कि ब्लागजगत में उद्घव तो मिलेंगे पर उस डाकिये से बदमाश, जो चिट्ठीवले की प्रेमिका ही ले भागें:) प्यार मोहब्ब्त में लफ़ंगई बहुत काम की चीज़ है, फ़ेलियर को हावी नहीं होने देती ये :) ...नौजवान बताए जाने को कंप्लीमेंट मान कर रख लिय है :)

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  27. मतलब इस उमर में माधौ को ऊधौ की तलाश !
    जारी रखिये,वैसे त्रिवेदीजी से मुफीद शायद ही कोई हो !

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  28. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  29. इस उम्र के मोड़ पर यही कहा जा सकता है- अब पछताए क्या होय जब चिडिया चुक गई खेत :)

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  30. रोचक।
    टिप्पणियाँ भी मज़ेदार.......
    पुराने समय में जाने के लिए एक टाईम मशीन बना लिजीए सारी समस्या सुलझ जाएगी.....

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  31. अच्छा है सर जी । न कुछ कहा जाए न चुप रहा जाए....

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  32. अरविंद जी,​
    ​मिडिल स्कूल मे हमारे हिंदी के टीचर उद्धव का पाठ इतना रस लेकर सुनाते थे कि उनका पीरियड कभी मिस नहीं करते थे...आपकी पोस्ट से वही क्लास याद आ गई...​
    ​​
    ​जय हिंद...

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  33. श्री अरविन्द जी के चिट्ठे से एक बात तो स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति के उद्गार से अधिक उसके उचित प्राप्तकर्ता तक पहुंचने के लिये उद्धव का मिलना अधिक आवश्यक है......रत्नेश मोहन

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  34. अब मैं क्या बोलू ???? 'उद्धवजी' ना होते तो मुझे कौन जानता???? सकल जोग के ईस उद्धवजी ने अपनी आँखों से राधे को देखा और............कृष्ण को....बस इसलिए मुझे प्रिय है. ज्ञानी प्रेम को सम्मान देना सीख गया.हा हा हा उन्ही को भेज देती हूँ.कम से कम झूठा और कपटी नही है.कांच सरीखा पारदर्शी है.
    आपके पास आएगा तो ज्ञान का आदान प्रदान हो जायेगा. :P

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  35. आप तो इंदु जी उल्टी गंगा बहा रही हैं अब ये ज्ञान की है या प्रेम की यह आपके उद्धव ही जाने ... :)

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