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मंगलवार, 7 मई 2013

घर में घुस आया वह अनचाहा संगीतज्ञ!

वह संगीतज्ञ कब से हमारे घर में घुसा बैठा था मुझे पता ही नहीं चला . वो तो रात में पहली झपकी के दौरान ही एक ऐसे तेज संगीत से नीद उचट गयी जिसके आगे जाज और बीटल्स सब फेल थे ....नींद टूटने के बाद अपने को संयत करते हुए ध्यान संगीत के स्रोत की और फोकस किया ...ऐसा लगा कि कर्कश संगीत लहरियां मेरे स्टडी रूम से आ रही हैं। भारी मन से उठा और ताकि देख सकूं यह बिन बुलाया मेहमान कब से चुपके से आ गया था मेरे स्टडी कक्ष में -जयशंकर प्रसाद की एक कविता भी अनायास याद आयी -पथिक आ गया एक न मैंने पहचाना ,हुए नहीं पद शब्द न मैंने जाना ...कर्कश स्वर लहरी के बीच यह रोमांटिक कविता का यकायक स्मरण होना और नींद में खलल पड़ना -इस सिचुएशन पर एक बेबस मुस्कराहट भी होठों पर आ धमकी ...बहरहाल अब मैं अपने स्टडी कक्ष में था मगर ऐसा लगा आवाज कभी इधर तो कभी उधर से आ रही थी ....

रात के ११ बज रहे थे और मैं अपने स्टडी कक्ष  के दरो दीवार को निहार रहा था कि आखिर संगीत  लहरियां फूट कहाँ से रही हैं? मैं इधर उधर नजरे घुमाता उस संगीतज्ञ को ढूंढो ढूंढो रे की तर्ज पर ढूंढ रहा था .आखिर वह मिल ही गया .दरवाजे के कोने में संगीत की तान लेता वह पकड़ा गया .अब आपकी जिज्ञासा को और भटकाने के बजाय बता ही दूं कि ये एक झींगुर महराज थे जो मदमस्त हो गाये  जा रहे थे -मगर स्वर लहरी इतनी कर्कश कि सोता हुआ उठ के बैठ जाय और मुर्दा भी उठ के भाग जाय . जी हाँ ! मैंने उन्हें उनके पंखों से उठा कर बाहर फेंक दिया ...थोड़ी देर तो शान्ति रही मगर फिर वही संगीत बाहर से भी सुनायी पड़ने लगा. दरअसल झींगुर यानी 'क्रिकेट' अपने आगे के आरीनुमा पंखों को रगड़ कर यह आवाज पैदा करते हैं . यह खुद से दुश्मनों /रकीबों को दूर रखने का तरीका तो है ही, साथ ही मादाओं को प्रणय के लिए रिझाने की कवायद भी है .
 
आखिर मिल ही गए महाशय !
झींगुरों द्वारा संगीत उत्पन्न करने की इस प्रक्रिया को स्ट्रिडुलेशन कहा जाता है . इन्हें एक और करामात आती है जिसे वेन्ट्रीलोक्विजम कहते हैं . यह भला वेन्ट्रीलोक्विजम क्या है ? यह एक ऐसी आश्चर्यजनक क्षमता है जिससे आवाज को उसके निकलने के मूल स्थान के बजाय किसी और स्थान से निकलने का आभास होता  है . यही कारण है कि जब भी कोई झींगुर आवाजें निकाल रहा हो आप उसे आसानी से ढूंढ नहीं सकते क्योकि आवाज कहीं और से निकलती सुनायी देती है . इस कला में कुछ पुतलेबाज भी माहिर होते हैं जो बोलते तो खुद है मगर उनकी आवाज पुतले के मुंह से निकलती हुयी लगती है .


प्राचीन काल के मंदिरों के पुजारी इस कला के माहिर हुआ करते थे और मंदिर में आये अपने जजमानों को सहसा 'आकाशवाणी' सुना कर चमत्कृत करते थे -मतलब वे बोलते तो खुद थे मगर ऐसा लगता था कि आवाज कहीं दूर से आ रही है -इसमें पेट की मांसपेशियों के सहारे फेफड़ों पर बल देकर आवाज को प्रोजेक्ट किया जाता था .....इसलिए इस कला का नाम पेट बोली भी है .  अब यह लुप्तप्राय है मगर झींगुरों में अभी भी यह क्षमता विद्यमान है -सच कहता हूँ उस रात इस कीट महराज ने मुझे काफी छकाया मगर मैं भी कुछ कम जीव नहीं ,जीव विज्ञान का खिलाड़ी हूँ सो साहबजादे को ढूंढ ही निकाला .


तनिक आप भी सुनें न यह संगीत!

अब अगली बार जब आपका पाला किसी संगीत रस में डूबे झींगुर मोशाय से पड़  जाय तो तनिक उन्हें ढूँढने का प्रयास करियेगा -अरे अरे उस दिशा में नहीं, जहाँ से आवाज आ रही हो बल्कि उससे  अलग कहीं भी :-) हमने कितने ही गुण इन कीट पतंगों और जीव जंतुओं से सीखे हैं और आज उसी पर एक नयी प्रौद्योगिकी ही आकार ले रही है जिसका नाम है बायो-मिमिक्री यानी जैव अनुहरण जिसके बारे में कभी विस्तार से साईब्लाग पर चर्चा होगी . अब बताईये कैसी लगी यह पोस्ट? :-)

शनिवार, 4 मई 2013

भरत, भौंरा और चम्पे का फूल

भरत त्यागी हैं ,वैरागी भी हैं . राम को वापस लेने के लिए जब वे प्रयाग पहुंचते हैं तो भारद्वाज ऋषि उनका  आवाभगत करते हैं . हो सकता है भरत  के उसी सेवा सत्कार से हिन्दी का यह आवाभगत शब्द महिमामंडित हुआ हो -आवाभगत अर्थात भगत आये जिसमें उनकी सेवा सुश्रुषा का भाव अंतर्निहित है . वैसे इस शब्द के उद्भव पर किसी वैयाकरण की व्याख्या अपेक्षित है . भारद्वाज जी जान ही  रहे थे कि भरत राम के वियोग में अत्यंत व्यथित हैं ,उद्विग्न हैं तो उनका मन बहलाने को वे बहुविध प्रयास करते हैं। छप्पन भोग  के उपरान्त आंनंद और आराम के तमाम साजो सामान और यहाँ तक कि गणिकाएं वनिताएँ भी उन्हें मुहैया होती हैं . मगर भरत पूरी तरह उदासीन ही रहते हैं .
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

दो0-संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।(अयोध्याकाण्ड ) 

( बसंत  ऋतु  की त्रिविध समीर बह रही है .सभी प्रकार की सुख सुविधा - धर्म अर्थ काम मोक्ष के  चारो पदार्थ उपलब्ध है -माला चन्दन स्त्री आदि भोगों की उपलब्धता से लोग हर्षित विस्मित है , मगर भरत रूपी चकवे  के लिए इन  सभी चकई रूपी सामग्री से कोई लगाव नहीं है भले ही इन्हें मुनि ने एक पिंजरे में रात भर रखने का प्रयास किया और सुबह हो गयी .)
मगर आज की पोस्ट का मुख्य हेतु यह नहीं है . भारत वापस जब अयोध्या लौट आते हैं तब भी वीतराग ही रहते हैं . तुलसी प्रकृति के भी पारखी कवि हैं -उनका प्रकृति निरीक्षण अद्भुत हैं -वीतरागी भरत की तुलना वे भौरे से करते हैं और यही मेरी दुविधा का प्रश्न लम्बे समय से बना रहा -तुलसी कहते हैं -
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा चंचरीक जिमि चम्पक बागा ..अर्थात विरागी भरत राम विहीन अयोध्या में वैसे ही रहते हैं जैसे चंपा जैसे सुगन्धित पुष्प के बाग़ में भौरा .....बस यही बात मेरे मन में खटक जाती थी .....भौरा क्या चंपा के फूल से आकर्षित नहीं होता ? हिमांशु जी ने भी ऐसी ही व्याख्या अपने चंपा के फूल की पोस्ट पर की है -"खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता । झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति - अनोखा है यह पुष्प । यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते । बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था - जैसे भौरा चंपक के बाग में हो । सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं" .अब पता नहीं हिमांशु जी ने यह विचित्र भ्रमर व्यवहार खुद देखा है या नहीं -मैंने भी नहीं देखा मगर जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि क्या सचमुच भौरे को चंपा के पुष्पों से परहेज है . वर्षों से मानस की इस अर्धाली ने मुझे व्यग्र कर रखा था .

 मदार पुष्प पर भौरा

अब यहाँ राबर्ट्सगंज में यह गुत्थी अचानक ही सुलझती नज़र आयी .एक दिन मैंने सुबह सुबह ही देखा कि मदार के   (Calotropis) समूहों पर भौरे झुण्ड के झुंड मंडरा रहे हैं -तो इन्हें चंपा नहीं मदार के पुष्प पसंद हैं . मगर क्यों ? क्या मदार के पुष्पों में परागण -निषेचन इन्ही भौरों से ही संभव हो पाता है? और यह मदार और भ्रमर सम्बन्ध इसलिए ही प्रगाढ़ बन गया हो ? कोई वनस्पति विज्ञानी क्या इस भ्रमर व्यवहार पर प्रकाश डालेगा ? एक साहित्यकार ने तो अपना प्रेक्षण पूरा किया मगर वैज्ञानिक विश्लेषण तो विज्ञानियों के जिम्मे है . इसी पोस्ट में तुलसी के ऊपर उद्धृत दोहे में चकवा चकई का उद्धरण दिया गया है . और यह साहित्यिक मान्यता है कि यह पक्षी युग्म -नर मादा रात में बिछड़ जाते हैं और इसलिए एक दूसरे  को ढूँढने की बोली लगाते रहते हैं। तुलसी ने भारद्वाज मुनि द्वारा भरत  के सेवा सत्कार में इसी साहित्यिक सत्य का उद्घाटन किया है कि संपत्ति सुख साधन रूपी चकई और भरत रूपी चकवे को भारद्वाज ऋषि द्वारा एक पिंजरे में बंद कर देने के बावजूद  भी उनमें संयोग नहीं हो पाया और सुबह हो गयी ... चकवे चकई के इस अभिशप्त  रात्रिकालीन वियोग का क्या कोई वैज्ञानिक विवेचन भी है ? इस पर कभी फिर चर्चा होगी .

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

सागर सागर फिरती मारी एक अकेली व्हेल बिचारी


एक अजूबा है. वैज्ञानिकों के एक दल ने ऐसे अकेले व्हेल (नर या  मादा पता नहीं) का पता पा लिया है जिसे आज तक कोई संगी साथी नहीं मिला और वह सात समुद्रों तक उनकी तलाश में दर दर भटक रही है ...कारण है उसका प्रणय राग जिसका तरंग दैर्ध्य इतना ज्यादा -५२ हर्टज( ध्वनि की तीव्रता का पैमाना ) है कि कोई भी दीगर व्हेल उसे सुन ही नहीं सकती ....इसलिए वह बिचारी सारी दुनिया के सागरों में अपना  संगी साथी   ढूंढ रही है ..मीत ना मिला न कोई की तान छेड़े हुए ....वैज्ञानिक भी परेशान कि आखिर उसे किसी साथी से मिलाये तो कैसे ...इतने भारी भरकम जीव के साथ इंतजाम भी भारी भरकम हो तो बात बने मगर ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है -दूसरी मुसीबत यह कि यह अज्ञात प्रजाति की अकेली व्हेल दिखी है -मतलब अब तक इसके प्रजाति की पहचान नहीं हो पायी है .वैज्ञानिक भी चकराए हुए हैं कि आखिर यह आयी कहाँ से? 
                                          Photo credit: USGS/National Biological Information 
अपने प्रजाति (जिसका अता पता नहीं है अब तक ) से अलग थलग पडी इस  व्हेल का मानो जाति निकाला हो गया हो ....और अब तो यह उनसे या किसी अन्य व्हेल प्रजाति से संवाद भी कायम नहीं कर पा रही है -इसके  प्रणय राग अब अरण्य रोदन बन बैठे हैं . कोई सुनने वाला नहीं मगर यह भी अपनी धुन की ऐसी पक्की कि अपनी  विरह राग छेड़े हुए सागर सागर एक किये हुए है ...कभी तो मिलेगा मन का मीत .....सबसे पहले यह अमेरिकी नेवी के अफसरों को १९८९ में दिखी जब उन्होंने अपने श्रव्य उपकरणों पर एक अजीब सी फ्रीक्वेंसी की  आवाजें सुनी.जहां दूसरी व्हेलें १५-२५ हर्ट्ज़ पर ताने छेड़ती  हैं इसका इतना ऊंचा तान -तरंग दैर्ध्य होना वैज्ञानिकों को हैरत में डाले हुए है . ब्ल्यू व्हेल तो काफी कम तरंग दैर्ध्य -पियानो के करीब करीब राग छेड़ती है.
  
वैज्ञानिक वैसे तो इसकी इस बिल्कुल यूनीक आवाज के चलते इसे आराम से सागर सागर ढूंढ ले रहे हैं मगर वे असहाय भी हो चले हैं कि इसका कोई जीवन संगी आखिर कैसे ढूंढ लायें . कैसे इसका चिर अकेलापन दूर करें ....अभी तक उन्हें यही पता नहीं लग पाया है कि इस व्हेल की संवाद और सामुद्रिक संचार में असमर्थता का कारण क्या है? क्या यह कोई आकस्मिक वर्ण संकर उत्पत्ति तो नहीं है जो अपने भिन्न माँ और पिता  प्रजाति से बिल्कुल अलग व्यवहार प्रदर्शन कर रही हो जिसमें यह विशिष्ट तरंगदैर्ध्य की तान भी सम्मिलित है ? एक जीव -भाषा विज्ञानी का तो कहना है कि यह शायद उससे भी ज्यादा दुखियारी है जितना हम समझ रहे हैं और अनन्त  सागर में टूटा दिल लिए विचर रही है . सागर का कोई कोना शायद अब इसका होना नसीब नहीं है ....आप सामान्य और इस दुखियारी व्हेल का प्रणय राग यहाँ जाकर सुन सकते हैं ....
हम मानव प्रजाति में भी कितनों की व्यथा कथा भी कुछ ऐसी ही है -विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना ,उमड़ी कल थी मिट आज चली मैं नीर भरी दुःख की बदली ...मशहूर कवयित्री के उदगार तो ऐसे ही लगते हैं ....आईये हम इस व्हेल के लिए दुआ करें! 

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

माया युद्ध -पुराणकार की अद्भुत सोच!


भारत ने अंतर महाद्वीपीय मिसाइल अग्नि-5  के प्रक्षेपण के साथ ही सैन्य क्षमता के लिहाज से पूरी दुनिया में एक गौरवभरा मुकाम हासिल कर लिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक एंटी मिसाइल की भी मारक क्षमता लिए हुए है - यानी दुश्मन की मिसाइल को लक्ष्य पर पहुंचने के पहले ही उसे  मार्ग में ही नष्ट करने की क्षमता...एक ऐसे युद्ध में पारंगत होने की क्षमता जिसका रोमांचपूर्ण विवरण हमें महाभारत और रामायण की युद्ध कथाओं में देखने को मिलता है. आज जब टेक्नोलॉजी का विकास हो गया है तो हम अपने पुराणकारों द्वारा कल्पित के कितने ही युद्ध तकनीकों को साकार कर रहे हैं. दैत्यों द्वारा संधान किये कितने ही आयुध, अस्त्र शस्त्र वायुमार्ग में ही देवताओं द्वारा विनष्ट कर दिए जाते थे...आज की गाईडेड  मिसाइल्स और एंटी बैलिस्टिक मिसाइल्स हमारी उसी पौराणिक सोच का साक्षात नमूना है .

हमारे पुराण युद्ध के अनेक कला कौशलों, अनेक तरह के आयुध-अस्त्र शस्त्र के रोमांचपूर्ण विवरणों से भरे पड़े हैं. आज के सैन्य सुरक्षा वैज्ञानिक उनसे कई सूझें ले सकते हैं. कृष्ण का सुदर्शन चक्र गाइडेड मिसाइल की ही तरह तो काम करता है - दुश्मन का काम तमाम किया फिर वापस अपने स्वामी के पास. भगवान राम के बाण दुश्मन का बाल बांका करके वापस अपने तरकश में आ जाते थे. यह अस्त्र शस्त्रों के उपयोग-प्रबंध की कितनी उपयुक्त सूझ है। कम खर्च बाला नशी...मतलब कम ही अस्त्र में किला फतह। अम्बार लगाने की जरुरत नहीं। कम ही अस्त्र हों पर अचूक और कारगर हों!कितने दूर की कौड़ी ले आये थे पुराणकार...आज जब हमारे पास प्रौद्योगिकी है तो हम उन विचारों को मूर्त रूप दे रहे हैं. मगर अभी भी हम पुराणों में वर्णित अनेक युद्ध कौशल और अस्त्र शस्त्रों को अमली जामा नहीं पहना पाए हैं।यद्यपि आज हमारे पास ब्रह्मास्त्र या नारायणास्त्र के आधुनिक स्वरुप- नाभकीय बम मौजूद हैं, जिनके इस्तेमाल से कुछ उसी तरह का दृश्य साकार हो उठता है जैसा पुराणों में दर्शित है -भीषण चमक ,आवाज ,भूकंप और पल भर में सब कुछ स्वाहा .मगर एसे भीषण और दुर्धर्ष आयुधों के आम इस्तेमाल पर तब भी प्रतिबन्ध थे -उनका महज मन मौज के रूप में इस्तेमाल वर्जित था - बस बेहद अपरिहार्य दशा में वे चलाए जा सकते थे...एक बड़ी रोचक कथा इस बारे में महाभारत में मौजूद है -आइए, संक्षेप में फिर उसकी स्मृति ताजा कर लें...

महाभारत के सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा के एक क्रूर कर्म का उल्लेख है कि किस तरह उसने द्रौपदी के पुत्रों की नृशंस हत्या कर दी थी। दुर्योधन की अंतिम इच्छा को पूरा करने के चक्कर में उसने भ्रम वश पांचों पांडवों का सर काटने के बजाय मुंह ढंक कर सोये उनके बच्चों का सर काट लिया था। और यह दुष्कृत्य करके वह गंगा के किनारे एक निर्जन स्थल पर छुपा था। मर्माहत और क्रोध की ज्वाला से भरे पांडवों ने उसके वध का निश्चय किया। मगर यह इतना आसान नहीं था। उसके पास ब्रह्मास्त्र था. जो डर था वही हुआ। अस्त्र शस्त्र से लैस ललकारते हुए पांडवों को अपनी ओर आते देख मृत्युभय से उसने ब्रह्मास्त्र चला ही तो दिया। पांडवों के तारणहार श्री कृष्ण ने तत्काल ब्रह्मास्त्र की काट की युक्ति सुझाई, "ब्रह्मास्त्र के कोप से बचने के लिए सब आत्म समर्पण की मुद्रा में आ जाएं। रथों से उतर पड़ें और अर्जुन तुम ब्रह्मास्त्र की काट के लिए ब्रह्मास्त्र का ही संधान करो।" अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चला दिया। प्रलयंकारी दृश्य उपस्थित हो गया। अग्नि की विशाल ज्वालाएं निकलने लगीं, आसमान से उल्कापात आरम्भ हो गया। प्रचंड वायु चल पड़ी...धरती डोलने लगी...हाहाकार मच गया...पर्वत गिरने लगे...नदियां बाहर उमड़ पडीं...यह भीषण दृश्य देख महर्षि व्यास और नारद तत्क्षण वहां उपस्थित हुए और जवाबदेही चाही कि, " प्राणी मात्र के अस्तित्व को नष्ट करने की क्षमता वाले इन महान अनिष्टकारी अस्त्रों का प्रयोग क्यों किया गया?" अर्जुन विनम्र हुए और अपने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाने का यत्न इस आशंका के साथ किया कि तब तो अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र हमें ख़त्म कर देगा।" उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बचाव में ब्रह्मास्त्र का संधान करना पड़ा क्योकि अश्वत्थामा ने इसे पहले ही चला दिया था...अन्ततोगत्वा अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का प्रभाव उत्तरा के गर्भ पर पड़ा। मगर कृष्ण की महिमा से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई और राजा परीक्षित जन्मे।यह दृष्टांत भयंकर अनिष्टकारी आयुधों के जवाब में प्रति संहारक आयुध के इस्तेमाल की अपरिहार्यता का संकेत करता है। राहत की बात है कि अब भारत भी ऐसे प्रति संहारक अस्त्रों की क्षमता से युक्त है।
माया युद्ध?

हमारे पुराणों में वर्णित अभी कई युद्ध कला कौशल हमारे  लिए प्रेरणा के स्रोत ही हैं, जैसे मय दानव और मेघनाथ के द्वारा संचालित माया युद्ध जिसमें भीषण की युद्ध की प्रतीति भर थी और डर कर दुश्मन आत्म समर्पण के लिए मजबूर हो जाता था। कैसी युद्ध रणनीति थी वह जहां कोई वास्तविक हानि नहीं थी...बस ऐसे भयावह दृश्य होते थे कि प्रतिपक्षी दहशत में आ जाता था - मेघनाथ ने जब माया का विस्तार किया तो राम की सेना ने एक नहीं अनेक मेघनाथ देखे। राम और लक्ष्मण को मृत देखा। यह आभासी युद्ध तब ही ख़त्म हुआ जब राम ने अपने मायारोधी बाणों से उनका प्रभाव ख़त्म कर दिया। ऐसे माया-मायावी युद्ध की तकनीक क्या कभी विकसित हो सकेगी। यह टेक्नॉलजी और सैन्य आयुध विशेषज्ञों के लिए एक चुनौती है।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मंगल पर निस दिन मंगल हो और चाँद पर हो इक आशियां!


यह सचमुच हैरान करने वाली बात है कि हमारे आदि पूर्वजों ने भी कभी अन्तरिक्ष में एक शहर बसाने का सपना देखा था ....इस बारे में मय दानव और उसके द्वारा बसाए गए त्रिपुर नामक अन्तरिक्ष की कथा बड़ी रोचक है ..मय एक मायावी दानव था मगर हर तरह के छल प्रपंच और माया के विस्तार के बावजूद भी वह देवताओं से युद्ध में पराजित हो गया था ...उसने घोर तप किया और ब्रह्मा से अन्तरिक्ष में नगर बसाने का वरदान मांग लिया ....और फिर उसने त्रिपुर नामका अन्तरिक्ष शहर बनाया .जैसा कि नाम से जाहिर है त्रिपुर  तीन छोटे शहरों को मिलाकर बनाया गया था जिनके नाम थे-अयसपुर,रजतपुर और सुवर्ण नगर ...इन सभी शहरों की अपनी विशेषताएं थीं ,जैसे अयसपुर यानि लौहपुर मजबूती  के कारण ,रुपहली आभा वाला रजतपुर और सोने सा दिखने वाला सुवर्णपुर अपनी चमक के कारण विख्यात हुआ ..इन सभी नगरों में बहुमंजिली इमारतें ,सड़कें, तालाब,बाग़ , झरने, तरह तरह के पशु पक्षी और वृक्ष सभी तो थे .एक नगर से दूसरे नगर तक की हवाई यात्रा के लिए विमान भी थे...पुराकथा  के मुताबिक़ ये तीनों नगर धरती से सौ योजन की दूरी पर   एक तारे सदृश दिखते थे.....मय राक्षस अपने बन्धु बांधवों के साथ यहाँ  विलासपूर्वक रहता था, मगर एक बार शंकर के कुपित हो जाने  पर उनके द्वारा इन नगरों को भस्म कर दिया गया .....शंकर का एक नाम इसलिए ही त्रिपुरारि है! 

एक ऐसी ही कथा त्रिशंकु की भी है जिसे विश्वामित्र ने अपने तपोबल से सीधे स्वर्ग भेज दिया था ....चूंकि धरती से सशरीर स्वर्ग की यात्रा दैविक  नियम के अनुकूल नहीं थी /है अतः इंद्र ने उसे स्वर्ग द्वार से ही नीचे ढकेल दिया .  बिचारा त्रिशंकु औधे मुंह नीचे गिरने लगा ..उसकी आर्तनाद से विश्वामित्र ने कुपित हो उसे बीच में ही रोक दिया ...पौराणिक मान्यता के अनुसार आज भी औधे मुंह त्रिशंकु वहीं धरती और स्वर्ग की देहरी -अधर में लटका हुआ है ..उसके मुंह से निकली लार से कर्मनाशा नदी की निर्मिति हुई है ....

अन्तरिक्ष में नगर बसाने की  सोच केवल एक कपोल कल्पना भर ही नहीं रह गयी ....आज हम सभी जानते हैं कि अन्तरिक्ष स्पेस स्टेशन एक हकीकत है और अन्तरिक्ष में  गतिमान है ....यह एक कृत्रिम उपग्रह की तरह  अन्तरिक्ष की एक निचली कक्षा में स्थापित है .और धरती से नंगी आँखों से देखा जा सकता है . इसमें दो चार अन्तरिक्ष वासी निवास भी कर सकते हैं,बल्कि रूसी और अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री वाहना रुकते भी रहे हैं . .आज अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के पास ऐसे अन्तरिक्ष के रैन बसेरों ,होटलों के ब्लू प्रिंट मौजूद हैं जहाँ लोग सैर सपाटे के लिए ,हनीमून के लिए जा सकते हैं ...अन्तरिक्ष के पर्यटन उद्योग का एक भरा पूरा स्वरुप अंगडाई लेने लगा है. 

प्रसिद्ध इतालवी -फ्रांसीसी गणितज्ञ जोसेफ लुयिओस लाग्रेंज ने १७७२ में गणितीय आधार पर यह साबित किया कि सूर्य ,धरती और चन्द्रमा के  गुरुत्व के मध्य एक ऐसा बिंदु है जहां गुरुत्वाकर्षण बल नगण्य है यानि वहां कोई भी वस्तु स्थापित हो तो स्थिर रहेगा ..इन्हें आज लाग्रेजियन बिंदुकहा जाता है और उन्ही गुरुत्व हीन स्थानों में ही भविष्य की अन्तरिक्ष बस्तियों के बसाए जाने की कवायद है . क्या यह रोचक नहीं कि हमारे पुराणकारों की कल्पनाएँ अब उपयुक्त प्रौद्योगिकी के विकास के चलते  साकार होने लगी हैं ....कितना अच्छा हो  यदि भविष्य की किसी अन्तरिक्ष बस्ती का नाम  त्रिपुर या त्रिशंकु रखा जाता .... 


      
अन्तरिक्ष स्पेश स्टेशन अब एक हकीकत है 
प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार आर्थर सी क्लार्क ने १९४५ मे एक लेख लिखा था जिसमे यह दर्शाया गया था कि यदि अन्तरिक्ष की भू स्थिर कक्षाओं मे उपग्रहों को स्थापित कर उनसे संचार संवहन कराया जाय तो समूची दुनिया मे एक साथ ही सहजता से संचार स्थापित हो सकता है .यद्यपि उन्होंने इस युक्ति को पेटेंट नही कराया मगर उनका यह स्वप्न जल्दी ही साकार हुआ और एक दशक बीतते बीतते पहला संचार उपग्रह धरती के भू स्थिर कक्षा मे स्थापित कर दिया गया . आज अंतर्जाल पर हमारी गतिशीलता इन्ही संचार उपग्रहों की ही देन है ..क्लार्क ने  1940 में यह भी घोषणा की थी कि मनुष्य सन १९८० के दशक तक तक चांद पर जा पहुंचेगा, चालीस के दशक में मनुष्य के चांद पर पहुंच जाने की कल्पना प्रस्तुत करने पर लोगों ने उनका उपहास किया,1969 में ही अमरीकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग ने आखिर चांद पर कदम रख ही दिए .तब अमरीका ने क्लार्क की सराहना करते हुए कहा था कि उन्होंने हमें चांद पर जाने के लिए बौद्विक रूप से प्रेरित किया.

शायद वह दिन अब बहुत दूर नहीं,मतलब अगले सौ पचास वर्षों में  ही    मंगल पर होगा निस दिन मंगल और चाँद पर हम बनायेगें इक आशियाँ ....और हमारे पुराण -मनीषियों की संकल्पनाएँ साकार हो उठेंगी .....

रविवार, 1 अप्रैल 2012

मैंने ऐसे मनाया पृथ्वी प्रहर,बोले तो अर्थ आवर


संचार माध्यमों ने कुछ ऐसी फ़िजा बनाई कि मैं भी पृथ्वी प्रहर (अर्थ आवर) मनाने को संकल्पित हो गया। अर्थ आवर आने पर उसका जोरदार स्वागत करने के लिए मोमबत्तियां वग़ैरह की खरीददारी की। सोचा कि इस अवसर को एक रूमानी संस्पर्श भी दिया जाय। क्यों न अवसर का लाभ ले कैंडिल डिनर का आनंद उठाया जाय। घुप अंधेरे में और कुछ करने की बजाय एक रूमानी डिनर पर समय व्यतीत किया जाना ज्यादा पर्यावरण हितकारी लगा। वैसे भी घुप अंधेरे में दिमाग को खाली तो कदापि न रखा जाए, क्योंकि वह कहावत तो है ही न कि 'खाली दिमाग शैतान का घर होता है'। बहरहाल पृथ्वी प्रहर के आते ही हमारा डिनर तैयार था। आज हमारा भी रसोई में प्रवेश निषिद्ध नहीं था, तो मैंने भी हाथ बटाया। खाना सुस्वादु होना ही था। उठ रही सुगंध इसकी गवाही दे रही थी। पृथ्वी प्रहर आन पहुंचा था। हमने सारे कमरों की बत्ती बुझाने के लिए मेन स्विच ऑफ कर दिया और डिनर टेबल पर सजे सुस्वादु भोजन का आनंद हम दंपती आराम से पुराने रूमानी दिनों की याद करते हुए उठाते रहे। साढ़े आठ से साढ़े नौ का समय भी कब पूरा हो गया पता ही नहीं लगा। मैंने ठीक साढ़े नौ बजे मेन स्विच ऑन कर दिया।

मगर यह क्या? बिजली तो नदारद थी। ओह तो अब पृथ्वी प्रहर मनाने का सरकारी टाइम आ गया था। अपनी सरकार तो रोज ही पृथ्वी प्रहर मनाती है, एक घंटे का नहीं घंटों का। कई-कई घंटों का, चौबीस घंटे में कई अंतरालों पर अपनी सरकार नित्य प्रति पृथ्वी प्रहर मनाती है। अचानक ही विचारों का एक रेला आया और इस पोस्ट की जुगाड़ कर गया। जिस देश में सरकारें रोज ही पृथ्वी प्रहर मना रही हों वहां क्या किसी एक दिन पृथ्वी प्रहर मनाने का कोई औचित्य भी है? हम प्रायः पश्चिमी देशों के विचार और बहिष्कृत तकनीकी अपनाने के आदी हो चले हैं, मगर यह भी तो देखें की वहां पल भर को भी बिजली नहीं जाती, जबकि हमारी अधिकांश आबादी पहले से ही अंधेरे में सोने को अभ्यस्त है। तमाम पश्चिमी देशों ने नाभिकीय बिजली अपना ली है मगर आज भी हमारे देश में पनबिजली का ही आसरा है, जो ज्यादातर प्रदेशों में शहरों तक में भी 15-16 घंटे से अधिक उपलब्ध नहीं रहती, गांव की तो बात ही छोड़िए। मगर, फिर भी हम पृथ्वी प्रहर मनाने को उतावले हो जाते हैं।
इन दिनो परीक्षाएं चल रही हैं। बच्चों की पढ़ाई जोरों पर है अब बिजली आई तो बच्चे पढ़ने पर, नकलची नकल की पर्ची बनाने में लगेगें कि पृथ्वी प्रहार मनाएगें? अच्छा हुआ यह अभियान यहां बनारस में तो फेल हो गया। दरअसल, हम पश्चिमी अभियानों को अपनी जमीनी हकीकत के लिहाज ने नहीं देख पाते। पर्यावरण से जुड़े ज्यादातर बुद्धिजीवी सिर्फ अकादमिक बहसों में उलझे होते हैं, जमीन से नहीं जुड़े होते।
माना कि आज धरती के संसाधनों का बड़ा दोहन हो रहा है, मगर इसमें पश्चिमी देश ही बहुत आगे हैं। उनकी प्रति व्यक्ति बिजली या अन्य ऊर्जा साधनों की खपत हमसे पहले से ही काफी अधिक है। उनका पृथ्वी प्रहर मनाया जाना जन चेतना को जागृत करने के लिए बेहद जरूरी है। मगर, ऊर्जा का उपभोग तो हमारे यहां अब भी बहुत कम है और उत्पादन भी, इसलिए ही भारत का आम आदमी ऐसे पश्चिमी अभियानों को तवज्जो नहीं दे पाता, उसके मंतव्य से मन से जुड़ ही नहीं पाता और जिस कारण से अर्थ आवर मनाया जा रहा है वह खुद वैज्ञानिकों के बीच विवादित है। वे कहते हैं वैश्विक ऊष्मन (ग्लोबल वॉर्मिंग) की ओर दुनिया का ध्यान दिलाना है। मगर, वैज्ञानिकों का एक और खेमा यह कहता फिर रहा है ग्लोबल वॉर्मिंग की बात छोड़िए हिमयुग की वापसी होने जा रही है। अब कौन गलत है और कौन सही यह आम आदमी कैसे समझे। पहले तो ये वैज्ञानिक फैसला कर लें, तब हम फैसला करें कौन सा आयोजन मनाया जाना जरूरी है। आज भारत में भी पर्यावरण अतिवादियों का एक खेमा बहुत सक्रिय है उनसे सावधान रहने की जरूरत है। यहां पृथ्वी प्रहर के आयोजन से ज्यादा जरूरी गंगा और सहायक नदियों की रक्षा है जो जीवन की आखिरी सांसें ले रही हैं।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक(पुराण कथाओं में झलकता है भविष्य-2)


धरती के जन्मे को एक न एक दिन मृत्यु का वरण करना ही है-इसलिए ही पृथ्वी को मृत्युलोक कहा गया है .मगर मृत्यु चाहता कौन है? कहते हैं जनमत मरत दुसह दुःख होई ...और यह भी कि मनुष्य की लोकेष्णायें ,चाहनायें उसे जीते रहने को प्रेरित करती रहती हैं . ग़ालिब साहब  देखिये क्या कह गए हैं -.गो हाथ को जुम्बिश नहींआँखों में तो दम हैरहने दो अभी सागरों-मीना मेरे आगे ...गरज यह कि यह जीने की तमन्ना आदमी को ठीक से मरने भी नहीं देती ...वह अमरता का सपना देखता रहता है - वह चिर यौवन का आनंद उठाना चाहता है .यह आज की नहीं हमारी आदिम सोच है . चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक कई पुराण कहानियों में दिखाई देती है। अब समुद्र मंथन को ही लें- यहां से भी चौदह रत्नों में से एक अमृत कलश था जिसे देवताओं ने पिया और वे अजर-अमर हो गये। च्यवन ऋषि ने ऐसा माजूम बनाया और खाया कि वे फिर से युवा बन गये। संजीवनी बूटी की कथा भी अमरता से जुड़ी है। कहते हैं कि संजीवनी विद्या असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास थी... देवताओं ने एक कुचाल रच कर अपने गुरु बृहस्पति के पुत्र कच को यह विद्या सीखने शुक्राचार्य के पास भेजा।

अब कच असुरों के गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रहकर संजीवनी विद्या सीखने लगा। मगर जल्दी ही असुर आश्रमवासियों को यह जानकारी प्राप्त हो गई और वह सब मिलकर कच का वध करके उसके शरीर के टुकड़े वन में ही विचरते एक भेड़िए को खिला दिए। शुक्राचार्य की बेटी देवयानी कच का बहुत ध्यान रखती थी। घर से गौए चराने के लिए कच के शाम बीत जाने के बाद भी न लौटने पर देवयानी को चिंता हुई। उसने पिता से अपनी चिंता व्यक्त की। शुक्राचार्य ने ध्यानस्थ होकर यह जान लिया गया कि राक्षसों ने कच को मारकर उसके अंगों को भेड़ियों को खिला दिया है। शुक्राचार्य ने उसी संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच जीवित हो उठा। मगर कुछ ही दिन में फिर असुरों ने मिलकर कच को मार डाला। यही नहीं मारने के बाद कच को जलाया गया और उसकी राख असुर गुरु शुक्राचार्य की मदिरा में ही मिला दी गई। अब बड़ी मुश्किल! कच का पुनर्जीवित होना अब दुष्कर कार्य था। देवयानी ने कहा कि वह बिना कच के जी नहीं सकती। शुक्राचार्य ने कच को पुकारा। भयभीत कच ने उनके पेट से ही अपनी दशा बताई। तब जाकर शुक्राचार्य ने कच को पूरी संजीवनी विद्या बताई जिसे पेट में ही सीखकर कच बाहर आ गया और फिर उसने उसी विद्या से शुक्राचार्य को जिला दिया।

अमरता की यह चाह आज भी मनुष्य को वैसे ही सालती रहती है। वैज्ञानिक आज भी प्रयोगशालाओं में ऐसे अनेक प्रयोगों में जुटे हैं जिनमें या तो मनुष्य की उम्र घटा देने की युक्ति है या फिर उसे अमरता के पास तक पहुंचा देने की ज़िद है। असाध्य रोगों से जूझ रहे मरीजों को क्रायोनिक कैप्सूलों में क़ैद कर लंबे समय तक उन्हें सस्पेंडेड एनिमेशन में रखने की जुगत तो जैसे बस कुछ वर्षों में ही सुलभ हो जाएगी। जब असाध्य रोगों का इलाज ढूंढ लिया जाएगा तब इन जिंदा लाशों को कैप्सूलों से आज़ाद कर उन्हें नया जीवन अदा कर दिया जाएगा। एक समुद्री जीव जेलीफिश की कोशिका का अध्ययन जारी है जो अमरता का वरदान पाए हुए है। जिस दिन उसकी कार्य पद्धति को वैज्ञानिक समझ जाएगें अमरता की कुंजी हमारे हाथ होगी। कुछ शोधार्थी गुणसूत्रों पर काम कर रहे हैं जिसमें एक हिस्सा टीलोमीयर उम्र बढ़ने के साथ ही घिसता जाता है। प्रयास यह है कि इस हिस्से को घिसने न दिया जाए और मनुष्य को चिर युवा बने रहने दिया जाए।

पुराणों की हमारी सोच आज विज्ञान की नई खोजों को दिशा दे रही है।

पुनश्च: मित्रों अब क्वचिदन्यतोपि की व्याप्ति नवभारत टाइम्स आनलाईन पर भी है!   

मंगलवार, 27 मार्च 2012

पुराण कथाओं में झलकता है भविष्य(1)-मन से चालित विमान सौभ!

आज से यह नई श्रृंखला. बीच बीच में दुनियावी  बातें और लीला भी चलती रहेगी . अक्सर हम लोगों को कहते सुनते हैं कि यह नई खोज यह नई जुगत तो हमारे यहाँ वेदकाल से ही रही है .लोग विमानों पर घूमते घामते थे ,लड़ाईयों में स्वचालित आयुधों का इस्तेमाल करते थे ,पल भर में एक जगहं से दूसरी जगहं की यात्राएं कर लेते थे ....ये पश्चिम वाले जो आज खोज रहे हैं वह तो हमारे यहाँ हजारो साल पहले से ही था ...मेरा भी यही मानना है मगर सोच का अंतर बस यही है कि ये चीजें बस लोगों की कल्पनाओं में ही विद्यमान थीं ...इनका कोई भौतिक वजूद नहीं था ..क्योकि उन दिनों आज जैसी प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं थी ....अब पत्थर युग में प्रौद्योगिकी के नाम  पर बस विविध उपयोगों हेतु तराशे पत्थर ही तो थे ....तब नैनो टेक्नोलोजी थोड़े ही थी ...मगर हाँ ,सोच के मामले में भारतीयों की कोई सानी नहीं थी ..भले ही वह एक अरण्य सभ्यता थी मगर हमारे पुरखे ,ऋषि गण अपनी सोच और कल्पनाओं के मामले में बहुत आगे थे ..वे बीन  बीन कर दूर की कौडियाँ लाकर सहेज रहे थे  ताकि भविष्य के उनके वंशधर उन कल्पनाओं का सहारा ले कोई चमत्कार कर सकें ...और आज सचमुच हमारे पास वह उपयुक्त प्रौद्योगिकी है जो अगर पुरखों की कल्पनाओं से संयुक्त हो जाय तो हमारे सामने एक सर्वथा अनोखी दुनियाँ,एक आश्चर्यलोक उपस्थित हो जाए -वैसा ही जैसा की विज्ञान कथाओं में वर्णित है ...इसलिए मैं अक्सर कहता हूँ कि हमारी पुराकथाओं और आज की विज्ञान कथाओं में कई साम्य हैं ...यह एक लंबा और विषद विमर्श है आईये तब तक आपको हम एक कथा सुनाएँ ...
सौभ!एक परिकल्पना!
शिशुपाल की याद तो आपको होगी ही ...अरे वही वाचाल शिशुपाल जिसका वध कृष्ण ने किया था ...उसी शिशुपाल का एक मित्र था शाल्व ...उसने एक बार प्रतिज्ञा की थी कि वह धरती से यदुवंशियों का नाश कर देगा ..अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिहाज से उसने भगवान् शंकर को प्रसन्न  करने के लिए घोर तप किया.. भोले भंडारी प्रसन्न हो गए ..वर मांगने को कहा ..शाल्व ने  शंकर से एक ऐसे विमान की मांग की जो अजेय हो और जो मन द्वारा नियंत्रित होता हो यानी मन से संचालित होता हो ...एवमस्तु! शंकर ने कहा और सौभ नामक विमान उसके हवाले कर दिया ..जिसे कुशल शिल्पी मय नामक दानव ने तैयार किया था ..यह एक मायावी विमान था ...जो अदृश्य भी हो सकता था और अँधेरे में केवल शाल्व को दिखता था इसी विमान में बैठ कर उसने यदुवंशियों से भयंकर युद्ध छेड़ दिया ....द्वारिकावासी घबरा उठे ...श्रीकृष्ण थे नहीं, वे युधिष्ठिर के साथ राजसूय यज्ञ में शामिल होने के लिए इन्द्रप्रस्थ आये हुए थे ...अब शाल्व से भिड़ने की जिम्मेदारी प्रद्युम्न पर थी ...भयानक युद्ध हुआ जो २७ दिनों तक चलता रहा ...सौभ जैसे मन चालित विमान के चलते शाल्व को हराना मुश्किल था ...आखिर कृष्ण के लौटने पर सौभ विमान उनके युद्ध कौशल के आगे विनष्ट हो गया और शाल्व मारा गया ....

अब देखिये आज मन के सहारे मशीनों का संचालन संभव  होता दिखायी दे रहा है ...आप विश्वविख्यात टाईम पत्रिका की यह रिपोर्ट पढ़िए ..जिसमें मन की बीटा तरंगों के संकेन्द्रण और एक जुगत 'द बाडी वेव' के सहारे कम्प्यूटर पर कमांड देना संभव  हो गया है ....ओंटारियो(अमेरिका ) की  पावर जेनेरेशन न्यूक्लियर प्लांट के कई वाल्वों को मात्र मन की बीटा किरणों के सहारे खोलने की करामात वहां के एक प्रबन्धक ने कर दिखायी ....इन बीटा तरंगों को कम्यूटर तक ट्रांसमिट करने का काम आई पाड सरीखी एक जुगत करती है जिसे कलाई में बान्ध दिया जाता है ...इस प्रविधि के और विकसित होने पर घर बैठे मन के कमान्ड से ही  कई कामों को अंजाम दिया जा सकेगा ..चाहे वह आफिस से घर के काम काज हों ..या युद्ध के मैदान में बमों का प्रहार -बस सोच भर लीजिये काम पूरा ...

अब कोई यह कहे कि अरे यह जुगत तो हमारे यहाँ पहले से ही थी ...सौभ विमान नहीं था? आपकी क्या प्रतिक्रया  होगी तब ? 

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

और अब हंस गीतिका!

राजहंसों की पुनर्खोज विषयक पहली और दूसरी पोस्ट के बाद यह आख़िरी किश्त है जिसमें हंस /राजहंस की एक और प्रबल दावेदारी का उल्लेख किया जाना जरुरी लगता है .यह कटेगरी है गूज (goose )की जिन्हें भी भारतीय साहित्य में हंस और कहीं कहीं राजहंस का दर्जा मिला हुआ है .सालिम अली ने भी बारहेडेड गूज (अन्सेर इंडिकस ) को हंस, राजहंस,बिरवा और सवन  के हिन्दी नामों का उल्लेख किया है .एक मिलती जुलती प्रजाति -बड़ी बत (अन्सेर अन्सेर)  भी है.दोनों भारत में जाड़े की प्रवासी हैं और अक्सर अक्टूबर से मार्च तक नदियों ,झीलों के आस पास दीखते हैं . 
बार  हेडेड गूज -यह भी है एक हंस!

गूज जाड़े में समूचे उत्तर भारत, आसाम तक फ़ैल जाते हैं .मगर मध्य भारत को छोड़ आगे बढ़ते हुए ये मैसूर तक देखे गए हैं . मध्य भारत में इक्का दुक्का दिखाई पड़ते हैं .किसी हिन्दी कवि  ने यह कहा है कि 'सिंहों के नहीं लेहड़े,हंसों  की नहिं पांत " तो निश्चय ही उसने गूजों की टोली और पंक्तिपावन परम्परा अनदेखा ही किया था ..ये जमीन पर तो बड़े झुंडों में होते ही हैं उड़ते  वक्त भी या तो V का अकार लेते हैं या फिर रिबन सरीखी कतार से नभ के दो सुदूर कोनों को जोड़ते हुए से लगते हैं .इनकी आंग आंग की आवाज गूजती हुयी सी लगती है . 

सुरेश सिंह ने 'भारतीय पक्षी' में  बारहेडेड गूज का सोनाबत और कादम्ब हंस  भी नाम दिया है .उनका कहना है कि कि कुछ कवियों ने इसे ही कलहंस या हंसराज भी कहा है ...उनके अनुसार यह मंगोलिया और साइबेरिया के दक्षिणी भागों में अपने घोसले बनाती है . तिब्बत और लद्दाख की झीलों में भी इनकी एक बड़ी आबादी जोड़े बनाती है . 
भारत सरकार की भी दरियादिली कि एक बत्तख को भी देवहंस का दर्जा मिल गया 

कई कवियों ने ज्यादा नीर क्षीर विवेक के चक्कर में पड़कर बत्तखों को हंस मान लिया है जिनमें नुक्टा या काम्ब डक और ह्वाईट विंग वूड डक है जिन्हें क्रमशः नंदीमुख हँसक और देवहंस का नाम मिला है ...जाहिर हैं कवियों की कल्पनाएँ उनके नीर नीर क्षीर विवेक और प्रकृति के सूक्ष्म प्रेक्षण पर हावी रही हैं . कुछ कवियों ने चैती (टील )  आदि को भी हंसराली,काणक हंस  जैसे सुन्दर नाम दे डाले हैं ....आशय यह कि एक आम पाठक के लिए इन्ही विवरणों के चलते असली हंस की पहचान मुश्किल तलब होती चली गयी ....
....इसलिए ही हंस गीतिका* आपकी सेवा में दरपेश हुयी -
*स्वान सांग = अंतिम कृति! 

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस :भाग -2

हंस विषयक पिछली पोस्ट में सुधी पाठकों /मित्रों की कई जिज्ञासाएं व्यक्त हुयी है ,सुझाव मिले हैं .पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि यह पोस्ट महज उस राजहंस की पहचान आपके सामने रखने के लिए है जिसका जिक्र अक्सर हमारे प्राचीन ग्रंथों और मिथकों में हुआ है ..वैज्ञानिक लिहाज से स्वान (swan ) और  गूज (goose )  अलग प्रजातियों के पक्षी हैं मगर हिन्दी में इन सभी को हंस कह दिया जाता है ....कामिल बुल्के के अंगरेजी हिन्दी कोश में भी अंगरेजी के इन दोनों शब्दों का अर्थ हंस बताया गया है.कामिल बुल्के ने स्वान का अर्थ बताया है -राजहंस ,हंस तथा गूज के लिए भी हंस, कलहंस ,हंसी ,हंसिनी शंब्दों का उल्लेख किया है ...

स्वान(Swan),जैसा कि पिछले पोस्ट में जिक्र हुआ है भारतीय मूल का पक्षी नहीं है किन्तु असली 'मानस का राजहंस'  वही लगता है ...और निश्चय ही  प्राचीन  बृहत्तर भारत के आखिरी छोरों से आज की भागोलिक सीमाओं में कभी   आ सिमटे हमारे अदि पूर्वजों के की स्मृति शेष में रचे बसे उसी स्वान -राजहंस की ही छवि -विवरण हम ऋग्वेद एवं कतिपय प्राचीन संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में पाते हैं ....और परवर्ती साहित्य में हिमालय पार कर यहाँ आने वाले कई प्रवासी पक्षी (गूज आदि ) ,यहाँ तक कि बत्तखों को भी हंस माना जाने  लगा. विश्वमोहन तिवारी कहते हैं कि वैदिक काल  के ऋषि गणों  के भ्रमण का दायरा बड़ा विस्तृत था -वे कश्मीर ,कैलाश तथा मानसरोवर तक आते जाते रहते थे जहां प्रवासी स्वान प्रजाति भी शीत ऋतु में दिख जाती थी..मगर कालान्तर के कवि जन तराई तथा गंगा की कछार तक ही सीमित होते गए जहां उन्हें गूज दिखते रहे और उन्होंने इसी प्रजाति की पदोन्नति हंस में कर दी .. हिमालय की एक घाटी जिससे ऐसे प्रवासी 'हंस' मैदानी भागों में प्रवेश करते है को कालिदास ने मेघदूत में हंसद्वार कहा है जो आज भी कुमायूं जिले में नीतीघाटी  के नाम से जाना जाता है और इससे होकर तिब्बती यात्री आते जाते हैं ....


संस्कृत साहित्य के विद्वानों में भी असली राजहंस को लेकर मतभेद रहा है .कुछ विद्वानों ने इसे बिलकुल सफ़ेद न मानकर धूसर माना है .अमरकोश में राजहंस के बारे में बताया गया है कि इनका शरीर 'सित' आँखें और पैर लाल रंग के होते हैं ...राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैलोहितै: सितः ..सित का अर्थ बिलकुल सफ़ेद  न होकर धूसरता लिए सफेदी से है ..जाहिर है यह विवरण 'स्वान' से नहीं मिलता बल्कि फ्लमिंगो (The Greater Flamingo (Phoenicopterus roseus से काफी मिलता है और इसलिए यह पक्षी भी राजहंस पद का प्रबल दावेदार है -यह मूल भारतीय देशज पक्षी है और गुजरात के कच्छ जिले के 'ग्रेट  रन आफ कच्छ' में इनका विशाल नीड़-क्षेत्र है -जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसे फ्लमिंगो सिटी के नाम से भी जाना जाता है .यह विश्व का सबसे बड़ा फ्लमिंगो प्रजनन स्थल है . यही पास में ही हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो  पुरातत्व विशेषज्ञों के भी आकर्षण का केंद्र है -इस तरह कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के आदि काल  के  भी साक्षी  रहे हैं फ्लमिंगो! और कोई आश्चर्य नहीं यदि इस पक्षी को जन स्मृतियों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है .सालिम अली ने अपनी पुस्तक 'द बुक आफ इंडियन बर्ड्स ' में इसे राजहंस की पदवी पर प्रतिष्ठित  किया है ...कामिल बुल्के ने इसे ही हंसावर कहा है .
राजहंस का एक और प्रबल दावेदार (विकीपीडिया ):फ्लमिंगो  

फ्लमिंगो गुजरात के कच्छ जिले ही नहीं देखा जा सकता बल्कि जैसा कि सालिम अली मानते हैं यह अपने घुमक्कड़ स्वभाव के कारण भारत में कहीं भी दिख सकता है,विश्व के तमाम और भागो में तो पाया ही जाता है ... मैंने आज तक फ्लमिंगो नहीं देखा मगर हो सकता है आपमें से कुछ ने देखा हो ...यह बहुत सुन्दर पड़ा पक्षी है और राजहंस कहलाने की पूरी काबिलियत रखता है ...
विकीपीडिया के नक़्शे में रन ऑफ़ कच्छ 
मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं कभी रन आफ कच्छ जरुर जाऊं और इन नयनाभिराम पक्षियों का दर्शन कर नेत्रों को लाभ दूं .यह वैसे तो पूरा मरुथल है मगर बरसात के दिनों में मीठे -खारे पानी का जमाव यहाँ होता है और फ्लमिंगो घोसले बनाते हैं जो मिटटी के तिकोने ढूहे से लगते हैं . रिफ्यूजी फिल्म की शूटिंग यही हुयी थी ...क्या कोई ब्लॉगर मीट यहाँ हो सकती है एक लाईफ टाईम नज़ारे को आँखों  में कैद करने के लिए? कोई गुजराती ब्लॉगर बंदा  क्या पढ़ रहा है यह?

क्रमशः ....

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस (1)

विभिन्न सामाजिक अवसरों के इस वाक्य से भला शायद ही कोई अपरिचित हो -...."हे मानस के राजहंस तुम भूल  न जाना आने को ..." मतलब मेहमान को एक बड़ी पदवी देकर सम्मान सहित बुलाने का भाव इस अर्धपंक्ति में निहित है ..मगर मानस के राजहंस से क्या सचमुच हम भलीभांति परिचित हैं? ...यह आश्चर्यजनक है कि भारत में कई पक्षी विद्वान भी इस पक्षी की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रमित रहे हैं .ऋग्वेद में जो राजहंस वर्णित है वह तो भारतीय महाद्वीप का पक्षी ही नहीं है ...पक्षी प्रेमी विश्वमोहन तिवारी अपनी पुस्तक "आनंद पक्षी निहारन का" (नेशनल बुक ट्रस्ट ) में कहते हैं कि 'हंस शब्द वैदिक काल में अधिकतर महाहंस (हूपर स्वान-Cygnus cygnus ? ) को इंगित करता था' मैं उनके कथन से सहमत हूँ मगर महाहंस जिसे मैं राजहंस भी कहूँगा यहाँ का पक्षी है ही नहीं ..
यही है वह हंस -महाहंस जिसका उल्लेख हमारे ग्रंथों में हुआ है -(Whooper स्वान) 

यह शुभ्र -श्वेत पक्षी  विभाजित  रूस के अधिकाँश भाग से लेकर फिनलैंड तक  अपना साम्राज्य आज भी बनाए हुए है और ये कई यूरोपीय देशों,कैस्पियन सागर,जापान ,चीन के कुछ क्षेत्रों और कभी कभार भूले भटके कश्मीर तक प्रवास करते देखे गए हैं .....आज भी इनकी संख्या १८0,000 है मगर अफ़सोस कि भारत में ये नहीं मिलते.. मगर जो बात आश्चर्य में डालती है वह यह कि आज के भारत में इनकी नामौजूदगी के बाद भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों ,वैदिक साहित्य और संस्कृत साहित्य में हंस की इसी प्रजाति का बहुलता से विवरण है ..ऐसा कैसे संभव है?

हंस ज्ञान की देवी सरस्वती का वाहन घोषित है -कवियों ने हंस को सरस्वती के वाहन के रूप में ही प्रतिष्ठित नहीं किया, नीर -क्षीर विवेक के गुण से भी युक्त किया -यह सरस्वती के साहचर्य के साथ सर्वथा उपयुक्त ही था -हेन्सैर्यथाक्षीरमिवाम्बुमध्यात  ....अर्थात यह हंस पानी का पानी और दूध का दूध  (अलग)   कर सकता है -कवि कल्पना ने यहीं विराम नहीं लिया वरन कैलाश पर्वत के सन्निकट मानसरोवर(अब चीन नियंत्रित तिब्बत में )  को इसका वास स्थान बताकर उस सरोवर से मोती चुग कर खाने की  विशिष्ट आहार प्रियता के गुण का भी बखान किया ...मगर फिर वही प्रश्न  उठता है कि जब महाहंस यहाँ था ही नहीं तो इसका इतना विपुल विवरण भारतीय साहित्य में कैसे है?
स्वान -हंस का मूल पर्यावास और प्रवास क्षेत्र :ध्यान दें भारत तक इनकी पहुँच नहीं है (विकीपीडिया ) 

निश्चय ही भारत की आज की भौगोलिक सीमा  हजारों वर्ष पहले इतनी सिमटी हुयी नहीं थी -या फिर इरान और कैस्पियन सागर तक रह रहे हमारे पूर्वज जो महाहंस से पहले से ही बखूबी परिचित रहे हों ,अपने रचना लोक .में इसका उल्लेख करते रहे हों.  जब प्रवास गमन के उपरान्त वे और नीचे मौजूदा भौगोलिक सीमाओं में आयें हों तो यह स्मृति भी स्मृति -वाचिक परम्परा में यहाँ अक्षुण बन गयी हो ...ध्यान रहे ईरानियों के ग्रन्थ अवेस्ता और ऋग्वेद में आश्चर्यजनक समानताएं हैं -अब यह पक्षी साक्ष्य भी इसी तथ्य की इन्गिति करता है कि हमारे पूर्वजों का साम्राज्य निश्चय ही इरान और वाह्य  यूरोपीय सीमाओं तक कभी न कभी अवश्य फैला था और वे कालांतर में दक्षिण पूर्व की और लौटे हैं ....जबकि प्रवासी पक्षी हजारो साल से एक निश्चित परिक्षेत्र में ही रहते आये हैं उनके प्रवास क्षेत्र /मार्ग में बड़े परिवर्तन नहीं हुए हैं ...यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने इस पक्षी को  भलीभांति देखा भाला था ,अपनी स्मृतियों-श्रुतियों  में अमर कर रखा था और बाद में उनकी आगामी पीढ़ियों की कृतियों में भी उनका उल्लेख बना रहा है -भले ही कभी भी महाहंस का यह पर्यावास  न रहा हो ....
राजा रवि वर्मा की एक अमर कृति : राजकुमारी दमयंती और राजहंस 

हमारे लौकिक साहित्य में भी हंस को कई रूपों में जाना समझा गया है -दो हंसो का जोड़ा दाम्पत्य निष्ठा का प्रतीक है तो हंस आत्मा का भी प्रतीक है ..हंस विद्वता का प्रतीक है, परमहंस परम ज्ञानी का द्योतक है ....कालिदास ने  महाहंस (स्वान ) तथा अन्य हंस प्रजातियों में  विभेद किया है -विश्वमोहन तिवारी ने अपनी उक्त पुस्तक में महाहंस ,हंस तथा हंसक श्रेणियों का उल्लेख किया है और बताया है कि भारत में महाहंसों के चार  वंश ,हंसों के नौ वंश तथा हंसकों के छत्तीस   वंश हैं जिनमें गूज  'goose ' और बत्तखें तक सम्मलित है .इसी संदर्भ में उन्होंने कालिदास को उद्धृत किया है -जिन्होंने  रघुवंश में स्वयंबर के लिए राजाओं के सामने चलने वाली इंदुमती की चाल को महाहंस की चाल ,रानी बनने के बाद गरिमा और भव्यता को दर्शाती उनकी हंस की चाल का उल्लेख किया है -महाभारत के एक कथा दृश्य - राजकुमारी दमयन्ती और हंस संवाद को रवि वर्मा ने अपनी पेंटिंग के लिये  चुना है जहां हंस दरअसल 'स्वान' ही है ..जाहिर है हंसों की विभिन्न प्रजाति का ज्ञान पूर्व मनीषियों को था   .मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह कि जिस महाहंस की बात आज हम यहाँ कर रहे हैं उसका प्रवास क्षेत्र तो कभी  यहाँ रहा ही नहीं! स्पष्ट है हमारे पूर्वज कवि निश्चय ही 'स्वान' के प्रवास क्षेत्र से ही इन स्मृति बिम्बों को पीढी दर पीढी अक्षुण बनाए रहे ...


जारी .... .

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

बहुत खराब है महिलाओं का समय प्रबन्ध

वैसे तो ऐसे  पुरुष भी कमतेरे नहीं हैं जिनका समय का प्रबंध बहुत लचीला रहता है -समय से आफिस नहीं पहुंचते,प्रायः बॉस की डांट खाते हैं मगर अमूमन महिलाओं का समय प्रबंध बहुत कमज़ोर होता है ऐसा मेरा अनुभव रहा है . आश्चर्य है इतने महत्वपूर्ण विषय पर आज तक कोई गंभीर अध्ययन नहीं हुआ है या कम से कम मेरी खोजबीन का नतीजा यही रहा है ...कई भारतीय महापुरुषों का समय प्रबन्ध बड़ा ही सटीक और शानदार रहा -गांधी जी समय के बड़े पाबन्द थे ...एक बार उन्होंने एक अध्यापक को मिलने का समय दिया था जो दस मिनट देर से पहुंचे तो गांधी जी ने उन्हें  बड़ी फटकार लगाई -कहा कि अगर यही आदत उनके छात्रों की होगी तो देश समय के कितने पीछे चला जायेगा ...विदेशों में समयबद्धता की कितनी मिसालें तो हम अक्सर सुनते ही रहते हैं ..मुझे विदेशी पुरुषों और महिलाओं के तुलनात्मक समय प्रबंध की कोई प्रमाणिक जानकारी तो नहीं है मगर कहे सुने की बात है कि सारी दुनिया में ही अमूमन समय प्रबंध के मामले में पुरुषों की तुलना में वे खासी फिसड्डी होती हैं ....

सबसे खस्ताहाल तो भारतीय महिलायें हैं -यहाँ तो लगता है कि उनसे  समय का विवेक ही छिन सा गया है...एक स्टीरियोटाईप तो वही है कि पतिदेव तैयार बैठे हैं ...किसी का बुलावा है शादी समारोह का और पत्नी जी तैयार हो रही हैं ....इस स्थिति से आपका भी दो चार हुआ ही होगा ..मिनट नहीं, घंटे बीत जाते हैं मगर श्रीमती जी का सजना बजना बदस्तूर बना रहता है ...पतिदेव कुढ़ रहे होते हैं ,झंखते झल्लाते हैं मगर अंततः असहाय हो चुप मार जाते हैं ,उन्हें भी पता है ही कि इस मामले  का कोई इलाज नहीं है ....मेरे एक संबंधी हैं बिचारे की पत्नी जी की तैयारियों में कई बार ट्रेन छूटी है ..एक बार तो ऐसा वाकया हुआ कि ट्रेन के चल पड़ने के साथ ही जब पत्नी जी पहुँची तो उन्हें तो ट्रेन पर चढ़ा कर वे खुद उतर गये और पत्नी को विदाई का गुड बाय कह दिया ..ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी थी ..खैर फोन कर यात्रांत के परिजनों को उन्हें रिसीव करने को आगाह कर दिया ...बात तो ख़त्म हो गयी लेकिन अभी भी समय प्रबंध को लेकर दंपत्ति  में जिच कायम रहती है . 

मैंने ज्यादातर सरकारी कार्यालयों  में पाया है कि देवियाँ तनिक या फिर अधिक देरी से ही पहुँचती हैं ..कई बार बेबस बॉस भी कुछ कह नहीं पाता इस कारण से कि सख्ती का परिणाम कहीं उसे ही महिला शक्ति से टकराने के  के खामियाजे के रूप में न भोगना पड़ जाए -कुछ सख्त बॉस अपने ऊपर लांछन आदि भी झेल चुके हैं, इन कबाहतों के चलते ..मैं भी इस मामले में फूंक फूंक कर ही कदम उठाता आया हूँ -क्योकि मुझे पता है कि जिस तरह से मैं अपने पुरुष सह कर्मियों के ऊपर समय की लापरवाही को लेकर बिफर पड़ता हूँ अगर कहीं महिला कर्मी से यही बर्ताव हुआ तो शायद वह दिन भी न देखना पड़ जाय जिससे बच पाने  में मैं विगत तीस वर्षों से भाग्यशाली रहा हूँ ..मगर इसका रंच मात्र भी  गुमान नहीं है मुझे  ..बल्कि डर ही बना रहता है..शेष सरकारी सेवा बस कट जाय किसी तरह! 

जैवीय विज्ञान और व्यवहार शास्त्रों के अध्ययन ने मुझे इस मामले को भी सुलटाने को प्रेरित किया .काफी सोचने विचारने के बाद जो बात मन में कौंधी है वह यही है कि महिलायें इसकी दोषी नहीं हैं -दोष उनके वैकासिक अतीत का है ..उनकी जीनों में उनकी देर सवेरी का राज छुपा है -जब मनुष्य गुफावासी था तो पुरुषों का दल जहां  शिकार को निकल पड़ता था वहीं घरैतिनें घर पर मौज मस्ती काटती थीं ..एक दूसरे का सुखवा दुखवा सुनती सुनातीं थीं ..आराम से बच्चों को नहलाती धुलाती थीं ...चौका बासन के साथ ही खाना पानी का इंतजाम करती थीं मगर सभी कुछ आराम से,सलीके से ....कोई  जल्दीबाजी नहीं ....पतिदेव  तो शाम को ही आयेगें ....ढेर सारा फुर्सत भरा समय ..समय ही समय ..फिर समय प्रबंध की जरुरत ही कहाँ ? जबकि पुरुष टोलियों के लिए समय प्रबंध उनके लिए जीवन मृत्यु का प्रश्न था ..खिसकते सूरज के साथ उन्हें शिकार की टोह में दूर सुदूर भटकने के साथ ही समय से वापस लौटने की फ़िक्र होती थी ....कहीं रात हुयी तो धुप अँधेरे में शिकारी के  शिकार बन जाने की बड़ी आशंका थी ....हिंस्र पशुओं की भरमार थी तब ....दिन के उजाले में बचाव संभव था मगर रात में शिकारी असहाय था .....

 पुरुषों का समय प्रबंध महिलाओं से बेहतर तभी से हुआ ..चूंकि जीन प्रेरित व्यवहार हज़ार लाख वर्ष में ही बदलते हैं इसलिए समय का यह लोचा आज भी कायम है ....दृश्य भले ही बदल गएँ हैं जीन हमारे वही हैं! 

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

कौए की निजी ज़िंदगी

बात यहाँ से शुरू हई यानि  रावेन मिथ  पर कौए पर संपन्न चर्चा से....  यह एक कनाडियन विदुषी और मेरी नयी नयी बनी फेसबुक मित्र  का ब्लॉग है ...उन्हें मिथकों में जीवन्तता दिखती है और मुझे भी ....समान रुचियों वाले और समान धर्मा लोगों के बीच मेल जोल सहज ही हो जाता है ...इसी ब्लॉग पोस्ट पर काक मिथक की सर्व व्यापकता को लेकर विस्तृत जानकारी के साथ ही टिप्पणियों में कौए के बारे में चाणक्य की एक उक्ति का उल्लेख  भी हुआ है ....चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य को तमाम पशु पक्षियों से कुछ न  कुछ सीखना चाहिए और कौए से यह सीखना चाहिए कि यौन संसर्ग सबकी नजरों से  अलग थलग बिलकुल एकांत में करना चाहिए - ...और यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि कौए की  प्रणय लीलाएं और संसर्ग आम नज़रों से ओझल रहती हैं ....यह एक विचित्र पक्षी व्यवहार है .
जंगली कौआ 

खुद ग्राम्य परिवेश का होने के बावजूद मैंने आज तक कौए की इस निजी जिन्दगी का अवलोकन नहीं किया जबकि पक्षी व्यवहार में मेरी रूचि भी रही है ...कहीं इधर उधर घूमते हुए भी मेरी नज़रे बरबस ही आस पास के पेड़ों और पक्षी बसाहटों की ओर उठती रहती हैं -मुझे अक्सर लोगों की यह टोका टोकी भी सुनने को मिलती है कि मैं चलते समय नीचे क्यों नहीं देख कर चलता ..मगर यह विहगावलोकन जैसे मेरा सीखा हुआ सहज बोध सा है . गरज यह कि अपने परिवेश के पक्षी और पक्षी व्यवहार पर पैनी नज़र के बावजूद भी मैंने आज तक कौए के नितांत निजी व्यवहार को देखने में सफलता नहीं पायी है ...मगर बड़े बुजुर्गों की राय में यह मेरा सौभाग्य है ..

अब मेरा सौभाग्य क्यों? इसलिए कि लोक जीवन में 'काक -संभोग'   देखना बहुत ही अशुभ माना गया है . अंतर्जाल पर भी कुछ चित्र और वीडियो हैं मगर मैथुन का दृश्य नहीं है ....एक तो कतई काक मैथुन नहीं लगता बल्कि काक युद्ध सरीखा है ... और मैं उन्हें यहाँ लगाकर मित्रों के लिए किसी भी प्रकार का अशुभ नहीं करना चाहता क्योकि   लोक मान्यता यह भी है कि ऐसा देखना मृत्यु सूचक है ..एक बड़ा अपशकुन है,दुर्भाग्य है . 

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि कौए खुले में मैथुन नहीं करते ...और इसलिए उनका यह जैवीय कृत्य लोगों की आँखों से प्रायः ओझल रहता है ....मगर वे ऐसा क्यों करते हैं ..उन्हें किससे लज्जा आती है?  और क्या उनका दिमाग लज्जा जैसी अनुभूतियों तक विकसित हो चुका है -ऐसे प्रश्न आज भी पक्षी विशेषज्ञों के लिए पहेली बने हुए हैं -यह खुद की मेरी जिज्ञासा रही है इसलिए इस रोचक पक्षी व्यवहार को आज आपसे साझा कर रहा हूँ ....कौए बाकी पक्षियों से बहुत बुद्धिमान हैं ..एक प्यासे कौए का घड़े से पानी निकालने के लिए उसमें कंकड़ डालते रहने की काक कथा केवल कपोल कल्पित ही नहीं लगती -क्योंकि काक व्यवहार पर नए अनुसन्धान कई ऐसे दृष्टान्तों को सामने रखते हैं जिसमें कौए ने औजारों का प्रयोग किया और उन्हें मानों यह युक्ति कि  " बिना उल्टी उंगली घी  नहीं निकलता " भी मालूम है और वे जरुरत के मुताबिक़ औजारों का आकार प्रकार चोंच और पैरों की मदद से बदल देते हैं -तारों को मोड़ कर ,गोला बनाकर खाने का समान खींच लेते हैं ....वे कुछ गिनतियाँ भी कर लेते हैं ....जैसे अमुक घर में कितने लोग रहते हैं ये वो जान जाते हैं और सभी के बाहर जाने के बाद वहां आ धमकते हैं..पक्के चोर भी होते हैं ..घर से चमकीली चीजें उठा उठा कर ये अपने घोसले को अलंकृत करते रहते हैं ...मुम्बई में एक बार एक कौए के घोसले से कई सुनहली चेन वाली घड़ियाँ बरामद हुयी थीं ....
घरेलू कौआ (दोनों चित्र विकीपीडिया ) 
लोक कथाओं के रानी के नौ लखे हार को कौए ने चुराया था -यह भी कथा बिल्कुल निर्मूल नहीं लगती  ....मतलब यह कि काक महाशय बड़े शाणा किस्म के प्राणी हैं -अपने आस पास कोई काक दम्पति देखें तो भले ही आप उनसे बेखबर रह जायं वे आपको लेकर पूरा बाखबर और खबरदार रहते हैं ... :) और तो और पक्षी विज्ञानी बताते हैं कि इनका एकनिष्ठ दाम्पत्य होता है मतलब जीवन भर एक ही जोड़ा रहता है इनका .....अब इतनी खूबियों और कुशाग्रता के बाद हो न हो इन्हें खुले में यौनाचार करने में शर्मिन्दगी आती हो, कौन जाने? आश्चर्यजनक है अभी तक इस आश्चर्यजनक काक -व्यवहार की व्याख्या पर मैंने किसी भी पक्षी विज्ञानी को कुछ लिखते पढ़ते नहीं सुना है ...आखिर वे आड़ में मैथुन क्यों करते हैं? 

कौए के व्यवहार के और भी बड़े रोचक पहलू हैं ..राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'भारत के पक्षी " (प्रकाशन विभाग ) में लिखा है कि भारत में चित्रकूट और कोडैकैनाल (दक्षिण भारत ) में कौए नहीं पाए जाते ..मुझे यह बात पता नहीं थी ..नहीं तो चित्रकूट तो कई बार जाना हुआ है ..ध्यान से देखते !....अब चित्रकूट में वे क्यों नहीं मिलते इसकी एक मिथक -कथा है . वनवास के समय सीता की सुन्दरता से व्यामोहित इंद्र के बेटे जयंत ने कौए का रूप धर उनके वक्ष स्थल पर चोंच मारी थी.  कुपित राम ने उसे शापित किया था -लोग आज भी कहते हैं इसी कारण कौए चित्रकूट में नहीं मिलते --मगर इसका वैज्ञानिक कारण क्या हो सकता है समझ में नहीं आता क्योंकि चित्रकूट तो एक वनाच्छादित क्षेत्र रहा है ....वहां से भला कौए क्यों पलायित हो गए? 

कौए की कोई छः प्रजातियाँ भारत में मिलती हैं ..सालिम अली ने हैन्डबुक में दो का ही जिक्र किया है -एक जंगली कौआ(कोर्वस मैक्रोरिन्कोस ) तथा दूसरा घरेलू कौआ( कोर्वस स्प्लेन्ड़ेंस)...पहला तो पूरा काला कलूटा किस्म वाला है दूसरा गले में एक भूरी पट्टी लिए  होता है -शायद इसी को देखकर तुलसीदास ने काग भुशुंडि नामके अमर मानस पात्र की संकल्पना की हो ... जिसके गले में कंठी माला सी पडी है ....यह काक प्रसंग अनंत है -फिर कभी अगले अध्याय की चर्चा की जायेगी ....
पुनश्च:
गिरिजेश जी ने एक काग साहचर्य का अनुपम उदाहरण फोटू यहाँ दिया है ....

रविवार, 13 नवंबर 2011

आप किस बच्चे को ज्यादा प्यार करते हैं?

टाईम पत्रिका के ताजे अंक (नवम्बर १४,२०११) की आमुख कथा बच्चों के प्रति माँ-बाप के भेदभाव पर केन्द्रित है ....क्या हम अपने बच्चों में किसी को कम किसी को ज्यादा चाहते हैं? क्या इसका कोई जैवीय /जीनिक आधार भी है या फिर सामाजिकता और परिवेश ऐसे निर्णयों पर हावी हैं ? टाईम का आलेख निर्णायक  नहीं है ....बल्कि संभ्रमित अधिक करता है ....वह पशु पक्षियों पर किये अध्ययनों का सहारा लेता है -जहां श्रेष्ठ की उत्तरजीविता ज्यादा मायने रखती है और इसलिए वहां वही ज्यादा प्यार दुलार पाता है जो बलिष्ठ ,हृष्ट पुष्ट होता है और संतति संवहन में सर्वथा समर्थ लगता है -आखिर वही तो वंश परम्परा का संवाहक है! इसलिए ही पेंगुइनें छोटे और कमज़ोर अंडे को खुद पैर से ढकेल बाहर करती है और ईगल(गरुंड) पक्षी की एक प्रजाति की माँ अपने ही एक बलशाली बच्चे को अपने से कमज़ोर का चीथड़ा उड़ाते देखकर भी चुपचाप रहती है .....तो क्या मनुष्य में भी कोई ऐसी ही प्रवृत्ति अंतर्निहित  है?  क्या वह भी अपने होनहार बच्चे को ही ज्यादा मानता है? उस पूत को जिसके पाँव पालने में ही दिख जाते हैं? 



लेखक जेफरी क्लुगर ने एक अध्ययन के हवाले से कहा है कि ७० फीसदी पिताओं और ६५ फीसदी माताओं में बच्चों के प्रति ऐसे भेदभाव के प्रमाण मिले हैं हालाँकि वे ऐसी किसी बात को प्रत्यक्षतः प्रगट नहीं करते ....पिता के मामले में प्रायः उसकी सबसे छोटी बिटिया और माँ के मामले में उसका सबसे बड़ा लड़का ..यानी 'पैलौठी" -पहला बच्चा -लड़का!..पैलौठी के बच्चे को पसंद करने का एक और कारण अध्ययन में  बताया गया है जिसे   जिसे "रूल आफ संक कास्ट"(rule of sunk cost) कहा गया है और जो कारपोरेट जगत का माना जाना नियम है -जिस प्राडक्ट पर जितना अधिक धन -संसाधन लगता है उसे व्यवसाय जगत ज्यादा फलना फूलना देखना चाहता है ....सबसे बड़ा बच्चा ऐसा ही एक कैपिटल है माँ बाप के  लिए ....मगर क्या मानव सम्बन्ध ठोस व्यावसायिकता से प्रेरित हैं? 

अपने एक लंगोटिया मित्र  से बिना उनकी अनुमति के क्षमा याचना  सहित  उनके   बचपन की  एक बात यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ. उनकी माँ  ने उनसे एक बार कहा था  -" पैलौठी के बच्चे को तो जन्म लेते ही मर जाना चाहिए, जीवन भर उसे जिम्मेदारियों का बोझ और तरह तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं " कहना न होगा कितना खराब लगा था तब उन्हें यह सुनकर मगर माँ का  प्रसाद मानकर मेरे मित्र ने  यह ग्रहण किया था  ....लेकिन  क्या यह वाकई सच है? पता नहीं ये  इमोशनल बातें यहाँ उठाना भी चाहिए या नहीं मगर मेरे मन में बैठा विज्ञानी इन सबसे पूरी तरह तटस्थ है और वह तथ्यान्वेषण को ज्यादा तवज्जो देता है? ऐसे  उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें सबसे कमजोर बच्चे के प्रति माँ बाप का स्नेह (माँ का विशेष ) ज्यादा होता है और इसका आधार भावात्मक है ...इस व्यवहार का  एक नजीर पक्षी जगत में एक  पनडुब्बी (कूट ) में भी देखने को मिलता है जो बच्चों में सबसे बाद के निरीह बच्चे का ज्यादा ध्यान रखती है और उसे खाने खिलाने में ज्यादा व्यस्त रहती है ....कूट्स के सभी बच्चे एक सा ही दीखते हैं मगर सर की सबसे चटख गुलाबी कलंगी सबसे छोटे वाले को  अलग करती है ....मतलब मनुष्य में भी इन मामलों में कोई एक निश्चित व्यवहार प्रतिरूप विकास यात्रा में नहीं उभरा है बल्कि यहाँ कई प्राणियों के मिश्रित  व्यवहार ही अवतरित होते दीखते हैं ...

भारत की तो बात ही मत पूछिए यहाँ तो देश काल परिस्थितियों में लड़का लडकी को लेकर जबरदस्त बायस देखा जाता रहा  है ...घुघूती बासूती जी ने अनचाही बच्चियों के जन्म पर उनसे किये जाने वाले भेदभाव पर एक रिपोर्ट  दी है!  यहाँ बड़े पैमाने पर तो लड़कों को लड़कियों के बजाय ज्यादा तवज्जो दिया जाता रहा है ...मगर यह सहज जैवीय व्यवहार नहीं है क्योकि परिवेश और सोच के बदलाव से  ऐसी बातें कम होती जा रही हैं ....किन्तु  यहाँ अच्छे पढ़े लिखे परिवारों में  क्या बिना जेंडर भेद के भी बच्चों के बीच  ऐसा कोई पक्षपात किया जाता है? मैंने एक वाकया अपने एक अन्य मित्र से और भी सुना है जब कमासुत बच्चे (कमाने वाल बच्चा ) को ज्यादा तवज्जो दिया जाता है ...उसके खान पान में ज्यादा ध्यान दिया जाता है ..प्रेम के प्रतीक के रूप में उसे परसी गयी दाल में देशी घी की मात्रा ज्यादा डाली जाती है जबकि बगल का बेरोजगार बच्चा इस देशी -घी प्रेम से वंचित रह जाता है .....और  प्रायः पिता की ओर से  ताने भी सुनता  है -न काम का न काज का ढाई सेर आनाज का ....हमारे मिथकीय पात्रों में एक राजा पुरु हुए हैं जिन्होंने अपने पिता के कहने भर से उन्हें अपनी जवानी सौंप दी थी जबकि उनके  दूसरे बेटो ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया था ..यहाँ भी एक ख़ास लाडले  पुत्र और  पिता के सम्बन्ध का एक पहलू उभरता है ....

जो भी हो अपना तो यह मानना है कि मानव व्यवहार बहुत जटिल है और ऐसे अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ..हाँ वे इन विषयों की ओर अकादमिक/ अन्वेषण की  रूचि जरुर जगाते हैं ..और अन्वेषण तो मनुष्य की मूलभूत चाह ही है ! 

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

मोनल से मुलाक़ात

वैसे तो मोनल या मोनाल पक्षी के बारे में मैं जानता तो पहले से था मगर जब इसे बिलकुल करीब से देखने का अवसर मिला तो इसकी सुन्दरता को बस देखता रह गया ...सुनहले मोनल की इस जाति-क्रायिसोलोफस  पिक्टस  पर लगता है प्रकृति ने अपने पसंदीदा रंगों का खजाना ही लुटा दिया हो ...मैं बनारस के मशहूर बहेलिया टोला नाम की एक गली में पहाडी मैना ढूँढने गया था जो मनुष्य की बोली की  काफी हद तक नक़ल करने में माहिर है ....पहाडी मैना तो नहीं मिली मगर वहीं मोनल से मुलाक़ात हो गयी ....वैसे भी पहाडी मैना अब वन्य जीव अधिनियम के अंतर्गत प्रतिबंधित है ..मतलब उसे हम अब कैद में नहीं रख सकते ....मगर मोनल का मामला मुझे सदैव उलझाता रहता है ...यह प्रतिबंधित श्रेणी में है या नहीं यह वन्य जीव अधिनियम की सूची से भी साफ़ साफ़ स्पष्ट नहीं होता ..

मोनल यानि  क्रायिसोलोफस  पिक्टस


दिक्कत यह है कि जीव जंतुओं के वर्गीकरण की लीनियस प्रणाली में भी जीनस(गण) और स्पीसीज (प्रजाति ) के नाम भी हमेशा एक जैसे नहीं रहते ..इनमे भी पुराने और नए नामकरण की झंझट बनी रहती है ....अब जो सूची वन्य जीव अधिनियम में दी गयी है वहां क्रायिसोलोफस  पिक्टस नदारद है ....जबकि मेरी  अंतरानुभूति है कि इतना महत्वपूर्ण पक्षी जरुर अबध्य होना चाहिए ..इसका आम बोलचाल की भाषा में जो नाम है -मोनल या मोनल फीजेंट उसकी दो प्रजातियाँ लोफोफोरस जीनस की हैं और वे प्रतिबंधित की गयी है यानि यहाँ भी क्रायिसोलोफस  पिक्टस को क्लीन चिट है ....और यह बहेलिया टोला में उपलब्ध है ..जोड़े का दाम १५ हजार है ..अंतर्जाल पर भी इसकी बिक्री की कई साईट हैं .....

अभी कुछ वर्षों पहले बनारस में बाबतपुर एअरपोर्ट पर मोनल पक्षी के जोड़े पकडे गए ..वन्य जीव अधिनियम के अधीन केस दर्ज हुआ मगर विभाग यह साबित करने में असफल रहा कि वह जोड़ा अधिनियम की अनुसूची में दर्ज प्रजाति का ही था ..आरोपित कोर्ट से बेदाग़ छूट गए और विभाग की किरकिरी हुयी सो अलग ...यह एक बड़ा दुर्भाग्य है कि पक्षी या अन्य वन्य प्रजातियों की सही पहचान के लिए वन विभाग के पास विशेषज्ञों की भारी कमी है ...कभी कभी तो  स्थिति इतनी हास्यास्पद हो जाती है कि पकड़ा जाता है बाघ तो बताया जाता है चीता क्योकि भार्गव साहब अपने पुराने अंगरेजी -हिन्दी शब्द कोष में भूलवश टाईगर को हिन्दी में चीता क्या लिख बैठे कि  आगे की एक दो पीढी यही भूल करती गयी..जबकि टाईगर बाघ /व्याघ्र है, चीता तो भारतीय जंगलों से कब का लुप्त हो गया है ..दुर्भाग्य यह है कि जब हम अपने प्रमुख पशु पक्षियों को भी पहचान तक नहीं पा रहे हैं तो उन्हें संरक्षित क्या कर पायेगें? 
क्रायिसोलोफस  पिक्टस: एक और छवि 

अब मोनल का मामला ही ले लीजिये २००५ तक यह हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी था ..और जब इसे संरक्षण की बड़ी जरुरत थी तो इसे राज्यपक्षी की पदवी से हटाकर एक दूसरे पक्षी जुजुराणा ( ट्रागोपान ) को राज्यपक्षी बना दिया  गया और कम संख्या में बचे मोनल पर और भी आफत आ गयी ...पूरी रिपोर्ट यहाँ पर है .. इन बदलावों से भी जीवों के संरक्षण में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है ..१९७२ तक भारत का राष्ट्रीय पशु सिंह था मगर प्रोजेक्ट टाईगर को लागू होते ही १९७३ से यह बदलकर बाघ हो गया .....आशय यह कि ऐसे निर्णय लिए ही क्यों जाय जिससे किसी  जानवर को बचाने के चक्कर में किसी और की शामत आ जाय ...


मोनल /फीजेंट की कई प्रजातियाँ भारत में मौजूद है मगर उनके संरक्षण स्टेटस को लेकर भ्रम है ..सम्बन्धित लोगों से गुजारिश है कि इस मामले में छाई धुंध को साफ़ करें नहीं तो यह बहुमूल्य पक्षी संपदा ही साफ़ हो जायेगी ....सुरेश सिंह ने अपने किताब भारतीय पक्षी में फीजेंट पक्षियों में कालिज,कोकलास,पोकरास,जोवार यानी   ट्रेगोपान ,कठमोर ,चिलमे (ब्लड फीजेंट ) .मोनाल (लोपोफोरस इम्पेजानस ) ,चेड,लुंगी,परबतिया (सिल्वर फीजेंट ) आदि का वर्णनं किया है ....ताज्जुब है कि अपनी  बुक आफ इन्डियन बर्ड्स (हैन्डबुक ) में सालिम अली साहब ने इन पक्षियों का जिक्र ही नहीं किया है ...इसलिए मुझे भी इनकी पहचान को लेकर संशय बना रहता है ...और यही कारण है कि मोनल से जुड़े इस अनुभव को आपसे साझा करने की जरुरत समझ में आयी ....कोई पक्षी प्रेमी इस पर और प्रकाश डालें तो मैं आभारी होउंगा ....

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मन की उम्र

मेरे मित्र ,सहपाठी ,पारिवारिक चिकित्सक और जार्जियन डॉ. राम आशीष वर्मा जी अक्सर समवयियों(पीयर ग्रुप )  को चेताते रहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ काया तो जरावस्था को प्राप्त होती रहती है मगर मन उसी तरह स्फूर्त और युवा बना रहता है-मतलब शरीर मन का साथ छोड़ने लगता है.आशय यह हुआ कि मन और देह का चोली दामन का साथ नहीं है . और इस लिए बहुत सावधान रहना चाहिए और मन की हर बात को मानने के पहले अपनी दैहिक समीक्षा अवश्य कर लेनी चाहिए और एक विज्ञ सुचिंतित निर्णय लेना चाहिए नहीं तो अपने  स्वास्थ्य को आप खतरे में डाल  देगें और चिकित्सकों की चांदी में और इजाफा ही होगा -मुझे नहीं मालूम कि हमारे ब्लॉगर चिकित्सक, डॉ.वर्मा की इस बात से इत्तेफाक रखेगें या नहीं मगर मेरा पूरा इत्तेफाक है -क्योकि मैं डॉ.वर्मा पर एक चिकित्सक और मित्र के नाते भी पूरा विश्वास रखता हूँ . उनकी डायग्नोसिस सटीक होती है -और मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि इधर वे कई बार यह बात मुझसे क्यों कह गए हैं? क्या मुझे भी उनकी सलाह पर गंभीरता से सोचना चाहिए या फिर इस बात को बस ऐसे ही कही जाने  वाली कतिपय बातों (प्लैटीचूड)   की तरह टाल दिया जाना चाहिए ..मगर मैं समझता हूँ कि उनकी बात में दम है!और इसलिए मैंने उनकी इस सलाह पर गंभीर चिंतन मनन किया है ..कुछ प्रेक्षण ब्लॉग जगत में भी किया है और खुद अपना भोगा हुआ यथार्थ तो है ही ... :) 

आखिर ऐसा क्यों है कि शरीर का साथ मन नहीं देता? बचपन में मन तो बच्चा रहता है किशोर और युवा भी होता चलता  है.. मतलब उम्र के सामयिक बढाव (क्रोनोलोजी) के साथ एक समय तक तो मन की  और देह की उम्र का सायुज्य -समन्वय बना रहता है मगर जैसे ही शरीर जरावस्था की ओर    अग्रसर होता है वह मानों जिद्दी बच्चे की तरह देह से किनारा करने लगता  है ....तुम जाओ भाड़ में अभी तो मैं जवान हूँ ..... एक अजीब सी कान्फ्लिक्ट शुरू हो जाती है ...शरीर बुढ़ाता जाता है मगर मन उसी तरह चंचल बना रहता है .....गीता में कृष्ण ने भी अर्जुन के माध्यम से जन जन को इसलिए ही आगाह किया -हे अर्जुन यह मन बड़ा चंचल है मगर हाँ , निरंतर स्व -अनुशासन   से इस पर नियंत्रण रखा जा सकता है ..मगर यह नियंत्रण वाली थियरी मानवता पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाई -कितनी ही शकुन्तलाओं और मत्स्यगंधाओं के जन्म इस बात के प्रमाण हैं ....मतलब आज तक न तो अध्यात्म और न ही विज्ञान या तकनीक के पास इस दुर्निवार समस्या का कोई स्थाई हल मिल सका है ....हाँ आत्म अनुशासन कुछ सीमा तक कारगर है मगर यह  परिवेश ,स्फुलिंग ,अंतरावस्था ,मनः स्थति आदि अन्यान्य बातों पर निर्भर है ....

पुराण कथा है है की राजा ययाति ने अपने एक पुत्र से युवावस्था की भीख तक मांग ली ...पितृभक्त पुत्र ने अपने मन का अर्पण कर दिया ..क्या आधुनिक चिकित्सा कोई ऐसा माजूम -मन्त्र मनुष्य को कभी सौंप सकेगी? एक कथा आती है अर्जुन की जब वे एक हिजड़े (बृहन्नला) के रूप से उन्मोचित हुए तो सचमुच बड़ी क्लैव्यता का अनुभव कर रहे थे तब दैव-चिकित्सकों ने उनको पुनः  उर्जित किया -वे मन से फिर युवा हो गए -क्या इस चिरयौवन की कुंजी मनुष्य को कभी मिल पायेगी? यह पोस्ट लिखते समय मेरे मन में बार बार यह एक असहज सी बात आ रही है कि देह और मन की यह बेमेलता पुरुषों के साथ ही क्यों ज्यादा है -वे ही इस अभिशाप से क्यों ज्यादा त्रस्त हैं?(ब्लॉग जगत के निरंतर प्रेक्षण ने इस अध्ययन में मेरी काफी मदद  की है -शुक्रिया ब्लॉग जगत! ) ..आखिर प्रकृति की क्या गुप्त अभिलाषा है?वह चाहती क्या है? एक जैविकी के अध्येता के रूप में मेरी कुछ संकल्पनाएँ हैं  -

मनुष्य अपनी अंतिम सांस तक प्रजनन -उर्वर रहता है जबकि नारी यह क्षमता जल्दी ही ,सामान्यतः ५० वर्ष के बाद ही त्याग देती है ....अब शरीर भले ही जरावस्था में है मगर कुदरत की खुराफात तो देखिये उसने नर की प्रजनन क्षमता -शुक्राणुओं को सक्रिय बनाए रखा है ...और यह बिना उद्येश्य के नहीं -यह प्रकृति चाहती है कि पुरुष मरते दम तक प्रजनन में योगदान देता रहे ....और यह तब तक क्रियात्मक नहीं होगा जब तक उसके मन को भी चंचल न रखा जाय! मगर विचारणीय यह है कि कुदरत की यह अपेक्षा पुरुष से ही क्यों है ? इन प्रश्न का उत्तर हमें जैविकी और मानव अतीत के कई अतीत -गह्वरों में ले जाएगा ....क्या संतति संवहन के लिए पुरुष(शुक्राणु )  का योगदान ज्यादा जरुरी है ? मगर बिना नारी के योगदान (अंडाणु ) के संतत्ति निर्वहन /संवहन संभव नहीं यह हम सभी जानते हैं ....क्या अतीत के किसी धुंधलके में पुरुषों की संख्या बहुत कम हो गयी थी -नारियां भोग्य थीं इसलिए  अबध्य थीं ..उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी ...पुरुष संख्या क्रांतिक सीमा तक कम होती जा रही थी... प्रकृति के पास कालान्तरों में   इसके बिना कोई चारा नहीं रहा कि वह पुरुष को अखंड उर्वरता दे दे ? सोचिये आप भी ....

मगर ऐसा परिहास कि मन के  ओज को बनाए रखने के बावजूद  भी शरीर को  प्रकृति  बुढापे से मुक्त नहीं कर पायी और पुरुष को प्रायः  उपहास का पात्र  बनाया :( ....यह ठीक नहीं हुआ ..सरासर नाइंसाफी ...मैं तो चाहता हूँ स्त्री और पुरुष दोनों को ही चिर यौवन की सौगात मिल जाय .
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अब वैज्ञानिकों से हम यही   आस लगाए बैठे हैं!  




रविवार, 14 अगस्त 2011

सुन्दर आँखों वाले कुणाल से क्या आप मिलना चाहेगें/चाहेगीं?

एक दिन सुबह ही लैंडलाईन फोन घनघनाया -मेरी भतीजी स्वस्तिका ने कुणाल का अर्थ पूछा ...यह एक अच्छा सा नाम है -कई लोगों का यह नाम सुना भी है मगर इसका अर्थ तत्काल नहीं बता पाया ..खोज बीन की ...विकीपीडिया देखा , यह खूबसूरत आँखों वाली  एक पहाडी चिड़िया है -पर एक खोजी का काम अभी कहाँ पूरा हुआ था? कौन सी चिड़िया -क्या नाम है इसकाफिर सालिम अली की बुक आफ इंडियन बर्ड्स के पन्ने पलटे-अरे यह तो चहा है -स्नायिप(snipe) है ....

चहा की दो प्रजातियाँ हैं -एक कामन स्नायिप और दूसरी पेनटेड स्नायिप.... कामन/फैन्टेल  स्नायिप यानी चहा प्रवासी है जबकि पेंटेड स्नायिप जो राजचहा के नाम से भी जानी जाती है प्रवासी नहीं है .राजचहा की मादाएं बहु पतित्व के गुण रखती हैं और प्रणय लीलाओं में दबंगता दिखाती है और सुयोग्य नर की प्रतिस्पर्धा में दबंग मादायें दब्बू मादाओं से रणहू  पुतहू(शब्द सौजन्य :गिरिजेश राव)  पर उतारू हो जाती हैं ,मतलब लड़ झगड़ पड़ती हैं जो अन्य जानवरों में नरोचित व्यवहार है!मतलब यहाँ मादाएं दबंग हैं! 
कुणाल जिसे राजचहा भी कहते हैं 

विकीपीडिया के अनुसार ,'कुणाल हिमालय में पाये जाने वाले पक्षियों मे एक है. सम्राट अशोक जिन्होंने सारे भारत पर राज किया था, उन्होंने अपने पुत्र कुणाल का नाम इस पक्षी की आँखो के ऊपर रखा था. कुणाल का संस्कृत  मेँ अर्थ होता है "सुन्दर नेत्रों वाला पक्षी" और यदि यह किसी का का नाम है तो इसका अर्थ होता है "वह व्यक्ति जो प्रत्येक  वस्तु मे सुंदरता देखता हो" अथवा 
"सुंदर नेत्रों वाला व्यक्ति". संस्कृत में इसका  एक अर्थ "कमल" भी होता है'...

विधि का क्रूर विधान देखिये कि अशोक के जिस पुत्र की आँखों की सुन्दरता के कारण उसे कुणाल नाम दिया गया उसकी सौतेली मां ने कुचक्र से गर्म लोहे की सलाखों से उसकी आँखें फोड़वा  कर उसे अँधा बना दिया.... ....अब यह कथानक कितना सत्य है कितनी  एक किंवदंती यह तो शोध का विषय है मगर कुणाल पक्षी आज भी एक जीवंत हकीकत है ....अब अगली बार किसी बच्चे के नामकरण संस्कार में शामिल हों तो कुणाल नाम सुझाने के पहले इस परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखें! 

प्रिय स्वस्तिका तुम्हारे प्रश्न का यह विस्तृत जवाब है!
  

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