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रविवार, 24 अप्रैल 2016

शिवजी के ललाट पर बालचंद्र क्यों हैं ,पूर्णचन्द्र क्यों नहीं?

कौस्तुभ ने पूछा है कि शिवजी के ललाट पर बालचंद्र  क्यों हैं ,पूर्णचन्द्र क्यों नहीं? अब सवाल है तो उत्तर भी होना चाहिए।  किसी को यह भी लग  सकता है कि भला यह भी कोई सवाल है? अर्धचंद्र है तो है अब इसकी क्या मीमांसा? देवी देवताओं के मामले में ऐसा हस्तक्षेप वैसे भी लोगों को पसंद नहीं है। मगर जो जिज्ञासु हैं उन्हें तसल्ली नहीं होती। जिज्ञासु लोगों के साथ एक समस्या और भी है वे प्रायः तार्किक भी होते हैं -एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा :-) . किन्तु  यह भी सत्य है कि यदि जिज्ञासु न होते तो आज मानव जहाँ है वह नहीं होता।  जिज्ञासुओं ने ज्ञान की गंगा को हमेशा प्रवाहित किये रखा है।  

चन्द्रमा हमेशा से मनुष्य की जिज्ञासा और श्रृंगारिकता को कुरेदता रहा है। कारण चन्द्रमा कौतुहल का विषय रहा है।  यह घटता बढ़ता  रहता है। कभी कभी तो अचानक लुप्त हो जाता है।  कभी दिन में दीखता है कभी रात में। हजारो वर्ष पहले से यह कौतूहल  का केंद्र रहा और इस आकाशीय पिंड को लेकर अनेक सवाल पूछे गए होंगे. तब हमारे पूर्वज ज्ञानियों ने अपने तत्कालीन ज्ञान के आलोक में और स्टाइल में  उन सवालों के जवाब दिए होंगे।  कहना नहीं है उन दिनों की जवाब की कथा शैली थी जो आज भी हमारे बीच पुराण कथाओं के रूप में हैं।  हाँ पुराण कथाओं की ज्ञात अद्यतन वैज्ञानिक जानकारियों के सहारे आज पुनर्रचना की जाय तो कितना अच्छा होगा। 

हाँ यह बताता चलूँ कि हजारो वर्ष पहले हमारे पूर्वजों को अच्छा खगोलीय ज्ञान था।  जब यूनान में मात्र १२ राशियों से अनेक खगोलीय गणनाएँ होती थीं तभी हमारे यहाँ 27 नक्षत्रों को आसमान में पहचान दी जा  चुकी थी।  अब धरती और चन्द्रमा  की अपनी धुरी और एक दूसरे के सापेक्ष पारस्परिक गति से चन्द्रमा का उसके अट्ठाईस दिन से कुछ अधिक के दिन की विभिन्न अवस्थाओं और आसमान में स्थिति को पूर्वजों ने भली भांति जान समझ लिया था तो  आम आदमीं तक इस ज्ञान को पहुंचाने के लिए को रोचक कथाएं गढ़ीं।  जिनमें एक तो दक्ष प्रजापति और उनकी सत्ताईस  पुत्रियों की कथा है जिनका व्याह चन्द्रमा से हुआ -अब २७ पुत्रियां यहीं नक्षत्र ही तो थे।  

देखा यह जाता था कि एक चंद्रमास में चन्द्रमा का ठहराव रोहिणी नक्षत्र में ज्यादा समय तक रहता  था। सवाल आया ऐसा क्यों ? जवाब था कि दक्ष की पुत्री और अपनी इस पत्नी रोहिणी  से चन्द्रमा का लगाव ज्यादा था। अब कथा और आगे बढ़ी।  जिसमें चन्द्रकलाओं के  रहस्य को समझा दिया गया -कुपित दक्ष ने  चन्द्रमा को शाप दे दिया कि तुम्हारा रूपाकार और तेज घटता जाएगा।  अब इस शाप से मुक्ति के लिए चन्द्रमा को अंततः शिव जी की शरण में जाना पड़ा ,उन्होंने आश्वस्त किया कि शाप का प्रभाव पूर्णतः तो नहीं खत्म होगा मगर तुम्हे अपना  पूर्ण स्वरुप भी मिलता रहेगा।  हमेशा के लिए क्षय नहीं होगा ! कहते हैं तभी से शिव के ललाट पर चन्द्रमा आश्रय लिए हैं।  

मगर शिव के ललाट पर बालचन्द्र (crescent moon ) ही क्यों? मैं किसी और मिथकीय कथा को ढूंढ रहा हूँ शायद कोई उत्तर वहां मिल जाय।  मगर पूर्णचन्द्र विश्व की कई सभ्यताओं में अपशकुन द्योतक हैं-ज्वार भाटा लाने वाले हैं और कभी कभी तो अचानक लुप्त हो कर भयोत्पादक भी रहे हैं। ग्रहण के चलते।  आज हमें ग्रहण की वैज्ञानिक जानकारी है मगर कभी इसके लिए भी राहु केतु राक्षसों की कथा रची गयी थी।  अब भला शिव अपशकुन सूचक ,भयोत्पादक चन्द्रमा के रूप को शिरोधार्य क्यों करेगें ? उन्हें तो निर्विकार निर्विघ्न बालचंद्र ही प्रिय हैं! आप को इस विषय पर और जानकारी मिले तो कृपया साझा करने  का अनुग्रह करेगें!

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

बिचारी कर्मनाशा!

अल्पना वर्मा जी ने मुझसे मेरी इस पोस्ट पर आग्रह किया था कि मैं खुद कर्मनाशा नदी को देखकर आने के बाद एक रिपोर्ट यहाँ डालूँ . वह संयोग कल पूरा हुआ और एक बार फिर मैं कर्मनाशा प्रसंग पर आपसे कुछ तफसील से साझा करना चाहता हूँ . सबसे पहले नदी के बारे में कुछ प्राथमिक बातें! कर्मनाशा नदी का उद्गम बिहार के कैमूर जिले के अधौरा व भगवानपुर स्थित कैमूर की पहाड़ी से हुआ है। यह  बक्सर के समीप गंगा नदी में विलीन हो जाती है।मगर अपने विस्तार में यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ,चंदौली और सोनभद्र जनपदों से गुजरती है और कुल 192 किमी का रास्ता तय करती है .इस नदी के बारे में जो बात हैरान करती है वह है इसका अभिशप्त होना ,अपवित्र होना . जबकि यह पतित पावनी गंगा की ही एक सहायिका है . कहाँ गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति की मान्यता और कहाँ इस नदी के स्पर्श मात्र से संचित पुण्यों के  स्खलित हो जाने का भय आज भी जन समुदाय में व्याप्त है .

अब कर्मनाशा को लेकर एक पौराणिक आख्यान भी आपको बताता चलूँ . सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता व सूर्यवंशी राजा त्रिवंधन के पुत्र सत्यव्रत, जो त्रिशंकु के रूप में विख्यात हुए उन्हीं के लार से यह नदी अवतरित हुयी। वर्णन है कि त्रिशंकु अपने कुल गुरु वसिष्ठ के यहाँ गये और उनसे सशरीर स्वर्ग लोक में भेजने का आग्रह किया। पर, वशिष्ठ ने यह कहते हुए उनकी इच्छा को ठुकरा दिया कि स्वर्गलोक में सदेह जाना सनातनी नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद वे वशिष्ठ पुत्रों के यहाँ पहुंचे और उनसे भी अपनी इच्छा जताई। लेकिन, वे भी गुरु वचन के अवज्ञा न करने की बात कहते हुए उन्हें चंडाल होने का शाप दे दिया। सो, वह वशिष्ठ के द्रोही महर्षि विश्वामित्र के यहाँ चले गये और उन्हें उकसाया।  विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। इस पर देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया और देवराज इन्द्र ने त्रिशंकु को नीचे धक्का दे दिया । त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए धरती पर गिरने लगे। विश्वामित्र ने ठहरो बोलकर पुन: उन्हें स्वर्गलोक भेजने का प्रयत्‍‌न किया। देवताओं व विश्वामित्र के तप के द्वंद में सिर नीचे किये त्रिशंकु आसमान में ही लटक गये। जिनके मुंह से लार टपकने लगी और उसी से एक नदी का उदय हुआ। कालांतर में  यही कर्मनाशा के नाम से जानी गयी। कर्मनाशा शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य कृष्णानंद जी 'शास्त्रीजी' का कहना है  कि जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मो के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है, वह कर्मनाशा कहलाती है।( सन्दर्भ:भारत कोश)..

 कर्मनाशा

गंगा के किनारे का वासी होकर जब मुझे यहाँ सोनभद्र आना हुआ तभी कर्मनाशा से साक्षात्कार का भी संयोग प्रबल हो गया था .यहाँ कर्मनाशा पर ही नगवां विकास खंड में एक बड़ा बाँध बना दिया गया है जो अत्यंत घने दुर्गम वन क्षेत्र में है और नक्सली प्रभावित होने से वहां अधिकारियों का आना जाना कम ही रहता है .यद्यपि विगत कई वर्षों से यहाँ कोई वारदात नहीं हुयी है और जंगल क्षेत्र में ही सेन्ट्रल पैरा मिलिट्री फ़ोर्स की एक पूरी छावनी  स्थायी तौर पर स्थापित  है मगर फिर भी वहां राबर्ट्सगंज मुख्यालय से अधिकारियों कर्मचारियों का आना जाना कम ही है . राबर्ट्सगंज से बाँध चालीस किमी पर है . कल सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता श्री के बी सिंह के सौजन्य से मुझे कर्मनाशा पर बने इस बाँध को देखने का सौभाग्य मिल ही गया .कहते हैं जब इसका निर्माण हुआ था तो यहाँ के घने जंगल में बाघ शेर तक प्रायः दिख जाते थे और दीगर वन्य जीवों की तो भरमार थी .ड्राइवर ने हमें वह जगहं दिखाई जहाँ १5 वर्षों पहले सीधे मार्ग पर ही उसने शेर को आराम फरमाते देखा था .खैर .....हम बाँध टाप पर पहुंचे और अवरूद्ध कर्मनाशा का विशाल जलाशय देखा . अधिशासी अभियंता श्री सिंह ने बताया कि इस बाँध के डाउन स्ट्रीम से निकली नहरों से हजारों किसानों की खेती आज हरी भरी है और उनकी आजीविका चलती है .
 नगवां में  कर्मनाशा पर बाँध

फिर यह नदी कैसे अपवित्र हुई? और ऊपर वर्णित आख्यान के पीछे का यथार्थ क्या है? मैं इसी का उत्तर पाने को व्यग्र रहा हूँ . इसी सिलसिले में कर्मनाशा ब्लॉग के लेखक सिद्धेश्वर सिंह जी से बात भी हुयी थी और उनका एक लेख  सृजनगाथा पर मुझे मिला। इसमें उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार शिवप्रसाद सिंह की लम्बी कहानी कर्मनाशा की हार का भी जिक्र किया है . सिद्धेश्वर सिंह जी के बचपन का एक अनुभव है -"मल्लाह को उतराई देने के लिये अक्सर पिताजी मुझे दो चवन्नियां इस हिदायत के साथ पकड़ा दिया करते थे कि इन्हें पानी में नहीं डालना है।क्यों? पूछने की हिम्मत तो नहीं होती थी लेकिन बालमन में यह सवाल  तो उठता ही था कि जब हम गाजीपुर जाते वक्त गंगाजी में सिक्के प्रवाहित करते हैं तो कर्मनाशा में क्यों नहीं? हां, एक सवाल यह भी कौंधता था कि गंगाजी की तर्ज पर कर्मनाशाजी कहने की कोशिश करने से डांट क्यों पड़ती है?" यह एक दृष्टांत ही काफी है यह बताने के लिए कि पौराणिक आख्यान आज भी जन मानस को कितना प्रभावित किये हुए हैं। आज भी बहुत से सनातनी इस नदी में स्नान नहीं करते . मेरी संकल्पना थी कि इसके पानी में हो सकता है कुछ विकारकारी प्रभाव हो और इसलिए विज्ञ पुरखो ने आख्यान की रचना कर  आम कार्य व्यवहार के लिए  इसे  प्रतिबंधित किया हो .मगर मुझे अपनी संकल्पना की पुष्टि के पक्ष में अभी तक तो  प्रमाण नहीं मिले हैं . फिर इस नदी के अभिशप्त होने का कारण?
बाँध से  बना विशाल जलाशय

ऐसा लगता है कि मगध में जब बौद्धों का आधिपत्य हुआ और उन्हें राजाश्रय मिला तो सनातनियों की शामत आ गयी . वैदिक ब्राह्मणों को उपेक्षित ही नहीं निर्वासित भी होना पड़ा होगा .बस प्रतिशोध की एक भाव भूमि तैयार हुयी होगी। लिहाजा गंगा के नित महिमा मंडन के साथ ही कर्मनाशा (जो निश्चय ही इसका मूल नाम नहीं रहा होगा ) का अवगुण वर्णन आरम्भ हुआ होगा क्योंकि कर्मनाशा को पार करने के बाद ही बौद्धों का प्रदेश प्रारंभ हो जाता था।कर्मनाशा अब पतित बन गयी थीं .गया आदि क्षेत्र आज भी प्रेत कर्म पिंड दान आदि के लिए ही घोषित बने हुए हैं .तो यह एक ऐसी घनघोर वैचारिक लड़ाई थी जिसकी भारी कीमत एक नदी को अपनी ख्याति देकर चुकानी पडी . कितना क्षोभजनक है यह? बिचारी कर्मनाशा!

सोमवार, 1 जुलाई 2013

मिथक का मतलब

इंजीनियर शिल्पा मेहता जी ने मुझसे मेरी पिछली पोस्ट पर एक सवाल  पूछा है कि मिथक का मतलब क्या है? अब जब किसी जिज्ञासु ने यह सवाल कर ही दिया तो यह फर्ज  बनता है कि जवाब दिया जाय .यद्यपि मैं जानता हूँ कि शिल्पा जी और मेरी सोच इस विषय पर  भिन्न संस्कारगत और स्वाध्याय के कारणों से अलग है मगर मैं समझता हूँ कि अपनी अल्प बुद्धि से  जो मैं आत्मसात कर सका हूँ वह पूरी ईमानदारी से आप से साझा करूँ! सबसे पहले यह कि मिथक शब्द हिन्दी मूल का नहीं है बल्कि इसे अंग्रेजी के मिथ या माइथालोजी से गढ़ा गया है .मिथक पुराकथाओं,विश्वासों ,चमत्कारिक घटनाओं, पात्रों ,अलौकिक आख्यानों का  ही संबोधन है जिनके सच होने की अनिवार्य प्रमाणिकता न हो। अब जैसे हमारी पुराकथाओं के अनेक स्थान, पात्र  मिथकों की ही श्रेणी में आते हैं .मिथक बोले तो जो 'रियल' यानी वास्तविक न हो . 
 पिछली पोस्ट में मैंने गोवर्द्धन पर्वत के नीचे लाकर गोकुलवासियों को  कृष्ण द्वारा अति वृष्टि से बचाए जाने का एक दृष्टांत दिया था . यह एक मिथक है!अब लोग बाग़ इस पर तर्क कर सकते हैं कि हद है कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं क्या उनके लिए ऐसा संभव नहीं हो सकता था-जिसकी भृकुटी विलास पर सारा ब्रह्मांड लय हो सकता है उसके लिए एक पहाड़ को अपनी उंगली पर  उठाना कौन  सी बड़ी बात?इसी तरह हमारे महाभारत और रामायण काल के कई आख्यान हैं . रावण द्वारा पूरा कैलाश पर्वत ही उठा लेने का मिथक है .नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र के प्रयोग हैं . पुष्पक विमान है।

 पुष्पक विमान:मिथक या सच 

मेघनाथ का माया युद्ध  है,आदि आदि ! क्या ये सब जैसा वर्णित है सच रहे होंगें? अगर आप  इन्हें सच मानते हैं तो बात ख़त्म हो जाती है -हम आपसे आगे बात नहीं कर सकते . क्योकि मेरा तर्क  है कि प्रौद्योगिकी तो तब इतनी विकसित ही नहीं थी (प्रमाण कहाँ है ? ) कि ऐसे गजेट वजूद में होते , हाँ मानव मेधा बहुत उर्वर तब भी थी . उसने अपनी कल्पनाशीलता के घोड़े को बेलगाम दौड़ा दिया . मगर यह कोई कम योगदान नहीं है -आज उन्ही दिव्यदृष्टि प्राप्त विचारकों की राह पर प्रद्योगिकी चल रही है और कोई आश्चर्य नहीं कि एक दिन  हमारे पास सचमुच का पुष्पक विमान हो , माया युद्ध के इंतजाम हों , शत्रु के टारगेट पर मार कर सकुशल वापस लौटने वाले मिसाईल हों जैसे भगवान् राम के बाण उनके तुरीण में लौट आते थे ! मगर ये सब कभी थे यह कहना सच नहीं है बल्कि मिथक है !
हाँ यह माना जा सकता है कि कुछ घटा होगा जिनकी सामूहिक/ जनस्मृति अवशेष आज के मिथक हों . समयांतराल में उनका स्वरुप फंतासी/स्वैर कल्पनाओं से आलोड़ित होता गया हो ! जैसे बहुत संभव है अतिवृष्टि की समस्या से आगाह होकर कृष्ण नामक कोई जन नायक महावृष्टि की किसी आशंका के चलते एक सुरक्षित विशाल कन्दरा ढूंढ ली हो और आपात काल में सबकी रक्षा हो गई  हो .कालांतर में वर्षा के देव इन्द्र के साथ संयुक्त हो यह पूरी घटना अपना मौजूदा  मिथकीय स्वरुप पा गयी हो .
मानव बुद्धि का तकाजा यह है कि वह अपने तर्क की क्षमता का उपयोग करे .फंतासी के पीछे छुपे सत्य को अनावृत करने का प्रयास करे .सभी अलौकिक घटनाओं के पीछे ईश्वरीय भूमिका को सहज ही मान लेना मानव बुद्धि का अपमान है ,उसका तिरस्कार  है . मिथकों ,जनश्रुतियों, लोक कथाओं में अंतर है मगर मिथकों को विराटता मिली है . जो अलौकिक हो, विराट हो ,चमत्कारिक हो वह मिथक है . उसकी दृश्यावलियाँ समकालीन दृश्य से मेल न खाती हों, एक दूसरी दुनिया सी हों .पात्र मानवीय न  होकर दैवीय हों ....स्वर्ग नरक पाताल देवता राक्षस मिथक ही तो हैं! मजे की बात है कि सभी लोक कथाएं तो सच नहीं मानी जाती  मगर मिथकों को कहने सुनने वाले उन्हें सच मानते हैं . स्वर्ग नर्क उनके लिए कोई परिकल्पना नहीं सच है! यह एक बड़ा विषय है .बहुत सी बातें इस छोटी सी पोस्ट की परिधि के बाहर हैं .हम फिर कभी चर्चा करेगें या फिर टिप्पणियों में कुछ चर्चा का विस्तार  हो सकेगा।आप चर्चा के लिए आमंत्रित हैं! 


शुक्रवार, 21 जून 2013

काश कोई कृष्ण आज भी होता!

गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !

सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा  है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना  होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल  पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक  देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला! 

रविवार, 22 जुलाई 2012

का न करै अबला प्रबल?.....(मानस प्रसंग-7)



अब आगे ....
बालकाण्ड में पहली बार नारी विषयक उदगार तब व्यक्त हुए हैं  जब वन में नारी विछोह में भटकते भगवान राम की  सती ने परीक्षा ले ली, शंकर जी की अनिच्छा के बावजूद -नारी के इसी दुराव छिपाव को लक्षित करते हुए  संतकवि कहते हैं -सती कीन्ह चह तहहूँ दुराऊ देखऊँ नारि सुभाव प्रभाऊ ..अर्थात जो सर्वज्ञाता है सती उससे भी छल कर रही हैं -नारी का स्वभाव तो देखिये .....और इसी दुराव को लक्षित कर शंकर जी ने सती का परित्याग किया -यहिं तन सती मिलन अब नाहीं ... खुद सती के ही अगले जन्म में पार्वती यह स्वीकारती हैं -"नारि सहज जड़ अज्ञ ... नारी स्वभाव से ही मूर्ख और बेसमझ होती है ..मैंने शिवजी से कपट किया था और उसका परिणाम भोगा"  -अयोध्या काण्ड में कैकेयी ने राजा दशरथ के साथ जो प्रपंच किया उससे भला कौन अपरिचित है ..वहां भी उल्लेख हुआ है -जदपि सहज जड़ नारि अयानी..नारी तो सहज ही मूर्ख और अज्ञानी है (मतलब जन्म से ही  मूर्ख) ..राजा दशरथ नीति निपुण होते हुए भी नारी मोह में पड़ गए -कारण? जद्यपि नीति निपुण नरनाहू नारि चरित जलनिधि अवगाहू ..बिचारे क्या करते? त्रिया चरित्र ही अथाह है उसका पार नहीं  पाया जा सकता . और राजा दशरथ नारी का विश्वास कर कहीं के नहीं  रहे ....गयऊँ नारि विश्वास.....! 
अयोध्या काण्ड में ही विभिन्न प्रसंगों में आया है -सत्य कहऊँ कवि नारि सुभाऊ सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ यानि कविगण सत्य कहते हैं कि नारी का स्वाभाव पकड़ में आने वाला  नहीँ है .अथाह है और भेद भरा है अपनी परछाईं तो फिर भी पकड़ी जा सकती है मगर नारी की गति समझ पाना असंभव है -निज प्रतिबिम्ब बरकु गहि जाई जानि न जाई नारि गति भाई ...हाँ एक जगहं वह निरी अबला भी नहीँ है -काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाई का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाई ....आग क्या नहीँ जला सकती ,समुद्र में क्या नहीँ समां सकता काल किसे कवलित नहीँ कर सकता और नारी क्या नहीँ कर सकती -वह तो दरअसल प्रबला है, अबला बस कहने भर को ही है  ....राजा दशरथ का तो प्राण ही हर लिया ...इतने ज्ञानी, विद्वान मगर अबला बिबस ग्यानु गुण गाजनु ..एक अबला से विवश हो गए ... 

भरत  स्वयं कैकेयी को धिक्कारते हुए कहते हैं -विधिहुं न नारि ह्रदय गति जानी सकल कपट अघ अवगुण खानी..अर्थात स्वयं ब्रह्मा भी नारी के ह्रदय की बात नहीँ जान सकते जो हर तरह के कपट बुराई और अवगुण की खान है...एक स्वीकारोक्ति शबरी की भी है -अधम ते अधम अधम अतिनारी तिन्ह में मैं मदिमंद अघारी ...जो अधम से भी अधम हैं नारी उनमें भी अधम है ...और उनमें भी मैं अति मंद बुद्धि की हूँ .....अरण्य काण्ड शुरू हुआ तो संतकवि ने राम के मुंह से -सीधे श्रीमुख से भी नारी की निंदा कराकर मनो संतुष्ट हुए हों -राख़िय नारि जदपि उर माहीं जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं -यानि नारी को भले ही ह्रदय में ही क्यों न रखा जाय वह ,शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रह सकते ...वे स्वभावतः स्वच्छंद होते हैं ..अरण्य काण्ड का समपान ही नारी विमर्श /विषयक परामर्श से होता है - 

दीप शिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग 

युवती का तन दीपक के लौ के सामान है, हे मन तूं उसके लिए पतंगा मत बन (नहीं तो नष्ट हो जाएगा )......

क्या सचमुच ज्ञानार्जन और पुरुषार्थ का मार्ग नारीविमुखता या उससे तटस्थ रहने  से ही संभव है? या फिर आर्ष ग्रथों की बात बस ऐसे ही कल्पना की बेवजह  उड़ान है और उसे अनदेखा कर देना चाहिए? संतकवि का खुद का अपना भोगा  हुआ यथार्थ -पत्नी की लताड़ उनकी आजीवन की कसक रही हो जिसे उन्होंने रामायण के पात्रों में यत्र तत्र आरोपित किया हो? ये सारे सवाल मेरे मन को मथते रहे हैं ,आप क्या कहते हैं ? 

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

माया युद्ध -पुराणकार की अद्भुत सोच!


भारत ने अंतर महाद्वीपीय मिसाइल अग्नि-5  के प्रक्षेपण के साथ ही सैन्य क्षमता के लिहाज से पूरी दुनिया में एक गौरवभरा मुकाम हासिल कर लिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक एंटी मिसाइल की भी मारक क्षमता लिए हुए है - यानी दुश्मन की मिसाइल को लक्ष्य पर पहुंचने के पहले ही उसे  मार्ग में ही नष्ट करने की क्षमता...एक ऐसे युद्ध में पारंगत होने की क्षमता जिसका रोमांचपूर्ण विवरण हमें महाभारत और रामायण की युद्ध कथाओं में देखने को मिलता है. आज जब टेक्नोलॉजी का विकास हो गया है तो हम अपने पुराणकारों द्वारा कल्पित के कितने ही युद्ध तकनीकों को साकार कर रहे हैं. दैत्यों द्वारा संधान किये कितने ही आयुध, अस्त्र शस्त्र वायुमार्ग में ही देवताओं द्वारा विनष्ट कर दिए जाते थे...आज की गाईडेड  मिसाइल्स और एंटी बैलिस्टिक मिसाइल्स हमारी उसी पौराणिक सोच का साक्षात नमूना है .

हमारे पुराण युद्ध के अनेक कला कौशलों, अनेक तरह के आयुध-अस्त्र शस्त्र के रोमांचपूर्ण विवरणों से भरे पड़े हैं. आज के सैन्य सुरक्षा वैज्ञानिक उनसे कई सूझें ले सकते हैं. कृष्ण का सुदर्शन चक्र गाइडेड मिसाइल की ही तरह तो काम करता है - दुश्मन का काम तमाम किया फिर वापस अपने स्वामी के पास. भगवान राम के बाण दुश्मन का बाल बांका करके वापस अपने तरकश में आ जाते थे. यह अस्त्र शस्त्रों के उपयोग-प्रबंध की कितनी उपयुक्त सूझ है। कम खर्च बाला नशी...मतलब कम ही अस्त्र में किला फतह। अम्बार लगाने की जरुरत नहीं। कम ही अस्त्र हों पर अचूक और कारगर हों!कितने दूर की कौड़ी ले आये थे पुराणकार...आज जब हमारे पास प्रौद्योगिकी है तो हम उन विचारों को मूर्त रूप दे रहे हैं. मगर अभी भी हम पुराणों में वर्णित अनेक युद्ध कौशल और अस्त्र शस्त्रों को अमली जामा नहीं पहना पाए हैं।यद्यपि आज हमारे पास ब्रह्मास्त्र या नारायणास्त्र के आधुनिक स्वरुप- नाभकीय बम मौजूद हैं, जिनके इस्तेमाल से कुछ उसी तरह का दृश्य साकार हो उठता है जैसा पुराणों में दर्शित है -भीषण चमक ,आवाज ,भूकंप और पल भर में सब कुछ स्वाहा .मगर एसे भीषण और दुर्धर्ष आयुधों के आम इस्तेमाल पर तब भी प्रतिबन्ध थे -उनका महज मन मौज के रूप में इस्तेमाल वर्जित था - बस बेहद अपरिहार्य दशा में वे चलाए जा सकते थे...एक बड़ी रोचक कथा इस बारे में महाभारत में मौजूद है -आइए, संक्षेप में फिर उसकी स्मृति ताजा कर लें...

महाभारत के सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा के एक क्रूर कर्म का उल्लेख है कि किस तरह उसने द्रौपदी के पुत्रों की नृशंस हत्या कर दी थी। दुर्योधन की अंतिम इच्छा को पूरा करने के चक्कर में उसने भ्रम वश पांचों पांडवों का सर काटने के बजाय मुंह ढंक कर सोये उनके बच्चों का सर काट लिया था। और यह दुष्कृत्य करके वह गंगा के किनारे एक निर्जन स्थल पर छुपा था। मर्माहत और क्रोध की ज्वाला से भरे पांडवों ने उसके वध का निश्चय किया। मगर यह इतना आसान नहीं था। उसके पास ब्रह्मास्त्र था. जो डर था वही हुआ। अस्त्र शस्त्र से लैस ललकारते हुए पांडवों को अपनी ओर आते देख मृत्युभय से उसने ब्रह्मास्त्र चला ही तो दिया। पांडवों के तारणहार श्री कृष्ण ने तत्काल ब्रह्मास्त्र की काट की युक्ति सुझाई, "ब्रह्मास्त्र के कोप से बचने के लिए सब आत्म समर्पण की मुद्रा में आ जाएं। रथों से उतर पड़ें और अर्जुन तुम ब्रह्मास्त्र की काट के लिए ब्रह्मास्त्र का ही संधान करो।" अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चला दिया। प्रलयंकारी दृश्य उपस्थित हो गया। अग्नि की विशाल ज्वालाएं निकलने लगीं, आसमान से उल्कापात आरम्भ हो गया। प्रचंड वायु चल पड़ी...धरती डोलने लगी...हाहाकार मच गया...पर्वत गिरने लगे...नदियां बाहर उमड़ पडीं...यह भीषण दृश्य देख महर्षि व्यास और नारद तत्क्षण वहां उपस्थित हुए और जवाबदेही चाही कि, " प्राणी मात्र के अस्तित्व को नष्ट करने की क्षमता वाले इन महान अनिष्टकारी अस्त्रों का प्रयोग क्यों किया गया?" अर्जुन विनम्र हुए और अपने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाने का यत्न इस आशंका के साथ किया कि तब तो अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र हमें ख़त्म कर देगा।" उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बचाव में ब्रह्मास्त्र का संधान करना पड़ा क्योकि अश्वत्थामा ने इसे पहले ही चला दिया था...अन्ततोगत्वा अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का प्रभाव उत्तरा के गर्भ पर पड़ा। मगर कृष्ण की महिमा से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई और राजा परीक्षित जन्मे।यह दृष्टांत भयंकर अनिष्टकारी आयुधों के जवाब में प्रति संहारक आयुध के इस्तेमाल की अपरिहार्यता का संकेत करता है। राहत की बात है कि अब भारत भी ऐसे प्रति संहारक अस्त्रों की क्षमता से युक्त है।
माया युद्ध?

हमारे पुराणों में वर्णित अभी कई युद्ध कला कौशल हमारे  लिए प्रेरणा के स्रोत ही हैं, जैसे मय दानव और मेघनाथ के द्वारा संचालित माया युद्ध जिसमें भीषण की युद्ध की प्रतीति भर थी और डर कर दुश्मन आत्म समर्पण के लिए मजबूर हो जाता था। कैसी युद्ध रणनीति थी वह जहां कोई वास्तविक हानि नहीं थी...बस ऐसे भयावह दृश्य होते थे कि प्रतिपक्षी दहशत में आ जाता था - मेघनाथ ने जब माया का विस्तार किया तो राम की सेना ने एक नहीं अनेक मेघनाथ देखे। राम और लक्ष्मण को मृत देखा। यह आभासी युद्ध तब ही ख़त्म हुआ जब राम ने अपने मायारोधी बाणों से उनका प्रभाव ख़त्म कर दिया। ऐसे माया-मायावी युद्ध की तकनीक क्या कभी विकसित हो सकेगी। यह टेक्नॉलजी और सैन्य आयुध विशेषज्ञों के लिए एक चुनौती है।

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