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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

वक्ष सुदर्शनाएँ!

भारत के एक मशहूर मीडिया हाउस ने अपनी एक प्रमुख पत्रिका के अंगरेजी हिन्दी दोनों संस्करणों के ताजे अंक की कवर स्टोरी को नारी वक्षों में  उभार के प्रति आयी नयी चेतना को समर्पित  किया है और कवर पृष्ठ पर जाहिर है स्टोरी के अनुरूप एक नयनाभिराम चित्र भी लगाया है -अब चिल्ल पों शुरू हो गयी है ...और पत्रिका द्वारा सौन्दर्य सर्जरी पर प्रचुर सामग्री को दरकिनार कर पत्रिका ग्रुप के व्यावसायिक हथकंडों ,नीयत , शुचिता आदि पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं -लानत मलामत किया जा रहा है .पता नहीं ये भारतीय जेंटलमैन कब परिपक्व होंगें?  ....और अपने तमाम पूर्वाग्रहों ,वर्जनाओं से मुक्त हो खुली हवा में सांसे ले पायेगें .
किसी ने सच कहा था कि एक आम भारतीय जीवन भर कई तरह के परस्पर विरोधी विचारों, आईडीओलोजी ,वर्जनाओं के द्वंद्व में जीवन काट देता है ...जितना एक आम भारतीय गलत- सही के भंवर में डूबता उतराता रहता है उतना शायद ही कोई अन्य देशवासी .उसे माडर्न बनने दिखने  की ललक भी होती  है तो वह अपने कितने अप्रासंगिक हो रहे रीति रिवाजों में  भी आसक्ति बनाए चलता है . लिहाजा उसका सारा जीवन ही एक तरह की उहा पोह और किंकर्तव्यविमूढ़ता में बीत जाता है .मुझे याद है मेरे एक परिजन केवल इसलिए नसबंदी नहीं करा पाए कि समाज के सामने सकुचाते रहे और अब कई लड़कियों की शादी में सब कुछ बेंच   बांच  भिखारी जीवन जी रहे हैं .....कई लोग अभी भी इसी तरह दूकान पर कंडोम मांगने में बला का संकोच करते हैं..किस युग में जी रहे हो भाई लोग :) 
बहरहाल मुद्दे की चर्चा की जाय ...दुनियां  में ब्रेस्ट सर्जरी इम्प्लांट की अर्धशती मनाई जा रही है ....१९६२ में टिमी जीन लिंडसे नामकी टेक्सास की महिला  ने अपने वक्षों को सुन्दर लुक देने के लिए सर्जरी के जरिये सिलिकन राड्स का इम्प्लांट कराया था ..और तबसे तो यह मानो नारी सौन्दर्य के अनेक जुगतों की फेहरिश्त का एक फैशनबल ट्रेंड ही बनता गया है .पश्चिमी दुनियाँ, हालीवुड की तो छोडिये अपने भारत में भी अब सौन्दर्य सर्जरी का व्यवसाय फलफूल रहा है .दक्षिणी अफ्रीका में तो हर वर्ष राष्ट्रीय क्लीवेज दिवस  विगत २००२ से मनाया जा रहा है ..जहां वक्ष सुदर्शना नारियों का जमघट लगता है! भला सुन्दर दिखने की चाह किसे नहीं होती ..नारी या पुरुष ...नारी जहां अब ज्यादा विवर जागृत (क्लीवेज कान्सस) हो गयी है मर्द अपनी छाती की  अनावश्यक चर्बी (मूब =मेल बूब =गायिन्कोमेस्टीया को हटाने के  लिए सर्जरी का  सहारा  ले रहे हैं . मेट्रो भारत में सौन्दर्य सर्जरी का धंधा फल फूल रहा है .सौन्दर्य सर्जनों के पास हीरोईनें ही नहीं ,साईज जीरो गर्ल्स ,भावी दुलहनों,महत्वाकांक्षी प्रोफेसनल ,समृद्ध चालीस प्लस युवतियों का ताँता लग रहा है .सभी को अन्यान्य कारणों से सुन्दर सहज दिखने की चाह है ..कैंसर जैसे महारोग से अभिशापित मरीज भी इसी सर्जरी के भरोसे हैं ... 
हलांकि ऐसी सर्जरी पूरी तरह निरापद नहीं हैं ,कहीं कहीं से सिलिकान राड/जेल के इम्प्लांट से कैंसर होने की भी रपट है मगर इन मामलों का अनुपात अभी भी बहुत कम है .सिल्कान इम्प्लांट से हमेशा दर्द बने रहने की शिकायत भी मिलती रहती है मगर सर्जरी में निरंतर सुधार होने से इन समस्याओं पर उत्तरोत्तर अंकुश लगता आया है . दिल्ली के गुडगाँव की  मेदान्ता मेडिसिटी में कास्मेटिक सर्जरी की यह सुविधा उपलब्ध है -हालांकि यहाँ चिकित्सक सौन्दर्य सर्जरी के इच्छुक लोग लुगायियों के कई भ्रमों का भी निवारण करते हैं...वक्षों की आयिडियल शेप साईज को लेकर भी कई तरह की दुर्निवार शंकाएं लोगों को रहती है -चिकत्सक कहते हैं कि 'आंसू सदृश ' आकार ही नारी वक्ष का सबसे नैसर्गिक शेप है . न ही एकदम गोलाकार और  न उन्नत जैसा कि प्रायः  लोगों के मन का फितूर होता है .
भारत में वक्ष सौन्दर्य सर्जरी की शुरुआत मुम्बई में १९७३ में शुरू हुयी थी जब एक मुंहढकी नाम छुपी महिला का ऐसा आपरेशन डॉ. नरेंद्र पांड्या ने आधीरात के सन्नाटे में किया था मगर अब तो उनके पास ऐसे आग्रहों की खुलेआम भीड़ लगी होती है ... प्लास्टिक सर्जन्स असोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सौन्दर्य वक्ष सर्जरी के मामले पिछले पांच वर्ष में काफी बढ़ गए हैं .अकेले वर्ष २०१० -२०११ में ५१००० ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी हुई है जबकि पूरी दुनियाँ का यह आकंडा डेढ़ लाख तक जा पहुंचा . सौन्दर्य की इस चाहना में कोई बुराई तो नहीं दिखती ....राखी सावंत को भी नहीं दिखती जो इस सर्जरी के बाद  वक्ष गर्विता बनी कहर ढा रही है और इस सर्जरी की प्रशंसा करते नहीं अघातीं ....
इसी परिप्रेक्ष्य में, इस नए ट्रेंड को कवर करती  चर्चित पत्रिका के हिन्दी- अंगरेजी संस्करणों को लिया जाना चाहिए ....

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भारतीय साड़ियों की दुशासन ब्रांड!

फैशन के नाम पर तन उघाडू संस्कृति के  पोषक पश्चिमी जगत का अगर कोई जाना माना डिजाईनर भारतीय साड़ी संस्करण लांच करे तो साड़ियों की उस खेप को मैं दुशासन ब्रांड ही कहूँगा या आपके पास कोई और मौलिक सुझाव है? टाईम पत्रिका से मुझे जानकारी मिली कि 174 वर्ष पुराने  पारसी फैशन हाउस हेर्मेस ने  भारतीय साड़ियों की पहली खेप जारी की है जो बेहतरीन फ्रेंच सिल्क और भारतीय पारंपरिक कला और शिल्पकारिता की अद्भुत मिसाल के रूप में प्रचारित की जा रही है . मगर यह पहली खेप तो भारतीय नारियों को ललचाने के लिए है जैसा कि हेर्मेस के भारतीय अध्यक्ष बेरट्रेंड मिचौड का कहना है ....मगर इन साड़ियों का मूल्य ६००० से ८००० डालर  के बीच है -मतलब तीन   से चार  लाख रुपये फी साड़ी....फिर तो इसे और भी दुशासन ब्रांड कहने का मन हो आया क्योंकि यह तो  अमूमन भारतीय नारी के तन को घेरने  वाली नहीं है ...बस फैशन शोज में दिखावे का आईटम बनके रह जायेगी जहां कपडे कम शरीर की नुमाईश ज्यादा होती है ..


इस ब्लॉग-पोस्ट के जरिये मैं हेर्मेस  को यह सलाह देना चाहता हूँ कि इन साड़ियों को वे दुशासन ब्रांड का नामकरण देकर यहाँ के परिवेश के एक ख़ास उपभोक्ता वर्ग में इन्हें ज्यादा लोकप्रिय बना सकते हैं ....कहते हैं इसी वर्ग ने इन दुशासन ब्रांड की पहली खेप को हाथोहाथ खरीद लिया ....भारतीय पहनावों और खासकर साड़ी के धंधे में भारतीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से मुकाबला आसान नहीं है ...यहाँ तक कि चीन ,ब्राज़ील और रूस के उपभोक्ता तक पश्चिमी फैशन डिजाईनरों /हाउसों के नए नए उत्पादों -फैशन पहनावों   को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं मगर भारतीय जनता इन्हें घास नहीं डालती -क्योकि आज भी यहाँ पारम्परिक परिधानों का ज्यादा बोलबाला है -देशी पसंद है .ऐसे परिवेश में हेर्मेस का यह साड़ी -उद्यम एक बड़े साहस का ही काम लगता है ...जो भी हो अभी तो इन 'दुशासनी'  साड़ियों की पहली खेप यहाँ बीते अक्टूबर में उतारी जा चुकी है और दावे हैं कि सभी की सभी बिक भी चुकी हैं ....
भारतीय नारी अपने पारम्परिक छवि में 
(फोटो पत्नी की पसंद है) 

फ्रेंच साड़ियों की इस खबर पर मेरी नज़र एक बनारसी होने के कारण भी पड़ी -अब बनारस की साड़ियों  की एक अपनी अलग क्रेज है और अपुष्ट आकड़ों पर अगर कुछ भी भरोसा किया जाय तो यहाँ बनारसी साड़ियों का सालाना कारोबार करोड़ से अरब तक जा पहुंचता है -जबकि धंधे के मंदी की बात हर साड़ी दुकानदार और व्यवसाय से जुड़े लोगों की जुबान पर रहता है ...बनारसी साड़ियों की मांग व्याह शादी के अवसरों पर कई गुना बढ़ जाती है क्योकि फैशन से दीगर इनका अपना एक सांस्कृतिक महत्व भी है ....बरात में वधू से लेकर आधी दुनिया की पूरी नुमायन्दगी जब इन लक दक बनारसी साड़ियों में सज धज के होती है तो लगता है इन्द्रपुरी ही धरा पर उतर आयी हो ...और यह शुभ -सगुन की प्रतीक तो है ही ....नारी मन इन साड़ियों के साथ ही कल्पना /फंतासी के कितने ही ताने बाने बुनती रहती है .अभी अभी देखी फिल्म द डर्टी पिक्चर के आख़िरी दृश्य में  बिस्तर पर लाल रेशमी साड़ी में आत्महत्या -मृत  हीरोईन का शरीर अरमानों की मौत का दर्शक के लिए न भूल पाने वाले  दर्दनाक मंजर को उभारता है.....

भारतीय साड़ी नारी के अरमानों और फंतासियों से जुडी है ...और भारतीय सौन्दर्य भी इस परिधान में सौन्दर्य का जो प्रगटन पाता है वह एक आम  भारतीय के लिए किसी विदेशी परिधान में मूर्त नहीं हो पाता ....वैसे उदात्त सौन्दर्य  परिधान का मुहताज हो भी क्यों यह रसिक जनों का एक अलग  विषय है ....बात  साड़ी की हो रही है तो यह भारतीय नारी परिधानों में निश्चय ही बेजोड़ है....तभी तो जब हेंडा सेल्मेरान वाराणसी आयीं तो यहाँ के साड़ी आवेष्टित नारी सौन्दर्य पर ऐसी फ़िदा हुईं कि खुद साड़ी पहनने का जिद कर बैठीं ....उनकी तमन्ना हमने शौक से पूरी कराई और उन्हें साड़ी का उपहार भी दिया ....

आप भी  जब कभी  बनारस  आयें हम अपनी बेगम से आपको साड़ी खरीद में मदद की सिफारिश कर देगें ...अब तो वे कुछ भन्नाती हैं मगर यहाँ आने वाले परिजन पर्यटकों के लिए यह समाज सेवा वे खुशी खुशी करती थीं यद्यपि सेवा शुल्क मुझे चुकाना पड़ता था हर बार  उनके खुद के किसी साड़ी के बिल को अदा करने के रूप में -उनके सामने तो मैं खुद को कितना  वस्त्र निर्धन समझता हूँ जब भी उनका साड़ी वार्डरोब मेरे सामने खुलता है तो आँखे भी चुधियाती हैं और दिल अपनी वस्त्र -निर्धनता की स्थति पर धक से कर जाता है -हम तो मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तौर पर उनके वस्त्र भण्डार की बराबरी कई जन्मों तक भी न कर पायें ..ओह यह विषय विचलन .....हाँ तो यहाँ १००-१५० रूपये की साड़ी से साठ पैसठ हजार की साड़ियाँ मैंने खुद शो रूमों में सामने पसरते देखी हैं ..शादी सगुन पर हजार बारह सौ और एकाध बार दस हजार तक की खरीदनी पड़ी है ..मगर यहाँ साड़ी का असली दाम किसी को  भी शायद पता नहीं होता .गोदौलिया के साड़ी के अपरम्पार दुकानों में मोलभाव की आवाजें गूंजती रहती है -मगर समय और अनुभव के साथ हमने ऐसी दुकानों का चयन कर लिया है जहां मोलभाव बिलकुल नहीं है ...और इस तरह ज्यादा ठगे जाने का अहसास भी नहीं होता ....

बनारस के साड़ी प्रतिष्ठानों में अभी भी दुशासन ब्रैण्ड साड़ियों का इंतज़ार है . 


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