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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

खड़ी शादी बनाम पट शादी! :-)

मतलब नहीं समझे होंगे आप . खड़ी शादी बोले तो दिन में निपट जाने वाली शादी और पट शादी मतलब रात वाली शादी जब लोग आराम से पट लेते हैं -सो जाते हैं . खड़ी शादी का नामकरण पिछले वर्षों से अपने पूर्वांचल में चर्चा में आया है , मैंने भी जब पहली  इसे सुना  तो  चौका था- लोगों ने बताया कि अब दिन में भी लोग शादियाँ निपटा रहे हैं यानी खड़े खड़े -आगत स्वागत सब निपट जाता है और बराती  घराती (रिश्तेदार)   लोग दिन रहते ही अपने अपने घर की राह लेते हैं और वर वधू की भी विदाई दिन को ही हो जाती है -सब की राहत और रात में चैन की नींद . मुझे याद है मैंने सन 1993 में ही मुम्बई (तब बाम्बे) में अपनी पुरवईया के ही एक भाई के यहाँ दिन की यानी खड़ी शादी अटेंड की थी ..मुझे तभी यह आईडिया भा गया था . और अब तो यह प्रचलन पूर्वांचल के गाँव गिराव तक आ गया  तो यह इस बात का द्योतक है कि लोगों की सोच प्रोग्रेसिव हो रही है . मैंने बहुत बार यह सोचा है कि आखिर शादियाँ प्रायः रात को ही क्यों होती है? अपने विचार आपसे साझा कर रहा हूँ।
 पुराने जमाने में आवागमन के साधन तो थे नहीं -लोग बाग़ पैदल ही बारात लेकर चलते थे -दूल्हा भले ही कहारों के कंधे की 'असवारी' में होता था मगर कहांर भी चलते तो पैदल ही थे। बारात निकलते निकलते और वधू के द्वार तक पहुंचते शाम हो जाती थी . तो फिर रात की शादी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता  था . मगर तब भी पूरी कोशिश होती थी कि हर हाल में बारात गोधूलि बेला यानी कुछ रोशनी रहने तक जरुर वधू के द्वार पर पहुँच जाय और द्वारचार हो जाय -पहले रोशनी आदि के भी पर्याप्त इंतजाम तो होते नहीं थे तो लोग दिन की रोशनी में कम से कम अपने प्रमुख भावी रिश्तेदारों और दूल्हे की शिनाख्त करके मुतमईन हो जाना चाहते थे -कहीं दूल्हा ही न बदल  दिया गया हो -ऐसी घटनाएं होती भी थीं कि देखुआरी (वर को देखने की रस्म) के समय तो किसी और को दिखाया गया और विवाह के समय कोई और दूल्हा बन आ गया -इन मामलों में सतर्कता जरुरी थी ....जीवन भरके निर्वाह का मामला जो था -यहीं नहीं रात होते ही बारातें भटक भी जाया  करती थी -मुझे बताया गया कि इक्के दुक्के मामले तो ऐसे हो गए थे कि कहीं की बारात कहीं पहुँच गयी और आगवानी ,आवाभगत भी हो गयी -द्वारचार बीतते बीतते पता लगा कि बारात ही बदल गयी -यहाँ की वहां चली गयी -बड़ी फजीहत हो जाती थी - मारपीट तक की नौबत आ  जाती थी . ऐसे मामलों से बचने के लिए पंडितों के जरिये यह सख्त हिदायत रहती थी कि कितनी भी देर हो मगर शाम होते होते द्वारचार जरुर हो जाय।
मगर आज तो यातायत के बेहतर साधन हैं तो दिन दिन ही शादियाँ क्यों निपटा नहीं ली जातीं -बस उसी रूढ़ परम्परा को ढ़ोया जा रहा है कि शाम को बारात पहुंचे और फिर देर रात तक शादी हो -और ये रात की शादियाँ अब कितनी खर्चीली हो चली हैं -रोशनी ,आतिशबाजी आदि आदि फिजूल के खर्चे ऊपर से और रात्रि जागरण का दुस्वप्न सरीखा अनुभव अलग से -पोंगे पंडित कहते हैं कि दिन में तो साईत  ही नहीं है जबकि भारतीय ज्योतिष में ज्यादातर शुभ ग्रह संयोग के लिए  उदया तिथि का विचार करते हैं मतलब एक दिन के सूर्योदय के बाद के अगले दिन तक के सूरज के उगने तक प्रायः एक ही शुभ ग्रह संयोग होता है -तो फिर दिन की शादियाँ क्यों नहीं? आज सोच के बदलाव की बड़ी जरुरत है -लोग दिन की खडी शादी का आयोजन कर बहुत से फिजूल खर्चों से बच  सकते हैं और आराम से अपने  वापस जाकर स्व-गृह ऊष्मा भोग सकते हैं . मुझे बड़ी कोफ़्त होती है उन अक्ल पर पत्थर  पड़े लोगों से जो बस इतनी सी बात नहीं समझ पाते और पोंगा पंडितों के चक्कर में खुद तो परेशान होते ही हैं -अपने रिश्तेदारों ,बारातियों सभी को हलकान करते हैं -रात्रि जागरण को मजबूर करते हैं - वधू पक्ष  पर अनाप शनाप खर्चे थोपते हैं .
आईये खड़ी शादियों को प्रोत्साहित करें! और पट शादियों का बहिष्कार! ! मैं तो बस आगे की एक अंतिम पट शादी के बाद किसी भी पट शादी में न जाने की घोषणा करता हूँ! लोग सुन लें और आईंदा से मुझे बख्श दें प्लीज!

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

शनिवार, 17 नवंबर 2012

भाग दरिद्दर!

इस बार भी दीपावली पैतृक आवास(चूडामणिपुर, बख्शा  -नौपेडवा,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश ) पर मनाने का मौका मिला .सालाना त्यौहार अपने पैतृक आवास पर मनाना मुझे अच्छा लगता है . बड़े मिश्रित अनुभव रहे . पिछले वर्ष से शुरू हुयी बाल रामलीला इस वर्ष  बच्चों के और भी उल्लास के चलते अविस्मरणीय बनी . इस बार का प्रसंग था लंका दहन का . इस प्रसंग में बच्चों ने हनुमान के लंका में प्रवेश, लंकिनी से वार्ता और उसकी मुक्ति ,विभीषण से भेंट ,सीता को रावण द्वारा धमकाना ,हनुमान द्वारा श्रीराम की मुद्रिका गिराना ,उनके  द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना ,अक्षयकुमार का वध ,मेघनाथ द्वारा हनुमान को ब्रह्मपाश में  बाँधना ,हनुमान रावण संवाद ,लंकादहन और माँ सीता से कोई स्मृति चिह्न माँगना और लौट कर उसे श्रीराम को सौंपना आदि दृश्य बहुत ही बढियां ढंग से अभिनीत किया . 
मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा 
हनुमान की सर्वश्रेष्ठ भूमिका कर सरिता मिश्र ने प्रथम पुरस्कार जीता 
इस कार्यक्रम के पीछे की सोच यह है कि समाज में श्रेष्ठ सांस्कृतिक और पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण बनाने की दिशा में बच्चों से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए -कैच देम  यंग। इस दिशा में बाल रामलीला की शुरुआत एक विनम्र प्रयास भर है . कुछ चित्रों का आप भी दृश्य लाभ उठायें . जागरण ने भी चित्र के साथ खबर छापी .
बाल कलाकार टीम
 निर्देशक कीर्ति मिश्र,दृश्य समन्वयक प्रियेषा मिश्र,पार्श्व ध्वनि - स्वस्तिका, सोनी आदि 


प्रियेषा ने गाँव के बच्चों से घुलमिल कर रावण का पुतला भी बनाया और मुझसे पुतले के साथ अपना फोटो लेने का आग्रह किया . पुतला दहन के बाद  पैतृक  आवास मेघदूत  को सजाने संवारने का काम शुरू हुआ . इस बार हमसभी ने पटाखे से दूरी बनायी मगर चयनित फुलझडियों -अनार ,चरखियां ,स्वर्गबाण अदि आईटमों का मर्यादित प्रदर्शन किया गया -यह काम बच्चों को देने के बजाय आउटसोर्स कर एक प्रोफेसनल आतिशबाज को दिया गया . खूब मजा आया .
आतिशबाजी 

जाप ध्यान भी हुआ,प्रसाद बांटे गए। एक लोक परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन अपने व्यवसाय या जो भी काम आप करते हों अवश्य करना चाहिए जिसे 'दिवाली जगाना' कहते हैं कि वह काम आप अगली दिवाली तक निर्विघ्न करते रहें.  इस लिहाज से तो मुझे जो कुछ काम करने थे वे  एक भी नहीं हो पाए,ब्लागिंग भी नहीं :-) सबसे बुरी बात यह हुयी कि मेरे फेसबुक अकाउंट से करीब दो दर्जन मोबाईल  फोटो अपलोड आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए और मुझे विचलित कर गए .कारण अभी तक समझ में नहीं आया ,फेसबुक को  प्राब्लम रिपोर्ट किया मगर अभी तक जवाब नहीं आया है , मतलब मेरी दिवाली नहीं जगी . माता जी ने आँख में काजल इस बार भी घुड़क कर लगा ही दिया यह डरा कर कि अगर नहीं लगवाता तो अगले जन्म में छंछून्दर हो जाऊंगा . मुझे सहसा डार्विन की याद आयी और होठों पर बरबस मुस्कराहट आ गयी . रिवर्स एवोलूशन :-)
भाग  दरिद्दर! 
....देर से सोये ही थे कि  अल्लसुबह नींद कुछ धप्प धप्प ढब ढब की आवाज से खुल गयी .गृहिणी एक प्राचीनतम परम्परा का निर्वहन कर रही थीं हँसियाँ से सूप पीट पीट कर घर के अतरे कोने से दरिद्दर को भागा रही थीं . अब दीवाली की आराध्य देवी लक्ष्मी के आने पर दरिद्दर को घर से बाहर हो जाने की यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति कहाँ से अनुचित है! मनुष्य उत्सव- अनुष्ठान प्रेमी है -वह कोई भी अनुष्ठान का मौका ऐसे ही गवाना नहीं चाहता . दरिद्दर भगाने का यह उपक्रम यहाँ पूर्वांचल में बहुत प्रचलित है . गाँव घर की लक्ष्मियाँ सूप पीट पीट कर गृह दारिद्र्य को गाँव से बाहर खदेड़ आती हैं . कहीं कहीं यह उपक्रम एकादशी की रात में करते हैं।

दिवाली की अगली रात से कार्तिक का शुक्ल पक्ष आरंभ हो रहा था सो कार्तिक महात्म्य की एक पर्म्पारा के मुताबिक़ हम सब ने आवला के पेड़ के नीचे सामूहिक भोज भात -आहारा का आयोजन भी किया . बारबीक्यू की तर्ज पर ....

आप सभी के यहाँ से  दुःख -दारिद्र्य भाग जाए दीपोत्सव की यही सर्वतोभद्र कामना है ........

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

शिव बारात सज रही है!

आज तो बम बम बोल रही है काशी....शिवरात्रि पर काशी  शिवमय हो जाती है ..शिव बारात सज रही है ...बरात क्या है चित्र विचित्र दृश्यों का संयोग है -एक बूढा बैल पकड़ा गया है,लोग उस पर भयावह से लग रहे बाल शिव को बैठाने के उपक्रम में हैं ...बैल बिदक रहा है ..लोग उसे संभाले हुए है ..दर्शक दूर से नमस्कार कर रहे हैं ..कहीं बैल बिदक गया तो किसी के थामें न थमेगा ..मेरे मन में भी दहशत है इसलिए एक सुरक्षित कोना ढूंढ लिया है ..बारात सज बज रही है ...यह भी कोई बरात है?


बैल तो बिदक गया अश्वारूढ़ हुए शिव बाबा -शिव बरात का एक दृश्य 

अजब गजब स्वांग भरे हैं बाराती -कोई नंगा ,कोई अधनंगा ,कोई लूला कोई लंगड़ा ,कोई अँधा कोई काना ...और भूत पिशाचों की तो एक अलग टोली है -खुद शिव मुंड माला पहने हैं ,अधनंगे हैं ,भभूत लपेटे हैं ,गले का जिन्दा फुफकारता नाग  है,विषदंत न भी टूटा  हो तो भी विषकंठी पर विष का प्रभाव कहाँ? अजब गजब बरात.. बस चलने को उद्यत है ...यह कैसा दृश्य है? ..कोई बरात ऐसी भी हो सकती है भला? हजारो हजार साल से शिव की बरात ऐसी ही निकलती आयी है -कहीं यह हजारो हजार विपन्न, अभाव ग्रस्त प्रवंचित भारतीयों का एक सांकेतिक चित्रण तो नहीं? क्या हुआ हम गरीब हैं ,बुभुक्षित हैं मगर उत्सवप्रेमी हम भी हैं -क्या हम मानव नहीं ? हमें क्या खुशियाँ मनाने का हक़ नहीं? हम जैसे हैं वैसे ही अपनी खुशियों का इज़हार करेगें! शिव की यह बरात मन में कई तरह के भावों को संचारित कर रही है -यह भी लग रहा है कि शिव  भी कुछ कम मौजी और किलोल -कौतुकी नहीं हैं -ऐसी बरात उनकी परिहास प्रियता का नमूना तो नहीं?

लोकमन के जितने करीब शिव हैं उतना  कृष्ण भी नहीं ...जन जन में रचे बसे हैं शिव ...न जाने कितने लोक गीत और लोक कथाएं भोले को लेकर प्रचलित हैं ..कहते हैं अपने नंदी पर ही पार्वती को भी बिठाए  हुए     (जबकि पार्वती का   वाहन अलग है ) भोले बाबा गाँव गिरावं घूमते रहते हैं- लोगों का दुखदर्द बांटते रहते हैं ...भला ऐसे दयालु दंपत्ति से लोगों का लगाव क्यों न हो ..भारत की नारियां तो शिव के प्रति पूरी समर्पित हैं ...शिव पूजा के प्रति उनमें विशेष उमंग और उछाह रहता है .....वर्षा ऋतु का एक पर्व है ललही छठ-यह औरतों का ही पर्व है जहां  वे इकट्ठी होकर शिव पार्वती के अन्तरंग पलों का भी चटखारे लेकर बयां करती हैं -इस शिव पार्टी में पुरुषों का जाना निषेधित है ..ऐसी पार्टी में एक बच्चे के रूप सम्मलित  मैंने जो कथायें सुनी है कि बस उनका स्मरण मात्र होठों पर मुस्कान बिखेर रहा है ...एक आम भारतीय नारी का शिव से इतना अपनापा है कि बस कुछ मत पूछिए ..शिव   खुद उनके स्वामी की प्रतीति हैं  ... शिव भोले भले हैं मगर  रसिक भी कम नहीं ..बस दिखने में ही बौरहे बकलंठ हैं, अन्दर से बड़े गहरे हैं ...उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ....वे कड़े योगी हैं तो बड़े भोगी भी हैं ..
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आदि देव हैं शिव ....विद्वानों के बीच उनके आर्य अनार्य होने की बहस छिड़ जाती हैं ..मैं तो यही मानता हूँ की वे मानव की चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति हैं -उनकी संकल्पना खुद हमारी अभिलाषाओं ,आकांक्षाओं ,दुर्बलताओं ,विपन्नताओं ,प्रवंचनाओं की ही देन है -इसलिए ही तो हम उन्हें अपने इतना करीब पाते हैं -हर किसी ने शिव को अपने अपने रंग में गढ़ा है -विद्वानों को  जहाँ वे 'नमामीशमीशान निर्वाण रूपं .....' लगते हैं तो एक तांत्रिक को वे भस्मावेष्ठित  कपाल कुंडल युक्त अघोरी दिखते हैं ..नर्तक -गायक उन्हें इस विद्या के अधिष्ठाता  मानते हैं तो किसी योद्धा को वे तांडव मुद्रा की प्रतीति कराते हैं ....कालांतर में सबने उन्हें अपना बनाया  है ,वे क्या सर्वहारा क्या समृद्धिवान सभी के चहेते देव हैं ....लोकमानस ने उनके साथ खुद को इतना जोड़ लिया है ,इतनी कथायें रच डाली हैं कि वे आम भारतीय में सदियों से ऐसे गुथे हुए हैं कि आगे भी कितनी सदियाँ क्यों न बीत जाएँ जनमानस शिवत्व से विलग नहीं हो सकता .....

योगी तो ऐसे कि उनके ध्यान भंग करने के लिए  कामदेव को अपनी जान की बाजी लगाने पडी ..मगर आसक्त भाव भी ऐसा की दक्ष यज्ञ के पश्चात मृत सती का शरीर लिए छः माह व्यथित विकल घूमते रहे ....मृत विगलित शरीर जगह जगह गिरता रहा -जो पुण्य स्थान बनते गए ...बनारस के एक घाट पर मणि कुंतल के साथ कान गिरा तो वह  मणिकर्णिका कहलाया -जो मोक्ष "श्रोतम श्रुतैनैव ' से नसीब था वह मणियुक्त पार्वती के कर्ण अवशेष अनुप्राणित स्थल के जीवित ही नहीं मृत्योपरांत भी  संस्पर्श मात्र से ही सर्व सुलभ है -आज  हिन्दुओं का अंतिम संस्कार के रूप में यहीं शव दाह की परम्परा है ---कामरूप कामाख्या में सती का एक कामांग  गिरा तो  जन श्रुति चल पडी कि पूरब की महिलाओं में जादू का आकर्षण है -यहाँ अकारण ही पूरब की बूढ़ी दादियाँ और स्त्रियाँ अपने बच्चों /पतियों को असम/बंगाल के सौन्दर्य से  बच के रहने की चेतावनी नहीं देतीं ....

बिना पार्वती के संस्पर्श -साथ के शिव भी शव रूप ही हैं ....वे शिव तो शिवा के संयोग से ही हैं ....एक भक्त ने वामांग में  पार्वती को बैठे देख हठ कर लिया कि वह केवल शिव रूप का ही अर्चन चाहता है तो शिव खुद अर्धनारीश्वर बन गए ...उस मूरख को कहाँ पता था कि वे अलग है ही कहाँ?  वे तो शब्द और अर्थ की भांति जुटे हुए हैं ....वागर्थाविव संपृक्तौ ...पार्वती परमेश्वरौ .....शिव की बारात नगर की गलियों को गुलजार कर रही है -बच्चे बूढों सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुयी है ....चारो और हंसी और ठिठोली का माहौल है .....भला ऐसी भी कोई बारात होती है ....जस दुलहा तस बनी बराता....

इस संसार में जो कुछ भी मनोरम है, सौष्ठव और सामंजस्य लिए है विभिन्न विरूपताओं में भी संतुलन बनाए हैं  वही शिव है -आप सभी का शिव पार्वती मंगल  करें-यही कामना है !  

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एक उदास शाम,देव दीपावली और पुण्य श्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज बनारस का एक लख्खी मेला देव दीपावली है ..लख्खी का मतलब जहाँ कम से कम एक लाख की भीड़ होती हो ....यहाँ पहले से कई लख्खी मेले विख्यात हैं -जैसे नाटी इमली का भरत मिलाप ,चेतगंज की नक्कटैया ,तुलसीघाट की नाग नथैया तथा सिगरा के पास की रथयात्रा जिसके नाम पर एक चौराहे का ही नामकरण हो गया है ....इन सभी अपार जनसमूह वाले मेलों में लगभग एक दशक से देव दीपावली का भी नाम आ जुड़ा है और इसे वैश्विक पर्यटन का आकर्षण दे दिया गया है -देश विदेश से पर्यटकों का एक बड़ा हुजूम आज यहाँ आ पहुँचता है ...और बनारस के गंगा घाटों पर असंख्य दीप जगमगा उठते हैं ....आतिशबाजी भी होती रहती है और अस्ताचल को बढ़ते चंद्रमा की रश्मियाँ गंगा जी में एक स्वर्ण पट्टी बिखेरती चलती हैं ....

देव दीपावली पर बनारस के बस एक घाट का नज़ारा (सौजन्य गूगल ) 

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद घाट (पारम्परिक दशाश्वमेध घाट)  पर गंगा आरती का दृश्य और पार्श्व में शिव तांडव स्त्रोत का पाठ - अद्भुत  दृश्य और अध्यात्मिक अनुभव -जीवन का एकबारगी का समग्र अनुभव देता है ....मैं स्वजनों के साथ, परिवार के साथ ,राज्य अतिथियों के साथ पिछले लगभग हर वर्ष इस मेले का आनन्द उठाता आया हूँ -इस बार न बच्चे हैं ,न घर (तेलितारा ,जौनपुर)  से कोई आया और न ही कोई मेहमान ही सो मेले में नहीं गया हूँ और बैठे ठाले विगत जीवन के कुछ सिंहावलोकन की ओर अनायास उन्मुख हो इस शाम को ही उदास कर बैठा हूँ -लोगों के बनावटी पन,चालाकी ,मित्रों के विश्वासघात,ब्रीच आफ ट्रस्ट आदि के मंजर अचानक ही याद हो आये हैं -कोई बच्चा मेला जाने से बिछुड़ गया हो तो वह ऐसी ही कई विचारों,अकेलेपन और असहायता  से गुजरता है ..बस समझ लीजिये ऐसा ही कुछ बेहद खराब सा अनुभव हो रहा है ...
देवेन्द्र  पांडे जी ने मेले से लौट कर  देर रात भेजा यह  चित्र -देखिये स्वर्ण पट्टी  


कहते हैं देव दीपावली के कई मिथकीय कारणों के साथ ही इस समारोह को महारानी अहिल्याबाई होलकर से भी जोड़कर देखा जाता है ...मैं आज से अच्छा और उचित अवसर कोई और नहीं समझता जब इस अवसर पर मैं इस महान भारतीय नारी के बारे में आपसे कुछ साझा न  करूं..महारानी लक्ष्मीबाई से यहाँ का बच्चा बच्चा परिचित है -उन पर कवियों की खूब लेखनी चली है ....फ़िल्में और सीरियल भी आयें हैं मगर आश्चर्य है कि अहिल्याबाई होलकर के बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं ...विकीपीडिया के अंगरेजी और हिन्दी संस्करणों ने इस महान महिला के बारे में यहाँ और यहाँ जानकारी दी है -अंगरेजी की जानकारी प्रभूत और पर्याप्त है ..अगर आपके समय हो तो अवश्य चंद मिनट वहां दें ..कई प्रान्तों में हिन्दू मंदिरों का पुनरोद्धार इन्हीने कराया ..काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का एक तरह से जीर्णोद्धार ही इनके द्वारा हुआ ..गया के विष्णुपाद मंदिर को भी इनकी ही कृपा से नया रूप रंग मिला ....
पुण्य श्लोक राजमाता अहिल्याबाई होलकर 

इसके बावजूद एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार काशी के लालची पंडों  ने इनके विश्वनाथ मंदिर में घुसने के समय इनके मार्ग पर हीरे जवाहरात बिछाए ताकि शूद्र के चरण से स्पर्शित हो पवित्र स्थल अपवित्र न हो जाय और बाद में मंदिर के गर्भगृह और आस पास के  प्रांगण  को  गंगा जल से धुलवाया ....तत्पश्चात महारानी ने यहाँ के पोंगा पंडितों को तब सीख दी जब वे गंगा स्नान के बाद जल धारा  से बाहर नहीं निकल रही थीं -अपनी सेना भेजकर उन्होंने उन्ही लालची पंडों को बुलाया और कहा अब तो मेरे स्नान के बाद  पूरी गंगा ही अपवित्र हो गयीं है इसे पवित्र करो तभी मैं बाहर आऊँगी ....लज्जित पंडों ने उनसे माफी मांगी ....ऐसी ही पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर ने हजारा दीपस्तम्भ से यहाँ के एक गंगा घाट -पञ्चगंगा घाट पर देव दीपावली की शुरुआत की जो आज एक वैश्विक मेला बन चुका है .
लख्खी मेले पर उमड़ा जन सैलाब (यह चित्र भी देवेन्द्र पांडे जी के सौजन्य से ) 

केवल इस मेले को ही देखकर आप बनारस आने का औचित्य साध सकते हैं और जीवन को धन्य कर सकते हैं ...मेरी बात का भरोसा कीजिये एक अनिर्वचनीय अनुभव के साथ आप वापस जायेगें ...और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपने संस्मरण छोड़ जायेगें ..इस पोस्ट को पूरी करते करते मैं अपने अवसाद से मुक्त हो रहा हूँ .....बाकी तो बेचैन आत्मा एलियास देवेन्द्र पाण्डेय जी ने आश्वस्त किया है कि इस बार  मेरे संती (हिस्से का ) भी मेला वे देखेगें और उसकी चौचक रिपोर्ट आपको  तक पहुचायेगें  ......मुझे उन्होंने फोटो उपलब्ध करने का भी वादा किया है मगर मुझे सब्र कहाँ और इस उदास शाम के गम को गलत करने का कोई और सहारा भी तो नहीं था -सो थोड़ी सृजनात्मकता का सहारा ले लिया और यह पोस्ट लिख दी है ......
शुक्रिया देवेन्द्र पाण्डेय जी आपके फोटो अवदान के लिए 
और देर रात आयी देवेन्द्र जी की यह आँखों देखी टटकी रिपोर्ट 

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

महारास की रात

आज शरद पूर्णिमा है मतलब क्वार (आश्विन ) माह की पूर्णिमा -स्निग्ध खिली खिली चांदनी पूरी रात ....गुलाबी जाड़े का संस्पर्श और खिली चांदनी आखिर क्यों न श्रृंगारिकता का उद्रेक करे ...फिर तो यही महारास भी होना था कृष्ण का ..दुग्ध धवल चांदनी में  काले गिरधारी का चेहरा निश्चय ही गोपियों को साफ़ शफ्फाक दिखता होगा और प्रेम आसक्ति का भाव गाढ़ा होता होगा ..कहते हैं इसी दिन ही रास नहीं कृष्ण महारास रचाते थे -रास में तो वे केवल राधा के साथ होते, महारास समस्त प्रेम विह्वल गोपियों का आह्वान था ....आज की चांदनी देखिये तो आपको खुद लग जाएगा कि महारास की यही तिथि क्यों चुनी गयी होगी -यह प्रेम का स्फुरण और उत्प्रेरण है ..मिलन का आमंत्रण है!



फेस बुक पर यह महारास आयोजित हो गया है ...ब्लॉग जगत न जाने क्यों रीता रीता सा है ...रास पूर्णिमा को भी यहाँ घनी कालिमा छाई हुयी है ....सोचा तनिक चेता दूं रसिक जनों को ..... :) ज्योतिषी कहते हैं कि केवल आज की रात चन्द्रमा सभी सोलह कलाओं से युक्त होते हैं जैसे वे भी नायक नायिका के अटल प्रेम को अपनी सम्पूर्णता में निरख रहे हों ....बड़ी मान्यताएं है आज के रात की ....कहते हैं चाँद आज रात भर अमृत वर्षा करता है ..सोम नाम चन्द्रमा का इसलिए ही है ...चिर जीवनीय गुणों से युक्त औषधियां इसी अमृत वर्षा से और भी गुणकारी हो उठती हैं ...अब इतने गुणकारी अमृत वर्षा को लक्ष्य कर ही वैदिक ऋषि ने कहा होगा ....तस्मै सोमाय हविषा विधेम .....यही अमृत संचित कर सेवन कर लेने के लिहाज से यह भी परम्परा है कि रात में खीर बनाकर चांदनी में रखा जाय और फिर रसास्वादन कर  आरोग्यता लाभ लिया जाय ..मैंने गृहिणी जी को इस व्यवस्था के लिए कह दिया है ..अब अनुष्ठान प्रिय तो मानव है ही और इसमें सुस्वादु खीर खाने का जुगाड़ भी है ....वैसे तो गृहिणी ना नुकर भी करतीं मगर शरद पूर्णिमा का महात्म्य बताने पर सहर्ष तैयार हो गयी हैं ....अच्छी गृहणियां ऐसी ही होती हैं न ..... :)

शरद पूर्णिमा का महारास 
कहीं कहीं व्रत भी रखते हैं -जिसे कौमुदी व्रत कहते हैं -कौमुदी चांदनी की पर्यायवाची है ....विधान यह भी है कि खीर बनायी जाय और उसी के साथ बैठा भी जाय ....रास ,महारास  के साथ रस भोग  भी  ....चांदनी में सूई में धागा भी पिरोया जाय .....पता नहीं इनमें से आप की तैयारी कुछ है भी या नहीं ..अभी भी समय है कुछ जुगाड़ कर सकते हैं ....मान्यता यह भी कि रात में लक्ष्मी जी गश्त लगाती हैं और देखती हैं कौन जग रहा है और उसे धन धान्य से परिपूर्ण कर देती हैं ...महारास  भी धन धान्य भी ..और चाहिए भी क्या? अब लक्ष्मी भगवती का यह देखना कि कौन जाग रहा है इस महारास पर्व को कोजागर पर्व  नाम भी दे गया है ...



अब कुछ ज्यादा लिखने लग गया तो आप को फिर सारे इंतजाम का मौका नहीं मिलेगा और अक्लमंद को इशारा ही काफी होता है ..क्या समझे? 

शनिवार, 27 अगस्त 2011

क्या मृत्योपरांत इस लोक प्रथा से आप परिचित हैं?

अपने किसी स्वजन ही नहीं पास पड़ोस के  किसी की भी मृत्यु होने पर हम संतप्त हो उठते है,पीड़ा अनुभव करते हैं और एक विरक्ति सा भाव भी मन में आ जाता है -मगर यह स्थाई नहीं रहता .कहा जाता है न कि समय सारे घावों को भर देता है ...कुछ दिन शोक मना  कर मनुष्य फिर  दुनियावी कामों में लग जाता है -यक्ष ने जब युधिष्ठिर से यह पूछा था कि दुनियाँ का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या  है तब उनका जवाब भी यही  था कि  लोग मृतकों का रोज दाह संस्कार करते समय जीवन की नश्वरता का बोध करते हैं और सोचते हैं कि एक दिन उनकी भी यही गति होगी मगर फिर से दुनियादारी में डूब जाते हैं -यही सबसे ब़डा आश्चर्य है!

किसी के भी दिवंगत होने पर दुखी होना मनुष्य का मानवीय गुण है ....यह उसकी जीनिक अभिव्यक्ति है -और मनुष्य की ही मोनोपोली इस क्षेत्र में नहीं है. कई ऐसे पशु हैं जो अपने समुदाय के सदस्य के मृत होने पर दुखी ही नहीं होते कुछ अनुष्ठान सा करते दिखाई देते हैं -गैंडे अपने शिशु-शावकों के मरने पर उनका सर सूंघते हैं और गोल गोल उनके शव के इर्द गिर्द घूमते हैं ..मनुष्य में भी मृत्योपरांत यह अनुष्ठानीकरण काफी विस्तृत होता गया है ....शोक सभा /शान्ति पाठ के साथ साथ कच्चे पक्के श्राद्ध और ब्रह्म चिंतन (जिसका विकृत रूप कालान्तर में ब्राहमण/ब्रह्म भोज हो गया ) का आयोजन हमें अपनी मनुष्यता का अहसास दिलाता है ...मृत्योपरांत ऐसे आयोजनों का स्वरुप विभिन्न संस्कृतियों में भले ही अलग अलग तरीके से हो मगर ऐसा आयोजन  होता अवश्य है! 

हमारे लोक जीवन में ,कम से कम भारतीय भूगोल के जिस हिस्से को मैं आबाद कर रहा हूँ -उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल ,यहाँ  मृत्यु के उपरान्त बड़े  कठिन क्रिया कर्म का प्रावधान है ....पूरे तेरह दिन के कठोर कर्मकांडी व्रत का विधान है यहाँ! दाह संस्कार ,छोटा श्राद्ध (छोटका सुद्ध  ) ,दशगात्र (दसवां ) और फिर तेरहवीं  और उसके बाद भी पूरे एक वर्ष तक के कई निषेध - डूज एंड डोंट्स! आखिर मनुष्य एक अति विकसित सामाजिक प्राणी है तो उसके मृत्यु -कर्मकांड भी तो इलैबोरेट  होने थे न? और पंडित जजमान की भी ऐसी प्रथा कि स्वजन के चले जाने की विछोह पीड़ा को झेलता जजमान वह सब क्रिया कर्म करता है जो लोभी कर्मकांडी  करवाता जाता है ...नहीं तो जग हंसायी तय है ....ऐसे ही लोभी लालची कर्मकांडियों  की एक जमात महापात्र कहलाने लगी जो ऐसे कर्मकांडों में श्रद्धा (?) से दिए जाने वाले सामानों का एक बड़ा हिस्सा हथियाने को हर हथकंडा अपनाते हैं!इसलिए हमारे समाज में महापात्र ब्राह्मणों को हेय दृष्टि से देखा जाता है  ...श्राद्ध का अर्थ ही है जो श्रद्धा से किया जाय या दिया जाय ...मगर महापात्र तो सब कुछ छीनने पर उतारू रहते हैं! मुझे अपने एक पड़ोसी की याद है जिनके पिता जी कोई ९५ वर्ष पर दिवंगत हुए ....अब उनसे श्राद्ध के कर्मकांडी महापात्र  ने अनुष्ठान के समय इतनी उठक बैठक  कराई कि उन्होंने हाथ जोड़ दिए और महापात्र से विनती की कि उसी समय उनका भी श्राद्ध कर दिया जाय:) 

मृत्यु से जुडी एक और लोक परम्परा है और इसे भी सदियों से समाज ने एक अनुष्ठान का रूप दे दिया है .....किसी स्वजन के मृत्यु के उपरान्त बड़े विस्तृत और लम्बे समय तक स्त्रियों के रोने के प्रदर्शन का ....इसे हमारे यहाँ 'कारण कर कर के रोना' कहते हैं और यह बड़े अंचल में प्रचलित है ....स्त्रियाँ  बहुत सी संगत  असंगत  बातों को रोते हुए कहती जाती हैं -मृतक को कई उलाहने भी देती है जो मृतक के प्रति उनकी घनिष्टता के स्तर को दर्शाती हैं ....ऐसा रुदन अनुष्ठान दूसरे विछोह के अवसरों पर भी होता है ..जैसे जब कोई लडकी विवाहोपरांत पिता का घर छोड़ के पहली बार  विदाई पर ससुराल जाती है -तब भी वह जिस किसी को देखती है कई कई बातें कहकर एक ख़ास रोने की शैली अपनाती है ..कई बार तो मुझे यह बड़ा हास्य मूलक भी लगता है...अब जैसे विदाई के वक्त किसी भी अड़ोसी पड़ोसी को देखकर रोजमर्रा की दिनचर्या का कोई प्रसंग छेड़ देना ..अब कब कौन गाय को भूसा देगा या भैंस का दूध दुहने में उसकी मां या बापू का  मदद करेगा अदि आदि ....मगर ये लोक प्रथाएं है और किंचित भी किसी तरह की अपसंस्कृति नहीं ....इसलिए हमें इनके प्रति एक सहिष्णु भाव रखना पड़ता है भले ही इनको लेकर थोड़ी हंसी ठिठोली हो जाय!


 अपने प्रिय ब्लागर डॉ. अमर कुमार के अवसान पर भी ऐसी कतिपय पोस्टों को  मैं इसी विधा-परम्परा  में मानता हूँ और उनका भी सम्मान करता हूँ! काश वे मेरी इस पोस्ट पर अपनी टिप्पणी दे पाते ......


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