..राम के नाम से जन जन में जाने गए उस महा मानव को एक अकिंचन संबोधन यह भी ...
मैंने भी खूब तलाशा, ढूँढा आखिर हैं कौन राम ? भले ही कबीर दादा ने मना कर दिया था -कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढें वन माहि ऐसे घट घट राम है दुनिया जानत नाहि ..मगर मूर्ख हृदयों को कहाँ चेत ...फिर भी लगा ढूढ़ने राम को ...कब हुए होंगे राम ? हुए भी होंगें या नहीं ? क्या बस एक मिथक हैं राम ? इतना विराट मिथक जो दिक्काल के इतने अपरिमित परिमाप को समेटे हुए है ?..भारत ही नहीं बाली सुमात्रा सिंगापुर पेरू और कितने और देशों तक भी राम का प्रताप जा पहुचा है -करोड़ों लोगों की दैनन्दिनी से सीधे जुड़े हैं राम ....जन्म के सोहर से मृत्यु की शैया तक राम राम ....मिलो तो राम बिछड़ो तो राम ...घृणा भी ,हिकारत भी राम राम से ... .बस केवल एक राम सत्य हैं बाकी सब मिथ्या ...आखिर हैं कौन राम ?
कभी कभी लगता है जब से मनुष्य में सत्य और चेतना की कौध आई तभी से राम का आविर्भाव हो गया ....सिन्धु घाटी की लिपि नहीं पढी जा सकी ....वेदों में दाशरथि राम का जिक्र है ,सीता का भी है ...मगर उन्हें देवत्व प्राप्त नहीं है ....देवत्व उन्हें तब भी प्राप्त नहीं है जब वे आदि काव्य रामायण के नायक बनते हैं ..वे पुरुष श्रेष्ठ है ,नरोत्तम हैं ....मगर ब्रह्म नहीं हैं ....उन्हें तो ब्रह्म का दर्जा देते हैं कबीर और बाद में तो तुलसी उन्हें सगुण ब्रह्म का स्वरुप दे जन जन के लिए प्रणम्य बना देते हैं ..मगर राम अगर ब्रह्म रूप में न भी .होते तो भी वे जन जन के प्राण होते ..उन्हें देवत्व प्रदान किया जाना देवत्व का सम्मान है ...ब्रह्म राम से संपृक्त हो एक अगम्य निर्वैयक्तिक विचार से सहसा ही सबके लिए सुगम बन जाता है ...अगुनहि सगुनहि नाहि कछु भेदा..
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मुझे नहीं लगता कि राम बस मनुज कल्पना की एक मंजु मूर्तिमान स्वरुप हैं ..उत्तर से दक्षिण की ओर आर्यों का प्रवास हुआ है ....अब रावण अनार्य था और राम आर्य -मैं इस मीमांसा में नहीं जाना चाहता ...मगर यह तो सत्य है कि हमारी विरासत राम की ही दी हुई है ..आज कथा सूत्रों के साथ भौगोलिक विवरणों का मेल करें तो वे सारी जगहें , सारे परिवेश अपने विस्तृत और सूक्ष्म दोनों पैमानों पर पग पग पर विद्यमान है ..अयोध्या से तमसा , संद्यिका (सई ) , गंगा ,यमुना ,चित्रकूट ,नासिक -दंडकारण्य ,रामेश्वरम और फिर एक समुद्री पगडंडी से होते हुए श्रीलंका तक राम -पथ अविछिन्न रूप में दिखता है ...राम ने समुद्र सेतु का नव निर्माण न भी किया हो तो उसका जीर्णोद्धार तो किया ही है -ऐसा लगता है ...आज श्रीलंका इसी राम के पद चिह्नों पर चल अच्छी खासी मुद्रा पर्यटन व्यवसाय से कमा रहा है ...क्या इन सारे तथ्यों को ठुकरा दिया जाय ? चलिए यह भी थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं ...मगर फिर राम भारतीय मनीषा में इतना आराध्य क्यों हैं ..पूज्य क्यों हैं अनुकरणीय क्यूं हैं ?
राम पर चार काव्यों की चर्चा जरुरी है ...एक तो आदि काव्य वाल्मीकि विरचित रामायण ,दूसरा कालिदास कृत रघुवंश ,तीसरा भवभूति का उत्तर रामचरितम और चौथा तुलसी का राम चरित मानस ...रामायण से शुरू होकर मानस तक राम की कथा एक महाकाव्यीय यात्रा कथा की पूर्ण.सम्पन्नता की ही कथा है जिसे लव कुश ने ही नहीं अनगनित लोगों ने स्वर संवर्धित किया ...राम को मानव से पूर्ण मानव ,पुरुषोत्तम राम और ब्रह्ममय राम तक बना दिया ..
वाल्मीकि पूरी नृशंसता के साथ राम के दोषों को उजागर करते हैं ..उनके बेटों तक से उन्हें धिक्कार कहलवाते हैं - शाश्वत सतीत्व की मूर्तिमान संज्ञा और पति की अनुगामिनी बने रहने वाली सीता का परित्याग ..? और वह भी एक अदने से आदमी के कह देने पर ? वाल्मीकि के साथ ही लोकमन राम के इस कृत्य पर खिन्न हो उठता है ...कलिदास भी इस मुद्दे पर राम का साथ नहीं देते ..बस भवभूति राम के इस नितांत वैयक्तिक पहलू को उभारते हैं ...क्या सीता के बिना राम का कोई अस्तित्व है -?? ..अंतर्साक्ष्य है कि नहीं ,कदापि नहीं ..-सीता के निर्वासन के साथ ही अयोध्या श्रीं हींन हो जाती है ..
टूटे शिथिल विरक्त राम का विषाद उन्हें जनस्थान को ले जाता है जहाँ वन देवता का कवि मन प्रसूत चरित्र उनकी उसी पीड़ा को उभार कर जनोन्मुख करता है ...राम ने जो किया वह लोक समर्थन में किया ...एक अदने से व्यक्ति की बात नहीं ...पूरी अयोध्या उस तरह बिलख कर सीता निर्वासन को रोकने सामने नहीं आई जैसा राम के वन गमन के समय दृश्य उपस्थित हुआ था ...शायद इसलिए भी कि राम की बात पलटती नहीं थी -वही रघुकुल रीति आड़े आई ...इसलिए ही राम के आचरण का यह बड़ा धब्बा भी उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम की पदवी से रोक नहीं पाया क्योकि उन्होंने जो किया लोक मत के अनुसार किया ..किसको किसको सीता की सच्चरित्रता का प्रमाण देते फिरते ? लोक ने ऐसी अनुचित बात की ही क्यों ? असहाय से धोबी विचारे पर तो लोगों ने सारा ठीकरा फोड़ दिया ..राम के गुप्तचरों की खबर थी कि घर घर में सीता के चरित्र की चर्चा है जैसा कि आज भी लोक मानस उसी मूढ़ता के साथ नारी को चरित्र का सार्टीफिकेट बांटता फिरता है ...यथा स्त्रीणाम तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनों जनः .....(स्त्री के बारे में परिवाद फैलना ही लोगों का काम है ) लोकोपवाद से सीता को बचाने के लिए इतना बड़ा त्याग राम के अलावा कौन कर सकता था ....फिर वे एक चक्रवर्ती राजा बन गए थे ....जिस जगह सीता रहीं वह उनके ही पर्यवेक्षण में ही था ...सहज बुद्धि यह क्यों नहीं समझ जाती ...
वाल्मीकि पूरी नृशंसता के साथ राम के दोषों को उजागर करते हैं ..उनके बेटों तक से उन्हें धिक्कार कहलवाते हैं - शाश्वत सतीत्व की मूर्तिमान संज्ञा और पति की अनुगामिनी बने रहने वाली सीता का परित्याग ..? और वह भी एक अदने से आदमी के कह देने पर ? वाल्मीकि के साथ ही लोकमन राम के इस कृत्य पर खिन्न हो उठता है ...कलिदास भी इस मुद्दे पर राम का साथ नहीं देते ..बस भवभूति राम के इस नितांत वैयक्तिक पहलू को उभारते हैं ...क्या सीता के बिना राम का कोई अस्तित्व है -?? ..अंतर्साक्ष्य है कि नहीं ,कदापि नहीं ..-सीता के निर्वासन के साथ ही अयोध्या श्रीं हींन हो जाती है ..
टूटे शिथिल विरक्त राम का विषाद उन्हें जनस्थान को ले जाता है जहाँ वन देवता का कवि मन प्रसूत चरित्र उनकी उसी पीड़ा को उभार कर जनोन्मुख करता है ...राम ने जो किया वह लोक समर्थन में किया ...एक अदने से व्यक्ति की बात नहीं ...पूरी अयोध्या उस तरह बिलख कर सीता निर्वासन को रोकने सामने नहीं आई जैसा राम के वन गमन के समय दृश्य उपस्थित हुआ था ...शायद इसलिए भी कि राम की बात पलटती नहीं थी -वही रघुकुल रीति आड़े आई ...इसलिए ही राम के आचरण का यह बड़ा धब्बा भी उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम की पदवी से रोक नहीं पाया क्योकि उन्होंने जो किया लोक मत के अनुसार किया ..किसको किसको सीता की सच्चरित्रता का प्रमाण देते फिरते ? लोक ने ऐसी अनुचित बात की ही क्यों ? असहाय से धोबी विचारे पर तो लोगों ने सारा ठीकरा फोड़ दिया ..राम के गुप्तचरों की खबर थी कि घर घर में सीता के चरित्र की चर्चा है जैसा कि आज भी लोक मानस उसी मूढ़ता के साथ नारी को चरित्र का सार्टीफिकेट बांटता फिरता है ...यथा स्त्रीणाम तथा वाचां साधुत्वे दुर्जनों जनः .....(स्त्री के बारे में परिवाद फैलना ही लोगों का काम है ) लोकोपवाद से सीता को बचाने के लिए इतना बड़ा त्याग राम के अलावा कौन कर सकता था ....फिर वे एक चक्रवर्ती राजा बन गए थे ....जिस जगह सीता रहीं वह उनके ही पर्यवेक्षण में ही था ...सहज बुद्धि यह क्यों नहीं समझ जाती ...
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अब एक पोस्ट में राम के किस रूप को समेटूँ - आज्ञाकारी पुत्र ,आदर्श भाई ,एकनिष्ठ दाम्पत्य को समर्पित आदर्श पति ,.एक श्रेष्ठ शासक ...यह अपौरुषेय कर्म है ...हाँ एक बात कह दूं, राम और सीता जैसी जोड़ी और उनकी देवोपम सुन्दरता के इतने विवरण हैं कि लगता है जिसने इस युगल जोड़ी को देखा वह तो ठगा ही रह गया जिसने नहीं देखा उसका जीवन ही व्यर्थ चला गया ....यह भी एक पहलू है राजा राम कथा का जिस पर चर्चा फिर कभी .....राम का जीवन त्याग त्याग और सर्वथा त्याग का है ,कड़े विधान नियमों में जीवन यापन का है ....आज इसलिए भारतीय जनमानस में त्याग का बड़ा मूल्य है ....आप परिवार में , समाज में ,राजनीति में त्याग के उदाहरण तो दिखाईये ,फिर देखिये जनता जनार्दन किस तरह आपको मानो राम का राज्य ही सौपने को उद्यत हो जाती है ......
राम सीता के भेष में थाई नर्तक नर्तकी
मानस की इस चौपाई से सीता के प्रति राम की भावना -उदगार के साथ ही यह ब्लॉग पोस्टीय रामांक पूरा करता हूँ -इनका ह्रदय एक दूसरे के प्रेम को जानता है ,सीता हर जन्म में राम की ही प्रिया बनने को आकांक्षी हैं ..कृष्ण रूप में वही राधा हैं ..जन मानस आज भी उन्हें अलग अलग कहाँ देखता है ....हर सुघड़ जोड़ी सीता राम की ही जोड़ी है ....राम सीता से कभी न अलग हुए और न कभी होंगे ......
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा ,जानत प्रिया एक मन मोरा
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं ,जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं
(मानस ,सुन्दर काण्ड :१४/६-७)
सियावर रामचन्द्र की जय ....



