सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल!

अभी कल ही नए ब्लॉग संग्राहक ब्लॉग सेतु के संचालक केवल राम जी ने अपने फेसबुक वाल पर मेरे ब्लॉग क्वचिदन्यतोपि का हेडर लगा कर मित्रों से इस नाम पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी। अभी कोई प्रतिक्रिया आयी भी न थी कि सहसा मैंने उसे देख लिया और थोड़ा असहज हो गया। क्योकि एक तो यह शब्द लोगों की जुबान पर सहजता से चढ़ता नहीं है दूसरे अब यह पुराने ज़माने का ब्लॉग हो गया -लोग याद भी काहें रखें। मुझे केवल राम जी की सदाशयता पर किंचित भी संदेह नहीं है फिर मुझे यह भी डर लगा कि कहीं कोई टिप्पणी न आने से मेरी बेइज्जती न खराब हो जाय -लोग कहें कि ई लो देखो बड़े बनते हैं बड़का ब्लॉगर और आज कोई पूछने वाला भी नहीं है -अब हम लाख कहते कि भाई मैं कोई गुजरा वक्त भी नहीं जो आ न सकूँ मगर कोई काहें को मानता। कई मित्रगण तो आज भी गाहे बगाहे मेरी खिंचाई पर ही लगे रहते हैं। अब लोगों को मौका न मिले यही सोचकर मैंने जल्दी से वहां एक झेंपी हुयी टिप्पणी चिपका ही तो दी। अब यह पोस्ट टिप्पणी विहीन तो नहीं रहेगी। शर्मनाक स्थिति से कुछ तो राहत मिलेगी।

बहरहाल कुछ समय बाद ही वहां ब्लॉग शिरोमणि अनूप शुक्ल जी का आगमन हो गया और उन्होंने मेरे सम्मान की कुछ रक्षा कर दी -क्वचिदन्यतोपि के अर्थादि को लेकर मेरे ब्लॉग पोस्ट वहां लगाए -यह अनूप जी की विशिष्ट विशेषता है -ब्लॉग के आदि(म) पुरुषों में से हैं वें और ब्लॉग साहित्य की कालजीविता के लिए प्राणपण से जुटे रहते हैं -दोस्त दुश्मन में कोई भेद किये बिना। और महानुभाव ब्लॉगों के चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया भी हैं अलग। वे इस माध्यम/विधा को आगे ले चलने को सदैव तत्पर रहते हैं। मुझे आश्चर्य है कि उनके इस महनीय योगदान के बाद भी देश के नामी गिरामी पुरस्कार देऊ संस्थायें उन तक क्यों नहीं पहुँच रहीं। अब तो मुझे लगता है अनूप जी को खुद एक बड़का पुरस्कार घोषित कर देना चाहिए -कम से कम बीस पच्चीस हजार का -इतना वेतन तो पाते हैं वे अब कोई लाख सवा लाख रूपये मासिक तो जरूर ही. ऐसे और कई महानुभाव हैं नाम नहीं ले सकता क्योकि उनसे इतनी स्वच्छंदता नहीं ले सकता जितनी अनूप जी से मगर आह्वान है कि वे भी आगे आएं और एक फंड स्थापित किया जाय जो अच्छे युवा ब्लागरों को पुरस्कृत कर सके। मैं भी अकिंचन योगदान दे सकता हूँ। अपने सतीश सक्सेना जी भी इस पुनीत कार्य में पीछे न रहगें!

अब वक्त यही है कि पहली पीढ़ी के ब्लॉगर आएं और इस माध्यम/विधा को प्रोत्साहित करने को अपनी टेंट ढीली करें ताकि ब्लागिंग का टेंट फिर मजबूती से गड जाए। मैं उन मन को बहलाने वाले विचारों से कतई सहमत नहीं हूँ कि आज भी ब्लागिंग की रौनक कायम है, ब्ला ब्ला ब्ला। अब समय है हम अपना आर्थिक योगदान भी सुनिश्चित करें अन्यथा हिन्दी ब्लागिंग पर उमड़ते संकट को देखा जा सकता है। मुद्रण माध्यम में छपास का मोह और फेसबुक इसे ले डूबने वाला है। तो ब्लागिंग के अग्रदूतों का आह्वान है कि वे इस संकट की बेला में कोई ठोस आर्थिक प्रस्ताव लेकर आएं और हम सब मिल बैठ कर उसे कार्यान्वित करें -एक ख़ास ब्लॉग बैठकी इस काज के लिए भी आहूत की जा सकती है। आप सभी के विचार आमंत्रित हैं -खुदगर्जी से तनिक आगे बढ़ें और ब्लॉग बहुजन हिताय कोई ठोस काम करें!

अंतर्जाल ने हमें मौका दिया अपने परिचय के वितान को विस्तारित करने का -आज हम चंद वर्षों में ही कितने परिचय समृद्ध हो चुके हैं। चिर ऋणी हैं अंतर्जाल के जिसने कितने ही सुदूर क्षेत्र और रुचियों के लोगों को एक साथ ही ला खड़ा नहीं किया, आजीवन प्रगाढ़ संबंधों की नींव भी रख दी। हाँ इस मौके पर कुछ मित्र मुझे शिद्दत से याद आ रहे हैं जो अंतर्जाल से छिटक कर दुनिया की भीड़ में खो गए हैं -मगर कोई बात नहीं -कोई तो मजबूरी रही होगी वार्ना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। हाँ अगर उन तक भी यह बात संदेशवाहकों या समकालीन नारदों के जरिये पहुंचे तो उनका भी स्वागत है अगर वे जुड़ना चाहें इस मुहिम में! अज्ञात रहकर भी लोग यथायोगय गुप्तदान कर सकते हैं।

केवल राम जी, आप से बस इतना ही कहना कि आप की युक्ति कामयाब रही। गांडीव उठवा दिया आपने और अनूप जी आपको भी शुक्रिया कि क्वचिदन्यतोपि के बंद करने की (मिथ्या ) घोषणा करके आपने मुझे प्रतिवाद करने को उकसा दिया। मगर मेरे प्रस्ताव पर ध्यान जरूर दीजिये और मित्रगण भी अपने विचार यहाँ प्रगट करें और कुछ दान दक्षिणा दे सकते हों तो सलज्ज /निर्लज्ज होकर कहें भी -क्योकि यह हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल है।

18 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे नहीं लगता की ब्लॉगिंग को पुरस्कारों की मदद से जीवित रखा जा सकता है. इसकी दीर्घजीविता का तो सिर्फ एक सूत्री उपाय है. और वो है निरंतर लेखन. जो रूचि से पढने वाले होते हैं वो तो आते ही हैं देर सबेर. देखिये हम आ गए है पहली टिप्पणी के साथ. अब इस पोस्ट के टिप्पणीहीन की आशंका निर्मूल होग यी होगी आपकी :)

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    1. बात तो सही कह रहे हैं निहार जी

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  2. hain..............aap vyathit hue..................balak ko 'shame-shame'...............abbhiye.........10 tippani 20 like kar aata hoon.................

    aur aap gahe-b-gahe is tarah ka post likhte rahen .............. jis-se ham balkon 'bhoole-bisre' geet ke tarz pe "purnke blog/blogger/blog-post" se taro-taz hote rahen............

    bakiya, aapke consideration ko consider karte hue 'adhik-se-adhik' janta ka "samarthan" is tippani ke madhyam se karte hain.................

    pranam.

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  3. आपको लगा कि वह स्याह रंग है, वह स्याही थी आपकी कलम के लिए..... :)

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  4. हाँ, अस्मिता का साल का तो है ही | सुझाव भी सार्थक लगा |
    फिर मैं यही कहना चाहूंगी ब्लॉग जब तक पढ़े न जायेंगें तब तक ब्लॉगिंग की रौनक नहीं लौटेगी | ब्लॉग पढ़े जाएँ , विषय को समझकर पाठक विचार रखे , कुछ नए दृष्टिकोण मिलें तो ही वो जीवंत माहौल फिर बन सकता है | ब्लॉग नियमित लिखे जाने से पढ़े नहीं जायेंगें, ये तो हमने देख लिया … नियमित पढ़े जाने से नियमित लिखने का उत्साह बनेगा ।

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    1. हाँ पढने की प्रतिबद्धता तो होनी ही चाहिए

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  5. कल 08/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. ब्लॉग लेखन मेरे जीवन के साथ जुड गया है, मैं तो लिखती रहूँगी , चाहे कोई पढे या न पढे, कभी तो कोई पढेगा ------। वैसे मेरा विचार है कि अधिकांश टिप्पणियॉ पढने पर यह साफ पता चलता है कि ब्लॉग पढे बिना टिप्पणी की गई है, जिसे कहते हैं न ! बला टालना , ब्लॉग पढकर जो टिप्पणी की जाती है , वह समझ में आ जाती है । टिप्पणी लिखने में , लेखक का स्तर दिखाई देना चाहिए तात्पर्य यह कि हम पाठक को टिप्पणी के रूप में क्या परोस रहे हैं, इस दायित्व का बोध होना चाहिए । ब्लॉग का अस्तित्व यदि खतरे में है तो इसके दोषी हम ब्लॉगर ही हैं, जो ब्लॉग के महत्त्व को समझ नहीं रहे हैं पर कभी तो हमें अपनी गलती समझ में आएगी और ब्लॉग फिर अपनी खोई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करेगा । शुभमस्तु ।

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  7. लेखन बोधगम्य हो एवम् रोचक हो तभी ब्लॉग - लेखन की सार्थकता है ।

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  8. ब्लाग लेखक, लेखक भी और पाठक भी, खाली पाठक, खाली ब्लाग, टिप्पणी, बिना टिप्पणी, अभी तक बहुत सी चीजों को समझ ही नहीं पाये हैं । अब ये भी जरूरी नहीं कि हर जरूरी बात में एक दो गैर जरूर भी शामिल हों ले । दो बार पढ़ के लिखे हैं अब ना कहियेगा कि बिना पढ़े टिप्पणी कर दिये । जितना समझ में आया कह दिये ।

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  9. मुझे तो लगता है कि‍ फंड बना के कुछ 'चल बैजयन्‍ती' जैसे ईनाम की व्‍यवस्‍था हो तो ठीक. ताकि सभी सदस्‍यों को बारी बारी से पुरस्‍कृत कि‍या जाता रहे वर्ना काफी समय से तो कुछ इने गि‍ने लोग ही ब्‍लाॅगिंग के ईनाम जीतते दि‍खाई देते रहे हैं :)

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  10. ब्लॉगिंग के अग्रदूत माने … उनकी कोई सूची हो तो अवगत कराएं। पुरस्कार वितरण में निष्पक्षता की गारंटी कौन लेगा। …
    यदि अब तक कुछ तय हुआ हो तो साझा करे कि कितनी राशि एकत्रित करने की योजना है ताकि इस पर सोचा जा सके कि आम ब्लॉगर किस प्रकार सहयोग कर सकता है !

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    1. इस प्रस्ताव पर सोचा जा सकता था मगर भामाशाह लोग तो मौन हैं :-(

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  11. ब्लागिंग तो अनवरत जारी रहेगा, चाहे कोई पुरस्कार हो या न हो | हाँ ! इसके अनुपात में कुछ कमी और अधिकता समय समय पर दिख सकती है.....
    अनुपम प्रस्तुति......आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ......
    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

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