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शुक्रवार, 21 जून 2013

काश कोई कृष्ण आज भी होता!

गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !

सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा  है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना  होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल  पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक  देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला! 

रविवार, 3 मार्च 2013

कितना भटक गया इंसान :-(

धर्म के प्रवक्ताओं को वैज्ञानिकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कंधे से कंधा मिलाकर दुनियां और मानवता की बढ़ोत्तरी में दिन रात सहयोग की भावना से जुटे रहते हैं -जबकि धर्म कर्म के अनुयायी ज्यादातर समय एक दूसरे के धर्म की निंदा में बिताते हैं और उनके  अपमान में ही समय जाया करते रहते हैं!और नतीजा सामने हैं विज्ञान ने जहाँ मानव की सुख सुविधा में एक बड़ा योगदान दिया है वहीं धर्म अपने मार्ग से भटक गया है जबकि मूल उद्येश्य इसका भी बहुजन हिताय और बहुजन सुखाया ही था। 
धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं मगर बने हुए हैं विरोधी। क्योंकि दोनों की प्रकृति में कुछ मूलभूत अंतर रहा है। विज्ञान में असहमतियों को खुले दिमाग से देखा समझा जाता है और कमियों को निरंतर सुधारने की प्रवृत्ति होती है जबकि धर्म में इसका ठीक उलटा आचरण है .यहाँ विरोधों और असहमतियों को लेकर तुरंत तलवारे खिंच जाती हैं .कट्टर लोग कट्टे तक निकाल लेते हैं . यहाँ तुरंत फतवे जारी हो जाते हैं .मगर विज्ञान की दुनिया में फतवे जारी नहीं होते .अगर किसी ने किसी की त्रुटि की ओर  ध्यान दिलाया तो उसका संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाती है,संशोधन होते हैं, आवश्यकतानुसार भूल सुधार होते हैं  . विज्ञान की अपनी एक पद्धति है जो  जिज्ञासा के अन्तःप्रेरण से आरम्भ होकर विभिन्न संभावनाओं /विकल्पों का सत्यापन सतत प्रयोग परीक्षण के जरिये कर सत्य के उदघाटन को प्रतिबद्ध होता है . धर्म के भटके स्वरुप में सत्य की घोषणा पहले ही की हुयी रहती है .यह घोषणा मुल्ला मौलवियों पंडितों ,पादरियों के मुखारविंद से होती है -जिसके विरोध का मतलब आपका बहिष्कार और कभी कभी तो सर तक कलम कर देने के फरमानों तक है . इसके विपरीत वैज्ञानिक कोई ऐसे परम पद पर आसीन नहीं है . अगर कोई वैज्ञानिक अनजाने की गयी त्रुटि के चलते गलत साबित होता है तो अपने समुदाय में उसे बिसरा भले दिया जाय कोई फतवा जारी नहीं होता .
                                                क्या सचमुच हुआ था नरसिंह अवतार?
धर्म या विज्ञान दोनों का उद्येश्य मानवता का कल्याण ही होना चाहिए यद्यपि विज्ञान की पद्धति में ऐसा कोई आवश्यक प्रतिबन्ध नहीं है . धर्म की नींव ही मानव कल्याण के सर्वतोभद्र कामना पर टिकी हैं . लेकिन आज धर्म इस अपने इस साध्य को साधने के बजाय मात्र पूजा पाठ के साधन तक सिमट गया है .मात्र पूजा पाठ ,अजान ,नमाज के साथ ही  मानव कल्याण के लिए उठाया गया एक छोटा कदम भी ईश्वर की एक बड़ी इबादत हो सकती है यह सच स्वीकार करने में हम पीछे रह जा रहे हैं . धर्म का अभ्युदय मानव कल्याण की सोच से ही हुआ मगर कालांतर में वह अपने मूल मार्ग से भटक गया है . हमारे कई समाज सुधारक पीर संतों ने समय समय पर हमें चेताया भी मगर धर्म और कट्टरता,धर्म  और कूप मंडूकता ,धर्म और अंधविश्वास का ऐसा सम्बन्ध स्थापित हो गया है जो टूटे नहीं टूट रहा है .
आज विद्वानों के बीच मान्य तथ्य है कि मनुष्य का निम्न श्रेणी के जीवों से विकास हुआ है -वह एक विकसित जीव है -न कि स्वर्ग से अधोपतित कोई देव -मगर फिर भी हम अवतारवाद को सच साबित करने में तुले हैं , हम आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते कि चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के पूर्व अवतारवाद का जिक्र केवल हमें अपने पूर्वजों की उस दृष्टि को दर्शाता है जो विकास की एक आरम्भिक सोच को दर्शाती है .यहाँ भी मछली से कछुआ और अदि अवतारों से होते हुए पशु और मनुष्य के संयुक्त रूप की नरसिंह अवतार  में बड़ी सुन्दर कल्पना की  गयी है -अब हम अपने पूर्वजों के इस सुन्दर वैचारिक योगदान की स्वीकृति और सराहना के बजाय अवतारों को ही सच मानने की मूर्खता पर उतर आते हैं . और जब पढ़े लिखे लोग भी ऐसा करते हैं तो मुझे दुःख होता है . जाहिर है उनके ज्ञान अध्ययन और विवेक में कहीं घोर कमी रह गयी है -ऐसे लोग निरक्षर लोगों से भी ज्यादा अहितकारी है समूचे समाज के लिए  . अगर यही लोग यह बात करते कि विकासवाद के सोच का उद्गम हमारे धर्म चिंतन में भी है तो कितनी पते की बात होती . मगर वे तो अवतारों को ही सच मान बैठते हैं . यह अंधश्रद्धा मानवता के लिए खतरनाक है .
धर्मों की ठीक से न समझी गयी बातों से कट्टरता उपजती,फैलती है - हिन्दू धर्म में कट्टरता कहीं नहीं है -विश्व में भारत ही वह भाव भूमि है जहाँ अनीश्वरवादी चिंतन तक का पुष्पन पल्लवन हुआ -सनातन धर्म चिंतन/दर्शन से जैन, बुद्ध दर्शन और कालांतर में इस्लाम के भी विचार पनपे -कहीं पृथक से नहीं आये -वेदान्त के कर्मकांडों को उपनिषदीय चिंतन ने तिरोहित किया -आज हिन्दू वह भी है जो किसी ईश्वर के वजूद को नहीं मानता और वह भी जो चौबीसों घंटे पूजापाठ में रत रहता है . हिन्दू होना विनम्र होना है किसी की भी पूजा पद्धति की खिल्ली न उड़ाना एक श्रेष्ठ हिन्दू का गुण है -शराब पियें या न पियें आप हिन्दू हैं ,मंदिर जाएँ या न जाएँ आप हिन्दू हैं ,मांस खायें न खायें आप हिन्दू हैं ,भगवान् को गाली दें या स्तुति करें आप हिन्दू हैं -इतना सृजनशील और संभावनाओं से भरा और कोई धर्म विश्व में दूसरा नहीं है -आप सभी से अनुरोध है इसे कट्टरता का जामा न पहनाएं -कोई मेरा सम्मान करे या न करे मैं हिन्दू ही रहूँगा ! मुझे हिन्दू होने का फख्र है क्योंकि इस महान धर्म ने मुझे कई बंधनों से आजाद किया है ...मुझे दुःख होता अगर मैं हिन्दू न हुआ होता और तब मुझे ईश्वर को मानने पर विवश होना पड़ता :-)
सबसे विनम्र निवेदन है धर्मों के रगड़ों झगड़ों को अलविदा कहकर विज्ञान सम्मत चिंतन को अपनाएँ!मानवता पर रहम करें!

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लागर का निरामिष चिंतन!


निरामिष ब्लॉग पर मेरी टिप्पणियाँ विस्तार पाती गयीं तो सोचा क्यों न उन्हें संहत तौर पर यहाँ सहेज लिया जाय ..कई दिनों से कुछ लिख नहीं पाया तो मित्रों के उलाहने मिलने लग गए हैं . यह भी अजीब है कि लिखूं तो वे पढ़ने न आयें और न लिखूं तो लिखने को फरमाएं - :-) 

मुझे अपना दृष्टिकोण कुछ और स्पष्ट करना होगा .सबसे पहले यह कि मैं किसी भी तरह की ईशनिंदा या धर्म विरोध का पक्षधर नहीं हूँ -हिन्दू हूँ किन्तु अज्ञेयवादी (अग्नास्टिक) या कह सकते हैं नास्तिक हूँ . दुनिया के सभी धर्म मूलतः श्रेष्ठ हैं ,इस्लाम ने भी मानवता को बहुत सी अच्छी सीखें और विचार दिए हैं .किन्तु सभी धर्म समय के अनुसार बहुत सी नासमझी और गलतियां ओढ़ते गए हैं -अपनी चादर मैली करते गए हैं -हिन्दू धर्म में कभी हजारों अश्वों की एक साथ बलि दे दी जाती थी ,वैदिक काल घोर हिंसा से भरा था ...यहाँ तक कि कालांतर तक लोग उस हिंसा को वैसे ही जस्टीफाई(वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ) करते थे  -इसलिए ही हिंसा की प्रतिक्रया स्वरुप एक महान धर्म का उदय हुआ -बौद्ध धर्म और इसने भी दुनिया को अहिंसा ,प्रेम और शान्ति का सन्देश दिया -यह एक नास्तिक धर्म है ,मूर्ति पूजा का यह भी विरोध करता है मगर मजे की बात देखिये कि आज इसके अनुयायी विशाल और भव्य मूर्तियाँ बना रहे हैं -बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं ही तालिबानियों ने पहले तोडीं -धर्मों के बीच के ये सारे आपसी झगड़ें मूर्ख मुल्लों और पंडितों ने रचे बनाए हैं ....इसी में से एक कुर्बानी है जो कुछ और नहीं बस वैदिक काल की वीभत्स पशु हिंसा ही है -मुझे तो कभी कभी लगता है कि कालांतर के  कुछ तिरस्कृत वैदिक विचार और परम्पराएं ही इस्लाम में प्रश्रय पा गयी हैं ,
आज पूरी दुनिया में सह अस्तित्व की एक पारिस्थितिकीय सोच परिपक्व हो रही है . यह भी हमारी एक मूल सोच का ही आधुनिक प्रस्फुटन है -"सर्वे भवन्तु  सुखिन:  सर्वे सन्तु   निरामया........ कामये दुःख तप्तानाम प्राणिनाम आर्त नाशनं"  आज पेटा जैसी संस्थायें -(पीपुल फार एथिकल ट्रीटमेंट टू एनिमल्स)  पशु हिंसा का प्रबल विरोध करती हैं -और यह उचित भी है -इस धरती पर सभी प्राणियों का सह अस्तित्व है.  सामूहिक पशु हिंसा और वह भी बड़े जानवरों की -अब वो जमाना नहीं रहा -शिकार तक प्रतिबंधित हो गए हैं .दुनिया एक पर्यावरणीय संचेतना (कान्शेंस) से गुजर रही है ..हमें क्या हिन्दू क्या मुस्लिम अनुचित प्रथाओं का विरोध करना ही होगा! 
बड़े स्तनपोषी हमारे अधिक जैवीय करीबी है .उन्हें मारने में सहजतः एक विकर्षण भाव होना चाहिए मगर धर्म का लफडा देखिये -इस कृत्य का भी उत्सवीकरण शुरू कर दिया ....यह हमारा ही कर्तव्य है कि हम कठमुल्ले या पोंगा पंडित ही न बने रहें बल्कि अपने धर्मों का निरंतर परित्राण करते रहें . हिन्दुओं ने समय के साथ अपने रीति रिवाजों में बहुत से सामयिक परिवर्तन किये हैं -बलि अब मात्र क्षौर कर्म -मुंडन आदि तक सीमित होकर रह गयी है और "बड़ा" भोज केवल उड़द के 'बड़े' तक सिमट  चुकी है -अश्वमेध तो अब किताबों में ही हैं .....समय देश और काल का तकाजा है कि मुसलमान दिशा दर्शक अब आगे आयें और अपने यहाँ सामूहिक पशुवेध की परंपरा को बंद करें -ऊंटों की कुर्बानी तो अत्यंत वीभत्स दृश्य उत्पन्न करती है -कुर्बानी का मूल अर्थ जो है  उसका अनुसरण क्यों नहीं किया जाय? त्याग और आत्म बलिदान की -बिचारे निरीह पशु क्यों इस सनक के शिकार बनें! . 
कुर्बानी का अर्थ तो पशु अत्याचार कतई नहीं हो सकता -यह विकृत सिम्बोलिक परम्परा इतनी पुरानी होती गयी ,आश्चर्य है! समाज की कुरीतियों पर क्या हिंदू क्या मुस्लमान सभी को आगे बढ़कर सकारात्मक कदम उठाना चाहिए -तभी हम एक बेहतर भविष्य और रहने योग्य धरती की कल्पना कर सकते हैं!दुनिया के लगभग सभी धर्मों में एक अपरिहार्य सी बुराई घर कर गयी है -सभी बेहद जड़ हैं -कोई गति नहीं हैं उनमें -बस लकीर का फ़कीर बने हुए हैं जबकि विज्ञान कितना गतिशील है -आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विज्ञान के नजरिये को अपना कर अपने धर्मों की कालिख और बुरी परम्पराओं का प्रक्षालन करें -यह मानवता का एक साझा कर्तव्य है -यहाँ धर्मों की श्रेष्ठता की कोई लड़ाई नहीं है -मैं हिन्दू धर्म की अनेक बुराईयों को सुनने और प्रतिकार करने को तैयार हूँ . 
मैं देख रहा हूँ कि बस बहस के लिए ही अब बहस हो रही है जो अनर्गल और अनुत्पादक है -ठीक है पेड़ पौधों में भी जान है और मनुष्य में भी जान है -तो क्या मनुष्य भी भोज्य बन जाना चाहिए? कुछ धर्म नरमेध को भी उचित मानते रहे -शुक्र है अब आख़िरी साँसे ले रहे हैं . किसी भी धर्म को अगर अपने श्रेष्ठ मूल्यों को बचाए रखना है तो उसे समय के साथ आ रही बुराईयों को पहचानना और प्रतिकार भी करना होगा .....और यह जितना ही शीघ्र हो उतना ही अच्छा .आज यह कितना दुखद है कि मानवता के बीच की कितनी ही खाइयां धर्मों ने तैयार की है -जहां हम अच्छे मित्र हैं ,सहपाठी हैं ,एक जगह काम करने वाले सहकर्मी हैं ,ब्लॉगर हैं -सब ठीक है मगर जैसे ही हम हिन्दू और मुसलमान होते हैं परले दर्जे के अहमक बन जाते हैं ....आखों के आगे पर्दा पड़ जाता है - अगर धर्मों का  यही उत्स है तो ऐसा कोई धर्म भी मुझे स्वीकार नहीं है. आईये हम सभी यहाँ धर्मों की बजाय अपने स्वतंत्र विचारों को प्रस्फुटित होने का मौका दें!
* 
 मुझे वैज्ञानिक  चेतना संपन्न ब्लॉगर का खिताब अता किया है अनूप शुक्ल 'फुरसतिया' जी ने और उतने ही ख़ुलूस और प्यार से मैं उन्हें ब्लॉग व्यंग विधा शिरोमणि की उपाधि  से नवाजता हूँ! :-)    

बुधवार, 11 जुलाई 2012

बाबा भोलेनाथ का दर्शन


सावन का महीना काफी धरम करम का होता है. बनारस में काफी भीड़ जुटती है श्रद्धालुओं की. इनकी एक और कैटिगरी पिछले एक दशक से आ जुड़ी है, कांवरिये. हर गली हर सड़क इन श्रद्धालुओं से लबरेज दिखती हैं. सावन के सभी सोमवारों पर बाबा भोले के दर्शन को लक्खी भीड़ (लाख से ऊपर) आ जुटती है मानो श्रद्धा का सैलाब उमड़ा आ रहा हो. अब इतनी भीड़, शहर की गड्ढों से भरी सड़कें और पतली गलियां. तिस पर बाबा भोले का एक अलग घनी आबादी और सकरी जगहं विराजमान होना. इंतजामिया विभाग के लिए बड़ी चुनौती. कैसे करे श्रद्धा के उमड़ते सैलाब को व्यवस्थित. लिहाजा बाबा भोले जो खुद विश्वनाथ हैं उनके इर्द गिर्द चप्पे चप्पे पर पुलिस और हर गली कूचे में एक मैजिस्ट्रेट की व्यवस्था ताकि खुदा न खास्ता कुछ अनहोनी हो तो उसकी पतली गर्दन नाप दी जाए :-). हम भी लगभग ऐसी ही एक जिम्मेदारी और घोर श्रम के काम में लगते हैं. एक रात के 11 बजे से शुरू हुई ड्यूटी दूसरे दिन शाम तक की हो जाती है क्योंकि श्रद्धा का सैलाब अर्धरात्रि से ही ऐसा शुरू होता है कि लगातार अहर्निश दूसरे दिन के शाम तक चलता रहता है. बिना रुके बिना थमे. किसी को भी बिना चार घंटे लाइन में लगे बाबा भोले का दर्शन मिलना शायद ही मयस्सर हो.
भला आप भी दर्शन से क्यों वंचित रहें 


ये दर्शनार्थी इतना कष्ट उठाते हैं कि मत पूछिए. कलेजा दहलता है और मुंह को आता है. और सिर श्रद्धा के इस रूप को देखकर स्वतः झुक जाता है. खुद की मुश्किल भरी ड्यूटी का कष्ट जाता रहता है. खुले में वर्षा में भीगते हुए, घंटों खड़े हुए, सूजे  हुए और झलकों से अटे पैरों के बावजूद भी चेहरों पर आशा और उत्फुल्लता की चमक...बोल बम के नारे...महादेव महादेव की रटन...एक अद्भुत दृश्य. जमीन पर दंडवत करता आता हुआ एक श्रद्धालु दूर से दिखा. पता लगा किसी दूसरे जिले से एक महीने पहले जमीन पर दंडवत करता ही चला आ रहा है. अब बाबा के दरवाजे आ पहुंचा है. कतार में नहीं है वह. मगर इस हठयोगी और बाबा के भक्त के लिए कतार की जरूरत ही कहां. मुझे कहने की जरूरत भी नहीं पड़ती. मुख्य वीवीआईपी द्वार का अवरोध उठा दिया जाता है. मंत्रमुग्ध द्वार प्रहरियों द्वारा. वह निर्विकार भीतर प्रवेश कर जाता है. अब वह बाबा का ख़ास भक्त है. उसे किसकी परमिशन लेनी है! मानो बाबा की प्रेरणा से दरवाजा खुल गया है. यह है श्रद्धा की विवेक और तर्क पर जीत. मैं भी किंकर्तव्यविमूढ़ देखता रहा यह लीला.





घंटों से कतार में लगे हैं दर्शनार्थी 



इन दृश्यों को देखकर सारे तर्क और बुद्धि की चंचलता जड़वत हो जाती है. भले ही चप्पे चप्पे पर पुलिस और सुरक्षा का भारी तामझाम है मगर सच पूछिए तो श्रद्धालुओं की यह भीड़ स्वयं बड़ी अनुशासित दीखती है. उसे बस बाबा भोलेनाथ का दर्शन चाहिए और किसी बात से उन्हें कोई मतलब नहीं है. वे एकाग्र होकर बस उसी पल की प्रतीक्षा में अपना नंबर लगाये रहते हैं. कतार में उन्हें घंटे दो घंटे चौबीस घंटे बीत जाएं कोई फरक नहीं है. मगर इतनी बड़ी भीड़ को नियमित करना सचमुच एक बड़ी समस्या है. प्रशासन के लिए नाकों चने चबाने का मौका है यह. पंजों पर खड़े रहने का वक्त. हम सब कुर्सी तोड़ मुलाजिम इतनी कठिन ड्यूटी के अभ्यस्त नहीं हैं तो दूसरे दिन तक पांव दुखते हैं. शरीर पोर पोर दुखता है और तापे पुरवईया भी पीर बढ़ाती चलती है. अब अगले सोमवार तक यह पीर बनी रहेगी जब तक दूसरी न घेर ले. यह सिलसिला इस महीने तक चलेगा. मगर यह कष्ट तो श्रद्धालुओं के कष्ट के सामने कुछ भी नहीं है..


 नन्हा कांवरिया बड़ा सा डमरू -बोले डम डम 



अब अगले सोमवार का इंतज़ार है...

शुक्रवार, 22 जून 2012

अब राम को कौन बताए कि वे कहां रहें? (मानस प्रसंग -2)


मानस पारायण चल रहा है...राम वन गमन का प्रसंग पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा। दुःख का समय कहां जल्दी बीतता है! सुख तो मानो पंख लगाकर उड़ चलता है और दुःख अंगद का पांव बन टाले नहीं टलता। यह पूरी गर्मी मानस के वन गमन को समर्पित हो गयी है। राम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आ पहुंचे हैं। लम्बा वनवास काटना है तो एक निरापद जगह की तलाश में हैं। वन गमन के पिता के आदेश की पूरी कथा बताकर वे वाल्मीकि से सहसा ही पूछ बैठते हैं - मुनिवर वह जगह बताइये जहां मैं सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूं। वाल्मीकि सुन कर मुस्करा पड़ते हैं। सकल ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वव्यापी का यह मासूम प्रश्न वाल्मीकि को मानो निःशब्द कर देता है - अब वे क्या उत्तर दें?  कौन सी जगह उन्हें बता दी जाये जहां वे न रहते हों - बहुत दुविधाजनक जनक सवाल है। राम तो कण कण में व्याप्त हैं - कोई जगह उनसे अछूती रह गयी हो तो न बताई जाये। वाल्मीकि साधु साधु कह पड़ते हैं - सहज सरल सुनि रघुबर बानी साधु साधु बोले मुनि ग्यानी...

आखिर वाल्मीकि कह ही पड़ते हैं कि हे राम मुझे यह कहने में भी संकोच हो रहा है मगर जहां आप न हों वह स्थान तो बता दीजिये ताकि मैं चलकर वही स्थान आपको दिखा दूं? यह पूरा प्रसंग, यह संवाद ही बहुत रोचक बन गया है। राम वन गमन की भीषण ग्रीष्म सरीखी यात्रा में मानो यह एक छायादार पड़ाव हो... राम का आग्रह था तो वाल्मीकि को जवाब देना ही था। उनका जवाब इतना विवेकपूर्ण और प्रत्युत्पन्न मति का सुन्दर उदाहरण है कि सोचा आपसे साझा कर लूं। राम वाल्मीकि संवाद के कुछ अंश यूं हैं -

एक पल को तो राम ऋषिवर की यह बात सुन सकुचा गए - कहीं मेरी लीला का भेद न सभी आश्रमवासियों पर खुल जाये। मगर फिर ऋषिवर ने बात संभाल ली। वह विस्तार से बताने लगे कि राम कहां रहो...वे कई ठांव बताते हैं। राम तुम उन श्रवण रंध्रों में जाकर रहो जिन्हें रामकथा बहुत प्रिय है। आप भक्तों के ह्रदय में बस सकते हैं। आप गुरु देवता और ब्राह्मणों का सम्मान करने वालों के मन में जाकर रहिये...और भी जगह हैं जहां आप रह सकते हैं -

काम कोह मद मान न मोहा लोभ न छोभ न राग न द्रोहा
जिनके कपट दंभ नहीं माया तिन्ह के ह्रदय बसहु रघुराया

अर्थात जो काम क्रोध मद अभिमान मोह लोभ क्षोभ राग-द्वेष कपट दंभ और माया से रहित हैं, क्यों न आप उनके ह्रदय में निवास करें? जो दिन रात आपके सदैव शरणागत हैं आप उन के मन में जाकर रहिये...

जे हरषहिं पर सम्पति देखी दुखित होहिं पर बिपति विशेषी
जिनहिं राम तुम प्रानपियारे तिनके मन शुभ सदन तुम्हारे

हे राम आप जिन्हें प्राणों से प्रिय हैं और जो दूसरो की संपत्ति देखकर हर्षित होते हों और दूसरे के दुःख को देखकर दुखी, आपके लिए उनके मन शुभ निवास स्थान हैं।

जाति पांति धनु धरम बड़ाई प्रिय परिवार सदन सुखदाई
सब तजि रहहुँ तुम्हहि उर लाई तेहिं के ह्रदय रहहु रघुराई

जो जाति पांति धन धरम बड़ाई और प्यारे परिवार और सुख देने वाले घर को त्याग  आपमें ही मन लगाए बैठा हो, आप क्यों न उनके ह्रदय में रहें...

अब लीला पुरुष असमंजस में हैं। उन्हें तो अपने लीला के लिए एक जगह चाहिए। मुनि हैं कि उन्हें सर्वव्यापी बनाए रखने पर ही अड़े हुए हैं। आखिर ऋषिवर राम की दुविधा का एक हल निकाल ही लेते हैं -

चित्रकूट गिरि करहुं निवासू तहं तुम्हार सब भांति सुपासू

हर तरह की सुविधा लिए चित्रकूट पर्वत आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आप वहां जाकर अपनी लीला का विस्तार कीजिये प्रभु! और श्रीराम के पग चित्रकूट की ओर बढ़ चलते हैं...जय श्रीराम!

बुधवार, 23 मई 2012

एक नए 'मानव' धर्म का आगाज


मस्जिद, चर्च और मंदिर से अलग इन दिनों एक नया धर्म आकार ले रहा है। शुरुआत अमेरिका से हुई है। इसके अनुयायी अपने को पारंपरिक धर्मों से अलग कर चुके हैं और बिना किसी धर्म के होने के चलते ' द नन्स' (nones) यानी बिना धर्म के कहे जा रहे हैं। मगर ये विधर्मी नहीं हैं- इनका मूल धर्म है मानवता की सेवा करना... 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई' को पूरी तरह चरितार्थ कर रहे हैं ये लोग... भूखे को खाना और बीमार की देखभाल ही इनका धर्म है। 'कामये दुःख तप्तानाम प्राणिनाम आर्त नाशनम' ही इनका मूल मंत्र है। और इसी ध्येय में मगन रहना ही इनका धर्म और आध्यात्म है। समाज शास्त्रियों ने इस नई मानवीय प्रवृत्ति के लोगों को 'द नन्स' का नाम दिया है। 1990 के बाद अमेरिका में इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है और अब समूची जनसंख्या की 16 फीसदी हो गई है। 

एक मजे की बात यह है कि इन्होंने धर्म तो छोड़ दिया है मगर इनमें से ज्यादातर लोगों का ईश्वर में विश्वास बना हुआ है। वैसे भी अमेरिका में महज 4 फीसदी लोग ही ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते जो या तो नास्तिक हैं या अज्ञेयवादी अर्थात एग्नॉस्टिक-जो यह मानते हैं कि ईश्वर का बोध संभव नहीं है- वे न तो ईश्वर का वजूद मानते हैं और न ही उसके होने से इनकार करते हैं। उनके लिए ईश्वर अगम्य है। जाहिर है पारंपरिक धर्म मानव सेवा के अपने मूल उद्येश्य से इतना भटकता गया है कि अब लोगों में ऐसे संगठनों और स्थापनाओं से मोहभंग होने लगा है। आज सारी दुनिया में धर्म का मतलब एक दूसरे के प्रति हिंसा, ईशनिंदा, रक्तपात ही रह गया है। धर्म के नाम पर लोगों का बदस्तूर शोषण जारी है। 

'द नन्स' अभियान से जुड़े लोग मानव सेवा के अपने काम को ही सच्चा आध्यात्म बताते हैं। वे ईश्वर की सत्ता से इनकार नहीं करते मगर धर्म के संगठित रूप को ढोंग का दर्जा देते हैं। पारंपरिक धर्म जहां कट्टरता है, दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णुता है, भेदभाव है इन्हें प्रिय नहीं रहा। लेखिका एमी सुलिवन ने अभी हाल के टाइम पत्रिका (एशियन अडिशन, 12 मार्च 2012 ) में 'द राइज ऑफ नन्स' शीर्षक से इस नए अभियान की जानकारी दी है। मुझे लगता था कि एक ऐसे अभियान को एक न एक दिन पनपना ही था। अब पारंपरिक और संगठित धर्म अपने 'सुनहले नियमों' के स्थापित राह से काफी दूर हट आए हैं। जन सेवा अब इनका मकसद नहीं रहा। हिन्दू धर्म में जहां अनुयायियों का शोषण, अकूत धनराशि के चढ़ावे पर गिद्ध दृष्टि है तो इस्लाम भाईचारे और शांति के घोषित मकसद की आड़ में हिंसा को बल दे रहा है। ईसाई धर्म जो जन सेवा के प्रति अपने समर्पण के लिए विख्यात रहा है अब पादरियों के आडंबर/भव्यता की चकाचौंध बनता गया है। ऐसे में एक ऐसे मानव धर्म की आज बड़ी जरुरत है। जो विजातियों को भले ही न सही स्वजनों की तो देख रेख करे। उनकी पीड़ा में भागीदार बनें। 

आज भारत में भी टूटते संयुक्त परिवारों के चलते लोगों के जीवन में एकाकीपन आ रहा है। वृद्ध उपेक्षित हो रहे हैं। ऐसे में कोई अभियान तो हो जहां इन दुखियों को भरोसे का कंधा मिल सके। दुःख दर्द बांटा जा सके। एक वह धर्म जो मनुष्य के दुःख दर्द से जानबूझ कर किनारा किए हो, अपने घोषित उद्येश्यों से भटक गया हो उसे त्याग देना ही श्रेयस्कर है। ऐसे किसी अभियान की भारत में भी पृष्ठभूमि तैयार है बस अगुवाई की जरुरत है। नई सुगबुगाहटें और एक नये धर्म-मानव धर्म की पदचापें अब सुनाई देने लगी हैं....

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