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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

आज पिता जी की पुण्य तिथि है!


आज पिता जी की पुण्य तिथि है. आज उन्ही की एक कविता श्रद्धा -सुमन के रूप में उन्ही को अर्पित है -त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्येव समर्पयामि.......
अथ नेता अर्ध चालीसा 
दोहा:
बंदौ नेता पद कमल,सब सुख धन दातार 
         कम्प्यूटर  नहीं कह सकत,माया अमित अपार  
चौपाई 
यद्यपि सब भगवान  बखाना, नेता अनुपम अगम महाना
नेता चरित अगाध अपारा,समुझत कठिन कहत विस्तारा 
कथनी करनी कहि नहिं जाई,क्षण प्रतिक्षण विस्मय अधिकाई 
बहु विधि सब्ज बाग़ दिखलावे,पीछे बहुरि न  पूछन आवे 
मतदाता सब खोजत फिरहीं, अलख ब्रह्म इव देख न परहीं 
महा महा मुखिया सब जोहत,माथा ठोक ठोक पुनि रोवत  
पत्रकार निशि दिन यश गावें,सहजई  बढियां माल उड़ावें 
ठेकेदार सब जय जय करहीं,बिनु श्रम लूटि  तिजोरी भरहीं 
जो व्यवसायी चंदा देई,कोटा परमिट सब कुछ लेई 
तस्कर अपराधी सब मिलते,'रस्म' चुकाई मधुर फल चखते 
दोहा:
नहि विद्या नहिं बाहु  बल ,बिनु धन करत कमाल 
संबंधी तक हो रहे, झटपट मालामाल 
चौपाई 
धन्य वचन अद्भुत चतुराई,ह्रदय भेद कोऊ जान न पाई  
लोकतंत्र की अलख  जगाते,पोलिंग बूथ कैप्चर करवाते 
समाजवाद की माला जपते, फाईव स्टार होटल में रमते 
जातिवाद का मन्त्र जगाते,धर्म निरपेक्ष गीत बहु गाते 
असमाजिक जन बहु आते,अभय दान पा मंगल गाते 
कला शास्त्र विज्ञान न आवा,नित नूतन अभिनन्दन पावा 
देश सभ्यता सब कुछ जाए, सत्ता सुख नहिं जाने पाए 
लोकलाज मर्यादा हीना ,'सब कुछ' करत न होत मलीना 
जो कोऊ तुम्हरो  यश गावे, विहसि प्रशासन कंठ लगावे 
झोला बस्ता तक जो ढोवे,पुलिस सभीत सशंकित होवे 
प्रभुता कोऊ नहिं सके बखानी,आई ऐ एस तक भरते पानी 
दोहा:
धन्य  धन्य तुम धन्य हो, तव प्रताप  को जान 
देवता सब रोवत फिरें,मौन भये भगवान 
-डॉ.राजेन्द्र प्रसाद मिश्र 
(रचना काल:१९९५;'राजेन्द्र स्मृति' से )   


बुधवार, 12 सितंबर 2012

असीम त्रिवेदी के चर्चित कार्टून पर एक काव्य प्रतिक्रिया


असीम ने हमारे मूल प्रतीक चिह्न के वर्तमान निहितार्थ को ही अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है उनका अभिप्राय कतई हमारे राष्ट्रीय प्रतीक को कलंकित करने का नहीं है ......और यह आजादी मानावाभिव्यक्ति की आजादी है! असीम के पक्ष में पिता जी की यह कविता पढ़िए: 
चले थे कहाँ से ,किया था क्या वादा 
कहाँ आ गए हम, हुआ क्या इरादा 
कितने मनोरम वे सपने लगे थे 
हुए क्यों पराये जो अपने सगे थे 
बहुत ही सुखद था उमीदों का पलना 
हुआ जब सवेरा तो छलना ही छलना 
सितारों का पाना समझा सरल था 
बढ़ाया कदम तो अमृत भी गरल था 
शहीदों ने जिसके लिए व्रत लिया था 
कहाँ है वह भारत जो सोचा गया था 
जितने हैं मक्कार गद्दार पाजी 
हुए हैं विधाता बने हैं वे काजी 
सत्यमेव्  जयते को क्या हो गया है 
महाकाव्य का अर्थ ही खो गया है 
वोटों की खातिर जुटे हैं जुआड़ी 
हुयी द्रोपदी आज जनता बेचारी 
हालत जो पहुँची है बद से भी बदतर 
कहाँ चक्रधारी कहाँ हैं धनुर्धर 
नहीं कोई आशा नहीं कोई हमदम 
नहीं हमको मालूम कहाँ जा रहे हम 
अस्मिता खोता भारत महाभ्रष्ट भारत 
आजाद है या पराधीन भारत 
महाभारती का महाघोष भारत 
करो या मरो मन्त्र लो फिर से भारत 

-डॉ. राजेन्द्र मिश्र (राजेन्द्र स्मृति से) 


रविवार, 29 जुलाई 2012

बाप बड़ा या बेटा -खेल शुरू होता है अब!


आखिर एक वैज्ञानिक तकनीक ने दूध का दूध और पानी का पानी कर ही दिया .डीएनए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक ने साबित कर दिया कि एन डी तिवारी (एन डी टी ) ही रोहित शेखर के जैविक पिता है . आजकल पूरी दुनिया में यह तकनीक तरह तरह के अपराधियों की शिनाख्त और पितृत्व के मामलों को सुलझाने में अचूक मानी जा रही है और अदालतें अब इन पर पूरी तौर से भरोसा करती हैं . आज इन तकनीकों के चलते कई ऐसे सामजिक मुद्दे सामने आ रहे हैं जिनकी गुजरे जमाने में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी . अब रोहित का मामला ही लें ,अब उनके दो पिता हैं .एक वैधानिक या कहिये धर्म पिता तो दूसरे जैवीय (या अधर्म पिता :-) ? ) शेखर के जन्म के बाद उनकी मां की दूसरी शादी हुयी और और एक और पुत्र हुआ .शेखर का सहोदर भाई . 
जाहिर हैं अपने पिता का अधर्म जग जाहिर कर अब शेखर कुछ शांति महसूस कर रहे होंगे. मगर मित्र शेखर, पिता तो हमेशा बाई चान्स ही होते हैं बाई च्वायस नहीं ....हाँ दोस्त मित्र भले ही बाई च्वायस बनते हैं . फेसबुक पर इस मामले से  प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गयी .बड़े रोचक रोचक शीर्षक उभरे. बेटे ने बाप को जन्मा......कई वर्षों का प्रसव काल और पुरायट पिता का जन्म ,जनम लियो मेरे पापा बजे बधाई चहुँ ओर आदि आदि .....ज्यादातर लोगों ने एन डी टी को कोसा तो कुछ उनके बचाव में भी उतरे....कहा कि शेखर एक नाजायज सम्बन्ध की उपज रहे और उनकी मां बेटे ने मिलकर एन डी टी के ऐश्वर्य का सुख भोगा और फिर नाजायज सम्बन्ध को जायज बनाने में जुट गए .
किसी ने यह सवाल भी किया कि ऐसा क्यों देखने में आता है कि पुरुष ऊंचे ओहदे और रसूख पर महिलायें मर मिटती हैं ....मेरे एक मित्र ने लिखा " यह तिवारी की सज्जनता है कि वे मां बेटे पर मेहरबान रहे और निजी तौर पर उनका ध्यान सम्मान रखते रहे मगर जो रिश्ता ही सार्वजनिक नहीं था उसे वे कैसे स्वीकारते? कोई और राजनेता रहा होता तो मां बेटे कब कहाँ लोप हो गए होते किसी को कानो कान खबर नहीं होती जैसा कि उत्तर प्रदेश में कई मामलों में ऐसा हो चुका है ..... या फिर खुद एन डी टी की ही  डी एन ए टेस्ट की परोक्ष सहमति थी अन्यथा ब्लड सैम्पल दूषित कर देना उनके लिए कौन सा मुश्किल था.."  बहरहाल यह तो त्वरित प्रतिक्रियाएं थीं ....बहुत सधी और सुचिंतित नहीं ...सरोकारनामा चिट्ठे ने तो एन डी टी के समर्थन में एक विकराल पोस्ट ही लिखी है -फुरसत हो तो आप भी पढ़िए. 
मगर अभी तो यह शुरुआत भर है ..पिता जन्में हैं और बधाईयों का दौर है . अब शुरू होगा  कानूनी लड़ाईयों का दौर. वैसे भी एन डी टी के पास कोई बड़ी जागीर नहीं हैं मगर फिर भी जो कुछ भी है बिना उनकी सहमति के वह जायज बेटे का भी नहीं हो सकता -यह उनकी मर्जी पर है या विधि विशेषज्ञ बेहतर जानते हैं . अब जैवीय हक़ तो काबिज हो गया मगर पिता तो कभी पुत्र का ऋणी माना नहीं गया है.   सनातन व्यवस्था है कि पितृ ऋण तो पुत्र को ही चुकाना पड़ता है ...और यह बहस चलती रहेगी ...मगर इन सबसे ऊपर और अलग मेरा अपना मानना है कि अगर एन डी टी को यह इल्म था कि रोहित उनका ही बेटा है तो उन्हें इसे स्वीकार कर लेना था -इससे उनका कद और ऊंचा उठता और उनकी नैतिकता और साहस की लोग बडाई करते ..वे निःसंतान भी हैं ..खैर अब भी देर नहीं हुयी है उन्हें सार्वजनिक आयोजन कर बेटे को गले लगा लेना चाहिए ...

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

पिता जी की पुण्य तिथि पर ...

आज उनकी पुण्य  तिथि है... जीवन में अगर किसी की प्रतिभा ने मुझे गहरे रूप से प्रभावित किया तो वे पिता जी ही थे ..डॉ. राजेन्द्र मिश्र ....आपकी नज़र में यह एक सामान्य सहज पितृ प्रेम हो सकता है ..और मैं भी यही सोचता हूँ कि पुत्र तो पिता की ही एक अनुकृति होता है -आत्मा वै पुत्रो जायते ..वे एक बहुत अच्छे गद्य लेखक और निबंधकार थे....उनकी पुस्तक आधुनिक हिन्दी निबंध के कई लेख /निबंध खासकर मनुवाद का यथार्थ बहुत चर्चित हुआ था ..अपने लेखों में  वे कभी कभी कुछ पद्यात्मक अभिव्यक्तियाँ कर जाते थे ..उन्ही में से कुछ चयनित करके यहाँ प्रस्तुत है ....
...थी नहीं मंजिल कहीं.... 
उम्र गुज़री हसीन सपनो में 
चाँद तारों के सब्ज बागों में, 
डूब गया दिल खुलीं जब आँखें 
कैसी थी साजिश आसमानों में 

रहे पिटते हम विजेता नहीं थे 
हो गए गुमनाम हम नेता नहीं थे 
खुली पुस्तक सी रही यह जिन्दगी 
पढ़ लिया लोगों ने अभिनेता नहीं थे 

बहुत लम्बी है यह रात क्या किया जाए 
नहीं बनती है कोई बात क्या किया जाए 
''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक''
नहीं है हाथ में इक उम्र क्या किया जाए 

उम्र भर  चलता रहा
मकसद समझ पाया नहीं 
था नहीं राहों का राही 
थी नहीं मंजिल कहीं ...
 आज मेरे पैतृक आवास पर हर वर्ष की भांति उनके पुण्य स्मरण का अनुष्ठान है ..अनुज  डॉ. मनोज मिश्र उसका संयोजन कर रहे हैं .नौकरी के चक्कर में मैं  नहीं जा पा रहा हूँ .. पिता जी अक्सर यही यह उद्धृत करते रहते थे कि पराधीन सपनेहु  सुख नाहीं -नौकरी के बारे में भी यह बड़ी सटीक उक्ति है ..और यही अनुभूति मुझे 
 शिद्दत के साथ हो रही है ....
पुण्य स्मरण....... 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

पिता जी की अंतिम कविता !

आज पिता जी की पुण्य तिथि है ! बल्कि कहिये पुण्य दशाब्दि वर्ष ! देखते देखते दस वर्ष होने को आयें उनसे विछोह के ! उनके व्यक्तित्व के कई  शेड   थे   -तत्कालीन कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में श्री कल्याणमल लोढ़ा  और आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी के साहचर्य में विद्याध्ययन के बाद विगत शती के छठे दशक में वे गाँव क्या आये कि यहीं  गाँव के ही होकर रह गए ! उनकी रचनात्मक ऊर्जा कई दिशाओं में बिखरी -समाज सेवा ,साहित्य प्रणयन ,संगीत की धुन- इन सभी दिशाओं में उनकी दखल बनती गयी -मानस के अनन्य प्रेमी और रामकथा के प्रसार में पूरी तरह  रमे हुए ! क्या सरस्वती ,क्या धर्मयुग ,क्या दिनमान उनकी रचनाएं अपने युग की किन मशहूर पत्र पत्रिकाओं में नहीं  छपी -पर उन्हें चाकरी से एलर्जी थी ! हर कीमत पर स्वतंत्र होकर जिए ! किसी की भी छत्रछाया नहीं स्वीकारी -आज उनके उस उद्धत रूप और किसी मुद्दे पर हम बच्चों की मान मनौवल  और उनका अपने स्टैंड पर नुक्सान सह कर भी अडिग रहना आँखों में आँसू ला देता है !



जौनपुर जिले के अनेक राजनीतिक उच्च पदों को भी उन्होंने सुशोभित किया मगर एक एक कर सभी से त्यागपत्र भी देते गए ! मुझे उनका राजनीति में रहना कभी नहीं रास आया  -मैं आज  जानता हूँ कि राजनीति ने उनकी सृजनात्मक संभावनाओं को कमतर  किया -या यूं कहें कि कभी उन्होंने राजनीति से अनुचित लाभ नहीं लिए -नहीं तो जिस व्यक्ति का प्रशंसक भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री और आज भी कविता कर्म के मर्मग्य  अटल जी रहे हों और सहपाठी आचार्य  विष्णुकांत शास्त्री जी जो हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे हों और श्री माताप्रसाद  जी जैसे मित्र जो अरुणांचल प्रदेश के राज्यपाल रहे -कुछ जुगाड़ कर कहीं  का कहीं तो पहुँच ही गए होते  ! पर उन्हें जुगाड़ से सख्त नफरत थी ! वे मूल्यों की राजनीति करना चाहते रहे और धीरे धीरे राजनीति ने उन्हें खुद से अलग कर दिया !



पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो लगता है कि उनका मूल भाव, अंतस साहित्य को समर्पित था -यह उनकी मौलिकता थी ! संगीत  की उनकी पकड़  भी  एक मुकाम तक पहुँच चुकी थी -जब भी उद्विग्न होते और अक्सर होते ही हारमोनियम पर जम जाते ..सोलो ही - दो तीन  घंटे लगातार आत्मविस्मृत से ! संगीत उन्हें राहत देती थी ! मेरा उनका  जुडाव ख़ास तौर से साहित्यिक सृजनशीलता से था -वे बहुत अधयनशील / स्वाध्यायी रहे  ! वेल रेड ! मुझे गैर पाठ्यकर्म के लेखन की ओर उन्होंने ही उन्मुख किया -बल्कि ऐसा उनके सानिध्य में अपने आप हो गया ! मुझे याद है जब मेरी प्रथम पापुलर साईंस की  रचना "अथ ऊलूकोपाख्यानम" १९८८ के आसपास धर्मयुग में छपी तो वे अपने हित मित्रों को गर्व से सीना फुलाकर दिखाते फिरते रहे और मैं इम्बैरैस्मेंट से कोनो अतरों में छुपता रहा था ! यादे... यादें ...यादें ....उनका दैहिक अवसान अकस्मात और स्तब्धकारी था ! बिलकुल स्वस्थ .निरोग ,मोहक व्यक्तित्व के धनी तो वे रहे ही ५ अक्टूबर १९९९ को काल के क्रूर हाथों ने उन्हें सहसा हमसे छीन  लिया -हृदयाघात से एकदम अप्रत्याशित था उनका जाना -जब मैं भागकर घर पहुंचा था तो अपार जन सैलाब देखकर हतप्रभ था -उन्होंने जीवन भर रूपये पैसे नहीं आदमी कमाए और वही अपार जन समुदाय वहां रोता विलखता उपस्थित था ......

खैर इस वर्ष हम उनकी पुण्य स्मृति दशाब्दी मना  रहे -साल भर उनकी स्मृति में कई रचनात्मक कार्यों की रूप रेखा बन उठी है ! मेरे चाचा ( पिता जी के छोटे भाई ) नासा में वैज्ञानिक रह चुके डॉ सरोज कुमार मिश्र भी इस हेतु पधार रहे हैं -अगले माहों उनकी पुण्य दशाब्दी से जुडी रपट और उनकी कुछ रचनाएँ यहाँ भी आयेगीं ! वे एक श्रेष्ठ गद्य लेखक भी रहे -उनके चुनिन्दा लेख भी यहाँ मैं दे सकूंगा -मगर अभी तो उनकी अंतिम कविता जो उनकी मेज पर उनकी ही हस्तलिपि में एक कार्ड पर मिली थी मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ -


.........अब दिन  लगा ढलने !
जन्म के साथ ज्योति जगी संभावनाओं की 
चाँद और तारों से भविष्य लगा सजने 
'बालू से भी तेल' के संघर्ष में दिन रीत गये 
कुछ नहीं  हाथ तो विवेक लगा जगने
आदि और अंत मध्य केवल प्रतीक्षा रही ,
सम्मोहन ,वशीकरण सिद्ध नहीं  सपने 
चुम्बकीय कामना के इन्द्रधनुष लुप्त हुए 
लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने 

यह कुछ अनगढ़ सी कई जगह करेक्शन की हुई  कविता थी जो उनकी मृत्यु  के उपरांत  उनकी मेज पर पडी मिली , वे  इसे फेयर  भी नहीं कर पाए थे  ! शायद जाने का पूर्वाभास या यूं कहें कि जीवन की निस्सारता समझ आ गयी थी उन्हें !

रविवार, 21 जून 2009

पितृ दिवस पर पिता जी की ही कविता के पाठ की श्रद्धाजंली

आज युनुस जी की इस पोस्ट ने पिता जी की याद दिला ही दी जिसे मैं तबसे सायास रोके हुए था जब आज यह पता चला कि आज ही "फादर्स दे " है -इन नित नए नए चोचलों में ,नूतन दिवसों में मेरी रूचि नही है -मगर अब युनुस भाई को क्या कहूं कि उन्होंने इस दिवस को कुछ चुनिन्दा लोगों की चुनिन्दा कविताओं से ऐसा अर्थ गौरव प्रदान कर डाला कि पिता जी याद आ गए और बेसाख्ता याद आए !
मैं उन पर क्या लिखूं ? पहले उनके लिखे से आगे बढ़ पाऊँ तब तो ! लीजिये "आत्मा वै जायते पुत्रः " के फलस्वरूप उनकी यह कविता आप भी पढ़ लें !

कया करुँ मन कुछ कहो तो .........

क्या करुँ मन कुछ कहो तो
क्या सितारे तोड़ लाऊँ
या कि गैरिक वस्त्र में सब कुछ छुपाऊँ
तरस आता किंतु तेरी विवशता पर
त्याग सकते हो कुछ नही तुम
रूढियों की जिन्दगी ही भाती तुझे है
कसकना ,कोसना ,हरदम फुलाए गाल रहना
और रो -रोकर सिसक कर पाँव रखना
बस ,यही आग्रह तुम्हारा खून पीकर
लड़ रहा प्रतिपल तुम्हारी साँस लेकर
और तुम ?
मुझी पर डांट की वर्षा लगाये
रो रहे हो
क्या करुँ मन कुछ कहो तो !

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

उर्वशी -पिता जी की एक कविता !

हिमांशु की एक कहानीनुमा कविता ने मुझे स्वर्गीय पिताजी की एक कविता की याद दिला दी -आप भी देंखें शायद अच्छी लग जाय !
उर्वशी
मंद मुस्काती छटा में करुण क्रंदन की कहानी
मद भरे आंखों में अंकित विवशता की मूक वाणी
नूपुरों के कलरवों में चीखता संगीत का स्वर
चितग्राही हर अदा पर घुट रहा यौवन निरंतर (१)
विवशता की इस चिता पर इन्द्रधनुषी स्वप्न जलते
प्रणय के इतिहास मिटते बन्धनों के बंध हसते
रूप यौवन साधना का दुखद परिणति घुटन ही है
प्रेम और श्रृंगार का अभिशप्त संगम जलन ही है (2 )
सर्वगुण संपन्न होकर उर्वशी साधन बनी क्यों
संगीत की देवी न जाने विषय की प्रतिमा बनी क्यों
कोटि उर मे बस रही जो ह्रदय अपना रिक्त रखती
इन्द्र की आराधना में साधना को भ्रष्ट करती (३)
देवता दानव मनुज की वासना का नग्न चित्रण
सिसकती संवेदना में भावना सौदर्य मिश्रण
उर्वशी सौन्दर्य गंगे ,सृष्टि का उपहास है तू
इन्द्र की वैभव शिखा पर अश्रु की बरसात है तूं (4)
सतत शाश्वत लग रही है आज भी तेरी कहानी
युद्ध हो या शान्ति हो तुम हो वही माध्यम पुरानी
सृष्टि की सर्वोत्तमें तुम भ्रष्ट करती ही रही हो
कुछ नहीं तेरा पर इतिहास रचती ही रही हो (5)
पतित करना ही तुम्हारी साधना का साध्य क्यों है
जो तुम्हे साधन बनाता फिर वही आराध्य क्यों है
वेद शास्त्र -पुराण हो या डार्विन फ्रायड की कथाएँ
उर्वशी जीवित रहेगी साथ ही उसकी व्यथाएं (६)

सभी जीवों का कोई आदर्श भी है लक्ष्य भी है
पर तुम्हारी अस्मिता का अर्थ क्या दासत्व ही है
सोचने पर लग रहा है तुम कहीं कुछ भी नहीं हो
मात्र शाश्वत कामना हो उर्वशी संज्ञा बनी हो (७)
डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र (१९६१)

यह कविता १९६१ में हिन्दी विभाग,कलकत्ता विश्वविद्यालय की भित्ति पत्रिका में तब
प्रकाशित हुयी थी जब प्रोफेसर कल्याण मल लोढा जी विभागाध्यक्ष थे ! अभी तो यह
राजेन्द्र स्मृति(२०००) से ली गयी है जिसके सम्पादक साहित्य वाचस्पति डॉ . श्रीपाल सिंह क्षेम जी हैं .

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

यादें -पुण्यस्मृति दिवस की !


५ अक्टूबर को पिता जी का पुण्य दिवस था .यह विगत ९ वर्षों से एक आयोजन के रूप में मेरे पैतृक निवास -चूडामणिपुर ,बख्शा ,जौनपुर में मनाया जाता रहा है .ऐसा नहीं है कि उन उनके दोनों पुत्र -एक मैं और मेरे अनुज डॉ .मनोज मिश्र बहुत लायक पुत्र हैं और एक अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं .बल्कि यह एक जन कार्यक्रम है ,बहुत अच्छी शिक्षा और मेधा के बावजूद पिता जी गावं में ही रह गए -और आज उनकी लोक गम्यता ही प्रतिस्मृति के रूप में उन्हें वापस हो रही है -लोगों की उनके प्रति यह स्वप्रेरित श्रद्धांजलि है जो हर वर्ष उनकी स्मृति को तरोताजा करती है .अंगरेजी की एक कहावत है कि जीवन में जैसा निवेश आप करते हैं वही आपको उत्तरार्ध में वापस होता है . पिता जी की रचनाएं सरस्वती में छपी , वे कल्याणमन लोढा और आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री जी के स्टुडेंट रहे .रामचरित मानस में उनका अगाध प्रेम था -भारतीय वांग्मय पर तो उनका अध्ययन विस्मित करने वाला था -इस ब्लॉग पर समय समय पर उनकी रचनाएं भी आपको पढने को मिलेंगी .साहित्यानुराग मेरी नजर में उनका ऊज्वल, सबल पक्ष था और राजनीति में रूचि दुर्बल पक्ष .शायद राजनीति ने उनकी असीम संभावनाओं पर ग्रहण भी लगाया . सभी तो आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हो सकते जिन्होंने कविता और राजनीति को साथ साथ साध लिया .

उन्हें नौकरी और किसी की दासता स्वीकार नहीं थी -उनका आदर्श वाक्य ही था -पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं .यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है -मुझे अफसोस होता है कि इस बात पर मुझ मूढ़ द्वारा बहस कर उनका कईबार दिल दुखाया गया .पर आज लगता है मनुष्य जैसे नश्वर और क्षणभंगुर जीव के लिए समझौते करते रहना सचमुच कोई पुरुषार्थ नहीं है -उन्होंने अपने शर्तों पर जीवन जिया और आज क्षेत्र में अपनी यशः काया में जीवित हैं ।
मैं सोचता हूँ मैंने तो एक चाकरी कर ली है पर क्या इस स्थूल शरीर के बाद भी मुझे कोई जानेगा ? वैसे ऐसी मेरी कोई इच्छा नहीं है पर कहते हैं न कि अमरता की चाह तो सभी में होती है -सभी अपनी यशः काया में बने रहना चाहते हैं .
पर मुझे कभी कभी यह सुखानुभूति अवश्य होती है कि मैं एक बहुत ही योग्य पिता का पुत्र हूँ और इसलिए ख़ुद को नालायक भी नहीं कह सकता -क्योंकि आत्मा वै जायते पुत्रः .
पुनश्च -मित्रों यह मेरी एक नितांत निजी पोस्ट है ,आप पढ़ तो लें पर टिप्पणी आवशयक नहीं .

शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?

महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
गर्व से कहता ताल ठोंक कर -
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
चाहे जितना ही लिख मारो
प्रवचन करते रहे शास्त्र पर ,
नही असर पड़ने वाला है
वज्र हुआ ईमान बेच कर
नित नूतन महफ़िल सजती है ,
स्वर्ग कैद है हाथ हमारे
मरे थैलों पर चलते हैं -
मुल्ला पंडित कवि बेचारे ,
गर्व से कहता ताल ठोक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
सुरा सुन्दरी की दुनिया से
किंग कोबरा सा फुफ्कारे
काले धन के उच् शिखर से
हाथ उठा फिर फिर ललकारे
भ्रष्ट रहा हूँ ,भ्रष्ट रहूँगा -
चाहे जितना जोर लगा ले !
गर्व से कहता ताल ठोक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
टूटे नेता टूटे अफसर
टूटी जनता टूटी आशा
विद्यामंदिर भी सब टूटे
टूट रहा समाज का नाता ,
सब कुछ टूट चुका है लेकिन
मैं दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता ,
गर्व से कहता ताल ठोंक कर
महा भ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
प्रेस मालिक अपना जिगरी है
सम्पादक ? मेहमान हमारे !
राजा दादा ,अपना ही है
कौन तुम्हारे है रखवारे ?
साक्ष्य हमारे टुकडों जीता
न्याय हमारे पाकेट में है
शासन मेरी बाट जोहता
सारी सत्ता साथ हमारे
जो सक्षम हैं वे सब मेरे-
किसके बल तुम आँख दिखाते
गर्व से कहता ताल ठोंक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे
(राजेन्द्र स्मृति से साभार ,२०००)
यह कविता स्वर्गीय पूज्य पिता जी,डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्र ( सितम्बर १९४०- अक्टूबर १९९९) ने १९९० के आसपास लिखी थी .कल उनका पुण्य दिवस है और मैं इस अनुष्ठान में भाग लेने गावं (जौनपुर ) जा रहा हूँ .वहाँ नेट की सुविधा अभी नही है इसलिए यह कविता श्रद्धांजलि स्वरुप क्वचिदनयतोअपि पर आप मित्रों के लिए छोडे जा रहा हूँ ! उम्मीद है पसंद आयेगी !




शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

तुलसी जयन्ती के अवसर पर ......

आज तुलसी जयन्ती है -एक महाकवि के धरावतरण का पुण्य और शुभ दिन .इस अवसर पर मेरी इस महान मेधा को काव्यांजलि -श्रद्धांजलि मेरे स्वर्गीय पिता डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र की इन पंक्तियों में अर्पित है -
निगमागम वाद अरण्य में
मतमतांतर द्वेशज शर्वरी ,
विवशता बन मृत्यु रता यदा
अरुण दीप शिखा तुलसी हुए

विविध दर्शन की सलिला सुधा
प्रवाहमान निरंतर विश्व में ,
सब समाहित 'मानस 'में सदा
सुसरिता इव तीरथ राज में

सरसता समता व्यवहारिता
त्रिपथगा बन काव्य प्रदेश की
शिवम् सत्यम लोक हितैषिणी
सुरुचि सूक्ति प्रवाहित सर्वदा

सफल मानव जीवन संहिता
फलित राज व्यवस्था राम की
सुलभ तो अन्यत्र कहीं नहीं
परम सूक्ष्म विवेचन धर्म का

सुकवि श्रेष्ठ सुनायक संत से
उरिन भारत सम्भव है नहीं
सुमन वन्दित यह श्रद्धांजलि
पद नख छवि ज्योतित रज बने
स्वर्गीय पिता जी जो तुलसी के अनन्य प्रेमी थे की यह कालजयीं पक्तियां आज तुलसी जयन्ती के अवसर पर उनकी ओर से ही महान कवि को सादर समर्पित -
त्वदीय वस्तु गोविन्द तुभ्येव समर्पयामि ..........

मेरी ब्लॉग सूची

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