गुरुवार, 27 मई 2010

तन ना भयो दस बीस ऊधो!

कलजुगी उधो से गोपियाँ कह रही हैं -हे उधौ तुम देह देह की रट लगाये हुए हो एक बार भी मन की बात करते तो हम उसे जिसे भी कहते उसे दे देते ..तुम्हे भी ..अगर तुम पूरी तरह से देह -राग से मुक्त  हुए होते तो तुम्हे भी पकड़ा देते ....यहाँ कितने  मन  तो हैं ...अरे मन का कोई वजूद भी होता है ..एक एब्सट्रैक्ट सी टुच्ची चीज ....कौन करता है इसकी परवाह आज की दुनिया में ..अरे वो द्वापर वाला उधौ तुमसे लाख गुना  बेहतर था जो मन की बात करता था .. उन बेचारी गोपियों का  बहरूपिये कृष्ण ने इतना ब्रेन वाश कर रखा था कि बिचारी मन  को ही सब कुछ मान बैंठी थी -तन से बेसुध और  मन से चैतन्य ..हम उन सरीखी मूर्खाएँ नहीं उधौ ....हम आधुनिक युग की गोपिकाएं हैं ....हम देह और मन  का अंतर बखूबी समझती हैं ..मुझे बेवकूफ मत मनाओं ..हमने तो अपना मन  कबका निर्गुण को समर्पित कर रखा है ...तुम और  जिसे कहो उसके भी हवाले कर देते हैं -आज की नारी को सशक्तिकरण के बदौलत कई ठो मन  मिल गए हैं -दो चार इधर उधर फेकते चलने में कोई गुरेज नहीं ...तब की टेक्नोलोजी इतना आगे थोड़े थी बिचारी सहेलियों को बस एक ठो मन होने की बात ऐसी घुट्टी में पिला दी गयी थी और किशनवा   हरजाई भी पहले तो बासुरी बजा उन्हें तन से बेसुध कर देता था और बाद में लेक्चर दे देकर यह समझाता था कि तन उतना जरूरी नहीं जितना मन है ....च च कितनी भोली थीं गोपियाँ तबकी, मान गयीं थीं वो बात ...जबकि अंधा भी यह देखे जाने कि केवल ई देहिया ही एक ठो है ...ज़रा बताईं तो उधौ कौनो औरत के राऊर देखे बांटी जिनके एक से जियादा तन हौवे...देखीं हों तो बताईं ...

ना ना हम दुआपर पर वाली गलती नहिए करब ....मन जेके जेके कहें  हमनी दे देईं मगर यी देहियाँ त एक्कै तो है ईकर बटवारा कैसे होई ...ई त केवल कृष्ण कन्हाई क नाम बाटे और उन्ही के मिले ...कहकर न जाने  कुछ गोपियाँ शर्माने की मुद्रा  में आयीं या फिर  केवल दिखी भर ही ...

अब कलयुगी बुद्धिभ्रष्ट उधौ भी कहाँ चूकने वाले थे...बस देह देह की रट लगाये पड़े रहे ....हमें बेवकूफ समझती हैं आप सब ..? हमने भी ई प़ता है  कि ई मन  वन कुछ नहीं होता है बस दिमाग का फितूर है ...कोई मन क देखे भी है  भला ? ई सब गलतफहमी ऊ किशन क पैदा किया हुआ है -आज भी उनके अवतार इधर उधर घूम रहे हैं और ई ब्लॉग जगतवा में भी ....करिहें मन  की बात मगर दिमगवा में देहिये घूमत फिरथ हरदम ..अब किशन के बारे में हमसे बढियां के दूसर जानी ....हमके त कौनो लफ्फाजी नही सुझात ..हम  तो देहवादी हूँ .....मनवादी झुट्ठो से तनिक भी मेरी  नहीं जमती ...सच सच कहिये तो इन कलयुगी किशन कन्हैयों से भी मेरी पटरी नहीं खाती ....आज भी वे केवल मन  की बात करते हैं और मन की बात करते करते जब मन की कर बैठते हैं तब तक देर हो गयी रहती है .....हम तो कहते हैं ऐसे किशनो से दूर रहिये आप लोग अगर भलमनसाहत चाहती हैं ....

आज मनवादी  किशनो से घबराने की जरूरत है . हमारी क्या?  हम  न तो द्वापर में और न अब ही  असली मनवादी रहे ..अरे किशन के झांसे में ऊ वक्त आ गए थे जो मन का सन्देश लेकर आप सभी तक पहुंचे थे...अब हम देह का सन्देश लेकर आये हैं ..और यी सच बात है कि एक जन्म में एक ही तन मिलता है ..बड़े जतन मानुष तन पावा ....सावधान रहीं आप लोग मनवादी किशनो के चक्कर में पड़ कर ई एकतन न कहीं भटक जाय ..फिर लम्बे समय क रोना धोना ...देखभाल और ऊ किशनवा  भी मौका देख गायब हुई जाए .....अरे भाग तो ऊ द्वापर वाला भी गया था और ई तो घोर कलजुगी किशनवे हैं .ध्यान रखीं मन के चक्कर में ई तन कहीं न भटक जाये ...

ऊधौ यह ज्ञान हमें है ..तभी हम कहते हैं न.... तन न भयो दस बीस ...गोपिकाएं समवेत स्वरों में बोल उठीं ...
कहती तो हैं मगर फिर भी कोई मनवादी किशन क्यूं आपके मन की बात कहते अपने  मन की कर बैठता है ...?
ऊधौ बिफर उठे ...पूरी तरह सन्नाटा छा  गया ......

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह उधौ महाराज। सच में मजा आ गया। बढिय़ा पोस्ट।

    http://udbhavna.blogspot.com/

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  2. वाह बहुत बढ़िया और मज़ेदार लगा! उम्दा प्रस्तुती!

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  3. कलजुगी गाथा!
    हरी ओम!
    जय श्री कृष्ण!
    राधे राधे!
    ऐसी गोपियाँ !ऐसे उधो..और मनवादी किशन.......राम!राम !राम!
    घोर कलजुग है!
    ----------
    जोक्स अपार्ट ...-'वास्तविकता का वर्णन कर रहे हैं या खास 'किन्हीं को' चेतावनी दे रहे हैं ..?'
    .............
    [खासकर]इस पोस्ट का भविष्य...क्या अपेक्षित प्रतिक्रियाँ मिलेंगी...?
    नहीं...आज कल ब्लागस्पाट के ब्लॉग खुल नहीं रहे..पवार कट से परेशान ब्लॉगर...लो शेद्डिंग ने या ज्यादा लोड लेने पर तारें जल गयीं ..शोर्ट सर्किट हो गए..और भी न जाने कितनी समस्याएं हैं इन दिनों ..उस में यह पोस्ट अपने उद्देश्य में कितनी सार्थक होगी..??
    [बाय दी वे... आल दी बेस्ट!]

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  4. @शुक्रिया अल्पना जी ,रचनाएं तो कालजयी होती हैं तात्कालिक स्थितियों -परिस्थितियों से निरपेक्ष! और कोई एक भी सजग पाठक इनके मर्म को समझ जाय तो भी ये धन्य हुई रहती हैं -आपने सीधे मर्म को इंगित कर ही लिया है -रचनाकार आश्वस्त हुआ !

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  5. आह..ह....कथा चालू रखें महराज। आंनदम....आनंदम।

    इस तरह के हटेले पोस्टों की मेरा मतलब है हट कर विषय उठाने वाली पोस्टों की काफी दरकार है :)

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  6. निज मन की व्यथा मन ही रखो गोय
    महाराज जी ऐसा लगता है कि पावर कट के कारण नींद पूरी नही हो रही है और ऐसे वैसे ख्याल आ रहे है हे प्रभु इन्हे वह वस्तु कदापि ना देना जो तुम्हारे पास थी तथा तुमने उधो को बताई नही थी
    वैसे विचार सामयिक व वय के अनुरूप ही है

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  7. कृष्ण के निष्काम कर्मयोग को परे रख कर महज उनकी लीला की लीला दिखा कर भरमाने वाले आधुनिक कृष्ण कन्हैयाओं पर गहरी चोट की है .....
    हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी का यही दुर्भाग्य है कि अपनी पुरातन संस्कृति और परम्पराओं या पाश्चात्य संस्कृति से हम सिर्फ कूड़ा करकट ही छाँट पाते हैं ...

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  8. "और मन की बात करते करते जब मन की कर बैठते हैं तब तक देर हो गयी रहती है "

    देखिये प्रथम द्रष्टया यह सम्वाद द्विअर्थी तो है ही , किंतु इसके साथ आलेख का मूल स्वर भी कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना प्रतीत होता है :)

    पंडित जी मैं अक्सर सोच में पड जाता हूं कि हमें ईश भक्ति में लीन देहों का चित्रण स्त्री रूप में करना ही क्यों भाता है :)

    ...और शायद यही कारण है कि हम देवियों के अवतारों /आख्यानों की तुलना में देव अवतारों /आख्यानों को प्राथमिकता देते है :)

    खैर ...आपके आलेख को केवल द्विअर्थी कह कर खारिज़ करना ज्यादती होगी ! व्यक्तिगत रूप से हम यह मह्सूस कर पा रहे हैं कि आपका आलेख आपके सन्देश /आशय को संचरित करने में सफल है ! संक्षेप में कहें तो रचना के गूढार्थ मनोहारी हैं :)

    ( पुनश्च: कृपया इस अकिंचन / नराधम की टीप को भी उभयार्थ मे विश्लेषित /स्वीकार किया जाये )

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  9. @अली सा व्यंग की नोक दिखती कहीं और चुभती कहीं और है .....बहरहाल आपका अनुमोदन मिला जर्रानवाजी का शुक्रिया !

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  10. Baapre baap! Kya qalam ghumayi hai,ki,dimag chakra gaya!

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  11. बहुत बढ़िया विश्लेषण.....

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  12. कलयुगी गोपियों और ऊधो के बहाने आजके मनों की अच्छी खबर ली है। पर आश्चर्य कि आपकी खबर लेने वा... नदारद हैं।

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  13. Oye Udhav !

    Mann ke do Gun hote hain-

    1-ekatwa [singularity]
    2-Anutwa [ Sukshma (small)-atomic property]

    A single 'mann' can associate with millon men at a time by virtue of its 'anutwa'.

    Eg- A single needle can pierce many lotus leaves in just one go.

    "Har shaakh pe kaanha baitha hai,
    Anjaame 'Gopi' kya hoga?
    Barbaad samast kanhaaon ko,
    Bas ek hi Gopi kafi hai. "

    Ek mann aur Ek tan kafi hain.

    aabhar,
    Modern Gopi,
    Divya

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  14. @ हे माडर्न गोपिके , ,तुम्हारी व्याख्या बड़ी दार्शनिक है -कलजुगी ऊधौ जैसे देहवादियों की समझ में नहीं आती!
    वे न मन के फेर में पड़ते हैं न मनमानी करते हैं ....उनका फंडा बहुत साफ़ है तन से मन तक की दूरी बहुत करीब है जबकि उलटे बहुत लम्बी यात्रा है ....इतना धैर्य आज के इस अधैर्य युग में कहाँ किसके पास है ....जिनके पास है वे ज्यादातर धोखे बाज हैं !

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  15. हठेली और हटेली पोस्ट... अली जी, सतीश जी और जील की टिप्पणियाँ इसे और सार्थकता प्रदान कर रही हैं. अल्पना जी और वाणी जी ने भी सही पॉइंट उठाया है.

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