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बुधवार, 11 मार्च 2015

पत्नी नहीं हैं तो खाना पीना कैसे चल रहा है?

इन दिनों होम मिनिस्ट्री साथ नहीं है , पैतृक आवास पर सास की भूमिका का निर्वहन हो रहा है जबकि मैं यहाँ सरकारी सेवा के तैनाती स्थल पर एकांतवास कर रहा हूँ।  किन्तु यह ब्लॉग पोस्ट इस विषय को लेकर नहीं है। यह उस असहज सवाल को लेकर है जिससे मुझे ऐसे  एकांतवास के दिनों में अक्सर दो चार होना  पड़ता है। यह जानकारी होने पर की पत्नी साथ  नहीं हैं पता नहीं  घनिष्ठतावश या फिर महज औपचारिकता के चलते  मुझसे यह सवाल इष्ट मित्र  और सगे संबंधी अक्सर पूछ बैठते हैं कि अरे पत्नी नहीं हैं तो खाना पीना कैसे चल रहा है ? 

 यह सवाल इतनी बार सुनने के बाद भी मैं हर बार असहज हो जाता हूँ और सवाल का ठीक ठीक जवाब नहीं दे पाता। आखिर क्या केवल खाना बनाने के लिए ही पत्नी का  साथ रहना आवश्यक है ? नारीवादी और / या महिलायें तक जब ये सवाल पूछती हैं तब मुझे और भी क्षोभ होता है।  क्या घर में नारी की भूमिका केवल खाना बनाने तक ही सीमित है?

आज भी यह आदि ग्राम्य मानसिकता बनी हुयी है कि शादी व्याह इसलिए जरूरी है की कोई  दो जून की रोटी तो बनाने वाला हो! मतलब इसके सिवा आज  भी व्यापक स्तर पर महिलाओं  की अन्य विशेषताओं /आवश्यकताओं को रेखांकित नहीं किया जा पा रहा है. यह एक सोचनीय स्थति है। भई पत्नी है तो उनकी भूमिका को केवल खाना बनाने और परोसने तक ही क्यों अवनत कर दिया गया है? क्या उनकी उपस्थिति उनका साहचर्य अन्य अर्थों में उल्लेखनीय  नहीं है? क्या घर में उनकी भूमिका मात्र इतनी भर रह गयी है और  प्रकारांतर से यह भी कि  पुरुष  क्या मुख्यतः   एक अदद  खाना बनाने वाली के लिए ही व्याह करता है? यह बात हास्यास्पद भले ही लग रही हो मगर आज की इस इक्कीसवी सदी  में भी अधिकाँश पुरुष खुद खाना नहीं बनाते या फिर बना ही नहीं सकते/पाते।  क्योंकि संस्कार ही ऐसा मिलता है।  गाँव घरों में आज भी पुरुष रसोईं में घुसना अपनी शान के खिलाफ समझता है। 

पुरानी सोच की महिलायें भी पुरुष को खाना खुद अपने हाथों से बनाने को हतोत्साहित करती  रहती हैं।  वे खुद नहीं चाहती कि पुरुष रसोईं  संभाले -यह उनका कार्यक्षेत्र है।  यह सही है कि महिलायें अपने जैवीय रोल  में एक चारदीवारी की भूमिका में रहती रही हैं किन्तु अब समय और सोच में बहुत परिवर्तन हुआ है और नर नारी की पारम्परिक भूमिकाएं बदल रही हैं।  आज भी एक महिला को मात्र रोटी बनाने की मशीन के रूप में लेना उसकी महत्ता और उसके पोटेंशियल को बहुत कम कर के आंकना है।  इसलिए मुझसे जब यह प्रश्न  भले ही मेरे प्रति अपनत्व  की  भावना से  पूछा जाता है मुझे नागवार लगता है।  और यह पुरुष के अहम भाव को भी तो चोटिल करता है -अब क्या  हम इतने नकारे हो गए कि अपने खाने पीने का इंतज़ाम तक नहीं कर सकते?  

अरे हम जब 'राज काज नाना जंजाला' झेल सकते हैं तो उदरपूर्ति में परमुखापेक्षी क्यों बने रह सकते हैं? यह सवाल सिरे से खारिज है मित्रों -सवाल यह होना चाहिए कि अरे पत्नी नहीं हैं तो आपको कोई असुविधा तो नहीं हो रही है? अकेलेपन की तो अनुभूति नहीं हो रही है? कोई  यह भी पूछे कि पत्नी नहीं हैं तो घर कैसे व्यवस्थित है ? समय कैसे कटता है? आदि आदि सवाल भी तो पूछे  सकते हैं? कब तक यह चलेगा आप उन्हें लाते क्यों नहीं? 

पत्नी का आपके साथ होना आपके पारिवारिक जीवन की समृद्धता का द्योतक है। घर की जीवंतता का परिचायक है।  सम्पूर्णता का अहसास है।  एकाग्रता और आत्मविश्वास का सम्बल है।  भगवान राम तक कह गए प्रिया हींन  डरपत मन मोरा।  पत्नी साथ नहीं तो आप अधूरे हैं जनाब -एकांगी जीवन जी रहे है -समग्रता  का अभाव है यह ! आप मनसा वाचा कर्मणा सहज नहीं है। और यह कमी आपके व्यवहार में प्रदर्शित हो रही होगी। आपने नहीं तो आपके सहकर्मियों और अधीनस्थों ने यह नोटिस किया होगा और कदाचित झेला भी होगा -कभी उन्हें कांफिडेंस में लेकर पूछिए!
 किसी प्रियजन ने इस पुरानी पोस्ट को भी इसी संदर्भ में प्रासंगिक बताया

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

सधवा की साध!

विगत फरवरी माह से लोकसभा निर्वाचन की तैयारियों में ऐसा मुब्तिला होना पड़ा कि ब्लागिंग स्लागिंग सब छूटा।  बस कभी कभार फेसबुक पर आना जाना रहा।  किसी ब्लॉगर के ब्लॉग पर भी चाह कर जा नहीं पाया , सज्जन ब्लागर माफ़ करेगें और मेरी मजबूरी समझेगें। मगर कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं कि वे खुद को अभिव्यक्त करा लेने की कूवत रखते हैं जैसा कि आज का मुद्दा है।  कल पत्नी ने घर पर काम करने वाली दाई का एक ऐसा वृत्तांत सुनाया कि वह मन पर गहरे अंकित हो गया।  वही आपसे साझा करना है।

दाई का पति बहुत बीमार है और उसकी सेवा में वह दिन रात जुटी रहती है।   दाई अपना यह दुखड़ा पत्नी को सुनाती ही रहती है। उसकी भी उम्र काफी हो चुकी है।   कल उसने बहुत भावुक होकर कहा कि वे मेरे सामने ही चले जायँ मैं तो भगवान से यही मनाती हूँ नहीं तो मेरे पहले चल बसने पर उनकी कौन देखभाल करेगा? बात मेरे कानों तक पहुँची और मैं विस्मित सा हुआ।  क्योकि अक्सर हम यही सुनते हैं कि महिलायें पति से पहले ही जाने की इच्छा रखती हैं।  मतलब वे वैधव्य नहीं चाहतीं।  पति के सामने ही वे अपनी सदगति चाहती हैं।  मगर यह सोच कि जीवन साथी की देखरेख कौन करेगा मेरी दृष्टि में एक उदात्त सोच है जो रिश्ते के समर्पण को दर्शाता है।  मतलब वैधव्य का बोझ भी स्वीकार है मगर जीवन साथी की देखभाल में कोई कोताही न हो. 

मैंने इस बात का जिक्र कल फेसबुक पर किया था तो विविध विचार  आये हैं।  जिनमें एक यह भी है कि पुरुष प्रधान समाज में पति के दिवंगत होने पर पत्नी को एक बड़ी पारिवारिक और सामाजिक उपेक्षा का भी शिकार होना पड़ता है।  आर्थिक पहलू अलग है। एक दींन शीर्ण और उपेक्षित जीवन से तो मृत्यु ही भली है।  और यही सोच ज्यादातर भारतीय महिलाओं में एक सांस्कृतिक कलेवर ले चुकी है जिनमें वे सधवा ही मृत्यु का वरण करने को इच्छुक हो रहती हैं।  वे वैधव्य की नारकीय स्थिति का  सामना नहीं करना चाहतीं।

यह तो एक जीवन साथी की सोच हुयी -पत्नियों की सोच हुयी।  पति क्या सोचते हैं इस विषय पर इसकी चर्चा फिर कभी हम फुरसत में करेगें इन दिनों तो सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है :-(

आप अपने विचार जरूर दीजियेगा -प्रतीक्षा रहेगी!

रविवार, 2 जून 2013

जीवन की गुणवत्ता

मनुष्य कैसा जीवन जी रहा है और उसे कैसा जीवन जीना चाहिए इस प्रश्न का जवाब धर्म और दार्शनिकता के नज़रिए से दिया जाता रहा है . और भी कई नज़रिए हो सकते हैं . धर्म की बात करें तो जीवन के चार मूल लक्ष्यों/ पुरुषार्थ की कसौटी पर मानव जीवन की सफलता असफलता आंकी जाती रही है -ये हैं धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष . इनका उचित अर्जन ही मनुष्य के जीवन की सफलता मानी गयी है . इनमें भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है मगर राहत की बात है की मोक्ष की धारणा काल्पनिक ही है . चार्वाक ने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है -और इस अवधारणा की समझ को सरल कर दिया . महात्मा बुद्ध की माने तो मानव जीवन के मूल में दुःख ही दुःख है और मनुष्य के जीवन का बड़ा अभीष्ट सुख की प्राप्ति है .जब जीवन दुःख भरा है तो निश्चित ही मृत्यु मोक्ष से कम नहीं . कवी ने भी कहा है निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल .यहाँ कवि जीवन की आपाधपी और कष्ट की अनुभूति को ही उजागर कर रहा है .
यह युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा सजाया संवारा जा रहा है . आज प्रौद्योगिकी ने मनुष्य की सुख सुविधा के कितने ही इंतजाम किये हैं . आज अल्प काल मृत्यु के मामले बहुत घट गए हैं मनुष्य की सामान्य आयु बढी है . कई रोग बढे हैं तो कई लाईलाज रहे रोगों पर नियंत्रण भी कर लिया गया है ,बड़ी माता और तावन जैसी बीमारियाँ छू मंतर होगई हैं . प्रसव मृत्यु दर काफी कम हुयी है . यात्राएं आसान हो गयी हैं .दो जून का भोजन एक बड़ी आबादी को उपलब्ध है . अगर सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को हम सही कर पाए तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को और भी सुखमय कर देगी .. हो सकता है रामराज्य का हमारा चिर कालिक स्वप्न भी साकार हो जाय -अल्प मृत्यु नहिं कवनऊ पीरा सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा ....मगर शायद हम सुख का एक सीमित अर्थ लगा लेते हैं -भौतिक सुख सुविधा को ही हम सुख मान लेते हैं! आध्यात्मविदों की बात हमें यहाँ सच लगती है कि सुख कहीं बाहर नहीं वह तो भीतर हैं अंतर्मन में है -उसकी खोज बाहर नहीं भीतर होनी चाहिए! और यह पूरा विषय ही आध्यात्म का हो जाता है ,
तो क्या बेशुमार धन दौलत ही सुख का आधार है . जाहिर तौर पर तो यही लगता है . मगर मैंने देखा है कि गाँठ के पूरे कितने लोग छदम बाबाओं पीरों की शरण में जा जैसे तैसे कमाए धन को लुटाते रहते हैं .पक्के अन्धविश्वासी हैं . हर पल डरते रहते हैं कि उनका वैभव कहीं भरभरा न जाए . क्या यह सुखपूर्ण जीवन है ?. हमारे पुरखों ने कितने ही सुनहले नियम बनाये हैं जिन पर चल कर हम भले ही सुखद कम मगर एक सार्थक जीवन जी सकते हैं . मगर अब वे नियम कहीं खो गए जल्दी मिलते नहीं .कोई पूछता भी नहीं . सार्थक जीवन के जो कुछ मूल मन्त्र थे उनमें दया ,परोपकार ,सत्य के प्रति आग्रह आदि थे. और ये मूल्य हैं . किसी विद्वान ने कहा है कि उपलब्धियों से भरे जीवन की अपेक्षा हमें गुणवत्ता पूर्ण जीवन को ज्यादा तरजीह देना चाहिए . पर यह जीवन की गुणवत्ता कैसे बढ़ायी जाय?
मेरे मन में यह प्रश्न कौंधता रहा है। और दैनंदिन जीवन में मिलने वाले लोगों को देख समझ कर तो यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि जीवन जो बहुत दीर्घकालिक नहीं होता और फिर भी हम एक अंधी दौड़ लगाये हुए हैं में गुणवत्ता का समावेश कैसे हो सके ....आपके कुछ विचार हो तो साझा करें -हम उन विचारों को अगली पोस्ट में संश्लेषित कर प्रस्तुत कर सकेगें . आप भौतिक समृद्धि के अलावा जीवन में किन और चीजों को वरीयता देगें या दे रहे हैं ? आप खुद के जीवन को कितना सार्थक मानते हैं ? आपने कोई ऐसा काम अब तक किया है जिसकी कोई उत्तरजीविता हो? यानी जिसे लोग याद कर सकें? और नहीं तो कब करेगें समय तो पंख लगाये उड़ता ही जा रहा है ?क्या हमें खुद का जीवन जीना ही भारी लग रहा है? क्या हम सचमुच इतना असहाय हो गए हैं ? इस भूलभुलैया से निकलना मुश्किल सा हो गया है ?आपके लिए ये प्रश्न उत्तर देने में सहायक हो सकते हैं!

रविवार, 3 मार्च 2013

कितना भटक गया इंसान :-(

धर्म के प्रवक्ताओं को वैज्ञानिकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कंधे से कंधा मिलाकर दुनियां और मानवता की बढ़ोत्तरी में दिन रात सहयोग की भावना से जुटे रहते हैं -जबकि धर्म कर्म के अनुयायी ज्यादातर समय एक दूसरे के धर्म की निंदा में बिताते हैं और उनके  अपमान में ही समय जाया करते रहते हैं!और नतीजा सामने हैं विज्ञान ने जहाँ मानव की सुख सुविधा में एक बड़ा योगदान दिया है वहीं धर्म अपने मार्ग से भटक गया है जबकि मूल उद्येश्य इसका भी बहुजन हिताय और बहुजन सुखाया ही था। 
धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं मगर बने हुए हैं विरोधी। क्योंकि दोनों की प्रकृति में कुछ मूलभूत अंतर रहा है। विज्ञान में असहमतियों को खुले दिमाग से देखा समझा जाता है और कमियों को निरंतर सुधारने की प्रवृत्ति होती है जबकि धर्म में इसका ठीक उलटा आचरण है .यहाँ विरोधों और असहमतियों को लेकर तुरंत तलवारे खिंच जाती हैं .कट्टर लोग कट्टे तक निकाल लेते हैं . यहाँ तुरंत फतवे जारी हो जाते हैं .मगर विज्ञान की दुनिया में फतवे जारी नहीं होते .अगर किसी ने किसी की त्रुटि की ओर  ध्यान दिलाया तो उसका संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाती है,संशोधन होते हैं, आवश्यकतानुसार भूल सुधार होते हैं  . विज्ञान की अपनी एक पद्धति है जो  जिज्ञासा के अन्तःप्रेरण से आरम्भ होकर विभिन्न संभावनाओं /विकल्पों का सत्यापन सतत प्रयोग परीक्षण के जरिये कर सत्य के उदघाटन को प्रतिबद्ध होता है . धर्म के भटके स्वरुप में सत्य की घोषणा पहले ही की हुयी रहती है .यह घोषणा मुल्ला मौलवियों पंडितों ,पादरियों के मुखारविंद से होती है -जिसके विरोध का मतलब आपका बहिष्कार और कभी कभी तो सर तक कलम कर देने के फरमानों तक है . इसके विपरीत वैज्ञानिक कोई ऐसे परम पद पर आसीन नहीं है . अगर कोई वैज्ञानिक अनजाने की गयी त्रुटि के चलते गलत साबित होता है तो अपने समुदाय में उसे बिसरा भले दिया जाय कोई फतवा जारी नहीं होता .
                                                क्या सचमुच हुआ था नरसिंह अवतार?
धर्म या विज्ञान दोनों का उद्येश्य मानवता का कल्याण ही होना चाहिए यद्यपि विज्ञान की पद्धति में ऐसा कोई आवश्यक प्रतिबन्ध नहीं है . धर्म की नींव ही मानव कल्याण के सर्वतोभद्र कामना पर टिकी हैं . लेकिन आज धर्म इस अपने इस साध्य को साधने के बजाय मात्र पूजा पाठ के साधन तक सिमट गया है .मात्र पूजा पाठ ,अजान ,नमाज के साथ ही  मानव कल्याण के लिए उठाया गया एक छोटा कदम भी ईश्वर की एक बड़ी इबादत हो सकती है यह सच स्वीकार करने में हम पीछे रह जा रहे हैं . धर्म का अभ्युदय मानव कल्याण की सोच से ही हुआ मगर कालांतर में वह अपने मूल मार्ग से भटक गया है . हमारे कई समाज सुधारक पीर संतों ने समय समय पर हमें चेताया भी मगर धर्म और कट्टरता,धर्म  और कूप मंडूकता ,धर्म और अंधविश्वास का ऐसा सम्बन्ध स्थापित हो गया है जो टूटे नहीं टूट रहा है .
आज विद्वानों के बीच मान्य तथ्य है कि मनुष्य का निम्न श्रेणी के जीवों से विकास हुआ है -वह एक विकसित जीव है -न कि स्वर्ग से अधोपतित कोई देव -मगर फिर भी हम अवतारवाद को सच साबित करने में तुले हैं , हम आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते कि चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के पूर्व अवतारवाद का जिक्र केवल हमें अपने पूर्वजों की उस दृष्टि को दर्शाता है जो विकास की एक आरम्भिक सोच को दर्शाती है .यहाँ भी मछली से कछुआ और अदि अवतारों से होते हुए पशु और मनुष्य के संयुक्त रूप की नरसिंह अवतार  में बड़ी सुन्दर कल्पना की  गयी है -अब हम अपने पूर्वजों के इस सुन्दर वैचारिक योगदान की स्वीकृति और सराहना के बजाय अवतारों को ही सच मानने की मूर्खता पर उतर आते हैं . और जब पढ़े लिखे लोग भी ऐसा करते हैं तो मुझे दुःख होता है . जाहिर है उनके ज्ञान अध्ययन और विवेक में कहीं घोर कमी रह गयी है -ऐसे लोग निरक्षर लोगों से भी ज्यादा अहितकारी है समूचे समाज के लिए  . अगर यही लोग यह बात करते कि विकासवाद के सोच का उद्गम हमारे धर्म चिंतन में भी है तो कितनी पते की बात होती . मगर वे तो अवतारों को ही सच मान बैठते हैं . यह अंधश्रद्धा मानवता के लिए खतरनाक है .
धर्मों की ठीक से न समझी गयी बातों से कट्टरता उपजती,फैलती है - हिन्दू धर्म में कट्टरता कहीं नहीं है -विश्व में भारत ही वह भाव भूमि है जहाँ अनीश्वरवादी चिंतन तक का पुष्पन पल्लवन हुआ -सनातन धर्म चिंतन/दर्शन से जैन, बुद्ध दर्शन और कालांतर में इस्लाम के भी विचार पनपे -कहीं पृथक से नहीं आये -वेदान्त के कर्मकांडों को उपनिषदीय चिंतन ने तिरोहित किया -आज हिन्दू वह भी है जो किसी ईश्वर के वजूद को नहीं मानता और वह भी जो चौबीसों घंटे पूजापाठ में रत रहता है . हिन्दू होना विनम्र होना है किसी की भी पूजा पद्धति की खिल्ली न उड़ाना एक श्रेष्ठ हिन्दू का गुण है -शराब पियें या न पियें आप हिन्दू हैं ,मंदिर जाएँ या न जाएँ आप हिन्दू हैं ,मांस खायें न खायें आप हिन्दू हैं ,भगवान् को गाली दें या स्तुति करें आप हिन्दू हैं -इतना सृजनशील और संभावनाओं से भरा और कोई धर्म विश्व में दूसरा नहीं है -आप सभी से अनुरोध है इसे कट्टरता का जामा न पहनाएं -कोई मेरा सम्मान करे या न करे मैं हिन्दू ही रहूँगा ! मुझे हिन्दू होने का फख्र है क्योंकि इस महान धर्म ने मुझे कई बंधनों से आजाद किया है ...मुझे दुःख होता अगर मैं हिन्दू न हुआ होता और तब मुझे ईश्वर को मानने पर विवश होना पड़ता :-)
सबसे विनम्र निवेदन है धर्मों के रगड़ों झगड़ों को अलविदा कहकर विज्ञान सम्मत चिंतन को अपनाएँ!मानवता पर रहम करें!

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

परिणय बसंत बत्तीसी!

 न न यह कोई कविता नहीं है .. बस आज विवाह के सकुशल बत्तीस साल पूरे हो गए हैं तो यह बसन्त बत्तीसी  उसी के उपलक्ष्य में है .  बत्तीसी सही सलामत है ,दन्त नख क्षत क्षमता भी  उसी परम शक्ति की कृपा से दुरुस्त है :-) -रात से ही कितने छुट्टा विचार दिमाग में उछल कूद कर रहे हैं -सोचा इस बासंती अवसर पर आपसे साझा कर लूं।बात बत्तीसी से शुरू हुई है तो जाहिर है कथा भी शुरू होगी जीवन के उदन्त काल से जब हम उदन्त मार्तंड हुआ करते थे। छुट्टा जीवन था...वे दिन भी क्या दिन थे -दूध के दांत वाली सहज मुस्कान के दिन! फिर हम बंधन में बध गए माह फरवरी 18 ,वर्ष 1981..इलाहाबादी दिन पूरे होने को आये थे......स्वच्छन्दता के दुधिया दांतों पर बन आयी . हम बाण भट्ट बनते बनते रह गए -बस छुट्टापन के नाम पर केवल छुट्टा विचार ही रह गए कितनी ही कसक फसक लिए ....मनुष्य का मानो यह स्वभाव ही है जब वह स्वछन्द होता है तो कहीं बंधना चाहता है और जब बंधा होता है तो छूटना ...अब मेरी इस बात का कम से कम आज तो कोई निहितार्थ न निकाला जाय! कल की बात और है :-) 


हम तो  जनम जनम के  स्वच्छन्दतावादी है , छुट्टा ख़याल, छुट्टा जीवन के हिमायती -मगर मेरे युवा और चिर युवा मित्र उलाहना देते हैं कि खुद तो गुड खाए और हमें मना कर रहे हैं .अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि भैया अनुभव की बात बिना गुड खाए कैसे की जा सकती है -अरे मुझे मुझ जैसा कोई गुरु समय से मिला गया होता तो हम उसके अनुभव से लाभान्वित न हो गए होते? ..सभी तो यही चाहते भये  जब हम फंसे तो ये बच्चू कैसे छूट जाएँ . अरे युवा मित्रों, छुट्टा जीवन के आह्लाद का आनंद देखना हो तो छुट्टे गाय बैलों को तनिक देखो -कितने हृष्ट पुष्ट नज़र आते हैं उनकी तनिक मरियल से दिखने वाले बैलों और गायों से तुलना करो! दूर नहीं जाना यहीं फेसबुक पर ही देखो! अरे बुद्धू अब भी नहीं समझे तो निरे वो ही हो ...बाकी बातें हम आगे भी कर सकते हैं आज तो गाँठ का दिन है -आज तो बंधने का पर्व है -स्वाधीनता की बाक़ी बातें कल कर लेगें .और मित्रगण चाहेगें तो टिप्पणियों में खुला विमर्श भी!

बहरहाल हम अपनी और इनकी बात कर रहे थे ....शुक्रगुजार हैं  इनके कि  इनके ही बस कि  बात है  बिना शरद के आत़प को सहे बत्तीस परिणय बसंत आज  पूरे हुए ....अब तो आभार ब्लॉगवुड कि अक्ल की दाढ़ें भी निकल आईं पिछले पाँच वर्षों में ही  -अब आगे के जीवन के बारे में आपकी शुभेच्छाओं की कामना है! कई मित्र मित्राणियों के चेहरे याद आ रहे हैं आज -उम्मीद है उनकी शुभकामनाओं का संबल आगे के जीवन के लिए जरुर मिलेगा .......

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं। संदर्भ: मिड लाईफ क्राईसिस!

पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर अपडेट किया -"कभी कभी मन बहुत अवसाद ,जड़ता और नकारात्मकता से भर उठता है -चिकित्सक इसे पुरुष रजोनिवृत्ति (मेल मीनोपाज ) भी कहते हैं! क्या सचमुच मेल मीनोपाज एक हकीकत है या फिर चिकित्सकीय भ्रम? मेरे समवयी मित्रों आप कभी इस मनोभाव से गुजरते हैं ? आप इसे दूर करने का क्या उपाय करते हैं?"जैसा कि अपेक्षित था मित्रों की सदभावनाएँ बरसनी शुरू हो गई। मित्रों ने मजाक भी किया " हर शाम रेड वाईन के दो बड़े पेग लें ठीक रहेंगे" -   मैंने कहा   मैं तो असुर हूँ भाई इसे तो न ले सकूंगा! हाँ कोई प्यारा सा साथ  मिले तो यह कुफ्र भी कबूल है, बहुत हो गया मुसलमा बने हुए :-) किसी मित्र ने नियमित व्यायाम सुझाया तो किसी ने ग़ज़ल सुनने -सुनाने की सलाह और किसी ने रचनात्मक लेखन (जैसे यह विधा कभी आजमाई ही न हो मैंने :-) ) डाक्टर से मिलने की भी सलाह दी गयी। एक मित्रा(णी) ने यहाँ तक सलाह दे ड़ाला कि इधर उधर की ताका झांकी और राग विराग के बजाय ईश्वर में मन लगाईये -योग कीजिये -ध्यानावस्थित रहिये! रसिक मित्र वीरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने तो एक पूरा वृत्तान्त ही पुरुष रजोनिवृत्ति पर चेंप दिया। एक संक्षिप्त सी प्रतिक्रिया आयी कि "सर्च मिडलाईफ क्राइसिस" ..मैंने ढूँढा तो विकीपीडिया ने स्वागत किया .जैसा कि मेरी रचना प्रक्रिया का यह हिस्सा है नयी जानकारी मैं मित्रों से साझा करता हूँ-यह विवरण यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत है -विस्तार से विकीपीडिया पर पढ़ ही सकते हैं।
मैंने बात पुरुष रजोनिवृत्ति से शुरू की थी। महिलाओं में रजस्राव बंद होने के बाद की उम्र बहुत से हार्मोनल असंतुलन और 'मूड स्विंग' की होती है .इसी के समतुल्य कुछ भावनात्मक असंतुलन की स्थिति जो पुरुषों में 45 वर्ष के बाद शुरू होती है को नाम मिल गया "पुरुष रजोनिवृत्ति" -जो एक 'मिसनामर ' भले ही है मगर कतिपय लक्षणों की उपस्थिति के चलते यह नामकरण प्रचलन में है . मिड लाईफ क्राईसिस भी पुरुष या स्त्री के 40-60 वर्ष के बीच की अवस्था में आने वाला एक समय है जब कई ऐसे भावनात्मक उद्वेग पैदा होते हैं जो विचलित करने वाले हैं -मगर यह पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है। यह समय काल ऐसा है कि  वह जीवन के उस पड़ाव पर होता है जब उसके शेष जीवन की अवधि कम हो रहती है और वह अपना मूल्यांकन शुरू करता है -क्या खोया क्या पाया? कितना सफल हुआ वह समवयी मित्रों/लोगों में, जीवन में सफलता या असफलता के परिप्रेक्ष्य में तथा नौकरी की संतुष्टि/असंतुष्टि,विवाह और रोमांटिक सम्बन्धों की स्थति, और खुद का आकर्षक -अनाकर्षक दिखना,यौनिक संतुष्टि -असंतुष्टि ,यौन परफार्मेंस में गिरावट आदि आदि भी महत्वपूर्ण कारक पाए गए हैं .मुझे लगता है इसमें कुछ कारण अवश्य महत्पूर्ण है।
इस त्रासदी से बचने के   लिए लोगबाग़ कई अधीर और हास्यास्पद प्रयास भी करते हैं -खुद को सजाने संवारने , प्रदर्शन के कई और जुगाड़ -नयी गाड़ियां या वैभव के दिखावे वाले सामानों को खरीदना,अपनी वैवाहिक संगिनी से इतर नए सम्बन्ध ढूंढना . और जीनवादियों (जेनेटिसिस्ट) की माने तो अनुर्वरक (नान रिप्रोडकटिव) हो चुकी पत्नी के उम्र की तुलना में उर्वरकतायुक्त(रिप्रोडकटिव) घानिष्टता की साध आदि आदि .
अब इस मिडलाईफ क्राइसिस से बचने के उपाय आखिर हैं क्या? कई सुझाव हैं -मनो चिकित्सक से संपर्क के अलावा जीवन शैली के बदलाव की सिफारिश है .मगर मुझे लगता है इसके अलावा मनुष्य को अपनी निजी स्वार्थपरता को त्याग कर समाजोपयोगी कार्य कलापों में रूचि लेना भी आत्मसंतुष्टि का संबल बन सकता है -और भारतीय आध्यात्म चिंतन में अभिरुचि -जीवन की निस्सारता की अवधारणा, मनुष्य के निमित्त मात्र होने का बोध आदि ऐसे समय बहुत लाभदायी हो सकते हैं . जीवन में तरह तरह की अपेक्षाएं पाल कर लोग दुखी होते हैं और अवसाद में भी चले जाते हैं . यही वह अवसर है जब बुद्धं शरणम गच्छ का आह्वान अर्थपूर्ण हो उठता है . 
अतिशय भौतिकता मनुष्य को अंततः पलायन की और ले जाती हैं -कृष्ण ने ऐसे ही उहापोह के समय अर्जुन से कहा -सर्व धर्मं परितज्य मामेकं शरणं ब्रज ..मतलब किसी एक परम सत्ता को समर्पण .....सम्पूर्ण भक्ति! मगर आप कदाचित अनीश्वरवादी हैं तो भी यह तो समझ ही सकते हैं कि मनुष्य के हाथ में सब कुछ नहीं है -पुरुष समग्र जीवन के परिप्रेक्ष्य में परिस्थितियों का भी दास होता ही है। वैसे भी मिड लाईफ क्राईसिस महिलाओं में मात्र 3-4 वर्ष और पुरुषों में दसेक वर्ष की पायी गयी है -अब इतना भी झेल लेना कौन सी बड़ी बात है -लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं।

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

वे उधार लेने वाले :-(

ब्लॉग अपनी पर्सनल डायरी है न ? हाँ भाई हाँ! हाँ, यह बात अलग है लिखने वाला चाहे तो इसे सार्वजनिक कर दे या ना भी करे,मगर ब्लॉग तो अब ज्यादातर सार्वजनिक ही हो चले हैं। वैसे  ज्यादातर होते ये ब्लॉगर के खुद अपने बारे में ,उसकी सनकों के बारे में, उसके स्वभाव और उपलब्धियों के बारे में यानि बहुत कुछ खुद अपने ही बारे में -मैं ऐसा हूँ ,ऐसा ही हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं वैसा क्यों नहीं हूँ -हम सभी छुपे ,प्रत्यक्ष या बेशर्मी के साथ सेल्फ प्रमोशन भी करते फिरते हैं -देखो देखो मैंने ये बड़ा तीर मार लिया है। मैंने फला को पटा  लिया है ,फला को धूल चटा दिया है आदि आदि। 

आज मैं भी अपनी एक वह बड़ी महारत जो हासिल कर रखी है बताना चाहता हूँ , मैंने अब तक के अपने जीवन में कभी किसी से उधार नहीं माँगा है,भले ही बड़ी ही विषम स्थितियां रही हों मैं उधार मांग ही नहीं सकता -उधार मुझे व्यक्ति की  गरिमा को गिराने वाली बात लगती है -मेरा कान्सेंस अलाऊ ही नहीं करता . मैं बचपन से ही ऐसा हूँ . पैसा नहीं मांग सकता किसी से ..नहीं नहीं मैं बोस्ट  नहीं कर रहा अपनी एक आदत बता रहा हूँ और उस परम शक्ति का आभार भी कि अभी तक तो ऐसे ही निर्वाह होता गया है . मुझे याद है जब नयी नयी नौकरी मिली थी पगार बड़ी कम थी। पत्नी को नौकरी के शुरू शुरू से ही साथ में रखता रहा हूँ। लखनऊ की पहली पोस्टिंग थी ,,बस हैण्ड टू माउथ मामला था ...एक बार घर (जौनपुर ) आना था तो किराए के पैसे ही कम पड़ने की नौबत आ गयी,हमारी आदत शुरू से ही फुटकर पैसे गुल्लक में डालने की है। कोई रास्ता न निकलते देख गुल्लक से फुटकर पैसे गिनने की नौबत आ गयी -तब पांच और दस पैसे भी चलते ही नहीं दौड़ते थे ....गिना गया कुल पच्चीस रुपये निकल गए ....पचास तो पहले से ही था ..अब हम अचानक रईस हो गए थे .शान से बस पकड़ी और कुल पचहतर रुपये में दोनों जने  जौनपुर कुछ मुंह भी हिलाते डुलाते आ पहुंचे।एक दो रुपये बचे भी थे। 

हम भले ही किसी से उधार न मांगते हों मगर मैंने उधार मांगने वालों की एक लम्बी भीड़ अपने आज तक के जीवन में देखी है . एक सज्जन तो मुझे ऐसे मिले जो उधार मांगने के कई गुर में निष्णात थे ,मुझे बताते भी थे और मेरे किसी काम के न होने के बावजूद भी मैं उनके तौर तरीके को हिकारत से सुनता था . एक तो यही कि उधार कभी भी भूमिका बाँध कर नहीं माँगना चाहिए नहीं तो सामने वाला सावधान हो जाता है , उधार हमेशा अचानक ,हडबडी और औचक -बेलौस  माँगना चाहिए जिससे अगले को सेकेंड थाट का मौका ही न मिले और वह इनकार न कर पाए .मतलब यह कि उधार माँगना एक कला है और कुछ लोग इसमें पारंगत होते हैं -वे आपकी मानवता तक को ललकार सकते हैं .और यह भी अहसास दिला सकते हैं कि एक दुखिया की मदद न करके आप परले दर्जे के कमीने बन गए हैं . मेरे पिता जी जी उधार दे देकर थक पक  गए थे,दुनिया छोड़ गए उनके दिए उधार वापस नहीं हुए . मैं उनको कभी कभी बड़ा विवश देखता था -मेरे ही तरह सरल ह्रदय :-) थे और इसका फायदा उठाकर उनसे उधार मांगने वालो का तांता लगा रहता ..लेकिन उन्हें धक्का तब पहुंचता जब ज्यादातर उन्हें उधार वापस न करते, बार बार मांगने के बावजूद . मैं उन्हें बड़ा अपसेट देखता था . और उनके अनुभवों ने मुझे अपना एक सिद्धांत बनाने और उस पर कायम रखने को मजबूर किया ,

चार्वाक नाम के एक दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने उधारी को प्रोत्साहित करके एक परम्परा की नींव ही डाल  दी मानो -मगर वह समय सूदखोरों महाजनों का था -लोग सुतही (आन इंटरेस्ट ) पैसे बाटते थे और अनाप शनाप व्याज लगा कर वसूली करते थे -इस काम में तब के पुरोहित पंडित भी ऐसे महाजन के मददगार होते थे -जो पैसा वसूलने के नाम पर तरह तरह के हथकंडे -स्वर्ग नरग और अगले जन्म तक की देनदारी के भय दिखाते थे ...चार्वाक ने ऐसे समय लोगों को सीख दी-यावत्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत , भस्मा विभूतस्य शरीरस्य पुनरागमनम  कुतः  -अरे, शान से उधार लेकर देशी घी पियो यानि मौज मस्ती करो ..कहाँ पैसे वापस करोगे और यह भी न घबराओ कि अगले जन्म में देना पड़ सकता है-यह शरीर एक बार भस्म हुआ तो फिर  कहाँ लौटना? लगता है उधार मानने वाले इन्ही चार्वाक महाभागा के ही अनुयायी हैं जो आज संदर्भ प्रसंग बदल जाने के बाद भी बेशर्म होकर कारज अकारज उधार मागंते फिरते हैं .

मैं किसी को उधार नहीं देता बल्कि यथाशक्ति मदद करता हूँ . और वह भी अपवादों को छोड़कर केवल पहली बार  की ही मदद .लोग मुझसे  उधार मांगते हैं तो मैं  उन्हें उधार नहीं देता मदद कर देता हूँ जो कर सकता हूँ मगर इस हिदायत के साथ कि मैं जो पैसे दे रहा हूँ वापस नहीं लूँगा और दुबारा  दूंगा भी नहीं . मैंने कुछ दिलदार लोगों को भी देखा है वे इस शर्त के बाद उधार, जो वस्तुतः उधार नहीं रह जाता लेते ही नहीं ....(किसी और से ले लेते होंगे) ..अंतर्जाल के अनुभव भी कुछ अलग नहीं है . एक उधार का ऐसा मामला आया कि उन्हें कुत्ते का पिल्ला /पिल्ली लेना था उधार माँगा दे दिया .....उन्होंने बाद में वापसी की पेशकश की तो मैंने  ठुकरा दिया ...कहा  अब मत मांगिएगा , आप भी अपने अनुभवों से मुझे धन्य करियेगा तो मैं इस विषय पर एक ठोस और संतुलित दृष्टिकोण अपना सकूंगा . कुछ तो हुआ है आज जो यह पोस्ट सहज ही लिखा उठी ....
यह पोस्ट इस लिए भी लिख दी ताकि सनद रहे और हर बार मुझे यह सब तफसील से इक्स्प्लेंन न करना पडा करे -लोग बाग़ यह समझने लगते हैं कि मैं बहाने बना रहा हूँ -मैं उधार नहीं देता ......

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है!


आज हमारे समाज में अनेक समस्यायें हैं -कुप्रथायें हैं ,अंधविश्वास है ,बेरोजगारी और भूख है, दिशाहीनता है, पलायन है. कई मामलों में मनुष्य की मूलभूत जरूरतों का हवाला हम अक्सर देते हैं -कपडा ,रोटी और मकान ,मतलब जीविकोपार्जन और रहने के लिए  एक खास जगह  की दावेदारी -मतलब एक छत . मगर देखा यह जाता है कि इन मूलभूत जरूरतों के पूरा होने के बाद भी कई समस्यायें उठती रहती हैं . और उनका एक तात्कालिक हल निकालकर हम आगे बढ़ते हैं .कई बार तो समस्याओं का निराकरण तो कुछ ऐसे फार्मूले से होता है जैसे कि गरीबी हटाने का सबसे  कारगर तरीका है गरीबों को ही मिटा देना :-) .... चलिए यह तो भूमिका हो गयी . आज की इस पोस्ट के लिए कोई एक विषय तो चुनना होगा. मैं भ्रष्टाचार पर कुछ कहना नहीं चाहता -काजल की कोठरी में रहकर तो हर ओर अँधेरा ही दिखता है -समाज में नारी की स्थिति,विवाहादि पर  अकेले कुछ नारीवादी ही इतना लिख चुके हैं कि कुछ ख़ास  बचा ही नहीं लिखने को और लिखा तो कुहराम मचना तय है. बढ़ती जनसख्या ,गर्भनिरोध के तरीकों पर लिखना अब कुछ नया नहीं रह गया . मनुष्य के अन्तरंग  जीवन के पहलुओं पर लिखने पर हमेशा श्लीलता और अश्लीललता की विभाजक रेखा धुंधलाती हुयी सी लगती है . फिर ?
आज सोचता हूँ कुछ ख़ास पर्सोनालिटी टाईप्स की बात करूँ. ऐसे लोग जो हमेशा नकारात्मक ऊर्जा का संचार करते रहते हैं .अंगरेजी का एक शब्द है सिनिक (cynic ) -अर्थात- दोषदर्शी/मानवद्वेषी/निंदक ...ऐसे लोग आपसे भी अक्सर टकराते होंगें .उन्हें हमेशा यह लगता है कि यह दुनिया ही बड़ी कमीनी है ,स्वार्थी है ,यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं है ....अब कुछ भी नहीं बचा जो अच्छा हो -कबीर ने ऐसे आदमी की पहचान तरीके से कर ली थी बल्कि यहाँ तक कह डाला था कि उसकी तो बड़ी आवाभगत करो -घर के भीतर भी बुला आँगन में बिस्तर आदि लगा उसकी पूरी सेवा श्रूशुषा करो क्योंकि वह तो आपनी आदत से बाज तो आएगा नहीं, हां आपकी बर्दाश्त करने की आदत में निरंतर इजाफा करता जाएगा -अब महापुरुष लोग समस्याओं का ऐसा ही कोई यूनिक तरीका बताते  हैं जो व्यवहार में पूरी तौर पर कभी लागू न हो पाए और इसलिए उसे कभी खारिज भी न किया जा पाए :-)  
मगर मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को अवायड करना चाहिए क्योकि वे आपमें एक तरह की नकारात्मक ऊर्जा का समावेश करते हैं -आपका आत्मविश्वास डिगाते हैं. और आपका कोई काम बनते बनते इसलिए बिगड़ जाता है कि आप में नकारात्मक सोच घर कर गयी थी . दर्शनशास्त्र  में ऐसी ही एक विचारधारा(Solopsism) है कि आपका मस्तिष्क जो सोचता है वही साकार हो उठता है. इसलिए मस्तिष्क का सकारात्मक सोच वाला होना बहुत आवश्यक है .मनुष्य की यह सकारात्मक सोच न होती तो वह चन्द्रमा का जेता न हुआ होता और आज ब्रह्माण्ड के असीम दिक्काल तक जा पहुँचने का हौसला न रख पाता. हम छोटी छोटी बातों को लेकर नकारात्मक हो उठते हैं -किसी ने अन्यान्य कारणों से आपका साथ नहीं निभाया तो सारा समाज ही दोषी हो गया , किसी औरत ने अपने खसम पर हाथ उठा दिया तो सारी नारी जाति ही कुलटा बन गयी -ऐसे सोच खुद ऐसा सोचने  /कहने वालों को और प्रकारांतर से सारे समाज को नुकसान पहुंचाते हैं . एक व्यक्ति  ऐसी नकारात्मक अतिवादी सोच के चलते अपना और समाज का बड़ा नुक्सान करने पर उद्यत रहता है . 
मेरा आशय यह नहीं कि सभी झूठ मूठ आदर्शवादी हो जायं ....यथार्थवादी रहते हुए भी एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ हम क्यों न रहें? -विवेकानन्द की अनेक ऊर्जाभरी बातों में मुझे यह उनका सबसे अच्छा विचार लगता है कि देखो अगर तुम सब कुछ खो चुके हो तो भी पूरा भविष्य अभी भी तुम्हारे पास बचा हुआ है . यह है आशावादी सोच -हमेशा नकुआये रहना ,मुंह को बिसूरते बिसूरते उस पर एक  नकारत्मक स्थायी भाव ही चिपका लेना मुझे तनिक भी नहीं भाता ..माना कि दुनिया बहुत बुरी है मगर सच तो यह है कि बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है -. सकारात्मक सोच और ऊर्जा के प्रवाह से हम नरक को स्वर्ग में तब्दील कर सकते हैं ....ऐसा मेरा सोचना है . 
आपका क्या सोचना है ? 

शनिवार, 15 सितंबर 2012

अंत में आखिर हर किसी को दो गज जमीन ही तो चाहिए!


हाँ, अगर वो आख़िरी मुगलिया सम्राट और शायर बहादुर शाह जफ़र सरीखा दुर्भाग्य वाला न हुआ तो वह दो गज जमीन अपने मादरे वतन में ही मुहैया हो सकती है . मगर ये दो गज जमीन का मसला भी अजीबोगरीब है -हर देश और  संस्कृति में ये मसला अलग अलग तरीकों से निपटाया जाता है .आखिर यह मामला ,सभ्य  और सामाजिक -सांस्कृतिक मनुष्य का है न तो वह जानवरों की तरह तो अपने स्वजनों के शवों को इधर उधर छोड़ कर उनका निपटारा कुदरती तौर पर  कर नहीं सकता . मगर तिब्बतियों और पारसियों का एक अनूठा अनुष्ठान आयोजन इस मामले में काबिले गौर है जो शवों का निपटान बिलकुल कुदरती तरीके से करते हैं -वहां शवों को गिद्द्धों की मर्जी पर रख दिया जाता है और वे उन्हें खाकर उनका निपटान कुदरती तरीके से कर देते हैं ...
आधुनिक तरीका विद्युत् शव दाह गृह है जहां बहुत अधिक तापक्रम में शवों को ख़ाक कर दिया जाता है .और एक तरीका ताबूत का है जिसमें मुर्दा जिस्म जमीन के  नीचे दफ़न हो जाता है और बाकी का काम जीवाणुओं का समूह निपटाता है -मृत शरीर की कोशिकाएं उनमें मौजूद एन्जायेम के जरिये खुद का आत्मघात करती हैं और इस काम में जीवाणुओं की फ़ौज मदद करती है . मगर यही प्रक्रिया अगर खुले वातावरण में शवों के लावारिस होने पर घटती है तो जीवाणुओं के सक्रियता के चलते शव पहले फूलता है फिर दो रसायन यौगिकों -Putrescine and Cadaverine  की सडांध -तीव्र बदबू निकलती है .यही वे रसायन हैं जो मुख की दुर्गन्ध के भी कारण होते  हैं . 
जहाँ शवों को सीधे नदी में बहा देने की परिपाटी है वह स्वच्छ जल को दूषित कर देता है -गंगा में कचरा ,मल जल आदि की तरह ही एक गलत परम्परा है शवों को प्रवाहित कर देने की ...कहते हैं सांप आदि जंतुओं के काटे मृत व्यक्ति को बहा देने से उसके जीवित होकर पुनः वापस लौटने की एक क्षीण सी आशंका बनी रहती है . कई बार कई तरह के हादसों ,महामारियों के समय काफी तादाद में शवों का सामूहिक निपटान भी करना होता है जिनके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बाकायदा गाईड लाईन  जारी की हुयी हैं . 
आज आख़िरी संस्कार के कई विकल्प हैं -लोग बाग़ अपनी पसंद का भी चुन सकते हैं . हिरण्यकश्यप ने तो यहाँ तक वरदान  मांग लिया था कि जमीन आसमान और जल कहीं भी उसको मारा -दफनाया न जा सके ....और उसे ऐसी जगहं भी मयस्सर हो ही गयी .... मगर यह एक अलग कथा है -कहने का आशय केवल इतना कि आज बस यह (अंतिम ) इच्छा करने भर की देरी है आख़िरी संस्कार के कई विकल्प मौजूद हैं -हिन्दुओं का प्रचलित तरीका दाह -संस्कार का है और फिर 'पवित्र -राख " का पवित्र स्थलों ,नदियों में बिखराव का है -पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी राख को यथा संभव सारे हिन्दुस्तान की नदियों ,वादियों वनों उपवनों तक बिखेर देने की अंतिम इच्छा व्यक्त की थी.....यह पर्यावरण के लिहाज से अपेक्षाकृत एक कम प्रदूषण वाला  तरीका है मगर पूरी तरह से निरापद नहीं -यहाँ  ऊर्जा चाहे वह ईधन के रूप में हो या फिर विद्युत् के रूप में, की भारी मांग है और कार्बन डाई आक्साईड की बड़ी मात्रा  निःसृत होती है . और जिनके दाँतों में पारे की फिलिंग हुयी रहती है उन शवों से वाष्पीकृत पारे का प्रदूषण   भी फैलता है . 
आज एक और नया तरीका अमेरिका में लोगों की पसंद बन रहा है -द्रवीय निस्तारण (alkaline hydrolysis ) का. इसके अंतर्गत पोटैशियम हायिड्राक्सायिड द्रव में हलके तापक्रम पर शव को द्रव और दबाव के सहारे विघटन के लिए छोड़ दिया जाता है . शव द्रव में पूरी तरह  घुल जाता है और पर्यावरण के लिए हानिकारक भी नहीं रहता जिसका निस्तारण निरापद तरीके से कर दिया जाता है . अमेरिका में ही एक हरित शव निस्तारण की पद्धति भी प्रचलित हो रही है जिसमें शव को जैव विघट्नीय डब्बों में जमीन के अन्दर पूरी तरह कुदरती अवयवों में तब्दील होने के लिए छोड़ दिया जाता है . प्रोमेसा नाम की स्वीडिश कम्पनी ने फ्रीज ड्राईंग विधि का ईजाद किया है जिसमें लिक्विड नायिटरोजन  में शरीर से द्रव का शोषण कर लिया जाता है और शरीर पाउडर में तब्दील हो जाता है जिसे जमीन के भीतर गहरे दबा दिया जाता है.हाँ ऐसे स्थानों पर कोई स्मृति -वृक्ष उगाया जा सकता है जिसका पोषण शव अवयवों से होगा . यह एक आकर्षक तरीका है . 
चाँद की धरती पर पहला कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रांग अपनी अंतिम इच्छा के मुताबिक़ सागर की तलहटी में दो गज जमीन पा गए हैं ..अन्तरिक्ष में पवित्र राख के छोटे छोटे कैप्सूल भी बिखरने का ताम झाम चल रहा है जो अनंत काल  तक धरती की परिक्रमा करते रहेगें  बिना मोक्ष पाए!शीत प्रशीतन के तरीके भी सुझाव में हैं . मगर सबसे अच्छा तरीका कौन सा है यह तो बताना मुश्किल है -तरीके ही तरीके हैं कोई भी चुन लें! 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

मंदोदरी विलाप (मानस प्रसंग -10)

रामचरित मानस में वैसे तो काव्य के सभी रसों का यथोचित प्रवाह परिपाक हुआ है मगर करुण रस की प्रधानता है .तुलसी करुण रस का ऐसा प्रभाव संचारित करने में सक्षम हुए  हैं कि रूखा से भी रुखा और निष्ठुर व्यक्ति दयार्द्र हो उठे. भारतीय मानस भी करुण रस के प्रति बहुत सुग्राही है, सहिष्णु है. यहाँ करुणा  महाकाव्य तक लिखा सकती है ,चुनावों में हारते को भी जीत दिला सकती है . रामायण की रचना के मूल में करुणा है और भारत की राजगद्दी भी करुणा के जरिये हासिल होती रही है . वह चाहे राम हों या फिर गांधी परिवार करुणा के सहारे जिनकी राजनीतिक नैया पार हुयी है .इंदिरा ,राजीव के आकस्मिक कारुणिक निधन के बाद लोगों ने सत्ता थाल में सजाकर एक परिवार को सौंप दी ...कहने का आशय यह कि भारतीय जनमानस करुणा रस में  सहज ही  बहता आया है .....एको रस: करुण एव - संस्कृत साहित्य के एक मूर्धन्य कवि भवभूति ने भी यही कहा और अपने ग्रन्थ उत्तर रामचरितम में यही प्रतिपादित और चरितार्थ भी किया .

मेरा नियमित मानस अवगाहन जारी है और मैंने पाया है कि यहाँ तमाम अन्य काव्यगत विशेषताओं के साथ ही  एक कारुणिक भाव बोध निरंतर बना रहता है -करुणा की एक अंतर्धारा सी बहती रहती है मानस में ....राम वनगमन ,दशरथ की मृत्यु ,सीता विछोह ,लक्ष्मण की मूर्छा आदि प्रसंग एक एक कर आते गए हैं और करुणा रस में पाठक को सराबोर करते हैं. तुलसी इस भाव के प्रगटन में इतने सिद्धहस्त लगते हैं कि रावण जैसे अत्याचारी की मृत्य पर भी पाठकों को करुणा के प्रवाह में बहा ले गए हैं -उस समय जब देवता जन हर्षगान कर रहे हैं ,विमानों से पुष्प वर्षा कर रहे हैं -चारो और खुशी और उत्साह का माहौल है मगर मृत्यु तो आखिर मृत्यु ही है -शत्रु या मित्र सभी के लिए सम और समान . तुलसी बड़ी ही सूक्ष्मता और कुशलता से इस भाव को लेते हैं और मंदोदरी के विलाप के जरिये मृत्यु जन्य करुणा का विस्तार करने से नहीं चूकते ....

मंदोदरी विलाप करते हुए कह रही है हे नाथ तुम्हारे बल के आगे धरती नित्य चलायमान थी (आज्ञाकारिणी बनी हुयी थी -कांपती रहती थी ) और अग्नि ,सूर्य और चन्द्र सभी निस्तेज हुए रहते थे ...और जिसका भार शेष और कच्छप भी सहने में असमर्थ थे वही शरीर आज धूल धूसरित सामने निश्चल पडा हुआ है -
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।।

सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।

हे नाथ!  वरुण ,कुबेर, इंद्र और वायु भी तुम्हारे सामने कभी रणभूमि में टिक नहीं पाए ,स्वामी, आपने तो अपने बल और प्रताप से काल और यमराज को भी जीत लिया था किन्तु आज अनाथ की तरह पड़े हुए हो ...
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।।

भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।।

अरे तुम्हारी प्रभुता तो जगत विख्यात थी और हाय तुम्हारे पुत्रों  और कुटुम्बियों के बल की भी कोई थाह नहीं थी मगर आज हे नाथ राम के विमुख होने से तुम ऐसी दुर्दशा को पहुँच गए कि खानदान में कोई रोनेवाला भी नहीं रहा ....

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।।

राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।।

हे नाथ विधाता की सारी सृष्टि ही तुम्हारे वश में थी ..लोकपाल सभी तुम्हे भयभीत हो सर नवाते थे मगर आज तुम्हारा ऐसा पराभव हुआ कि सर  और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं...रामविमुख के साथ तो होना भी यही था .....कितनी बार मैंने आपको कहा, मनाया मगर आप तो काल के वश होकर किसी का नहीं माने और आज इस गति को प्राप्त हुए .....जगत के नाथ को भी साधारण मनुष्य मान बैठे.. 

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।।

अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।

ऐसे कारुणिक दृश्य को देखकर  राम भी द्रवित हो गए और उन्होंने मंदोदरी को दिलासा देने के लिए लक्ष्मण को भेजा .....

मृत्यु तो सभी की तय है ....तुलसी इस अवसर पर देवताओं के हर्षगान को तो दिखाते हैं मगर मृत्युलोक के इस ध्रुव सत्य से भी विमुख नहीं होते कि मरना तो एक दिन सभी को है -रावण मृत्यु के बाद महज एक निस्तेज शरीर है ....इस मृत काय से अब कैसा वैमनस्य? एक यह भी प्रबल सन्देश  देने से महाकवि विरत नहीं हुए हैं कि यहाँ कुछ भी चिरकालिक, अक्षय  नहीं है ..रावण सरीखे पराक्रमी का भी पराभव हुआ और वह ऐसी गति -दुर्गति को प्राप्त हुआ कि रहा न कुल कोऊ रोवनहारा ....यह एक सीख है लोगों को जो उन्हें उद्धतत्ता से रोके और विनम्र बनाए .......जय श्रीराम!  


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

एक वर्षा ऋतु वर्णन ऐसा भी ......(मानस प्रसंग-9 )


वर्षा ऋतु ही ऐसी है कि कवि मन आह्लादित हो उठता है ..सुमित्रा नंदन पन्त ने लिखा,पकड़ वारि की धार झूलता रे मेरा मन ...  कवियों ने वर्षा की  फुहारों से प्रेरित अपने मन की उत्फुल्लता को अनेक भावों में व्यक्त किया है .मानस में तुलसी ने भी किष्किन्धाकाण्ड में स्वयं राम के श्रीमुख से वर्षा ऋतु का वर्णन किया है जो अद्भुत और अविस्मरणनीय   है,.  आज मानस के इसी प्रसंग के कुछ अंश आपसे साझा करता हूँ .....राम गहन जंगलों में ऋष्यमूक पर्वत पर जा पहुंचे हैं ...सुग्रीव से मैत्री भी हो चुकी है. सीता की खोज का गहन अभियान शुरू हो इसके पहले ही वर्षा ऋतु आ जाती है . वर्षा का दृश्य राम को भी अभिभूत करता है .वे लक्ष्मण से कह पड़ते हैं .....बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए .....हे लक्ष्मण  देखो ये गरजते हुए बादल कितने सुन्दर लग रहे हैं.....और इन बादलों को देखकर मोर  आनन्दित हो नाच रहे हैं ......मगर तभी अचानक ही सीता की याद तेजी से कौंधती है और तुरंत ही बादलों के गरजने से उन्हें डर भी लगने लगता है .... :-) -घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥...आखिर वे लीला ही तो कर रहे हैं ..एक साधारण विरही की भांति .....

अब बिजली चमकती है तो वे कह पड़ते हैं - दामिनि दमक रही  घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥अर्थात बादलों में बिजली ठीक वैसी ही रह रह कर कौंध रही है जैसे किसी दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं होती, बस क्षणिक सी होती है ......और लक्षमण जरा पानी के बोझ से नीचे तक आते हुए इन बादलों को तो देखो जो वैसे ही लग रहे है जैसे विद्या पाकर विद्वान और विनम्र हो जाते हैं .....और यह भी तो देखो कि वर्षा बूदों को ये पर्वत शिखर ऐसे सह रहे हैं जैसे दुष्ट जनों के दुर्वचनों को संत लोग सहज ही सह लेते हैं बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें॥....और वर्षा से ये छोटी मोटी नदियाँ तो ऐसी उफना कर बह रही हैं जैसे थोड़ा सा ही धन मिलते ही दुष्ट जन भी इतराने लगते हैं ,मर्यादाओं का त्याग कर उठते हैं . ...छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥....और लक्ष्मण  यह भी तो देखो वर्षा जल कैसे तालाबों में वैसे ही सिमटता  आ रहा है जैसे कि सदगुण एक एक कर सज्जनों के पास चले आते हैं .. समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
अब वर्षा ऋतु है तो उसके अग्रदूत भला कैसे पीछे रहते ....मेढकों की टर्राहट परिवेश को गुंजित कर रही है ..राम का ध्यान सहसा ही इन आवाजों की और जाता है और वे उन्हें एक परिहास सूझता है ..कह पड़ते हैं, लक्ष्मण इन मेढकों की टर्राहट तो एक ऐसी धुन सी सुनायी पड़ रही है  जैसे वेदपाठी ब्राह्मण विद्यार्थी वैदिक ऋचाओं का समूह पाठ कर रहे हों ....दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥यह अंश तुलसी ने ऋग्वेद से प्रेरित होकर मानो लिया है जहाँ मेढकों के वर्षा ऋतु गायन पर "मंडूक" नाम्नी  ऋचाएं हैं(संवत्सरं शशयानाः ब्राह्मणाः व्रतचारिणः वाचम पर्जन्यअजिंविताम  प्र मंडूकाः अवादिशुः -एक वर्षीय निद्रा से उठकर मौन वर्ती  ब्राह्मणों की तरह ही बादलों के आगमन से हर्षित हो मेढक गण मानो  वेदाभ्यास कर रहे हों ) ..अब वर्षा ऋतु है तो जुगनू भी दिप दिप कर रहे हैं ..राम को लगता है ये तो अँधेरे में ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे दम्भियों का पूरा समाज ही आ जुटा हो .....निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥
अब भरी वर्षा हो चली है .....राम देखते हैं छोटी छोटी क्यारियाँ और नाले भी उफनाकर बह चले हैं और वे फिर हास -परिहास भरी बात कह उठते हैं -महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥....लो अब तो तेज हवाएं भी चलने लगीं .....और राम कह पड़े ...लक्ष्मण,तेज हवाओं से बादल उसी तरह अदृश्य हो जा रहे हैं जैसे कुपुत्र के होने से कुल के उत्तम कर्म /धर्म नष्ट हो जाते हैं ....और कभी तो बादलों के कारण ही दिन में भी घोर अन्धकार छा जाता है तो कभी उनके हटने से सूर्य निकल आता है ठीक वैसे ही जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और फिर सुसंग पाकर वापस लौट आता है -
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥

मानस में  वर्षा ऋतु के अविकल पाठ के लिए आप यहाँ जा सकते हैं -यह तो मात्र कुछ संकलित अंश है .....

रविवार, 22 जुलाई 2012

का न करै अबला प्रबल?.....(मानस प्रसंग-7)



अब आगे ....
बालकाण्ड में पहली बार नारी विषयक उदगार तब व्यक्त हुए हैं  जब वन में नारी विछोह में भटकते भगवान राम की  सती ने परीक्षा ले ली, शंकर जी की अनिच्छा के बावजूद -नारी के इसी दुराव छिपाव को लक्षित करते हुए  संतकवि कहते हैं -सती कीन्ह चह तहहूँ दुराऊ देखऊँ नारि सुभाव प्रभाऊ ..अर्थात जो सर्वज्ञाता है सती उससे भी छल कर रही हैं -नारी का स्वभाव तो देखिये .....और इसी दुराव को लक्षित कर शंकर जी ने सती का परित्याग किया -यहिं तन सती मिलन अब नाहीं ... खुद सती के ही अगले जन्म में पार्वती यह स्वीकारती हैं -"नारि सहज जड़ अज्ञ ... नारी स्वभाव से ही मूर्ख और बेसमझ होती है ..मैंने शिवजी से कपट किया था और उसका परिणाम भोगा"  -अयोध्या काण्ड में कैकेयी ने राजा दशरथ के साथ जो प्रपंच किया उससे भला कौन अपरिचित है ..वहां भी उल्लेख हुआ है -जदपि सहज जड़ नारि अयानी..नारी तो सहज ही मूर्ख और अज्ञानी है (मतलब जन्म से ही  मूर्ख) ..राजा दशरथ नीति निपुण होते हुए भी नारी मोह में पड़ गए -कारण? जद्यपि नीति निपुण नरनाहू नारि चरित जलनिधि अवगाहू ..बिचारे क्या करते? त्रिया चरित्र ही अथाह है उसका पार नहीं  पाया जा सकता . और राजा दशरथ नारी का विश्वास कर कहीं के नहीं  रहे ....गयऊँ नारि विश्वास.....! 
अयोध्या काण्ड में ही विभिन्न प्रसंगों में आया है -सत्य कहऊँ कवि नारि सुभाऊ सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ यानि कविगण सत्य कहते हैं कि नारी का स्वाभाव पकड़ में आने वाला  नहीँ है .अथाह है और भेद भरा है अपनी परछाईं तो फिर भी पकड़ी जा सकती है मगर नारी की गति समझ पाना असंभव है -निज प्रतिबिम्ब बरकु गहि जाई जानि न जाई नारि गति भाई ...हाँ एक जगहं वह निरी अबला भी नहीँ है -काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाई का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाई ....आग क्या नहीँ जला सकती ,समुद्र में क्या नहीँ समां सकता काल किसे कवलित नहीँ कर सकता और नारी क्या नहीँ कर सकती -वह तो दरअसल प्रबला है, अबला बस कहने भर को ही है  ....राजा दशरथ का तो प्राण ही हर लिया ...इतने ज्ञानी, विद्वान मगर अबला बिबस ग्यानु गुण गाजनु ..एक अबला से विवश हो गए ... 

भरत  स्वयं कैकेयी को धिक्कारते हुए कहते हैं -विधिहुं न नारि ह्रदय गति जानी सकल कपट अघ अवगुण खानी..अर्थात स्वयं ब्रह्मा भी नारी के ह्रदय की बात नहीँ जान सकते जो हर तरह के कपट बुराई और अवगुण की खान है...एक स्वीकारोक्ति शबरी की भी है -अधम ते अधम अधम अतिनारी तिन्ह में मैं मदिमंद अघारी ...जो अधम से भी अधम हैं नारी उनमें भी अधम है ...और उनमें भी मैं अति मंद बुद्धि की हूँ .....अरण्य काण्ड शुरू हुआ तो संतकवि ने राम के मुंह से -सीधे श्रीमुख से भी नारी की निंदा कराकर मनो संतुष्ट हुए हों -राख़िय नारि जदपि उर माहीं जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं -यानि नारी को भले ही ह्रदय में ही क्यों न रखा जाय वह ,शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रह सकते ...वे स्वभावतः स्वच्छंद होते हैं ..अरण्य काण्ड का समपान ही नारी विमर्श /विषयक परामर्श से होता है - 

दीप शिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग 

युवती का तन दीपक के लौ के सामान है, हे मन तूं उसके लिए पतंगा मत बन (नहीं तो नष्ट हो जाएगा )......

क्या सचमुच ज्ञानार्जन और पुरुषार्थ का मार्ग नारीविमुखता या उससे तटस्थ रहने  से ही संभव है? या फिर आर्ष ग्रथों की बात बस ऐसे ही कल्पना की बेवजह  उड़ान है और उसे अनदेखा कर देना चाहिए? संतकवि का खुद का अपना भोगा  हुआ यथार्थ -पत्नी की लताड़ उनकी आजीवन की कसक रही हो जिसे उन्होंने रामायण के पात्रों में यत्र तत्र आरोपित किया हो? ये सारे सवाल मेरे मन को मथते रहे हैं ,आप क्या कहते हैं ? 

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

नारी सब दुखों की खान है -बोले सियावर रामजी! (मानस प्रसंग, 6)


सबसे पहले यह निवेदन और दावात्याग: प्रस्तुत लेख एक खुला हुआ नारी विमर्श है और मेरा अपना कोई पूर्वाग्रह पोस्ट-कंटेंट के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। विषय पर मेरी अपनी समझ और व्याख्याएं हैं। मगर यहां मैं उनसे निरपेक्ष रहकर मानस के नारी विमर्श को जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूं।मेरे मित्रगण खासकर महिला ब्लॉगर और मित्र इसी परिप्रेक्ष्य में इस पोस्ट को देखेगें/देखेगीं! हां विवेचन में अपने मनोभाव भी व्यक्त कर सकूंगा अगर कोई स्वस्थ बातचीत-विवेचन होता है तभी! पोस्ट लम्बी हो गयी है अतः दो भागों में आएगी...आज अरण्यकाण्ड पूरा हुआ। एक ख़ास प्रसंग है यहां . सीता की खोज में राम वन-वन भटकते हुए आगे बढ़ रहे हैं। एक सुरम्य सी जगह रुकते हैं। विराम करते हैं। मुनिजन, देवता गण आते हैं। स्तुति गान करते हैं। नारद भी आते हैं। सुअवसर जानकर एक सवाल पूछते हैं –

तब बिबाह मैं चाहऊँ कीन्हा केहिं कारण प्रभु करहि न दीन्हा...

प्रभु! मैं जब विवाह करना चाहता था तब आपने मुझे क्यों नहीं करने दिया? नारद को एक कसक थी...सो पूछ ही लिया...मोह में उनकी बड़ी फजीहत हुई थी। उन्हें अपने कामजेता होने का घमंड हो गया था और विश्वमोहिनी के स्वयंवर का सारा माया जाल उनके इसी दर्प को तोड़ने के लिए रचित हुआ था। कथा आपको पता ही है। भगवान राम ही अब उन्हें इत्मीनान से बताते हैं कि उन्हें उस समय विवाह करने से हठात खुद उन्होंने ही रोकने का यत्न क्यों किया था। यह प्रसंग मानस में नारी विमर्श का एक अनूठा प्रसंग है। श्री राम कहते हैं –


काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।। 


उन लोगों को जिन्हें अवधी पढ़ने समझने में असुविधा है, अर्थ भी बताते चलते हैं - संसार में काम क्रोध लोभ और मद मनुष्य के मोह के बड़े कारण हैं। मगर उनमें भी स्वयं माया रूपा नारी तो अत्यंत दारुण और दुखद है। हे मुनि, पुराण और श्रुतियों तक में यही कहा गया है कि मोह रूपी वन के लिए नारी बसंत ऋतु के समान है। अर्थात् सभी मोहों को बढ़ाने वाली है। और जप तप नियम रूपी जलाशय के लिए तो वह ग्रीष्म ऋतु बन कर इन गुणों को सोख लेती है। मगर काम क्रोध मद और डाह रूपी मेढकों के लिए नारी वर्षा ऋतु बनकर हर्षित कर देती है। और बुरी वासनाओं के कुमुदों के लिए तो यह सदैव सुख देने वाली शरद ऋतु बन जाती है। और सभी तरह के धर्मं कर्म रूपी कमलों के समूह के लिए नारी हिम (ऋतु) बन कर उन्हें क्षय कर देती है। ममता मोह रूपी जवास (के वन) को तो नारी शिशिर ऋतु बनकर हराभरा करती है। पाप रूपी उल्लू समूहों के लिए नारी घनी अंधेरी सुखभरी रात है जो उनके बढ़ने में सहायक है। और तो और बुद्धि बल शील और सत्य रूपी मछलियों के लिए यह बंसी (मछली पकड़ने का कांटा) बन जाती है।

हे मुनिवर युवती स्त्री सभी अवगुणों की मूल,पीड़ा देने वाली और दुखों की खान है और इसीलिए मैंने आपको विवाह करने से रोका थाअब जैसे मुनि और ज्ञानी जनों के लिए नारी सानिध्य ही पूर्णतया प्रतिबंधित हो!

मानस का यह प्रसंग निर्विवाद रूप से संतकवि के निजी भोगे हुए अनुभव और नारी विषयक तत्कालीन अद्यावधि ज्ञान का निचोड़ था जो किसी और के मुंह से नहीं स्वयं श्रीराम के मुंह से संत कवि द्वारा कहलाया गया। हमारे धर्मग्रंथों, आर्षग्रंथों में नारी को ज्ञान और तपस्या का एक विरोधी कारक बताया जाता रहा है जबकि यह भी सत्य है कि अनेक संदर्भ ग्रन्थ वैदिक -उपनिषदीय काल की नारियों को परम विदुषी और वेदों के ज्ञाता भी घोषित करते हैं।

मेरा असमंजस यही है - क्या कालान्तर में कतिपय कारणों, जिनकी पहचान की जा सकती है, के चलते नारी की यथोक्त स्थिति विद्वत मानस में बनती गयी। क्या सनातनी ब्राह्मणों ने बुद्ध विहारों में नारी स्वच्छंदता से उपजे व्यभिचार और ज्ञान मार्गियों के अधोपतन से कोई सबक लिया था? मानस में नारी विमर्श के इस स्वरुप को देखकर मैं हतप्रभ हूं। लिहाजा मैंने पूर्व कांडों का भी एक सिंहावलोकन किया। दरअसल बालकाण्ड से ही नारी का ऐसा रूप स्थापित होता दीखता है।

शेष अगले भाग में...


बुधवार, 11 जुलाई 2012

बाबा भोलेनाथ का दर्शन


सावन का महीना काफी धरम करम का होता है. बनारस में काफी भीड़ जुटती है श्रद्धालुओं की. इनकी एक और कैटिगरी पिछले एक दशक से आ जुड़ी है, कांवरिये. हर गली हर सड़क इन श्रद्धालुओं से लबरेज दिखती हैं. सावन के सभी सोमवारों पर बाबा भोले के दर्शन को लक्खी भीड़ (लाख से ऊपर) आ जुटती है मानो श्रद्धा का सैलाब उमड़ा आ रहा हो. अब इतनी भीड़, शहर की गड्ढों से भरी सड़कें और पतली गलियां. तिस पर बाबा भोले का एक अलग घनी आबादी और सकरी जगहं विराजमान होना. इंतजामिया विभाग के लिए बड़ी चुनौती. कैसे करे श्रद्धा के उमड़ते सैलाब को व्यवस्थित. लिहाजा बाबा भोले जो खुद विश्वनाथ हैं उनके इर्द गिर्द चप्पे चप्पे पर पुलिस और हर गली कूचे में एक मैजिस्ट्रेट की व्यवस्था ताकि खुदा न खास्ता कुछ अनहोनी हो तो उसकी पतली गर्दन नाप दी जाए :-). हम भी लगभग ऐसी ही एक जिम्मेदारी और घोर श्रम के काम में लगते हैं. एक रात के 11 बजे से शुरू हुई ड्यूटी दूसरे दिन शाम तक की हो जाती है क्योंकि श्रद्धा का सैलाब अर्धरात्रि से ही ऐसा शुरू होता है कि लगातार अहर्निश दूसरे दिन के शाम तक चलता रहता है. बिना रुके बिना थमे. किसी को भी बिना चार घंटे लाइन में लगे बाबा भोले का दर्शन मिलना शायद ही मयस्सर हो.
भला आप भी दर्शन से क्यों वंचित रहें 


ये दर्शनार्थी इतना कष्ट उठाते हैं कि मत पूछिए. कलेजा दहलता है और मुंह को आता है. और सिर श्रद्धा के इस रूप को देखकर स्वतः झुक जाता है. खुद की मुश्किल भरी ड्यूटी का कष्ट जाता रहता है. खुले में वर्षा में भीगते हुए, घंटों खड़े हुए, सूजे  हुए और झलकों से अटे पैरों के बावजूद भी चेहरों पर आशा और उत्फुल्लता की चमक...बोल बम के नारे...महादेव महादेव की रटन...एक अद्भुत दृश्य. जमीन पर दंडवत करता आता हुआ एक श्रद्धालु दूर से दिखा. पता लगा किसी दूसरे जिले से एक महीने पहले जमीन पर दंडवत करता ही चला आ रहा है. अब बाबा के दरवाजे आ पहुंचा है. कतार में नहीं है वह. मगर इस हठयोगी और बाबा के भक्त के लिए कतार की जरूरत ही कहां. मुझे कहने की जरूरत भी नहीं पड़ती. मुख्य वीवीआईपी द्वार का अवरोध उठा दिया जाता है. मंत्रमुग्ध द्वार प्रहरियों द्वारा. वह निर्विकार भीतर प्रवेश कर जाता है. अब वह बाबा का ख़ास भक्त है. उसे किसकी परमिशन लेनी है! मानो बाबा की प्रेरणा से दरवाजा खुल गया है. यह है श्रद्धा की विवेक और तर्क पर जीत. मैं भी किंकर्तव्यविमूढ़ देखता रहा यह लीला.





घंटों से कतार में लगे हैं दर्शनार्थी 



इन दृश्यों को देखकर सारे तर्क और बुद्धि की चंचलता जड़वत हो जाती है. भले ही चप्पे चप्पे पर पुलिस और सुरक्षा का भारी तामझाम है मगर सच पूछिए तो श्रद्धालुओं की यह भीड़ स्वयं बड़ी अनुशासित दीखती है. उसे बस बाबा भोलेनाथ का दर्शन चाहिए और किसी बात से उन्हें कोई मतलब नहीं है. वे एकाग्र होकर बस उसी पल की प्रतीक्षा में अपना नंबर लगाये रहते हैं. कतार में उन्हें घंटे दो घंटे चौबीस घंटे बीत जाएं कोई फरक नहीं है. मगर इतनी बड़ी भीड़ को नियमित करना सचमुच एक बड़ी समस्या है. प्रशासन के लिए नाकों चने चबाने का मौका है यह. पंजों पर खड़े रहने का वक्त. हम सब कुर्सी तोड़ मुलाजिम इतनी कठिन ड्यूटी के अभ्यस्त नहीं हैं तो दूसरे दिन तक पांव दुखते हैं. शरीर पोर पोर दुखता है और तापे पुरवईया भी पीर बढ़ाती चलती है. अब अगले सोमवार तक यह पीर बनी रहेगी जब तक दूसरी न घेर ले. यह सिलसिला इस महीने तक चलेगा. मगर यह कष्ट तो श्रद्धालुओं के कष्ट के सामने कुछ भी नहीं है..


 नन्हा कांवरिया बड़ा सा डमरू -बोले डम डम 



अब अगले सोमवार का इंतज़ार है...

रविवार, 1 जुलाई 2012

जौं न होत जग जनम भरत को....(मानस प्रसंग 4)


रामचरित मानस एक आदर्श परिवार, समाज और व्यवस्था की रूप रेखा सामने रखता है -जिसे 'रामराज्य' का संबोधन दिया जाता है। यद्यपि यह रामराज्य कई विवेचकों के लिए यूटोपिया का पर्याय बना है। मध्ययुगीन संत कवि तुलसी का प्रादुर्भाव तब होता है जब घोर तार्किकता और निःसंगता की तूती बोल रही थी और कबीर का उद्धत घोष - कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुआठीहाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ लोगों को घर बार से बाहर निकालने का आह्वान दे रहा था - तुलसी ऐसे में टूटते परिवार और खंडित आस्था के मंडन को अवतरित होते हैं। आज मानस में एक भाई के रूप में भरत के चरित्र चित्रण के कुछ अंश आपके सामने रखना चाहता हूं। 

राम के वन गमन और पिता के मृत्यु से भरत बिखर से गए हैं - राज्याभिषेक को दुत्कार देते हैं और चल पड़ते हैं राम को मनाने। वह आगे, सारी प्रजा पीछे पीछे...लोग बाग अनुरोध करते हैं -पैदल नहीं रथ पर चलिए आप। तो वे जवाब देते हैं - 

सिर भर जाऊं उचित अस मोरा

सबतें सेवक धरमु कठोरा
वह कहते हैं कि इसी मार्ग से राम पैदल गए हैं तो मेरे लिए तो उचित यह है कि मैं सिर के बल जाऊं क्योंकि सेवक का धर्म बड़ा कठोर होता है। यहां भरत खुद को राम का भाई नहीं सेवक मानते हैं। यह है विनयशीलता, विनम्रता का उदाहरण और सेवक के आचरण की एक सीख। पावों में छाले/झलके पड़ जाते हैं मगर वह आगे बढ़ते जाते हैं। प्रयाग के संगम (त्रिवेणी ) तक आ पहुंचते हैं। थकी प्रजा, परिवार, माताओं के विश्राम के लिए पड़ाव डलवा देते हैं। यहां सभी श्रम-थकान को दूर करने और पुण्यलाभ के लिए त्रिवेणी स्नान करते हैं। भरत का विक्षोभित मन युमना और गंगा की लहरों को देख कुछ शांत होता है। और फिर प्रयाग के पुण्य प्रताप-सकल कामप्रद तीरथराऊ, बेदबिदित जग प्रगट प्रभाऊ से मन में सहसा एक विचार आता है कि अपनी मनोकामना प्रयाग के इस प्रसिद्ध त्रिवेणी तीर्थ पर क्यों न प्रगट कर दूं। वह विनयावनत हो उठते हैं। तीर्थराज त्रिवेणी के सामने कह पड़ते हैं - 
मांगऊं भीख त्यागि निज धरमू 
आरत काह न करई कुकर्मू 
हे तीर्थराज मैं अपना क्षत्रिय धर्म त्याग कर आपसे भीख मांगता हूं - आखिर दुखी-आर्त व्यक्ति कौन सा कुकर्म नहीं करता (यहां बुभिक्षितम किम न करोति पापं का कितना प्रांजल भाव आया है ) ...और मांग है -
अर्थ न धरम न काम रूचि गति न चहऊं निरबान 
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन
मुझे किसी भी पुरुषार्थ –धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बिल्कुल भी चाह नहीं है। बस जन्म-जन्म में मेरा राम जी के चरणों में प्रेम हो यही वरदान, दूसरा कुछ नहीं, मांगता हूं।
भारद्वाज ऋषि से भी यहीं मुलाकात होती है। उन्हें पहले से ही सब कुछ पता रहता है। वह देखते हैं भरत ही नहीं उनकी पूरी प्रजा बहुत क्लांत, दुखी है। अपने तपोबल से वे सब वैभव सृजित कर देते हैं –
रितु बसंत बह त्रिविध बयारी सब कहं सुलभ पदारथ चारी
स्रक चन्दन बनितादिक भोगा देखि हरष बिसमय सब लोगा 
मानो बसंत ऋतु ही आ गयी हो। शीतल मंद सुगंध वाली हवा बहने लगी। यही नहीं भोग के सब पदार्थ सुलभ हो गए...उर्वशियां, माला (वेणी की माला ) चन्दन आदि भोगों को देख लोग विस्मित भी हैं तो उदास भी - वे उदास राम के वियोग के कारण हैं। प्रजा की छोड़िये मगर अपना चरित्र नायक इन सबसे तटस्थ ही रहता है –
सम्पति चकई भरतु चक मुनि आयसु खेलवार 
तेहि निसि आश्रम पिजरां राखे भा भिनुसार 
काव्य-मान्यता है कि चकवा चकई रात में विरक्त हो रहते हैं। यहां तक कि बहेलिये द्वारा एक ही पिजरे में बंद करने के बाद भी दोनों में संयोग नहीं होता। उसी तरह भारद्वाज मुनि के सारे सुख सुविधा के ताम-झाम के बाद भी भरत का मन उन सब भोगों से विरत ही रहा और सुबह हो गई। राम के बजाय उनका मन कहां रमने वाला था?
संतकवि सच ही कहते हैं - 
जौं न होत जग जनम भरत को
सकल धरम धुर धरनि धरत को ...
अगर भरत का जन्म न होता तो आखिर धरती पर धर्म के चक्र का धारण कौन करता ?
भरत का चरित्र हर परिवार समाज के लिए एक उदाहरण है। जय श्रीराम!

बुधवार, 27 जून 2012

एक आर्त अपील -लिव एंड लेट लिव!


भ्रष्टाचार पर मैंने कभी नहीं लिखा .बेमन टिप्पणियाँ जरुर की हैं इस विषय पर ब्लॉग पोस्टों पर . जल में रहकर मगर से बैर या आ बैल मुझे मार सरीखी बात ही नहीं है यह एक सरकारी मुलाजिम के लिए बल्कि उससे भी बढ़कर कि उसे  इस लाईलाज महारोग का कोई हल नहीं दीखता ..यह मनुष्य के आचरण,उसके संस्कार अर्थात लालन पालन, घर परिवार और दृष्टि-विवेक से जुड़ा मसला है. केवल सरकारी मुलाजिम ही नहीं भारत में भ्रष्टाचार घर घर तक पहुँच कर हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. कभी कभी तो  लगता है यह जैसे कोई आनुवंशिक बीमारी सा है जो पीढी दर पीढी चलता जा रहा है मगर इसके दीगर भी उदाहरण अक्सर मिलते रहते हैं .दो सगे भाईयों में एक बड़ा ईमानदार और दूसरा महाभ्रष्ट .एक ही मां बाप परिवार, संस्कार मगर फिर भी बड़ा  अंतर . यहाँ कुदरत के विभिन्नता का सिद्धांत समझ आता है :)  .कई ज्ञानी इस महारोग का औचित्य तक सिद्ध करते दिखाई देते हैं .दाल में नमक भर तो चलता है भाई? पता नहीं नैतिकता की किस तराजू से भ्रष्टाचार का माशा तोला ऐसे लोग तौलते हैं .फिर एक जुमला  यह भी अक्सर सुनाने को मिल जाता है कि अरे मन से और मूलतः तो भ्रष्ट  सभी हैं -जिसे मौके नहीं मिलते वे खुद को हरिश्चन्द्र दिखाने पर तुल जाते हैं -जाहिर है यह एक भ्रष्टाचारी का उद्धत वक्तव्य है . 

ईमानदारी के प्रवक्ता कहते हैं और अब यह एक बहु -उद्धृत वक्तव्य बन उठा है कि ईमानदारी होनी ही नहीं प्रदर्शित भी होनी चाहिए .गोया आज के दिखावे के युग में या महाभ्रष्ट युग में यह भी एक प्रदर्शन की वस्तु हो गयी है :) फिर तो यह प्रदर्शन कब ढोंग बन जाय कौन कह सकता है?. ईमानदारी भी एक जीवन मूल्य है .आज भी राजकीय सेवा में ऐसे अधिकारी मिल जाते हैं जो इस मूल्य के साथ किसी तरह जी ले रहे हैं बाकी तो कितने हिमालय की कंदराओं में या असमय ही अपने कुल पूर्वज (हरिश्चन्द्र ) से मिलने उनके नाम -प्रसिद्ध गंगा घाट की शरण लेते भये हैं . कुछ इस महामारी से अडजस्ट करने की अपनी मुहिम में यह दलील देते फिरते हैं कि जब जाड़ा अधिक पड़ने लगे तो जिद करने के बजाय रजाई न सही कम्बल तो ओढ़ ही लेना चाहिए ..नहीं तो कोई ऐसा धर्म नहीं है जो आत्मविनाश की हिदायत देता हो . मैं इन्ही विचारों की उहापोह में अपने सरकारी मुलाजिम होने के लगभग तीस वर्ष तो बिता चुका ....सेवा निवृत्ति की ओर बढ़ रहा मगर मुझे कोई निवृत्ति मार्ग नहीं सूझ रहा ...
और जब तक कोई हल न हो, समस्यायों को उठाना एक गैर उत्तरदायित्वपूर्ण काम है .इसलिए इस विषय पर कभी नहीं लिखा और फिर व्यवस्था के एक चाकर को इन विषयों पर लिखने की अनुमति नहीं है -कई भृकुटियाँ तन उठती हैं . मगर वो क्या है न जब जब दंश गहरे होते हैं एक कलम सेवी को कलम (अब की बोर्ड! ) का सहारा लेना ही पड़ जाता है . खुद के लिए नहीं भी तो उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता के नाते . लिहाजा मैंने सोचा आज से अपने सुधी पाठकों और मित्रजनों को और उनके जरिये समाज के और लोगों को जहां तक पहुँच हो सके इस मामले पर संवेदित कर सकूं . यह कोई अछूत विषय क्यों होना चाहिए? आज जब पूरे भारत में, खासकर युवाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता तथा जवाबदेही के प्रति एक जुनूनी रुझान उठती दिखाई दे रही है तो शायद एक संभावना भी झलक रही है कि इस कोढ़ के विरुद्ध भी एक बड़ा जनमत उठ खड़ा होगा  और हम और अगली पीढियां इसके प्रभाव से मुक्त हो सकेंगी ..आशा ही तो जीवन है . 
भ्रष्टाचार एक छतरी शब्द है जिसके अधीन तरह तरह के भ्रष्टाचार हो सकते हैं - नैतिक, चारित्रिक, आर्थिक...इनमें तो अनेक बिलकुल निजी वैयक्तिक स्तर के हैं और समाज या राष्ट्र को इतना नुकसान नहीं पहुंचाते जितना आर्थिक किस्म का भ्रष्टाचार। आर्थिक भ्रष्टाचार में लगे लोग दीमकों की तरह हैं जो गरीब टैक्स पेयर के धन को तो हजम करते ही हैं, किसी भी राष्ट्र के आधार स्तंभों को खोखला करने की माद्दा रखते हैं। इनके समूल विनाश का कोई भी कृमनाशी नहीं बना है - ये कहीं भी किसी भी जगह पाए जा सकते हैं - मगर इनका जमाव टॉप पर अधिक है और इनकी इल्लियां तल पर भी मौजूद हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार का मॉडल टॉप टू बॉटम का है। इस वैतरणी का उद्गम भी ऊपर से ही है। अगर ऊपर का भ्रष्टाचार मिट जाए तो मैदान की वैतरणी भी साफ़ पवित्र हो जाए। मिथकों में तो वैतरणी कभी भी साफ़ न होने वाली नदी बतायी गयी है। यहां तक कि इसके जल के स्पर्श मात्र से मनुष्य को अपवित्र होने की चेतावनी है। यह ऊपर अधर में लटके त्रिशंकु के लार से प्रवाहित हुई है। भ्रष्टाचार की लार भी ऐसे ही ऊपर से टपकती है। यह मॉडल टॉप टू बॉटम का है।
सरकार की नौकरियों के बारे में यही कहना ज्यादा उपयुक्त है कि यह काजल की कोठरी है। इस घटाटोप में ईमानदारी दिया बाती लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगी। अब खुद भी एक ऐसे ही सिस्टम में काम करते हुए बहुत सी बाते मुझे व्यंजना और लक्षणा में कहनी पड़ रही हैं। सरकारी कर्मचारी की आचार संहिता आड़े हाथ आती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस समस्या का मूलोच्छेदन कैसे हो...सबसे पहले वैतरणी के उद्गम को साफ करना होगा। भारी कीचड़ और कचरा वहीं से बहकर नीचे आ रहा है।
गीता में कहा गया है - यद्यदाचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते मतलब जैसा आचरण 'श्रेष्ठ ' लोग करते हैं वैसा लोग अनुसरण करते हैं। अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।
आज यद्यपि भ्रष्टाचार एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है मगर भारत में स्थिति बदतर है। यहां विसल ब्लोअर की बातें तो होती हैं मगर एक विसल ब्लोअर का मतलब है खुद अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना...भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर खुद शहीद हो जाना। यानी मेसेज साफ है - खबरदार! सीटी मत बजाना। और अब तो यह अपना पूरा समाज ही भ्रष्ट हो चुका है। अपने समाज परिवार में से ही कोई न कोई इसी व्यवस्था के पोषण और औचित्य को सिद्ध करने में लगा है। बिना कुछ दिए लिए काम नहीं होता, जैसे जुमले अक्सर सुनने को मिलते रहते हैं। जाने माने कवि कैलाश गौतम ने अपनी एक कविता में यही बात बड़ी ख़ूबसूरती से सामने रखी थी -
काम नहीं होता है केवल अर्जी देने से
कुर्सी कुर्सी पान फूल पहुचाने पड़ते हैं
कैसे कैसे तलवे अब सहलाने पड़ते हैं...
आज भ्रष्टाचार का चिंतन भी हरि अनन्त हरि कथा अनंता सरीखा हो गया है। क्या मैं आर्त अपील करूं शिखरासीन भातृत्व से कि लिव एंड लेट लिव...!

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