शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

अभी देखी है स्लमडाग करोड़पति ! फ़िल्म अच्छी ,मकसद बुरा !

स्लमडाग करोड़पति -एक दृश्य ! ( साभार : exclaim.ca)
अभी अभी स्लमडाग करोड़पति देख कर आया हूँ -बेहतरीन फिल्मांकन ,कलात्मकता और व्यावसायिकता का महीन मिश्रण ! एक जबरदस्त समांतर फिल्म ! पर मकसद क्या ? भारत के अंधेरे को पश्चिम के उजाले में ले जा पैसा , शोहरत और पुरस्कार आदि बटोरना !
ऐसा नही है कि भारतीय फिल्मों /फिल्मकारों /निर्देशकों को मुम्बई की झुग्गी झोपडी की गंदगी ,जरायमपेशा ,अंडर वर्ल्ड से उसकी सांठगाठ की सुध नही आयी है -कई बेहतरीन फिल्में वहाँ के परिवेश पर बन चुकी हैं ! बल्कि बालीवुड का एक सितारा जैकी श्राफ तो "स्लमडाग " ही रहा और पहले ही करोड़पति बन चुका है .तो विषय कोई नया नही है और न ही नग्न यथार्थ को उघारती यह कोई नई प्रस्तुति है -पर हाँ यह नई फिल्म पटकथा और प्रस्तुतीकरण में जरूर प्रभावशाली बन पडी है .
यह फिल्म सुखान्त है और मानवीय संवेदना के सकारात्मक पहलुओं को दिखाने में भी सफल हुयी है पर यह बेचती भारत की गंदगी और गरीबी ही है -यह भारत के लिए बनी ही नही है -भला कौन भारतीय अपरिचित है झुग्गी झोपडी की असलियत से ....वहां की गरीबी और घोर घुटन भरी पशुओं से भी बदतर जिन्दगी से ! पर यदि इसे भारत के दर्शक देखते हैं तो वे इसमें वे अपना ही आईना पायेंगे -अपना ही विकृत और खौफनाक चेहरा ! पर यह फिल्म बनी है तो केवल एक ही साभिप्राय मकसद से -पश्चिम को भारत का घिनौना पक्ष दिखा कर पैसे बनाना और पुरस्कार बटोरना .और अपने इस मकसद में फिल्म सफल होती दीख रही है .यहाँ न तो साध्य ही की शुचिता है और न ही साधन की ! दोनों में ही बदनीयती झलकती है ! हाँ मनोरंजन भरपूर है .पर फ़िल्म में मुम्बई के अंडर वर्ल्ड के रा मटेरियल के रूप में वहाँ की झुग्गी झोपडी के मानव संसाधन की खपत के तौर तरीके / मंजर दिल को दहलाने वाले हैं ! किस तरह बेसहरा बच्चों को भीख मांगने के लिए उन्हें अंधा तक कर देने ,उनका दैहिक शोषण और तमाम अभिशप्तता के बावजूद समझ के अभाव के चलते उनकी हीरो वरशिप की प्रवृत्ति आदि इस तरह फिल्म में दिखाई गयी है कि मन विचलित हो उठता है ! पर क्या आम पश्चिमी दर्शक की भी ऐसी ही प्रतिक्रया होगी ? निसंदेह नहीं ! यह फिल्म एक आम पश्चिमी दर्शक के मन में भारत की इमेज को धूल धूसरित ही करेगी -हमारा सिर शर्म से झुकायेगी ही !
बनारस में हाल खाली जा रहा है । वे कथित 'स्लमडाग' फिल्म को देखने नही आए जिनके बारे में यह है -फिर यह फिल्म कम सेकम भारत में पैसा वसूलने से रही !
कई घटनाए साथ साथ ऐसी घटीं कि यह सोचने में उलझन सी हो रही है कि क्या वे मात्र संयोगमात्र हैं -एक स्लम डाग (अश्वेत ) का अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाना -अपने रीयल लाईफ में ! और एक रील लाईफ में इंडियन स्लम डॉग का करोड़पति बन जाना ! लगता है अब 'स्लम डागों ' के दिन बहुरे हैं ! यहाँ किसी को यह बुरा नहीं लगना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति को मैंने स्लम डाग का संबोधन दिया ! जो अमेरिका में अश्वेतों की गाथा जानते हैं वे इसे सही परिप्रेक्ष्य में लेंगे .अब जब हमने अपने झुगी झोपडी वाले साथी प्रवंचितों के लिए स्लमडाग शब्द स्वीकार कर लिया है तो बराक ओबामा के लिए ऐसे शब्द को लेकर नाक भौ का क्या सिकोड़ना ! दोनों ,भारत के झुगी झोपडी वासी और वे -ह्यूमन बीईंग ही तो हैं ! फिर दुहरा मानदंड क्यों ??
फिल्म में पात्रों का अभिनय बड़ा धाँसू है .खास कर झुग्गी झोपडी के "कुत्तों सा जीवन" जी रहे पात्रों का ! कौन बनेगा करोड़पति के एंकर के रूप में अनिल कपूर ने इसी नाम के कार्यक्रम को संचालित कर चुके अमिताभ बच्चन के हाव भाव की काबिले तारीफ़ नक़ल की है !
फिल्म भारत में बनी है ,खर्चा कम आया होगा ! यहाँ बन्दे सस्ते मिलते हैं और अब हमारी ही सरजमीं पर तैयार माल को हमारे ही सर पर ' मियाँ की जूती मियाँ के सर ' स्टाईल में दे मारा गया है .
एक सवाल यह भी है कि क्या कई साम्यवादी देशों में जैसे कि रूस और चीन के अंधेरे पक्षों को भी हालीवुड का माई का लाल ऐसे ही दिखा पायेगा -अनुमति ले पायेगा ? फिर भारत ही ऐसे लोगों को क्यों बर्दाश्त करता है .जिसे देखो वही भारत में मुंह बाए /सर उठाये प्रत्यक्षतः किसी "महान" काम या आतंक तक को अंजाम देने आ पहुँचता है और अपने मकसद में कामयाब हो गर्व से सीना फुलाए चल देता है !
बदलो भारत बदलो -तुम्हे लोग बेंच रहे है ,बदनाम कर रहे हैं ,तुम्हारी सरेआम खिल्लियाँ उड़ा रहे है ! और कोढ़ में खाज यह कि तुम्हारी कमजोरियों का फायदा उठा कर मालामाल भी हो रहे हैं !
खैर फिल्म देख लें -अपना दृष्टिकोण कायम करने में सहजता होगी !
फिलवक्त यहाँ स्लमडाग शब्द के अर्थ और भाव बोध को लेकर द्वंद्व छिड़ा हुआ है मौका लगे तो देखें और आंग्ल भाषा में अपने विचार वहाँ भी टिपिया आयें !

26 टिप्‍पणियां:

  1. कोशिश करते हैं फिल्म देख ही लें !

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  2. क्या भारत में रीलीज़ हो गयी।

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  3. स्लमडॉग है या स्लमगॉड?
    जब करोड़ों के वारेन्यारे होते हों स्लम दिखाने में तो जीव कुक्कुर से देवता बन जाता है।
    यह फिल्म क्या बताती है - गरीबी या गरीबी की समस्या का निदान? या फिर केवल गरीबी के खुरदरेपन की रूमानियत बताती है?

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  4. आपकी अनुशंसा सर आंखों पर. जरुर देखेंगे.

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  5. भारत और भारतवासियों की कमजोरियों का फायदा क्या केवल विदेश से आए फ़िल्म बनाने वाले ही उठा रहे हैं? हम यह भी मान रहे हैं कि फ़िल्म में जो कुछ दिखाया गया है वह सच्चाई है. दूसरी तरफ़ उसे देखने से भी डरते हैं. हिन्दी फिल्मों में पिछले कई सालों से जिस तपके के लोगों को लेकर कहानियाँ गढी जा रही हैं, उससे भी हमें कष्ट हो रहा है क्योंकि ये कहानियाँ ऊंचे तपके के लोगों को दिखा रही हैं. दूसरी तरफ़ विदेश से आए लोग नीचे तपके और झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन बिताने वालों की कहानी कहते हैं तो भी हमें कष्ट हो रहा है.

    आख़िर हमें इतना कष्ट क्यों हो रहा है? हम सच्चाई देखने से और उसका सामना करने से कतराते क्यों हैं?

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  6. हॉलीवुड के निर्माता निर्देशक एक अरसे से ऐसे विषयों पर फिल्‍म बनाते रहे हैं। ऐसा वे इसलिए नहीं करते कि इन लोगों से उन्‍हें कोई सेम्‍पेथी होती है, बल्कि वे इसलिए ऐसा करते हैं कि इन लोगों की जिंदगी के सहारे अपने लिए इनमो इकराम बटोर सकें। यही बात स्‍लमडॉग मिलेनियर पर भी लागू होती है। इस फिल्‍म को बनाने के प्रति जो उददेश्‍य है, वह उसके शीर्षक से ही जाहिर हो जाता है। यह एक उच्‍च वर्गीय नस्‍लीम मानसिकता है, जिसका विरोध होना ही चाहिए।

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  7. " कल इतवार का फायदा उठाते हैं ...देखते हैं....नाम और चर्चा तो बहुत सुन रहे हैं...और आपके लेख से उत्सुकता और भी बढ़ गयी है...."

    Regards

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  8. मि्श्राजी, कहीं आप भी तो प्रोड्युसर मंडली मे नही हैं? अब हम तो आपने बता दिया इइसलिये देखने की सोच रहे हैं वर्ना हमने ो सिनेमा बनाना छोडा उसके बाद देखा ही नही.:)

    यहां हम ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ की बात से सहमत हैं.

    रामराम.

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. अभी कल देखेंगे तो करेंगे चर्चा इस पर ..इसके नाम को ले कर पढ़ा है कई जगह आज

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  11. अच्‍छी जानकारी दी....इसे देख पाने की कोशिश रहेगी।

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  12. Film good, intentions/motives bad. The reason for which it's a hit in the West is bad. OK. The West only likes photos of filth and movies about India's suffering. OK. But as an Indian, why waste time and energy on what "they" think and why "they" made this movie? Let them go to hell ! Let Indians decide not to celebrate the Oscars ! My appeal to all humans: let's work together for a better world. When there is no poverty, there'll be no "poverty porn."

    But as long as there's poverty, we need people to make such movies and shame us - entire humanity.

    Because the sad reality is that people in India do NOT know all about slums and poverty. We look the other way. We need to be SHOWN it on the big screen. And if we still turn a blind eye and simply wish that the film was never made... I'm out of words.

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  13. अभी देखी नही है इसलिए टिप्पणी करना पूरी ईमानदारी नही होगी ...फिलहाल कल समीक्षा में यही देखा की महेश भट्ट मुस्करा रहे है क्यूंकि उनकी राज को ज्यादा दर्शक मिल रहे है.....

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  14. भारत की गरीबी से यह लोग अमीर बन रहे है इन चित्रो को बेच कर.... अरे इन्हे शर्म भी नही आती आप्ने ही भाई बहिन् को नंगा कर के, अपने ही देश की पोल खोल के, अच्छा तब लगता जब यह फ़िल्म बनाने वाले इन लोगो के लिये कुछ करते भी... लेकिन इन्हे तो अपनी जेब से मतलब है....
    चलिये अभी डाऊन लोड कर के देखते है किसी भाई ने जरुर डाली होगी नेट पर.
    आप का धन्यवाद

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  15. चलिये अभी डाऊन लोड कर के देखते है किसी भाई ने जरुर डाली होगी नेट पर.

    now what will you call this , this is the typical indian mentality . indians are corrupt by nature and they feel pride in saying the same
    mr raj bhatia is an indian and still even thoug he is not in india he will try to down load an illegally upadted film

    why do we ren away from the reality ?? 905 indians still call the street children dogs

    and why is every indian so eagar to see the film , bycott it if you feel its insulting to your sensibilites

    first thing is we will run to see the movie then we will try to disect and find out what is bad in it

    kaun banega karorpati its self is foriegn based idea why copy it and why amitabh became the host

    if you want to be a follower of ghandhi shun every thing that is not indian even the "idea "

    can you ???

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  16. मैंने तो फ़िल्म देखी नहीं, लेकिन सुना है कि "स्लमडॉग" में मुस्लिम हीरो का डायलॉग है, "यदि राम का जन्म नहीं हुआ होता तो मेरी माँ नहीं मरती…" ये सब क्या है? फ़िल्म में दंगों के लिये "राम" को जिम्मेदार भी बताया गया है… क्या इस पर चर्चा नहीं होना चाहिये… कहीं यह भी तो एक कारण नहीं है ऑस्कर मिलने का? लगान में तो अंग्रेजों को हारते हुए दिखाया गया था इसलिये नहीं मिला होगा, लेकिन इस फ़िल्म में तो "सेकुलर" अंग्रेजी प्रेस के लिये काफ़ी मसाला है…

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  17. @आदरणीय चिपलूनकर जी,

    आपसे यहाँ असहमति जताना चाहूंगा। वस्तुतः फिल्म में जमाल के किरदार का डायलाग है-

    "if it wasn't for the ram and allah, i'd still have a mother.."

    मेरे विचार से फिल्म भारत को लगभग पूर्णतया नकारात्मक तौर पर प्रस्तुत करती है। चाहे वह साम्प्रदायिक दंगों के दृश्य हों, बाल-शोषण के, अथवा हीरो-वर्शिपर जमाल का शौच में डुबकी लगा देना। निस्संदेह यह फिल्म पश्चिमी दुनिया के सामने भारत को आज भी एक तीसरी दुनिया के देश के तौर पर प्रस्तुत करना चाहती है, क्योंकि उन्हें तेजी से चुनौती दे रहे भारत का तथाकथित यही रूप भाता भी है और संतुष्टि भी देता है।

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  18. भारत की नकारात्मक छवि को कैश करना विदेशी क्या देशियों को भी खूब आता है..वह सलाम बाम्बे और वाटर बनने वाली हों या फिर कोई और. इस की विवादस्पद खबरें सुन कर लोग देख रहे हैं यह क्या फ़िल्म को लोकप्रियता रंकिंग में ऊपर नहीं कर रहा है?फ़िल्म बनाने वालों की pocket गरम होगी सो अलग.पहली बात क्यूँ हमारे देश के फ़िल्म वाले बाहर मुल्क में जाकर उनका ठप्पा लगवा कर ही अपनी फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ मनवाना चाहते हैं?क्या हमारे देश के फ़िल्म पुरस्कार बेकार हैं उनका कोई माप दंड नहीं है?अपरोक्ष रूप से बाहर के मुल्क यही चाहते हैं की ऐसी फ़िल्म को पुरस्कार दिया जाए जो भारत की नेगेटिव छवि दिखाए.क्यूँ की वे भी भारत की उन्नत्ति से जलते हैं.

    अगर kisi ko कुछ करना है तो क्यूँ आ कर इन slum wale बच्चों और गरीब लाचारों के लिए 'व्यवहार में कुछ करते?

    वैसे भी अभी तक भारत को जादू -टोन -snake charmers का देश समझा जाता है.aur chhavi khraab karne par tule hain.

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  19. गणतँत्र दिवस सभी भारतियोँ के लिये नई उर्जा लेकर आये ..और दुनिया के सारे बदलावोँ से सीख लेकर हम सदा आगे बढते जायेँ

    बदलाव के लिये व नये विचारोँ मेँ से,
    सही का चुनाव करने की क्षमता भी जरुरी है ..

    भारत से बाहर के देश फ्राँस, ब्रिटेन इटली, होलीवुड -छीन और रशिया जैसे कम्यूनिस्ट देसोँ की बुराई भी बहुत बार फिल्मोँ के जरीये बतला चुके हैँ -

    बाकि,

    शिव भाई ने प्रश्न का जवाब भी बतलाये कोई कि क्यूँ हम हमारी गँददी, गरीबी, भर्ष्टाचार जैसी बुराई को देखकर भी
    उन्हेँ नज़राँदाज करते हैँ ?

    अल्पना जी का प्रश्न भी जवाब माँगता है,
    " गरीब , अनाथ बच्चोँ के लिये, हम क्या करते हैँ ? "

    ये फिल्म, एक आइना है बम्बई के धारावी जैसे इलाकोँ का -
    और महानगर मेँ फैले प्रदूषणोँ का -
    सामाजिक और जो बाहर फैला है सभी का -

    - लावण्या

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  20. मैंने अब तक फिल्‍म नहीं देखी है किन्‍तु बहस में शरीक हो रहा हूं।
    फिल्‍म में जो कुछ दिखाया गया है वह यदि सचमुच में है तो हमें फिर से सोचना चाहिए कि हमें उस सबके होने पर आपत्ति क्‍यों नहीं है? निस्‍सन्‍देह भारत की 'दरिद्र छवि' की बिक्री नहीं की जानी चाहिए लेकिन यदि 'बिकाऊ सामान' उपलब्‍ध है तो उसे कब तक और किस-किस से छिपा कर रखा जा सकेगा?
    भारत की ऐसी छवि प्रचारित करना निस्‍सन्‍देह आपत्तिजनक है किन्‍तु यदि हम सचमुच मे गम्‍भीर हैं तो हमें 'चोर की मां' को मारने के प्रयत्‍न करने चाहिए, 'चोर' को नहीं।
    एक बात और कही जाती है कि भारत को जैसा दिखाया जाता है वैसा सब कुछ दूसरे देशों में भी है। उसे क्‍यों नहीं दिखाया जाता? बात तो सच है। किन्‍तु भारतीय फिल्‍मकार 'उन' देशों का 'वह सब कुछ' क्‍यों नहीं दिखाते? उन्‍हें रोकता कौन है?
    कहीं ऐसा तो नहीं कि 'काम मत कर, फिक्र कर। फिक्र का जिक्र कर' वाली उक्ति पर आदर्श अमल कर रहे हैं?

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  21. मैंने ये चलचित्र कई बार देखा और मुझे ऐसा कुछ भी नजर नही आया जो ग़लत हो | हम भागना किससे चाहते है, गरीबी से या उस सच से जो हम पिचले ६० सालो से जानते तो हैं लेकिन उसे अपनाने से डरते है |अगर कोई हमारी बड़ाई करे तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है पर इसके उलट अगर किसी बेगाने ने हमें हमारे ज़मीनी हकीकत से कुछ कमा लिया तो इतना शोर.. उनका तो काम ही है बेचना चाहे वो सचिन का रुतबा हो या फ़िर किसी कूदे दान का सच |
    विचार कराने लायक बात ये है की हम अपनी बड़ाई सुन कर मस्त होने वालों में से है या अपनी कमी जान कर उसे दूर करनेवालों में से |

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  22. जब सब लोगों के मन में इस फिल्म को देखने की इतनी उत्सुक्ता उत्पन हो रही है तो जिस उदेश्य हेतु निर्माता ने ये फिल्म बनाई है, वो तो अपने आप पूरा होता जा रहा है.
    अजी देखते जाइए....... भारत में भी ये फिल्म सुपरहिट ही होगी.

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  23. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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  24. मैंने स्लम डॉग तो नहीं देखि लेकिन मुंबई में रहते हुए दो दिन स्लम एरिया में ज़रूर गुजारे थे. एक दोस्त की मेहमान नवाजी में. वह जगह जहाँ सुबह शौच के लिए लम्बी लाइनें लगती हैं. एक अन्दर बैठा है तो दूसरा बाहर से खटखटा रहा है. एक फिट चौड़े पटरों पर लोगों को बैलेंस बनाकर एक के ऊपर एक सोते देखा. वहां घरों की खिड़कियों से ताज़ी हवा नहीं बल्कि नालों की बदबू आती है. वहां रहते हुए खटमलों और मच्छरों से दोस्ती करनी पड़ती है. एक तरफ़ लोग ढाबों में नाश्ता करते हैं तो दूसरी तरफ़ कुत्ते कूड़ाघर के ऊपर. पता नहीं फ़िल्म में कितना दिखाया गया.

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  25. इंडियन मीडिया में अब स्लमडॉग् मिलिनेयर की धूम मची हुई है. अखबार-टीवी पर इसकी जय हो रही है. होनी भी चाहिए. लेकिन एक बात थेाड़ी खटकती है. देश में अच्छी फित्म बनाने वालों की कमी नहीं है. रंग दे बसंती, चक दे इंडिया, तारे जमीं पर, गज़नी.. इधर बीच कई अच्छी फिल्में आईं. इनके रिलीज होने से पहले इन पर काफी चर्चा हुई, शोर हुआ हर कोई जान गया कि फलां फिल्म बड़ी जोरदार. इनमें से कुछ ने ऑस्कर में नॉमिनेशन के लिए दस्तक भी दी लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन स्लमडॉग मिलिनेयर एक बहुत ही शानदार फिल्म है, इसका म्यूजिक लाजवाब है, इसका पता हमें बाहर से तब चलता है विदेशों में इसकी जय होती है. ठीक है फिल्म वल्र्ड के लोग और क्रिटिक इसके बारे में जानते होंगे लेकिन आम आदमी को इसके बारें में बहुत नहीं पता था. न इंडियन मीडिया में इसका कोई शोर था. लोगों का ध्यान तब गया जब इसने गोल्डेन ग्लोब अवार्ड जीता. मैंने स्लमडॉग मिलिनेयर देखी, एक फिल्म की तरह बहुत अच्छी लगी. कुछ लोगों अच्छा नहीं लगा कि भारत के स्लम, शिट, स्मेल को सिल्वर फ्वॉयल में लपेट कर वाह वाही लूटी जा रही है. फिल्म देखते समय मुझे कभी अमिताभ, कभी दीवार, कभी कभी जैकी श्राफ याद आ रहे थे और तो कभी मोहल्ले की बमपुलिस (सुलभ शौचालय का पुराना मॉडल...अमिताभ बच्चन ने यह नाम जरूर सुना होगा) के बाहर क्रिकेट खेलते बच्चे. मुझे तो फिल्म में गड़बड़ नहीं दिखी. बाकी तो लोकतंत्र है. यह आप पर है कि स्लम के स्मेलिंग शिट और गारबेज पर नाक दबा कर निकल जाएं या उसके कम्पोस्ट में कमल खिलाने का जतन करें.

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  26. Yeah, yeah. Typical Indian bickering. If an Indian had made that movie, nobody would have cried. Nobody made a hue and cry about "Traffic Signal."

    Anyway, its a typical Indian bickering to cry and say "Oh My God, others saw that we are nude. Nobody knew that before." Take your head out of the sand, watch other international films, start appreciating movie as an art.

    Otherwise start complaining Premchand as well. He used Indian poverty so efficiently to write famous books. People knew there was poverty, and he shouldn't have shown that to everybody. Get a life!

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