हिन्दी कवि और कविता प्रेमी क्या इसे झेल पायेगें ? :-)
रचाती कामनाएं नित स्वयम्बर
प्रेम की चिरंतन चाह लिए होती है प्रेमियों की आतुरता
वैसे ही जैसे स्वाति बूँद की चाह लिए चातक रहता रटता
प्रेम की चिरंतन चाह लिए होती है प्रेमियों की आतुरता
वैसे ही जैसे स्वाति बूँद की चाह लिए चातक रहता रटता
सीप की भी होती है साध पले उसके गर्भ में इक मोती दुर्लभ
वैसे ही जैसे चाहे स्वाति की बूँद कोई निरापद आश्रय सुलभ
मुक्ता संभरण का संयोग है तभी प्रतीक्षा हो सीप की जब चिर
स्वाति बूँद सहजने को रहे वह हर क्षण हर पल आकंठ तत्पर
उभय प्रेमियों में हो मिलन की चाहना और प्रीति जब परस्पर
प्रेम तब परिपूर्ण होता और रचाती कामनाएं नित स्वयम्बर

