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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो!

जब हिन्दी ब्लॉगों का एक दशक पहले आगाज  हुआ था तो कहा गया था कि अभिव्यक्ति  के  एक युगांतरकारी माध्यम का आगमन हो गया है। अब न तो संपादकों की  कैंची  का डर था और न कही कोई रोक टोक।बेख़ौफ़ बयानी का एक चुंबकीय आमंत्रण था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर की शिक्षा लेकर युवाओं की एक फ़ौज अंतर्जाल की नयी संभावनाओं को तलाश रही थी। जाहिर है उनमें से  अधिकांश का सृजनात्मक लेखन से कोई  लेना देना नहीं था और न  कोई अनुभव ।  फिर भी उन्होंने अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन की अलख जगाई और उसमें से कुछ तो रातो रात अच्छे लेखक के रूप में सन्नाम भी हो गए। यह समय (2003 -२००७ ) हिन्दी ब्लॉग लेखन का प्रस्फुटन  काल था।

हिन्दी  ब्लॉग जगत में इसके बाद साहित्यिक और सृजनात्मक प्रतिभाओं की पैठ हुई और लगने लगा कि हिन्दी ब्लागिंग के रूप में अभिव्यक्ति का एक नया युग आ गया है जो पारम्परिक मीडिया को धता बताकर रहेगा। और हिन्दी ब्लागिंग की यह धमक और ठसक आगे के कई सालों तक बनी रही। और इस माध्यम/विधा की खिलाफत भी हिन्दी के पारम्परिक खुर्राट और खेमेबाज साहित्यकारों  /संपादको की ओर से शुरू हो गयी गई -उन्हें अचानक अपने विस्थापन  का खतरा भी दिखाई देने  लग  गया था।  मजे की बात यह कि वे ब्लॉग बैठकियों में मुख्य अतिथि की हैसियत से  बुलाये जाते और मंच पर ही इस माध्यम की खिल्ली उड़ा आते। आत्ममुग्ध ब्लागर  ऐठ में उनकी बातों को तवज्जो नहीं देते। यह  हिन्दी  ब्लॉग जगत का पुष्पन -पल्लवन काल(2007 - 2010 था। 

ठीक इसके बाद ब्लॉग जगत का वह हाहाकारी स्वर्णकाल आया जिससे प्रतिभाओं का अजस्र  बहाव यहाँ देखा गया ।  एक से एक सच्चे प्रतिभाशाली , आत्ममुग्ध और स्वनामधन्य महानुभाव अवतरित हुए जिन्हे  ब्लागजगत  के अब तक पुरायट कहे जा रहे ब्लागरों ने सीख दी , संरक्षण दिया और दुर्भाग्य से हिन्दी ब्लागजगत में भी पारम्परिक साहित्य की अनेक दुष्प्रवृत्तियों का यहीं से आरम्भ शुरू हुआ। खेमे बने ,'मठ' बने और मठाधीश बने।  जाति  बिरादरी के नाम पर गोलबंदी शुरू  हुयी। कई  मगरूर ब्लॉगर आये। कई बेशऊर भी आये।  किसी ने मखमली माहौल बनाया तो किसी ने इस्पाती ताकत दिखाई। व्यर्थ के लड़ाई झगड़े बहस मुहाबिसे और रोज की चख चख ।  सृजन गायब होने लगा -रगड़ घषड़ की ऊष्मा ही ज्यादा फ़ैली।  लोगों ने देख सुन लेने की धमकियां  भी दी लीं. 

भारत का अब तक न जाने कहाँ  सोया नारीत्व भी  अचानक जाग दहाड़ें मारने लग गया  .ब्लागरों की पुरुष महिला कैटेगरी  का क्लीवेज भी साफ ज़ाहिर हो चला।  स्वाभाविक था रचनाशील सौम्यता अब परदे के पीछे जा पहुँची थी।  हिन्दी ब्लागजगत का मोहभंग काल अब शुरू हो चला था।  कुछ का ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने मुद्रण माध्यम का दामन थाम लिया -जिसे वे कभी  पानी पी पीकर कोसते थे।  कुछ ने तो यहाँ तम्बू उखड़ने के अंदेशे से  झटपट इस माध्यम  का लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल कर प्रकाशकों से  मिल मिला पैसे वैसे दे दिलाकर किताबें छपवाईं  और बिकवानी शुरू कर दीं।  

हिन्दी ब्लागजगत का अवसान काल  अब आसन्न था। दशेक काल में सब कुछ हो हवा गया।  उत्थान पतन सब।  अभी भी लोग कहते  हैं, नहीं नहीं ब्लॉग अब भी खूब लिखे पढ़े जा रहे हैं -मगर पाठक हैं कहाँ  भाई? हिन्दी के अन्तरजालीय पाठकों को हमने संस्कारित ही तो नहीं  किया -यहाँ तो सब  ब्लॉगर लेखक ही हैं -ब्लॉग पाठकों का टोटा है -उनकी कोई जमात नहीं, जत्था नहीं। यहाँ ब्लॉगर ही लेखक है और खुद  वही पाठक भी । अलग से पाठक वर्ग गायब है।  पाठकों को ललचाये  जाए बिना हिन्दी जगत के दिन बहुरने से रहे। तब तक शायद हम ब्लॉगर अल्पसंख्यकों को हाथ पर हाथ बैठे रहना होगा।  इस माध्यम को भी अब प्रायोजकों  प्रश्रयदाताओं की ही  तलाश है -आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो ! 

 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

पारम्परिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया: नए आयाम, नई चुनौतियां! ( परिप्रेक्ष्य: हिन्दी दिवस)


मानव के विकास में उसके शिकारी जीवन के आदि हुंकरणों से शुरू हुई अभिव्यक्ति की महायात्रा के भाषाई पड़ावों का अध्ययन बहुत रोचक है। मनुष्य ने संवाद की दिशा में संकेतों/शिकारों ,हाव भाव(gestures ) का सहारा लेते हुए भाषिक संवाद की भी जो क्षमता विकसित की वह समूचे जीव जगत की अनूठी घटना है। एक सामजिक प्राणी के रूप में भाषाई ईजाद ने बोलियों वाक्यों की संरचना मार्ग प्रशस्त किया और मनुष्य आपसी संवाद समन्वय से विकास की एक अनन्य मिसाल कायम कायम की। अब उसके पास भावों के आदिम प्रगटन की भाव भंगिमाओं और अभिव्यक्ति के शैल चित्रीय या भोजपत्रीय माध्यमों के अलावा एक तेजी से विकसित हो रही भाषा का भी सहारा था जिसमें विश्व के प्राचीनतम वैदिक साहित्य की वाचिक और श्रुति परम्परा से आरम्भ होकर आज के डिजिटल मीडिया तक का इतिहास समाहित है। वाचिक / श्रुति परम्पराओं से आगे लेखन और मुद्रण तक का इतिहास सहज ही ज्ञेय है। मुद्रण माध्यमों ने जहां समाचार पत्र पत्रिकाओं,पुस्तको के जरिये जन संवाद का नया अध्याय शुरू किया वहां प्रसारण माध्यमों में दृश्य और श्रव्य दोनों तरीकों का खूब विकास हुआ -सिनेमा और आकाशवाणी ने जन संवाद की नई मिसालें कायम की। मीडिया के इन विविध रूपों से आम समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तरह तरह आशंकाएं भी उठती रही हैं।
मीडिया और जन मानस

मीडिया के बारे में अक्सर यह बात कही जाती रही है कि वह जन विचारों को प्रभावित कर सकती है और समूह 'ब्रेन वाश' करने में भी सक्षम है। यहाँ तक कि विचारों को भी एक केंद्रीय कंट्रोल /कमांड के जरिये संचालित और नियमित भी किया सकता है. इन कथानकों पर कई कई साइंस फिक्शन फ़िल्में और उपन्यास आधारित हैं जो जनमानस और मीडिया के पारस्परिक अंतर्सबंधों की विविध संभावनाएं प्रगट करते हैं। जार्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 1 9 8 4 में 'बिग बास इज वाचिंग यू' जैसे दहशत भरे तकनीकी दुरूपयोग की ओर इशारा किया था। विगत डेढ़ दशक से नई मीडिया -डिजिटल मीडिया का वर्चस्व दिन दूनी रात चौगुनी दर बढ़ा है जिसकी ऑफशूट है -सोशल मीडिया। सोशल मीडिया कम्प्यूटर क्रान्ति की देन है। डिजटल दुनिया का एक नया जिन! अब सोशल मीडिया की लोक गम्यता क्या क्या गुल खिला रही है यह छुपा नहीं है. खाड़ी देशों की सद्य संपन्न जन क्रांतियाँ गवाह हैं। अभी संपन्न सामान्य निर्वाचन में भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हुआ है। जिसके जन प्रभावोत्पादकता के मुद्दे पर बहस अभी भी जारी है।

चिट्ठे और सोशल मीडिया

अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके।

क्या हिन्दी ब्लॉगों के अवसान की बेला आ गई ?

लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान आ पहुंचा है? -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता। हाँ यह जरूर हुआ कि कई रचनाकारों को ब्लॉग और फेसबुक के चलते पारम्परिक मुद्रण मीडिया में पहचान मिली और उन्होंने इस नए मीडिया को लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया। किन्तु अंतर्जाल पर अपने चुटीले कार्टूनों से ब्लॉग जगत में विशिष्ट पहचान बनाने वाले काजल कुमार का कहना है कि "ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती मेढक आते-जाते ही रहते हैं." अखबार भी जन मानस में पैठ बनाये हुए हैं। हाँ व्यापक रीडरशिप पाने के लिए कई मीडिया समूह अब अंतर्जाल पर भी जाकर अपना वर्चस्व बना लिए हैं।

डिजिटल डिवाईड

अंतर्जाल की सुविधा सहूलियत कितनो के पास है ? यह सवाल मौजू है। कितने लोगों के पास कम्प्यूटर और कनेक्टिविटी है ? बिजली की क्या उपलब्धता है -यही वे कारण हैं जिनसे यह आशंका बलवती हुयी की तकनीकी संचार से दो तरह की दुनिया वजूद में आ रही है -एक जिसके पास अंतर्जाल तक की पहुँच है और एक जिसके लिए अभी भी अंतर्जाल एक स्वप्न है -समाज में विषमता की एक नयी खाईं गहराती नज़र आ रही है -और जन सुविधाओं का आबंटन भी कहीं इस डिजिटल डिवाईड पर आधारित न हो जाय ? वह प्रौद्योगिकी ही क्या जो जन सुलभ और बहुजन सुखाय बहुजन हिताय न हो ? ये सारे सवाल आज विचार मंथन के मुद्दे बने हुए हैं। यह सही है कि पारम्परिक मीडिया भी ऐसी सम्भावनाओं की आहट पाकर अब अपने को अंतर्जालीय संस्कृति की ओर मोड़ रहा है मगर यह भी सच है कि अंतर्जाल तक अभी भी जान सामान्य की पहुँच नहीं हो पायी है। मगर सोशल मीडिया ने एक संचार क्रान्ति का बिगुल जरूर फूँक दिया है!

फेसबुक का बढ़ता वर्चस्व

फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को आंक नहीं पाए थे जबकि इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का ध्यान आकर्षित किया गया था। आज भी यह बल देकर कहा जा सकता कि कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं . वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

नाम अनेक काम एक 
दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते!

पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ . आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग अपने कंटेंट/ फीड की नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर! ...ऐसी अफवाहें और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है .

इंटेलिजेंट मशीनें
तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें भी आ धमकने वाली हैं जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!


आज सोशल मीडिया अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी संपर्क /अभिव्यक्ति से ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ चुका है .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों/फेसबुक आदि का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब यह अभिव्यक्ति के एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

माध्यम या विधा
विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी ) एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही सोशल मीडिया में लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ? -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत एक ही समय आये ऐसा जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं..
निष्पत्ति
सोशल मीडिया का लेखन ऐसी ही कुशलता की मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है सोशल मीडिया में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग भी एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के तकनीक के सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ ब्लॉग? ....

रविवार, 27 जुलाई 2014

हिन्दी ब्लॉग के अवसान की बेला?

एक मीडिया संस्थान ने आगामी हिन्दी दिवस के लिए मुझे सोशल मीडिया के बढ़ाते प्रभाव पर आलेख भेजने का अनुरोध किया। मैंने आलेख तैयार किया तो उसके कुछ अंश जो हिन्दी ब्लॉगों की मौजूदा स्थिति पर है फेसबुक पर डाला। ताकि मित्रों के विचार भी जान लिया जाय. खुशी हुयी वहां ठीक वैसे ही विचार आने लगे जैसे किसी ज़माने में ब्लॉग पोस्टों पर आया करते थे. आईये आप भी मुजाहरा कीजिये कि हिंदी ब्लॉगों की स्थिति पर हिन्दी के पुरायट ब्लॉगर क्या कहते हैं। यहाँ वही टिप्पणियाँ मैं दे रहा हूँ जो विचारवान लगीं। बाकी के मित्र अन्यथा नहीं लेगें!
मैंने जो कहा -
अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके। लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान युग आ पहुंचा है -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता।
और चुनिंदा प्रतिक्रियायें ये रहीं -
काजल कुमार
"ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.
बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों( ) ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती पतंंगे आते-जाते ही रहते हैं"
वाणी गीत
"हिंदी ब्लोगिंग में जो गंभीर पाठक अथवा लिखने वाले थे , वे अब भी लिख पढ़ रहे हैं . कुछ लोग सिर्फ अपने को रौशनी में बनाये रखने के लिए जानबूझकर विचार विमर्श के नाम पर लडाई झगडे का माहौल बनाये रखते थे , कुछ अंग्रेजीदां ब्लॉग्स भी थे जिन्होंने जानबूझकर हिंदी ब्लॉगिंग को नुकसान पहुँचाने के लिए विषाक्त माहौल पैदा किया जिससे संवेदनशील ब्लॉगर्स ने अवश्य विदा ली , कुछेक गंभीर ब्लॉगर अपनी इतर जिम्मेदारियों के चलते दूर हुए तो कुछ अर्थ/नाम के लिए प्रिंट लेखन में उतरे .. मगर ब्लॉग पढने वाले बने हुए है , लिखने वाले भी!"
आशीष श्रीवास्तव
मेरे ब्लाग पर दैनिक ८०० लोग आते है, वह भी जब इसमे नया लेख महिने मे एक बार आता है.... ब्लाग जिवित है.... रचनाकार के आकड़े देख लिजीये .. वैसे आपने अपनी पढे जाने वाले ब्लागो की सूची कब नविनीकृत की थी ? नये ब्लाग आये है.... नये बेहतरीन लेखक....
शिखा वार्ष्णेय
जो लिखने वाले थे वे आज भी बने हुए हैं, और पढ़े भी जा रहे हैं. हाँ जिनका उद्देश्य कुछ और था वे छट गए हैं परन्तु इससे ब्लॉगिंग को कोई हानि नहीं हुई है. ऐसा लगता है कि ब्लॉग अब कोई लिखता पढता नहीं क्योंकि पुराने जिन लोगों के हम अभ्यस्त थे उनमें से कम दीखते हैं. परन्तु नए लिखने वाले भी आये हैं और पढ़ने वाले भी पठनीय ब्लॉग्स की रीडरशिप आज भी बनी हुई है.
सलिल वर्मा
दरसल जिस दुर्दिन की बात आपने कही है वो तो चिट्ठाजगत बन्द होने के बाद ही शुरू हो गया था... टॉप टेन की दौड़ ने बहुत दौड़ाया लोगों को... लेकिन जो उस दौड़ से बाहर ईमानदारी से लिख रहे थे, वे अब भी लिख रहे हैं और उन्हें इससे कोई अंतर नहीं पड़ा. हाँ फेसबुक को ही अब लोगों ने ब्लॉग का पर्याय बनाकर यहीं पर पोस्ट ठेलना शुरू कर दिया है! यहाँ भी वही होड़ लगी है!!ब्लॉग के सूनेपन का स्यापा करने वाले सारे लोग एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि क्या वे पढने का समय निकाल पाते हैं ब्लॉग पढने का?? चुँकि वो नहीं लिखते, इसलिये पढते भी नहीं! और पढते भी तब हैं जब अपना कुछ पोस्ट करना होता है!!तू मेरी खुजा मैं तेरी खुजाऊँ - यह मुहावरा ब्लॉग जगत की देन है.. लेकिन कितनों ने इसे झूठ साबित करने की ईमानदार कोशिश की है!!
रविशंकर श्रीवास्तव (रतलामी जी )
आपका कहना है कि ब्लॉगों की पठनीयता गिरी है - जबकि हुआ इसके उलट है. जब हमने शुुरुआत की थी तो दिन में 10 लोग पढ़ते थे - वह भी जब कुछ नया लिखो. अब तो गूगल सर्च से ही पुराना माल हजारों की संख्या में पढ़ा और उपयोग किया जा रहा है!
निशांत मिश्र
ब्लॉगिग को लेकर लोगों में जो जोश था वह नदारद है. एक नई क्रॉप आई है ब्लॉगिंग में जो इससे होने वाली संभावित कमाई को देखकर योजनाबद्ध तरीके से ब्लॉगिंग कर रही है. हिंदी में वे बहुत कम हैं.
सतीश चन्द्र सत्यार्थी
शुरू में हिन्दी ब्लोग्स पर व्यक्तिगत बातें ज्यादा होती थीं.. या फिर कविता कहानियाँ.. धीरे धीरे सब्जेक्ट स्पेसिफिक ब्लोग्स आ रहे हैं हिन्दी में, तकनीक, विज्ञान, साहित्य, राजनीति, फोटोग्राफी, कूकिंग वगैरह विषयों पर.. लोगों के काम की चीजें स्तरीय सामग्री के साथ हिन्दी में नेट पर आयेंगी तभी पढ़ने वाले भी गूगल से आयेंगे. जिन ब्लोगों पे ये सब है उनपर पाठक आते हैं और आते रहेंगे.
मनीष कुमार
अगर आपका content काम का है तो लोग उसे खोज खोज कर पढ़ने आते हैं। जो भी ब्लॉग शुरु से ऐसा करते आए हैं वो फल फूल रहे हैं। हाँ इस content तक पहुँचने के लिए हिंदी भाषी जनता के लिए अच्छे टूल्स उपलब्ध करने की आवश्यकता है। ब्लॉगरों ने पिछले कुछ सालों से इसके लिए सोशल मीडिया का प्रयोग किया है पर इंटरनेट पर उपलब्ध वेब एप्लीकेशन इसमें महत्त्वपूर्ण भुमिका निभा सकते हैं। हाल ही में भारतीय भाषाओं से जुड़े एक वेब एप्लीकेशन ने मेरे एक ब्लॉग को हिंदी में यात्रा संबंधी जानकारी के लिए समाचार पत्रों के साथ जगह दी। नतीज़े के तौर पर पाँच सौ से हजार प्रति पोस्ट से आंकड़ा कुछ दिनों में ही कई हजार तक पहुँच गया।
डॉ. मोनिका शर्मा
ब्लॉगिंग में नए लोग आ रहे हैं और पुराने भी लिख रहे हैं , पर निश्चित रूप से ब्लॉग्स की पाठक संख्या कम हुयी है | लेखन भी कम हुआ है | गिनती के ब्लॉगर्स हैं जो आज भी उसी तरह नियमित लेख लिख रहे हैं जैसे दो तीन साल पहले .....इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम तो है पर इसका प्रभाव तभी दीखता है जब पाठक पोस्ट पढ़ने आते हैं | अपने विचार रखते हैं | किसी विषय पर सधी और सार्थक बहस होती है | नए दृष्टिकोण निकलकर सामने आते हैं | ब्लॉगिंग में अब ये नहीं हो रहा है, और इसी के चलते अभिव्यक्ति के इस माध्यम की गति में ठहराव आया है |
हरिवंश शर्मा
फेस बुक के माध्यम से ही हम जान पाए है ब्लॉग को। फेस बुक पर स्टेटस ओर की गई टिपणी महज चुटकुले सामान है,एक पानी का बुलबुला है। ब्लॉग पड़ने का एक अनूठा अपना सा आनंद है।
संतोष त्रिवेदी
जो चुक गए हैं, उनका जोश भी ठंडा हो गया है पर नए लोग खूब आ रहे हैं। कुछ पुरनिया अभी भी डटे हुए हैं।
अभिषेक मिश्रा
किसी विषय पर विस्तार से अभिव्यक्ति तो ब्लॉग पर ही प्रभावशाली है।
अनूप शुक्ल
मुझे नहीं लगता कि ब्लॉगिंग कि अभिव्यक्ति के किसी अन्य माध्यम से कोई खतरा है। फ़ेसबुक और ट्विटर से बिल्कुलै नहीं है। इन सबको ब्लॉगर अपने प्रचार के लिये प्रयोग करता है। इनसे काहे का खतरा जी!
ब्लॉगिंग आम आदमी की अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। आम आदमी इससे लगातार जुड़ रहा है। समय के साथ कुछ खास बन चुके लोगों के लिखने न लिखने से इसकी सेहत पर असर नहीं पड़ेगा। अपने सात साल के अनुभव में मैंने तमाम नये ब्लॉगरों को आते , उनको अच्छा , बहुत अच्छा लिखते और फ़िर लिखना बंद करते देखा है। लेकिन नये लोगों का आना और उनका अच्छा लिखने का सिलसिला बदस्तूर जारी है- पता लगते भले देर होती हो समुचित संकलक के अभाव में।जरूरी नहीं है फ़िर भी ये कहना चाहते हैं कि हम ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर तीनों का उपयोग करते हैं। समय कम होता है तो फ़ेसबुक/ट्विटर का उपयोग करते हैं लेकिन जब भी मौका मिलता है दऊड़ के अपने ब्लॉग पर आते हैं पोस्ट लिखने के लिए।
रंजू भाटिया
मेरे जैसे कुछ लोग है ब्लॉग लिखते हैं पढ़ते हैं ,आदत में यह अब शुमार है , हिंदी ब्लॉग्स पहले भी इंग्लिश ब्लॉग्स की तुलना में अधिक तवज़्ज़ो नहीं पाते थे पर अभी घुम्मकड़ी के शौक में यह पता चला की आज कल फ्री लांस राइटर से अधिक ब्लॉग लिखने वालों को बुलाया जाता है। मैंने हैरान हो कर पूछा क्या उस में हिंदी ब्लॉगर भी है?तो जवाब हाँ मिला ,अब हिंदी ब्लॉगर वाकई उस में शामिल है तो यह एक उम्मीद की किरण है वैसे भी हिंदी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं.
सतीश सक्सेना
मैंने तो पिछले एक वर्ष में पहले से अधिक पोस्ट लिखी हैं और नियमित रहा हूँ , आने वाले विजिटर भी बढे हैं।
चलते चलते मोनिका जैन
हम तो जब तक हैं हमारा ब्लॉग रहेगा और झाँकने वाले भी हमेशा रहेंगे


अब आप ही बताईये कि क्या  फेसबुक पर गंभीर चर्चा नहीं हो सकती?

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