आज पिता जी की पुण्य तिथि है ! बल्कि कहिये पुण्य दशाब्दि वर्ष ! देखते देखते दस वर्ष होने को आयें उनसे विछोह के ! उनके व्यक्तित्व के कई शेड थे -तत्कालीन कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में श्री कल्याणमल लोढ़ा और आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी के साहचर्य में विद्याध्ययन के बाद विगत शती के छठे दशक में वे गाँव क्या आये कि यहीं गाँव के ही होकर रह गए ! उनकी रचनात्मक ऊर्जा कई दिशाओं में बिखरी -समाज सेवा ,साहित्य प्रणयन ,संगीत की धुन- इन सभी दिशाओं में उनकी दखल बनती गयी -मानस के अनन्य प्रेमी और रामकथा के प्रसार में पूरी तरह रमे हुए ! क्या सरस्वती ,क्या धर्मयुग ,क्या दिनमान उनकी रचनाएं अपने युग की किन मशहूर पत्र पत्रिकाओं में नहीं छपी -पर उन्हें चाकरी से एलर्जी थी ! हर कीमत पर स्वतंत्र होकर जिए ! किसी की भी छत्रछाया नहीं स्वीकारी -आज उनके उस उद्धत रूप और किसी मुद्दे पर हम बच्चों की मान मनौवल और उनका अपने स्टैंड पर नुक्सान सह कर भी अडिग रहना आँखों में आँसू ला देता है !
जौनपुर जिले के अनेक राजनीतिक उच्च पदों को भी उन्होंने सुशोभित किया मगर एक एक कर सभी से त्यागपत्र भी देते गए ! मुझे उनका राजनीति में रहना कभी नहीं रास आया -मैं आज जानता हूँ कि राजनीति ने उनकी सृजनात्मक संभावनाओं को कमतर किया -या यूं कहें कि कभी उन्होंने राजनीति से अनुचित लाभ नहीं लिए -नहीं तो जिस व्यक्ति का प्रशंसक भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री और आज भी कविता कर्म के मर्मग्य अटल जी रहे हों और सहपाठी आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी जो हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे हों और श्री माताप्रसाद जी जैसे मित्र जो अरुणांचल प्रदेश के राज्यपाल रहे -कुछ जुगाड़ कर कहीं का कहीं तो पहुँच ही गए होते ! पर उन्हें जुगाड़ से सख्त नफरत थी ! वे मूल्यों की राजनीति करना चाहते रहे और धीरे धीरे राजनीति ने उन्हें खुद से अलग कर दिया !
पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो लगता है कि उनका मूल भाव, अंतस साहित्य को समर्पित था -यह उनकी मौलिकता थी ! संगीत की उनकी पकड़ भी एक मुकाम तक पहुँच चुकी थी -जब भी उद्विग्न होते और अक्सर होते ही हारमोनियम पर जम जाते ..सोलो ही - दो तीन घंटे लगातार आत्मविस्मृत से ! संगीत उन्हें राहत देती थी ! मेरा उनका जुडाव ख़ास तौर से साहित्यिक सृजनशीलता से था -वे बहुत अधयनशील / स्वाध्यायी रहे ! वेल रेड ! मुझे गैर पाठ्यकर्म के लेखन की ओर उन्होंने ही उन्मुख किया -बल्कि ऐसा उनके सानिध्य में अपने आप हो गया ! मुझे याद है जब मेरी प्रथम पापुलर साईंस की रचना
"अथ ऊलूकोपाख्यानम" १९८८ के आसपास
धर्मयुग में छपी तो वे अपने हित मित्रों को गर्व से सीना फुलाकर दिखाते फिरते रहे और मैं इम्बैरैस्मेंट से कोनो अतरों में छुपता रहा था ! यादे... यादें ...यादें ....उनका दैहिक अवसान अकस्मात और स्तब्धकारी था ! बिलकुल स्वस्थ .निरोग ,मोहक व्यक्तित्व के धनी तो वे रहे ही ५ अक्टूबर १९९९ को काल के क्रूर हाथों ने उन्हें सहसा हमसे छीन लिया -हृदयाघात से एकदम अप्रत्याशित था उनका जाना -जब मैं भागकर घर पहुंचा था तो अपार जन सैलाब देखकर हतप्रभ था -उन्होंने जीवन भर रूपये पैसे नहीं आदमी कमाए और वही अपार जन समुदाय वहां रोता विलखता उपस्थित था ......
खैर इस वर्ष हम उनकी पुण्य स्मृति दशाब्दी मना रहे -साल भर उनकी स्मृति में कई रचनात्मक कार्यों की रूप रेखा बन उठी है ! मेरे चाचा ( पिता जी के छोटे भाई ) नासा में वैज्ञानिक रह चुके डॉ सरोज कुमार मिश्र भी इस हेतु पधार रहे हैं -अगले माहों उनकी पुण्य दशाब्दी से जुडी रपट और उनकी कुछ रचनाएँ यहाँ भी आयेगीं ! वे एक श्रेष्ठ गद्य लेखक भी रहे -उनके चुनिन्दा लेख भी यहाँ मैं दे सकूंगा -मगर अभी तो उनकी अंतिम कविता जो उनकी मेज पर उनकी ही हस्तलिपि में एक कार्ड पर मिली थी मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ -
.........अब दिन लगा ढलने !
जन्म के साथ ज्योति जगी संभावनाओं की
चाँद और तारों से भविष्य लगा सजने
'बालू से भी तेल' के संघर्ष में दिन रीत गये
कुछ नहीं हाथ तो विवेक लगा जगने
आदि और अंत मध्य केवल प्रतीक्षा रही ,
सम्मोहन ,वशीकरण सिद्ध नहीं सपने
चुम्बकीय कामना के इन्द्रधनुष लुप्त हुए
लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने
यह कुछ अनगढ़ सी कई जगह करेक्शन की हुई कविता थी जो उनकी मृत्यु के उपरांत उनकी मेज पर पडी मिली , वे इसे फेयर भी नहीं कर पाए थे ! शायद जाने का पूर्वाभास या यूं कहें कि जीवन की निस्सारता समझ आ गयी थी उन्हें !