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रविवार, 15 जून 2014

क्या पुरुष को बस यही चाहिए?


एक ही धरती एक ही कालावधि मगर लोगों की सोच और रुचियाँ अलग अलग देशों में कितनी भिन्न हैं और हैरत में डालने वाली हैं . क्या सही है और क्या गलत यह भी पूरी तरह सापेक्षिक है . आज फेसबुक दोस्त शालिनी श्रीवास्तव ने एक लिंक साझा किया . यह मामला है एक पश्चिमी दुनिया में पली बढ़ी युवती का जिन्हे सेक्स की लत  है और वे इसकी खुले आम जिक्र भी करती हैं -पब्लिक डोमेन में उन्होंने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है. और अपने सेक्स अभिरुचियों और झुकावों का ईमानदारी से जिक्र भी किया है. इस लेख की चर्चा अन्यत्र जगहों पर इसकी बेबाकी और ईमानदार स्वीकृतियों के चलते है। आप को पूरा आलेख पढ़ने के लिए ऊपर के  अंग्रेजी लिंक पर जाना होगा मगर मैं हिन्दी प्रेमियों के लिए यहाँ कुछ उद्धरण देना चाहता हूँ.

क्रिस्टीन व्हेलेन  ४० वर्ष की मोटी महिला हैं। एक रिलेशन में थीं जो दस वर्षों चला मगर टूट गया। अब उन्हें सेक्स की सनक सवार हो गयी - अपने सर्किल के किसी मित्र, जान पहचान वाले  के साथ सोने को तैयार। और यह सिलसिला चल पड़ा. उन्होंने अपने अनुभवों को समेट कर यह प्रकाश डाला है कि आखिर पुरुष चाहते क्या हैं? और इससे भी बढ़कर कि उनकी खुद की क्या ख्वाहिश होती  है . उनके सेक्स संबंधियों में कई आयु वर्ग के लोग हैं. टीनएजर्स भी . उनकी स्वीकारोक्ति को कुछ आलोचकों ने वर्ष २०१४ का एक बड़ा खुलासा माना है.

मोहतरमा क्रिस्टीन व्हेलेन ने खुद के बारे में बताया है कि वे बहुत इंटेलिजेंट हैं ,मनोविनोदी हैं ,कभी कभार स्टाइलिश ,अपने बारे में बेफिक्र और वास्तव में बहुत अच्छी हैं। वे कहती हैं कि आकर्षण एक निजी मामला है और उनमें वह बहुत कुछ नहीं है जो बहुतों के लिए उन्हें आकर्षक बनाए। उनकी अपनी सेक्स अभिरुचियाँ /वितृष्णायें हैं और इसलिए और लोगों के समान व्यवहार से भी उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता ।क्रिस्टीन ने अपने एक दीवाने से पूछा कि उसे एक थुलथुल चालीस वर्षीय महिला में आखिर क्या आकर्षक लगा? जवाब था क्रिस्टीन तुम्हारा जबर्दस्त आत्मविश्वास ! कांफिडेंस इज सेक्सी! 

मैंने यह क्रिस्टीन कथा एक सनसनी पोस्ट के लिए ही नहीं की है . यह भारतीय समाज के सेक्स वर्जना को  सापेक्ष रखने और उस पर खुली चर्चा के लिए पोस्ट किया है मैंने . बहुत से लोग तुरंत क्रिस्टीन को वैश्या कह देगें -काल गर्ल कहेगें! मगर उसके निर्भीक आत्मकथन, स्पष्टवादिता को तवज्जो नहीं देगें .हमारा कल्चर इतनी स्वच्छंदता को अनुमति नहीं देता बल्कि सेक्स को पाप की सीमा तक यहाँ घृणित समझा जाता है -एक उचित स्थिति कहीं बीच में है . है ना ?

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

ब्लागिंग का 'गर्भकाल' और फुरसतिया को बधाई!

आज फ़ुरसतिया यानि अपने अनूप शुक्ल महराज को ब्लागिंग करते नौ साल बीत गए . उन्होंने नौ शब्दों से अपनी पारी शुरू की  थी और आज नौ साल पूरे हुए तो वे थोडा संजीदे और अतीतरागी बन उठे हैं -और यह सहज ही है. मेरे मन में यह देख एक उपमा उपजी है -नौ वर्ष के ब्लागिंग के गर्भकाल की . मनुष्य का गर्भकाल भी नौ माह का है और आज फ़ुरसतिया के भी जब ब्लागिंग के नौ साल हुए तो यह अवसर ऐसे ही हाथ से जाने देने का तो नहीं है . हम इस अवसर को ब्लागिंग के इतिहास में अमर बना देना चाहते हैं . क्यों न अनूप जी के महनीय ब्लागिंग अवदान को देखते हुए इस अवसर पर उनके ही इस नौ साला मानक को एक सार्थक,सकारात्मक रूप दे दिया जाय . आखिर ब्लागिंग के नौ साल को ऐसे ही हंसी ठिठोली करते काट देना कोई मामूली बात तो नहीं है . तो यह मानक ब्लागिंग का गर्भकाल माना जायेगा और इतने समय जो यहाँ  टिका रह जाय समझिये वही धाकड़ ब्लागर है . वही  पहचान और प्रतिष्ठा के काबिल है - बाकी तो अजन्में शिशु से हैं . अनूप जी की किलकारियां आज यहाँ ध्वनित हैं -कोई तो सोहर आदि का आयोजन करो न भाईयों, लुगाईयों .
                                                       पूरा हुआ ब्लागिंग का गर्भकाल: बधाई 
फुरसतिया जी सचमुच जीवट के ब्लॉगर निकले .एक एक फन्ने खां और लौह संकल्पनाएँ आयीं और चली गयीं .अनेक झंझावात आये,चिल्ल पों मची ,निकल बाहर देख लेगें के उदघोष तक गूंजें मगर फ़ुरसतिया अपने  व्यंग बाणों  का समर्पित और और अनवरत संधान करते ही रहे -भले ही कभी कभार थोडा शिथिल हुयें हों मगर इनकी तुरीण  व्यंग -बाणों से कभी खाली नहीं हुई . एक समय था जब ब्लागिंग के त्रिदेव में इनके साथ दो और देव थे मगर अब ये  हैं अकेले हैं . और अकेले ही काफी हैं . मैंने भी कई बार इनके आघात प्रघात झेले हैं और खुद को धन्य मानता हूँ कि अपना  भी गर्भकाल निकट आ रहा है . मगर इसके लिए मुझे कई शास्त्रोक्त कर्मकांड आदि कराने पड़े हैं . :-) अन्यथा इनके तिक्त बाणों के सामने टिक पाना आसान नहीं है .
आखिर ऐसा क्या है फ़ुरसतिया में? कुछ तो है यह उनके धुर विरोधी भी मानते हैं -लेखन की एक मौलिकता है,स्टाईल है और सबसे बढ़कर ब्लागिंग के प्रति  समर्पण है और छपास की उत्कट अभिलाषा भी जो इन दिनों  मुद्रण माध्यमों में उनके दनादन लेख भेजने से प्रमाणित हो रही है -जबकि वे ऐसी भयंकर भूल क्यों कर रहे हैं यह समझ में नहीं आ रहा है -क्या पूत के पाँव ऐसे ही दिखने थे? फुरसतिया जनाब एक वक्त खुद मुद्रण माध्यम से बिदकते थे और उन  ब्लागरों की खिंचाई किया करते थे जो अंतर्जाल से मुद्रण माध्यम की  ओर लपकते थे… मगर आज वे उसी  पर मार्ग पर खुद चल पड़े हैं . मैं दंग हूँ ! बात मानिए फ़ुरसतिया जी यह  उलटा दांव लगा बैठे हैं आप! छि छि  ब्लॉग जगत  में जन्मने के बाद फिर उसी बासी ,बिकाऊ, सड़ी गली गिरवी पत्र पत्रिकाओं के गलीज में लौटना? संपादकों से रिरियाना? रचना छपवाने के लिए मनुहार और टकटकी लगाकर छपने का इंतज़ार? फिर काहें को ब्लॉगर हुए आप? मुद्रण जगत से ब्लॉग जगत में आना तो समझ  में आता है मगर यहाँ से उल्टा फिर उसी घुटन भरे माहौल में लौटना? यह कैसा पौरुष? आप भी अब यहाँ से चल निकलने के फिराक में हैं?
आखिर हमारा कोई  मूल्य ,सिद्धांत वैगेरह है भी? ब्लागरों के अगुओं में आप रहे हैं मगर अब आप को भी कागजी ग्लेज भाने  लगा है ? न न यह आपके लिए कतई शोभनीय नहीं है . मुझे पता है कुछ ब्लॉगर थोड़े से पारिश्रमिक की मोह में अखबारों से आस लगा बैठे हैं। मगर आपके साथ तो ऐसा भी नहीं है -हर  माह के लखपती वैसे ही हैं आप! या फिर यह समझा जाय कि लद चुके  ब्लागिंग के दिन और अब पलायन के दिन है .....चल उड़ जा रे पंछी यह देश .........
सुबह ही फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पढी थी तो ये सारे विचार मन में घुमड़ रहे थे . एक  ब्लॉगर उद्विग्न था यह सब सुनाने  को ....सहज उदगार ,बेलौस बात ,और झटपट पोस्ट ही ब्लॉगर पहचान है. और यह पहचान कम से कम मैं तो खोने वाला नहीं . लोग अब ठकुर सुहाती को छोड़ यहाँ और कुछ नहीं चाहते -कोई मुद्दा भी हो तो भी बगल से सटक लेते हैं . ये ब्लागिंग  के लिए और ब्लॉगर के लिए भी शुभ लक्षण नहीं है . अब तो लोग लड़ते झगड़ते भी नहीं ..माहौल कितना कब्रिस्तानी सा हो गया है न? वो जीवन्तता और वह मनसायनपन कहाँ गया? फ़ुरसतिया जी यहाँ की जिम्मेदारी ऐसे ही न छोड़ जाईये -आप अब ब्लॉग - दशक पुरुष बनने की राह  पर हैं। शुभकामनाएं और बधाई! 
 

बुधवार, 20 जून 2012

पगड़ी वाले के सलाम का सबब


पगड़ी वाले मतलब अपने वही ब्लॉगर शिरोमणि पाबला साहब .परोपकारी और सेवाभावी हर दिल अजीज  सरदार जिनकी मदद की दरकार हममें से बहुतों को रही है और गाहे बगाहे उनसे मदद लेकर हम धन्य होते रहे हैं .वे एक ख़ास अर्थ में सलाम भी करते हैं .जब किसी ब्लॉगर भाई बंधु बांधवी की कोई पोस्ट मुद्रण माध्यमों में छपती है तो उनका फ़ौरन सलाम उस ब्लॉगर तक आ पहुंचता है .मुझे उनके ऐसे कई सलामों का सौभाग्य प्राप्त है . फिर उनका सलाम आ पहुंचा .मगर सलाम के साथ एक गुजारिश थी कि मेरे इस ब्लॉग शीर्षक का मतलब क्या है? 

यह वह अहसज करता सवाल है जिससे मुझे अक्सर दो चार होना पड़ता है .मैंने इस पर पहले भी दो पोस्टें झोंक रखी हैं-यह और यह .  मगर फिर भी प्रायः यह सवाल मेरे मित्र सुधीजन पाठक करते ही रहते हैं .और मैं हैरान होता रहता हूँ कि इत्ती सी बात आखिर इतनी बार क्यों पूछी जाती है? . इस बार भी मुझे हैरानी हुयी कि अरे पाबला साहब भी इतनी मासूमियत के साथ और इतनी देर से यह सवाल कर रहे हैं! बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते :)..... हैरत के साथ मैंने पाबला साहब को फोन पर ही बताना शुरू किया ....क्वचित माने कुछ ,अन्यतो माने अन्य या अन्यत्र और अपि माने भी ....मतलब क्वचिदन्यतोपि ....कुछ अन्यत्र से भी ...मगर यह अन्यत्र से होने की बात उठी ही क्यों ....? 

मैं अंतर्जाल पर सक्रिय यही कोई 2007 से ही हुआ और अपनी हाबी के मुताबिक़ ऐसे प्लेटफार्म ढूँढने लगा जहां से विज्ञान से जुडी बातों का आम लोगों, मतलब वे जिनसे विज्ञान का साबका अमूनन नहीं रहता तक पहुंचा सकूं .उन दिनों समूहों का जमाना था ..याहू पर कई समूह चौड़े से चल रहे थे मैंने भी अपना एक समूह विज्ञान कथाओं को लेकर बनाया  जो आज भी धड़ल्ले से चल रहा है .मगर जो आनंद ,जो संतुष्टि अपनी मातृभाषा में काम  करने की होती हैं वह अनिर्वचनीय है . और तभी ब्लागर पर मैंने साईब्लाग बनाया जो विज्ञान संचार  का  नियमित हिन्दी का ब्लॉग बना ..एक द्विभाषी ब्लाग साईंस फिक्शन इन इण्डिया भी बनाया ....ये दोनों ब्लॉग प्रचलित हिन्दी ब्लागों में अपनी कुछ जगहं बनाने में कामयाब हुए . 

मुझे फिर भी लगता रहा कि ऐसा बहुत कुछ है जो इन दोनों ब्लागों के फलक से छूट रहा है .विज्ञान की अपनी सीमाए हैं, अपना अनुशासन है और उसे तोडा नहीं जा सकता ..हाँ साहित्य तो सीमाहीन है ....और मुझे विज्ञान के इतर भी बहुत कुछ कहने की तलब महसूस होती और तभी मेरे मन में नाम सूझा -क्वचिदन्यतोपि! 
रामचरित मानस जो मेरे सर्वप्रिय पठन साहित्य में से हैं में संतकवि तुलसी प्रस्तावना में ही लिखते हैं -

नाना पुराण निगमागम सम्मतम यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि, स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा निबंधमति मंजुल मातनोति...अर्थात मानस की रचना के लिए नाना पुराण, निगम यानि वेद और आगम मतलब तंत्र साहित्य और आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण तथा कुछ अन्यत्र से भी (क्वचिदन्यतोपि) संदर्भ सामग्री  इस्तेमाल हुई है .बस यहीं से उस संतकवि का  मन ही मन आभार   के  साथ  मैंने यह शब्द ले लिया -इस नए भावबोध के साथ कि विज्ञान से इतर विषयों की चर्चा यहाँ करूँगा .अब हुआ यह कि पब्लिक यहाँ ज्यादा आने लगी तो  मैंने अब विज्ञान की हलकी चाशनी यहाँ भी देनी शुरू कर दी है ..आदमी अपनी फितरत से कब बाज आता है . :)


इतनी बातें पाबला साहब से मैंने फोन पर ही बतिया डाली ..वे भी अजब फंसे कहाँ सलाम के लिए फोन मिलाया था मगर पूरी मुसीबत ही पगड़ी पर आ गिरी ..सारी सर ..और मित्रगण आपसे भी मुआफ़ी इस पुराने पिटे विषय पर आपका समय एक बार फिर जाया करने के लिए ....


शुक्रवार, 15 जून 2012

ग़ज़ल गायकी के लीजेंड का यूँ चले जाना...


यह तब की बात है जब मैं एक स्नातक छात्र था .यानी १९७६ के आस पास .मेरे चाचा जी उन्ही दिनों फेलोशिप पर जर्मनी जा रहे थे तो एक पैनासोनिक का टेप रिकार्डर घर पर दे गए जिसे उन्होंने दिल्ली में खरीदा था .उन दिनों टेपरिकार्डर गाँव के लिए एक अजूबा था .अब टेपरिकार्डर जैसा आवाज का एक अजूबा और नया 'बाईस्कोप' मिल जाय तो फिर क्या कहना ..गवईं लोगों की आवाजें टेप की जातीं और फिर उनको सुना देने पर वे भौचक रह जाते ..रेडिओ एक कोने में उपेक्षित हो गया और टेप रिकार्डर की करामातें चल पडीं ..उन्ही दिनों पिता जी मेहदी हसन की चंद चुनिन्दा ग़ज़लों का पालीडोर कंपनी का ओरिजिनल कैसेट घर ले आये थे ..और दिन रात वह बजता था .....मैं उससे बेफिक्र था .मुझे मेहदी हसन के बारे में कुछ पता नहीं था ..
पिता जी ने सबसे पहले इस अजीम शख्सियत और पाकिस्तानी फनकार से मेरा परिचय कराया था ..पकिस्तान में कुछ अच्छा भी हो सकता है उसकी यह पहली मिसाल थी ...पिता जी ने कहा कि देखो मेहदी हसन कितने अलग अंदाज़ में दिले नादां तुझे हुआ क्या है गाते हैं. मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल दूसरे फनकारों को गाते हुए सुनी थी .मेहदी हसन की आवाज़ में यह बिलकुल अलग क्लासिकी तरीके से गाई हुयी लगी .....और सच बताऊँ पहली बार तो ख़राब सा लगा मेहदी साहब से यह ग़ज़ल सुनना ..मगर ज्यों ज्यों सुनता गया ..उसकी तासीर गहन होती गई और आज तो यह ग़ज़ल किसी और की गाई अच्छी ही नहीं लगती ..
आगे तो मेहदी साहब जैसे जीवन का एक हिस्सा ही बनते गए .. जैसे एक मजेदार  याद है जब मैं मुम्बई में दो सालाना विभागीय ट्रेनिंग पर था तो वहां पहली बार सांख्यिकी पर एक पूरे पेपर की तैयारी करनी थी ..मुझे सांख्यिकी के सिद्धांत मेहदी हसन साहब की ग़ज़लों की तासीर लिए लगते थे ...और मैंने उनकी ऐसी ब्लेंडिंग तैयार की कि उधर सांख्यिकी के  कोई चैप्टर पर पढाई चलती तो उस्ताद की कोई न कोई ग़ज़ल पार्श्व में बजती रहती थी और साथी मुझे इनका दीवाना सिरफिरा क्या क्या न कहते थे -आखिर में जब नतीजा आया तो सैद्धांतिक सांख्यिकी में मुझे सर्वोच्च स्थान मिला था ..आप भी यह फार्मूला अपना सकते हैं :)

मेहदी हसन सरीखे फनकार को सुनने समझने पसंद करने का एक प्रोटोकोल है .उनकी आवाज़ और अंदाज़ तथा हुनर की बारीकियों को पसंद करने के लिए उनकी गायकी में तनिक समय जाया करना होगा ..उसे शुरू शुरू में पेशेंस के साथ / सकून से सुनना होगा -यह एक सीखने का सबब है .एक क्लास है जहां आपको मन लगाना है .आप पायेगें धीरे धीरे आप इनकी गायकी में रूचि लेने लगे हैं और फिर यह तासीर बढ़ती ही जायेगी ...मेहदी हसन को पसंद करने के लिए पहले आपके मस्तिष्क के कुछ तंतुओं को संवेदित होना होगा अगर वह इलाका पूरी तरह निष्क्रिय ही न हो गया हो .. :) और इसमें शुरुआती समय लग सकता है .मगर फिर आपको इसकी तलब लगनी शुरू हो जायेगी ...दुनिया में कितने ही नशे हैं उसमें एक प्यारा सा नशा है ग़ज़लों का और उसमें भी अगर आप मेहदी हसन को पसंद करते हैं तो आप एक अलग क्लास के व्यक्ति हैं . उनसा दूजा कोई नहीं है . दुनिया का बड़ा सा बड़ा ग़ज़ल गायक मेहदी हसन को शीश झुकाता रहा है .वे ग़ज़ल गायिकी के लीजेंड बन गए .

एक और बात है जो मेहदी हसन की गायकी के करीब हमें ला सकती है .यह है दिल का साफ़ होना ,बिना छक्का पंजा के और चालाक दुनियादारी से दूर होना ..वे भी ऐसे ही थे निष्कपट ,सहज सरल और विनम्र ...हर वक्त दुनियादारी में डूबे व्यक्ति के लिए कहाँ शेरो सुखन और वह भी मेहदी हसन की गायकी? इसके लिए निष्कपटता तो मानों एक अनिवार्य शर्त है ..मैंने खुद पाया है जिन्हें मेहदी हसन पसंद हैं वे बहुत सीधे सरल लोग हैं और एक ख़ास तरह की संवेदनशीलता लिए हुए हैं . यह एक अलग सा विशिष्ट ग्रुप ही है जिसे आप मेहदी हसन फैन ग्रुप कह सकते हैं .

वह पहला कैसेट जिसने मुझे इस अजीम हस्ती से मिलाया था 
मुझे ३६ साल पहले घर में आये उस कैसेट जो आज भी मेरे संग्रह का एक नायब आईटम है की एक एक ग़ज़ल के हर्फ़ दर हर्फ़ याद हैं ..उनके साथ जिए जीवन के कितने ख़ास पल छिन भी जैसे तरोताजा से हैं . चाहे खुशी के पल हों या गम के ये गज़लें मुझे एक सा आनंदित करती रहीं हैं .....दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुःख सहते हैं ...अर्जे नियाज़ इश्क के काबिल नहीं रहा .....मग्घन बात पहेली जैसी .....दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है ......क्यूं दामने हस्ती तक बढ़ने दिया हाथों को ....और भूली बिसरी चंद उमीदें चंद फ़साने याद आये .....यह आख़िरी वाली तो जब भी सुनता हूँ पूरा अतीत ही मानों सामने आ साकार हो उठता है ...इसके बाद की तो उनकी कितनी और गज़लें आयीं और दिल दिमाग पर कब्ज़ा करती चली गयीं .....
रंजिश ही सही .... मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो......बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ......गुलों में रंग भरे ....इन सभी की एक सूची नजरिया वाले ब्लॉगर ने भी दी है -वे भी मेहदी साहब के दीवाने रहे हैं .....तीन दशकों के एक लम्बे साथ के बाद मेहदी हसन साहब का जाना दुखी कर गया है मगर तसल्ली यही है कि उनकी गज़लें उनकी दिलकश आवाज़ आज भी हमारी एक बेशकीमती धरोहर है .....ऐसी शख्सियतें कहाँ फ़ना होती है वह तो हमारे अहसासों हमारी चेतना में मानो पैबस्त रहती है जैसे बस गर्दन झुकाई और देख ली सूरत यार की .....अमर हैं मेहदी हसन साहब!

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एक उदास शाम,देव दीपावली और पुण्य श्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज बनारस का एक लख्खी मेला देव दीपावली है ..लख्खी का मतलब जहाँ कम से कम एक लाख की भीड़ होती हो ....यहाँ पहले से कई लख्खी मेले विख्यात हैं -जैसे नाटी इमली का भरत मिलाप ,चेतगंज की नक्कटैया ,तुलसीघाट की नाग नथैया तथा सिगरा के पास की रथयात्रा जिसके नाम पर एक चौराहे का ही नामकरण हो गया है ....इन सभी अपार जनसमूह वाले मेलों में लगभग एक दशक से देव दीपावली का भी नाम आ जुड़ा है और इसे वैश्विक पर्यटन का आकर्षण दे दिया गया है -देश विदेश से पर्यटकों का एक बड़ा हुजूम आज यहाँ आ पहुँचता है ...और बनारस के गंगा घाटों पर असंख्य दीप जगमगा उठते हैं ....आतिशबाजी भी होती रहती है और अस्ताचल को बढ़ते चंद्रमा की रश्मियाँ गंगा जी में एक स्वर्ण पट्टी बिखेरती चलती हैं ....

देव दीपावली पर बनारस के बस एक घाट का नज़ारा (सौजन्य गूगल ) 

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद घाट (पारम्परिक दशाश्वमेध घाट)  पर गंगा आरती का दृश्य और पार्श्व में शिव तांडव स्त्रोत का पाठ - अद्भुत  दृश्य और अध्यात्मिक अनुभव -जीवन का एकबारगी का समग्र अनुभव देता है ....मैं स्वजनों के साथ, परिवार के साथ ,राज्य अतिथियों के साथ पिछले लगभग हर वर्ष इस मेले का आनन्द उठाता आया हूँ -इस बार न बच्चे हैं ,न घर (तेलितारा ,जौनपुर)  से कोई आया और न ही कोई मेहमान ही सो मेले में नहीं गया हूँ और बैठे ठाले विगत जीवन के कुछ सिंहावलोकन की ओर अनायास उन्मुख हो इस शाम को ही उदास कर बैठा हूँ -लोगों के बनावटी पन,चालाकी ,मित्रों के विश्वासघात,ब्रीच आफ ट्रस्ट आदि के मंजर अचानक ही याद हो आये हैं -कोई बच्चा मेला जाने से बिछुड़ गया हो तो वह ऐसी ही कई विचारों,अकेलेपन और असहायता  से गुजरता है ..बस समझ लीजिये ऐसा ही कुछ बेहद खराब सा अनुभव हो रहा है ...
देवेन्द्र  पांडे जी ने मेले से लौट कर  देर रात भेजा यह  चित्र -देखिये स्वर्ण पट्टी  


कहते हैं देव दीपावली के कई मिथकीय कारणों के साथ ही इस समारोह को महारानी अहिल्याबाई होलकर से भी जोड़कर देखा जाता है ...मैं आज से अच्छा और उचित अवसर कोई और नहीं समझता जब इस अवसर पर मैं इस महान भारतीय नारी के बारे में आपसे कुछ साझा न  करूं..महारानी लक्ष्मीबाई से यहाँ का बच्चा बच्चा परिचित है -उन पर कवियों की खूब लेखनी चली है ....फ़िल्में और सीरियल भी आयें हैं मगर आश्चर्य है कि अहिल्याबाई होलकर के बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं ...विकीपीडिया के अंगरेजी और हिन्दी संस्करणों ने इस महान महिला के बारे में यहाँ और यहाँ जानकारी दी है -अंगरेजी की जानकारी प्रभूत और पर्याप्त है ..अगर आपके समय हो तो अवश्य चंद मिनट वहां दें ..कई प्रान्तों में हिन्दू मंदिरों का पुनरोद्धार इन्हीने कराया ..काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का एक तरह से जीर्णोद्धार ही इनके द्वारा हुआ ..गया के विष्णुपाद मंदिर को भी इनकी ही कृपा से नया रूप रंग मिला ....
पुण्य श्लोक राजमाता अहिल्याबाई होलकर 

इसके बावजूद एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार काशी के लालची पंडों  ने इनके विश्वनाथ मंदिर में घुसने के समय इनके मार्ग पर हीरे जवाहरात बिछाए ताकि शूद्र के चरण से स्पर्शित हो पवित्र स्थल अपवित्र न हो जाय और बाद में मंदिर के गर्भगृह और आस पास के  प्रांगण  को  गंगा जल से धुलवाया ....तत्पश्चात महारानी ने यहाँ के पोंगा पंडितों को तब सीख दी जब वे गंगा स्नान के बाद जल धारा  से बाहर नहीं निकल रही थीं -अपनी सेना भेजकर उन्होंने उन्ही लालची पंडों को बुलाया और कहा अब तो मेरे स्नान के बाद  पूरी गंगा ही अपवित्र हो गयीं है इसे पवित्र करो तभी मैं बाहर आऊँगी ....लज्जित पंडों ने उनसे माफी मांगी ....ऐसी ही पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर ने हजारा दीपस्तम्भ से यहाँ के एक गंगा घाट -पञ्चगंगा घाट पर देव दीपावली की शुरुआत की जो आज एक वैश्विक मेला बन चुका है .
लख्खी मेले पर उमड़ा जन सैलाब (यह चित्र भी देवेन्द्र पांडे जी के सौजन्य से ) 

केवल इस मेले को ही देखकर आप बनारस आने का औचित्य साध सकते हैं और जीवन को धन्य कर सकते हैं ...मेरी बात का भरोसा कीजिये एक अनिर्वचनीय अनुभव के साथ आप वापस जायेगें ...और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपने संस्मरण छोड़ जायेगें ..इस पोस्ट को पूरी करते करते मैं अपने अवसाद से मुक्त हो रहा हूँ .....बाकी तो बेचैन आत्मा एलियास देवेन्द्र पाण्डेय जी ने आश्वस्त किया है कि इस बार  मेरे संती (हिस्से का ) भी मेला वे देखेगें और उसकी चौचक रिपोर्ट आपको  तक पहुचायेगें  ......मुझे उन्होंने फोटो उपलब्ध करने का भी वादा किया है मगर मुझे सब्र कहाँ और इस उदास शाम के गम को गलत करने का कोई और सहारा भी तो नहीं था -सो थोड़ी सृजनात्मकता का सहारा ले लिया और यह पोस्ट लिख दी है ......
शुक्रिया देवेन्द्र पाण्डेय जी आपके फोटो अवदान के लिए 
और देर रात आयी देवेन्द्र जी की यह आँखों देखी टटकी रिपोर्ट 

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

यादों की एक सुहानी शाम

आज बंगलौर से बेटे कौस्तुभ का आगमन हुआ ...और  आज २३ तारीख को  उनका तेईसवां जन्मदिन भी है और  एक ख़ास मेहमान केक काटने के अवसर पर आज  आमंत्रित थीं ...अमेरिकावासी डॉ.रोशनी राव nee शुक्ल जो वहां के मशहूर एम डी एंडरसन कैंसर इंस्टीच्यूट टेक्सास में सर्जन हैं ...और इन दिनों भारत भ्रमण पर आयी हुई हैं...अपने काबिल पिता डॉ. एस. डी. शुक्ल की काबिल पुत्री डॉ.रोशनी राव धर्मपत्नी की सगी भतीजी हैं ..जन्मी तो भारत में थीं मगर बचपन में ही इंग्लैण्ड गयीं और अमेरिका जाकर वहां की नागरिक बन गयीं ...
केक टोस्ट आफरिंग: गेस्ट आफ आनर डॉ रोशनी राव  और कौस्तुभ 

डॉ रोशनी राव हिन्दी तो  कुछ बोल समझ लेती हैं मगर पढ़ लिख नहीं पातीं ...वे मेरा ब्लॉग देखती  हैं मगर खुद पढ़ नहीं पाती जब तक कि पापा या मम्मी उन्हें पढ़कर न सुनाएँ ...बेटे के जन्मदिन की शाम को उनके आने से सादे जन्मदिन कार्यक्रम में काफी  वैल्यू एडीशन हो गया ....बच्चे, उनकी मम्मी हम  सब खुश हो गए ...कौस्तुभ की खुशी का तो कुछ पूछना ही नहीं था ...सात समुद्र पार से कोई अपना ही इस अवसर पर संयोग से आ पहुंचा था ..इस लिहाज से यह जन्मदिन  ख़ास बन  गया ......


डॉ .रोशनी ने कैंसर के कई मरीजों की सफल सर्जरी की है जिसमें एक हेंडा सल्मेरान ही हैं जो पिछले वर्ष बनारस आयीं थी और हम लोगों के साथ पूरे चार दिन बनारस में घूमती फिरी थीं और अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और डॉ.रोशनी राव  के गुण गाया करती हैं ....हेंडा की अपनी राजनीतिक अभिरुचियाँ भी हैं और अभी अभी टेक्सास राज्य में अधिसूचित हेन्डाज ला जिसमें ब्रेस्ट कैंसर की आरम्भिक जानकारी प्राप्त करने के नागरिक अधिकार को सहमति मिली है  इन्ही के अथक परिश्रम की देन है .हेंडा अब एक सेलिब्रिटी हैं ...हमें फख्र है कि हम इस बला की हिम्मती और महात्वाकांक्षी महिला के साथ कुछ बनारसी दिन बिताने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं .. वे डल्लास में प्रापर्टी डीलर भी हैं और उनके सौजन्य सहयोग से डॉ.रोशनी राव को अब डल्लास में एक खूबसूरत बंगला मिल गया है ....डॉ. रोशनी राव के वर्तमान इंस्टीच्यूट -एम डी एंडरसन कैंसर इंस्टीच्यूट टेक्सास से मेरा भी एक रिश्ता रहा है ..मेरे पी एच डी के एक परीक्षक डॉ .सेन पाठक अब यहीं प्रोफ़ेसर हैं ....आज की शाम कई ऐसी यादों के साथ और भी सुहानी बन गयी ....

फर्स्ट सपर विद डॉ. रोशनी राव 

हमने साथ में बाहर खाना खाया ...डॉ. रोशनी शुद्ध शाकाहारी हैं ...मैंने आज के डिनर को "फर्स्ट सपर विद डॉ. रोशनी राव " का नाम दिया है ...अभी अभी लौटे हैं ..सोचा इन  यादगार लम्हों को ब्लॉग करके ही सोने जाऊं ...उन्होंने रेस्टोरेंट में आये ढेर से बच्चों के उधम को अच्छा नहीं माना और बताया कि ऐसे स्थलों पर अमेरिकी बच्चों को अनुशासित रहने को सिखाया जाता है और वहां घर पर आने वाले लोगों को कुत्ते भी नहीं भूंकते ...अजनबियों तक को नहीं ..वहां ज्यादातर शान्तिपूर्ण माहौल हर जगहं मिलता है ..कोई कोलाहल नहीं कोई आपाधापी और चिल्ल पो नहीं ..मैंने देखा बच्चों की उधम से वे बार बार विचलित सी हो रहीं थीं ..हम तो ऐसे माहौल के आदी हैं मगर उनके लिए यह अप्रिय सा था ....

हैपी बर्थ डे कौस्तुभ और बाय बाय डॉ रोशनी ..फिर मिलेगें ......

बुधवार, 21 सितंबर 2011

इलाहाबाद की अल्पकालिक यात्रा की कुछ ख़ास मुलाकातें!

संगम की नगरी इलाहाबाद जाना मेरे लिए हमेशा अतीत की पगडंडियों पर चहलकदमी करने जैसा होता है ..यादें यादें बस यादें .जो आज भी तरोताजा और खुशनुमां हैं और हों भी क्यों नहीं यह नगरी मेरे इल्म की मां है ,अल्मा मेटर है.सोच की दशा और दिशा को बदलने में इस नगरी का बड़ा योगदान रहा है.अभी उसी दिन माननीय उच्च न्यायालय में एक विभागीय पैरवी के सिलसिले में वहां गया तो एक बड़ी ख़ास मुलाक़ात से मैं रोमांचित हो उठा.जिन्हें भी उच्च न्यायालयों /सर्वोच्च न्यायालय के परिसर/ खासकर भीतर न्यायालय कक्षों के आस पास जाने का मौका मिला होगा   वे वहां की गरिमापूर्ण परिवेश से अभिभूत हुए बिना नहीं रहे होंगें.अगर सम्मान -प्रतिष्ठा/गरिमा  को कहीं मूर्तिमान बना देखना हो तो एक बार किसी भी माननीय न्यायमूर्ति  के न्यायकक्ष और वहां की कार्यवाही का अवलोकन अवश्य करें.यह जीवन के कुछ बहुत ख़ास और अलग अनुभवों में से एक है -यह शायद हमारे अवचेतन में एक उस मिथकीय धर्मराज /दंडाधिकारी की मौजूदगी के अहसास का  स्फुरण भी है जो जीवन और मृत्यु के फैसले किया करता है .....जो धर्मराज है और प्रकारांतर से वही यमराज  भी  है ....

उस  अलौकिकता की अनुभूति के बावजूद भी मैंने न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह जी से उन्ही के चैंबर में निजी मुलाक़ात का साहस जुटाया  और उनके निजी सहायक के पास जाकर मिलने की अर्जी पकड़ा दी -उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे कुछ इस तरह घूरती आँखों से देखा कि मुझे पहली बार अपने मानव प्रजाति का होने पर गंभीर आशंका उत्पन्न हो गयी -मैंने तत्क्षण खुद अपना आत्मावलोकन कर डाला और पाया कि मैं होमो सेपियेंस सेपियेंस ही हूँ,भले ही नस्ल का कुछ अंतर हो गया हो.जब सहायक महोदय अपने प्राणि- निरीक्षण का कार्य  निपटा चुके तो मैंने विनम्र बने रहने की दिशा में सारी ऊर्जा लगाते हुए अनुरोध किया कि वे बस माननीय न्यायविद महोदय को यह चिट भर दे दें बस..अगर वे मना करते हैं तो कोई बात नहीं.उन्होंने बड़ी अनिच्छा से कहा कि चिट पर 'परपज' लिखिए मैंने तुरंत अनुपालन किया,लिखा "साईंस फिक्शन इन इंडिया".'आपको न्यायमूर्ति साहब जानते हैं?' "हाँ", मुझे कहना ही पड़ा ....तब कहीं जाकर कुछ अनिश्चय की सी मानसिकता में वे मेरी चिट और कुछ अन्य कागजातों के साथ लेकर न्यायमूर्ति के कक्ष में प्रविष्ट हो गए...



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अगले कुछ पल मुझे युगों से प्रतीत हुए मगर वे बस कुछ पल ही थे....बमुश्किल एक भी मिनट नहीं बीता था कि सहायक ने आकर वह उद्घोषणा कर ही दी जिसका मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था ....जाईये बुलाया है उन्होंने आपको ,और भीतर उनके उपस्थिति स्थान आदि परिप्रेक्ष्य के बारे में यह संक्षिप्त जानकारी भी कि वे निर्धारित चेयर पर नहीं बल्कि पी सी पर बैठे हैं ....लिहाजा मैंने भी इस महत्वपूर्ण सूचना के हिसाब से खुद की मनस्थिति बनाकर कक्ष में घुसा -न्यायमूर्ति महोदय कक्ष में घुसते ही दायीं ओर पी सी पर विराजमान थे..मैंने देखते ही अतिरिक्त शिष्टाचार के साथ  दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन किया ....वे उठ खड़े हुए अभिवादन का जवाब वैसे ही हाथजोड़ कर दिया ....

.हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान् और शान्तिनिकेतन के शिक्षक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने एक जगह लिखा है कि 'व्यक्ति वह महान होता है जिसके संसर्ग में आकर  किसी साधारण व्यक्ति को भी अपने महत्व का  बोध होने लगे .." उनके साथ बिताये लगभग  दस मिनट मुझे खुद को महत्वपूर्ण होने का अनुभव दिलाते रहे ...आश्चर्य मिश्रित आनंद सहसा  तब आया  जब उन्होंने हिन्दी ब्लागिंग के बारे में कतिपय पृच्छायें कीं और प्रतिवर्ष किसी एक पुरस्कार की स्थापना ,जैसे बेस्ट ब्लॉगर ....पर बल दिया और इसके लिए संस्थागत सहयोग की भी आश्वस्ति दिलाई ...मैंने उनसे अनुरोध किया है कि प्रश्नगत संस्था से मुझसे संपर्क करने को कहें ...साईंस फिक्शन पर वार्ता तो हुई ही ..वे विज्ञान कथाओं के चतुर चितेरे रहे हैं .....अभी अमेजन द्वारा प्रचारित पुस्तक साईंस फिक्शन इन इंडिया में उनका एक लेख है -'साईंस फिक्शन -द पाईड पाईपर आफ साईंस' यह लेख उनकी इस विधा की गहन और सूक्ष्म जानकारियों /पकड़ का द्योतक है ....एक न्यायमूर्ति का उनके कार्यावधि में अधिक समय लेने का दुस्साहस मैं नहीं कर सकता था ..अतः बिना मन के उठ खड़ा हुआ और इसके पहले मैं उनसे विदाई नमस्कार करता उन्होंने खुद हाथ जोड़ दिए ....एक न्यायमूर्ति से इनके निजी कक्ष में न्याय व्यवस्था से सर्वथा इतर विषय पर बात कर इतराते हुए मैं बाहर निकल फिर दुनियादारी में लग गया ....

एक और ख़ास मुलाकात अभी बाकी है .......तनिक धीरज रखिये ...

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