मतलब नहीं समझे होंगे आप . खड़ी शादी बोले तो दिन में निपट जाने वाली शादी
और पट शादी मतलब रात वाली शादी जब लोग आराम से पट लेते हैं -सो जाते हैं .
खड़ी शादी का नामकरण पिछले वर्षों से अपने पूर्वांचल में चर्चा में आया है ,
मैंने भी जब पहली इसे सुना तो चौका था- लोगों ने बताया कि अब दिन में भी
लोग शादियाँ निपटा रहे हैं यानी खड़े खड़े -आगत स्वागत सब निपट जाता है और
बराती घराती (रिश्तेदार) लोग दिन रहते ही अपने अपने घर की राह लेते हैं और वर वधू की भी विदाई दिन को ही हो जाती है -सब की राहत और रात में चैन की नींद . मुझे याद है मैंने सन 1993 में ही मुम्बई (तब बाम्बे) में अपनी पुरवईया के
ही एक भाई के यहाँ दिन की यानी खड़ी शादी अटेंड की थी ..मुझे तभी यह आईडिया
भा गया था . और अब तो यह प्रचलन पूर्वांचल के गाँव गिराव तक आ गया तो यह इस बात का द्योतक है कि लोगों की सोच प्रोग्रेसिव हो रही है . मैंने बहुत बार यह सोचा है कि आखिर शादियाँ प्रायः रात को ही क्यों होती है? अपने विचार आपसे साझा कर रहा हूँ।
पुराने जमाने में आवागमन के साधन तो थे नहीं -लोग बाग़ पैदल ही बारात लेकर चलते थे -दूल्हा भले ही कहारों के कंधे की 'असवारी' में होता था मगर कहांर भी चलते तो पैदल ही थे। बारात निकलते निकलते और वधू के द्वार तक पहुंचते शाम हो जाती थी . तो फिर रात की शादी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता था . मगर तब भी पूरी कोशिश होती थी कि हर हाल में बारात गोधूलि बेला यानी कुछ रोशनी रहने तक जरुर वधू के द्वार पर पहुँच जाय और द्वारचार हो जाय -पहले रोशनी आदि के भी पर्याप्त इंतजाम तो होते नहीं थे तो लोग दिन की रोशनी में कम से कम अपने प्रमुख भावी रिश्तेदारों और दूल्हे की शिनाख्त करके मुतमईन हो जाना चाहते थे -कहीं दूल्हा ही न बदल दिया गया हो -ऐसी घटनाएं होती भी थीं कि देखुआरी (वर को देखने की रस्म) के समय तो किसी और को दिखाया गया और विवाह के समय कोई और दूल्हा बन आ गया -इन मामलों में सतर्कता जरुरी थी ....जीवन भरके निर्वाह का मामला जो था -यहीं नहीं रात होते ही बारातें भटक भी जाया करती थी -मुझे बताया गया कि इक्के दुक्के मामले तो ऐसे हो गए थे कि कहीं की बारात कहीं पहुँच गयी और आगवानी ,आवाभगत भी हो गयी -द्वारचार बीतते बीतते पता लगा कि बारात ही बदल गयी -यहाँ की वहां चली गयी -बड़ी फजीहत हो जाती थी - मारपीट तक की नौबत आ जाती थी . ऐसे मामलों से बचने के लिए पंडितों के जरिये यह सख्त हिदायत रहती थी कि कितनी भी देर हो मगर शाम होते होते द्वारचार जरुर हो जाय।
मगर आज तो यातायत के बेहतर साधन हैं तो दिन दिन ही शादियाँ क्यों निपटा नहीं ली जातीं -बस उसी रूढ़ परम्परा को ढ़ोया जा रहा है कि शाम को बारात पहुंचे और फिर देर रात तक शादी हो -और ये रात की शादियाँ अब कितनी खर्चीली हो चली हैं -रोशनी ,आतिशबाजी आदि आदि फिजूल के खर्चे ऊपर से और रात्रि जागरण का दुस्वप्न सरीखा अनुभव अलग से -पोंगे पंडित कहते हैं कि दिन में तो साईत ही नहीं है जबकि भारतीय ज्योतिष में ज्यादातर शुभ ग्रह संयोग के लिए उदया तिथि का विचार करते हैं मतलब एक दिन के सूर्योदय के बाद के अगले दिन तक के सूरज के उगने तक प्रायः एक ही शुभ ग्रह संयोग होता है -तो फिर दिन की शादियाँ क्यों नहीं? आज सोच के बदलाव की बड़ी जरुरत है -लोग दिन की खडी शादी का आयोजन कर बहुत से फिजूल खर्चों से बच सकते हैं और आराम से अपने वापस जाकर स्व-गृह ऊष्मा भोग सकते हैं . मुझे बड़ी कोफ़्त होती है उन अक्ल पर पत्थर पड़े लोगों से जो बस इतनी सी बात नहीं समझ पाते और पोंगा पंडितों के चक्कर में खुद तो परेशान होते ही हैं -अपने रिश्तेदारों ,बारातियों सभी को हलकान करते हैं -रात्रि जागरण को मजबूर करते हैं - वधू पक्ष पर अनाप शनाप खर्चे थोपते हैं .
आईये खड़ी शादियों को प्रोत्साहित करें! और पट शादियों का बहिष्कार! ! मैं तो बस आगे की एक अंतिम पट शादी के बाद किसी भी पट शादी में न जाने की घोषणा करता हूँ! लोग सुन लें और आईंदा से मुझे बख्श दें प्लीज!
पुराने जमाने में आवागमन के साधन तो थे नहीं -लोग बाग़ पैदल ही बारात लेकर चलते थे -दूल्हा भले ही कहारों के कंधे की 'असवारी' में होता था मगर कहांर भी चलते तो पैदल ही थे। बारात निकलते निकलते और वधू के द्वार तक पहुंचते शाम हो जाती थी . तो फिर रात की शादी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता था . मगर तब भी पूरी कोशिश होती थी कि हर हाल में बारात गोधूलि बेला यानी कुछ रोशनी रहने तक जरुर वधू के द्वार पर पहुँच जाय और द्वारचार हो जाय -पहले रोशनी आदि के भी पर्याप्त इंतजाम तो होते नहीं थे तो लोग दिन की रोशनी में कम से कम अपने प्रमुख भावी रिश्तेदारों और दूल्हे की शिनाख्त करके मुतमईन हो जाना चाहते थे -कहीं दूल्हा ही न बदल दिया गया हो -ऐसी घटनाएं होती भी थीं कि देखुआरी (वर को देखने की रस्म) के समय तो किसी और को दिखाया गया और विवाह के समय कोई और दूल्हा बन आ गया -इन मामलों में सतर्कता जरुरी थी ....जीवन भरके निर्वाह का मामला जो था -यहीं नहीं रात होते ही बारातें भटक भी जाया करती थी -मुझे बताया गया कि इक्के दुक्के मामले तो ऐसे हो गए थे कि कहीं की बारात कहीं पहुँच गयी और आगवानी ,आवाभगत भी हो गयी -द्वारचार बीतते बीतते पता लगा कि बारात ही बदल गयी -यहाँ की वहां चली गयी -बड़ी फजीहत हो जाती थी - मारपीट तक की नौबत आ जाती थी . ऐसे मामलों से बचने के लिए पंडितों के जरिये यह सख्त हिदायत रहती थी कि कितनी भी देर हो मगर शाम होते होते द्वारचार जरुर हो जाय।
मगर आज तो यातायत के बेहतर साधन हैं तो दिन दिन ही शादियाँ क्यों निपटा नहीं ली जातीं -बस उसी रूढ़ परम्परा को ढ़ोया जा रहा है कि शाम को बारात पहुंचे और फिर देर रात तक शादी हो -और ये रात की शादियाँ अब कितनी खर्चीली हो चली हैं -रोशनी ,आतिशबाजी आदि आदि फिजूल के खर्चे ऊपर से और रात्रि जागरण का दुस्वप्न सरीखा अनुभव अलग से -पोंगे पंडित कहते हैं कि दिन में तो साईत ही नहीं है जबकि भारतीय ज्योतिष में ज्यादातर शुभ ग्रह संयोग के लिए उदया तिथि का विचार करते हैं मतलब एक दिन के सूर्योदय के बाद के अगले दिन तक के सूरज के उगने तक प्रायः एक ही शुभ ग्रह संयोग होता है -तो फिर दिन की शादियाँ क्यों नहीं? आज सोच के बदलाव की बड़ी जरुरत है -लोग दिन की खडी शादी का आयोजन कर बहुत से फिजूल खर्चों से बच सकते हैं और आराम से अपने वापस जाकर स्व-गृह ऊष्मा भोग सकते हैं . मुझे बड़ी कोफ़्त होती है उन अक्ल पर पत्थर पड़े लोगों से जो बस इतनी सी बात नहीं समझ पाते और पोंगा पंडितों के चक्कर में खुद तो परेशान होते ही हैं -अपने रिश्तेदारों ,बारातियों सभी को हलकान करते हैं -रात्रि जागरण को मजबूर करते हैं - वधू पक्ष पर अनाप शनाप खर्चे थोपते हैं .
आईये खड़ी शादियों को प्रोत्साहित करें! और पट शादियों का बहिष्कार! ! मैं तो बस आगे की एक अंतिम पट शादी के बाद किसी भी पट शादी में न जाने की घोषणा करता हूँ! लोग सुन लें और आईंदा से मुझे बख्श दें प्लीज!











