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शनिवार, 12 जून 2010

देवदूत नहीं है मनुष्य ....!

इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य प्रकृति की एक सुन्दरतम संरचना है -मगर वह देवदूत है ऐसा नहीं माना जाना चाहिए!  वह स्वर्ग से अवतरित कोई फ़रिश्ता नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों के जैविक विकास से उद्भूत एक सामाजिक और 'सांस्कृतिक ' पशु ही है -जब यह बात १५० वर्ष पहले चार्ल्स डार्विन की महान कृति -"ओरिजिन " ने असंदिग्ध रूप से सामने रखी तो सारे संसार में तहलका मच गया -पादरियों ने डार्विन का घोर विरोध किया -"भला ईश्वर की बनायी गयी सृष्टि की एक बेहतरीन कृति के बारे में  ऐसा घृणित विचार " को लोग सहन भी कैसे कर सकते थे.पूरे ६ दिन में सृष्टि की रचना करने वाले ईश्वर ने आखिर मनुष्य को अपने हाथो से अपनी खुद की प्रतिकृति (इमेज ) के रूप में बनाया  था और उसकी एक पसली से उसकी सहचरी को भी उपजा दिया था -डार्विन के  सिद्धांत से इस स्थापना की धज्जियां उड़ चुकी थी ..मगर धर्म के ठेकेदारों ने इस वैज्ञानिक तथ्य को  मानने में एक सदी से भी अधिक समय गुजार दिया! यह एक ज्ञात इतिहास है! च्राल्स डार्विन बहुत विनम्र और खुद कभी वाद विवाद में नहीं पड़ते थे मगर जूलियन हक्सले ने पादरियों से लोहा लिया -वे डार्विन के बुलडाग माने जाते थे .कभी कभी मुझे लगता है मुझमे जूलियन हक्सले की आत्मा प्रविष्ट हो गयी है ...



मुझे जो बात सबसे बुरी लगती है वह है पढ़े लिखे लोगों की मूढ़ता और अज्ञानता जनित हठधर्मी ...ऐसे लोग समाज के लिए ज्यादा घातक है ..भोली भाली  समझ के सीधे सादे लोग तो क्षम्य हैं मगर अधकचरे ज्ञान के पोंगापंथी समाज को गुमराह करते  रहते हैं ...और वे हैं तो सर्वथा तिरस्कार के योग्य मगर लोकतंत्र में सब की गुजर बसर हो जाती है... आज हिटलरवाद  का पुनर्जागरण हो रहा है तो इसके निहितार्थों को भी समझना होगा ....बार बार यह बात समझी और समझाई जानी चाहिए कि मनुष्य एक विकसित पशु ही है -जितनी  भी मूल पाशविक वृत्तियाँ है मनुष्य में ऊर्ध्वाधर जैवीय विकास के चलते उच्चतम बिंदु पर  है -आक्रामकता ,कामुकता ,क्षेत्रवाद -इन तीन वृत्तियों का पूरा परिपाक मनुष्य में आकर हुआ है और जाहिर है इनसे जुडी विसंगतियाँ भी इसी में चरम पर हैं ! उदाहरण ? क्या पशु बलात्कार करते हैं ? क्या किसी पशु ने अपने ही किसी कबीले का समूल नाश किया ? याद करिए नागासाकी हिरोशिमा!  पूरा महाभारत केवल मेड़ -डांड की ही लड़ाई थी -जाहिर है पशु इतना हिंस्र नहीं है -लगता है इसलिए ही प्रकृति ने मनुष्य की चरम और निर्द्वंद्व  पाशविकता पर अंकुश लगाने के लिए  उसके एक नए तरीके के विकास -सांस्कृतिक विकास की कवायद शुरू की  मगर उसकी जड़ें अभी ज्यादा गहरी नहीं है -अभी २० -२५ हजार वर्ष पहले तक तो  आदमी गुफाओं में रहता था -जैवीय विकास के स्केल पर यह समय चंद सेकेण्ड  से भी अधिक नहीं है -आशय यह कि उसकी जैविकता आज भी उस पर हावी है -उसकी सांस्कृतिक चमक "स्किन डीप " भी नहीं है .....वह सभ्यता के  कथित खोल में पशु आचरण से सर्वथा मुक्त नहीं हुआ है ! 

आज जरूरत इस बात है कि मनुष्य के अंदर बैठे कपि के  वजूद को न तो झुठलाया जाय और न ही दुलराया  जाय और न ही उसे चुनौतियां दी जायं ! वह किसी भी मौजूदा वनमानुष -गोरिल्ला ,गिब्बन ,ओरांगुटान ,चिम्पान्जी और एक सैकड़ा दूसरे कापियों  से किसी भी मामले में   कमतर नहीं है -अधिक हिंस्र है ,अधिक कामुक है ,साल भर प्रजनन करता है ,अगम्यागम्य  तक का दोषी बनता है .....आदि आदि ...उसकी  असलियत की नासमझी ही कितने ही सामाजिक समस्याओं की मूल में है .

खुद को जानो तुम्हे पशु और मनुष्य का फर्क समझ में आ जायेगा ! हाँ मनुष्य अधिक प्रत्युपकारी भी है ,वंश रक्षा की भावना उसमें उच्चतम है ,स्वामिभक्त भी है (मगर जरा कुत्ते से फर्क  करके देखिये! ) - साथ ही  सबसे बड़ा धोखेबाज ,अहसानफरामोश और स्वजाति नाशी भी है ...कहा न कि हर जैवीय आचरण उसमे उत्स पर है! बच के रहना रे बाबा ....
(यह श्रृंखला गाहे बगाहे चलती ही रहेगी ....)

सोमवार, 7 जून 2010

जैवीयता केवल मैथुन और जगह की मारामारी (territorialism ) ही नहीं है जैसा कि मेरे कुछ काबिल दोस्त सोचते आये हैं! ..

अनवरत पर हुई इस चर्चा ने मुझे प्रेरित किया है कि मैं मनुष्य की जैवीयता पर कुछ बातों को स्पष्ट करुँ ...जन स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक होती हैं ..मैंने मनुष्य की जैवीय प्रवृत्तियों और सांस्कृतिक  विकास पर एक विस्तृत पोस्ट पहले  लिखी थी (देखें यहाँ यहाँ ..) मगर लगता है जैसे 'शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिय ...' वैसे ही पोस्ट पुरानी पुनि पुनि पाठय ! ! 

मनुष्य का जैवीय विकास /विरासत करोड़ वर्ष से कमतर नहीं है -एक करोड़ वर्ष पहले ही उसके आदि रूप रामापिथिकेस ने धरा पर अवतरण किया और एक लम्बे जैवीय विकास के बाद मनुष्य आज का कथित सुसंस्कृत मनुष्य बना है .मनुष्य का गैर पशुओं से एक पृथक विकास हुआ है -सांस्कृतिक विकास मगर वह बहुत बाद की कहानी है ...नागरीकरण के शुरुआत के कालखंड को  बहुत पीछे भी हम ले जाएँ तो हद से हद १५ से २० वर्ष पीछे लौटेंगें ...इसी में सब कुछ वैदिक काल,उपनिषदीय काल ,महाकाव्य काल सिमटा हुआ है ...जाहिर है मनुष्य का स्पष्ट सांस्कृतिक काल बहुत  बाद में अस्तित्व में आया .इसके पहले वह निरा पशु  न भी रहा हो पर उस पर केवल और केवल जैवीयता हावी थी ...कबीलों में हिंसक संघर्ष होते थे और अनगढ़ पत्थर की गदा से प्रतिद्वंद्वी की खोपड़ी चकनाचूर कर दी जाती थी ...वजह ? वही जर जोरू और जमीन! करीब लाख वर्ष  पहले मनुष्य का ही एक निकट संबंधी था नीन्डर्थल मानव जिसमे आभूषणों और अलंकरणों के प्रति रुझान थी -अभी हाल में सीपियों के तत्कालीन गहने उत्खनन में मिले हैं ..हमारी प्रजाति यानि होमो सैपिएंस में भी ऐसे ही आरम्भिक अलंकरण की वृत्ति देर से दिखती है ...दुर्भाग्य से नीन्डर्थल अज्ञात कारणों से लुप्त हो गए या एक गंभीर अध्ययन के अनुसार होमो सैपिएंस यानि हमारे पूर्वजों ने उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया ...होमो सैपिएंस के अफ्रीका से ६० हजार वर्ष पहले महाभिनिष्क्रमण के बाद की ये घटनाए हैं... ....

जीनो -वंशाणुओं   में कुदरती बदलाव लाखो वर्ष में होते हैं ....हाँ कभी कभी कुछ उत्परिवर्तन से बदलाव तुरंत हो जाते हैं मगर वे शारीरिक विकृतियाँ  ही ज्यादा उत्पन्न करते हैं जैसे नागासाकी हिरोशिमा में परमाणु बम गिरने के बाद विकिरण से जनन कोशाओं के जरिये विकृतियों का पीढ़ियों में अंतरण ...मनुष्य की पाशविक विरासत जहाँ लाखों वर्ष की है वहीं उसकी कथित सांस्कृतिक विरासत  अभी महज कुछ हजार वर्ष की है ....हमारे जीन ही हमारे संरक्षक हैं .हम उनके बंदी हैं ....कभी कभी लगता है कि हमारे सांस्कृतिक  विकास के पीछे भी कुदरत का ही कुछ गूढ़  गुम्फित प्रयोजन है .....कई सांस्कृतिक अनुष्ठान /संस्कार दरअसल हमारे जैवीय मंतव्यों को ही महिमा  मंडित करते है -जैसे एक पति/पत्नी निष्ठता के पीछे क्या केवल हमारी सांस्कृतिक  परिपाटी ही है ? नहीं! नारी की लम्बी सगर्भता और भावी पीढ़ियों की संरक्षा उसके ज्यादा देखभाल की मांग करती है -और यह मनुष्य के अस्तित्व रक्षा से सीधे जुड़ा सवाल है ....एकनिष्ठता का सांस्कृतिक महत्व  दरअसल हमारे जीनो की ही एक चाल है - और मनुष्य उनकी चंगुल मे आया हुआ विवाह रस्म का निरंतर अलंकरण करता गया है -मंत्रोच्चार ,सात फेरे ,अग्नि का साक्ष्य महज इसलिए कि भावी पीढी भली चंगी रहे -पूरे विश्व में जहाँ आधुनिक जीवन शैली (अति सांस्कृतिकता /भौतिकता /सभ्यता ) के चलते तलाक अधिक होते  है  वहां भी दाम्पत्य निष्ठता एक आदर्श है !


मनुष्य की काबिलियत आज जो भी हो रहना वह कबीलों में ही चाहता है -यह उसके जींस की अभिव्यक्ति है -आज का सांस्कृतिक मनुष्य क्यों इतने खेमो में  बटा है ? डाक्टर, वकील ,पादरी आदि कैसे कैसे अपने परिधानों से अलग वजूद बनाये हुए हैं ....यह अलग अलग गोल हैं ...और सावधान उनसे उलझने की हिमाकत  मत करियो कभी ....खोपड़ी नहीं बचेगी ! 

जैवीयता इन सबके मूल में है -जैवीयता केवल मैथुन और जगह की मारामारी (territorialism ) ही   नहीं है जैसा कि मेरे कुछ काबिल दोस्त सोचते आये हैं ...आज मनुष्य जो भी है उसकी जैवीयता ही उसकी पीठिका है ....बहुत कुछ अच्छा बुरा हमारी जैवीयता की ही देन है और मुझे प्रायः लगता है कि हमारी  पूरी सांस्कृतिकता ही अपनी समग्रता में जैवीयता से ही उद्भूत है और मानव के अनेक धर्मसंकटों ,समस्याओं का हल इसी जैवीयता की बेहतर और गहरी समझ में ही निहित है ...

आज भी हम परले दर्जे के हिंस्र हैं ,जर जोरू जमीन के झगडे  और जरायम आज भी केवल इसलिए ही अधिक हैं कि हम मनुष्य की जैवीय वृत्तियों की प्रायः अनदेखी कर देते हैं ....इसलिए ही नारी के  वस्त्रों के चयन पर आचार संहितायें हैं ....देहरी के भीतर और बाहर की वर्जनाएं हैं ...किसलिए ..महज इसलिए कि मानव वंशावली की वाहिका कहीं खतरे में न पड़ जाय ....वो देवी है मात्रि शक्ति है मगर   भस्मासुर और सुन्द उपसुन्द रूपी राक्षसों की जमात आज भी सक्रिय है .... आज भी  एक नंगा कपि मनुष्य के  भीतर सक्रिय है! उससे  सावधान रहने की भी  जरूरत है! मुझे लगता है आज के लिए इतना काफी है -अगर इतना कुछ लिखा विचार स्फुलिंगों को निर्गत कर सकेगा और कुछ भी  पूर्वाग्रह रहित विचार सरणियों की  निर्मिति हुई   तो समझूंगा  कि श्रम सार्थक हुआ !
Further Reading:
The Human Zoo

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

डार्विन एक व्यक्तित्व ! (डार्विन द्विशती )

पहले बता दूँ कि कल रात साढ़े नौ बजे एन डी टी वी इंडिया ने डार्विन द्विशती पर एक विशेष रिपोर्ट प्रसारित की जिसे बेहद प्रभावशाली लहजे में प्रस्तुत किया रवीश कुमार नें -आज ११.३० दिन में यह पुनः प्रसारित होगा .मौका लगे/मिले तो जरूर देखें -बहुत ही परिश्रम से तैयार की गयी यह बहुत रोचक प्रस्तुति है .भारत में किसी भी टी वी चैनेल की डार्विन पर पहली और बेहतरीन प्रस्तुति ! मेरी बधाई !
अब आगे चलें, आज डार्विन के व्यक्तित्व पर कुछ चर्चा हो जाय ! डार्विन की विलक्षण विनम्रता प्रभावित करती है। उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व से लोग उनकी ओर खिंचे चले आते थे। उनकी नीली भूरी आँखों में सहानुभूति की गहरी चमक सी थी। सभी से उनका व्यवहार मृदु था। जो एक बार भी उनसे मिल लेता था उनकी तारीफ किये बिना न रहता। डार्विन ने अपने एक मित्र को लिखे अपने पत्र में कहा था, ``ऐश्वर्य- सम्मान, सुख और समृद्धि सच्चे स्नेह सम्बन्धों के आगे धूल के समान है´´।
वे अपने धुर विरोधियों के प्रति भी बड़े उदार थे। उनके विरोधी भले ही गाली-गलौज तक उतर आते थे, डार्विन ने कभी भी अपना आपा नहीं खोया। उनके विरूद्ध कभी भी कटु शब्दों का इस्तेमाल तक नहीं किया। बल्कि उन्होंने सदैवे अपनी आलोचना के लिए उनके प्रति आभार ही जताया। अपनी कड़ी से कड़ी आलोचना को वे धैर्य से सुन लेते थे और अपनी कमियों पर ज्यादा ध्यान देते थे। डार्विन का यह व्यक्तित्व किसी के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। ( हमारे ब्लॉग मित्र सुन देख रहे हैं ना ?)

एक अविस्मरणीय मुलाकात ... ...
एक बार इग्लैण्ड के तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डस्टीन डार्विन से मिलने आये। मिलने के उपरान्त लोगों ने डार्विन से इस मुलाकात के बारे में पूँछा। डार्विन ने कहा, ``मेरे साथ तो गोल्डस्टीन साहब इतनी सहजता और विनम्रता से पेश आये कि कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि वे प्रधानमंत्री हैं, उनका आचरण मेरे जैसे ही साधारण व्यक्ति के स्तर का था... ... ``यह बात जब गोल्डस्टीन को बतायी गई तो उनका जवाब था, `अरे... ... उनके बारे में तो मैं भी ऐसा ही सोच रहा था´´।

डार्विन, आस्तिक या नास्तिक?
डार्विन खुद को अज्ञेयवादी मानते थे यानि न तो नास्तिक और न ही आस्तिक। उनका महज यह मानना था कि परम सत्ता को समझ पाना सम्भव नहीं है। ईश्वर में विश्वास के प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे। आत्मा, परमात्मा के सम्बन्धों, अमरता की अवधारणा आदि विषयों को वे मनुष्य की बौद्धिक सीमा से बाहर का विषय मानते थे। उनकी पत्नी यद्यपि चर्च से बड़ी प्रभावित थीं, डार्विन के अज्ञेयवादी होने के बावजूद भी नैत्यिक कार्यो में उन्होंने सदैव उनका सहयोग किया।
विश्व चिन्तन पर चाल्र्स डार्विन का कितना जबर्दस्त प्रभाव रहा है यह अकेले इस वैज्ञानिक के व्यक्तित्व और कृतित्व से जुड़े निरन्तर तीन तीन शतकीय आयोजनों से इंगित होता है। डार्विन से जुड़े दो शताब्दी समारोहों-1959 में उनकी युगान्तरकारी पुस्तक `द ओरिजिन´ की प्रणयन शताब्दी, पुन: उनके मृत्यु (1882) की पुण्य शती (1992) और अब 2009 में उनके जन्म की द्विशती। यह वह तिहरा शतक है जब इस महान वैज्ञानिक, महामानव की प्रासंंगिकता को लेकर एक बार फिर सारे विश्व में बहस-मुबाहिसों का दौर शुरु हो रहा है।

मन्की ट्रायल यानि कटघरे में विकासवाद!
अमेरिका में इतिहास अपने को दुहरा रहा है। वहाँ के कुछ शहरों में सृजनवादियों ने फिर से बखेड़ा शुरू कर दिया है। उनकी माँग है कि डार्विनवाद के बजाय स्कूलों में सृजनवाद पढ़ाया जाय। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश तक भी इन्हीं सृजनवादियों के बहकावें में आकर विकासवाद के साथ ही सृजनवाद को पढ़ाये जाने पर जोर दिया .अभी ओबामा इस मुद्दे पर मुखर नही हुए हैं .
इन घटनाओं ने बीते दिनों (1925) के एक चर्चित मुकदमें की याद दिला दी है जो कानून की किताबों में `मंकी ट्रायल आफ टेनेसी´ के नाम से विख्यात है। अमेरिका के टेनेसी राज्य में एक कानूनी प्रावधान ऐसा भी था जिसके अनुसार बाइबिल के सृजनवाद के दीगर किसी और मत का प्रवर्तन एक अपराध था।
टेनेसी के एक कस्बे `डेटेन´ में जब जान थामस स्कोप्स ने विकासवाद का पाठ बच्चों को पढ़ाना शुरु किया तो मानों बवेला मच गया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फिर शुरू हुआ वह मुकदमा जो सृजनवाद और विकासवाद को लेकर शुरु हुए घमासान का एक काला अध्याय माना जाता है। स्कोप्स को कानून के उल्लंघन का दोषी माना गया - उन्हें गिरफ्तार किया गया, जुर्माना भी किया गया। हालांकि उच्च न्यायालय में अपील के बाद वे बरी हो गये और उस कानून को भी अब बदल दिया गया है। अमेरिका के अरकंसास प्रान्त में `सृजनवाद´ और विकासवाद को साथ-साथ पढ़ाये जाने का एक विवादास्पद कानून पुन: 1982 में लागू हुआ जब समूचा विश्व डार्विन की पुण्य शती मना रहा था। इसका भी पुरजोर विरोध हुआ तो इसे भी रदद् करना पड़ा।
किन्तु पुन: सृजनवादियों ने डार्विनवाद के खिलाफ कमर कस ली है और वे एक राजनीतिक शक्ति के रुप में उभर रहे हैं।

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