गुरुवार, 17 जुलाई 2008

एकल ब्लॉग बनाम कम्युनिटी ब्लॉग -उत्तरजीविता का प्रश्न

अभी कुछ समय पहले किसी ब्लॉगर भाई ने एक अनोखी आशंका व्यक्त की थी कि उसके बाद उसके ब्लॉग की क्या गति होगी .पहली नजर में तो यह कुछ हास्यास्पद सी बात लगी ,मगर जल्दी ही इसके कई निहितार्थ जेहन मे तैर गए ।ब्लॉग लेखन की शुरुआत महज निजी अभिव्यक्ति को धरातल देने से हुयी थी .मगर यह पारम्परिक निजी डायरी भी नही थी जिसे गोपनीयता का आवरण दिया जाता रहा है .कुछेक निजी डायरियां आज नेट पर वजूद में हो सकती हैं मगर अब इनकी प्रवृत्ति लोकार्पित हो उठने की है -लोगों से विचार साझा करने की है .पारम्परिक प्रकाशनों को भी चुनौती देते हुए ब्लॉग नित नए रूपों और भूमिकाओं में उदित हो रहे हैं .कहीं सिटिजन पत्रकारिता का बोलबाला है तो कहीं तकनीकी जानकारियों को सर्व सुलभ बनाने का जज्बा है .ये नए नए रूप कलेवर हमें ब्लॉग जगत के संभावनावों भरे भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं ।

ऐसे में इस माध्यम की कालजीविता या उत्तरजीविता की चिंता ही क्यों हो ?और अब तो साझा चिट्ठे -कम्युनिटी ब्लॉगों की भी तूती बोल रही है -जिन्हें यह चिंता हो कि उनके बाद उनके ब्लॉग का क्या हो वे अपने ब्लॉग को साझे ब्लॉग में रूपांतरित कर दें-मगर इसके लिए समान मनसा -समान धर्मी ब्लॉग साथियों की दरकार होगी .इतनी बड़ी दुनिया में यह भी मुश्किल नही है .साझे ब्लागों का कारवां काल को चुनौती देता चलता रहेगा ।

मगर मुझे किसी इंडिविजुअल की यह चिंता बेमानी ही लगती है कि उसके बाद उसका ब्लॉग यतीम हो जायेगा .भैया अपना काम करो आपके बाद दुनियाँ में क्या होगा इसमे काहें फिजूल का सर खपा रहे हो .हो सकता है कि मनुष्य की कलमें बनाना आसान हो जायं और अपने कलम को आप अपने ब्लॉग लेखन का जिम्मा पकडाते जायं .एक कलम अगली कलम को जिम्मेदारी सौंपे और यह सिलसिला चलता रहे -कभी ख़त्म न हो दास्ताँ ......

मुझे नही लगता कि महान कालजयी रचनाकारों ने कभी सोचा होगा कि उनके बाद उनकी रचनाओं का क्या होगा .तुलसी ने क्या यह सोचा होगा कि उनके बाद रामचरित मानस का क्या होगा ?

तो हे चिंताग्रस्त एकल ब्लॉग लेखक तूं लिखता चल तेरी समस्या का हल भविष्य की गर्भ मे छुपा है -चरैवेति चरैवेति .......

6 टिप्‍पणियां:

  1. असल में कुछ लोग चिन्ता करते हैं, और कुछ लोग रचना करते हैं!
    बाकी कालजयी तो शायद काल भी नहीं है।

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  2. आप तो कुछ दिनों में प्रेमचंद के टक्कर के हो जायेंगे सर जी . इतने सरे नाम के ब्लॉग बनते जा रहे हैं क्या इसे ब्रह्माण्ड का विस्तार समझा जाया खैर विषय बहुत ही गंभीर चयन किया है साधुवाद वैसे जो भी रचना होती है वोह मूलतः सर्व प्रथम स्वान्तः सुखाय ही होती है संशय की स्थिति में ही इसे अन्यों को बताना दिखाने की जरूरत होती है

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  3. सही कहा आपने, जैसे ब्लॉग न हुआ कोई सल्तनत हो गयी कि मेरे बाद इसे कौन संभालेगा?

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  4. अच्छा लेख है - चिंता भी दमदार है. हम कभी भी ठीक-ठीक जान नहीं पाएंगे कि किस किस कालजयी लेखक को अपने जाने के बाद अपनी रचना की फ़िक्र थी. फ़िर भी अकबर की जीवनगाथा लिखने वाले इतिहासकार बदायूनी और मौलाना आज़ाद, ये दो ऐसे शख्स हैं जो मुख्तलिफ वजहों से अपनी किसी रचना को अपने जीवनकाल में प्रकाशित नहीं करना चाहते थे.

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  5. अच्छा लगा
    मेरे ब्लॉग पर भी आये

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  6. अच्छा लगा आप के यहा अच्छे लेख देख कर,धन्यवाद

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