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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

रचाती कामनाएं नित स्वयम्बर!

हिन्दी कवि और कविता प्रेमी क्या इसे झेल पायेगें ? :-)

रचाती कामनाएं नित स्वयम्बर
प्रेम की चिरंतन चाह लिए होती है प्रेमियों की आतुरता
वैसे ही जैसे स्वाति बूँद की चाह लिए चातक रहता रटता

सीप की भी होती है साध पले उसके गर्भ में इक मोती दुर्लभ
वैसे ही जैसे चाहे स्वाति की बूँद  कोई निरापद आश्रय सुलभ

मुक्ता संभरण का संयोग है तभी प्रतीक्षा हो सीप की जब चिर
स्वाति बूँद सहजने को रहे वह हर क्षण हर पल आकंठ तत्पर

उभय प्रेमियों में हो मिलन की चाहना और प्रीति जब परस्पर
प्रेम तब परिपूर्ण होता और रचाती कामनाएं नित स्वयम्बर

रविवार, 27 जुलाई 2014

अक्सर ऐसा होता क्यूँ जब कविता लिखने को मन हो आये


अक्सर ऐसा होता क्यूँ जब कविता लिखने को मन हो आये
शुष्क जगत के व्यवहारों से रूठा मन रूमानी हो जाए
प्रीत किसी की लगे छीजने जी अकुलाने को हो आये
तब काव्य देवि के चरणों में ही जा मन कुछ राहत पाये

कैसे कैसे लोग यहाँ जो रीति प्रीति की समझ न पाये
हृदयी आग्रहों को त्यागे बस गुणा गणित हैं अपनाये
भावुकता का मोल नहीं यह बिना मोल की बिकती जाए
दुनियादारी का परचम ही हर दिशा में है अब फहराये

चाह किये अनचाहे की तो कविता ठौर कहाँ पर पाये
आद्र स्पंदनों से दुलरायें तो बंजर में अंकुर उग आये।
संवेदन हो मानव उसकी यही विरासत समझ में आये
पशुवत होता जा रहा आचरण मन को कितना अकुलाये

गीत संगीत की रुनझुन अब रास किसी को ना आये
निज स्वारथ का नशा चढ़ा हर मन को है भरमाये
प्राप्य नहीं था मनुज का यह तो राह वह नित भटका जाए
देख दशा यह कुल की अपने कविता लिखने को मन हो आये


मंगलवार, 24 जून 2014

तुम वो तो नहीं!

तुम वो नहीं
तसव्वुर में थी बसी एक तस्वीर जो
मुद्दत से  था जिसका ख़याल
था सदियों से इंतज़ार जिसका
तुम वो नहीं

पास तुम आये जो
लगा सच हुआ ख्वाब मेरा
मगर जल्द ही टूटे भरम
तुम वो नहीं

शुक्र है उन
नजदीकियों का
होती गयी हर हकीकत  बयां
तुम वो नहीं

तिश्नगी फिर से वही अब
इंतज़ार फिर उस प्यार का
ताकि हो ताबीर उस ख्वाब का
तुम वो तो नहीं!

मंगलवार, 10 जून 2014

क्यूँ होता है ऐसा? (कविता)

क्यूँ होता है ऐसा?

क्यूँ होता है ऐसा  कि पराये अपने हो जाते हैं और अपने पराये
कि चुक जाती  है प्रीति अनायास ही किसी मीत की और
अलगाते हैं रिश्ते  अकारण ही  बिना बात के
विस्मृत  हो जाते  हैं वे सभी  वादे
किये गए थे जो  कभी भावों के आगोश में 
क्यूँ होता है 
ऐसा कि  अनायास ही कोई मिलता है  और लगता है
जैसे हो उससे  जन्म जन्मान्तर का कोई रिश्ता
मगर  वह भी  बिखर जाता है बिना परवान चढ़े 
यह अल्पकालिक जीवन भी कैसे कैसे  श्वेत श्याम
और इंद्रधनुषी सपने दिखाता  है
 एक दिन सहसा ये सारे सपने बेआवाज टूटते हैं -
सहसा  आ धमकता है आख़िरी दिन का फरमान
ऐसा क्यूँ होता है?

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना!

भरा था स्नेह में उसके कभी जो

बेसुधी रहती थी  हर रोज छाई

बेरुखी से अब उसी के संतप्त होना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

संयोग होगा न ऐसी अब आस कोई

मौन हैं वसंत के स्वर न उजास कोई

उसी की टेर में अब क्यों वक्त खोना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

 

सुधि न ली मेरी कभी भी लौटकर
था मुग्ध मैं सर्वस्व जिसको सौंपकर
अब उसी पाषाण की क्या चाहना
ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

है प्रतीक्षा अब नए इक मीत की

इंद्रधनुषी कामना, नई इक प्रीति की

लौट के ना आयेगी वह क्रूर छलना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

अभिलाषा (कविता)

ब्लॉग जगत में देखा देखी कभी कभार मुझे भी कविताई का शौक चर्राता है :-) वैसे बार बार कहता रहा हूँ कवि कर्म बहुत ही दुष्कर और दुस्तर है।  आशा है इस नईं कविता को आप झेल लेंगें! :-) :-)
अभिलाषा 
क्या हुआ जो प्रौढ़ता ने
पलक पावड़ें आ बिछाए
विगत की जीवन्तता है
आज भी मन को रमाये
कामनाएं जीवन क्षितिज पर
 आज  भी  दिप दिप दमकती
 स्वर्णरेखी इच्छाएं हैं अनगिन
रात दिन अब भी मचलती
चित तो अब भी है चंचल
किन्तु हुआ है तन अचंचल
 इनके समंजन का आ बने
अब कोई तो नवीन संबल
 कितनी साधें और साधनाएँ
क्या रहेगीं  चिर अधूरी
पल छिन घट रही है
 जब  जीवन डोर की दूरी
काल का पहिया थमे
रुक जाए यह द्रुतगामी समय
कर सकूं संकल्प पूरे
जो कभी लिए मैंने अभय
आह्वान है यह समूची संसृति
और सृष्टि से निरंतर
कुछ मंद हो यह जगत गति
 और समय जाए ठहर
रस भाव और वर्ण मात्रा की त्रुटियों की और  पारंगत जन ध्यान दिलाकर ठीक करायेगें यह अनुरोध भी है. 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

क्या खाली पीली होली ?

क्या खाली पीली होली ?
नहीं नहीं
खा ली और पी ली होली
क्या खा ली क्या पी ली
भांग खा ली और ठंडई पी ली
बस इत्ती सी होली?
नहीं नहीं
ली थोड़ी गुलाल
मुंह पर उनके मल ली
नेह के रंग भिगोली
कर तन मन रंग रंगीली
खुशियों से ली भर झोली
बस हो ली होली
 याद आयी
बहुत  घर की होली 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

फागुनी अहसास को जगाता एक कविता संग्रह!

सुनीता शानू जी के नए कविता -संग्रह 'मन पखेरू उड़ चला फिर ' की मानार्थ प्रति मिली तो शीर्षक ने मन में बहुत उमड़ घुमड़ मचाया। अभी तक तो प्राण पखेरू का रूढ़ प्रयोग हिन्दी में दुखद संदर्भों में  आया है मगर यहाँ  मन पखेरू के उड़ने के सर्वथा नए प्रयोग ने चौका सा दिया . यहाँ मन का पखेरू शरीर के प्रतिबंधों से दूर उन्मुक्त विचरण के लिए उड़ चला है .बंधनों से चिर आजादी का यह भाव और इस नए बिम्ब प्रयोग को स्वीकार करने में कोई असहजता संग्रह को पढ़ने के  बाद  नहीं बची थी  . किताबों की समीक्षार्थ/ मानार्थ प्रतियाँ मिलने पर मैं उन्हें आदतन तुरंत नहीं पढता बल्कि अपनी स्टडी मेज या फिर ड्राईंग/लिविंग कक्ष की मेज (यहाँ राबर्ट्सगंज में टू इन वन या इन आल इन वन ही कहिये ) पर छोड़ कई दिन निहारता रहता हूँ . फिर बहुत ही अहतराम से उठा पढने में मुब्तिला हो उठता हूँ . अभी कल ही संग्रह की अंतिम कविता तक पहुंचा  हूँ .

कविता संग्रह बहुत ही मौके से मिला है मुझे -फागुनी बयारों के बीच फागुनी कविताओं ने कहर ही ढा दिया है समझिये :-) .मैंने अपने मन को गहरे स्पर्श कर गयी एक कविता को फेसबुक पर भी शेयर किया . देखिये मैं हिन्दी साहित्य का मनई तो हूँ नहीं तो मुझे समीक्षा कर्म वगैरह आता नहीं और उसके प्रतिमानों और अनुशासनों से सर्वथा अनभिज्ञ भी  हूँ इसलिए इसे कृति की समीक्षा न माना जाय .यह एक सुहृद के प्रति मेरी कृतज्ञता ज्ञापन का बस विनम्र उपक्रम भर है -सुनीता शानू जी से विगत वर्ष मेरी भेंट  लखनऊ के ब्लॉगर परिकल्पना दशक सम्मान में हुयी थी -उनकी विनम्रता, सहजता,सरलता ने क्षणों में ही अपरिचय की औपचारिकताओं को छू मंतर कर दिया था . तब मुझे यह बिल्कुल भान नहीं था कि मैं एक उदीयमान प्रतिभाशाली कवयित्री के चंद घंटों के सानिध्य में मैं हूँ-वे दिल्ली लौटीं और फिर उनकी स्मृति उनकी फागुनी कविताओं के साथ सहसा लौट आयी हैं .
मन पखेरू का मूल स्वर उन्मुक्तता/जड़ बंधनों से आज़ादी का तो हैं मगर डोर को पूरी तरह से स्वच्छंद छोड़ देने की हिमायती भी कवयित्री नहीं है। उनकी कविता डोर की अंतिम पंक्तियां यही तो कहती हैं - 'सच है डोर से बंधी होती तो पूरा न सही होता उसका भी अपना एक आकाश' ...संग्रह की आख़िरी कई कविताओं ने ख़ास प्रभावित किया जो  मेरी अपनी पसंद है -कवयित्री या प्रकाशक/सम्पादक ने कविताओं के चयन क्रम को अपने ढंग से रखा होगा . आनंद कृष्ण जी की इस पुस्तक से सम्बन्धित समीक्षा संग्रह के शुरू में ही है और यह इतनी सम्पूर्ण है कि उसके बाद किसी के लिए भी समीक्षा के लिए कुछ  बचता ही नहीं . उन्हें इस संग्रह  की कविताओं में एक संभावनाशील कवयित्री की पदचाप सुनायी दी है और मैं उनसे सहमत हुए बिना नहीं रह सकता . सुनीता जी ने प्रेम की सघन अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति नहीं की है बल्कि कई सामाजिक विडंबनाओं को भी सटीक उकेरा है -इस लिहाज से कन्यादान, ऐ कामवाली,माँ   रचनाएं बहुत सशक्त बन पडी है . संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है कविताओं का अपने पाठकों से सहज संवाद -इन कविताओं में अमूर्तता नहीं है,निर्वैयक्तिकता नहीं है.  जीवन के पल प्रतिपल के अनुभवों से लबरेज हैं ये कवितायें!
 कृति 
हिन्द -युग्म ने बहुत सलीके से और एक स्लीक लुक के साथ इस कविता संग्रह को प्रकाशित किया है -प्रशंसा के मेरे दो शब्द प्रकाशक के लिए भी हैं। मुझे एक लम्बे समय बाद एक कविता संग्रह ऐसा मिला है जिसकी अधिकाँश कविताओं ने मुझसे सहज संवाद किया है। अंत में वो फेसबुक वाली कविता आपको पढ़ाना चाहता हूँ-

खामोशी
आँखों ने आँखों से
कह दिया सब कुछ
मगर जुबां खामोश रही

जब दिल ने
दिल की सुनी आवाज
धड़कन खामोश रही
तुम्हारे प्यार की
खुशबू से तृप्त
उठती गिरती साँसे देख
पलकें खामोश रहीं
कृतिकार 
और वहां मेरा कमेन्ट था- सारे पहरेदार या तो मौकाए वारदात पर सोये रहे या गुनाह के खामोश भागीदार हुए। :-)  सुनीता शानू जी को उनके प्रथम कविता संग्रह के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई!

सोमवार, 7 जनवरी 2013

नुकीली हवाएँ ,चुभती ठण्ड!

कड़ाके की ठण्ड पड़  रही है। मानवीय गतिविधियां शिथिल पड़  रही हैं . कहते हैं पैसे वालों के लिए ठण्ड अच्छा मौसम है .होता होगा जो समाज दुनियां से निसंग लोग है-आत्मकेंद्रित हैं . हेडोनिस्ट हैं। मगर हम लोग तो तमाम सरोकारों से जुड़े हैं सो ठण्ड से भी दो चार हो रहे हैं . 
अपुन के पूर्वांचल में कैसी ठण्ड पड़ती है और जन जीवन कैसे ठहर सा जाता है, इसका एक जोरदार शब्द चित्र ब्लॉगर पदम सिंह ने खींचा है अपने ब्लॉग पर , आज ठिठुरते हुए बस वही आपसे साझा कर रहा हूँ -कविता आप भी ठिठुरते हुए पढियेगा तो ज्यादा  आनंद आएगा :-) 

चला गजोधर कौड़ा बारा …


कथरी कमरी फेल होइ गई
अब अइसे न होइ गुजारा
चला गजोधर कौड़ा बारा…
गुरगुर गुरगुर हड्डी कांपय
अंगुरी सुन्न मुन्न होइ जाय
थरथर थरथर सब तन डोले
कान क लवर झन्न होइ जाय
सनामन्न सब ताल इनारा
खेत डगर बगिया चौबारा
बबुरी छांटा छान उचारा …
चला गजोधर कौड़ा बारा… 
बकुली होइ गइ आजी माई
बाबा डोलें लिहे रज़ाई
बचवा दुई दुई सुइटर साँटे
कनटोपे माँ मुनिया काँपे
कौनों जतन काम ना आवे
ई जाड़ा से कौन बचावे
हम गरीब कय एक सहारा
चला गजोधर कौड़ा बारा….
कूकुर पिलई पिलवा कांपय
बरधा पँड़िया गैया कांपय
कौवा सुग्गा बकुली पणकी
गुलकी नेउरा बिलरा कांपय
सीसम सुस्त नीम सुसुवानी
पीपर महुआ पानी पानी
राम एनहुं कय कष्ट नेवरा
चला गजोधर कौड़ा बारा …
…. पद्म सिंह (अवधी)

कुछ समझ  न आये तो सकुचाने की जरुरत नहीं है, पूछ सकते हैं! :-) 

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?


भावों को शब्द -बद्ध करना  कितना  मुश्किल है :-( शब्द साधना एक तपस्या है . गुणी  मित्र गण माफ़ करेगें इस अनाधिकार चेष्टा के लिए -


यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?

जो  दीन है औ  शीर्ण है 
 जर्जर  जरा अधीन है 
 तुम्हे अब क्या दे सकेगा 
 जो आर्त है,पराधीन है 

 क्षितिज की ओर देखो 
उभरती तरुणाई  जहां है 
नव चेतना का आह्वान औ
आ पहुंचा  शुभ  विहान  है  

कर सकेगा सम्पूर्ण  तुमको 
अभिसार  कर हर विध वही 
हो सकेगी संतृप्ति रसमय 
मिटेगी चिर प्यास   भी 

अब नहीं  है शेष कुछ भी 
दे सकूं जो प्राण प्रिय को 
छीजती जाती  है प्रतिपल 
जीवन की डोर अब तो 


फिर भी हूँ  विस्मित  भला 
 नेह पर जिसके   पला 
क्यों अचंचल बन गयी वह 
स्वभाव से ही  जो चंचला 

पूछता जाता हूँ विस्मित 
छोड़ नव आकर्षणों को 
मुझी पर है किसी का 
 नेह क्यों,अनुराग क्यों?







बुधवार, 12 सितंबर 2012

असीम त्रिवेदी के चर्चित कार्टून पर एक काव्य प्रतिक्रिया


असीम ने हमारे मूल प्रतीक चिह्न के वर्तमान निहितार्थ को ही अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है उनका अभिप्राय कतई हमारे राष्ट्रीय प्रतीक को कलंकित करने का नहीं है ......और यह आजादी मानावाभिव्यक्ति की आजादी है! असीम के पक्ष में पिता जी की यह कविता पढ़िए: 
चले थे कहाँ से ,किया था क्या वादा 
कहाँ आ गए हम, हुआ क्या इरादा 
कितने मनोरम वे सपने लगे थे 
हुए क्यों पराये जो अपने सगे थे 
बहुत ही सुखद था उमीदों का पलना 
हुआ जब सवेरा तो छलना ही छलना 
सितारों का पाना समझा सरल था 
बढ़ाया कदम तो अमृत भी गरल था 
शहीदों ने जिसके लिए व्रत लिया था 
कहाँ है वह भारत जो सोचा गया था 
जितने हैं मक्कार गद्दार पाजी 
हुए हैं विधाता बने हैं वे काजी 
सत्यमेव्  जयते को क्या हो गया है 
महाकाव्य का अर्थ ही खो गया है 
वोटों की खातिर जुटे हैं जुआड़ी 
हुयी द्रोपदी आज जनता बेचारी 
हालत जो पहुँची है बद से भी बदतर 
कहाँ चक्रधारी कहाँ हैं धनुर्धर 
नहीं कोई आशा नहीं कोई हमदम 
नहीं हमको मालूम कहाँ जा रहे हम 
अस्मिता खोता भारत महाभ्रष्ट भारत 
आजाद है या पराधीन भारत 
महाभारती का महाघोष भारत 
करो या मरो मन्त्र लो फिर से भारत 

-डॉ. राजेन्द्र मिश्र (राजेन्द्र स्मृति से) 


शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

मदमत्त हो रहा सावन

मदमत्त हो रहा सावन 

खुशबू खुशबू दिन हैं 
महकी महकी रातें
अलसाई सी सुबहें
औ बहकी बहकी बातें 
सुनहली हुई  दोपहरी
रुपहली घिरती शाम 
नित बरसा की फुहारें 
होठों पे उनका नाम 
मन मयूर का  नर्तन 
दहगल का शुभ गान 
मदमत्त हो रहा सावन 
छेड़ी अनंग ने तान 


शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

अब सावन से आस है!


कविता की अपनी एक कशमकश भरी सृजन प्रक्रिया है ..किसी प्रसव वेदना से कम नहीं ..

जब तक वह भीतर हो एक बेचैनी सी बनी रहती है ...मगर बाहर आते ही एक गहन संतोष भाव उमड़ता है -यह कविता जो परसों  अंकुरित हुई,फेसबुक पर अवतरित हो  अब आपके सामने है ....ब्लॉग जगत में इतनी अच्छी अच्छी कवितायें लिखी जा रही हैं .फिर ऐसी अनगढ़ कविता पोस्ट करना? आखिर बेशर्मी भी कोई चीज है! कविता पारखी जनों से क्षमा याचना सहित! 

अब सावन से आस है! 

आषाढ़ रीत गया 
सावन से आस है ...
जीवन घट सूना सा 
न मीत कोई पास है 
न छाई है बदरी, 
बेगानी उजास है
घटा कोई घिर आये
एक यही आस है! 
अकेला यह सफ़र 
औ' विछोह के दंश हैं 
मृगतृष्णायें राह की 
प्यास हुई अनंत है 
कोई तो योग हो 
मन का संयोग हो 
मजिल मिले ना  मिले 
बस मनचाहा साथ हो 
टूटती है आस अब 
घुटती है साँस अब 
 मिलना हो  उनका 
  तो आख़िरी पड़ाव हो

शनिवार, 24 मार्च 2012

चिट्ठाकार चर्चा की नीरवता को तोड़तीं अमृता तन्मय!

बहुत दिन बीते चिट्ठाकार चर्चा में  किसी सुधी  चिट्ठाकार की चर्चा नहीं हो पाई ..एक नीरवता सी छाई रही है यहाँ...यह नीरवता अकारण  नहीं है ...एक तो शायद वह शुरुआती उमंग रोमांच नहीं रहा ब्लागिंग का -अर्थशास्त्र के ला आफ डिमनिशिंग रिटर्न की भांति इस विधा की अब वह शुरुआती चाहना नहीं रही और कुछ इस  टैब्बू से मैं आशंकित रहा जिसमें एक मोहतरमा बलागर  ने सरे आम मुझे यह कह डाला  था कि मैं जिसे भी चिट्ठाकार चर्चा में शामिल करता हूँ उससे मेरे सम्बन्ध ख़राब हो जाते हैं -मुझे भी हैरत हुयी जब मैंने सिंहावलोकन में आंशिक रूप से इस बात को सच पाया . मैं इतना ही कहूँगा कि मानव जीवन ,भावनाएं और व्यवहार बहुआयामी और बहुत जटिल हैं ...अब किसी की प्रोफाईल को सम्मिलित करने का मतलब यह भी नहीं कि उसके साथ मेरा कोई सप्तपदी का अनुबंध हो गया और मैं आजीवन उससे बड़ा ही उदारतापूर्ण, सहिष्णु सम्बन्ध बनाए ही रखूँ ...और सारी बात का ठीकरा मेरे ही सर पर फोड़ दिया जाय यह भी कहाँ का न्याय है ....दूजे यह बात भी है कि कुछ ऐसे भी मित्रगण रहे हैं जिनसे मेरे टाप के और गहन सम्बन्ध रहे मगर उन्हें मैं अन्यान्य कारणों से अपने इस प्रिय स्तम्भ में नहीं ले पाया हूँ -कुछ तो ब्लागजगत को भी छोड़ चुके हैं और इस धरा पर कहाँ हैं अब यह भी नहीं मालूम -गुमनामी की अंधियारे में खो गए ..और मुझे बच्चन जी की यह सीख याद कराते रहते हैं,जो बीत गयी से बात गयी ...और नीड़ का  निर्माण फिर फिर .....ओह प्रस्तावना इत्ती लम्बी क्यों हो रही है ..लाजिमी है इतना दिन का अंतराल रहा है जो ...मगर आज उस अंतराल की पूरी भरपाई करने ब्लागजगत की एक खालिस कवयित्री आयी हैं ....अमृता तन्मय....

मगर किंचित संकोच भी है कि चिट्ठाचर्चा में इस चिट्ठा -कवयित्री को शामिल करने की सहमति/अनुमति उनसे नहीं ले पाया ....क्योकि उनसे संपर्क का कोई सूत्र नहीं मिला ..उनका ब्लॉगर  परिचय पृष्ठ केवल उनका नाम बताता है और वह भी शायद उनका काव्य नाम है ,वास्तविक नहीं ..फिर उनका जेंडर फीमेल बताता  है और लोकेशन पटना, इण्डिया बताता है ...आशा है ये विवरण सही हैं ...उन्हें चिट्ठाकार चर्चा  में लेने का एक  गूढार्थ भी है -अब चूंकि उनसे कोई खतो किताबत,चर्चा परिचर्चा नहीं है इसलिए सम्बन्ध खराब होने की संभावना भी नहीं है ...और यह भी कि इस तरह मेरे इस स्तम्भ से जुडा टैब्बू ख़त्म हो जाय सो इस कवयित्री का यहाँ शामिल होना  एक शुभकारी टोटका -अनुष्ठान भी है ....

मेरी हे कवयित्री कविता आपने पढी होगी ..उससे दीगर अगर कुछ कवयित्रियाँ यहाँ है तो उनमें एक अमृता तन्मय भी है ...इनकी कविताओं में मैंने श्रृंगार  वियोग से अलग का फ्लेवर पाया है और वह इनके काव्यकर्म को एक पृथक पहचान देता है -आध्यात्मिक भाव का संस्पर्श  ...और प्रकृति के कई बिम्बों को लेकर भावाभिव्यक्ति! उनकी यह ताजी कविता, बस  कोई   पढ़ते ही मन में सहसा ही कौंधा कि क्यों न मैं इस काव्य कर्म प्रवीण कवयित्री का सादर आह्वान यहाँ अपने इस लम्बे समय से नीरवता ओढ़े स्तम्भ में करूं.. आलोच्य कविता में एक बहुव्यापी रिक्तता की ओर कविमन संकेत करता है -मतलब कहीं न कहीं कोई, कुछ सूक्ष्म सी  अपूर्णता है जो सम्पूर्णता के, समुच्चय के सुख की चरमता को हठात रोके हुए हैं  ..अगर वह सूक्ष्म अपूर्णता पूरी हो जाय तो बस बात ही बन जाय ..यह एक अकेली कविता ही कवयित्री के काव्य कर्म को  एक समादृत स्थान दिलाने में समर्थ है -इसमें भाव प्रवणता तो है ही मगर शिल्प और साहत्यिक बोध के आधार पर भी यह एक अद्भुत और लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कविता है .....

मेरे पूर्व के चिट्ठाकार चर्चा में व्यक्तित्व निरूपण को एक अनिवार्य घटक के रूप में लिया जाता रहा है ..मैंने स्वीकार किया है कि चिट्ठाकार चर्चा की अभ्यर्थता में मात्र कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व का  समावेश मेरे लिए अपरिहार्य रहा है ...मगर आज की चिट्ठाकार चर्चा इस अर्थ में भी अपवाद है ..मुझे कवयित्री के व्यक्तित्व का कुछ अता पता नहीं ...मात्र किसी के रचना कर्म से उसके व्यक्तित्व का निरूपण एक जोखिम भरा  काम है और ऐसा कोई जोखिम उठाने का कोई मतलब भी नहीं ...एक आशंका  भी रहती है कि महान कवि कवयित्रियों में कृतित्व और व्यक्तित्व का साम्य प्रायः  नहीं पाया गया है ....और ऐसी कोई प्रत्याशा भी शायद अनौचित्यपूर्ण है ....वो देशी कहावत है न -आम खाने से मतलब होना चाहिए आम के  पेड़ से नहीं!

अमृता तन्मय को मैंने चिट्ठा कवि लिखा है -मतलब वे ब्लागजगत में और शायद  अन्यत्र भी किसी अन्य विधा में योगदान नहीं कर रहीं ,यहाँ  तक कि अपने काव्य चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों का जवाब भी  नहीं देती..महज कवितायें ही लिखती हैं.. यही उनका मुख्य व्यसन /टशन है . और हाँ वे क्वचिदन्यतोपि की नियमित पाठिका हैं ..और इसलिए भी मेरी कृतज्ञता आखिर उनके प्रति क्यों न हो ....

अन्य ब्लागों पर भी अमृता की  सार्थक अभिव्यक्तिपूर्ण टिप्पणियाँ देखने को मिलती रहती हैं ...वे एक सजग पाठिका भी हैं ..केवल आत्मकेंद्रित, आत्म मुग्धा ब्लॉगर ही नहीं ....मैं उन्हें उदीयमान कवयित्री कहने से हिचक रहा हूँ क्योकि मेरी दृष्टि में वे काव्य कर्म के उस  मुकाम पर पहुँच गयी हैं जहां किसी को महज उदीयमान कहना उचित नहीं .....वे लम्बे समय से ब्लागजगत में अविकल साहित्य सेवा कर रही हैं और आपमें से अधिकाँश उनके  काव्य लालित्य से परिचित भी होंगे ....मैं अमृता की कई कवितायें आपको  पढाना चाहता हूँ मगर उन्होंने अपने ब्लॉग पर ताला जड़ रखा है -मैं कापी पेस्ट नहीं कर  पा रहा हूँ ...मगर सर्दियों में उनकी लिखी  एक और कविता  पढने की जोरदार सिफारिश करते हुए इस संभावनाशील कवयित्री के काव्य कर्म के आस्वादन  का आह्वान करता हूँ ....
शुभकामनाएं अमृता!  



सोमवार, 5 मार्च 2012

हे कवयित्री!


हे कवयित्री!

होली देहरी लाँघ चुकी है अब तो छेड़ो  नेह की  बातें   
घुट घुट जीवन क्या जीना अब तो  करो फाग की बातें 
बीता जो बीता, कल की कब की अब न बात करो 
जीवन जो शेष पड़ा है अब उसका तो श्रृंगार करो 
हे कवयित्री! 
सबका जीवन ऐसा ही है जहाँ सुख दुःख का रेला है 
कोई ऐसा भी है जिसने दुःख को कभी न झेला है ?
फिर नित क्यूं  रोना धोना ह्रदय शूल को दूर करो 
फागुन ने दी दस्तक है  बढ़  आगे बंदनवार धरो 
हे कवयित्री!
माना बेदर्दों ने तुमको दुःख पहुचाये हैं अनगिन पल छिन 
लेकिन देखो  कोई है जिसकी  है तुममे  दिन रात लगन 
त्याग युगों की यह सिसकन,उठ देख  द्वार है कौन आया 
अभिसार करो   हो  धन्य, हो जाए  पुलकित  मन  काया 
हे कवयित्री!  
 मंगलमय  होली पर आप सभी मित्रगण को रंगारंग शुभकामनाएं!

रविवार, 27 नवंबर 2011

अब हमारे बीच में है शब्द की दीवार ........

बच्चन जी मेरे मेरे प्रिय कवियों में रहे हैं .आज उनका जन्मदिन है .मेरा मन भी कल से ही उझ-बुझ सा उद्विग्न है ...तो क्यों न आज उनकी यह कविता आपसे मैं साझा कर लूं -यह कहा भले ही जाता हो कि कवितायेँ बड़ी व्यक्तिपरक,व्यष्टिगत  होती हैं मगर उत्कृष्ट रचनाएं दरअसल समष्टि -जन जन की पीड़ा-मनोभावों से जा जुड़ती हैं और इस अर्थ में कालजयी बन जाती हैं -बच्चन जी की निम्न कविता कुछ इसी श्रेणी की कविता है -

क्षीण कितना शब्द का आधार! 

मौन तुम थीं ,मौन मैं था,मौन जग था, 
तुम अलग थीं और मैं तुमसे अलग था ,
जोड़-से हमको गए थे शब्द के कुछ तार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

शब्दमय तुम और मैं,जग शब्द से भरपूर ,
दूर तुम हो और मैं हूँ आज तुमसे दूर 
अब हमारे बीच में है शब्द की दीवार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

कौन आया और किसके पास कितना ,
मैं करूं अब शब्द पर विश्वास कितना 
कर रहे थे   जो  हमारे  बीच छल व्यापार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

(हरिवंश राय बच्चन,२७ नवंबर १९०७ – १८ जनवरी २००३)  
कवि कर्म कौशल से सर्वथा विहीन मुझ जैसे व्यक्तियों का क्या हुआ होता जो अगर बच्चन सरीखे कवि न जन्मे होते, तब  अपने मन के भावों को कभी व्यक्त ही न कर पाते हम -आज ये कालजयी युग द्रष्टा कवि घोर पीड़ा ,दिशाहीनता और हताश क्षणों में  हमारी वाणी बन जाते हैं ...और अभिव्यक्ति  का सहारा  बन मानो  व्यथा को कुछ पल के लिए ही हर लेते  हैं ......शत शत नमन ......

रविवार, 20 नवंबर 2011

एक अतुकांत कविता ...युगांतर की आस!

कविता लय  ताल यानि छंद बद्ध अर्थात  तुकबंदी युक्त होनी चाहिए या फिर बिना तुकबंदी के, इस पर विद्वानों के बीच निहायत साहित्यिक /अकादमिक किस्म के गंभीर वाद विवाद होते रहते हैं -कोई कहता है जब कविता लय ताल बद्ध होती है तो वह प्रकृति के ही लय ताल से जुडती है और ऐसी  उपलब्धि बहुत साधना के बाद हासिल होती है ....उनके लिए लयताल निबद्ध कविता ब्रह्म के नाद सौन्दर्य से तालमेल करती नज़र आती है और मन को निसर्ग से जोड़ने में सफल होती है ..वहीं छंद मुक्त  कविता के समर्थक तुकबंदी की कविताओं में  भावनाओं के उन्मुक्त बहाव को बाधित हुआ पाते हैं ..बहरहाल बहस जारी है और इसी की आड़ में मैं एक अतुकांत कविता आपको झेलने के लिए यहाँ पोस्ट कर देता हूँ .... :) 
युगांतर की आस
फूलों की वादियाँ 
बुलाती हैं  मुझे बार  बार 
खिंचता उनके मोहपाश में
पहुंचता हूँ जब उनके पास 
तो अचानक वे ओढ़ लेती हैं 
बर्फानी चादरें,
फूलों की घाटी तब्दील 
होती जाती है बर्फानी वादियों में
और मैं हतप्रभ  बर्फ के  ढेर को 
अपनी उँगलियों से
 कुरेदता हूँ इस चाह में कि
 नीचे दबे उन मोहक फूलों का
 दीदार हो सके 
मगर नीचे तो एक 
धधकता ज्वालामुखी सा 
आकार  लेता दीखता है 
और मैं फिर डरता हुआ 
हठात उँगलियों को खींचता 
देता हूँ खुद को दिलासा 
कि कभी तो हटेगीं 
ये बर्फानी चादरें,
नीचे दबा ज्वालामुखी
 कभी तो शांत होगा
बहारें कभी तो आयेगीं ..
और मैं ठहर जाता हूँ 
एक युगांतर की आस लिए ...
अब यह पूछने की हिम्मत या बेहयाई कैसे करूँ कि कविता कैसी है? 

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

खुल जाएँ भाग्य मोतियों के सीप

यह दीपावली आप सभी मित्रों को शुभ और समृद्धि देने वाली हो ....

जलते ही दीवाली के शत शत दीप
खुल जाएँ  भाग्य मोतियों के सीप 

बिना शरण और ठांव
मंजिल को बढ़ते पाँव 

शुभ्र वसना सरस्वती सा
रिश्तों के हो  रंग यकसाँ  

अरुणोदय की रक्तिम किरणें
उजास हर ह्रदय में भर भर दें 

 होठों पर हो निष्कलंक मुस्कान
मिट जाए सबके  श्रम की थकान 

दूर हट जाए घिरा  घना तिमिर
आनन्दमय हो जाए  यह  शिशिर 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

जी हाँ यह कविता आपको पूरी करनी है....

जी हाँ यह  कविता आपको पूरी करनी है क्योकि ऐसा लगता है कहीं कुछ छूटा सा है....कुछ और कहा जाना बाकी है ..मेरे कई मित्र हैं ब्लॉग जगत में जिनकी काव्यात्मक प्रतिभा पर मुझे नाज है. कविता तो बस एक भाव है जो शब्दों का सहारा ले अभिव्यक्त हो उठती है मगर यह अभिव्यक्ति , शब्दों के  चयन की प्रतिभा के साथ एक सतत अभ्यास की भी  अपेक्षा रखती है ....ऐसे ही कोई  भाव उठा और चंद पंक्तियाँ सहज ही अभिव्यक्त हो गयीं मगर हो सकता है कोई कुशल शब्द जेता कवि मन इसमें कुछ और जोड़ दे ....मेरे मित्र जयकृष्ण तुषार जी दूसरे अनुशासनों,क्षेत्रों के लोगों का कविता के मैदान में आ धमकना किसी हिमाकत से कम नहीं मानते ..मगर मेरी इल्तिजा है - कविता क्या अनिवार्यतः किसी कवि का ही आश्रय ढूंढती है वह स्वयं-उद्भूता नहीं हो सकती? ..हमारे जैसे कथित शुष्क विज्ञानसेवी को अपना माध्यम नहीं बना  सकती? मुझे तो सदैव यह लगता रहा है कि कवि नहीं कविता का होना ज्यादा सहज है..नासतो विद्यते भावो ... ...अभिव्यक्ति का माध्यम कोई भी बन सकता है ....मुझ जैसा  कवि कला विहीन भी ....विज्ञान का सेवी भी ...बहरहाल आप कविता पढ़ें और इसे पूरी करें ....कोई व्याख्या या स्पष्टीकरण चाहते हों तो खुलकर कहें .....

देह  से नहीं मुझे मेरी चेतना से जानो 
वय से नहीं मुझे मेरी भावना से पहचानो
 नहीं मेरा है  कोई  काल बाधित वजूद 
इक शाश्वत कामना है केवल यही मानो 

 चिर पुरातन होकर  भी हूँ चिर नवीन 
रहा हूँ बना इक अभिलाषा  युग युगीन 
बस साथ रहने को ही तेरे हर पल छिन 
अवतरित अपनाता हर मरुथल जमीन 

हर युग  में रहूँ  साथ उसके यही  कामना 
वह जो खुद भी है एक शाश्वत सी चाहना 
चिर संयोग में  फिर हो कोई क्यूं  बाधा 
युग युगों में रहूँ मैं कृष्ण और तू मेरी राधा 

अब यह आपके भरोसे कुछ और जोड़ना चाहें या फिर कोई संशोधन ..सस्नेह सादर ....
आ गया है राधा का संशोधन:
 मुझसे नहीं मेरी चेतना से मुझे जानो
समय से नहीं भावना से मुझे पहचानो
मेरा नहीं है ये काल बाधित अस्तित्व
जो भी हूँ मैं  बस हूँ  तुम्हारा ही तत्व
इक शाश्वत कामना है बस यही मानो
मुझसे नहीं मेरी चेतना से मुझे जानो
चिर पुरातन होकर भी हूँ चिर नवीन
बनकर  अभिलाषा इक  युग-युगीन
औ संग तेरे हो मेरा हर इक पल छिन
अवतरित हुआ कई-कई जन्म अगिन
युगों-युगों का साथ हो है यही कामना
निश्छल,नैसर्गिक सा शाश्वत चाहना
संयोग में न उत्पन हो कोई भी बाधा
तू ही कृष्ण हो और मैं हो जाऊं  राधा .
यह अनुष्ठान अब परिपूर्ण हुआ ....



बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

पिता जी की पुण्य तिथि पर ...

आज उनकी पुण्य  तिथि है... जीवन में अगर किसी की प्रतिभा ने मुझे गहरे रूप से प्रभावित किया तो वे पिता जी ही थे ..डॉ. राजेन्द्र मिश्र ....आपकी नज़र में यह एक सामान्य सहज पितृ प्रेम हो सकता है ..और मैं भी यही सोचता हूँ कि पुत्र तो पिता की ही एक अनुकृति होता है -आत्मा वै पुत्रो जायते ..वे एक बहुत अच्छे गद्य लेखक और निबंधकार थे....उनकी पुस्तक आधुनिक हिन्दी निबंध के कई लेख /निबंध खासकर मनुवाद का यथार्थ बहुत चर्चित हुआ था ..अपने लेखों में  वे कभी कभी कुछ पद्यात्मक अभिव्यक्तियाँ कर जाते थे ..उन्ही में से कुछ चयनित करके यहाँ प्रस्तुत है ....
...थी नहीं मंजिल कहीं.... 
उम्र गुज़री हसीन सपनो में 
चाँद तारों के सब्ज बागों में, 
डूब गया दिल खुलीं जब आँखें 
कैसी थी साजिश आसमानों में 

रहे पिटते हम विजेता नहीं थे 
हो गए गुमनाम हम नेता नहीं थे 
खुली पुस्तक सी रही यह जिन्दगी 
पढ़ लिया लोगों ने अभिनेता नहीं थे 

बहुत लम्बी है यह रात क्या किया जाए 
नहीं बनती है कोई बात क्या किया जाए 
''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक''
नहीं है हाथ में इक उम्र क्या किया जाए 

उम्र भर  चलता रहा
मकसद समझ पाया नहीं 
था नहीं राहों का राही 
थी नहीं मंजिल कहीं ...
 आज मेरे पैतृक आवास पर हर वर्ष की भांति उनके पुण्य स्मरण का अनुष्ठान है ..अनुज  डॉ. मनोज मिश्र उसका संयोजन कर रहे हैं .नौकरी के चक्कर में मैं  नहीं जा पा रहा हूँ .. पिता जी अक्सर यही यह उद्धृत करते रहते थे कि पराधीन सपनेहु  सुख नाहीं -नौकरी के बारे में भी यह बड़ी सटीक उक्ति है ..और यही अनुभूति मुझे 
 शिद्दत के साथ हो रही है ....
पुण्य स्मरण....... 

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