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बुधवार, 17 सितंबर 2014

एक अदद उद्धव की तलाश है!

कभी कभी सोचता हूँ कृष्ण को आखिर उद्धव की जरुरत ही क्यों पडी होगी ? गोपियों से अपने गोपन संबंधों को किसी और से साझा करना? और इसकी इतनी जरुरत भी क्या थी द्वारिकाधीश को? फिर उद्धव की जरुरत इसलिए भी नहीं समझ आती कि वे तो खुद लीला पुरुष थे और इसलिए हर पल हर वक्त सर्वगामी सर्वव्याप्त भी। वे अपनी योगमाया से द्वारिका और मथुरा -वृन्दावन एक साथ ही रह लेते। उनके लिए यह कहाँ असंभव था? अब अध्यात्मवादी यहाँ यही जवाब देगें कि यह तो उनकी 'लीला' भर थी. सचमुच यह लीला ही रही होगी और वे गोपियों और राधा के प्रति थोड़ा नैतिक आग्रह भी रखते रहे होगें -यह कृष्ण का एक उज्ज्वल पक्ष लगता है। और इसलिए अपने एक अति विश्वस्त सखा को उन्होंने संदेशवाहक बना कर भेजा।

अब आज के विरही प्रेमियों जैसी आशंका उन्हें थोड़े ही रही होगी कि उद्धव कहीं अपनी ही दाल न गलाने लग जायं । उद्धव ने प्रयास भी किया हो तो कृष्ण -प्रेमिकाओं ने एकदम से इस संभावना को निर्मूल कर दिया और कहा की हे उधो मन दस या बीस नहीं होते -हताश निराश उधो की इसके बाद की कथा का कोई खास इतिहास नहीं मिलता। पता नहीं वे लौट कर कृष्ण के पास गए भी या नहीं। गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य समर्पण का यह एक प्रमाण है। मगर कृष्ण का प्रेम? छलिया कृष्ण?

मगर एक नैतिकता तो थी ही उनमें -कुछ तो खुद को जवाबदेह समझा गोपियों का -सोचा होगा बिचारियां वियोग में तड़प रही होगीं। तो खुद क्या जाना अब, किसी संदेशवाहक को ही भेज दो. बस इतनी नैतिकता से काम चल जायेगा। भोले लोगों को और क्या चाहिए? उन्हें मनाना कित्ता तो आसान होता है। उन्हें यह भी फ़िक्र थोड़े ही थी कहीं उद्धव अपना किस्सा चलाये तो चलायें मेरी बला से। और फिर इतना घणा सखा तो रहा है मेरा आखिर प्रेम रस -रास से यह भी इतना अछूता क्यों रहे बिचारा। इधर बिचारा उधर कितनी ही बिचारियां-कोई चक्कर वक्कर चल भी जाय तो थोड़ा इसका भी कल्याण हो जायेगा। तो कृष्ण की एक नैतिकता अपने सखा के प्रति भी रही होगी।

मुझे लगता है कृष्ण और गोपियाँ हर देश काल में रही हैं। मगर कोई उद्धव नहीं दिखता। लव जिहाद का युग है। सब कुछ खुद करने कराने का ज़माना है नहीं तो बात बिगड़ सकती है। मुझे लगा कि उद्धव की खोज होनी चाहिए। किसी कोने अतरे में हो सकता है सिमटा दुबका मिल ही जाय। मैंने अपने मित्रों में से तलाशा। एक ने तो तत्काल इस उद्धव वालंटियरशिप का ऑफर स्वीकार कर लिया। उसने अतीव उतावलेपन से तुरंत पूछा जाना कहाँ और किसके पास होगा?

मगर उसकी तत्परता ने मुझे उसके सख्यपन को लेकर गंभीर आशंका में डाल दिया -नहीं नहीं यह मेरा उद्धव नहीं हो सकता। मुझे पुरुष मित्रों में से कोई उपयुक्त नहीं लगा उद्धव बनने के लिए। एक मित्राणी ब्लॉगर ने वालंटियर बनने का आग्रह किया। मगर यहाँ भी खतरा है -गोपियाँ और राधा तो जल भुन जायेगीं -क्या क्या न कह डालें मेरी मित्र को -कलमुंही वगैरह वगैरह जैसी अनुचित बातें -अपने कुनबे में तो ठीक मगर किसी बाहरी को तो वे रकाबा ही समझ जाएगीं-नहीं नहीं यह तो जले पर नमक जैसा हो सकता है। फिर वे तो जन्म से ही संशयवादी हैं -ह्रदय हमेशा आशंकाओं से धड़कता रहता है छलिया कृष्ण को लेकर। तो यह महिला मित्र का ऑफर भी जाँच नहीं रहा?

एक विश्वसनीय और उपयुक्त उद्धव की तलाश है जो गोपियों को असहज न करे -मेरी कोई मदद कर सकते हैं आप ?

रविवार, 15 दिसंबर 2013

अथ चापलूसी महात्म्य


मनुष्य की अनेक प्रतिभाओं में एक है चमचागीरी/चापलूसी। वैसे तो इस क्षमता में दक्ष लोगों में यह प्रकृति प्रदत्त यानी जन्मजात है मगर कुछ लोग इस कला को सीखकर भी पारंगत हो लेते हैं। चारण और चमचागीरी में बारीक फर्क है।चारण एक पेशागत कार्य रहा है जिसमें भांटगण मध्ययुगीन राजा महराजाओं की विरुदावली गाते रहते थे -उनका गुणगान करते रहना एक पेशा था। मगर मध्ययुगीन भांट लड़ाईयों में भी राजाओं के साथ साथ रणक्षेत्र में जाते थे और इसलिए भट्ट कहलाते थे -भट्ट अर्थात वीर! लगता है भट्ट से ही भांट शब्द वजूद में आया हो। आज भी जो ज्यादा भोजन उदरस्थ करने का प्रताप दिखाता है भोजन भट्ट कहा जाता है। 

अब वैसे तो चारण का  हुनर एक पेशागत कर्म नहीं रहा मगर आज भी  लोग बेमिसाल उदाहरण अपने स्वामी/ आका को खुश करने के लिए देते ही रहते हैं. ताजा उदाहरण एक राजनेता का है जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को सारे राष्ट्र की माता का अयाचित, अनाहूत दर्जा दे दिया। लोगबाग़ विस्मित और उल्लसित भी हो गए चलो चिर प्रतीक्षित राष्ट्रपिता की कोई जोड़ी तो बनी।

चापलूसी थोडा अधिक बारीक काम है। यह प्रत्युत्पन्न बुद्धि, हाजिरजवाबी या वाग विदग्धता(एलोक्वेन्स )  की मांग करता है।वक्तृत्व क्षमता (रेटरिक )  के धनी ही बढियां चापलूस हो सकते हैं। परवर्ती भारत में बीरबल को इस विधा का पितामह कह सकते हैं। वे अपने इसी वक्तृता के बल पर बादशाह को खुश करते रहते थे। पूर्ववर्ती भारत में तो यह विधा सिखायी जाती थी। महाभारत में ऐसे संकेत हैं।आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चापलूसी के उदाहरण मिलते ही रहते हैं मगर उनका स्तर घटिया सा हो चला है। 

बॉस को खुश करने के लिए ऐसे बेशर्मी से भरे खुले जुमले इस्तेमाल में आते हैं कि आस पास सुनने वाले को भी शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है -अब चापलूसी में वक्तृता का पूरा अभाव हो गया है। और वैसे ही आज के  बॉस हैं, जो चाहे राजनीति में  हों या प्रशासनिक सेवा में बिना दिमाग के इस्तेमाल के कहे गए "सर आप बहुत बुद्धिमान हैं " जैसे वाक्य पर भी  लहालोट हो जाते हैं. मतलब गिरावट दोनों ओर है -चापलूसी करने वाले और चापलूसी सुनने वाले दोनों का स्तर काफी गिर गया है।


वैसे शायद ही कोई होगा जिसे अपनी प्रशंसा अच्छी न लगती हो। मगर वह सलीके से की तो जाय। बेशर्म होकर केवल चापलूसी के लिए चापलूसी तो कोई बात नहीं हुयी। यह एक कला है तो कला का कुछ स्तर तो बना रहना चाहिए। कभी कभी मुझे कुछ लोग कह बैठते हैं 'मिश्रा जी आप बहुत विद्वान् आदमी हैं' मैं तुरंत आगाह हो उठता हूँ कि ऐसी निर्लज्ज प्रशंसा का आखिर असली मकसद क्या है? कोई न कोई स्वार्थ जरुर छिपा होता है इस तरह की स्तरहीन चापलूसी में। मगर मैं हैरान हो रहता हूँ जब मैं पाता हूँ कि कई ऐसे सहकर्मी अधिकारी हैं जिन्हे अपने मातहत से  चापलूसी सुने बिना खाना ही हजम नहीं होता। उन्हें चापलूसी करवाते रहने की आदत सी पडी हुयी हैं। कुछ तो चापलूसी करने वाले स्टाफ को अपने साथ ही लगाए रहते हैं और उसे अवकाश पर भी जाने देने में हीला हवाली करते हैं। बिना चापलूसी के दो शब्द सुने उनका दिन ही नहीं कटता। 
चापलूसी सुनने का ऐसा व्यसन भी तो ठीक नहीं !

बुधवार, 20 नवंबर 2013

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... ललित निबंध

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... यह एक ऐसी बात है जिससे  महिलायें ख़ास तौर पर नारीवादी सक्रियक  झट से सहमत हो लेती हैं। उनके लिए यह सार्वभौमिक सत्य है। वे फरेबी होते हैं, झूठे होते हैं वादा करके मुकर जाते हैं।  रूहानी लगाव के बजाय बस रूप सौंदर्य के दीवाने होते हैं।  उनकी चाहतें यकसाँ  ही होती हैं। हर मायनों में सभी समान होते हैं और उनमें भी कुछ और भी ज्यादा समान होते हैं।  यहाँ तक कि अलग से दिखने वाले (नारीवादी पुरुष) भी अंततः आखिर पुरुष ही साबित होते हैं।  मुझे भी यह वाक्य गाहे बगाहे सुनना ही पड़ता रहा है।  अब लाख समझाईये कि नहीं अपुन तो भीड़ से बिल्कुल अलग हैं.एक नायाब पुरुष पीस हैं मगर उनके चेहरे का अविश्वास इतना अटल रहता है कि कभी कभी और अब तो अक्सर ही खुद भी अपने बारे में शक होने लगता है कि कहीं हम भी वाकई 'सभी पुरुषों' की ही श्रेणी में तो नहीं आते -सोचते हैं खुद को कहीं आजमा के देख ही लिया जाय कि अपनी असलियत आखिर है क्या ? वालंटियर्स चाहिए।  

मैंने कभी ,मतलब अंतर्जाल में पहला कदम रखने के दरमियान ही एक मित्र से तब इस जुमले की हकीकत को गहराई से समझने का प्रयास किया था।  इसके पहले वे इस गूढ़ रहस्य को उजागर करतीं अंतर्जाल छोड़कर ही कहीं लुप्त हो गयीं और मेरा प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।एक आधी दुनिया के मित्र ने जब फिर इस जुमले को उछाला तो मैं जैसे इसकी मीमांसा के लिए तैयार ही बैठा  था।  मैंने अनुनय किया कि कृपा कर इसे व्याख्यायित किया जाय और बिना व्याख्या अंतर्जाल न छोड़ा जाय।उन्होंने एक चिढाऊ स्माईली बनाकर कहा कि मैं सब जानता हूँ -मैंने जवाब दिया कि मैं क्या जानता हूँ यही बता दिया जाय ताकि सत्यापित कर सकूं कि वह  सही या गलत हैं। उन्होंने बात का एक आखिरी छोर पकड़ा दिया कि आप सभी पुरुष बड़े वो होते हैं। और एक शातिराना स्माईली छोड़कर चल दी हैं -लगता है अभी बात की तह तक पहुँचने में कई चैट सेशन बीत जायेगें।  

मैं तो विज्ञान और उसमें भी जैव विज्ञान  का एक अदना सा अध्येता रहा हूँ -चार्ल्स डार्विन को अपना ईश्वर पैगम्बर सब कुछ मानता हूँ -उनके अनुसार तो विभिन्नता प्रकृति का नियम है -तो पुरुष एक जैसे तभी हो सकते हैं जब वे जुड़वां हों और वह भी एक ही निषेचित अंड की उत्पत्ति हों।  तो सभी पुरुष एक जैसे कैसे हो सकते हैं। इसलिए मेरी तो वैज्ञानिक मान्यता यह है कि सभी  पुरुष और न ही नारी एक जैसे होते हैं।  नारियां तो बिल्कुल ही एक जैसी नहीं होतीं।  बहुत फर्क होता है उनमें, यह मेरा स्वयं का सुदीर्घ अनुसन्धान है।  एक अंग्रेजी कहावत के जनक ने भी यही कहा है कि नारी नारी में बहुत फर्क होता है -" सम वीमेन ब्लश व्हेन दे आर किस्ड ,सम स्वेयर , सम काल फार पोलिस बट वर्स्ट आर दोज हू लाफ " देखिये न यह कहावत यह सिद्ध कर देती है कि नारियां अलग अलग होती हैं। मेरी इस बात से आप निश्चय ही झट से सहमत हो जायेगें :-) 
मगर मेरे एक फेसबुकिये मित्र हैं जो इससे असहमत हैं।  वे कहते हैं कि सभी नारियां भी एक जैसी होती हैं , उन्होंने अपनी पीड़ा सरे आम फेसबुक पर साझा की थी , जो याद है उसके मुताबिक़ वे अपने पुरुष दोस्तों से घनिष्ठ होते होते सहसा ही पलट जाती हैं। 

 वे कहती हैं -
१ -मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ मगर मैंने कभी उस निग़ाह से आपको देखा ही नहीं। 
2 -आप मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं मगर उसके आगे नहीं 
३- मेरे लिए मित्रता से बढ़कर दुनिया में और कुछ नहीं है मगर मित्र से मैं शादी नहीं कर सकती।  
४-दोस्ती मित्रता अपनी जगह  विवाह शादी अपनी जगह 
5 -आपने तो कभी पहले बताया ही नहीं। मैं तो किसी और के हाथों महफूज हो गयी हूँ। .

मित्र का मानना है सभी एक सा ही सोचती हैं।  एक जैसी ही हैं। तो चलिए यह मानने में क्या गुरेज कि सभी पुरुष या नारी एक जैसे ही होते हैं :-) आपकी भी तो अपनी कोई राय होगी इस मुद्दे पर या निजी अनुभव होगा तो क्यों नहीं साझा करते यहाँ? मानवता का मार्ग दर्शन होगा! 

रविवार, 3 नवंबर 2013

देहाती औरत!

कहते हैं कुछ दिनों पहले नवाज शरीफ ने अपने प्रधान मंत्री को देहाती औरत कह दिया जो कथित तौर पर रोज रोज पाकिस्तान को लेकर ओबामा के पास जाकर रोना रोते रहते हैं। इस पर तरह तरह की समीक्षायें ,टीका टिप्प्णियां और भाष्य हुए . मोदी ने इस बात की निंदा की . बात आयी गयी हो गयी . मगर अभी कल ही एक बिहारी नेता ने अपने मुख्यमंत्री नितीश जी को भी देहाती औरत कह दिया जो मोदी को लेकर निंदा पुराण बाँचते रहते हैं . कहा गया कि नितीश मोदी से इर्ष्या रखते हैं . आखिर देहाती औरत से अभिप्राय क्या है ? बिहार से लेकर पाकिस्तान तक के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में यदि देहाती औरत से कोई समान अभिप्राय निकलता हो तो यह एक महत्वपूर्ण विवेचन का विषय निश्चित ही है .

मेरा लालन पालन और एक उम्र तक निवास भी ग्रामीण परिवेश में ही हुआ है . अब भी छठे छमासे गाँव आना जाना होता रहता है और सेवा निवृत्ति के बाद गाँव में ही बस जाने का प्लान है . देहाती औरत का विशेषण मेरे भी समझ में बिल्कुल बेजा ही नहीं है . सभी नहीं मगर गाँव की ज्यादातर औरतों में मैंने सहजता का ज्यादा आग्रह देखा है .शहरों का मिथ्याचरण (सोफिस्टिकेशन) उनमें नहीं होता . सभी मानवीय आवेग -गुस्सा, प्रेम,घृणा और द्वेष और उनका प्रगटीकरण उनमें अपने मौलिक रूप में देखे जा सकते हैं . वे जबर्दस्त झगड़ालू ,स्नेहमयी ,प्रेममयी सब हैं . गालियां देने में भी उनकी कोई सानी नहीं है . बहुत सहज होकर वे 'सुभाषितम' का धड़ल्ले से आपसी विनिमय करती हैं . जैसे कोई अनुष्ठान का धाराप्रवाह मंत्रोंच्चार हो रहा हो . मैं तो आज भी इस अनुष्ठानिक कलरव से लज्जावश नेपथ्य में हो लेता हूँ . कहीं कोई यह न देख ले कि मैं इस नारी -निनाद का रससिक्त श्रवण कर रहा हूँ .

देहात की औरतों की इस सम्भाषण स्पर्धा में लैंगिक विशेषणों का धड़ल्ले से प्रयोग होता है जो कभी कभी मुझे उनकी यौन विषयक कुंठाओं का आभास सा देता है और बहुत सम्भव है कि उनके दैनिक सम्भाषण से उनकी कतिपय कुंठाओं का कुछ शमन भी हो जाता हो . इसके अलावा गाँव की ज़िंदगी अभावों की और काफी श्रम साध्य होती आयी है तो  उनसे मनोमुक्ति के लिए भी कोई मनोरंजन और टाईम पास चाहिए सो एक गाली गलौज के संवाद का सेशन भी क्यों न हो? मेरी एक अंतर्जालीय घनिष्ठ मित्र ने उत्कंठा वश मुझसे कभी उन लैंगिक विशिष्टियों युक्त गालियों को बताने को  कहा था जो प्रायः ग्राम्य वधुओं द्वारा इस्तेमाल में आती हैं -मैं उन्हें संकोचवश बता नहीं सका था . आपके मन में कौतुहल हो तो मुझे अलग से मेसेज कर सकते हैं -एक और कोशिश कर सकता हूँ . अब तो टेलीविजन आदि के बढ़ते प्रभाव में गाँव की औरतें भी मिथ्याचरण अपनाने लगी हैं -तथाकथित 'सभ्य' होने लग गयी हैं . और गालियों आदि के विनिमय के बजाय शिष्टाचरण से काम लेने लगी हैं . अब तो मुझे यह लगने लग गया है कि गाँव की औरतें 'तो शिष्ट' होने लग गयी हैं मगर शहर की औरतें अब आदिम होने लगी  हैं .

तो गावं की औरतों में लगाने बुझाने(झगड़ा ) ,चुगली करने , ईर्ष्या करने के आदिम मानवीय भावों के भी होने के आरोपण हैं -मंथरा आदि के चरित्र यूँ ही वजूद में नहीं आये। मगर मैं यह मानता आया हूँ कि गाँव की औरतें बहुत भोली होती हैं ,मुंहफट तो होती हैं मगर दिल की साफ़ होती हैं . जीभ भले कलुषित हो, ह्रदय निष्कपट होता है . निहायत भोली ऐसी कि कोई भी चंट आदमी उन्हें छल सकता है . चंटों के सामने वे कत्तई भी महफूज नहीं रह पातीं . यह ग्राम्य भोलापन मैंने कई शहरी नारियों में भी देखा है -भले वे शहरी हो गयी हों मगर मन उनका ग्राम्य बोध लिए ही होता है . कैलाश गौतम जी की एक कविता की पंक्ति अकस्मात याद हो आयी है जो गाँव की औरतों के भोलेपन को इंगित करता है -

उसको शायद पता नहीं वह गाँव की औरत है
इस रस्ते पर आगे चल के थाने पड़ते हैं .......

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

ब्लागिंग का 'गर्भकाल' और फुरसतिया को बधाई!

आज फ़ुरसतिया यानि अपने अनूप शुक्ल महराज को ब्लागिंग करते नौ साल बीत गए . उन्होंने नौ शब्दों से अपनी पारी शुरू की  थी और आज नौ साल पूरे हुए तो वे थोडा संजीदे और अतीतरागी बन उठे हैं -और यह सहज ही है. मेरे मन में यह देख एक उपमा उपजी है -नौ वर्ष के ब्लागिंग के गर्भकाल की . मनुष्य का गर्भकाल भी नौ माह का है और आज फ़ुरसतिया के भी जब ब्लागिंग के नौ साल हुए तो यह अवसर ऐसे ही हाथ से जाने देने का तो नहीं है . हम इस अवसर को ब्लागिंग के इतिहास में अमर बना देना चाहते हैं . क्यों न अनूप जी के महनीय ब्लागिंग अवदान को देखते हुए इस अवसर पर उनके ही इस नौ साला मानक को एक सार्थक,सकारात्मक रूप दे दिया जाय . आखिर ब्लागिंग के नौ साल को ऐसे ही हंसी ठिठोली करते काट देना कोई मामूली बात तो नहीं है . तो यह मानक ब्लागिंग का गर्भकाल माना जायेगा और इतने समय जो यहाँ  टिका रह जाय समझिये वही धाकड़ ब्लागर है . वही  पहचान और प्रतिष्ठा के काबिल है - बाकी तो अजन्में शिशु से हैं . अनूप जी की किलकारियां आज यहाँ ध्वनित हैं -कोई तो सोहर आदि का आयोजन करो न भाईयों, लुगाईयों .
                                                       पूरा हुआ ब्लागिंग का गर्भकाल: बधाई 
फुरसतिया जी सचमुच जीवट के ब्लॉगर निकले .एक एक फन्ने खां और लौह संकल्पनाएँ आयीं और चली गयीं .अनेक झंझावात आये,चिल्ल पों मची ,निकल बाहर देख लेगें के उदघोष तक गूंजें मगर फ़ुरसतिया अपने  व्यंग बाणों  का समर्पित और और अनवरत संधान करते ही रहे -भले ही कभी कभार थोडा शिथिल हुयें हों मगर इनकी तुरीण  व्यंग -बाणों से कभी खाली नहीं हुई . एक समय था जब ब्लागिंग के त्रिदेव में इनके साथ दो और देव थे मगर अब ये  हैं अकेले हैं . और अकेले ही काफी हैं . मैंने भी कई बार इनके आघात प्रघात झेले हैं और खुद को धन्य मानता हूँ कि अपना  भी गर्भकाल निकट आ रहा है . मगर इसके लिए मुझे कई शास्त्रोक्त कर्मकांड आदि कराने पड़े हैं . :-) अन्यथा इनके तिक्त बाणों के सामने टिक पाना आसान नहीं है .
आखिर ऐसा क्या है फ़ुरसतिया में? कुछ तो है यह उनके धुर विरोधी भी मानते हैं -लेखन की एक मौलिकता है,स्टाईल है और सबसे बढ़कर ब्लागिंग के प्रति  समर्पण है और छपास की उत्कट अभिलाषा भी जो इन दिनों  मुद्रण माध्यमों में उनके दनादन लेख भेजने से प्रमाणित हो रही है -जबकि वे ऐसी भयंकर भूल क्यों कर रहे हैं यह समझ में नहीं आ रहा है -क्या पूत के पाँव ऐसे ही दिखने थे? फुरसतिया जनाब एक वक्त खुद मुद्रण माध्यम से बिदकते थे और उन  ब्लागरों की खिंचाई किया करते थे जो अंतर्जाल से मुद्रण माध्यम की  ओर लपकते थे… मगर आज वे उसी  पर मार्ग पर खुद चल पड़े हैं . मैं दंग हूँ ! बात मानिए फ़ुरसतिया जी यह  उलटा दांव लगा बैठे हैं आप! छि छि  ब्लॉग जगत  में जन्मने के बाद फिर उसी बासी ,बिकाऊ, सड़ी गली गिरवी पत्र पत्रिकाओं के गलीज में लौटना? संपादकों से रिरियाना? रचना छपवाने के लिए मनुहार और टकटकी लगाकर छपने का इंतज़ार? फिर काहें को ब्लॉगर हुए आप? मुद्रण जगत से ब्लॉग जगत में आना तो समझ  में आता है मगर यहाँ से उल्टा फिर उसी घुटन भरे माहौल में लौटना? यह कैसा पौरुष? आप भी अब यहाँ से चल निकलने के फिराक में हैं?
आखिर हमारा कोई  मूल्य ,सिद्धांत वैगेरह है भी? ब्लागरों के अगुओं में आप रहे हैं मगर अब आप को भी कागजी ग्लेज भाने  लगा है ? न न यह आपके लिए कतई शोभनीय नहीं है . मुझे पता है कुछ ब्लॉगर थोड़े से पारिश्रमिक की मोह में अखबारों से आस लगा बैठे हैं। मगर आपके साथ तो ऐसा भी नहीं है -हर  माह के लखपती वैसे ही हैं आप! या फिर यह समझा जाय कि लद चुके  ब्लागिंग के दिन और अब पलायन के दिन है .....चल उड़ जा रे पंछी यह देश .........
सुबह ही फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पढी थी तो ये सारे विचार मन में घुमड़ रहे थे . एक  ब्लॉगर उद्विग्न था यह सब सुनाने  को ....सहज उदगार ,बेलौस बात ,और झटपट पोस्ट ही ब्लॉगर पहचान है. और यह पहचान कम से कम मैं तो खोने वाला नहीं . लोग अब ठकुर सुहाती को छोड़ यहाँ और कुछ नहीं चाहते -कोई मुद्दा भी हो तो भी बगल से सटक लेते हैं . ये ब्लागिंग  के लिए और ब्लॉगर के लिए भी शुभ लक्षण नहीं है . अब तो लोग लड़ते झगड़ते भी नहीं ..माहौल कितना कब्रिस्तानी सा हो गया है न? वो जीवन्तता और वह मनसायनपन कहाँ गया? फ़ुरसतिया जी यहाँ की जिम्मेदारी ऐसे ही न छोड़ जाईये -आप अब ब्लॉग - दशक पुरुष बनने की राह  पर हैं। शुभकामनाएं और बधाई! 
 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

मार्च का महीना और वैशाख नंदन

कभी किसी ने कहीं लिखा था कि मार्च महीने में दफ्तरों और सरकारी कर्मियों के आवास के लगे गमलों में फूलों के रंग ज्यादा चटख हो जाते हैं -इशारा साफ़ था कि इन दिनों सरकारी खजाने का मुंह जो वैसे तो   साल भर तक  बंद सा रहता है मगर मार्च महीने के आते ही चौड़ा खुलने लगता है और आख़िरी दिनों में तो अपनी फुल सीमा पर खुल उठता है और करोड़ों अरबों का निस्तारण एक दो दिनों में ही हो जाता है , मगर मुझ जैसे रहीम शहीम और मोहकमाये मछलियान के आफीसर के लिए यह महीना जी का जंजाल बनकर आता है -खासकर महीने की अंतिम तारीख तक वित्तीय स्वीकृतियां मिलती रहती हैं जिनका आहरण 31 मार्च तक कराया जाना अनिवार्य होता है . अन्यथा अधिकारी का गला फंस जाने का  भयपूर्ण माहौल बनने लगता है। हम एक ऐसी ही जहालत में हलकान थे तभी मोबाईल पर फेसबुक में अनूप शुक्ल महराज का अपडेट देखा था तो वे ठीक 31 तारीख का और उस दिन पड़ने वाले इतवार का गुणगान पूरी फुरसत में किये जा रहे थे -अब यह पढ़कर कहीं कुछ जल- भुन (सुलग का प्रीतिकर शब्द ) ही तो गया -मैंने टिपियाया, महराज डी डी ओ होते तो जानते -अब मेरी जो आशंका  थी वह सच निकली कि वे कहीं यह न पूछ लें कि ये डी डी ओ क्या होता है -और लीजिये उन्होंने पूछ ही लिया -मैं जी. के.  की ऐसी अज्ञानता से बहुत चिढ़ता हूँ -तो उन्हें टका   सा जवाब दे टरका दिया कि इसके बारे में सिद्धार्थ शंकर  त्रिपाठी जी से पूछ लीजिये -अब यह उनके लिए हिंट साबित  हो गया -अब इतने समझदार तो हैं ही अपने फुरसतिया शुकुल -तुरंत कहे कि हम प्रोडक्शन वाले आफीसर हैं आहरण वितरण अधिकारी (डी डी ओ ) नहीं -काश यह आपको पता होता अनूप जी तो उस दिन हम जलने भुनने से बच गए होते ....

खैर मुझे पता नहीं कि सिद्धार्थ जी से अनूप जी ने इस बारे कुछ तहकीकात की या नहीं ,नहीं तो सिद्धार्थ जी उन्हें मेरे उस घबराए फोन का जिक्र भी जरुर किये होते जो  एक ट्रेजरी आहरण की समस्या में मैं उनसे मदद मांगी थी -मगर एक ब्लॉगर और एक बड़े खजाने के अधिकारी सिद्धार्थ जी में अंतर तो है ही  - ब्लॉगर धर्म का निर्वाह कर अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद भी वे बोले बतियाये मगर अंत में टका सा जवाब मिल गया कि मेरी समस्या मेरे ही खजाने का अधिकारी दूर करेगा और मैं उन्ही की शरण में जाऊँ -खैर कल रात 10 बजे मामले का निपटारा निरापद तरीके से हो गया .मैंने यहाँ के सिद्धार्थ जी के समकक्षीय सीनियर ट्रेजरी आफिसर श्री राकेश सिंह जो ब्लागरों के दुर्भाग्य से अभी तक ब्लॉगर नहीं हैं का  बहुत आभार व्यक्त किया -काश अधिक से अधिक ट्रेजरी के पदाधिकारी ब्लॉगर हो जाते -इस दिशा में सिद्धार्थ जी के सहयोग की अपेक्षा रहेगी .

ले देकर किसी तरह मार्च बीता तो आज मूर्ख दिवस आ धमका . मैंने उत्साह से फेसबुक खोला कि इस पुनीत अवसर पर अनूप जी कुछ आयोजन किये होंगें मगर वहां तो कुछ दिखा ही नहीं -मैंने तुरत यह अपडेट सटाया- इतना सन्नाटा है क्यों है भाई यहाँ ? तो लोग जैसे सोते  से जागे और सन्नाटे को तोड़ दिया और अभी भी तोड़ते ही जा रहे हैं . मगर आश्चर्य है व्यंगकार भाई आज रहस्यात्मक चुप्पी साधे हुए हैं या फिर आत्मावलोकन में लगे हैं -आपने भी नोटिस किया होगा कि आपके करीब कल तक मुखर रहने वाले कुछ लोग आज सहसा चुप हो गए हैं और कल तक चुप रहने वाले अकस्मात मुखर हो गए हैं -यह आज के पुनीत दिवस का महात्म्य है। वैसे अप्रैल फूल फिरंगियों की देन हैं मगर यह अपनी विरासत छोड़ गया है अन्यथा हमारे यहाँ का ऐसा ही पावन दिवस वैशाख नंदन जी को समर्पित है ,आप इस शख्सियत तो परिचित होंगें ही-न हों तो संतोष त्रिवेदी जी तफसील से बता देगें -हाँ वैशाख नंदन जी का जब समय आएगा तो अपने आप आपको पता चल जाएगा और उनके दिव्य दर्शन भी  हो जायेगें।   वैसे ब्लॉग जगत में एक और सन्नाम शख्स है अपने ताऊ जिनके पास वैशाख नंदनों की अच्छी जमात है। उनसे भी आज ही पूछ लीजिये -क्या आप पूछने जा रहे हैं?? 

रविवार, 23 सितंबर 2012

कुत्ता दिवस!

गिनेज बुक आफ रिकार्ड्स का नया संस्करण आ गया है. संयोग से मैंने आज ही टाईम पत्रिका में उसके नए विश्व रिकार्ड्स पर एक नज़र डाली तो एक विशालकाय कुत्ते को देखकर दंग रह गया ...कुत्तों के भी कद इतने बड़े होने लग गए ..पहले तो मुझे भी यह शक हुआ कि यह कोई और जनावर तो नहीं है? अब जैसे अपने बेचैन आत्मा वाले देवेन्द्र जी लिखते भये तो गधे  पर मगर फोटू  चेप दी खच्चर की....अब तो हम यह नहीं मान सकते कि उन्हें  गधे और खच्चर का फर्क नहीं पता .....मगर मैं अगर ऐसी गलती कर दूं तो उल्टा लटका दिया जाऊंगा क्योकि अपुन की पढ़ाई लिखाई और सोहबत भी इन्ही जानवरों और जानवर प्रेमियों की रही है और फिर कुत्ते की स्वामिभक्ति की दूसरी कोई सानी जानवर जगत में नहीं है. फोटो में कुत्ता और उसकी स्वामिनी का यह पारस्परिक सम्बन्ध दिख भी रहा है. 



कहते हैं कुत्ते दरअसल भेड़ियों के ही वंशधर हैं -दोनों एक ही  गण(जीनस) के हैं -कुत्ता दरअसल एक पालतू भेड़िया है. मनुष्य के साथ इसका बड़ा आदिम सम्बन्ध है -तभी से यह मनुष्य के साथ है जब  शिकार की ताक में मनुष्य दर  दर भटकता रहता था . उसे शिकार को घेरने के लिए एक तीव्रगामी अनुचर  चाहिए था और तत्कालीन कुत्ते के पुरखे को भोजन की एक निश्चित व्यवस्था -तो यह सम्बन्ध तभी से स्थाई बनता गया -दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.  एक दूजे के बिना अधूरे हैं. मगर आश्चर्य है कि फिर भी बहुत से लोग आज भी कुत्ता द्वेषी हैं ..न जाने क्यों? हो सकता है यह उनका कोई निजी मामला हो या फिर वे बचपन में कुत्ते के काट खाये लोग हों. बचपन का कुत्ता काटा आदमी जीवन भर इस जानवर से दहशत खाता है -बाद में काटे गए लोग इतना नहीं घबराते और इसलिए कई लोग बार बार काट खाए जाते हैं. वैसे अब कुत्ते से काट खाना उतना त्रासदपूर्ण नहीं है क्योकि अब पेट वाली चौदह सूईयों  का जमाना नहीं रहा! 
आज से आश्विन मॉस आरंभ  हो रहा है . यह कुत्तों का घोषित प्रणय काल है. इस समय कुत्ते बहुत कटखने और आक्रामक हो जाते हैं .इसलिए इनसे बच के रहना चाहिए ..दरअसल इसी अंदरुनी डर के चलते मैं  यह पोस्ट लगा रहा हूँ -इन दिनों रात बिरात सूदूर यात्राओं से जब लौटता हूँ अपनी गली में नए नए अजनबी कुत्तों को देखता हूँ...और वे भी मुझे संशय से देखते हैं और मैं नज़र बचा कर निकल आता हूँ -कौन फालतू में लफड़े में पड़े. उन्हें लगता होगा हम उनकी प्रेयसी के एक और दावेदार /प्रतिद्वंद्वी हैं ....उनकी टेरिटरी का दायरा अब और सीमित हो चला है ....और अब तो वे झुण्ड में भी हैं -एक से तो हम निबट भी लें मगर कुत्तों के पैक से बचना मुश्किल ही नहीं असंभव है . 
मैं उनकी गोल में शामिल होकर एक दब्बू कुत्ता सा बिहैव नहीं करना चाहता...मैं मनुष्य हूँ और मुझे अपनी अस्मिता अलग रखनी ही होगी....वे लाख मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी माने मगर मैं मैं हूँ मनुष्य और वे कुत्ते....कुत्ते कहीं के .....मगर सावधान तो रहना ही है ..किसी ने कहा आपका  ये कुत्ता बहुत भौंकता है मुझे डर लगता है कहीं काट न ले ..कुत्ता स्वामी ने जवाब दिया कि बिलकुल मत डरिए जो कुत्ते भौंकते हैं काटते नहीं यह कहावत भी आप नहीं जानते? डर रहे सज्जन ने कहा मैं तो जानता हूँ मगर यह नामुराद कुत्ता तो यह कहावत नहीं जानता :-) 
मैं चाहता हूँ कि कुत्तों के सम्मान में कुत्ता दिवस घोषित किया जाय -अब इस प्रस्ताव से कम से कम वे कालोनी के नए कुत्ते तो मुझे बख्श देगें और यह मनुष्य और कुत्ते के प्रगाढ़ सम्बन्ध की एक कृतज्ञ भारतीय स्वीकृति भी होगी ...मुझे मालूम है श्वान प्रेमी मेरे इस प्रस्ताव पर खुश होंगें और मुझे बधाईयाँ देगें और श्वान विद्वेषी मुझ पर जल भुन जायेगें! ह्यूमर प्रेमी भी मुझे सारस्वत सम्मान अता करेगें! :-)
पुनश्च: फेसबुक पर चर्चा के दौरान कुत्ता दिवस (नामकरण ) की सूझ बैसवारी नरेश संतोष त्रिवेदी की थी तो यह आभार उनके प्रति बनता है ! 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

मैंने कब किसी को कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां!?


नाहक ही मुझ पर तोहमत पर तोहमत लगाई जा रही है ...मैंने तो किसी को नहीं कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां ...हालांकि इन दोनों शब्दों का कापीराईट मेरे पास है मगर अब क्या शब्द -कौतुक भी कोई गुनाह है? वर्ड प्ले तो बच्चों तक का प्रिय शगल है ...और वो कहावत भी तो कितनी जग प्रसिद्ध हुयी है ना -सुवरण को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर ... तो मैंने भी ये दो शब्द गढ़ दिए ताकि ब्लॉग शब्द कोश में अपनी इंट्री बना लें और साहित्य कोश की शोभा बढायें -अब यह किसी के प्रति ,किसी को लक्षित करके तो ओरिजिनली कहा नहीं गया था ..शब्द तो कितने ही हवा में तैरते रहते हैं और तब तक किसी के साथ नहीं आ चिपकते जब तक उसका वैसा आचरण न हो जाय -भाषा और शब्द के धनी मेरी इस बात को समझेगें ....और फिर ब्लागरा भी ऐसा कौन सा एलर्जिक शब्द हो गया जो उसे सुनते ही भड़क या चिहुंक उठा जाय ....अरे जैसे शायरा वैसे ब्लागरा..अब कोई बताये क्या शायरा शब्द फूहड़ है? या सम्मान से नहीं लिया जाता? ..अरे मेरे जमाने में तो लोग बाग़ बिना किसी शायरा का नाम सुने मुशायरे में जाते तक नहीं थे ... हाँ अब जमाना जेंडर न्यूट्रल शब्दों का आ गया है ...शायर और एक्टर प्रचलन में है दोनों के लिए मगर तो क्या नए शब्द गढ़ने पर कोई पाबंदी है या फिर शब्दों को डिक्शनरी से निकाल  दिया जाय? हम कभी कभी इतना संकीर्ण क्यों हो उठते है? कहीं कोई अपनी कमी कसक तो नहीं है?  
अब आईये ब्लॉग वालियां पर ..पढ़ने लिखने वाले जानते हैं कि अमृत लाल नागर जैसे सारस्वत प्रतिभा के धनी विद्वान ने ये कोठेवालियां लिखी थी ..मगर मेरा संबोधन तो कतई इस लिहाज से नहीं था ...अभी उसी दिन कोई चर्चा कर रहा था ....कौन पाबला? जवाब आया अरे वही अपने ब्लॉग वाले पाबला जी ? तो जब ब्लॉग वाले पाबला जी हो सकते हैं तो ब्लॉग वाली फलानी क्यों नहीं हो सकती? आम बोल चाल की भाषा में कई संबोधन ऐसे ही दैनन्दिन जीवन में सहजता से चलते रहते हैं और कई कार्य व्यवहारों को अंजाम देते हैं ...उनका कोई अन्य व्यंजनात्मक अर्थ थोड़े ही होता है ..मगर वो क्या है कि चोर के दाढी में तिनका .. तो वह चिहुंक पड़ता है ..जैसे वज्रपात हो गया हो ....अब क्या इक्केवालियाँ ,ठेलेवालियाँ, नखरेवालियाँ कोई खराब शब्द हैं -भाई ये तो रोजमर्रा के शब्द हैं ....हाँ बहुबचन में हैं ..अब एक वचन और बहुवचन, जैसी जरुरत हो उसी के मुताबिक़ व्यवहृत हो उठते हैं ... इसमें कहाँ कौन सा आक्षेप अन्तर्निहित है? हाँ जब शब्दों का धुर विरोध होता है तो वे नए अर्थ और गाम्भीर्य ग्रहण करते चलते हैं... अब जितना ही विरोध इन नव सृजित शब्दों का होगा वे और भी प्रचलन  में आते जायेगें ....लोगों को तो मुझे इन दोनों नए शब्दों के गढ़ने पर शाबाशी देनी चाहिए मगर दे रहे हैं गालियाँ ....हाय रे हिन्दी ब्लागवर्ल्ड :-( ..यह किसी के लिए कहा ही नहीं गया ...अब लोग अपने आचरण से इन शब्दों को अपने से चिपका लें तो बात और है ..अब तक तो तीन चार ने तो चिपका ही लिया है ...अब उनकी अपनी मर्जी ...बेदर्दी तेरी मरजी ....जो चाहे कह लो आखिर पुरुष द्रोह भी कोई चीज है ..
दरअसल यह सब परिणाम है ब्लॉग जगत की उन गोल गिरोह वाले वालियों के  सुकर्मों के जिनके चलते यहाँ कई दुरभि संधियाँ चल रही हैं --अब उन मोहतरमा के ब्लाग पोस्ट पर टिप्पणी करिए तो फलानी नाराज़ हो जाती हैं कि मेरे यहाँ तो करते नहीं बार बार वहीं जाते हैं ....अब कोई क्या कहे अरे वे मोहतरमा आपसे लाख गुना अच्छा लिखती हैं आप भी वैसा लिखिए तो हम दौड़े चले आयेगें ..और आपके यहाँ भी पुरुष मित्रों की कोई कम भरमार तो रहती नहीं ...सब दाद खाज देने पहुंचे ही रहते हैं और आपको ब्लॉग विदुषी की खुशफहमी देते रहते हैं ..मगर मेरी दाद?  मो सो नको .....बढियां लिखिए आयेगें आपके यहाँ भी आयेगें ....वैसे भी यह अपनी अपनी पसंद की बात है और मैंने खैरात टिप्पणियाँ बंद कर दी है उन सभी के यहाँ जिनके अपने अघोषित एजेंडे हैं और जो दुरभि संधियों में मशगूल हैं ....इनमें मेरे कई पुरुष मित्र भी हैं  .....
मेरी नसीब ही अजीब है ..ब्लॉग जगत में आने के पहले नारीवाद शब्द तक मैंने नहीं सुना था मगर एक मुहिम चलाकर मुझे नारी विद्वेषी घोषित करने के प्रयास किये जाते रहे हैं ....और अब तो लगता है मैं हो भी गया हूँ पक्का मीसोजीनिस्ट ....बार बार सही को गलत कहो तो वह गलत ही हो जाता है ....एक देवि हैं जिन्होंने नाक में दम कर रखा है.. कितने अच्छे श्रेष्ठ ब्लागरों को वे पैवेलियन तक पहुंचा चुकी हैं ...गोलबंदी की है ..कितनी दुत्कारों का सामना किया है मगर अवसर की ताक में रहती हैं ....कुछ लोगों को फिर से खेमें में जोड़ रही हैं .....लोग हैं कि अब उनकी सुनते ही नहीं .... कब खतम होगा ये अरण्य विलाप? 
मित्रों, ब्लॉग ऐसा ही माध्यम है ...यहाँ कड़वी कड़वी थू और मीठी मीठी गप्प नहीं चलेगा ....दोनों कहने का और सुनने  का माद्दा रखिये ...तब यहाँ टिकिए..तनिक टफ माध्यम है यह ...यहाँ ठकुरसुहाती लम्बे दिनों तक नहीं चलती ..प्यारे बोल बोलने वालों को तो एक उन मोहतरमा ने ही चलता कर दिया ...तो डट के ब्लागिंग करिए और ठसक के रहिये ..मुंहदेखी आलाप प्रलाप की जरुरत नहीं है ब्लागिंग में ......अपनी कहिये और एलानियाँ कहिये .....आप अपनी सोशल नेट्वर्किंग के कारण नहीं अपनी लेखनी से ही जाने जायेगें ....टिप्पणी मोह छोडिये ..गणना काउंटर आपको बतायेगा कि आप पढ़े जा रहे हैं और खूब पढ़े जा रहे हैं ..
टिप्पणियों का भी अपना समाजशास्त्र है और राजनीति है -मेरे कई पुरुष मित्र इसलिए भी आपके यहाँ सहज टिप्पणी करने से बचते हैं कि कहीं उनकी वे फलानी नाराज न हो जायं!और वे फलानी आपके यहाँ नहीं आतीं तो मुंह क्या बिसोरना? उन्हें फलाने ने मना कर रखा होगा ....और फिर और  भी कितने अच्छे अच्छे ब्लॉग लिखे जा रहे हैं वहां जाईये न ...रोनी सूरत बनाकर मत बैठिये ....और हाँ बन्दर बंदरिया घुड़कियों से मत घबराईये ..आप अपनी पर आ जाईये तो पायेगें आप उनसे लाख गुना अच्छा लिखते हैं ... आप लिखते भी हैं ..मैंने देखा है ..और आगे भी देखते रहेगें बाबा, टिप्पणी भी करेगें ..अब खुश न :-) 

बुधवार, 4 जुलाई 2012

गुरु ,गुरुघंटाल और ब्लागजगत के अफ़साने


अभी कल ही की तो बात है .गुरु पूर्णिमा पर अपनी पोस्ट का लिंक जैसे ही मैंने फेसबुक पर डाला वे अवतरित हो गए ...भावुकता भरे शब्दों में अपना उदगार व्यक्त कर गए -मेरे तो गुरु आप ही हैं .मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई की ही तर्ज़ पर . वे अक्सर हमें यह अहसास दिलाते रहते हैं कि वे मेरे शिष्य है और यह हर बार मेरे लिए एक असमंजस भरी अनुभूति होती है ...कारण, मैं बराबर की मित्रता में बिलीव करता हूँ -उम्र का कोई झाम  आड़े हाथ नहीं आने देता ....और फिर खुद को गुरु मानने की मूर्खताभरी  अहमन्यता से भी दूर रहना चाहता हूँ ...वैसे भी आजकल काहो गुरु! का संबोधन व्यंगात्मक ज्यादा है .पता नहीं उनमें सचमुच का शिष्यत्व है या नहीं या फिर वे भी काहो गुरु वाली ही स्टाईल में यह उपाधि मेरी और उछालते हों -मैं भी सावधान रहता हूँ -और उनके ऐसे संबोधन को मजाकिया लहजे में ही लेता हूँ .....
एक बार मैंने थोडा गंभीर मगर पवित्र भाव से पूछ ही लिया कि अगर मैं गुरु हूँ तो वे फिर वे कौन हैं जिनकी चर्चा अक्सर उनके होठों पर रहती हैं तो वे तपाक से बोल उठे -"अरे वे तो गुरु घंटाल हैं .अब  गुरु घंटालों की चेल्हआई से राम बचाएं ....मेरे लिए तो गुरुवार आप ही ठीक हैं ."मगर मेरा मन हमेशा असमंजस में ही रहता है कि ये शिष्य कब कौन सी खुराफात न कर बैठे -चलो बच्चू ज्यादा खुरचाली कभी की तो गुरु द्रोणाचार्य की याद करके अंगूठा मांग लूँगा गुरु दक्षिणा में और उसी दिन असली नकली शिष्यत्व का फैसला भी हो जाएगा .. :-) मुला मेरे एकाध शुभाकांक्षी जो रह गए हैं ताकीद करते हैं कि भैया आधुनिक शिष्यों से सावधान रहा करियो नहीं तो वे गुरुओं का ही अंगूठा काट लेते हैं -मैं तुरत ग़मगीन होकर उन्हें बता दिखा देता हूँ कि अब कोई स्कोप नहीं है ...दोनों अंगूठे तो पहले से ही लिए जा चुके हैं अब तो और की गुंजायश ही नहीं है -गनीमत है डैशबोर्ड पर अंगूठों का इस्तेमाल नहीं होता -नहीं तो कलमों पर अभिव्यक्ति टिकी होती तो मैं तो गया था काम से ....आधुनिक तकनीकीविद कैसे युग द्रष्टा हैं उन्हें आभास है कि गुरुओं के अंगूठे गायब हो रहेगें ....शिष्यों का ऐसा ही कुछ जलवा है आज के युग में ....मेरे मित्र फिर कहते हैं कि वे दंडवत होकर आपके पैर का अंगूठा भी काट सकते हैं ....मैं दहल तो जाता हूँ मगर फिर कह पड़ता हूँ चलो कोई बात नहीं परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ..मगर अपने डर की आशंका को हंसी में उड़ाते हुए यह भी जोड़ देता हूँ चलो ससुरे जो भी अंग वे चाहें काट ले जाएँ बस न ....अब इस उम्र में कई अंग वैसे ही अवशेषी अंग की उपाधि ग्रहण करने वाले हैं ......
बहरहाल मैंने अपने शिष्य से बातचीत आगे बढ़ायी-और भाई क्या हाल हैं गुरु घंटाल के? बोले हाल कुछ ठीक है चाल तो कभी सुधरेगी नहीं और वैसे भी बिचारे इन दिनों बड़ी मुसीबत में हैं .काहें? एक अद्भुत सुखानुभूति के साथ मैंने पूछ ही तो लिया .."अरे हालत पस्त और तबीयत खस्ता है इन दिनों उनकी ...." मैंने सलाह दी,.. तो फिर ज्ञानदत्त जी गंगा किनारे वाले ब्लॉगर से कुछ पिस्ता विस्ता क्यों नहीं दिलवा देते उन्हें ...अभी फेसबुक पर वे डिक्लेयर किये थे कि उनके पास मेवे का जखीरा है और गुरु पूर्णिमा के दिन उन्होंने खूब  मेवे डालकर खीर बनवाई है ..मगर इस हास्य बोध को न पकड़ कर मेरे शिष्य का मुंह अब भी गुरुघंटाल की हालत बयान करते हुए लटका हुआ था ..
मैंने अपनी आवाज में जानबूझ कर थोडा रहस्य का पुट देकर पूछा और कोई ऐसी वैसी बात तो नहीं है ...."वो तो मुझे पता नहीं मगर इन दिनों वे खोयी हुए शान शौकत को फिर से जमाने में लगे हैं" ...भला कैसे? मैंने पूछा और यह भी जोड़ा कि भाई वे तो बड़े आशावादी ब्लॉगर हैं."हाँ आशा तो उनकी बलवती है ही   -उसी तरह जैसे पांडवों और कौरवों के युद्ध में जब सारथी  शल्य को अंत में दुर्योधन ने अपना सेनापति बनाया  तो संजय धृतराष्ट्र से कह उठे कि राजन देखिये दुर्योधन कितना आशावादी है जो शल्य को पांडवों पर विजय के लिए भेज रहा है . यही हाल बिचारे गुरु घंटाल का है जिन्होंने एक नया चिटठा चर्चाकार चुना है जो चिट्ठाचर्चा का बेड़ा पर करेगा ...और उस नए चिट्ठा चर्चाकार ने अपनी गोल  जुटा कर सर संधान भी कर लिया है ....ओह चिट्ठाचर्चा को भला यह दिन भी देखना था ...? मेरा मन क्षुब्ध हो गया .....शिष्य ने मुझे चिंतन से उबारा -आप काहें चिंतित होते हैं ....जो हो सो हो आपसे क्या लेना देना ....मेरा मुंहबोला  शिष्य अब पूरे शिष्यत्व भाव से मेरे सहज होने के प्रयास में जुट गया था ..ब्लॉग जगत के कई दूसरे अफसानों  का जिक्र शुरू हो चला  था ......

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

एक चड्ढी कथा

 ऐसे ही मित्र के साथ फिल्मों की चर्चा के दौरान आने वाली फिल्म फात्सो के प्रसंग में  चड्ढी की चर्चा शुरू हो गयी .दरअसल इस फिल्म का नायक चड्ढी नहीं पहनता .फिर तो चड्ढी को लेकर मित्र ने चटखारे लेकर और भी बातें करनी शुरू की ...याद है एक ब्लागर ने किस तरह ब्लागजगत में यह कह कर धमाका कर दिया था कि वे इस इह लोक में महज पति की चड्ढी धोने के लिए ही नहीं अवतरित हुईं है ...हाँ हाँ भला उन्हें कौन भुला सकता है, आज वे बिना चड्ढी धोये जीवन को सार्थकता के नए आयाम दे रही हैं ...फिर तो एक वृहद् चड्ढी चर्चा ही शुरू हो गयी .आस पास के जो लोग इधर ही कान लगाये थे थोडा और पास खिसक आये  ...

...गुलजार के चड्ढी लगाव पर चर्चा हुयी ..क्या गाना था वो भी  ..चड्ढी पहन के फूल खिला है ..बच्चों के साथ बड़े भी लहालोट हो जाते थे यह गीत सुन कर ..तब भी यही लगता था कि चड्ढी निश्चय ही फूल जैसे बच्चों की ही ड्रेस हो सकती है . इन्नोसेंट प्यारे बच्चे चड्ढी में और भी कितने प्यारे लगने लगते हैं ..मगर नाश हो इन नासपीटों होजरी उद्योग वालों का जिन्होंने विज्ञापन के चलते चड्ढी को युवाओं का भी ड्रेस -अन्तःवस्त्र बना दिया और उसके साथ कुछ रोमांटिसिज्म भी जोड़ दी -नए प्रतीक भी गढ़ लिए गए ...मुओ ने इस बचपने को यौनाकर्षण से भी जोड़ दिया ...अगर तुम वह वाली चड्ढी पहनोगे तो वह तुम्हारे पास खिंची चली आयेगी -हुंह ऐसा भी होता है भला? मगर चड्ढी उद्योग परवान चढ़ता गया ..नारियों ने अपने लिए गुलाबी रंग चुन कर इस रंग को भी एक फुरफुरी झुर्झुरीनुमा संवेदना से जोड़ दिया -पिछले दिनों एक चड्ढी अभियान दरअसल इसी संवेदना  की एक निगेटिव पब्लिसिटी ही तो थी:) किसी राम सेना को इस चड्ढी अभियान में पूरी तरह गुलाबी बना दिया गया था ....

हमारे यहाँ गाँव गिराव में तो बच्चे ही चड्ढी पहनते आये हैं ..बड़े हुए तो लंगोट ढाल ली ..कहते हैं लंगोट और ब्रह्मचर्य में एक घनिष्ठ रिश्ता है ...अगर बात इधर मुडी तो तगड़ा विषयांतर हो जायेगा ...इसलिए अभी यह चड्ढी चर्चा पूरी हो जाने दीजिये, लंगोट महात्म्य फिर कभी ..मैंने तो कभी पहनी नहीं किसी लंगोटधारी से पूंछ पछोर कर ही कुछ बता पाऊंगा ...वैसे भी लंगोट मुझे हमेशा सांप की प्रतीति कराती है ...जाहिर है लंगोट से डर लगता है ....तो हाँ ..चड्ढी .....गाँव में अभी भी बहुत से लोग चड्ढी नहीं पहनते ....यह नागर सभ्यता की देन है. हाँ नेकर गावों में जरुर पहना जाता है जिसे जन्घियाँ भी कहते हैं ...मगर वह एक बहिर्वस्त्र है अंतरवस्त्र नहीं -हाँ कुछ उजबक किस्म के लोग जन्घियाँ के ऊपर पायजामा ,पैंट पहन कर अपनी समृद्धता का बेजा प्रदर्शन भी करते हैं -ऐसे लोग मुझे अच्छे नहीं लगते (याद दिला दूं चल रही चड्ढी चर्चा में ज्यादा हिस्सेदारी मेरे मित्र की है इसलिए जिस भी वक्तव्य के बारे में तनिक भी शंका हो उसे मेरे मित्र का माना जाय) गाँव की गोरियाँ भी अमूमन अन्तःवस्त्र नहीं पहनती ...एक ग्राम्य पंचायत में अभी खुलासा हुआ कि एक ग्राम्या को उसका शहरी हसबैंड जबरदस्ती चड्ढी पहनने को कहता है ...पञ्च लोग गरजे ..अबे कलुआ ऐसा काहें करता है बे ....उसने बहुत झेंप झांप के बताया कि यह फार्मूला अपनाने से उसे जोर का कुछ कुछ होता है ...मगर उस ग्राम्या को यही ऐतराज था ..मामला तलाक पर जा पहुंचा था -मुझे लगता है ग्राम्या होशियार थी ..उसे भी रोज रोज चड्ढी साफ़ करने की मुसीबत से छुटकारा चाहिए था ..... 

जाहिर है यह चड्ढी संस्कृति बहुत गहरे घुस गयी है हमारे जीवन में ...एक मित्र दंपत्ति को जब शादी के कई साल बाद भी संतान की प्राप्ति नहीं हुयी तो .ओझाई सोखाई शुरू हुयी ...कहाँ कहाँ  नहीं गए बिचारे, कौन कौन सा नेम व्रत नहीं किया ..किसकी मिन्नतें नहीं हुईं, देवी औलिया दरगाह सब जगहं शीश नवाया ..मगर संतान नहीं हुयी ..एक काबिल डाक्टर ने जांच परख की तो मित्र से कहा कि अब से चड्ढी पहनना छोडो ..बच्चा हो जाएगा ...आश्चर्यों का आश्चर्य दम्पत्ति को अगले वर्ष ही बच्चा नसीब हो गया ....मगर कैसे? डाक्टर ने बताया कि लगातार चड्ढी पहनने से स्पर्म काउंट घट गया था - यह भी कि पुरुष जननांग के पास एक ख़ास स्थिर तापक्रम शुक्राणुओं को सक्रिय समर्थ रहने के लिए आवश्यक है ....मेरे मित्र ने तबसे चड्ढी ऐसी उतार फेंकी कि फिर आज तक नहीं पहनी .कई होनहार बच्चों के गर्वित पिता हैं ..और चड्ढी न पहनने की कई सहूलियतों का भी वर्णन करते नहीं अघाते ...

अभी तो विराम मगर फिर कभी शेष चड्ढी कथा .....


गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

अथ नकलोपाख्यानम!


जी भ्रम न करें नकलोपाख्यानम ही है.... पुराणों का नलोपाख्यानम यानि नल दमयंती आख्यान नहीं..नकल का अख्यान. इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं तो सोचा आप सबसे कुछ इसी मामले पर बतियाया जाए। नक़ल और परीक्षाओं का तो बड़ा गाढ़ा रिश्ता है। नक़ल विहीन परीक्षा की सारी कवायद के बाद भी नक़ल रोके नहीं रुक रही है तो केवल इसलिए कि यह हमारी एक बड़ी पुरानी थाती है, कला है और भारतीयता की पहचान है। शिक्षा व्यवस्था में चाहे वह तोता रटंत विद्या हो या नक़ल विद्या, इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। वेदपाठी ब्राह्मण वेद की ऋचायें रट रट कर ही याद करते थे। बाबा तुलसी भी कहते भये हैं- 'दादुर धुन चहुं दिशा सुनाई, वेद पढ़हिं जिमि बटु समुदाई'... मतलब वर्षा ऋतु में मेंढक ऐसे टर्रा रहे हैं जैसे वेदपाठी ब्राह्मणों के समूह वेदपाठ कर रहे हों। शिक्षाशास्त्री और भाषा विज्ञानी लाख कहें कि रटना मानव  बुद्धि की संभावनाओं को कमतर करता है, हम नहीं मानते। यदि ऐसा होता तो वैदिक वांगमय हजारो साल तक अक्षुण न रहते। हमने अपनी इसी नैसर्गिक क्षमता से ही तो अपने वेदों और स्मृतियों को हजारो साल तक बचाए रखा। लिखने की कला और छापे खाने तो कितने बाद में आए। अब नक़ल की बात कर लीजिए। आज नक़ल पूरे विश्व में भारतीयता की पहचान मानी जाती है। कोई भी उपकरण पश्चिमी देश आविष्कृत करें, यहां उसका तर्जुमा तुरत फुरत तैयार... और नक़ल में भी अकल की दखल ऐसी कि हमारी कितनी ही 'जुगाड़ी' तकनीकों को दुनियां में इनोवेशन के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।

इसलिए यह सर्वथा उचित लगता है कि नक़ल के प्रति हम अपने नकारात्मक दृष्टिकोण को बदलें और अपनी इस पुरानी कला को परिमार्जित करें। इस कला को आगे बढ़ाने में हर पीढी के छात्रों का बड़ा योगदान रहा है। शायद ही कोई पढ़ा लिखा ऊंचे ओहदे पर बैठा मानुष यह दावे के साथ कह सके कि उसने जीवन में कभी नक़ल नहीं की। बड़े ओहदों के प्रशासकों  और राजनेताओं ने भी बिना रटंत विद्या या कभी कभार के नक़ल के जीवन में इतनी ऊंचाई शायद ही पाई होती। हां इनके नक़ल के तरीके जुदा जुदा भले ही रहे हों। मेरे एक मित्र हैं आज कल एक बड़े राजनेता हैं। हम साथ ही पढ़ते थे। उनका रटने या समझने में विश्वास जरा कम था इसलिए वे परीक्षा के समय पुर्जियां बनाते रहते थे और हम सब को हिकारत भरी नज़र से देखते थे। कहते, लगाओ घोटा ...जितनी देर में तुम लोग रट्टा मारकर एक दो सवाल याद करोगे, मैं पचीसों सवाल की पुर्जी बना चुका रहूंगा। बला की फुर्ती से वे महीन अक्षरों में नक़ल की पुर्जी बनाते थे और अंत में एक पुर्जी यह भी बनाते थे कि अमुक अमुक पुर्जी कहाँ कहाँ छुपाई जाएगी।

एक बार तो अपनी इसी सूझ के चलते वे भारी मुसीबत में पड़ गए। हिन्दी का साहित्य का प्रश्नपत्र था। उनका दुर्भाग्य की कक्ष निरीक्षक खुर्राट किस्म के निकल गए और उन्हें नक़ल करते धर दबोचा और दुर्भाग्य से वही पुर्जी उन्हें पहले ही दिख गयी जिसमें कुछ ऐसा मजमून बारीक अक्षरों में था। मीराबाई मोज़े में, तुलसीदास कांख में, कबीर दास लंगोट में, रसखान रीढ़ के नीचे... आदि आदि। जाहिर है कक्ष निरीक्षक के हाथ नक़ल साहित्य का खजाना ही मिल गया था। बेचारे अलग कक्ष में ले जाए गए जहां उनकी नंगाझोरी करनी पड़ी। अभी वे नक़ल शुरू नहीं कर पाए थे कि यह विपदा आन पड़ी थी। बहरहाल उनकी सारी नक़ल सामग्री जो जहां जहां से प्राप्त हुई जब्त कर ली गयी। गनीमत यही रही कि उन्हें परीक्षा देने की अनुमति दे दी गयी और ताज्जुब कि वे फिर भी पास हो गए थे। यह  राज तो उन्होंने बाद में उजागर किया कि वह पुर्जी तो उन्होंने जानबूझ कर निरीक्षक को थमा दी थी ताकि उनका ध्यान बंट जाए। असली वाली पुर्जी  तो कहीं और थी...

भला बताइए, ऐसी  तीक्ष्ण प्रतिभा वाले को नक़ल के नाम पर प्रताड़ित करना कहां तक उचित था और आज वे अपनी इसी प्रतिभा के बल पर राजनीति के  एक बड़े नाम हैं। उनसे ही जुड़े  एकाध और संस्मरण हैं। एक बार काला चश्मा लगाए एक कक्ष निरीक्षक जब पधारे तो हमारे प्रिय भावी राजनेता ने उन्हें इस बात पर कनविंस कर लिया कि वे बिना काले चश्मे के ही बला की पर्सनालिटी वाले लगते हैं। लिहाजा निरीक्षक साहब ने चश्मा निकाल कर सामने रख दिया। यह सब उन्होंने  इसलिए किया था कि उनके मुताबिक़ काले चश्मे  से यह पता नहीं लग पा रहा था कि वे देख किधर रहे हैं और नक़ल करने के लिहाज से यह एक असहज स्थति थी।
इनके कुछ क़िस्से  फिर कभी। आज का नक़ल आख्यान बस इतना ही।

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय जी की इन दिनों चल रहे नक़ल विमर्श से प्रेरित है अतः उनका आभार! 

गुरुवार, 22 मार्च 2012

एक फेसबुकिया परिचर्चा

इन दिनों एक दुर्लभ किस्म की आजादी का लाभ उठा रहा हूँ....जो शादीशुदा लोगों के लिए वरदान है मगर प्रत्यक्ष नहीं छुपा हुआ वरदान ...पत्नी मायके गयी हुयी हैं ....पिछली पोस्ट पर इस आजादी की  उद्घोषणा कर चुका हूँ ...तब से बनारसी गंगा का  लाखो टन पानी राजघाट से आगे निकल गया है ...और अब आजादी का समापन भी नज़दीक आन पहुंचा है ....आम दुनियावी शिष्टाचार में गृहिणी के घर से लम्बे समय तक बाहर रहने पर लोग बाग़ सबसे पहले यही पूछ लेते हैं कि भई खाना  पानी कैसे हो रहा है ..जैसे हम कोई ढोर गंवार हैं जिसे सानी पानी चोकर भूसा कोई और देगा तभी जिन्दा रहेंगे  -हम खूंटे में बंधे कोई जनावर तो हैं नहीं .....यह बात भी आपत्तिजनक है कि लोग अर्धांगिनी को केवल खाना बनाने की अपरिहार्यता के रूप में देखते हैं -बस जैसे पत्नी का केवल  यही एक काम  हो ..भारतीय सोच समाज बदलने से रहा ....

मुझे पता है कि कुछ मित्र मन में सोच रहे होंगे कि मैं फिर वही पकाऊ विषय लेकर बैठ गया ...भैया अगर भोगा हुआ यथार्थ ही असली साहित्य का स्रोत  है तो मुझे साहित्यिक सेवा से काहें रोक रहे हैं ..? इन दिनों अपने खालिस अनुभवों को आपसे साझा कर मुझे कुछ तो साहित्यिक अवदान का पुण्य लेने दें :) अब बात लम्बी न खींच कर इसी विषय पर  फेसबुक परिचर्चा का उल्लेख कर दूं जिसे मैंने मित्रों के बीच आयोजित किया था और ढेरो छुट्टा विचार प्राप्त हुए थे....विषय था - "पत्नी का मायके में रहना पति के लिए छुपा हुआ वरदान है"... गिरिजेश भोजपुरिया  ने विषय देखते ही एक लिंक पकड़ा दिया और परिचर्चा से फारिग हो लिए ....ढेर सारे मित्रों ने बड़े उर्वर विचार रखे ....मजे की बात यह कि जिन्होंने सबसे गूढ़ और विस्तृत विचार रखे वे खुद शादी शुदा नहीं हैं -मैंने पूछा प्रभु बिना सेब का स्वाद चखे इतना विषद और सुदीर्घ अनुभव आपको कैसे हुआ तो उन्होंने बड़े फिलासिफियाना अंदाज में जवाबा दिया कि अंतर्बोध और अंतर्ज्ञान भी कुछ चीज होती है ...मुझे अंतर्बोध पर व्याख्यान नहीं सुनना था इसलिए उनके द्वारा उछाले गए इस विषय को हठात परे धकेलते हुए मूल परिचर्चा के विषय पर ही लोगों को फोकस करने की गुजारिश की ....आप भी कुछ अनमोल विचार ग्रहण करें ...सबसे पहले तो उन्ही मित्र महानुभाव के विचार जो अभी तक कुंवारे हैं -गदह पचीसी के आस पास हैं ..आप इनके विचार पढ़कर  भारत की युवा शक्ति  से वाकिफ हो सकते हैं. नाम है ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ..कृतित्व की बानगी यहाँ मिल ही जायेगी व्यक्तित्व से उनके फेसबुक प्रोफाईल पर जाकर परिचय प्राप्त कर सकते हैं -
"वैसे ये बात कभी पति पत्नी के सामने स्वीकार नहीं कर सकता की पत्नी का घर जाना वरदान है अतः इसे छुपा हुआ कहना ही सही होगा ........ अब ये वरदान है, इस की पुष्टि के लिए पति को मिलने वाली निम्नलिखित स्वतंत्रता उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है...........
१. पत्नी घर पर हो तो पड़ोस की भाभी जी से हंस कर बात करना, दफ़ा ३०७ के तहत आता है........ न हो तो अच्छा है.
२. घर पर रोजाना उपयोग के समान ढूढ़ने नहीं पड़ते या इसके लिए पत्नी को चिल्ला कर आवाज़ नही लगानी पड़ती, ये सारे समान (कंघा, बनियान, तौलिया आदि) बिस्तर पर उपलब्ध होते है....... या सामने मेज या कुर्सी पर उपलब्ध होते है.
३. किसी भी मित्र (म./पु.)को घर पर बुलाने की स्वतंत्रता....... अगर सुरा की इच्छा हो तो घर पर ही माहौल बन सकता है.
४.खाना बनाने मे थोड़ी दिक्कत होती है, पर इसी बहाने सही पड़ोस वाली भाभी जी हाल चाल ज़रूर पूंछ लेती है. और उनसे जान पहचान बढ़ाने का मौका मिल जाता है. और उनकी सहानभूति भी मिलती है. अब बात होगी तो आगे भी बढ़ेगी.
५. वैसे कुछ दिनों बाद पत्नी की याद भी आती है, खास करके जब कपड़ों का हुजूम इकठ्ठा हो जाता है........ पर लगता है की कुछ और दिन मज़े ले लिए जाए पता नही ये दिन कब आए, .......... और ये तो सोने पर सुहागा हो जाए अगर वो देर से आए......... एक तो एंज़ोय करने कुछ और दिन.. उसपर उसको घुड़की पिलाने का मौका मिल जाए." 


किस नतीजे पर पहुंचे आप? मतलब ज्ञानेंद्र जी के अंतर्बोध के मामले में? ...अपने पुराने संगी राज भाटिया जी भी विषयाकर्षण से बंच नहीं पाए ,देखिये कैसे दुखती रंग पर उंगली धरते भये ....
" पत्नी मायके गई हे तभी वरदान है  जब घर के काम काज के लिये अपनी छोटी बहिन को छोड गई हों ....:) वर्ना तो आफ़त है ... और  मेरे जैसे के लिये तो बिना पत्नी के रहना नामुमकिन है ... क्योकि मुझे अपने किसी भी समान का कुछ पता नही.... " ...
मित्र अजय त्यागी ने तो एक कविता ही ठोक दी ....
पत्नी गयीं मायके 
ओये मौजा ही मौजा 
भाई मौजा ही मौजा 
ऍमये ओम्मे करिए 
भाई मौजा ही मौजा 
पड़ोसन आये रोटी लाये 
संग बैठकर वो बतलाये 
भाई मौजा ही मौजा 
दिन बीता और रात हो आये 
घुटना मोड़ पेट में सोये ...
बीवी जब वापस आये 
सास की भेजी मिठायी लाये 
भाई मौजा ही मौजा 

आप भी इस परिचर्चा में भाग लेना चाहेंगे? :)  

शनिवार, 17 मार्च 2012

उनका मायका,मेरी मौज!

आज वे मायके चली गयीं हैं ..और इससे उपजे अहसास पर  सोचा एक पोस्ट चेप दूं .यह भीड़ जुटाऊ श्रेणी की पोस्ट है . कभी कभार की  ऐसी पोस्टों से ब्लॉगर की मौजूदगी का शिद्दती अहसास दीगर ब्लागरों में  बना रहता है ...अगर यह पोस्ट ज्यादा टिप्पणियाँ नहीं जुगाड़ेगी तो महज इसलिए कि भीड़ जुटाने की बात मैंने बेबाकी से कह डाली है ..लोग आयेगें तो मगर टिप्पणियाँ करने में संकोच कर सकते हैं ..मगर मैं मुतमईन हूँ मेरे चाहने वाले जरुर आयेगें और अपने प्रेरणा पुष्पों को सदैव की भांति यहाँ बिखेर जायेगें ...स्टैट काउंटर आने वालों की  संख्या भी बतायेगा ही .. मगर पहले की ही तरह कुछ लोग जलेगें भुनेगें मगर यह उनकी नियति है तो मैं क्या कर सकता हूँ ..मैं तो भीतर से सभी का शुभाकांक्षी हूँ -मगर लोग बाग़ आँखें तरेरे रहें तो  मैं  करूं भी क्या? बहरहाल वे आज मायके गयीं हैं .. जाने की प्रस्तावना विविध रूप रंगों से  कई दिन से बना रही थीं -मैं इस बार निरुत्तर और निरपेक्ष था ..पत्नी को मायके जाने से रोकने वाला कलियुग में घोर पाप का भागी बनता है ..सुना पढ़ा है ऐसे पतियों को कुम्भीपाक नरक नसीब होता है ..और अब वानप्रस्थ का समय निकट आता जा रहा है तो मुझे भी परलोक की चिंता होने लगी है -यह तो रही बाहर की बात  -एक अन्दर की बात भी  है ..जरा कान करीब  लाईये न..बताते हैं ....(खुसर पुसर ) ....

 पत्नी के मायका गमन से एक परम शान्ति ,सकून और आजादी का अनुभव भी होता है ....यह आप लोगों में से श्रेष्ठ और गुणी  पुरुषों ने अनुभव भी किया होगा ....दरअसल घर स्त्री का ही होता है ...एक गृहिणी ब्लॉगर ने इसी बात को अभी हाल में अपनी एक लम्बी कविता में समझाया भी है और मैं उनकी इस बात से पूरा इत्तेफाक भी करता हूँ -दरअसल यह भोगा यथार्थ मेरा भी है..घर पर तो गृहणी की ही चलती है -वह तानाशाह होती है ...लेडी आफ द हाउस या गृह मंत्रालय जैसे  नामकरण इसकी  पुष्टि भी करते हैं ..अब मैं प्राणी व्यवहार का अध्येता रहा हूँ तो किसी भी व्यवहार का उदगम ढूंढता फिरता रहता हूँ -आखिर गृह स्वामिनी इतनी कड़क क्यों होती हैं ? घर पर अपना अकेला अधिपत्य क्यों समझती हैं? घर स्त्री का होता है और घर बिल्ली का भी होता है ...आपको क्या पता है कि बिल्लियाँ जिस घर में होती हैं उनका गृह स्वामी/स्वामिनी के बजाय घर से लगाव होता है और कुत्ते घर के बजाय अपने स्वामी /स्वामिनी से गहरे जुड़े होते हैं ....आप किसी मकान को छोड़ जाएँ और वर्षों बाद लौट आयें तो आप ताज्जुब कर सकते हैं अपनी पुरानी पाली हुयी बिल्ली को  वहां देखकर ..मगर कुत्ता स्वामी/स्वामिनी  के साथ ही घर छोड़ जाएगा नहीं तो जान दे देगा ...

जाहिर है आज के मनुष्य में भी कतिपय इन्ही पशु  प्रवृत्तियों का  ही विस्तार तो  हुआ है ....पत्नी घर छोड़ना नहीं चाहतीं  मगर बिचारी मायके के मोह में विवश हो जाती हैं ...किन्तु  जब घर पर इस  तानाशाह की मौजूदगी रहती  है तो पति निषेध कार्यक्रम बदस्तूर जारी रहता है - यह न करो वह न करो ..ये तौलिया यहाँ क्यों रखा ...ये सामान यहाँ क्यों छोड़ा ..ये गन्दगी यहाँ क्यों की ..डेजी (कुतिया ) की चेन यहाँ क्यों रखी?अखबार यहाँ  क्यों पड़ा है? चप्पलें यहाँ क्यों निकाली?  डिटाल की शीशी खुली क्यों पडी है?मतलब नाक में दम!-लगता है हे भगवान ये तो पूरी जिन्दगी ही तबाह हो गयी है ...इसलिए गृह स्वामिनी के घर छोड़ते ही परम सुख की सहज स्वयमेव  तत्काल प्राप्ति हो जाती है ....अब तो सबै भूमि गोपाल की ..जहां कहीं भी मन हो निढाल हो रहिये ..जो भी जैसा भी करिए ...कोई बोलने वाला नहीं ...परम सुतंत्र न सर पर कोई ..एक दिव्यानुभूति! घर की ऐसी तैसी! वैसे भी कुत्तामना पुरुष घर को ठेंगे पर ही रखता है ..हाँ दूसरे आस पड़ोस के घरों के बारे में और गृह वासियों के बारें में उसका ख़याल तनिक जुदा सा होता है ...वह तो मुए अंतर्जाल ने पुरुषों को भी घर से चिपका रखा है अब, नहीं तो हमसे पहले की पीढी के मर्द घर पर रहते ही कहाँ थे -...

उस विरहिणी नायिका का आर्तनाद सुना है आपने? -कहवाँ बिताई सारी रतिया ,पिया रे सांच कहो मोसे बतिया ....या फिर ..तुम जाओ जाओ मोसे ना  बोलो सौतन के संग रहो....भोर भये आये हो द्वारे ये दुःख कौन सहे .... अब मैं होता तो बिचारी विरहणी को ढाढस देता छोडो ऐसे कुत्ता (आ)चारी पिया को वे ऐसे ही होते हैं ..उन्हें आदिकाल से पड़ोस ही अच्छा लगता आया है ...जीनों की विरासत है जो ...अब इतनी जल्दी तो बदली नहीं जा सकेगी ..रफ्ता रफ्ता एकाध लाख साल तो लग ही जाएगा ..हाँ नारीवादी थोडा जोर लगा लें तो एकाध हजार साल कम भी हो सकता है ....अब विरहिणी घर को छोड़ नहीं सकती -उसका प्राण बसा है उसी में ...और लोग भी न जाने कैसे कैसे मुहावरे गढ़ डाले हैं -डोली और अर्थी का गहरा  रिश्ता पिया के घर से जोड़ते भये हैं ...मगर मुआ मर्द वह तो चिर स्वतंत्र है ..कुत्ता है कुत्ता ..न घर का न घाट का -घाट घाट का पानी पीने के लिए भटकता रहता है ताउम्र ....तब भी उसकी प्यास नहीं बुझती ..छिः कुत्ता कहीं का .....

बहरहाल मैं परम स्वतंत्रता का अनुभव कर रहा हूँ और आज की और आगे की भी ..कुछ दिनों की इस स्वयमेव अर्जित आजादी को सेलिब्रेट करने की कार्ययोजना बना रहा हूँ -सरकारी मानुष हूँ कार्ययोजनायें बना लेता हूँ ...एक मित्र तो अभी पहुँचने वाले हैं ..हम उन्हें बुलावा भेजे हैं ..घर से निकल चुके हैं ..उन्हें भी कहीं बाहर खुली हवा में सांस लेने की दरकार है ....गुजरेगी खूब जब आज मिल बैठेगें दो यार ..कई दिल्ली के दोस्तों की भी बरबस याद आ रही है -काश वे  होते यहाँ ! न न भाई ..अब इत्मीनान से मार्च के बाद आईयेगा अभी तो यह टेम्पररी मुक्ति है ...पता नहीं कब घर की मालकिन टपक पड़ें ! खतरा तो है ही! फिलहाल तो घर पर मेरा कब्ज़ा है ..परसों नरसों तक वे फिर काबिज हो जायेगीं -मगर सच कहूं तो न घर उनका न घर मेरा यह तो बस इक रैन बसेरा है ....

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मुर्रा भैंसों का कैटवाक:स्पर्धा में बेशर्म चयनित ,शर्मीली बाहर!

यह अभिनव आयोजन हरियाणा के जींद शहर में होना तय है .इसके पहले सोनपुर के प्रसिद्ध पशु मेले में भी ऐसे आयोजन को जनता का भरपूर समर्थन मिला था ...माडल्स का कैटवाक तो फैशन की दुनिया का एक जानामाना आयोजन है -बिल्लौरी आँखों के चुम्बक और मदमाती "फेलायिन " चाल से लोगों के कलेजों  पर बिजलियाँ गिरातीं माड्लें...निश्चित ही नए आयोजन की प्रेरणा स्रोत भी यही माड्लें ही हैं ..वैसे भैंसों की तुलना भी बेहतर सेक्स से चोरी छुपे और दबी जुबान में पुरुष जन करते ही रहते हैं ....अब यह आयोजन एक दमित इच्छा का उत्सवी प्रगटीकरण  ही लगता है ...

सौन्दर्य की  नयी श्यामा :) कैसी लगी ? 
सौन्दर्य के इन नयी कृष्णा -माडलों के लिए अलग ढंग और डिजाईन के रैम्प बनाए जा रहे हैं....और आयोजन के पहले चयन की स्पर्धा में बेशर्म भैंसों को ही चयनित किया गया है और शर्मीलियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है -आयोजक बिलकुल वही मोड्यूल अपना रहे हैं जो माडलों के कैटवाक का है ...बेशर्म इसलिए कि हजार जोड़ी घूरती गृद्ध दृष्टियाँ कहीं भैंसों को भी नर्वस न बना दें ....इसलिए शर्मीली  पहले से ही बाहर कर दी गयीं -यहाँ तो भीड़ के सामने उद्धत और बेपरवाह ,बिंदास या बम्बास्ट ही बने रहना पड़ता  है ..शर्मीली  बिचारियों के लिजलिज संस्कार उनके आड़े जो आ जाते हैं ...सो वे कहीं आयोजन के रंग में भंग न डाल दें इसलिए जजों की पारखी दृष्टि ने उन्हें पहले ही पहचान कर घर का रास्ता दिखा दिया है ....

अगर हम माडलों के कैट वाक्  के अल्पकालीन इतिहास पर गौर करें तो इसकी शुरुआत फैशन डिजाईनरों ने अपनी दुकान चलाने को किया था -हाँ इससे माडलों को और भी  मौके मिले और विश्व सुन्दरियों तक का चयन भी ऐसे ही आयोजनों से मूर्त रूप लेने लगा  -प्रयोगधर्मियों ने बाद में गृहणियों को भी रैम्प पर रम पम   कराने की मुहिम चलाई और यह कतई असंगत नहीं कि अब रैम्प पर सौन्दर्य की नयी कृष्णाओं की धमक होने को है ...कैटवाक पर निश्चित ही पुरुष माडल सफल नहीं हुए और यही कारण है कि भैसे  इस प्रतियोगिता से अभी भी बाहर हैं -युगल कैटवाक का भी यहाँ सवाल नहीं है क्योकि कहीं यम दूत और दूतियाँ रैम्प पर कैटवाक करते करते सहसा कुछ और अप्रत्याशित  गुल न खिला दें -यह एक बड़ा रिस्क है!आयोजक यह रिस्क लेने को तैयार नहीं हैं खास तौर पर इस बासंती मदमाते मौसम में!

वैसे हरियाणा सरकार का जाहिरा तौर पर यह दावा है कि पूरा आयोजन मुर्रा भैंसों की नस्ल  को जनप्रिय बनाए जाने का है -जो अधिक दूध देती हैं .और हरियाणा में इन्हें पालने वालों को समाज में ऊँची नज़रों से देखा जाता है -जितनी मुर्रा  भैंसे दरवाजे पर उतनी ही बड़ी हैसियत और रुतबा -अब इसके बारे में डॉ .दराल साहब और दीगर हरियाणवीं ब्लॉगर बन्धु ज्यादा जानकारी दे सकते हैं ....

शनिवार, 21 जनवरी 2012

ब्लॉग जगत में एक अदद उद्धव की तलाश!

अब आप तो यह बात जानते ही हैं कि प्रेम का इज़हार कर पाने में कुछ लोग पैदाईशी कमज़ोर किस्म के होते हैं ...मतलब मिलो न मुझसे दिल घबराए मिलो तो आंख चुराए वाला मंज़र ..काजल कुमार और अभिषेक ओझा या देवांशु निगम सरीखे दीगर नौजवान लोग मेरी इस बात से इत्तिफाक नहीं करेगें मगर हम उस पीढी के हैं जब इजहारे इश्क को लेकर बड़ी जहमत होती थी ....लोग कह नहीं पाते थे मगर लम्बी लम्बी चिट्ठियाँ आहें भर भर कर जरुर लिख डालते थे और अक्सर यह भी हो जाता था वे गंतव्य तक न पहुच कर किसी रकीब या माशूका के पहलवान भाई आदि को मिल जाती थीं और बड़ा गुल गपाड़ा होता था ....अब आज शार्ट मेसेज सर्विस वाली पीढी शायद इजहारे इश्क को उतना तवज्जो नहीं देती या फिर बाकी का काम पहले ही निपटा कर बाद में जरूरत के मुताबिक़ इज़हार वैगेरह किया तो किया और न किया तो न किया, जैसा फार्मूला जो  अपने अनूप शुकुल जी टिप्पणी देने के मामले में करते हैं ....को अंजाम देती है .... 

काफी नामी गिरामी शायर या ग़ज़ल गायक भी इजहारे इश्क को लेकर काफी संजीदा रहे हैं ...जेहन में मेहदी हसन की वह ग़ज़ल अभी गूँज रही है ..बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी .....आखिर यह मुश्किल क्यों आन पड़ती है? मैंने खुद भी ऐसा शिद्दत के साथ महसूस किया है और दूसरों के मामले में भी देखा है कि कितनी ही साफगोई बरतने वाले ,खरी खरी मुंह पर सुना देने वाले मुहब्बत का इज़हार करने में टोटली फेल हो रहते हैं ....फिल्मों ,उपन्यासों में कई ऐसे बिचारे चरित्र नायकों के आख्यान भरे पड़े हैं.. और ऐसे मौकों पर भरोसेमंद दोस्त काम आते हैं और कभी तो वे भी ऐसा वाकया कर गुजरते हैं कि दुश्मन भी उनसे बेहतर लगते हैं ..लगता है भूमिका लम्बी खिंच रही है ....यह भी एक दिक्कत ही है इज़हार करने की ....बहरहाल ....

कभी कभी मुझे लगता है कि किशन कन्हाई के साथ भी कुछ ऐसा ही लफड़ा रहा होगा ..इजहारे इश्क में पूरी तरह फेल वे अपनी बासुरी का सहारा लेने पर बिचारे मजबूर होते थे.....लेकिन इससे मुश्किलें ही बढती गयीं ...कईयों को यह इल्म हो गया कि किशन कन्हाई तो असली वाला इश्क केवल उन्ही से करते हैं ....किस्सा कोताह यह कि उनकी अभिव्यक्ति की इस दिक्कत के चलते उनके इर्द गिर्द तमाम ऐसी भीड़ जुड़ने लगी जिसे वे बिलकुल भी नहीं चाहते थे मगर यहाँ भी कह नहीं पाते थे...अपने हाव भाव से यह जरुर दिखाते थे कि कोई एक ही उनकी चाहत है मगर यह भी उनका दिखावा मान लिया जाता था ...छलिया किशन ....और सब जन यही सोचती रहती थीं कि असली वाली मुहब्बत तो कान्हा  उन्ही से करते हैं ...मामला जब काफी संगीन हो गया तो किशन कन्हाई रोज रोज की चख चख से घबरा कर द्वारिका की ओर  रुख कर गए ...मगर मुसीबत ने यहाँ भी उनका दामन नहीं छोड़ा ...बिचारे  अपने एक विश्वसनीय मित्र उद्धव को अपनी असली वाली को प्रेम सन्देश के लिए नियुक्त किये ..गोकुल भेजे भी मगर यहाँ फिर वही मुसीबत ...हर गोपी यही समझे कि गोपेश्वर ने बस उन्ही के लिए सन्देश भेजा है .....उद्धव बिचारे की पूरी फजीहत हो गयी ..वो किस्सा तो आप सब जानते ही हैं ....यहाँ भी यही लगता है कि उद्धव बिचारे खुद भी अभिव्यक्ति -पटु नहीं रहे होंगे शायद और इसलिए मिशन में पूरी तरह असफल रहे ...सन्देश की डिलेवरी सही सही और सही गोपी तक नहीं पहुंचा पाए ....

मेरे जैसे अभिव्यक्ति -पंगु के लिए आज भी एक वाक्पटु उद्धव की तलाश जारी है और शायद यह एक शाश्वत खोज है .....

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

 ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो आज के वर्तमान में भी  वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की क्रमिकता/ऐतिहासिकता  का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमांचित  और आह्लादित होता हूँ...क्या नहीं है यहाँ -साहित्य की ज्ञात और नवोन्मेषित कितनी ही विधाएं यहाँ अपनी ओर ललचाती सी हैं ..कहानी है ,कविता है ,व्यंग है ,हास परिहास है ,संस्मरण है, आशय कि सचमुच क्या नहीं है यहाँ ..मगर यहाँ केवल लेखक बने रहने और पाठकों की प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलने वाला है ...यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....
जैसे अपनी कविता तो कवि जी ने पकड़ पकड़ के अनेक हिकमतों  से ,प्यार मनुहार और चाय तक पिला के सुनाई  मगर जब मेरी सुननी हुई तो जनाब भाग खड़े हुए ..यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता  की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से  त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....वे चाहते तो हैं कि उनका ब्लॉग हाथो हाथ ले लिए जायं  ,उनकी हर पोस्ट पर पाठकों की इतनी भीड़ आ जुटे कि शीशी चटखने वाला मुहावरा चरितार्थ हो जाय  मगर कभी खुद किसी के यहाँ  नहीं तशरीफ़ रखेगें ....हम भी आखिर कब तक वहां जाने की सदाशयता दिखाते रहेगें.. विनम्रता ,औदार्य ,शालीनता की आखिर कोई सीमा भी तो है या नहीं?
अब लोगों को कौन समझाए भैया ब्लॉग लेखन एक दुतरफा संवाद का माध्यम है ,यहाँ महज अपनी ढपली अपना राग नहीं चलने वाला ....यहाँ का सरोकार है दूसरे के कहे को भी सुनना,समझना और भागीदार बनना  ..उनके  यहाँ आते जाते रहना ...फिर अपनी भी कहना ...लेकिन मगरूर लोगों को कौन समझाए ....खुद को अर्श पर होने और बाकी को फर्श पर पड़े होने की समझ से भी ब्लॉगजगत जूझता रहा है ..अच्छी बात है कि ऐसे कई सारे तो किनारे को आ गए हैं..कुछ घोषित करके विनम्रता या बेहयाई से तो कुछ   अपनी औकात और सीमाओं को समझ बिना घोषित, बिना गीत गवनई के चुपचाप चलते बने  .....मतलब बिना बताये ही टंकी पर चढ़ अपने ब्लागीय जीवन का उत्सर्ग कर लिया ....इस अर्थ में ब्लॉग लेखन केवल "बड़कवा" लेखक बने रहने की आत्ममुग्धता नहीं है ,यह एक सामजिक  सरोकार का  संवाद मंच भी है ....डायरी लिखनी है तो तोप ढक के रखिये न यहाँ काहें उघारे फिरते हैं ?  सही है ब्लागजगत में कोई फन्ने खा नहीं है ....साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये नहीं तो बाद में कहीं यह न कहना सुनना पड़े ..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले ...
एक जमाना हुआ करता था हमें भी अपने एक बड़े लेखक होने का गुमान था ..बिना दमड़ी लिए लिखते न थे....एक अजब सा गुमान,बेखुदी  और मदहोशी तारी थी ....लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है ..भैया इस गुमान में न रहियो यहाँ ....हमने तो यह रहस्य पहले ही भांप लिया था और तभी बिना दमड़ी की अपेक्षा के यहाँ झख मार रहे हैं .. जो चीज है यहाँ वो कहीं पे नहीं ....तो यहाँ रुकने लिखने आपके विचार जानने,यथा संभव लोगों के यहाँ पहुँचते रहने की ,संवाद बनाए रखने की मेरी कोशिश ही रहती है ....बाकी कुछ रूठे हुए लोग भी है उनके प्रति भी मन में कभी कभी प्यार सा उमड़ा आता है मगर वे खुद उस उमड़ते प्यार को रोपने कटोरा लेकर नहीं आते तो वह व्यर्थ ही बह जाता है .. :) 
 हमने लेखन से बहुत कमाया है रोजी रोटी चल सकने लायक नहीं (उसके लिए एक अदद नौकरी तो है ही) ..मगर बहुत कम भी नहीं ..इस अर्थ में कि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान..इस ब्लॉग लेखन की अपार्च्यूनिटी कास्ट बताऊँ तो आप निरा बावरा समझेगें मुझे ....इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ ..अब ब्लॉग जीवन से फुरसत तो मिले.... है न यह पागलपन? मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे?  नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :) 
नोट: यह पोस्ट लिखी  जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय ! 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

क्या आप तैयार हैं रतजगा की भी कीमत पर बिग बॉस सीजन पांच को देखने के लिए?

बिग बॉस सीजन पांच शुरू हो गया है -इसकी लांचिंग सेरेमनी में मैं माहिला प्रतिभागियों की गिनती करते करते थक गया -कुल तेरह की (अ)शुभ संख्या में देवियाँ एक के बाद एक अवतरित होती गयीं और मैं नतमस्तक होता गया ..एक से बढ़कर एक हैं सब  ....एक तो चार्ल्स शोभराज की दीवानी हैं और शो के एकमात्र बिचारे (का ) पुरुष शक्तिकपूर(नाम बड़े और दर्शन छोटे)  को भी लुभाने की कोशिश में लग गयी हैं ...एक अर्धरात्रि में आईने में होठों पर लिपस्टिक फेरते हुए उन्होंने शक्ति से गुफ्तगू की कि वे उन्हें इम्प्रेस करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ने वालीं हैं .....एक प्रतिभागी को अभी जेल हुयी तो जेल से छूटते ही अपनी एक प्रतिस्पर्धी से बोल उठीं  कि जब उसे छोड़कर वे गयीं थी तो वह प्रेगनेन्ट नहीं थी मगर उसके जाते ही वह कैसे प्रेगनेन्ट हो गयीं ..एक ने दूसरी के लिए कहा  कि बड़ी आग है रे उसमें ....(मतलब कोई तो बुझाये ..आगे आग को बुझाने का विस्तार से वर्णन भी होगा ही ) 

एक बृहन्नला (यदि इस शब्द से आप अपरिचित हैं तो अपने  हिन्दी शब्दकोश ज्ञान को और बढाईये,हम नहीं बताने वाले)   प्रतिभागी भी हैं ....उनसे "सेक्सुअल अनुभव" की बातें शेयर करने पर कोई  आमादा दिखीं -यह आज की ...आधुनिक और असेर्टिव नारी हैं ....या पैसे कमाने को /व्यावसायिक समझौते के तहत किसी भी सीमा तक जाने को तैयार नारी और उनका इस्तेमाल करने की व्यवसायी सोच ....नहीं नहीं मैं कोई मोरल पुलिसिंग नहीं कर रहा बल्कि चाव से देख रहा हूँ ड्रामे को अनफोल्ड होते ....बस दिक्कत यही है कि यह काफी देर से आसमानी हो रहा है और वह मेरे लिए सोने का समय है ..यह बात अपने पाबला जी बखूबी जानते हैं मेरे बारे में यकीन न हो पूछ सकते हैं ...  हाल यह है कि इसेदेखते हुए  आँखें मुंदते मुंदते अचानक खुल सी जाती है कुछ बतकहियों और दृश्यों पर ......

यहाँ देवियों की इतनी बड़ी फ़ौज देखकर एक काफी पहले पढ़ा चुटकुला याद आ गया -दो सखियाँ आपस में बात कर रही थीं . एक ने दूसरी से कहा कि जानती हो सखी ये पुरुष लोग भी अकेले में वही बतियाते हैं जो अक्सर हम बतियाते रहते  हैं तो दूसरी बेसाख्ता बोल पडी ..हाय रे वे कितने गंदे होते हैं ..... :) बस जैसे इसी ग्रंथि से पैसा लूटने की शगल शुरू है बिग बॉस सीजन पांच में ....देखते जाईये महिलाओं की असली प्रतिनिधि दुनिया ...शौकत थानवी उर्दू के अच्छे व्यंग लेखक हुए हैं ..उनके एक व्यंग में मैंने पढ़ा था कि प्रगटतः आधुनिक देवियाँ बहुत सुशील दिखने का सारा प्रयास करती हैं मगर अँधेरे और अकेले में उनका कार्य व्यवहार बदल जाता है ....उन्होंने अपने एक लेख में इनकी इस कथित प्रवृत्ति की चुटकी लेते हुए एक उस वाकये का जिक्र किया था जब वे फिल्म देख रहे थे ...जब बगल से एक फुसफुसाहट भरी आवाज आयी कि छोडिये न मेरा हाथ क्यों पकड़ रहे हैं आप ..तो  वे अकबका के रह गए ...नहीं मैंने कब आपका हाथ पकड़ा? वे घबरा कर बोल उठे और किसी तरह सिमटे दुबके रहे ..शिव शिव करके इंटरवल हुआ तो उन्होंने मोहतरमा का दीदार करना चाहा मगर वे तो बड़ी बेरुखी से दूसरी ओर देख रही थीं...कुछ समय पहले इतनी निकटता दिखाने वाली देवि उजाले में दूरस्थ हो गयीं थीं ....इस प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति  कहीं और सुनी है आपने ? याद कीजिये!

तो क्या आप तैयार हैं बिग बॉस सीजन पांच को देखने के लिए ..रतजगा की भी कीमत पर ..हाँ जी हम तो तैयार  हैं ....आप सरीखा कोई साथी भी मिल जाय तो फिर क्या बात है?  


शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

टिकाऊ बनाम टरकाऊ ब्लागिंग!

जब तक विद्वान ब्लॉगर यह तय करें कि ब्लॉग लेखन एक विधा है या महज अभिव्यक्ति का माध्यम आईये समय बिताने के लिए किसी  और विषय पर चर्चा कर लेते हैं. जैसे टिकाऊ बनाम टरकाऊ ब्लागिंग! पहले टिकाऊ की अवधारणा समझते चले जो इन दिनों पर्यावरण और संसाधनों के संरक्षण के मामले में बहुत चर्चा में है -अंगरेजी में इसका समानार्थी शब्द 'सस्टेनबल' है....पर्यावरण विज्ञानी कहते भये हैं कि संसाधनों  का 'सस्टेनबल' उपभोग होना चाहिए न कि अंधाधुंध दोहन .....यहीं पर कुछ गांधीवादी माडल के पुरोधा बापू के ही एक विचार को बहुधा उद्धृत करते रहते हैं जिसके अनुसार धरती लोगों की जरूरते भले ही पूरी करने में सक्षम है मगर लोगों के लालच की पूर्ति  वह नहीं कर सकती .. आप इसे विषयांतर न माने और मानें भी तो मुझे ग़र क्षमा करते चलें तो यहाँ मैं यह भी जोड़ देना चाहता हूँ कि यह विचार गांधी जी को ईशोपनिषद के पहले ही श्लोक से मिला था  -ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् । ...  मतलब इस संसार में जो कुछ भी उपभोग्य है वह सब ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त है ,तुम्हारा कुछ भी नहीं है अतः उस पर गिद्ध दृष्टि के बजाय उसका त्याग की भावना से उपभोग करो ...कहते हैं गांधी जी को यह श्लोक बहुत भाया था .....अब निष्पत्ति यह है कि हमें अगर टिकाऊ ब्लागिंग करनी है तो त्याग की भावना और तटस्थता के साथ करनी होगी नहीं तो वह बस एक टरकाऊ ब्लागिंग बनी रहेगी! आईये बात को और खोल कर समझते हैं ... :)  

देखा यह गया है कि लोगबाग भावनाओं में बहकर ब्लागिंग कर रहे हैं ,नाते रिश्ते बना रहे हैं ..कई तरह की अपेक्षायें पाल रहे हैं..टिप्पणियों की संख्या गिन रहे हैं ..अपना कीमती समय जाया करके आलतू फालतू पोस्टों पर जा जाकर टिप्पणियाँ कर रहे हैं (अब जैसे यहाँ ही .. ), महज इस चाह में कि टिप्पणियों की खेप मिलती रहे ....यह तो निर्विकार निरपेक्ष भाव वाली ब्लागिंग,बोले तो टिकाऊ ब्लागिंग  हुई  ही नहीं ...और नतीजा होता है ऐसे ब्लॉगर जल्दी ही टंकी पर जा चढ़ बैठते  हैं ....अब तो लोग गुपचुप ,चुपचाप टंकी आरोहण कर जा रहे हैं ..बीते दिनों चुपके से कितने ही चल दिए पब्लिक को पता ही नहीं लग पाया और आज भी लोग बाग़  बेखबर है ..अब नाम न गिनाऊंगा , आप अपने ही अगल बगल सर घुमाकर देख लीजिये कौन गायब है! कृष्ण की गीता का सार भी कई लोग इसी बात को मानते हैं कि जगत और जागतिक चीजों का उपभोग तो करो मगर निस्पृह भाव से ...निष्काम भाव से ....गीता के विद्वान इसे निष्काम योग मानते हैं ....यहाँ आसक्ति भाव का पूरी तरह निषेध है -कर्म तो करो मगर बिलकुल तटस्थ भाव से ...टिकाऊ तभी होगा आपका कर्म! 

हमारे यहाँ एक बड़े जोगी और समान मात्रा में भोगी हुए हैं राजा जनक ...जिनके बारे में ज्यादा ब्लॉगर बिचारे जानते भी नहीं होंगें   .जानेगें भी कैसे, उन पर ज्यादा सामग्री आज भी उपलब्ध नहीं है ....बस यह समझ लीजिये वे नितांत भोगी देवताओं के राजा इंद्र के बिलकुल उलट थे ..जनक ने  भोग और योग को ऐसा साध लिया था कि बिना इन्वाल्व हुए वे दोनों क्षमताओं में समान रूप से निष्णात हो गए थे-एक ब्लागर को राजा  जनक जैसा होना चाहिए तभी वह ब्लागिंग में टिकाऊँ रह पायेगा नहीं तो बस उसकी ब्लागिंग टरकाऊ श्रेणी में ही रह जायेगी और एक दिन एक अनसंग हीरो की ही तरह वह टंक्यारोहण  कर जाएगा  ..कई कर भी चुके हैं... बिचारे /बिचारी ..असमय ही चलते बने... पहले तो टंकी -आरोहण पर बड़ा मान मनौवल होता था ....वादे कसमे दी जाती थीं ... पूड़ी पेड़े का निमंत्रण दिया जाता..कहीं  तब जाकर वे उतरते थे..एक बार ज्ञानदत्त जी ने नारी ख्यातिलब्धा रचना सिंह  जी से कहा था कि देवि उतर आओ अबसे हम आपकी पोस्टों पर जरुर टिप्पणियाँ करते रहेगें  ...शायद इसी भरोसे से वे फिर लौट आयीं और आज भी ब्लागजगत की शोभा  बनी हुयी हैं ...इसी तरह जब एक बार समीर लाल जी का भी इन्द्रासन डोल गया था तब हमने  अपने ब्रह्मबल के तेज से उसे थामने की कोशिश की थी  ..ऐसे ही कई बड़कवा ब्लॉगर और हैं ..ज्ञानदत्त जी भी ....और खुशदीप जी भी ....अब इसकी भी चर्चा क्या ..पुराने घावों को कुरेदना अपना ही नुक्सान करना है ....

कई ब्लॉगर लोगबाग अपनी टिप्पणी खिड़की बंद कर लिए हैं ..वर्स्ट आशंका यही है कि कहीं वे भी टंकी आरोहण पर न निकल जाएँ -टंकी की सीढियां ऐसी ही हैं -पहले अपनी खिड़की बंद करो ,फिर दूसरी खिडकियों में झांको तक नहीं और धीरे धीरे चुपके चुपके दुबके दुबके चल दो -हे हम नहीं जाने देगें अब किसी भी जाने पहचाने को ...फिल्मों में नहीं देखा क्या ..जरायम जगत  में आया हुआ  कोई फिर जाने पाता है क्या ...तो हम फिर अंतर्जाल जगत में भी नहीं जाने देगें ....बिग ब्रदर  इज वाचिंग यू ......समझाने बुझाने पर भी नहीं माने तो वैसे ही नोटा पकड़ हम आपको यहाँ खींच लायेंगे  जैसी बाघिन अपने बच्चे को गले  से पकड कर मांद से बाहर  लाती है ..आप से टिकाऊ ब्लागिंग की अपेक्षा है टरकाऊ की कदापि नहीं ...

आज यहीं तक ..कुछ समय के लिए इस टिकाऊ चिंतन को टरकाते हैं ....:) 

सोमवार, 8 अगस्त 2011

स्लीप टाईट :खटमल धीरे से आना खटियन में ...

अब हम तो पढ़े  देहाती प्राथमिक विद्यालय में -वह भी एक  कन्या विद्यालय ...आरम्भिक शिक्षा हिन्दी भी क्या लोकल ठेठ में ....अब कोई मित्र मुझे चैट के दौरान विदाई के समय 'स्लीप  टाईट' कहे तो दिमाग का ठनकना स्वाभाविक ही था.... अब क्या कहें जवाब में ....कुछ उल्टा पुल्टा कह दिया तो नया  नया आभासी सम्बन्ध खटाई में ....लिहाजा मैंने कुछ नहीं कहा ..हिम्मत कर बस  स्वीट ड्रीम्स कह  चैट आफ कर दिया ....अब क्या होता है -स्लीप टाईट का मतलब ...कुछ देर विचार मग्न हो रहा ......क्या यह कोई रूमानी उद्वेलन था? शयन -सहचरी के साथ टाईट हो सोने का .....जैसा कि २००३ के उन बेहद ठंड के दिनों में एक बुजुर्ग से ही सलाह मिली थी कि ठण्ड से बचने में शारीरिक ऊष्मा बड़ी मददगार होती है इसलिए बेहद ठण्ड के दिनों में यह नुस्खा - शैया सहचरी/सहचर  के साथ के साथ टाईट हो सोने की आजमाईश की जानी चाहिए ....अब बुजुर्गों की बात तो हम गाँठ बाँध  कर मानते आये हैं ....लेकिन एक नयी नयी मित्र का यह चैट सन्देश -स्लीप टाईट ,सहसा ही निःशब्द कर गया था ....उधेड़बुन के समय गूगल बाबा याद आते हैं -गूगल शरणं गच्छामि ......
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कभी ऐसी भी होती थी खटिया?  

अब इत्ती सी बात पर गूगल साहब तो फैले हुए नजर आये ....स्लीप टाईट की इतनी विस्तृत विषद व्याख्या संकलित कर डाली है कि बस कुछ मत पूछिए ....कहते हैं सदियों पहले बिस्तरे छल्लों से युक्त होते थे ...उन्हें बिना टाईट किये अच्छी नीद नहीं आती थी... इसलिए दरअसल यह प्रकारांतर से  बिस्तर यानी खटिये को टाईट करने की शुभकामना थी ....वैसे ही कुछ जैसे एक फिल्म में यह सलाह दी गयी थी कि सटाई लो खटिया जाडा  
लगे टाईप ...मतलब कुछ जुगाड़ करने की सलाह .........मगर विद्वान् लोग इस व्याख्या से अपनी विद्वता के चलते सहमत नहीं हुए ..उन्हें कहा कोई खटिये को भला कोई क्यों शुभकामना देगा? मैं भी यही सोचता हूँ अब मेरी मित्र क्यूंकर  मेरे बिस्तर को शुभकामना देगीं ..फिर? ....गूगल बाबा फिर उवाचे ....कोई कहे कि यह खटमलों से बचने की शुभकामना है -न काटेगें खटमल और न सोने वाला हिलेगा डुलेगा, चैन की टाईट नींद नसीब होगी  ....खटमल धीरे से आना खटियन में जैसा ही कुछ ...  हम गूगल पर पन्ने दर पन्ने पलटते जा रहे थे ..मन का कुछ पाने को तभी यह नर्सरी राईम दिख गयी ....
Good night, sleep tight,
Don’t let the bedbugs bite,
Wake up bright
In the morning light
To do what’s right
With all your might.

खटमल धीरे से आना खटियन में ...
ओह तो यह बच्चों का मामला है ....सारी अभिलाषायें धडाम हुईं :) मतलब केवल इतना कि स्लीप टाईट का मतलब बस केवल इतना कि स्लीप वेल ....किसी को टाईट पकड़   कर नहीं ..अच्छे बच्चे की तरह बस सो जाना ......ऐसी ही  कई कहावते हैं जिसका मतलब न समझिये तो अर्थ का अनर्थ होना पक्का .....अब जैसे स्केप गोट-इसका मतलब है बलि का बकरा बन जाना ....गड़ेरियों की भेंड बकरियों के झुण्ड में कोई एक भाग न पाने वाले जेनेटिक दोष का  बकरा / भेंड/बकरी भी होती है .चारागाहों के  आसपास भेड़ियों के आक्रमण पर यह भाग नहीं पाता और जब तक भेड़िया इससे निपटता है ..भेंड जमात बिना तनिक नुक्सान के भाग  लेती है ..गड़ेरिये जन बूझ कर ऐसी भेड़ें भी रखते हैं पालते पोषते हैं जैसे अपने  कलमांडी साहब जो इन दिनों स्केप गोट बने हुए हैं ...
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ऐसे ही सोर ग्रेप्स का मामला है -अंगूर खट्टे हैं!  और ..स्पिल द बीन्स मतलब  कोई राज खोल देना .....अब मेरी इस पोस्ट से कोई राज खुला क्या ?..नहीं तब तो आपको अभी और इंतज़ार करना होगा !:) स्ट्रेट फ्राम हार्स'स माउथ....  बी  पेशेंट .....

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