मंगलवार, 25 नवंबर 2014

प्रेम पत्रों का विसर्जन!

 प्रौद्योगिकी की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति ने मनुष्य के निजी और सामाजिक कार्यव्यवहार पर काफी प्रभाव  डाला है और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है।  आज एक मित्र से इस पहलू पर काफी रोचक विचार विमर्श हुआ और उन्ही के अनुरोध पर यह नई ब्लॉग पोस्ट लिखी भी जा रही है।  जी हाँ मनुष्य के जीवन के एक निजी अहम पहलू पर भी प्रौद्योगिकी ने गहरा  असर डाला है और वह है प्रेम. एक समय था जब हर  घर में न तो लैंडलाइन फोन थे और  मोबाइल का  तो दूर दूर तक कोई अता  पता ही न था। और तब प्रेमी प्रेमिका के बीच खतोकिताबत का ही एक सहारा था जिससे इज़हारे मुहब्बत और इश्क़ का सिलसिला चलता था। और वह था सुन्दर सुलेख खतों का आदान प्रदान जिसके जरिये ही मुहब्बत  परवान चढ़ती थी । मेरे मित्र  ने तफ्सील से ज़िक्र किया कि कैसे सुन्दर सुन्दर रंगीन कागजों और लिफाफों का जुगाड़ होता था और लगभग रोज ही एक प्रेम पत्र मेल बाक्स के हवाले हो  जाता था या फिर माशूक /माशूका के घर की दूरी ज्यादा न हुयी तो दीगर  सन्देश वाहकों का इंतज़ाम किया जाता था।
मेरे मित्र का  किस्सा भी बहुत कुछ मेरे जैसा ही है कि जिनसे ख़तो  किताबत हुयी वे कोई और नहीं नव परिणीता पत्नी ही थीं  और उन्हें तो साधिकार प्रेम पत्र लिखने का  सामजिक लाइसेंस मिल गया था। बेशर्मी भी अगर रही हो तो उसकी पूरी स्वीकार्यता थी।  एक पूरा प्रणयकाल(कोर्टशिप पीरियड )  ही इन प्रेम पत्रों के आदान प्रदान में बीत जाता था और तब कहीं जाकर एकाध साल बाद गौना (पति पत्नी का मिलन -सेकेण्ड सेरेमनी ) होता था तब तक उभय हृदयों का  अपरिचय पूरी तरह से मिट चुका होता था। मिलन बस एक औपचारिकता भर रह जाती थी -प्रेम पत्रों  में ह्रदय उड़ेल  दिया जाता था -कस्मे वादे होते थे -जन्म जन्मांतर तक साथ रहने की कसमें खाईं जाती थीं -एक दूसरे के प्रति समर्पण अपने उत्कर्ष पर जा पहुंचता था।

 मित्र ने अपने अतीत को याद करते हुए मुझे भी कितनी ही भूली बिसरी यादें ताजा करा दीं।  यह भी कहा कि  घर घर फोन और मोबाइल हो जाने से बिचारी नयी पढ़ी का यह सुख उनसे छिन गया है - यह कहते हुए उनके चेहरे पर जो भाव था वह ठीक से पढ़ा नहीं जा  सका कि वे नयी पीढ़ी के प्रति वास्तव में अफ़सोस कर रहे थे या फिर उन पर कटाक्ष कर रहे थे. हाँ अपने समय की प्रेम प्रधानता की गौरवानुभूति उनके चेहरे पर स्पष्ट थी। जो मजा कागज़ के प्रेम पत्रों  के लिखने पढने में है भला मोबाइल नेट संस्कृति में  कहाँ? लिखती  हूँ खत खून से स्याही न समझना मरती हूँ तुम्हारे याद में जिन्दा न समझना को पढ़ने का अहसास एक अलौकिकता का बोध कराता था।  उफ़ बीत गए वो रूमानी दिन ..  

बहरहाल मित्रों के बीच का यह अतीत -संवाद एक जगहं आकर ठहर गया -
मित्र ने कहा कि वे प्रेम पत्र तो आज  भी पड़े हुए हैं बहुत ही संभाल कर और सुरक्षित -क्या  किया जाय उनका? ऐसे तो कूड़े में फेंका नहीं जा सकता।  उनका तो एक डीसेंट डिस्पोजल होना चाहिए।  एक सम्मानपूर्ण विसर्जन।  तभी उन्हें याद आया कि मैं तो ब्लॉग लिखता हूँ तो यह समस्या तनिक ब्लॉग पर डाल दूँ -यह बहुत संभव है कि समान वयी  दूसरे मित्रों का भी यही धर्म संकट हो या फिर उनके सामने इसका कोई सम्मानजनक हल हो।  मैंने तो उन्हें सुझा दिया है कि चलिए संगम क्षेत्रे  एक सामूहिक प्रेम पत्र विसर्जन कार्यक्रम ही आयोजित कर लिया जाय और पवित्र संगम की अपार जलराशि में  प्रेम की  इस धरोहर को अर्पित कर दिया जाय।  आपके पास भी अगर कोई और  उदात्त विचार हों तो मित्र की मदद सकते हैं।  

15 टिप्‍पणियां:

  1. सहेजने वाली चीजें विसर्जित क्यों की जाएँ?

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  2. गहराई से सोचें तो तकनीक के इस खेल ने सच में कई चीज़ों से दूर कर दिया । ये हमारे व्यवहार में दिख रही हैं

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  3. यह तो 'नमामि गंगे ' प्रोजेक्ट पर कुठाराघात है । अपने घर के टब को ही संगम समझ कर उस पुनीत कार्य को अन्जाम दिया जाए ।

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  4. संगम मिएँ तो मत ही बहाइये ... कहीं पानी में आग न लग जाए ...
    तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ
    आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

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  5. मित्र (?) के काँधे रखकर बन्दूक चला रहे हैं आप आजकल ;)

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  6. ख़ुद मैंने वो प्रेम पत्र प्रणय-विच्छेद के कई वर्षों उपरांत भी अपने बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखे हुये थे. एक बार "अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो" की परिस्थिति में मुलाक़ात होने पर उनकी ओर से सवाल दागा गया कि वो ख़त (प्रेम पत्र से ज़्यादा वज़न ख़त कहने में आता है) मैंने क्यों बेकार लॉकर में सँजो रखा है, सालाना किराया भी तो देना पड़ता है (उन दिनों तीन सौ रुपये सालाना किराया होता था). हमने भी दिलीप कुमार वाले अन्दाज़ में जवाब दिया - तुम्हारी यादों का किराया तीन सौ रुपये तो बहुत कम है.
    बाद में जब उन्हीं ख़तों को पढने पर हँसी आने लगी कि क्या फालतू बातें लिखते थे हम तो उन्हें गंगा के पुल से गंगा में बहा दिया!
    तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ,
    आग बहते हुये पानी में लगा आया हूँ! टाइप कुछ कुछ!!
    /
    वैसे पण्डित जी इस टेक्नोलॉजी के भी अपने फायदे हैं. रात भर मोबाइल पर सर्दियों की रातों में रजाई में छुपकर आशिक माशूक की बातें... आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम...!!

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  7. विसर्जन!
    कमाल करते हो मियाँ!!!

    बल्कि तो इन्हें स्कैन करें, डिजिटाइज करें और फिर ब्लॉग में और आर्काइव.ऑर्ग में अपलोड कर दें. (चाहें तो निजी / सार्वजनिक सेटिंग जैसी भी रखें, ताकि निजी किस्म के वार्तालाप (ऐसी पंक्तियों को धुंधला भी कर सकते हैं - माने सेंसर!) के सार्वजनिक हो जाने से उत्पन्न हो जाने वाली असहजता की स्थिति न हो.)

    आनेवाली पीढ़ियों के इतिहास के लिए तो कुछ सोचिए!

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    1. अरे यह तो सोचा तक था :-)

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    2. अरे यह तो सोचा तक न था :-)

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    3. मेरी भी सहमती है सर ........... कुछ ऐसा ही करना था :)

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  8. देर से टिप्पणी लिख पाने के फायदे होते हैं कि औरों की महत्वपूर्ण टिप्पणियों से खुद सुझाव देने में सहयता मिलती है ...मुझे ऊपर लिखे सुझावों में रविशंकर जी का सुझाव अच्छा लगा....भावी पीढ़ियों का ख्याल करते हुए यह जनहित में किया गया कार्य माना जाएगा. : ) ..भावी क्यों ....'प्रेमपत्र कैसे होते हैं' ,हम जैसे मूढ़ -मूर्ख लोग भी जान जायेंगे. जो प्रेम -व्रेम से वंचित रह गए... पढ़ाई ख़तम होते ही विवाह हो गया .....प्रेमपत्र लिखने-पाने की नौबत नहीं आई..

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  9. हमारे कॉलेज के दिन वो दिन थे जिसे 'गदह-काल' कहा जा सकता है. चिट्ठियों के अवसान के दिन थे और मोबाइल सबके हाथों में नहीं आया था. दिल्ली विश्वविद्यालय में वैलेंटाइन्स डे चिर-प्रतीक्षित दिन हुआ करता था. उसी दिन प्रेम-सबंधों की बुनियाद रखी जाती थी और कोर्टशिप को संपूर्णता देने के लिए कई पार्क थे जो बस युगलों के लिए थे. एक तो हमारे सेंट्रल साइंस लाइब्रेरी के सामने ही था.

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