इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य प्रकृति की एक सुन्दरतम संरचना है -मगर वह देवदूत है ऐसा नहीं माना जाना चाहिए! वह स्वर्ग से अवतरित कोई फ़रिश्ता नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों के जैविक विकास से उद्भूत एक सामाजिक और 'सांस्कृतिक ' पशु ही है -जब यह बात १५० वर्ष पहले चार्ल्स डार्विन की महान कृति -"ओरिजिन " ने असंदिग्ध रूप से सामने रखी तो सारे संसार में तहलका मच गया -पादरियों ने डार्विन का घोर विरोध किया -"भला ईश्वर की बनायी गयी सृष्टि की एक बेहतरीन कृति के बारे में ऐसा घृणित विचार " को लोग सहन भी कैसे कर सकते थे.पूरे ६ दिन में सृष्टि की रचना करने वाले ईश्वर ने आखिर मनुष्य को अपने हाथो से अपनी खुद की प्रतिकृति (इमेज ) के रूप में बनाया था और उसकी एक पसली से उसकी सहचरी को भी उपजा दिया था -डार्विन के सिद्धांत से इस स्थापना की धज्जियां उड़ चुकी थी ..मगर धर्म के ठेकेदारों ने इस वैज्ञानिक तथ्य को मानने में एक सदी से भी अधिक समय गुजार दिया! यह एक ज्ञात इतिहास है! च्राल्स डार्विन बहुत विनम्र और खुद कभी वाद विवाद में नहीं पड़ते थे मगर जूलियन हक्सले ने पादरियों से लोहा लिया -वे डार्विन के बुलडाग माने जाते थे .कभी कभी मुझे लगता है मुझमे जूलियन हक्सले की आत्मा प्रविष्ट हो गयी है ...
मुझे जो बात सबसे बुरी लगती है वह है पढ़े लिखे लोगों की मूढ़ता और अज्ञानता जनित हठधर्मी ...ऐसे लोग समाज के लिए ज्यादा घातक है ..भोली भाली समझ के सीधे सादे लोग तो क्षम्य हैं मगर अधकचरे ज्ञान के पोंगापंथी समाज को गुमराह करते रहते हैं ...और वे हैं तो सर्वथा तिरस्कार के योग्य मगर लोकतंत्र में सब की गुजर बसर हो जाती है... आज हिटलरवाद का पुनर्जागरण हो रहा है तो इसके निहितार्थों को भी समझना होगा ....बार बार यह बात समझी और समझाई जानी चाहिए कि मनुष्य एक विकसित पशु ही है -जितनी भी मूल पाशविक वृत्तियाँ है मनुष्य में ऊर्ध्वाधर जैवीय विकास के चलते उच्चतम बिंदु पर है -आक्रामकता ,कामुकता ,क्षेत्रवाद -इन तीन वृत्तियों का पूरा परिपाक मनुष्य में आकर हुआ है और जाहिर है इनसे जुडी विसंगतियाँ भी इसी में चरम पर हैं ! उदाहरण ? क्या पशु बलात्कार करते हैं ? क्या किसी पशु ने अपने ही किसी कबीले का समूल नाश किया ? याद करिए नागासाकी हिरोशिमा! पूरा महाभारत केवल मेड़ -डांड की ही लड़ाई थी -जाहिर है पशु इतना हिंस्र नहीं है -लगता है इसलिए ही प्रकृति ने मनुष्य की चरम और निर्द्वंद्व पाशविकता पर अंकुश लगाने के लिए उसके एक नए तरीके के विकास -सांस्कृतिक विकास की कवायद शुरू की मगर उसकी जड़ें अभी ज्यादा गहरी नहीं है -अभी २० -२५ हजार वर्ष पहले तक तो आदमी गुफाओं में रहता था -जैवीय विकास के स्केल पर यह समय चंद सेकेण्ड से भी अधिक नहीं है -आशय यह कि उसकी जैविकता आज भी उस पर हावी है -उसकी सांस्कृतिक चमक "स्किन डीप " भी नहीं है .....वह सभ्यता के कथित खोल में पशु आचरण से सर्वथा मुक्त नहीं हुआ है !
आज जरूरत इस बात है कि मनुष्य के अंदर बैठे कपि के वजूद को न तो झुठलाया जाय और न ही दुलराया जाय और न ही उसे चुनौतियां दी जायं ! वह किसी भी मौजूदा वनमानुष -गोरिल्ला ,गिब्बन ,ओरांगुटान ,चिम्पान्जी और एक सैकड़ा दूसरे कापियों से किसी भी मामले में कमतर नहीं है -अधिक हिंस्र है ,अधिक कामुक है ,साल भर प्रजनन करता है ,अगम्यागम्य तक का दोषी बनता है .....आदि आदि ...उसकी असलियत की नासमझी ही कितने ही सामाजिक समस्याओं की मूल में है .
खुद को जानो तुम्हे पशु और मनुष्य का फर्क समझ में आ जायेगा ! हाँ मनुष्य अधिक प्रत्युपकारी भी है ,वंश रक्षा की भावना उसमें उच्चतम है ,स्वामिभक्त भी है (मगर जरा कुत्ते से फर्क करके देखिये! ) - साथ ही सबसे बड़ा धोखेबाज ,अहसानफरामोश और स्वजाति नाशी भी है ...कहा न कि हर जैवीय आचरण उसमे उत्स पर है! बच के रहना रे बाबा ....
(यह श्रृंखला गाहे बगाहे चलती ही रहेगी ....)

