गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !
सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला!




