रविवार, 27 जुलाई 2014

हिन्दी ब्लॉग के अवसान की बेला?

एक मीडिया संस्थान ने आगामी हिन्दी दिवस के लिए मुझे सोशल मीडिया के बढ़ाते प्रभाव पर आलेख भेजने का अनुरोध किया। मैंने आलेख तैयार किया तो उसके कुछ अंश जो हिन्दी ब्लॉगों की मौजूदा स्थिति पर है फेसबुक पर डाला। ताकि मित्रों के विचार भी जान लिया जाय. खुशी हुयी वहां ठीक वैसे ही विचार आने लगे जैसे किसी ज़माने में ब्लॉग पोस्टों पर आया करते थे. आईये आप भी मुजाहरा कीजिये कि हिंदी ब्लॉगों की स्थिति पर हिन्दी के पुरायट ब्लॉगर क्या कहते हैं। यहाँ वही टिप्पणियाँ मैं दे रहा हूँ जो विचारवान लगीं। बाकी के मित्र अन्यथा नहीं लेगें!
मैंने जो कहा -
अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके। लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान युग आ पहुंचा है -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता।
और चुनिंदा प्रतिक्रियायें ये रहीं -
काजल कुमार
"ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.
बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों( ) ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती पतंंगे आते-जाते ही रहते हैं"
वाणी गीत
"हिंदी ब्लोगिंग में जो गंभीर पाठक अथवा लिखने वाले थे , वे अब भी लिख पढ़ रहे हैं . कुछ लोग सिर्फ अपने को रौशनी में बनाये रखने के लिए जानबूझकर विचार विमर्श के नाम पर लडाई झगडे का माहौल बनाये रखते थे , कुछ अंग्रेजीदां ब्लॉग्स भी थे जिन्होंने जानबूझकर हिंदी ब्लॉगिंग को नुकसान पहुँचाने के लिए विषाक्त माहौल पैदा किया जिससे संवेदनशील ब्लॉगर्स ने अवश्य विदा ली , कुछेक गंभीर ब्लॉगर अपनी इतर जिम्मेदारियों के चलते दूर हुए तो कुछ अर्थ/नाम के लिए प्रिंट लेखन में उतरे .. मगर ब्लॉग पढने वाले बने हुए है , लिखने वाले भी!"
आशीष श्रीवास्तव
मेरे ब्लाग पर दैनिक ८०० लोग आते है, वह भी जब इसमे नया लेख महिने मे एक बार आता है.... ब्लाग जिवित है.... रचनाकार के आकड़े देख लिजीये .. वैसे आपने अपनी पढे जाने वाले ब्लागो की सूची कब नविनीकृत की थी ? नये ब्लाग आये है.... नये बेहतरीन लेखक....
शिखा वार्ष्णेय
जो लिखने वाले थे वे आज भी बने हुए हैं, और पढ़े भी जा रहे हैं. हाँ जिनका उद्देश्य कुछ और था वे छट गए हैं परन्तु इससे ब्लॉगिंग को कोई हानि नहीं हुई है. ऐसा लगता है कि ब्लॉग अब कोई लिखता पढता नहीं क्योंकि पुराने जिन लोगों के हम अभ्यस्त थे उनमें से कम दीखते हैं. परन्तु नए लिखने वाले भी आये हैं और पढ़ने वाले भी पठनीय ब्लॉग्स की रीडरशिप आज भी बनी हुई है.
सलिल वर्मा
दरसल जिस दुर्दिन की बात आपने कही है वो तो चिट्ठाजगत बन्द होने के बाद ही शुरू हो गया था... टॉप टेन की दौड़ ने बहुत दौड़ाया लोगों को... लेकिन जो उस दौड़ से बाहर ईमानदारी से लिख रहे थे, वे अब भी लिख रहे हैं और उन्हें इससे कोई अंतर नहीं पड़ा. हाँ फेसबुक को ही अब लोगों ने ब्लॉग का पर्याय बनाकर यहीं पर पोस्ट ठेलना शुरू कर दिया है! यहाँ भी वही होड़ लगी है!!ब्लॉग के सूनेपन का स्यापा करने वाले सारे लोग एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि क्या वे पढने का समय निकाल पाते हैं ब्लॉग पढने का?? चुँकि वो नहीं लिखते, इसलिये पढते भी नहीं! और पढते भी तब हैं जब अपना कुछ पोस्ट करना होता है!!तू मेरी खुजा मैं तेरी खुजाऊँ - यह मुहावरा ब्लॉग जगत की देन है.. लेकिन कितनों ने इसे झूठ साबित करने की ईमानदार कोशिश की है!!
रविशंकर श्रीवास्तव (रतलामी जी )
आपका कहना है कि ब्लॉगों की पठनीयता गिरी है - जबकि हुआ इसके उलट है. जब हमने शुुरुआत की थी तो दिन में 10 लोग पढ़ते थे - वह भी जब कुछ नया लिखो. अब तो गूगल सर्च से ही पुराना माल हजारों की संख्या में पढ़ा और उपयोग किया जा रहा है!
निशांत मिश्र
ब्लॉगिग को लेकर लोगों में जो जोश था वह नदारद है. एक नई क्रॉप आई है ब्लॉगिंग में जो इससे होने वाली संभावित कमाई को देखकर योजनाबद्ध तरीके से ब्लॉगिंग कर रही है. हिंदी में वे बहुत कम हैं.
सतीश चन्द्र सत्यार्थी
शुरू में हिन्दी ब्लोग्स पर व्यक्तिगत बातें ज्यादा होती थीं.. या फिर कविता कहानियाँ.. धीरे धीरे सब्जेक्ट स्पेसिफिक ब्लोग्स आ रहे हैं हिन्दी में, तकनीक, विज्ञान, साहित्य, राजनीति, फोटोग्राफी, कूकिंग वगैरह विषयों पर.. लोगों के काम की चीजें स्तरीय सामग्री के साथ हिन्दी में नेट पर आयेंगी तभी पढ़ने वाले भी गूगल से आयेंगे. जिन ब्लोगों पे ये सब है उनपर पाठक आते हैं और आते रहेंगे.
मनीष कुमार
अगर आपका content काम का है तो लोग उसे खोज खोज कर पढ़ने आते हैं। जो भी ब्लॉग शुरु से ऐसा करते आए हैं वो फल फूल रहे हैं। हाँ इस content तक पहुँचने के लिए हिंदी भाषी जनता के लिए अच्छे टूल्स उपलब्ध करने की आवश्यकता है। ब्लॉगरों ने पिछले कुछ सालों से इसके लिए सोशल मीडिया का प्रयोग किया है पर इंटरनेट पर उपलब्ध वेब एप्लीकेशन इसमें महत्त्वपूर्ण भुमिका निभा सकते हैं। हाल ही में भारतीय भाषाओं से जुड़े एक वेब एप्लीकेशन ने मेरे एक ब्लॉग को हिंदी में यात्रा संबंधी जानकारी के लिए समाचार पत्रों के साथ जगह दी। नतीज़े के तौर पर पाँच सौ से हजार प्रति पोस्ट से आंकड़ा कुछ दिनों में ही कई हजार तक पहुँच गया।
डॉ. मोनिका शर्मा
ब्लॉगिंग में नए लोग आ रहे हैं और पुराने भी लिख रहे हैं , पर निश्चित रूप से ब्लॉग्स की पाठक संख्या कम हुयी है | लेखन भी कम हुआ है | गिनती के ब्लॉगर्स हैं जो आज भी उसी तरह नियमित लेख लिख रहे हैं जैसे दो तीन साल पहले .....इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम तो है पर इसका प्रभाव तभी दीखता है जब पाठक पोस्ट पढ़ने आते हैं | अपने विचार रखते हैं | किसी विषय पर सधी और सार्थक बहस होती है | नए दृष्टिकोण निकलकर सामने आते हैं | ब्लॉगिंग में अब ये नहीं हो रहा है, और इसी के चलते अभिव्यक्ति के इस माध्यम की गति में ठहराव आया है |
हरिवंश शर्मा
फेस बुक के माध्यम से ही हम जान पाए है ब्लॉग को। फेस बुक पर स्टेटस ओर की गई टिपणी महज चुटकुले सामान है,एक पानी का बुलबुला है। ब्लॉग पड़ने का एक अनूठा अपना सा आनंद है।
संतोष त्रिवेदी
जो चुक गए हैं, उनका जोश भी ठंडा हो गया है पर नए लोग खूब आ रहे हैं। कुछ पुरनिया अभी भी डटे हुए हैं।
अभिषेक मिश्रा
किसी विषय पर विस्तार से अभिव्यक्ति तो ब्लॉग पर ही प्रभावशाली है।
अनूप शुक्ल
मुझे नहीं लगता कि ब्लॉगिंग कि अभिव्यक्ति के किसी अन्य माध्यम से कोई खतरा है। फ़ेसबुक और ट्विटर से बिल्कुलै नहीं है। इन सबको ब्लॉगर अपने प्रचार के लिये प्रयोग करता है। इनसे काहे का खतरा जी!
ब्लॉगिंग आम आदमी की अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। आम आदमी इससे लगातार जुड़ रहा है। समय के साथ कुछ खास बन चुके लोगों के लिखने न लिखने से इसकी सेहत पर असर नहीं पड़ेगा। अपने सात साल के अनुभव में मैंने तमाम नये ब्लॉगरों को आते , उनको अच्छा , बहुत अच्छा लिखते और फ़िर लिखना बंद करते देखा है। लेकिन नये लोगों का आना और उनका अच्छा लिखने का सिलसिला बदस्तूर जारी है- पता लगते भले देर होती हो समुचित संकलक के अभाव में।जरूरी नहीं है फ़िर भी ये कहना चाहते हैं कि हम ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर तीनों का उपयोग करते हैं। समय कम होता है तो फ़ेसबुक/ट्विटर का उपयोग करते हैं लेकिन जब भी मौका मिलता है दऊड़ के अपने ब्लॉग पर आते हैं पोस्ट लिखने के लिए।
रंजू भाटिया
मेरे जैसे कुछ लोग है ब्लॉग लिखते हैं पढ़ते हैं ,आदत में यह अब शुमार है , हिंदी ब्लॉग्स पहले भी इंग्लिश ब्लॉग्स की तुलना में अधिक तवज़्ज़ो नहीं पाते थे पर अभी घुम्मकड़ी के शौक में यह पता चला की आज कल फ्री लांस राइटर से अधिक ब्लॉग लिखने वालों को बुलाया जाता है। मैंने हैरान हो कर पूछा क्या उस में हिंदी ब्लॉगर भी है?तो जवाब हाँ मिला ,अब हिंदी ब्लॉगर वाकई उस में शामिल है तो यह एक उम्मीद की किरण है वैसे भी हिंदी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं.
सतीश सक्सेना
मैंने तो पिछले एक वर्ष में पहले से अधिक पोस्ट लिखी हैं और नियमित रहा हूँ , आने वाले विजिटर भी बढे हैं।
चलते चलते मोनिका जैन
हम तो जब तक हैं हमारा ब्लॉग रहेगा और झाँकने वाले भी हमेशा रहेंगे


अब आप ही बताईये कि क्या  फेसबुक पर गंभीर चर्चा नहीं हो सकती?

15 टिप्‍पणियां:

  1. एक सार्थक चर्चा का शुभारम्भ किया है आपने. दरसल इस विषय पर चर्चा महज टाइम पास न होकर इसे एक मुद्दे के तौर पर संजीदगी से लेना, मुश्किलों का आकलन करना, उनसे निपटने के सुझाव पर विचार करना होनी चाहिये. अनूप जी की बातों से सहमत होते हुए भी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि फेसबुक ने नुकसान पहुँचाया है, क्योंकि मैंने देखा है कि लोग अपनी पूरी रचना, जो पूरे एक एकड़ में फैली होती है, फेसबुक पर डाल देते हैं. ट्विट्टर पर तो सीमा निर्धारित है, इसलिये वहाँ यह लफ़ड़ा नहीं.
    मैंने तो अपने लिये यह सीमा निर्धारित कर ली है कि मुझे ब्लॉग और फेसबुक में निश्चित दूरी बनाए रखनी है! वैसे भी फेसबुक पर मैं टिप्पणियों में ही अपनी बात कहता हूँ!

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  2. मै फेसबुक से अपने ब्लाग पर ट्रैफिक भेज पा रहा हूं, ब्लाग के पाठ्को की संख्या फेसबुक ने दोगुनी कर दी है.....
    ब्लाग पर आने वाला अधिकतर ट्रैफिक गूगल जैसे सर्च इंजनो से है, दूसरे क्रमांक पर फेसबुक है....

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  3. संक्षिप्त चर्चा के लिए फेसबुक/ट्विटर उचित हैं मगर अभिव्यक्ति के लिए ब्लॉग की अहमियत कहीं ज्यादा है। हाँ, कुछ लोगों में इसके और बेहतरीन उपयोग की क्षमता ज्यादा होती है...

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  4. अब आपका पोस्ट इतने समय बाद आयेगा तो हम पाठकों के लिए यह चिंता की बात जरूर है :) शेष बात अवसान की....ऐसा नहीं लगता है. ब्लॉगिंग का सूरज उज्जिहान है. लेकिन क्वचिदन्यतोSपि पर पोस्ट नियमित रूप से आये यह जरूर अपेक्षित है.

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  5. ब्लॉगिंग में गंभीरता बढ़ी है , लोग पढने को लेकर गंभीर हुए है , इसलिए इस प्रकार की शंका व्यर्थ है .
    चिंता और शिकायत जायज़ तभी मानी जायेगी जब हम स्वयम ब्लॉगिंग को लेकर गंभीर हों ! व्यर्थ हंगामों को तरजीह न देते हुए सकारात्मक माहौल बनाये , नए ब्लॉगर्स को प्रोत्साहित करें !

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  6. ये सही है की चिट्ठाजगत के बंद होने पर कुछ अन्धकार सा दिखने लगा. परन्तु फिर ब्लॉग्गिंग धीरे धीरे अपने रस्ते पर है. हो सकता है किसी पोस्ट पर सार्थक टीप की कमी झलकती हो. पर मेरे जैसे बहुत से ब्लॉगर है जो समय समय पर ब्लॉग पर विचरण करते रहते है - आलस्य या फिर धीमी गति की बुद्धि मिलने के कारण अपना वाद ढंग से नहीं रख पाते. बाकी खुरापाती ब्लोगर्स को शह मिलनी बंद हो गयी है. अच्छे लिखे के कद्रदान बहुत है - अपितु बढ़ रहे है. क्या कहते है सकरात्मक माहौल बनता जा रहा है. समय की कमी सभी को है - जबसे ब्लोग्गर्स फेसबुक पर सक्रीय हुए है. पर ये भी है फेसबुक से कुछ नय ब्लोग्गर्स भी बने है. बढ़िया पोस्ट - बहस जारी है - बढ़िया . जय राम जी की.

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  7. कल 29/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  8. दरअसल तुरंता-संवाद के लिए फेसबुक का कोई विकल्प नहीं है.ब्लॉग में भी विमर्श होता है पर यह प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से धीमी है पर है चिरकालिक जबकि फेसबुक में विमर्श के बाद वह सब विमर्श लापता-सा हो जाता है.दोनों की अलग उपयोगिता है.

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  9. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  10. ऐसा लगता है , जिस तरह पब्लिक मेमरी शॉर्ट होती है , उसी तरह इंसान की अटेंशन स्पेन भी बहुत कम होती है ! यह एक वैज्ञानिक सत्‍य भी है ! ब्लॉगिंग का इनीसियल यूफोरिया निश्चित ही कम हो गया है ! अधिकांश लोगों के लिये ब्लॉगिंग एक मनोरंजन का साधन बन गई थी ! उसके लिये अब फ़ेसबुक बेहतर माध्यम नज़र आने लगा है ! इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि अधिकांश ब्लॉगर्स अब फ़ेसबुकिये बन गए हैं ! ना ना करते हम और आप भी !

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  11. मैं पिछले दस साल से इंटरनेट काम में लेती हूँ। अंग्रेजी और हिंदी समान रूप से पढ़ती हूँ। लेकिन इस साल से पहले पता ही नहीं चला कि हिंदी में स्तरीय सामग्री नेट पर उपलब्ध है।अब काफी कुछ अच्छा पढ़ने को मिल जाता है -कभी-कभी तो बहुत स्तरीय भी। मेरा मानना है कि पढ़ने वाले बहुत हो सकते हैं लेकिन जानकारी का आभाव रहता है। सामग्री की स्तरीयता का जहाँ तक प्रश्न है तो सच्चाई यह है कि हिंदी साहित्य जगत एक विशिष्ट मानसिकता में क़ैद है जो बदलती दुनिया में नई खिड़कियाँ नहीं खोल पा रही। समस्या अंग्रेजी लेखन में भी है पर उसका स्वरूप अलग है।
    मेरे विचार से हिंदी ब्लॉग संकलनों को अधिक पाठकों तक पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए।पठन-पाठन होगा तो स्तर भी बढ़ेगा ही।

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  12. achhi bahas shuru ki hai aapne ... bloggers toh bahut hain jinme daily base typer (not writer.. plz dnt take it otherwise) bahut jyada hain .. aur wahi typer log sab aggregators pe dikhte hain .. doosra aajkal aalochna koun sunna chahta hai .. bas sabko comment ke roop mein taareef chahiye .. fir aajkal ek bimari aur ho gai hai devnagri font par zor .. arrey bhai apne blog pe toh hindi font use karte hi hain ab koi zaruri hai kya ki fb pe ya har jagah hindi font hi sue karu ..

    ek point aur hai ki jo quality content hai kya wo vaakai logon tak pahunch paa rahaa hai ya kya uske baare mein jaankari bhi hai .. maien blogging se judi apni pareshaniyon ke baare mein apne blog pe do lekh likhe the aur dekha jaaye to we problms abhi bhi kamobesh waisi hi hain.

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  13. फेसबुक पर गंभीर विमर्श नहीं के बराबर है/ नहीं हो सकता

    वहां तो ज़्यादातर लोग मौज मस्ती के लिए जाते हैं
    जस्ट लाइक पान ठेला/ किटी पार्टी

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  14. तुलनात्मक दृष्टि से फेसबुक की अपेक्षा ब्लॉग पर आवाजाही कम होने के कुछ कारण ये हो सकते हैं :
    -- पुराने ब्लॉगर्स की अन्य कार्यों में व्यस्तता और ब्लॉग लेखन और पठन में घटती रुचि।
    सत्ता परिवर्तन के लिए लगभग साल-दो साल से और चुनावी दौर में ब्लॉगर्स की अधिकांश ऊर्जा फेसबुक पर लग रही थी क्योंकि उसे अधिक-अधिक लोगों तक पहुँच बनाना (जन-जागृति के लिए) उसके लिए प्राथमिक हो गया था। नए ब्लॉगर्स की पैदावार भी इसी कारण से कम हुई।

    -- एक अन्य कारण ये भी रहा - ब्लॉगर्स की गुटबाजी और व्यक्तिगत हमलों ने टिप्पणीकर्ताओं को ब्लॉगचर्चाओं से विमुख करना शुरू कर दिया। टिप्पणीकार यदि ब्लॉग लेखक की पोस्ट पर बात करते हुए ईमानदारी से सख्त टिप्पणी कर दे तो सौहार्द बिगड़ने वाली समस्या और प्रशंसासूचक शब्दों से औपचारिकता भर निभाये तो बौद्धिक असंतोष। बड़े-बड़े विचारक ब्लॉगर्स का चिंतन प्रवाह जब कुछ ब्लॉग-महंतों के द्वारा रोका जाने लगता है या वैसी कोशिश होने लगती है तो वे देर-सबेर लेखन से संन्यास ले ही लेते हैं। ब्लॉग-जगत में ऐसे बहुत से नाम हैं जो सदानीरा हैं बड़े वेग से बहना चाहते हैं लेकिन उतने ही प्रबल शिलाखंड हैं जो उन्हें रोकते रहे हैं।

    -- एक मासूम कारण ये भी है कि अब पीठ थपथपाने वाले हाथ उड़नतश्तरी लेकर निकल गए हैं।
    कोई पुराना व्यक्ति जब नए प्रयासों को बिलकुल नहीं सराहेगा तब क्योंकर ऎसी आशा की जाए कि ब्लॉग लेखन और ब्लॉग पठन का ग्राफ ऊपर जाएगा।

    दो-तीन कारण और भी हैं जो बड़े विचित्र से हैं। उनकी विचित्रता बनी रहे इसलिए उन्हें नहीं कहूँगा।

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  15. मुझे स्वयं दो समस्याएँ महसूस होती हैं.
    १. ब्लौगवाणी, चिट्ठाजगत आदि की कमी.
    २. जब किसी ब्लॉग पर या अपने पर ही किसी की टिप्पणी पढ़ या तो ध्यान आता है, अरे इन्हें पढ़े तो जमाना बीत गया, या इन्होने अच्छी टिप्पणी की है सो इनके ब्लॉग को देखा जाए तो नाम पर खटका लगाने पर गूगल + खुल जाता है.पहले जमाने में उनका प्रोफाइल खुलता था और फिर उनके ब्लॉग का लिंक मिल जाता था. अब मुझे तो गूगल + से उनके ब्लॉग पर जाने में समस्या होती है.
    इनके अतिरिक्त भी जो कारण मित्रों ने गिनाए हैं वे सही हैं. और फेसबुक तो है ही नशे की तरह, इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन के लिए.
    घुघूती बासूती

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