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मंगलवार, 25 नवंबर 2014

प्रेम पत्रों का विसर्जन!

 प्रौद्योगिकी की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति ने मनुष्य के निजी और सामाजिक कार्यव्यवहार पर काफी प्रभाव  डाला है और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है।  आज एक मित्र से इस पहलू पर काफी रोचक विचार विमर्श हुआ और उन्ही के अनुरोध पर यह नई ब्लॉग पोस्ट लिखी भी जा रही है।  जी हाँ मनुष्य के जीवन के एक निजी अहम पहलू पर भी प्रौद्योगिकी ने गहरा  असर डाला है और वह है प्रेम. एक समय था जब हर  घर में न तो लैंडलाइन फोन थे और  मोबाइल का  तो दूर दूर तक कोई अता  पता ही न था। और तब प्रेमी प्रेमिका के बीच खतोकिताबत का ही एक सहारा था जिससे इज़हारे मुहब्बत और इश्क़ का सिलसिला चलता था। और वह था सुन्दर सुलेख खतों का आदान प्रदान जिसके जरिये ही मुहब्बत  परवान चढ़ती थी । मेरे मित्र  ने तफ्सील से ज़िक्र किया कि कैसे सुन्दर सुन्दर रंगीन कागजों और लिफाफों का जुगाड़ होता था और लगभग रोज ही एक प्रेम पत्र मेल बाक्स के हवाले हो  जाता था या फिर माशूक /माशूका के घर की दूरी ज्यादा न हुयी तो दीगर  सन्देश वाहकों का इंतज़ाम किया जाता था।
मेरे मित्र का  किस्सा भी बहुत कुछ मेरे जैसा ही है कि जिनसे ख़तो  किताबत हुयी वे कोई और नहीं नव परिणीता पत्नी ही थीं  और उन्हें तो साधिकार प्रेम पत्र लिखने का  सामजिक लाइसेंस मिल गया था। बेशर्मी भी अगर रही हो तो उसकी पूरी स्वीकार्यता थी।  एक पूरा प्रणयकाल(कोर्टशिप पीरियड )  ही इन प्रेम पत्रों के आदान प्रदान में बीत जाता था और तब कहीं जाकर एकाध साल बाद गौना (पति पत्नी का मिलन -सेकेण्ड सेरेमनी ) होता था तब तक उभय हृदयों का  अपरिचय पूरी तरह से मिट चुका होता था। मिलन बस एक औपचारिकता भर रह जाती थी -प्रेम पत्रों  में ह्रदय उड़ेल  दिया जाता था -कस्मे वादे होते थे -जन्म जन्मांतर तक साथ रहने की कसमें खाईं जाती थीं -एक दूसरे के प्रति समर्पण अपने उत्कर्ष पर जा पहुंचता था।

 मित्र ने अपने अतीत को याद करते हुए मुझे भी कितनी ही भूली बिसरी यादें ताजा करा दीं।  यह भी कहा कि  घर घर फोन और मोबाइल हो जाने से बिचारी नयी पढ़ी का यह सुख उनसे छिन गया है - यह कहते हुए उनके चेहरे पर जो भाव था वह ठीक से पढ़ा नहीं जा  सका कि वे नयी पीढ़ी के प्रति वास्तव में अफ़सोस कर रहे थे या फिर उन पर कटाक्ष कर रहे थे. हाँ अपने समय की प्रेम प्रधानता की गौरवानुभूति उनके चेहरे पर स्पष्ट थी। जो मजा कागज़ के प्रेम पत्रों  के लिखने पढने में है भला मोबाइल नेट संस्कृति में  कहाँ? लिखती  हूँ खत खून से स्याही न समझना मरती हूँ तुम्हारे याद में जिन्दा न समझना को पढ़ने का अहसास एक अलौकिकता का बोध कराता था।  उफ़ बीत गए वो रूमानी दिन ..  

बहरहाल मित्रों के बीच का यह अतीत -संवाद एक जगहं आकर ठहर गया -
मित्र ने कहा कि वे प्रेम पत्र तो आज  भी पड़े हुए हैं बहुत ही संभाल कर और सुरक्षित -क्या  किया जाय उनका? ऐसे तो कूड़े में फेंका नहीं जा सकता।  उनका तो एक डीसेंट डिस्पोजल होना चाहिए।  एक सम्मानपूर्ण विसर्जन।  तभी उन्हें याद आया कि मैं तो ब्लॉग लिखता हूँ तो यह समस्या तनिक ब्लॉग पर डाल दूँ -यह बहुत संभव है कि समान वयी  दूसरे मित्रों का भी यही धर्म संकट हो या फिर उनके सामने इसका कोई सम्मानजनक हल हो।  मैंने तो उन्हें सुझा दिया है कि चलिए संगम क्षेत्रे  एक सामूहिक प्रेम पत्र विसर्जन कार्यक्रम ही आयोजित कर लिया जाय और पवित्र संगम की अपार जलराशि में  प्रेम की  इस धरोहर को अर्पित कर दिया जाय।  आपके पास भी अगर कोई और  उदात्त विचार हों तो मित्र की मदद सकते हैं।  

रविवार, 15 जून 2014

क्या पुरुष को बस यही चाहिए?


एक ही धरती एक ही कालावधि मगर लोगों की सोच और रुचियाँ अलग अलग देशों में कितनी भिन्न हैं और हैरत में डालने वाली हैं . क्या सही है और क्या गलत यह भी पूरी तरह सापेक्षिक है . आज फेसबुक दोस्त शालिनी श्रीवास्तव ने एक लिंक साझा किया . यह मामला है एक पश्चिमी दुनिया में पली बढ़ी युवती का जिन्हे सेक्स की लत  है और वे इसकी खुले आम जिक्र भी करती हैं -पब्लिक डोमेन में उन्होंने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है. और अपने सेक्स अभिरुचियों और झुकावों का ईमानदारी से जिक्र भी किया है. इस लेख की चर्चा अन्यत्र जगहों पर इसकी बेबाकी और ईमानदार स्वीकृतियों के चलते है। आप को पूरा आलेख पढ़ने के लिए ऊपर के  अंग्रेजी लिंक पर जाना होगा मगर मैं हिन्दी प्रेमियों के लिए यहाँ कुछ उद्धरण देना चाहता हूँ.

क्रिस्टीन व्हेलेन  ४० वर्ष की मोटी महिला हैं। एक रिलेशन में थीं जो दस वर्षों चला मगर टूट गया। अब उन्हें सेक्स की सनक सवार हो गयी - अपने सर्किल के किसी मित्र, जान पहचान वाले  के साथ सोने को तैयार। और यह सिलसिला चल पड़ा. उन्होंने अपने अनुभवों को समेट कर यह प्रकाश डाला है कि आखिर पुरुष चाहते क्या हैं? और इससे भी बढ़कर कि उनकी खुद की क्या ख्वाहिश होती  है . उनके सेक्स संबंधियों में कई आयु वर्ग के लोग हैं. टीनएजर्स भी . उनकी स्वीकारोक्ति को कुछ आलोचकों ने वर्ष २०१४ का एक बड़ा खुलासा माना है.

मोहतरमा क्रिस्टीन व्हेलेन ने खुद के बारे में बताया है कि वे बहुत इंटेलिजेंट हैं ,मनोविनोदी हैं ,कभी कभार स्टाइलिश ,अपने बारे में बेफिक्र और वास्तव में बहुत अच्छी हैं। वे कहती हैं कि आकर्षण एक निजी मामला है और उनमें वह बहुत कुछ नहीं है जो बहुतों के लिए उन्हें आकर्षक बनाए। उनकी अपनी सेक्स अभिरुचियाँ /वितृष्णायें हैं और इसलिए और लोगों के समान व्यवहार से भी उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता ।क्रिस्टीन ने अपने एक दीवाने से पूछा कि उसे एक थुलथुल चालीस वर्षीय महिला में आखिर क्या आकर्षक लगा? जवाब था क्रिस्टीन तुम्हारा जबर्दस्त आत्मविश्वास ! कांफिडेंस इज सेक्सी! 

मैंने यह क्रिस्टीन कथा एक सनसनी पोस्ट के लिए ही नहीं की है . यह भारतीय समाज के सेक्स वर्जना को  सापेक्ष रखने और उस पर खुली चर्चा के लिए पोस्ट किया है मैंने . बहुत से लोग तुरंत क्रिस्टीन को वैश्या कह देगें -काल गर्ल कहेगें! मगर उसके निर्भीक आत्मकथन, स्पष्टवादिता को तवज्जो नहीं देगें .हमारा कल्चर इतनी स्वच्छंदता को अनुमति नहीं देता बल्कि सेक्स को पाप की सीमा तक यहाँ घृणित समझा जाता है -एक उचित स्थिति कहीं बीच में है . है ना ?

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

परिणय बसंत बत्तीसी!

 न न यह कोई कविता नहीं है .. बस आज विवाह के सकुशल बत्तीस साल पूरे हो गए हैं तो यह बसन्त बत्तीसी  उसी के उपलक्ष्य में है .  बत्तीसी सही सलामत है ,दन्त नख क्षत क्षमता भी  उसी परम शक्ति की कृपा से दुरुस्त है :-) -रात से ही कितने छुट्टा विचार दिमाग में उछल कूद कर रहे हैं -सोचा इस बासंती अवसर पर आपसे साझा कर लूं।बात बत्तीसी से शुरू हुई है तो जाहिर है कथा भी शुरू होगी जीवन के उदन्त काल से जब हम उदन्त मार्तंड हुआ करते थे। छुट्टा जीवन था...वे दिन भी क्या दिन थे -दूध के दांत वाली सहज मुस्कान के दिन! फिर हम बंधन में बध गए माह फरवरी 18 ,वर्ष 1981..इलाहाबादी दिन पूरे होने को आये थे......स्वच्छन्दता के दुधिया दांतों पर बन आयी . हम बाण भट्ट बनते बनते रह गए -बस छुट्टापन के नाम पर केवल छुट्टा विचार ही रह गए कितनी ही कसक फसक लिए ....मनुष्य का मानो यह स्वभाव ही है जब वह स्वछन्द होता है तो कहीं बंधना चाहता है और जब बंधा होता है तो छूटना ...अब मेरी इस बात का कम से कम आज तो कोई निहितार्थ न निकाला जाय! कल की बात और है :-) 


हम तो  जनम जनम के  स्वच्छन्दतावादी है , छुट्टा ख़याल, छुट्टा जीवन के हिमायती -मगर मेरे युवा और चिर युवा मित्र उलाहना देते हैं कि खुद तो गुड खाए और हमें मना कर रहे हैं .अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि भैया अनुभव की बात बिना गुड खाए कैसे की जा सकती है -अरे मुझे मुझ जैसा कोई गुरु समय से मिला गया होता तो हम उसके अनुभव से लाभान्वित न हो गए होते? ..सभी तो यही चाहते भये  जब हम फंसे तो ये बच्चू कैसे छूट जाएँ . अरे युवा मित्रों, छुट्टा जीवन के आह्लाद का आनंद देखना हो तो छुट्टे गाय बैलों को तनिक देखो -कितने हृष्ट पुष्ट नज़र आते हैं उनकी तनिक मरियल से दिखने वाले बैलों और गायों से तुलना करो! दूर नहीं जाना यहीं फेसबुक पर ही देखो! अरे बुद्धू अब भी नहीं समझे तो निरे वो ही हो ...बाकी बातें हम आगे भी कर सकते हैं आज तो गाँठ का दिन है -आज तो बंधने का पर्व है -स्वाधीनता की बाक़ी बातें कल कर लेगें .और मित्रगण चाहेगें तो टिप्पणियों में खुला विमर्श भी!

बहरहाल हम अपनी और इनकी बात कर रहे थे ....शुक्रगुजार हैं  इनके कि  इनके ही बस कि  बात है  बिना शरद के आत़प को सहे बत्तीस परिणय बसंत आज  पूरे हुए ....अब तो आभार ब्लॉगवुड कि अक्ल की दाढ़ें भी निकल आईं पिछले पाँच वर्षों में ही  -अब आगे के जीवन के बारे में आपकी शुभेच्छाओं की कामना है! कई मित्र मित्राणियों के चेहरे याद आ रहे हैं आज -उम्मीद है उनकी शुभकामनाओं का संबल आगे के जीवन के लिए जरुर मिलेगा .......

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

प्रेमकथा का पटाक्षेप-स्त्री पुरुष के घनिष्ठ सम्बन्धों पर राम जन्म पाठक की संपूर्ण कहानी(पटाक्षेप समाहित)


हम किनारे लग भी सकते थे 
 राम जन्म पाठक
और अब पटाक्षेप...........  


मेरा पांच मिनट चित्रा पर उधार चल रहा था, और वह चुका नहीं रही थी। मैं खीझा रहता। सचाई तो यही थी कि अगर ‘प्रेमिका’ शब्द का कोई संदर्भ बनता था, तो इसका संबंध मुझसे था। लेकिन, झोलाछाप गीतकार और मोपेडधारी कथाकार निहायत करीने और खामोशी से पूरे शहर में यह स्थापित करने में लगे थे कि वह, मोपेडधारी कथाकार की प्रेमिका है।

सुनते-सुनते मेरे कान पक गए। छोटा-सा शहर है। घुमा-फिराकर उठने-बैठने और गपियाने की जगहें सीमित हैं। हम अक्सर टकराते कभी यहां, कभी वहां। मैंने रणंजय से खुलकर बात की। उसकी राय थी-चित्रा करिअरिस्ट और मौकापरस्त है। मुझे उसे भूल जाना चाहिए। बहुतों ने मुझसे यही कहा था। आज तक कोई मुझे यह नहीं समझा पाया कि जिसे तुम ईमानदारी से प्रेम करते हो, उसे भूल कैसे सकते हो, भले ही वह वेश्या ही क्यों न हो जाए। मेरी यातना यह नहीं थी कि चित्रा मुझे छोड़ गई थी, बल्कि यह थी कि अब किसी और को कैसे अपनाऊंगा ? यही वह नुक्ता था जो मुझे सारी जिंदगी तबाह करनेवाला था। भूलने की शर्त लगानेवाले, याद रखने की शर्त क्यों नहीं लगाते 
मेरा अतीत अब दागी थी, बिना किसी जरायम के। 
कुछ और डेवलेपमेंट हुए।गांव से पिताजी आएः बोले-अट्ठाईस के हो गए हो। चलो शादी कर लो। सदानंद पीछे पड़े हैं। लड़की सुंदर है, सुशील है, गृहकार्य दक्ष है। मैं उसमें जोड़ना चाहता था- चौबीस, छत्तीस, चौबीस है। तन्वंगी है और अक्षतयौनि है। पता नहीं लोग, ये सूचनाएं देना कब शुरू करेंगे। मैंने सख्ती से मना कर दिया। वे झल्लाकर चले गए। 
दुर्दिन अभी और आनेवाले थे। मैं जिस अखबार में काम करता था-उसमें हड़ताल हुई और फिर तालाबंदी। रहा-सहा आधार भी ढहा। अब मैं हर तरह से मैं एक बार चित्रा से बात करना चाहता था। मैंने उसके पिता से बात की-उन्होंने कहा, बेटा, यह नासमझ है। उसकी शादी जहां हुई है, वहीं जाएगी। वे एक सीधे, सरल और निष्कपट आदमी थे। और चित्रा की शादी की विफलता से मर्माहत थे। उससे ज्यादा दुख उन्हें जवान बेटे की मौत का था। उन्होंने कहा-तुम उससे दूर रहो। मैंने उन्हें वचन दे दे दिया। यही वचनबद्धता मेरी जान की दुश्मन बनी। इसने मेरे हाथ-पांव बांध दिए। 
हालांकि, मैं जानता था कि सूरज, पूरब से पश्चिम में उगने लगे तो भी चित्रा अपने पति के पास नहीं जाएगी। आगे चलकर उसने तलाक लिया था। जब चित्रा, मुझे जवाब देने आई थी, उस दिन मैंने आंखों से आंखें डालकर उससे पूछा था कि क्या वह अपने पति के पास जाएगी ? उसने संपूर्ण तीव्रता से कहा था—नहीं, बिल्कुल नहीं।
हद ही थी हर जगह। पिता कहते हैं, वहीं जाएगी, वह कहती है नहीं जाएगी। इन पिता-पुत्री के बीच मैं हूं तो कहां हूं । 
लेकिन...मैं बाजी हार चुका था।
मुझे अभी भी उसी से उम्मीद थी। क्या उसे कुछ भी याद नहीं है ? वह ऐसे, कैसे हो सकती है ! अक्तूबर गुजर गया। दिसंबर भी गया। मैं रोज अपने कमरे पर बाहर रेलिंग पकड़कर बैठा रहता और घंटों उसका इंतजार करता रहता। 
वह न आई तो नहीं ही आई। उसकी कट्टरता, क्रूरता और उन्माद का कोई सानी नहीं है। अतिशय कठोर, अतिशय नरम।
मेरे अंदर एक बदलाव चल रहा था, तूफानी गति से। यह तूफान रोज मेरी तरफ बढ़ता। चित्रा के साथ चूमाचाटी और आलिंगन-मर्दन ने मुझे ‘जगा’ दिया था। मेरी तमाम रोमांटिक कल्पनाएं और बदहवासियां उससे जुड़ी थीं। मैं निरंतर काम-पीड़ा से ग्रस्त रहता और विह्वल होता जा रहा था। कुछ सूझता नहीं था, सिवा क्रोध और झल्लाहट के। मैं आए दिन अखबारों में प्रेम-प्रसंग में हत्याओं और आत्महत्याओं की खबरें पढ़ता रहता। मैं अपने आप से डर गया था। मेरे हाथ-पांव कांपने लगते। और बेचैन हो जाता। 
एक दिन धुंधलके में निकल पड़ा कमरे से। चला जा रहा हूं...मन, बुद्धि, शरीर-कुछ भी मेरे काबू में नहीं है। एक अदम्य इच्छा, एक दुर्निवार कामना हावी है मुझ पर। या इलाही मैं कहां आ गया हूं। यह शहर की बदनाम बस्ती है। यहीं बगल में चित्रा का घर भी है। 
पतन और गिरावट की भी हद होती है।
लेकिन कहां होती है ? 
वह दरमियाना कद की एक सांवली-सी युवती थी। हम कुछ भाव-ताव कर रहे हैं। वह मुझे एक सीलनभरी अंधेरी कोठरी में ले गई है। वह मोमबत्ती जलाने में बहुत वक्त जायां कर रही है। वह मुझे तड़पा रही है। हद है, हद है..यह भी तो स्त्री ही है न। मेरी नजर एक कोने पर पड़ी। एक टोकरी में लिसलिसे गुब्बारों की ढेरी...। मुझे लगा अभी उल्टी हो जाएगी। उसने कोई पैकेट फाड़ा है, मुझे कुछ दे रही है। वह पेशेवर है। मैंने हड़बड़ी और भूख और अतृप्ति के साथ काम निपटाया। और अब सड़क पर हूं। चला जा रहा हूं... चला जा रहा हूं, पता नहीं कहां, किधर...किधर...। अब मेरे इस पाप का कोई अंत नहीं। संसार के सारे गंगाजल अब इसे नहीं धुल सकेंगे। क्या कहा था लेडी मैकबैथ ने—all the perfumes of arebia will not sweaten this little hand. ( दुनिया का सारा इत्र छिड़क लूं तो भी इस हत्यारे हाथ की बदबू नहीं जाएगी।) 
जाओ, चित्रा, मैं तुम्हें शाप देता हूं। तुम कभी सुखी नहीं रहोगी।
बहुत साल बाद चित्रा मुझसे कहनेवाली थी, ‘ आठ साल से झेल रही हूं... आप आइए, मुझे डांटिए। मैं मौनी बाबा बनकर बैठी रहूंगी। असल में , आप मुझसे बात तो कर नहीं पाए...।’ उसकी आवाज में एक गहन पछतावा, हमदर्दी और कातरता थी। क्या उसे कोई दुख है ? वह सुखी है या दुखी ? पति से तलाक, फिर एक कुंआरे से लगाव और विलगाव, फिर शादीशुदा से चक्कर। और फिर अपने से दो साल छोटे युवक से शादी। उसने अपनी अर्थ-शक्ति से जवानी खरीदी होगी ? ठेठ मरदों की तरह। वह मजा मार रही थी चारों तरफ या सजा भोग रही थी ?कौन कह सकता है ! उसने अपना वक्त खुद खराब किया। 
वह फोन पर बहुत साल बाद मुझसे यह भी पूछनेवाली थी,’तो आप कब से ‘पी’ रहे हैं ? ‘ 
और मैं उससे यह झूठ बोलनेवाला था-‘जबसे आप मुझे छोड़कर गईं।‘ वह चुप्प थी। क्या वह खुश हुई? क्या उसे तकलीफ हुई ? वह किसी के लिए तकलीफ नहीं करती । उसे सिर्फ मौत पर भरोसा है। उसने कहा-मैंने बहुत मौतें देखीं हैं। वह कहना चाहती थी कि तुम्हारी मौत के मायने क्या हैं ? मैंने उससे कहा-मैं न मरने वाला। मैं उससे यह भी कहने वाला था, ‘तुम रंगोली बनाओ, तुम छात्रोपयोगी किताबें लिखो, तुम नमूने पालो। इससे थोड़ी तुम बच जाओगी। तुम्हें मैं बचाऊंगा। तुम अपनी वजह से नहीं, मेरी वजह से जानी जाओगी। लोग पूछेंगे, चित्रा कौन। अरे, वही...। चौराहे तुम्हारा ख्याल रखेंगे। ओ! मॉय, लेडी-पिकासो । 
लेकिन, इससे पहले और भी बहुत कुछ हुआ था। मेरे दिन बहुरे थे। और वाकई बहुरे थे। मेरे गांधीवादी एक साथी ने मुझे एक अखबार में उपसंपादक की स्थायी नौकरी दिला दी थी। बढ़िया खाना और कपड़े और एक अदद स्कूटर। बहुत दिनों तक तो मुझे विश्वास ही न हुआ कि मैं स्कूटर से चलता हूं। 
जाड़ों के दिन थे। मैं ताजा पानी से खूब नहाया था। सफेद शर्ट पहनी थी और गहरा हरा ब्लैजर। बाल सदन जा पहुंचा। मोटी साली (पिंसिपल) ने कहा-बहुत दिन बाद आए। जाकर मिल लीजिए। मैं सीधे गया उसकी कक्षा में। वह मुझे देखकर खुश हो गई। ऐसे मिली, जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। मैं दंग था, क्या यह वही चेहरा है, जिसने मुझे तिल-तिलकर मारा है। इतना इतराने और दिलजोई करने का सबब क्या है ? वह इतना दुलार क्यों मार रही है? 
वह मुझे ऐसे देख रही थी, मानो अभी पी लेगी। 
यही, वह जगह है, जहां उसने मेरी जिंदगी का सबसे रहस्यभरा, अबूझ और कभी न समझ में आनेवाला वाक्य बोला था कि मोपेडधारी कथाकार से मिलवाने का श्रेय मुझे था। यह सुनने के बाद भी मैं लड़खड़ाकर गिरा नहीं था। 
आज फिर वहीं खड़ा हूं। और उसे देख रहा हूं। और उससे बात कर रहा हूं। वह हमेशा की तरह अपनी कुर्सी पर टेढ़े-मेढ़े बैठी है। उसकी निहायत खूबसूरत ऊंची नाक, पतले-पतले अतिकामुक होंठ और शरारत से भरी आंखें चमक रही हैं। बीच-बीच में मुंह बिचका रही है। अभी कुछ करेगी वह। तय है। 
उसने आव देखा न ताव और बोल गई—‘फिर से, अच्छा फिर से। ‘
यह किसी पादरी के सामने का कन्फेशन था। धन्य है। उसने बहुत दुख सहा है, लेकिन सिफत यह है कि वह संसार के सारे दुखों के योग्य है। 
मेरी ही तरह, वह भी कोई बाजी शायद ही जीत पाए। विभीषिकाएं उसकी सहेली बनी रहेंगी।
शायद, यही सुनने मैं आया था। मैं तेजी से मुड़ा और चला आया।
शाम हो रही थी। तारे उगने लगे थे। जमाने बाद मैंने देखा कि मेरे कमरे पर एक बल्ब भी है और स्विच आन करो तो जलता भी है। मैंने उसे जला दिया। उसमें से ढेर सारी रोशनियां फूटीं। अब मैं कमरे की चीजों को साफ-साफ देख सकता था। 
बहुत साल बाद मोबाइल पर चित्रा मुझसे कहनेवाली थी—‘अगर आपने शादी न की होती तो इतिहास कुछ और होता।‘ 
वह कॉलेज में रीडर है। रीडर का एक मतलब पाठक भी होता ही है। उसने एक बार मुझसे कहा था-‘आप लिखते रहेंगे, मैं पढ़ती रहूंगी।‘ 
लो, पढ़ो, मेरी शैतान ! 
यही चाहती थीं न तुम ! .... 
क्या यह वाकई प्रेम कहानी ही है ? है भी तो कितनी अजीब !

मुझे भी कुछ कहना है ......

यह कथा मुझे  गहरे संस्पर्शित कर गयी -कारण?क्या बताना जरुरी है? :-)  पात्र जरुर काल्पनिक है, कहानी एक पुरुष का भोगा हुआ यथार्थ. मगर एक ही क्यों?यह  पुरुष  दारुणय की एक प्रतिनिधि कथा क्यों नहीं कही जा सकती ...?  इस कहानी से जहाँ घनिष्ठ मानवीय रिश्तों की जटिलता सामने आती हैं ,वहीं पुरुष नारी उभय पक्षों को अपने आचरण को सायास मर्यादित रखने की एक सीख या सूझ भी मिलती है -कहानी इस अर्थ में सोदेश्यपरक बन जाती है कि वह समाज के लिए उपयोगी बन सकती है। बाकी  चर्चा के लिए तो सुधीजन आमंत्रित हैं ही .......







बुधवार, 23 जनवरी 2013

आधुनिक प्रेमकथा का उत्तरार्द्ध


हम किनारे लग भी सकते थे 

* राम जन्म पाठक
.......और अब उत्तरार्ध! 
  
चित्रा के साथ कुछ समस्याएं थी। अनवरत बीमार मां, अतिवृद्ध पिता, युवा भाई की अकाल मौत, बेरोजगारी और तलाक के लफड़े। लेकिन, उसके साथ एक समस्या और भी थी। वह शहरी मध्यवर्गीय लड़कियों से हरगिज अलग न थी। शुरू में लगा था कि वह कुछ करना चाहती है, कि उसमें कुछ दम है। उसकी बातें बड़ी-बड़ी होतीं। मैं मोहित हो जाता। एक बार मैंने कुछ ऐसी तुकबंदीवाली लाइनें लिखीं—कितनी-कितनी है दुखदायी कहानी अपनी। जवाब में वह लिखकर लाई, फूल-सी खिलेगी कहानी अपनी। मैं खुश हो गया। मैंने उसे देवतुल्य प्यार किया। 
वह उतरती सदी का महाझोंप अंधियारा था। लोग पटापट एक दूसरे को मार रहे थे या मर रहे थे। सबसे ज्यादा कुछ बुलंद था तो बेरोजगारी का परचम।कोई बड़ी चूक नहीं हुई थी मुझसे। बहुत मामूली और छोटे-मोटे स्वार्थों ने चित्रा को घेर लिया था। वह महज छह सौ रुपए पाती थी बालसदन में। बस जो भी कमजोरी थी, उसकी यही थी। मोपेडधारी ने कुछ जाल फेंका होगा मदद के नाम पर। वह आ गई चक्कर में। लेकिन इसके लिए मेरा परित्याग कोई शर्त कैसे थी ? क्या चित्रा मोपेडधारी को पूरी तरह स्पेस देना चाहती थी ? ताकि, उसे अपनी ओर पूरी तरह झुकाया जा सके। चित्रा ने बाद में मुझसे कहा था, ‘मैं तुमसे नफरत नहीं करती। मुझसे कुछ लड़कपन हुआ था ?’ 
वजह जो भी रही हो ! 
अब क्या हो सकता था। क्या हो सकता था अब ? मुझे मोपेडधारी कथाकार से मिलना पड़ेगा। वह चित्रा का, ममेरा या फुफेरा भाई है। ऐसे ही कुछ बताया था मुझे चित्रा ने। आजकल भाइयों का भी कुछ ठीक नहीं...। 
असल में यह सब बाकायदा एक बिछाया हुआ जाल था, जिससे मैं तो बेखबर था ही, मेरी पग्गल भी बेखबर थी। उन्होंने उसे घेर लिया। मोपेडधारी कथाकार और झोलाछाप गीतकार बंधुओं ने। और मेरे कुछ निष्क्रिय और कपटी मित्रों ने। वे नहीं चाहते थे कि लड़की मालवीयों से निकलकर सरयूपारियों के पास जाए। यह ब्राह्मणों के भीतर का जातिवाद था, जिससे निपटना किसी के बूते की बात नहीं थी। मोपेडधारी यों तो शादीशुदा था, लेकिन मोपेड पर सुंदर, शुकनासिका,चित्रकार और थोड़ी बिलिल्ली लड़की के साथ कहीं जाना भी तो रोमांस है न। बहन लगती है तो लगने दो...। प्रेमिका नहीं कह सकते थे। उन्होंने नया नाम चुना-सहेली। इसमें सुविधा थी। झोलाछाप गीतकार चारों ओर फैलाता- भाई की सहेली। अर्थ सब समझते। सारे शहर को सूचना हो गई कि चित्रा, मोपेडधारी कथाकार की प्रेमिका हो या बहन या सहेली। लेकिन एक बात पक्की है कि वह फंसी है, उससे। बहुत बाद में चित्रा मुझसे कहनेवाली थी कि मेरा उनसे कोई ‘रगड़-फसड़’ नहीं था। कि उसने शहर छोड़ा ही था, उस मोपेडधारी कथाकार की सहायतातुर हरकतों से तंग होकर। फिलहाल तो ‘द्रौपदी-कृष्ण’ कथा सारे शहर पर तारी थी। मैं एक दिन मोपेडधारी कथाकार की पत्नी विनीता से क्षमा मांगने वाला हूं। आप अपने पति को इतना अधिक छूट कैसे दे सकी थीं ? मैं, चित्रा की नहीं, आपकी कहानी लिख रहा हूं। मैंने विनीता से ज्यादा दुखी स्त्री संसार में नहीं देखी। बाद में मुझसे चित्रा कहने वाली थीं’-नहीं, आप भी आइए, विनीता भी आती हैं।‘ 
विनीता न तुम्हारा, कत्ल करने आती हैं, बदमाश! 
तो मामला यों रहा।
................ 
लेकिन, चित्रा मुझसे साफ कह सकती थी। मैं बुरा नहीं मानता।
अगले दिन मैं और मोपेडधारी कथाकार रसूलाबाद घाट पर थे। मुंहअंधेरा हो गया था। गंगा चढ़ी हुई हैं। लहरें ऐसे लोट रही हैं,जैसे सैकड़ों हाथी करवट बदल रहे हों। दूर कोई चिता जल रही है। मैं उधर देखता हूं, तो डर लगता है। हम जब यहां आए थे तो कुछ सोच-समझकर नहीं। लेकिन, अब जब आ बैठे हैं तो यही लग रहा है कि दुनिया में शायद ही इससे बेहतर जगह हो ऐसी वार्ता के लिए। श्मशान...श्मशान...श्मशान। बाद में मैं चित्रा से कहनेवाला था कि’ एक दिन सबको रसूलाबाद जाना है।‘ 
हमने बात शुरू की। मैंने उन्हें सब कुछ बताया-मिलना-जुलना, आना-जाना,प्रपोजल, आलिंगन-चुंबन, ये और वो। मैंने पूछा कि मैं क्या करूं ? मुझे कहना चाहिए था कि आप बीच से हटिए। उन्होंने कहा,’आपके लिए दरवाजा बंद हो चुका है।‘ 
मैं उनसे यह सुनने नहीं आया था। मेरी तवक्को उनसे कुछ और थी। एक लेखक, एक लेखक के साथ इतना बुरा सुलूक नहीं कर सकता। उठा तो अपमान और अनादर से आहत था। मैंने उनसे हाथ मिलाया। उस दिन मुझे लगा कि यह आदमी कहीं मर-मरा न जाए। इतना कमजोर आदमी मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा था। मेरी प्रज्ञा कुछ सालों में सच साबित होनेवाली थी। क्या उन्हें मेरी बद्दुआ लगी होगी ? मैंने ऊपर, दूर, बहुत –दूर आसमान की तरफ देखा। ढेर सारे दैत्य दांत चियारे हंस रहे थे। 
राम बचाएं दुनिया को। 
यह इस शहर में इससे पहले भी हजारों बार हुआ था, और आगे भी होगा। नारायण रहे हों या प्रसाद, सभी अपना-अपना ‘प्रेम-पत्र’ बचाते इस शहर में खेत रहे थे। 
मैं उठा और चला आया। 
कहीं जाने से अच्छा है, पुराने दोस्त के घर जाओ। मैं बौखलाया हुआ था। मैंने एक कुत्ते को ईंट मारी, सांड़ से टकराया, रिक्शेवाले से भिड़ंत की, टैंपोवाले को गाली दी। रणंजय कमरे पर थे। मैं पहुंचा तो फटेहाल और थका हुआ। उसने कहा-कैसे बे ? प्रेमिका भाग गई क्या? इस साले को कैसे पता है। अरे, मजाक कर रहा होगा। जिंदगी में पहली बार मैंने शराब पी और फूट-फूटकर रोया। मैंने उसके कमरे के सीसे की खिड़की तोड़ दी।
सवेरे उठा तो वह मुझे देखकर हंस पड़ा। 
बोला-तुम भी न पंडित ! 
मैं फिर रो पड़ा। 
मैं अपने कमरे पर आ गया। काम में मन लगाने की कोशिश करने लगा। मैं एक अखबार में पत्रकार हूं, और फीचर पेज देखता हूं। यहीं मेरी भेंट हुई थी चित्रा से। इतना साफ और सुंदर अक्षर मैंने किसी का नहीं देखा। वह कला-समीक्षाएं लिखती थी। कभी कुछ और भी लिखती। मैंने कुछ छापीं। वह बहुत अच्छी चित्रकार है। 
बस यों ही सब गचड़-पचड़ था।
मैं उदास रहता। ज्यादातर पस्त और थका हुआ। मद्दिम-मद्दिम बुखार रहता। जैसे किसी धीमी आंच में तप रहा होऊं। कुछ सूझता नहीं था। वह मुझसे बात नहीं करती थी। वह मुझे कोई वजह नहीं बताती थी। मोपेडधारी कथाकार के साथ जगह-जगह दिखती थी, कभी यात्रिक में, कभी एल्चीको में, कभी एकडेमी में। मेरे लिए असहनीय होता जा रहा था-सब कुछ। एक दिन मैंने सोचा-गोली वाली प्रतिज्ञा पूरी कर लूं क्या ? फिर डर गया। मारना, और जान से किसी को क्या मारना। जो खुद अपने ईमान, धर्म और रूह से न मरा, उसे क्या मारना, प्यारे। उसकी तो जिंदगी ही सजा है। 
मैंने बालसदन फोन लगाया- चित्रा की मोटी-साली(प्रिंसिपल) ने उठाया। 
उन्होंने बुलाकर चित्रा से बात कराई। मैंने कहा-मुझे पांच मिनट चाहिए। उसने कहा-ठीक है, यूजीसी दे लूं, फिर। 
मैंने इंतजार किया। और काफी इंतजार किया। कोई किताब लेने-देने के बहाने वह मेरे कमरे पर आई। उस दिन मैं मिल गया होता तो इतिहास कुछ और होता। वह दुआओं भरा एक खत छोड़ गई थी।
मैंने पढ़ा। और हंसा-ये भी न, पागल है कुछ। 

अभी पटाक्षेप बाकी  है ........

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

प्रेमकथा जारी है ......


हम किनारे लग भी सकते थे 

* राम जन्म पाठक

आधुनिक प्रेमकथा का  पूर्वार्ध 


अब मध्य भाग .........
लेकिन, जब इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहासकार लिखेगा-यह चुंबन विषाक्त था। 
समय का सांप निकल गया था। हमने अपनी सलवटें ठीक की थीं। उसने बिखरे बालों का जूड़ा बनाया था। बोली-ठीक है ? मैं ऐसे सवालों का आदी नहीं था। 
मैंने रोड पर जाकर उसे रिक्शा पकड़ाया था। वह अपने घर चली गई थी। रास्ते में उसने मुझसे कहा-तुमने मुझे जूठा कर दिया। मैं झेंप गया था। मैं कमरे पर लौट आया था। खुश। बहुत ज्यादा खुश। बहुत-बहुत ज्यादा खुश। रात को बारिश आई, पहले बूंदों भरी, फिर झमाझम। और फिर तेज हवा चली-थोड़ा तूफानी। मैंने पहला प्रेमपत्र लिखा था, देर रात जागकर। मैंने अनुमान लगाया कि वह इस वक्त कहां होगी ? यह सवालों के उस्तुरा बन जाने का मौसम था। 
हम गरीबों के पास तब मोबाइल नहीं पहुंचे थे। 
मैंने चिट्ठी लिखी। एक, दो, तीन, चार, पांच, ...फिर सो गया। उठा तो लगा कि छत से कूदकर देखूं क्या ? इतना ऊंचा तो नहीं है कि मर जाऊं?अगर तुम प्रेम करते हो तुम्हें छत से कूदना आना चाहिए। 
मैंने कहा था कि सफेद वाला शूट पहनकर आना। वह फिर आई थी, फिरोजी रंग की बिंदिया लगाकर।’सुंदर हो...सुंदर हो...सुंदर हो। ‘ मैं बौराने लगा था, वह खिलखिलाई थी-कितनी बार कहोगे ! हम ठठाकर हंसे थे। 
हम हवा में थे। हम वहां कितनी देर रहेंगे-यह इस पर निर्भर करनेवाला था कि-हमारी चाहतें कितनी टिकाऊ हैं और हमारी ताकते-परवाज कितनी है।
एक दिन मैंने कहा कि तुम्हें बांध लूं ? उसने कुछ सोचते-से कहा कि अब तो बंध गई ही हूं। एक बार आसमान से गिरा तब, जब उसने मेरी पीठ पर गोदना गोदते हुए बताया, ‘ मुझे तुम से इश्क तब हुआ, जब तुम घर पर पीलीवाली शर्ट पहनकर आए थे। और उस दिन बालसदन ‘ये वाली’ पहनकर...।‘ 
दुनिया में कितने अच्छे-अच्छे शर्ट हैं। या खुदा, मेरी कुर्बानी पक्की। ‘वक्त’ मुझे प्यार से जिबह करना! 
वह लपक-झपक थी, लता-सी झूल जाती थी और गुनाहे अजीम करके भूल जाती थी। उसकी हंसी फौव्वारा होती थी, जैसे किसी को पानी पीते समय अंदर से हंसी आ जाए- फचाक से। वह सलीके से झूठ बोलती थी, मैं बेसलीके से सच। लेकिन प्यार करना अगर किसी को सीखना हो तो उसी से सीखे। वह प्यार नहीं करती थी, जान लेती थी। सीधे हलक में और हलाक। उसका प्यार अमीराना था, पूरा खोलकर। खतरा यही है कि बस जब तक है तब तक। वह गिरगिट की तरह रंग बदलती है, बेखटके, बे-झटके। 
एक दिन हमारी भिड़ंत हुई।
चित्रा-तुम भी ‘उन्हीं’ की तरह शक्की हो । 
मैं- उन्हें बीच में मत लाना। 
एक दिन और।
चित्रा-मैं कहीं और कर लूं शादी ? 
मैं-कौन करेगा तुमसे शादी...।
वह बुरा मान गई। मैं सहम गया। कभी मिली तो मैं उससे कहूंगा कि देखो मेरा मतलब वह नहीं था, जो आपने उस दिन समझा था। आखिर क्यों नहीं करता कोई आपसे शादी। वह तो मैंने बस ऐसे ही कहा था। 
यही पल, यही नोकझोंक, छुआछुऔलि आगे चलकर मेरी यातना बननेवाली थी। 
हमारी भिड़ंतें ही ज्यादा हुईं,सुलह के पल तो कम ही थे। 
जब हम प्रेम में थे और गाफिल थे दुनिया से, तब किसी की हम पर नजर थी। राहों में लोग थे, और देख रहे थे। किसी अदृश्य दानव की, किसी अदृश्य शिकारी की, किसी अदृश्य सत्ता की, किसी अदृश्य समाज की, किसी अदृश्य दोस्त की, किसी अदृश्य दुश्मन की, किसी अदृश्य बहेलिए की। चित्रा को अपना हाथ मुझसे कसकर पकड़ाना चाहिए था, क्योंकि आंधियां तेज थीं और गर्दोगुबार प्रचंड थे। 
मैं महान अपराधी था। ताजिंदगी खुद को इसी नाम से पुकारनेवाला था। 
मगर चित्रा तुम ? तुम क्या हो ? 
क्या तुम पर कोई दफा नहीं लागू होगी, क्या तुम किसी अदालत में मुल्जिम बनाकर नहीं लाई जाओगी ? मैं तुम्हें छलात्कारी कहता हूं, बलात्कारी की तर्ज पर। इसलिए नहीं कि तुमने मुझे भड़काया ( यह जुर्म तुम कुबूल कर चुकी हो) बल्कि, इसलिए की भड़का कर भाग गईं।
इतिहास एक दिन तुमसे बात करेगा। 
मैं थोड़ा अपनी कमजोरियों की वजह से डरा हुआ था। मगर निश्चिंत था। मुझे चित्रा पर पूरा भरोसा था। वह घृणा से प्रेम की तरफ, निरावेग से आवेग की तरफ, दूरी से निकटता की तरफ बढ़ती है। लेकिन, इस बार उसने जो दांव खेला, वह सर्वथा अप्रत्याशित था। 
उसने ऐसा किया ही क्यों ? इस सवाल का जवाब कौन दे सकता था। मैंने किताबें पलटनी शुरू कीं, जो पाया वह दिल दहलानेवाला था- क्या कहा था बुद्ध ने, कि औरत की तरफ देखना भी मत। क्या कहा था शंकराचार्य ने, कि स्त्री नरक का द्वार है। क्या कहा था नीत्शे ने कि, स्त्री के पास जाना तो अपना चाबुक लेकर जाना। क्या कहा था तुलसीबाबा ने, कि अवगुन आठ सदा उर रहहीं। क्या कहा था भतृहरि ने, कि तिरिया चरित्र को देवता भी नहीं जानते, तुम्हारी क्या बिसात।क्या कहा था शेक्सपीयर ने, दगाबाजी तुम्हारा नाम औरत है। तुमने नहीं सुनी किसी की तो लो, भुगतो। 
हुआ यों कि एक दिन मैं अपने कमरे पर सो रहा था। किसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने अधनींदे में दरवाजा खोला, चित्रा थी। मुझे अच्छा लगा, क्योंकि मुझे सवेरे से लूज मोशन हो रहे थे। उसे देखकर राहत हुई। मैंने बहुत सारे प्यार के साथ कहा कि आओ। वह कुछ बोलती, इससे पहले मैं फिर बोल गया-आज मेरा पेट ही खराब हो गया। उसे इन बातों से क्या मतलब। मैंने उसे पानी पूछा। वह कुर्सी पर बैठ गई। मैं उसके पांवों के पास बैठकर उसके जूते के फीते से खेलने लगा। जैसे पालतू कुत्ते कभी-कभी अपने मालिक से दुलराते हैं। उसने आव देखा न ताव और कहा ही तो-’अच्छा तुम मुझे भूल जाओ।
’क्या sssss? ‘ 
’हां, तुम मुझे भूल जाओ।‘
मुझे कुछ न सूझा, कुछ न सूझा। 
’ मैंने उसके पांव पकड़ लिए।‘ और फफककर रो पड़ा’ ऐसे नहीं करना,प्लीज।‘
वह उठी और चली गई। कोई सुन रहा है-चित्रा न, चली गई। वह मुझे जवाब दे गई है। 
कुछ नहीं है दुनिया में।
कुच्छ भी नहीं है। 
दिन आते हैं और जाते हैं। रातें आती हैं और जाती हैं। जो आता है, वह जाता है। कुछ भी थिर नहीं है। लेकिन, कुछ तो तौर-तरीका होगा न आने-जाने का। ऐसे, कैसे। ऐसे, कैसे। आखिर हुआ क्या? अब किससे पूछूं। मेरे पास कोई उत्तरदाता नहीं।
हार नहीं मानूंगा। मैंने परन ठानी।...नैव दास्यामि, नैव दास्यामि...बिना युद्धेन...। 
मैं अब किसी काम का नहीं रह गया था। जब तुम प्रेम में विफल हो जाते हो, तो यह सिर्फ एक लड़की, जिसे तुम प्रेमिका कहते हो, केवल उसका उठकर चले जाना नहीं होता, बल्कि यह तुम्हारे मुस्तकबिल का तुमसे रूठ जाना होता है। अब मैं गड्डमगड्ड हो गया था। जाता कहीं, पहुंचता कहीं। किताबें उठाता तो पढ़ नहीं पाता। मैं डाल से टूटे पत्ते की तरह उड़ता। यहां और वहां। काफीहाउसों में और शराबखानों में और चौराहों पर। हर जगह अपमानित और बहिष्कृत। दोस्त फब्तियां कसते-दानिश्वर, कहां गई तुम्हारी महबूबा ? फिर कोई जवाब देता। एल्चीको में दिखी थी—मोपेडधारी कथाकार के साथ। मैं सुनता। सिर्फ। सुनता। 
एक दिन यों ही किसी काम से निकला। सोचा-बाल सदन के सामने से गुजरता जाऊं,क्या पता कि वह दिख जाए। मैं, उसको देखने मात्र से ही खुश हो जाता हूं और मारे खुशी के थर-थर कांपने लगता हूं। 
या खुदाया ! 
मैंने जो देखा, वह किसी को सह्य नहीं हो सकता, किसी को भी नहीं। 
मेरे परिचित, बैंक में क्लर्क, किस्सागो ( ले-देकर) और शादीशुदा ( उनकी दुखियारी पत्नी मुझे क्षमा करें)—मोपेड लेकर सदन पहुंचे। दौड़ते हुए चित्रा आई-उछलकर मोपेड पर बैठी। वह गहरे हरे रंग के सूट में बहुत सुंदर लग रही थी। बस सुंदर ही तो है वह। पता नहीं, मैं अपने ही गणित, रेखागणित, त्रिकोणमिति, गतिकी, स्थैतिकी और बीजगणित की भुलभुलैया में फंस गया हूं। मैं ही पहले गया था बाल सदन में उससे मिलने। 
मोपेडधारी गए चौक की तरफ। 
मेरा रंग सांवला है, लेकिन मैंने देखा कि मैं काला पड़ गया था। फिर मुझे कुछ याद नहीं। शंकर दीक्षित ने बताया कि सड़क के किनारे तुम बेहोश पड़े थे। मैं रिक्शे पर लादकर लाया हूं। डॉक्टर ने कहा कि इन्हें कोई सदमा पहुंचा है। दवाएं रख दी हैं, खा लो। और घर से किसी को बुलवा लो। और ये लौंडियाबाजी बंद करो। लड़कियां प्यार-वार नहीं करतीं। वे हरवक्त एक स्मार्ट, कमाऊ, और क्लर्क और एकाउंटेंट टाइप के पति की खोज में रहती है, जो उन्हें नाम, स्टेटस और बिस्तर की पूर्ति दे सके। शंकर दीक्षित ने मुझे एक गाली दी, जिसका संबंध मेरी मां से था। वह मुझे हिदायतें देकर चला गया। मैं पूरी रात हंसता रहा।
सरसामों की तरह। क्रमशः .....

रविवार, 20 जनवरी 2013

एक मित्र की फरमाईश पर यह आधुनिक प्रेम कथा........

मैंने एक अपने एक दूसरे  मित्र से वादा किया था कि उनकी पसंद की एक आधुनिक प्रेम कथा भी कभी अपने ब्लॉग पर उन्हें पढ़ाऊंगा .मगर वक्त बीतता गया और मित्र ने फिर से कहा भी नहीं मगर भला हो संतोष त्रिवेदी जी का उन्होंने यह कहानी फेसबुक पर अपने कई मित्रों से शेयर की जिनमें एक मैं भी था . मुझे अचानक लगा कि क्यों न इस कहानी  से मैं अपने उस भूले बिसरे मित्र की फरमाईश ही पूरी कर दूं। सो यह आपके भी सामने भी है .कहानी  बहुत सशक्त है और निश्चय ही यह लोगों के मनः मस्तिष्क पर मिले जुले विचारों का जबरदस्त प्रभाव डालेगी . यह कहानी कथादेश के सितम्बर 2012 के अंक में छप चुकी है और मैंने यहाँ प्रकाशित करने की अनुमति कहानीकार से संतोष त्रिवेदी जी के सौजन्य से ले ली है -एक पोस्ट  में कहानी लम्बा समय और स्थान ले रही थी इसलिए सिलसिलेवार चलेगी . यद्यपि लोगों को व्यग्र बनाये रखना मुझे नहीं सुहाता मगर मजबूरी है . आशा है सहयोग और धैर्य दोनों बनाए रखेगे! :-) 


कहानी 

हम किनारे लग भी सकते थे 


* राम जन्म पाठक
जब हम मिले थे तो करीब-करीब ध्वस्त और पस्त थे। दुख से भरे और घायल और एक दूसरे की आंखों में झांकते हुए। एक दूसरे को तौलते हुए। जैसे दरिया में डूबते दो शरीर-और सहारे के लिए एक दूसरे की तरफ झपटते हुए। और डुबोते हुए। और बहाते हुए। 
चपल। 
चौकन्ने। 
एक दूसरे को मदद देते। 
हमने चाहा होता तो हम किनारे लग भी सकते थे। 
इतिहास के कटघरे में कौन खड़ा होने वाला था- यह बहुत बाद में तय होने वाला था। 
वह कुछ मुंहफट और तुनकमिजाज थी। 
मैं भी था। 
प्रेम पहले मेरी आंखों और देह में उपजा था। 
लेकिन शादी का प्रस्ताव पहले उसने रखा था। 
हमारी शादी नहीं हो पाई। 
और प्रेम ? 
यही तो कहानी है। 
जाहिर है सब कुछ अकस्मात नहीं हुआ होगा। इसे घटने में, होने में, बनने में, बिगड़ने में दिनों, हफ्तों,महीनों लगे होंगे।
वैसे तो यह दो सदी की कहानी है। 
हम जल्द ही ‘आप’ से ‘तुम’ पर उतर आए थे। 
इसे रोशनाई से लिखा जाना था, या सियाही से, या तरबतर आसुओं और खून और शराब की मुश्तरका मिलावट से- यह भेद आगे चलकर खुलने वाला था। 

कोई प्रेम कहानी सिर्फ कहानी नहीं होती, वह जुगों से संचित और जुगों तक गाई और फैलाई जाने वाली चीज भी होती है। 

( एक जरूरी हस्तक्षेप- असल में मैं कथाकार नहीं हूं। मैं एक मजमेबाज हूं। मजमेबाज का मकसद होता है पुड़िया बेचना। पहले वह अपनी रसीली,बेधक, मोहक और जादुई बानी से दर्शकों को फुसलाता-रिझाता है, जैसे ही दर्शक एकटक हुए, पुड़िया बेचने का काम शुरू- वह किसी भी चीज की हो सकती है, पेट की, पीठ की, घुटने की, बाई-बतास या खड़ा करने की।) 
मैं भी वही करूंगा। 
असल में कोई कथाकार नहीं होता, सभी मजमेबाज होते हैं। किसी को गांधीवाद की पुड़िया बेचनी है तो किसी को मार्क्सवाद की तो किसी को कलावाद की। 
मजमेबाज हमारा पुरखा है, पुरनिया, अतिवृद्ध किस्सागो। मैं उसका वंशधर हूं। मुझे ‘प्रकाश’ और‘चित्रा ‘ की कहानी सुनानी है। प्रकाश ने अपनी लिखित मंजूरी मुझे दे दी है। चित्रा से लेखक कई बार मिला, उनसे चिरौरी-विनती की, उन्होंने कहानी कहने के लिए कभी मना नहीं किया, लेकिन मंजूरी भी नहीं दी। सिर्फ एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा,’मैं बहुत व्यस्त हूं।‘ हो सकता है वह सचमुच व्यस्त हों, हो सकता है वह बहाना कर रही हूं, हो सकता वह कथाकार ( क्षमा करें, मजमेबाज) को टार्चर कर रही हों। प्रकाश का आग्रह है कि कहानी उत्तम पुरुष यानी अहम शैली में चले। इसलिए ‘मैं ’को ‘प्रकाश ’ समझा जाए। इस कहानी के पात्र, घटनाओं, स्थानों या भावों का अगर कहीं-कोई‘रिजम्बलेंस ’ है, तो यह महज संयोग होगा।) 

उन्हीं दिनों वज्रपात हो गया था। चित्रा के दो भाइयों में से छोटे ने रेल के चक्के के नीचे कटकर जान दे दी थी। उनकी जेब में एक पुर्जी मिली था, ‘मैं बेरोजगारी से ऊबकर आत्महत्या कर रहा हूं। किसी को तंग न किया जाए।‘ वे स्कूलों के खुलने के दिन थे। हो सकता है कि उन्हें स्कूल अच्छे न लगे हों। वह सूना और उदास-सा घर आसुंओं के समंदर में बह गया था, पुनर्निर्माण मुश्किल था, लगभग असंभव। कोई भी चीज अपनी जगह नहीं रह गई थी, न दिल न दिमाग। वह शायद मुझमें अपना खोया हुआ भाई, या पति या प्रेमी तलाश रही थी। संभावनाएं तीनों थी। फैसला जल्द ही होने वाला था। हां, वह शादीशुदा थी और पिता के घर पर रहती थी। उसने मुझे बताया था कि उसके पति ने उसे बेड पर पटक दिया था, हाथापाई की थी, कि सास थोड़ी कड़क थी, कि वह अपनी तालीम पूरा करना चाहती थी। उसके बताने में जो सबसे अहम था, वह यह कि, ‘ देखने में भी नहीं अच्छे थे।‘ इस वाक्य से मुझे डरना चाहिए था, लेकिन दीवानगी ने कब, किसी की सुनी है। 

खेल तवील होने वाला था। 

शिकारी घात में थे। 
खुदा खैर करे। 
चित्रा चलती तो लगता कि भाग रही है। उसे हर वक्त कोई सांड़ या कुत्ता खदेड़े रहता। एक हड़बड़ी, हड़बोंग, हताशा, घबराहट, बेचैनी ने उसकी गर्दन फांस ली। वह जहां भी जाती हड़बड़ाई रहती। मुझसे मिलने आती-तुरंत चल देती। घड़ी हाथ में है, लेकिन दूसरों से वक्त पूछती रहती। उसे कहीं पहुंचना था और देर हो गई थी। बिना बताए तमाम चीजें उसके हाथों से फिसल गई थीं। मैंने देखा कि उसके चित्रों और स्केचों की रेखाएं टूटी हुईं, सर्पिल और लहरीली हो गई हैं। जैसे कोई कांपती रस्सी, जिसमें किसी का गला फंसाकर वह उसे मार डालना चाहती है।स्ट्रोक ऐसे, मानो बम फोड़ा गया हो। बहुत बाद में उसने जाकर एक चित्र बनाया—इंतजार । यह उसके जीवन का सार था। वह सारी उम्र किसी का इंतजार करने वाली थी। 

उस दिन बुधवार था यानी मेरी साप्ताहिक छुट्टी थी। मैं अपने कमरे में यों ही बैठा ऊब-डूब रहा था। हवा में नमी और चिपचिपाहट के आसार। अब बारिश हुई कि तब। 
मकान मालिक की छोटी बेटी ने आकर बताया-कोई आया है। आपको पूछ रहा है। 
मैंने पूछा-कोई लड़की है ? 
उसने कहा-हूं। 
मैं झपटा। 
कितनी चीजें हैं, कितनी बातें है, जिन्हें हम यों ही जान लेते हैं, ज्ञान-विज्ञान से परे। बेद-लबेद से बाहर। मेरे इमकान की बुनियाद पिछली शाम को चित्रा से मुलाकात थी। मैंने ही बातों-बातों में दावत दी थी कि वह कमरे पर आएगी,तो मुझे अच्छा ही लगेगा। उसने कोई रजामंदी दिखाई हो, ऐसा मुझे नहीं लगा था। लेकिन, जब वह रिक्शे पर बैठी और उसने मुड़कर मुझे देखा तो मुझे लगा था कि शायद वह आएगी। वह मेरे कमरे पर पहली बार आई थी, इससे पहले हम बाहर-बाहर ही मिलते रहे थे। 

वह कई सीढ़ियां फांद चुकी थी। मैं दोतल्ले पर रहता हूं न। उसने गर्दन टेढ़ी की और दूधिया हंसी की बौछार... । यह उसकी बांकी अदा है, जब भी उसे झेंपना होगा, प्यार करना होगा, उसकी गर्दन गई कंधे पर। मैंने कहा-आइए, आइए। उसकी आंखें टकराईं-जैसे कह रही हों, आ गई हूं, तो गलत मत समझना। मैं वैसी नहीं हूं। मन हुआ तो चली आई, कुछ आपके लिए, कुछ अपने लिए। 

या मेरे अल्लाह-मैं करूं तो क्या करूं। मैं केवल बनियान और लुंगी में था। कुछ भी नहीं सूझ रहा था मुझे, कुछ भी नहीं। वह मेरे कमरे पर पहली बार आई है। मैंने पहले ही क्यों नहीं सोच लिया कि वह आ भी सकती है। कैसे स्वागत करूं, इसका केवल बातों से। बातें भी तो नहीं हैं मेरे पास। शायद वह समझ गई, वह तेज है। मेरे कमरे में एक ही कुर्सी है, वह उसी पर बैठ गई। और कमरे का सरसरी मुआयना किया। मेरे तौर-तरीके से, ढब से वह कुछ खास तुष्ट नहीं लग रही है। मुझे अपनी गुरबत पर संत्रास फूट रहा है। उसने पीने के लिए पानी मांगा, मैंने कांपते हाथों दिया। शायद उसे भी कुछ सूझ नहीं रहा था। हमारी जान-पहचान ही है, कोई आत्मीयता या गहराई नहीं है उसमें। और यह आधा देशी-आधा शहरी, आधा कच्चा-आधा पक्का शहर है। भले ही इसकी जड़ें गहरी हों और पातालपुरी तक जाती हों, और शिखा आसमान छूती हो, भले ही यह कला-साहित्य, संस्कृति और धर्म और विज्ञान की नगरी हो। भले ही यहां विश्वविद्यालय हो, हाईकोर्ट हो। बड़े बड़े कवि, लेखक, समाजशास्त्री, नेता, दार्शनिक, वैज्ञानिक रहे हों और रहते हों। लेकिन यह सब चीजें मिलकर भी इस नगरी की आत्मा को टुच्चई से मुक्त नहीं कर पाई हैं। किसी युवक के कमरे पर किसी युवती का अकेले जाना आज भी ‘खबर’ है, और हर आते-जाते का ध्यान खींचती है। यह कोई दिल्ली नहीं है। 
शायद हमारी पहली हड़बड़ाहट यही हो। 
मेरे कमरे में एक ही कुर्सी है। वह उसी पर बैठ गई है। मैं अपनी चारपाई की पाटी पर किसी तरह। जैसे बच्चे, मैम के सामने बैठते हैं। 
चित्रा ने पूछा- क्यों आते हो बालसदन ? (वह बालसदन में छोटे बच्चों को पढ़ाती है।) 
मैं-पता नहीं, शायद कुछ होनेवाला है। कुछ ट्रैजिक, जो सिर्फ मेरे लिए होगा। 
उसने कहा-अच्छा छोड़िए। मैं आपसे शादी करूं तो आप करेंगे ? 
मैंने थोड़ी ना-नुकुर के बाद हां कर दी। 
उसने कहा कि कमरा तो बंद कर दीजिए। मैंने उसके हुक्म की तामील की। 
अचानक नजारा बदल गया। वह फफककर रो पड़ी। 
मैंने पूछा-मैं तुम्हें छू सकता हूं। उसने इजाजत दी। मैंने उसका आंसुओं से तर चेहरा अपनी हथेली में ले लिया। उसे चुप कराया। पीठ सहलाई। वह उठी और बोली-थक गई हूं, लेटूंगी। वह चारपाई पर पसर गई। 
उसने आव देखा, न ताव, अपनी बांहें मेरी गर्दन में डाल दी। 
इसके बाद सीमाएं, सीमा नहीं रहीं। मर्यादाएं, मर्यादा नहीं रही । शरीरों ने अपना काम संभाला। रसायनों ने मोर्चेबंदी की। भाव बहुत चढ़ गए। और दांव भी। दोनों ने जानने योग्य सब कुछ जाना। दोनों ने चाहा कि दोनों जान लें कि वे एक- दूसरे को कितने अच्छे लग रहे हैं। उसने शरारतन अंगड़ाई ली। जब मूर्च्छा टूटी तो मैंने पाया, वह उतान पसरी है, संपूर्ण समर्पित। मैं उसकी कोमलता में समाया हुआ हूं। चुंबनों की बाढ़ आई हुई है, प्रतिचुंबन की मांग करती हुई। लारों और थूकों का सोता फूट पड़ा है। दांत लकड़बग्घे हो गए हैं और कोमल कपोल मेमने। जिह्वा ने जिह्वा से बात की। एक चुंबन-युद्ध, एक चुंबन-महायुद्ध । उसने कहा-मुझे लगा कि तुम्हें प्रेम की जरूरत है। मैंने कहा- हूं। उसने कहा-तुम्हारी आंखों में मेरी तस्वीर। मैंने कहा- हूं।उसने कहा-मुझे बच्चा चाहिए। मैंने कहा-हूं। उसने कहा-भाभी कहती हैं बच्चा पैदा करने का तरीका अच्छा नहीं होता। मैंने कहा-हूं। उसने मेरी छाती की त्वचा का नमक चाटा। मैंने उसके मुख-विवर से पानी पिया। मुझे लगा कि वह मेरे सीने के भीतर छिप जाना चाहती है-वह दुनिया से बहुत डरी हुई थी। बाद में उसने मुझसे शिकायत की थी कि मैंने उसे ( गाल पर) काट लिया था। मैंने पूछा था-अगर मैं तुम्हें धोखा दे दूं तो ? चित्रा ने कहा था-तो मेरा विश्वास पुरुषों पर से उठ जाएगा। मैंने कहा था-अगर तुमने ऐसा किया तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। उसने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया था। उतना कि जितना लिया जा सकता था। ऐसे मोहाविष्ट, मर्मांतक और जादूभरे पलों में गोली की बात पर खुद मुझे बहुत पछतावा हुआ था। मैं उसे विश्वास दिलाने के लिए तेजी से चूमने लगा था। वह शांत लेटी रही थी- प्रेमरत, प्रेमश्लथ। उसकी सुंदरता लाजवाब है...और दाहक भी...और मारक भी। तुम ध्यान दो तो पाओगे कि वह सिर्फ, और सिर्फ—चूमे जाने के लिए बनी थी। उसकी यातना यही थी। उसे प्यार न मिला था। 
लेकिन, यह सब कुछ जो हो रहा है अगर यह एक गलत हरकत, एक गलत कार्रवाई हुई तो आनेवाला विहान किसके लिए अधिक दुखदायी होगा ? इसका पता तब लगनेवाला था जब मेरे दांपत्य जीवन में अंधड़ चलने वाले थे और चित्रा का दांपत्य जीवन भी उखड़ा-उखड़ा रहनेवाला था। मैंने यों ही चित्रा से पूछा कि किसे साक्षी बनाऊं, यहां तो सब बेजान चीजें हैं। चित्रा ने कोई तुक का जवाब न दिया।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

तू हाँ कर या ना कर?


अपनी  फेसबुक भित्ति पर एक प्रखर नारीवादी विदुषी ने विवाह नाम्नी सुदृढ़ सामजिक  व्यवस्था पर  कटाक्ष करते हुए लिखा "  . कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि .... मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :).." यह एक टिपिकल नारीवादी चिंतन है जो विवाह की पारम्परिक व्यवस्था पर जायज/नाजायज सवाल उठाता रहा है. यहाँ के विवाह के  फिजूलखर्चों ,दहेज़ ,बाल विवाह आदि का मैं भी घोर विरोधी रहा हूँ मगर नारीवाद हमें वह राह दिखा रहा है जहाँ विवाह जैसे सम्बन्धों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न उठने शुरू हो गए हैं -और यह मुखर चिंतन लिविंग रिलेशनशिप से होता हुआ पति तक को भी "पेनीट्रेशन" का अधिकार देने न देनें को लेकर जागरूक और संगठित होता दिख रहा है . क्या ऐसे अधिकार की वैयक्तिक स्वतंत्रता की इज़ाज़त दी जा सकती है -क्या समाज के हितबिंदु इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगें ? धर्म तो विवाह को केवल प्रजनन के पवित्र दायित्व से जोड़ता है -अगर 'पेनीट्रेशन' नहीं तो फिर तो प्रजनन का प्रश्न  नहीं और प्रजनन नहीं तो फिर प्रजाति का विलुप्तिकरण तय .  क्या कोई भी धर्म और समाज या क़ानून समाजिक सरोकारों के ऊपर/अपरंच  जाकर ऐसे दिमागी फितूरों को वैयक्तिक/नागरिक आधिकारों के रूप में स्वीकृति  प्रदान कर सकता है? मामला गंभीर है और एक प्रबुद्ध विमर्श की मांग करता है.  
मैं अपने विचार यहाँ रख रहा हूँ जो समाज जैविकी(Sociobilogy)  के नजरिये से है और कोई आवश्यक नहीं कि मेरा इससे निजी मतैक्य अनिवार्यतः हो भी? अकेले मनुष्य प्रजाति में  यौन भावना का प्राबल्य या प्रजनन किसी ख़ास माहों तक सीमित न होकर सदाबहार है . हमारी नजदीकी चिम्पांजी मादा भी छठे छमासे ही हीट में आती है ..मगर मनुष्य के मामले में यह बारहोमास है .और प्रत्येक माह में अंड स्फोटन(ovulation)  के साथ ही मनुष्य -मादा के गर्भधारण की संभावनाएं बलवती हो उठती हैं -इस ग्रह पर अरबों जनसँख्या उसकी इसी अति प्रजननशीलता की ही देन है -यहाँ नारी या पुरुष किसी भी वक्त संयोग करते हैं गर्भधारण की तिथियों से दीगर भी ..... निश्चित ही मात्र प्रजनन ही मनुष्य के मामले में हेतु नहीं है कोई और भी कारक है जो जोड़े को साथ बनाए रखता है और गहन आत्मीय/यौन  सम्बन्ध ही जोड़े के लिए सीमेंट का काम करता है ..मगर क्यों यह जोड़ा सीमेंटेड होना चाहिए? इसलिए कि विद्रूप नैसर्गिक सत्य यह है कि जैव- विकास की  सीढी में न जाने क्यों प्रकृति ने मनुष्य प्रजाति की मादा को ही वात्सल्य देखभाल (पैरेंटल केयर ) का नब्बे फीसदी तक का उपहार /ठेका  देकर नारी को बिचारी बना दिया ...मनुष्य शावक पट्ठा(!) बरसों बरस तक मां  की छाती पर मूंग दलता रहता है ..दुग्धपान से डायपर बदलाव के  बहुत बाद तक भी वह मां पर पूरी /बुरी तरह आश्रित रहता है -और बाप बस उसे कभी कभार निर्मिमेष निगाहों से पलता बढ़ता देखता और औपचारिकता स्वरुप कभी कभार कुछ प्यार पुचकार करता रहता है ताकि कम से कम यह आभास तो होता ही रहे की साहबजादे उसी की औलाद हैं :-) अब सभी डी एन ऐ जांच  के लिए तो जाने से रहे ... :-) 
बच्चे  के बाप कहीं अपने दायित्वों से खिसक न लें इसलिए मनुष्य के मामले में प्रकृति ने सेक्स को और भी "सेक्सियर" -आनंददायक बना डाला -ले पट्ठे तुझे साथ रहना है तो भरपूर मजे लेता रह  और संतान की अपनी जिम्मेदारियों से  मत भाग ....मनुष्य नर  के ऊपर प्रकृति ने वात्सल्य देखभाल की  उतनी विवशता डाली ही नहीं.....न तो मानसिक स्तर पर ही और न ही शारीरिक स्तर पर ....उसके चूचक भी अवशेषी होकर सिमट सिकुड़ गए नहीं तो कम से कम प्लेसेबो दुग्धपान की राहत कभी कभार तो  बच्चे को देते ही ...... :-) 
अब उक्त परिप्रेक्ष्य में जरा सोचिये भारत ही नहीं पूरे विश्व के किसी भी भूभाग या संस्कृति में शादी एक नारी के लिए कितनी जरुरी है -मुख्यतः एक कारण से -एक तो  बच्चों के बड़ा होने तक जच्चा बच्चा  दोनों को  किसी  आपदा की स्थितियों में पुरुष का तन मन धन से तात्कालिक और दूरगामी सहयोग देना और इस तरह वंश रक्षा की निरापदता सुनिश्चित करना ....विवाह जैसी संस्था इसी जैवीय और सांस्कृतिक जरुरत को ही पूरा करती है. एक सामाजिक   संस्था के रूप में भी वह यह भी सुनिश्चित  करती है कि बच्चा पैदा कर बंदा कहीं और न सटक ले ...कुछ तो लाज भय रहेगा ...अगर मनचाहा कुदरती आनंद न भी मिल रहा हो तो बेचारा  सामजिक/कानूनी  भय और संकोच वश वैवाहिक जीवन को निबाहते रहने को अभिशप्त हो रहता है -और यह नारी के ही पक्ष में एक छुपा हुआ वरदान है . पुरुष को एक ओर गहन वात्सल्य देखभाल से मुक्त कर प्रकृति ने काम भावना को बुलंद कर दिया ताकि वह कम से कम  नारी बिचारी से जुड़ा रहे ....अन्यथा समागम के बाद उसका काम ख़त्म ..और वह बीजारोपण के लिए आगे भटक /सटक लेगा .
शादी इसलिए जरुरी है .हाँ अगर बच्चे पैदा करने का  मातृत्व बोध क्षरित हो गया लगता है (जैसा कि अभी तक नहीं है )  तो फिर विवाह जरुरी नहीं तथापि पश्चिमी देशों में यही हो रहा है -कई कई तलाक और पुनर्विवाह! नैसर्गिक इंस्टिंक्ट बस वही है -पुरुष  रुकना नहीं चाहता और नारी को वात्सल्य देखभाल से निवृत्ति नहीं है .पश्चिम में इसलिए ही आजीवन बिन व्याहे और विवाहेत्तर सम्बन्ध,तलाक  का  आंकडा बढ़ रहा है . आखिर भारत क्या चाहता है ? 

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?


भावों को शब्द -बद्ध करना  कितना  मुश्किल है :-( शब्द साधना एक तपस्या है . गुणी  मित्र गण माफ़ करेगें इस अनाधिकार चेष्टा के लिए -


यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?

जो  दीन है औ  शीर्ण है 
 जर्जर  जरा अधीन है 
 तुम्हे अब क्या दे सकेगा 
 जो आर्त है,पराधीन है 

 क्षितिज की ओर देखो 
उभरती तरुणाई  जहां है 
नव चेतना का आह्वान औ
आ पहुंचा  शुभ  विहान  है  

कर सकेगा सम्पूर्ण  तुमको 
अभिसार  कर हर विध वही 
हो सकेगी संतृप्ति रसमय 
मिटेगी चिर प्यास   भी 

अब नहीं  है शेष कुछ भी 
दे सकूं जो प्राण प्रिय को 
छीजती जाती  है प्रतिपल 
जीवन की डोर अब तो 


फिर भी हूँ  विस्मित  भला 
 नेह पर जिसके   पला 
क्यों अचंचल बन गयी वह 
स्वभाव से ही  जो चंचला 

पूछता जाता हूँ विस्मित 
छोड़ नव आकर्षणों को 
मुझी पर है किसी का 
 नेह क्यों,अनुराग क्यों?







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