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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो!

जब हिन्दी ब्लॉगों का एक दशक पहले आगाज  हुआ था तो कहा गया था कि अभिव्यक्ति  के  एक युगांतरकारी माध्यम का आगमन हो गया है। अब न तो संपादकों की  कैंची  का डर था और न कही कोई रोक टोक।बेख़ौफ़ बयानी का एक चुंबकीय आमंत्रण था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर की शिक्षा लेकर युवाओं की एक फ़ौज अंतर्जाल की नयी संभावनाओं को तलाश रही थी। जाहिर है उनमें से  अधिकांश का सृजनात्मक लेखन से कोई  लेना देना नहीं था और न  कोई अनुभव ।  फिर भी उन्होंने अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन की अलख जगाई और उसमें से कुछ तो रातो रात अच्छे लेखक के रूप में सन्नाम भी हो गए। यह समय (2003 -२००७ ) हिन्दी ब्लॉग लेखन का प्रस्फुटन  काल था।

हिन्दी  ब्लॉग जगत में इसके बाद साहित्यिक और सृजनात्मक प्रतिभाओं की पैठ हुई और लगने लगा कि हिन्दी ब्लागिंग के रूप में अभिव्यक्ति का एक नया युग आ गया है जो पारम्परिक मीडिया को धता बताकर रहेगा। और हिन्दी ब्लागिंग की यह धमक और ठसक आगे के कई सालों तक बनी रही। और इस माध्यम/विधा की खिलाफत भी हिन्दी के पारम्परिक खुर्राट और खेमेबाज साहित्यकारों  /संपादको की ओर से शुरू हो गयी गई -उन्हें अचानक अपने विस्थापन  का खतरा भी दिखाई देने  लग  गया था।  मजे की बात यह कि वे ब्लॉग बैठकियों में मुख्य अतिथि की हैसियत से  बुलाये जाते और मंच पर ही इस माध्यम की खिल्ली उड़ा आते। आत्ममुग्ध ब्लागर  ऐठ में उनकी बातों को तवज्जो नहीं देते। यह  हिन्दी  ब्लॉग जगत का पुष्पन -पल्लवन काल(2007 - 2010 था। 

ठीक इसके बाद ब्लॉग जगत का वह हाहाकारी स्वर्णकाल आया जिससे प्रतिभाओं का अजस्र  बहाव यहाँ देखा गया ।  एक से एक सच्चे प्रतिभाशाली , आत्ममुग्ध और स्वनामधन्य महानुभाव अवतरित हुए जिन्हे  ब्लागजगत  के अब तक पुरायट कहे जा रहे ब्लागरों ने सीख दी , संरक्षण दिया और दुर्भाग्य से हिन्दी ब्लागजगत में भी पारम्परिक साहित्य की अनेक दुष्प्रवृत्तियों का यहीं से आरम्भ शुरू हुआ। खेमे बने ,'मठ' बने और मठाधीश बने।  जाति  बिरादरी के नाम पर गोलबंदी शुरू  हुयी। कई  मगरूर ब्लॉगर आये। कई बेशऊर भी आये।  किसी ने मखमली माहौल बनाया तो किसी ने इस्पाती ताकत दिखाई। व्यर्थ के लड़ाई झगड़े बहस मुहाबिसे और रोज की चख चख ।  सृजन गायब होने लगा -रगड़ घषड़ की ऊष्मा ही ज्यादा फ़ैली।  लोगों ने देख सुन लेने की धमकियां  भी दी लीं. 

भारत का अब तक न जाने कहाँ  सोया नारीत्व भी  अचानक जाग दहाड़ें मारने लग गया  .ब्लागरों की पुरुष महिला कैटेगरी  का क्लीवेज भी साफ ज़ाहिर हो चला।  स्वाभाविक था रचनाशील सौम्यता अब परदे के पीछे जा पहुँची थी।  हिन्दी ब्लागजगत का मोहभंग काल अब शुरू हो चला था।  कुछ का ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने मुद्रण माध्यम का दामन थाम लिया -जिसे वे कभी  पानी पी पीकर कोसते थे।  कुछ ने तो यहाँ तम्बू उखड़ने के अंदेशे से  झटपट इस माध्यम  का लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल कर प्रकाशकों से  मिल मिला पैसे वैसे दे दिलाकर किताबें छपवाईं  और बिकवानी शुरू कर दीं।  

हिन्दी ब्लागजगत का अवसान काल  अब आसन्न था। दशेक काल में सब कुछ हो हवा गया।  उत्थान पतन सब।  अभी भी लोग कहते  हैं, नहीं नहीं ब्लॉग अब भी खूब लिखे पढ़े जा रहे हैं -मगर पाठक हैं कहाँ  भाई? हिन्दी के अन्तरजालीय पाठकों को हमने संस्कारित ही तो नहीं  किया -यहाँ तो सब  ब्लॉगर लेखक ही हैं -ब्लॉग पाठकों का टोटा है -उनकी कोई जमात नहीं, जत्था नहीं। यहाँ ब्लॉगर ही लेखक है और खुद  वही पाठक भी । अलग से पाठक वर्ग गायब है।  पाठकों को ललचाये  जाए बिना हिन्दी जगत के दिन बहुरने से रहे। तब तक शायद हम ब्लॉगर अल्पसंख्यकों को हाथ पर हाथ बैठे रहना होगा।  इस माध्यम को भी अब प्रायोजकों  प्रश्रयदाताओं की ही  तलाश है -आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो ! 

 

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

आप शर्मिंदा तो नहीं कि कैलाश सत्यार्थी को नहीं जानते?

 फेसबुक पर कई आत्ममुग्ध बुद्ध प्रबुद्ध लोगों ने उपहासात्मक लहजे में टिप्पणियाँ की हैं कि
उन्होंने कैलाश सत्यार्थी का नाम तक नहीं सुना -जैसे उनका यह उद्घोष हो कि अगर बन्दे को मैं नहीं जानता तो फिर उसकी  कोई काबिलियत ही नहीं है . प्रकारांतर से वे नोबेल की उनकी वैधता पर उंगली उठा रहे हैं। जानता तो मैं भी नहीं था उन्हें कल तक, किन्तु इसलिए शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ -उन कारणों के विवेचन में लगा हूँ कि ऐसे शख्स को जिसने भारत ही नहीं दुनिया के सैकड़ों देशों में बाल शोषण के विरुद्ध अलख जगायी और इस दिशा में ठोस काम किया, क्यों इतना अनजाना सा रह गया अपने ही देश में। सबसे पहले तो मैं अपना ही दोष मानता हूँ कि मेरी जागरूकता की कमी रही -मैं अपने संकीर्ण दायरों से बाहर न निकल सका या फिर इनके कार्यों को महज एक आम सामाजिक कार्यकर्त्ता द्वारा किये जा रहे कार्यों के रूप में ले लिया-यह नाम दिमाग में जगह नहीं बना सका।

मगर मैं अन्य कारणों को भी समझना चाहता हूँ जिससे यह शख्स इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद भी अनजाना रहा? क्या अपने देश की मीडिया की भूमिका कटघरे में है? या देश के शासक वर्ग की अनदेखी? या फिर कोई और कारण ? फिर कैलाश सत्यार्थी का कार्य सचमुच इतना उल्लेखनीय नहीं रहा और महज वैश्विक राजनीतिक कारणों से यह पुरस्कार महानुभाव की झोली में टपक पड़ा है? कल से दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा है! हमारे देश में नेता और अभिनेता के  सिवा सेलिब्रिटी होना किसी अपवाद से कम नहीं है। विदेशी संस्थानों को हमारे यहाँ के दूसरे तीसरे दरजे के क़ाबिल लोगों जैसे वैज्ञानिकों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं की  भले ही सुधि हो आए। 

एक और बात है अब मीडिया और शासकीय वर्ग भी सत्यार्थी के विरुदावली गायन में जुट गया है मगर यह सदाशयता उन दिनों कहाँ थी जब इन्हे इसकी बहुत जरुरत रही होगी? भारत में यह पुरानी बात है कि जब तक हमारा कोई अपना पश्चिम से सम्मानित और अनुशंसित नहीं होता हम उसे तवज्जो नहीं देते? परमुखापेक्षता का यह विद्रूप उदाहरण है।इस  देश को अपनी प्रतिभाओं की न तो पहचान है और न ही कद्र। बेकदरी से जूझते अकुलाये वैज्ञानिक  और दीगर प्रतिभायें  विदेश का  रुख करती हैं। यहाँ प्रतिभाओं पर जंग लगती जाती है।  यहां प्रतिभा पलायन साथ प्रतिभाओं के जंग खाते जाने की विकराल समस्या रही है। 

अब लोगों में आत्मगौरव का जज्बा चढ़ रहा है कि वाह देखो भारत को और एक नोबेल मिल गया -मित्रों, यह सम्मान केवल और केवल सत्यार्थी का है -यह उनकी अतिशय उदारता है जो उन्होंने भारतीयों को इसका उत्तराधिकारी कहा है। सच तो यह है कि भारत का राजनीति और लालफीताशाही से दूषित परिवेश और हमारा चिर आत्मकेंद्रित समाज ऐसे पुरस्कारों की कूवत नहीं रखता -हाँ उसका श्रेय लेने को हम बढ़ चढ़ के दौड़ पड़ते हैं ! बेशर्मी की  हद तक। 

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल!

अभी कल ही नए ब्लॉग संग्राहक ब्लॉग सेतु के संचालक केवल राम जी ने अपने फेसबुक वाल पर मेरे ब्लॉग क्वचिदन्यतोपि का हेडर लगा कर मित्रों से इस नाम पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी। अभी कोई प्रतिक्रिया आयी भी न थी कि सहसा मैंने उसे देख लिया और थोड़ा असहज हो गया। क्योकि एक तो यह शब्द लोगों की जुबान पर सहजता से चढ़ता नहीं है दूसरे अब यह पुराने ज़माने का ब्लॉग हो गया -लोग याद भी काहें रखें। मुझे केवल राम जी की सदाशयता पर किंचित भी संदेह नहीं है फिर मुझे यह भी डर लगा कि कहीं कोई टिप्पणी न आने से मेरी बेइज्जती न खराब हो जाय -लोग कहें कि ई लो देखो बड़े बनते हैं बड़का ब्लॉगर और आज कोई पूछने वाला भी नहीं है -अब हम लाख कहते कि भाई मैं कोई गुजरा वक्त भी नहीं जो आ न सकूँ मगर कोई काहें को मानता। कई मित्रगण तो आज भी गाहे बगाहे मेरी खिंचाई पर ही लगे रहते हैं। अब लोगों को मौका न मिले यही सोचकर मैंने जल्दी से वहां एक झेंपी हुयी टिप्पणी चिपका ही तो दी। अब यह पोस्ट टिप्पणी विहीन तो नहीं रहेगी। शर्मनाक स्थिति से कुछ तो राहत मिलेगी।

बहरहाल कुछ समय बाद ही वहां ब्लॉग शिरोमणि अनूप शुक्ल जी का आगमन हो गया और उन्होंने मेरे सम्मान की कुछ रक्षा कर दी -क्वचिदन्यतोपि के अर्थादि को लेकर मेरे ब्लॉग पोस्ट वहां लगाए -यह अनूप जी की विशिष्ट विशेषता है -ब्लॉग के आदि(म) पुरुषों में से हैं वें और ब्लॉग साहित्य की कालजीविता के लिए प्राणपण से जुटे रहते हैं -दोस्त दुश्मन में कोई भेद किये बिना। और महानुभाव ब्लॉगों के चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया भी हैं अलग। वे इस माध्यम/विधा को आगे ले चलने को सदैव तत्पर रहते हैं। मुझे आश्चर्य है कि उनके इस महनीय योगदान के बाद भी देश के नामी गिरामी पुरस्कार देऊ संस्थायें उन तक क्यों नहीं पहुँच रहीं। अब तो मुझे लगता है अनूप जी को खुद एक बड़का पुरस्कार घोषित कर देना चाहिए -कम से कम बीस पच्चीस हजार का -इतना वेतन तो पाते हैं वे अब कोई लाख सवा लाख रूपये मासिक तो जरूर ही. ऐसे और कई महानुभाव हैं नाम नहीं ले सकता क्योकि उनसे इतनी स्वच्छंदता नहीं ले सकता जितनी अनूप जी से मगर आह्वान है कि वे भी आगे आएं और एक फंड स्थापित किया जाय जो अच्छे युवा ब्लागरों को पुरस्कृत कर सके। मैं भी अकिंचन योगदान दे सकता हूँ। अपने सतीश सक्सेना जी भी इस पुनीत कार्य में पीछे न रहगें!

अब वक्त यही है कि पहली पीढ़ी के ब्लॉगर आएं और इस माध्यम/विधा को प्रोत्साहित करने को अपनी टेंट ढीली करें ताकि ब्लागिंग का टेंट फिर मजबूती से गड जाए। मैं उन मन को बहलाने वाले विचारों से कतई सहमत नहीं हूँ कि आज भी ब्लागिंग की रौनक कायम है, ब्ला ब्ला ब्ला। अब समय है हम अपना आर्थिक योगदान भी सुनिश्चित करें अन्यथा हिन्दी ब्लागिंग पर उमड़ते संकट को देखा जा सकता है। मुद्रण माध्यम में छपास का मोह और फेसबुक इसे ले डूबने वाला है। तो ब्लागिंग के अग्रदूतों का आह्वान है कि वे इस संकट की बेला में कोई ठोस आर्थिक प्रस्ताव लेकर आएं और हम सब मिल बैठ कर उसे कार्यान्वित करें -एक ख़ास ब्लॉग बैठकी इस काज के लिए भी आहूत की जा सकती है। आप सभी के विचार आमंत्रित हैं -खुदगर्जी से तनिक आगे बढ़ें और ब्लॉग बहुजन हिताय कोई ठोस काम करें!

अंतर्जाल ने हमें मौका दिया अपने परिचय के वितान को विस्तारित करने का -आज हम चंद वर्षों में ही कितने परिचय समृद्ध हो चुके हैं। चिर ऋणी हैं अंतर्जाल के जिसने कितने ही सुदूर क्षेत्र और रुचियों के लोगों को एक साथ ही ला खड़ा नहीं किया, आजीवन प्रगाढ़ संबंधों की नींव भी रख दी। हाँ इस मौके पर कुछ मित्र मुझे शिद्दत से याद आ रहे हैं जो अंतर्जाल से छिटक कर दुनिया की भीड़ में खो गए हैं -मगर कोई बात नहीं -कोई तो मजबूरी रही होगी वार्ना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। हाँ अगर उन तक भी यह बात संदेशवाहकों या समकालीन नारदों के जरिये पहुंचे तो उनका भी स्वागत है अगर वे जुड़ना चाहें इस मुहिम में! अज्ञात रहकर भी लोग यथायोगय गुप्तदान कर सकते हैं।

केवल राम जी, आप से बस इतना ही कहना कि आप की युक्ति कामयाब रही। गांडीव उठवा दिया आपने और अनूप जी आपको भी शुक्रिया कि क्वचिदन्यतोपि के बंद करने की (मिथ्या ) घोषणा करके आपने मुझे प्रतिवाद करने को उकसा दिया। मगर मेरे प्रस्ताव पर ध्यान जरूर दीजिये और मित्रगण भी अपने विचार यहाँ प्रगट करें और कुछ दान दक्षिणा दे सकते हों तो सलज्ज /निर्लज्ज होकर कहें भी -क्योकि यह हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल है।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

पारम्परिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया: नए आयाम, नई चुनौतियां! ( परिप्रेक्ष्य: हिन्दी दिवस)


मानव के विकास में उसके शिकारी जीवन के आदि हुंकरणों से शुरू हुई अभिव्यक्ति की महायात्रा के भाषाई पड़ावों का अध्ययन बहुत रोचक है। मनुष्य ने संवाद की दिशा में संकेतों/शिकारों ,हाव भाव(gestures ) का सहारा लेते हुए भाषिक संवाद की भी जो क्षमता विकसित की वह समूचे जीव जगत की अनूठी घटना है। एक सामजिक प्राणी के रूप में भाषाई ईजाद ने बोलियों वाक्यों की संरचना मार्ग प्रशस्त किया और मनुष्य आपसी संवाद समन्वय से विकास की एक अनन्य मिसाल कायम कायम की। अब उसके पास भावों के आदिम प्रगटन की भाव भंगिमाओं और अभिव्यक्ति के शैल चित्रीय या भोजपत्रीय माध्यमों के अलावा एक तेजी से विकसित हो रही भाषा का भी सहारा था जिसमें विश्व के प्राचीनतम वैदिक साहित्य की वाचिक और श्रुति परम्परा से आरम्भ होकर आज के डिजिटल मीडिया तक का इतिहास समाहित है। वाचिक / श्रुति परम्पराओं से आगे लेखन और मुद्रण तक का इतिहास सहज ही ज्ञेय है। मुद्रण माध्यमों ने जहां समाचार पत्र पत्रिकाओं,पुस्तको के जरिये जन संवाद का नया अध्याय शुरू किया वहां प्रसारण माध्यमों में दृश्य और श्रव्य दोनों तरीकों का खूब विकास हुआ -सिनेमा और आकाशवाणी ने जन संवाद की नई मिसालें कायम की। मीडिया के इन विविध रूपों से आम समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तरह तरह आशंकाएं भी उठती रही हैं।
मीडिया और जन मानस

मीडिया के बारे में अक्सर यह बात कही जाती रही है कि वह जन विचारों को प्रभावित कर सकती है और समूह 'ब्रेन वाश' करने में भी सक्षम है। यहाँ तक कि विचारों को भी एक केंद्रीय कंट्रोल /कमांड के जरिये संचालित और नियमित भी किया सकता है. इन कथानकों पर कई कई साइंस फिक्शन फ़िल्में और उपन्यास आधारित हैं जो जनमानस और मीडिया के पारस्परिक अंतर्सबंधों की विविध संभावनाएं प्रगट करते हैं। जार्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 1 9 8 4 में 'बिग बास इज वाचिंग यू' जैसे दहशत भरे तकनीकी दुरूपयोग की ओर इशारा किया था। विगत डेढ़ दशक से नई मीडिया -डिजिटल मीडिया का वर्चस्व दिन दूनी रात चौगुनी दर बढ़ा है जिसकी ऑफशूट है -सोशल मीडिया। सोशल मीडिया कम्प्यूटर क्रान्ति की देन है। डिजटल दुनिया का एक नया जिन! अब सोशल मीडिया की लोक गम्यता क्या क्या गुल खिला रही है यह छुपा नहीं है. खाड़ी देशों की सद्य संपन्न जन क्रांतियाँ गवाह हैं। अभी संपन्न सामान्य निर्वाचन में भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हुआ है। जिसके जन प्रभावोत्पादकता के मुद्दे पर बहस अभी भी जारी है।

चिट्ठे और सोशल मीडिया

अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके।

क्या हिन्दी ब्लॉगों के अवसान की बेला आ गई ?

लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान आ पहुंचा है? -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता। हाँ यह जरूर हुआ कि कई रचनाकारों को ब्लॉग और फेसबुक के चलते पारम्परिक मुद्रण मीडिया में पहचान मिली और उन्होंने इस नए मीडिया को लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया। किन्तु अंतर्जाल पर अपने चुटीले कार्टूनों से ब्लॉग जगत में विशिष्ट पहचान बनाने वाले काजल कुमार का कहना है कि "ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती मेढक आते-जाते ही रहते हैं." अखबार भी जन मानस में पैठ बनाये हुए हैं। हाँ व्यापक रीडरशिप पाने के लिए कई मीडिया समूह अब अंतर्जाल पर भी जाकर अपना वर्चस्व बना लिए हैं।

डिजिटल डिवाईड

अंतर्जाल की सुविधा सहूलियत कितनो के पास है ? यह सवाल मौजू है। कितने लोगों के पास कम्प्यूटर और कनेक्टिविटी है ? बिजली की क्या उपलब्धता है -यही वे कारण हैं जिनसे यह आशंका बलवती हुयी की तकनीकी संचार से दो तरह की दुनिया वजूद में आ रही है -एक जिसके पास अंतर्जाल तक की पहुँच है और एक जिसके लिए अभी भी अंतर्जाल एक स्वप्न है -समाज में विषमता की एक नयी खाईं गहराती नज़र आ रही है -और जन सुविधाओं का आबंटन भी कहीं इस डिजिटल डिवाईड पर आधारित न हो जाय ? वह प्रौद्योगिकी ही क्या जो जन सुलभ और बहुजन सुखाय बहुजन हिताय न हो ? ये सारे सवाल आज विचार मंथन के मुद्दे बने हुए हैं। यह सही है कि पारम्परिक मीडिया भी ऐसी सम्भावनाओं की आहट पाकर अब अपने को अंतर्जालीय संस्कृति की ओर मोड़ रहा है मगर यह भी सच है कि अंतर्जाल तक अभी भी जान सामान्य की पहुँच नहीं हो पायी है। मगर सोशल मीडिया ने एक संचार क्रान्ति का बिगुल जरूर फूँक दिया है!

फेसबुक का बढ़ता वर्चस्व

फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को आंक नहीं पाए थे जबकि इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का ध्यान आकर्षित किया गया था। आज भी यह बल देकर कहा जा सकता कि कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं . वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

नाम अनेक काम एक 
दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते!

पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ . आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग अपने कंटेंट/ फीड की नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर! ...ऐसी अफवाहें और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है .

इंटेलिजेंट मशीनें
तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें भी आ धमकने वाली हैं जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!


आज सोशल मीडिया अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी संपर्क /अभिव्यक्ति से ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ चुका है .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों/फेसबुक आदि का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब यह अभिव्यक्ति के एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

माध्यम या विधा
विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी ) एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही सोशल मीडिया में लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ? -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत एक ही समय आये ऐसा जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं..
निष्पत्ति
सोशल मीडिया का लेखन ऐसी ही कुशलता की मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है सोशल मीडिया में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग भी एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के तकनीक के सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ ब्लॉग? ....

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान

विगत लगभग एक साल से नारी अस्मिता और सम्मान को तारतार करने के ऐसे अप्रिय और शर्मनाक मामले मीडिया के जरिये चर्चित हुए हैं कि हमें खुद के सभ्य  होने पर शंका होने लगी है।  सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि कठोर दंड के प्रावधानों के बावजूद भी इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है। ऐसा नहीं  है कि ये मामले अशिक्षित, गंवार और जाहिल लोगों के बीच के हैं बल्कि नारी की अस्मिता से खिलवाड़ का आरोप लोकतंत्र के लगभग सभी स्तम्भों के नुमाइंदों पर लगा है -जज ,विधायक-सांसद  ,अधिकारी और पत्रकार सभी इस के दायरे में है जो खासे पढ़े लिखे और शिक्षित हैं। आखिर सामजिक स्थापनाओं की एक अहम् कड़ी बल्कि कर्णधारों  पर ऐसे आरोपों  का सबब क्या है ?

.... और आधी दुनिया पर भारत में यह क़यामत क्यों बरपा हुयी है। इस अत्यंत ही विषम समस्या के  पहलुओं पर गहन विचार विमर्श और उनके कारणों और निवारण पर उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यवाही समय की मांग है।  मात्र  कानूनी प्रावधान -दंड व्यवस्था के बल पर इससे निजात मिलना मुश्किल लगता है।  इस समस्या के मूल कारणों के सभी सामाजिक ,आर्थिक और जैवीय पहलुओं को गम्भीरता से समझना होगा।  मीडिया ट्रायल या नारी समर्थकों की अति सक्रियता भी इसे प्रकारांतर से उभार ही रही हैं ऐसा लगता है। 

 मुझ पर अपनी बातों की बार बार पुनरावृत्ति के आरोप की कीमत पर भी जैवीय पहलुओं को यहाँ इंगित करना मैं जरूरी समझता हूँ -नारी का प्राचीन मानवीय सभ्यता में घर के भीतर तक सीमित रहने का रोल सभ्यता की प्रगति के साथ तेजी से बदला है।  अब नारी का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहकर उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत हो चला है -डेजमांड मोरिस जैसे विश्व प्रसिद्ध जैव व्यवहार विद के शब्दों में कहें तो नारी अब पुरुष के बाहरी विस्तृत  "आखेट के मैदान " में उसकी बराबर की सहभागी बन रही है।  यह एक बड़ा रोल रिवर्जल है। उसका नित एक्सपोजर अब एक बड़े " आखेट के मैदान" में हो रहा है।  और यहाँ उसका सामना विभिन्न हैसियत के पुरुषों से हो रहा है। 

मनुष्य का विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। पुरुष ऐसे जैवीय आकर्षणों या यूं कहिये "जैव कांपों" (बायो ट्रैप ) से बच नहीं पाता, सहज ही फंसता है ।  इस मामले में उसका आचरण ज्यादा मुखर  होता है।  प्रकृति ने उसे सम्भवतः ऐसा ही बनाया है क्योंकि ऐसा होने में उसके सामने कोई जैवीय या सामाजिक रिस्क नहीं है।जबकि नारी का लम्बा प्रसव काल और  शिशु के लम्बे समय तक पालन पोषण उसके लिए सबसे बड़ा बंधन है , इसलिए प्रकृति ने उसे विपरीत सेक्स के प्रति जब तक कि उसकी संतति के लालन पालन के लिए एक जिम्मेदार सहचर न मिल जाय प्रायः उदासीन ही बना रखा है।  मगर पुरुष की ऐसी  किसी बाध्यता के न होने से उसके यौनिक आग्रह प्रायः ज्यादा मुखर होते हैं।  यह एक बड़ी असहज स्थिति है.  जानवरों में तो मादा के चयन के लिए बाकायदा भयंकर शक्ति का प्रदर्शन होता है और जो सबसे बलिष्ठ होता है वही मादा को हासिल करता है।  वहाँ  पूरी तरह जैवीय -कुदरती व्यवस्था लागू है। मगर मनुष्य ने शादी विवाह के कई सामाजिक पद्धतियों को वजूद में ला दिया है।   वह आज भी एक तरह से अपनी उसी आदि आखेटक की भूमिका और बलिष्ठ नर होने का गाहे बगाहे प्रदर्शन का 'कु -प्रयास' कर बैठता है। 
 
 मनुष्य ने विकास क्रम में अपनी एक सामाजिक व्यवस्था  विकसित की है और कई कायदे क़ानून बनाये हैं।  स्त्री पुरुष के ऐसे ही जैवीय लिहाज से भी अनुचित संसर्गों से बचने के लिए धर्म में  स्त्री के पर्देदारी ,यौनिक दृष्टि से परिपक्व विपरीत लिंगियों यहाँ तक कि पिता पुत्री तक के एकांतवास पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।  धार्मिक साहित्य में स्त्री से दूर रहने के लिए ऐसे तमाम निषेध हैं और उसे जानबूझकर कर दुखों और अपयश की खान तक कह  डाला गया है।  कहा गया है कि नारी संसर्ग/प्रसंग पुरुष के ज्ञान -बुद्धि सभी को नष्ट भ्रष्ट कर देने वाला है।  इसका अभिप्राय केवल यही लगता है कि विज्ञ जन नारी से दूर रहें -उनके आकर्षण से बचें।  

पूरी दुनिया में नारी के पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर चलने के चलन ने हमें 'सभ्य युग' के  कई शिष्टाचार के पाठ भी पढ़ाये हैं।  कंधा से कंधा मिलाना महज एक अलंकारिक उक्ति है जबकि सामाजिक रहन सहन में उंगली भी छू जाय तो शिष्टाचार का तकाजा है कि तुरंत सारी बोला जाय।  मगर बायोट्रैप का क्या कहिये, बसों रेलों में ईव टीजिंग की घटनाएं होती रहती हैं।  जाहिर है पुरुषों के लिए जैव कांपों से खुद को बचने का सलीका अभी आया नहीं है।  बहुत प्रशिक्षण और कठोर पारिवारिक संस्कारीकरण की जरुरत बनी हुयी है. ऐसे में कार्य स्थल जो मनुष्य के आदिम आखेट स्थलों के नए स्वरुप हैं में नारियों को भी कई सुरक्षा और सावधानियों का अपनाना जरूरी है। यहाँ मैं नारीवादियों की उन्मुक्त रहन सहन के बड़े दावों से सहमत नहीं हूँ।  अनेक दुखद घटनाएं हमें बार बार चेता रही हैं कि आज कार्यस्थलों पर नारी के भी आचरण को मर्यादित रखने के प्रति सजग होना होगा। अनावश्यक प्रदर्शनों जिसके कि अनजाने ही गलत अर्थ -जैवीय संकेत निकलते हों के प्रति सावधानी अपेक्षित है।  

पुरुषों के लिए तो खैर कार्यस्थलों पर आचार विचार के लिए कठोर दण्ड के कानूनी प्रावधान लागू हो ही गए हैं मगर साफ़ दिख रहा है कि इससे भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।  इस समस्या की जड़ें कही और है और हम  कहीं और समाधान के प्रयास कर रहे हैं।  भारत में कार्यस्थलों पर विशाखा प्रावधानों के लागू होने के बाद तो स्थिति पुरुष सहकर्मियों के लिए काफी निषेधात्मक और चेतावनीपूर्ण हो गए हैं।महिला सहकर्मी के किस हाव भाव या उपक्रम को गलत समझ कर प्रतिवाद हो जाय यह भी असहज सम्भावना बनी हुयी है।  इसलिए आज पुरुष सहकर्मियों को भी कार्यस्थलों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरुरत है। बस काम से काम उनका मंतव्य हो, जैवीय 'काम' से बस दूर से ही नमस्कार! अन्यथा बस फजीहत ही फजीहत है। नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान! 

रविवार, 3 नवंबर 2013

देहाती औरत!

कहते हैं कुछ दिनों पहले नवाज शरीफ ने अपने प्रधान मंत्री को देहाती औरत कह दिया जो कथित तौर पर रोज रोज पाकिस्तान को लेकर ओबामा के पास जाकर रोना रोते रहते हैं। इस पर तरह तरह की समीक्षायें ,टीका टिप्प्णियां और भाष्य हुए . मोदी ने इस बात की निंदा की . बात आयी गयी हो गयी . मगर अभी कल ही एक बिहारी नेता ने अपने मुख्यमंत्री नितीश जी को भी देहाती औरत कह दिया जो मोदी को लेकर निंदा पुराण बाँचते रहते हैं . कहा गया कि नितीश मोदी से इर्ष्या रखते हैं . आखिर देहाती औरत से अभिप्राय क्या है ? बिहार से लेकर पाकिस्तान तक के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में यदि देहाती औरत से कोई समान अभिप्राय निकलता हो तो यह एक महत्वपूर्ण विवेचन का विषय निश्चित ही है .

मेरा लालन पालन और एक उम्र तक निवास भी ग्रामीण परिवेश में ही हुआ है . अब भी छठे छमासे गाँव आना जाना होता रहता है और सेवा निवृत्ति के बाद गाँव में ही बस जाने का प्लान है . देहाती औरत का विशेषण मेरे भी समझ में बिल्कुल बेजा ही नहीं है . सभी नहीं मगर गाँव की ज्यादातर औरतों में मैंने सहजता का ज्यादा आग्रह देखा है .शहरों का मिथ्याचरण (सोफिस्टिकेशन) उनमें नहीं होता . सभी मानवीय आवेग -गुस्सा, प्रेम,घृणा और द्वेष और उनका प्रगटीकरण उनमें अपने मौलिक रूप में देखे जा सकते हैं . वे जबर्दस्त झगड़ालू ,स्नेहमयी ,प्रेममयी सब हैं . गालियां देने में भी उनकी कोई सानी नहीं है . बहुत सहज होकर वे 'सुभाषितम' का धड़ल्ले से आपसी विनिमय करती हैं . जैसे कोई अनुष्ठान का धाराप्रवाह मंत्रोंच्चार हो रहा हो . मैं तो आज भी इस अनुष्ठानिक कलरव से लज्जावश नेपथ्य में हो लेता हूँ . कहीं कोई यह न देख ले कि मैं इस नारी -निनाद का रससिक्त श्रवण कर रहा हूँ .

देहात की औरतों की इस सम्भाषण स्पर्धा में लैंगिक विशेषणों का धड़ल्ले से प्रयोग होता है जो कभी कभी मुझे उनकी यौन विषयक कुंठाओं का आभास सा देता है और बहुत सम्भव है कि उनके दैनिक सम्भाषण से उनकी कतिपय कुंठाओं का कुछ शमन भी हो जाता हो . इसके अलावा गाँव की ज़िंदगी अभावों की और काफी श्रम साध्य होती आयी है तो  उनसे मनोमुक्ति के लिए भी कोई मनोरंजन और टाईम पास चाहिए सो एक गाली गलौज के संवाद का सेशन भी क्यों न हो? मेरी एक अंतर्जालीय घनिष्ठ मित्र ने उत्कंठा वश मुझसे कभी उन लैंगिक विशिष्टियों युक्त गालियों को बताने को  कहा था जो प्रायः ग्राम्य वधुओं द्वारा इस्तेमाल में आती हैं -मैं उन्हें संकोचवश बता नहीं सका था . आपके मन में कौतुहल हो तो मुझे अलग से मेसेज कर सकते हैं -एक और कोशिश कर सकता हूँ . अब तो टेलीविजन आदि के बढ़ते प्रभाव में गाँव की औरतें भी मिथ्याचरण अपनाने लगी हैं -तथाकथित 'सभ्य' होने लग गयी हैं . और गालियों आदि के विनिमय के बजाय शिष्टाचरण से काम लेने लगी हैं . अब तो मुझे यह लगने लग गया है कि गाँव की औरतें 'तो शिष्ट' होने लग गयी हैं मगर शहर की औरतें अब आदिम होने लगी  हैं .

तो गावं की औरतों में लगाने बुझाने(झगड़ा ) ,चुगली करने , ईर्ष्या करने के आदिम मानवीय भावों के भी होने के आरोपण हैं -मंथरा आदि के चरित्र यूँ ही वजूद में नहीं आये। मगर मैं यह मानता आया हूँ कि गाँव की औरतें बहुत भोली होती हैं ,मुंहफट तो होती हैं मगर दिल की साफ़ होती हैं . जीभ भले कलुषित हो, ह्रदय निष्कपट होता है . निहायत भोली ऐसी कि कोई भी चंट आदमी उन्हें छल सकता है . चंटों के सामने वे कत्तई भी महफूज नहीं रह पातीं . यह ग्राम्य भोलापन मैंने कई शहरी नारियों में भी देखा है -भले वे शहरी हो गयी हों मगर मन उनका ग्राम्य बोध लिए ही होता है . कैलाश गौतम जी की एक कविता की पंक्ति अकस्मात याद हो आयी है जो गाँव की औरतों के भोलेपन को इंगित करता है -

उसको शायद पता नहीं वह गाँव की औरत है
इस रस्ते पर आगे चल के थाने पड़ते हैं .......

रविवार, 18 अगस्त 2013

हिन्दी ब्लॉगर अपना विरोध अवश्य दर्ज करें!


इन्डिब्लागर से मेलबाक्स में प्रायः आने वाले मेल का मजमून एक दिन अलग सा था -इन्डिब्लागर पुरस्कारों के लिए ब्लॉग आमंत्रण की घोषणा की गयी थी .वैसे मैं खुद को पुरस्कार सम्मान के लिए कभी नामांकित नहीं करता और इसका कारण कोई दंभ इत्यादि नहीं बल्कि काम करते जाने को ज्यादा महत्वपूर्ण मानता आया हूँ.  मगर उस दिन कुछ तो जरुर मन में विचलन सा हुआ और मैंने सीधे साईंस से जुड़े वर्गों को ढूंढ कर अपने एक ब्लॉग साईब्लाग को नामांकित कर दिया और फिर भूल गया -कोई प्रमोशन वगैरह भी नहीं किया .वैसे भी मेरे इस ब्लॉग का इंडीरैंक 58 पर आ पहुंचा है जबकि क्वचिदन्यतोपि का 82 है . बुद्धिमानी तो यह थी कि मैं  क्वचिदन्यतोपि को नामंकित करता मगर मन में चूंकि हमेशा विज्ञान संचार का भूत सवार रहता है अतः साईब्लाग का नामांकन करके  मन को संतुष्ट कर लिया . बीच बीच में एकाध मित्रों के अनुरोध आये तो जाकर उनकी सिफारिश भी कर दी  -निःस्वार्थ और निरपेक्ष।   एक मित्राणी ब्लॉगर ने तो यह भी फिकरा कसा कि जहाँ आप और अनुराग शर्मा जी जैसे धुरंधर नामित हों वहां और किसकी दाल गलेगी? -मैंने निर्विकार भाव से यह ताना भी सुन लिया -बाद में देखा कि देवि ने अपना भी ब्लॉग नामंकित कर दिया है :-) हाँ यह नहीं देखा कि  अनुराग जी   ने अपना कोई ब्लॉग नामांकित किया है या नहीं . वैसे तब मन में यह बात भी आयी थी चलो अनुराग जी ने अगर कोई ब्लॉग नामांकित किया है तो मेरा भी औचित्य सिद्ध हो गया और मन में कहीं छिपा एक अपराध बोध सा भी कम हो गया। बाद में तो कई अन्य सम्मानित ब्लागरों के नामांकन से अपराध बोध बिलकुल ही उड़न छू हो गया। इन्डिब्लॉगर वालों के प्रति एक सम्मान का भाव भी जगा और अब भी है कि ये ब्लागिंग को बढ़ाने के लिए कितना श्रमशील हैं।  बहरहाल बात आयी गयी हो गईं.
अभी उस दिन जब पुरस्कार परिणाम आये  तो बड़ी मजेदार बात  हुई -खुशदीप जी जिन्हें सम्मान शब्द से ही घोषित घृणा रही है इन्डिब्लागर से सम्मानित/पुरस्कृत हो गए थे . अब उन्होंने अपना नामांकन तो किया ही होगा न? परिकल्पना सम्मान को तमाम धरहरिया (Persuasion) और चिरौरी के बाद भी ठुकरा देने वाले और अभी अभी ताऊ टी वी पर सम्मान शब्द से चिढ होने का उद्घोष करने वाले अपने खुशदीप भाई अब सम्मान की वरमाला पहन चुके थे! खुशदीप भाई मुझ पर नाराज होने के बजाय उन कारणों को जरुर बताने  का कष्ट करेगें जिसने उन्हें  इस सम्मान को सम्मानित करने का फैसला लेने को प्रेरित किया था. या फिर मेरी ही तरह यह एक क्षण के मन विचलन से हुआ यह उनका भी एक प्यारा सा गुनाह था :-)  यह बात कोई और ब्लॉग जगत  में उनसे  पूछे या न  पूछे मगर मैं इसकी धृष्टता जरुर कर रहा हूँ । क्षमायाचना के साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि उनके  बारे में लोगों के मन में कोई दुराव न रहे इसलिए यह अप्रिय निर्णय लेना पड़ा ।
 हिन्दी को रीजनल लैंग्वेज तक ही दिखाने की मानसिकता?
 बहरहाल यह पोस्ट इस मुद्दे पर लिखी नहीं जा रही। मामला तो दूसरा है जो बहुत गंभीर है। खुशदीप जी के साथ एक शाम मेरे नाम वाले मनीष जी का ब्लॉग है जो पुरस्कृत हुआ  है। देशनामा के साथ यह भी मेरी पसंद का ब्लॉग है, मैंने इन दोनों ब्लागरों को तुरंत बधाई दी मगर सहसा एक बात मुझे खटक गयी।  मनीष जी ने अपना ब्लॉग एक ऐसी कटेगरी में नामित किया था जो मेरी नज़र में आया ही नहीं था।  यह कटेगरी इन्डिब्लॉगर वालों के एक अजीव सी सोच का परिणाम है जो आज भी जानबूझ कर हिन्दी को निचले स्तर पर रखने को उद्यत रहती है -रीजनल लैंग्वेज कटेगरी  में हिन्दी को रखा गया था ।  मनीष जी ने अपना ब्लॉग इसी कटेगरी में नामांकित कर दिया।  हालांकि  हिन्दी कई प्रान्तों की आंचलिक राजभाषा भी है किन्तु उसका असली या मुख्य स्टेटस पूरे भारत संघ की राजभाषा का है. यह भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाले भाषा (लिंगुआ फ्रैन्का) तो है ही यह विश्व में  सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में छठवें नंबर पर है. मैं सभी भाषाओं का सम्मान करता हूँ -अंग्रेजी विश्व की खूबसूरत भाषाओं में से एक है। और भारत में संवैधानिक रूप से भी हिन्दी और अंग्रेजी को समान दर्जा दिया गया है और पूरे भारतीय यूनियन की दोनों ही  राजभाषायें है।  मगर खामी हमारी गुलामी की सोच उस अंग्रेजियत की है जो हिन्दी को अंग्रेजी के सामने अपमानित करती आयी है निरंतर पददलित करती रही है।  यह आपत्तिजनक है. हमें निरंतर इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए।  खुशदीप जी और मनीष जी का आह्वान करूँगा कि हिन्दी के अपमान की इस प्रवृत्ति के विरोध में वे सम्मान सहित इस पुरस्कार को लौटा  दें -खुशदीप भाई, कोई सम्मान लेने से छोटा नहीं हो जाता बल्कि बड़े सम्मान को लौटा कर और भी बड़ा बन जाता  है।और इन्डिब्लागर का यह सम्मान कोई इतना बड़ा भी नहीं है यह आप स्वयं यहाँ   कह रहे हैं(अरविंद जी फिक्र मत कीजिए इस अवार्ड मे मिलना-विलना कुछ नहीं है)  तो लौटाईये इसे और उन्हें एक सन्देश दीजिये। 
टुच्ची राजनीति  और हमारे नेताओं की कमजोर इच्छाशक्ति  के चलते हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई.राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है।किसी भी देश की  विभिन्न भाषाओं में से कोई एक  अपने गुण-गौरव, साहित्यिक अभिवृद्धि, जन-सामान्य में अधिक प्रचलन / लोकप्रियता आदि के आधार पर राजकार्य के लिए भी चुन ली जाती है और उसे राजभाषा के रूप में या राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाता है।  वह अधिकाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा होती है। प्राय: राष्ट्रभाषा ही किसी देश की राजभाषा होती है जो यहाँ हिन्दी है ।यह जन जन की भाषा है -इसका अपमान कोई भी सच्चा राष्ट्रवादी कैसे सहन कर सकता है। आगे भी पुरस्कार दाता भामाशाहों से गुजारिश होगी कि वे पहले हिन्दी को अपनी घोषित श्रेणियों में सम्मानजनक स्थान दें जिसकी वह हकदार है। हाँ बंगला या कन्नड़, तेलगू  आदि भाषाओं को भी पृथक श्रेणी देने में कोई गुरेज नहीं क्योंकि की ये भी हमारी प्यारी और समृद्ध भषाएँ हैं मगर हिंदी को मात्र एक प्रांतीय भाषा के रूप में ही प्रदर्शित करने की सोच स्वीकार्य नहीं है। संविधान की आठवीं अनुसूची का तर्क कब तक चलता रहेगा -यह पूरे देश की राजभाषा है यह तथ्य पीलियाग्रस्त आँखों को नहीं दिखता? आह्वान है हिन्दी ब्लॉगर अपना विरोध अवश्य दर्ज करें और आगे से ऐसे कुचक्रों से सावधान रहें।  

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

कहीं आप तो पत्नी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं कर रहे हैं ?

यह पोस्ट उन जोड़ों (पति पत्नी) के लिए हैं जिन्हें कई कारणों से,मुख्यतः आर्थिक परिस्थितियों के चलते जीवन में एकाधिक बार एक दूसरे से अलग थलग जीवन यापन के लिए मजबूर होना पड़ता है।  कभी गमन फिल्म का एक गीत(ठुमरी) मुझे बहुत संवेदित कर जाता था -आ जा साँवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, स के भरे तोरे नैन.…। जिस पार्श्वभूमि यह ठुमरी दर्शायी गयी है उसमें जीवनयापन की विभीषिका से जूझते मुंबई पहुंचे  एक ग्राम्य युवा का सामने से ट्रेनों का अपने 'मुल्क' ' की ओर विवश सा गुज़रते देखना और अपनी सद्य परिणीता पत्नी की याद का मार्मिक चित्रण है. यह ठुमरी मेरे लिए इसलिए भी यादगार बन गयी है क्योंकि मैं उन दिनों दो वर्षीय विभागीय ट्रेनिंग पर था और परिवार पैतृक निवास जौनपुर में था।मैं चाहकर भी दो वर्षों के लिए परिवार मुम्बई न ले जा सका था। भोजपुरी के कितने ही लोकगीत गीत, विरहा,कजरी  आदि ऐसे ही वियोग -विछोह से ही उपजे हैं -वियोग और विरह तमाम गीतों के मूल स्थायी भाव है।  
भारत की एक बड़ी त्रासदी आर्थिक संकट की भी है जिससे आधी से अधिक आबादी आज भी जूझ रही है।  लोगों को इस आर्थिक संकट से उबरने के लिए रोजी  रोटी की तलाश में दूर दूर तक निकलना पड़ता है इसके बावजूद कि उनका व्याह हो चुका होता है और अर्धांगिनी को छोड़ उन्हें कमाई के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की तो यह एक  आम राम कहानी है।  पहले जमीदारों के कहर से भी नव विवाहित युवा गाँव से पलायन करता था और पत्नी को भगवान के भरोसे छोड़ जाता था।  ऐसे तमाम कथानकों पर फ़िल्में भी बन चुकी हैं। युद्ध के लिए सैनिकों को भी यह अमानवीय विछोह की स्थिति झेलनी पड़ती है।  समूचे विश्व में सीमा पर तैनात सैनिकों को यह दारुण व्यथा उठानी पड़ती है।  
मुझे यह बड़ा कारुणिक लगता है। मैं इस स्पष्ट मत का हूँ कि पति पत्नी को लम्बे विछोह में नहीं रहना चाहिए।  इस पहलू को हर नियोक्ता, वेलफेयर राज्य को अवश्य सोचना चाहिए। हाँ कुछ सेवाओं में यह व्यवस्था दी गयी है कि नौकरी शुदा जोड़ों को यथा संभव साथ साथ रहने दिया जाय। मगर जिनकी पत्नियां नौकरी नहीं करतीं उन्हें  क्या अनिवार्यतः दूर दूर होने को अभिशप्त होना चाहिए? इस पर सरकारी व्यवस्थायें  मौन है. जर्मनी में  शादी करते ही वेतन  परिलब्धियां बढ़ जाती हैं।  पारिवारिक भत्ता स्वीकृत कर दिया जाता है।  मगर यहाँ राज्य या केंद्र सरकारों में अभी भी इस व्यवस्था की दरकार है कि पत्नी/बिना नौकरी कर रही गृहिणी  को साथ रखने पर अतिरिक्त/पारिवारिक भत्ता दिया जाय.  यह शायद कभी विचारणीय भी नहीं रहा है . आखिर वेलफेयर स्टेट की  यह कोई प्राथमिकता नहीं होने चाहिए है? बल्कि यह तो अनिवार्य होना चाहिए कि पति पत्नी साथ साथ रहें।  मैंने अपने सेवाकाल में देखा है कि अनेक कर्मी बिना पत्नी को साथ रखे पूरी नौकरी काट देते हैं -बड़ा आश्चर्य भी होता है उन पर! क्या परिस्थितियाँ सचमुच ऐसी अमानवीय स्थिति को जन्म देती हैं ? फिर जीवन संगिनी का तमगा आखिर क्यों ? 
यहाँ भी राम का आदर्श है-चौदह वर्ष के वनवास में वे पत्नी को साथ ले गए।  जबकि परिस्थितियाँ बहुत विपरीत थीं -राजा  दशरथ मरणासन्न थे.…… सीता को उनकी सास माओं से उस समय अलग कर अपने साथ ले जाना राम का सचमुच एक बड़ा ही दृढ़ निर्णय था। मगर उन्होंने लिया। राम के इस निर्णय का मेरे मन में बहुत सम्मान है. पत्नी को दूसरों के सहारे, भले ही वे अपने परिवारी जन ही क्यों न हों छोड़ जाना बहुत ही अमानवीय है। हर वो शख्स  जो परिणय सूत्र में  बंधा हो यथासम्भव पत्नी को अपने साथ रखना चाहिए।  मेरे युवा मित्रों, सुन रहे हैं न आप? बहुत से लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कई अन्य अप्रत्यक्ष कारणों से पत्नी को सेवाकाल में कहीं और छोड़े रहते हैं। अपने सेवाकाल में मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है और उनसे जिरह भी की है और अधिकाँश मामलों में पाया है कि पत्नी को दूर रखने के उनके आधार संतुष्ट करने वाले नहीं थे। पति पत्नी को साथ साथ रहने का एक अन्य  पहलू भी है मगर उसकी चर्चा शायद इस पोस्ट की गंभीरता को कम कर देगी।  
कहीं आप तो पत्नी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं कर रहे हैं ? 

मंगलवार, 25 जून 2013

वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

अभी पिछले दिनों जब मैंने फेसबुक पर एक अपडेट किया तो अनुमान नहीं था कि उसका एक खौफनाक  परिणाम सामने आ जाएगा .अविनाश वाचस्पति जी को लगा कि वह अपडेट मैंने उन पर किया है और उन्होंने अपने ब्लाग्स को हमेशा के लिए ब्लाक कर दिया और मात्र फेसबुक पर बने रहने की घोषणा कर डाली। पहले तो आप मेरे उस अपडेट को पढ़ लें और चाहें तो एक नज़र आई टिप्पणियों पर भी डाल लें। वह कमेन्ट यूं था " एक हिन्दी ब्लॉगर ने डिजिटल मीडिया से शोहरत हासिल की और इस टटकी शोहरत को अब प्रिंट मीडिया में कैश कर रहे हैं -मजे की बात यह कि प्रिंट मीडिया में अपने छपे आलेखों को फिर से डिजिटल मीडिया में मित्रों से साझा कर रहे हैं मानो यह धौंस देना चाह रहे हों कि देखो तुम लोग लल्लू ही बने रहे और मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया ....ये उनकी आत्म विस्मृति के दिन हैं -एक दिन लौट के आना यहीं है! वैसे दोस्तों की मेहरबानी से अभी पूरी तौर से यहाँ से गए भी नहीं हैं ! बूझिये कौन ?"
दिनेश द्विवेदी जी ने अपनी प्रतिक्रिया यूं व्यक्त की थी -"ब्लागिंग में बहुत तरह के लोग आए और आते रहेंगे। बहुत वे भी हैं जो सरोकार और प्रतिबद्धता का अर्थ नहीं समझते। बहुत लोग हैं जिन के लिए अपना नाम चित्र अंतर्जाल पर लिखा, अखबार में छपा देखना और मौका लगे तो दो-चार सौ रुपए रोज बना लेना ही सरोकार और प्रतिबद्धता है। आप तो ब्लागरों की कहते हैं। अखबारों के कथित कालमों के कलमघिस्सू बनने के लिए बहुत से अच्छे  कलमकार बरबाद हो चुके हैं......जिस दिन ब्लागिंग का झण्डा एडियाँ उचका उचका कर ऊँचा किया जा रहा था। हम तब भी जानते थे कि एडियाँ उचकाने वाले जल्दी ही ब्लागिंग से भाग सकते हैं। वैसे भी वे ब्लागिंग के जरिए किताबों अखबारों की दुनिया में प्रवेश कर रहे थे। उद्देश्य तो किताबों और अखबारों की दुनिया ही था। जो लोग अपने ब्लागों के अखबारों में छपे अंश को ऑस्कर की तरह अपने ही ब्लाग पर लगा रहे थे उन से भी यही अपेक्षा थी और है। क्यों कि उन के साध्य का साधन ब्लागिंग बन रही थी।"
पता नहीं आप मित्रों में से कौन अभी भी फेसबुक पर आबाद नहीं हुआ है मगर फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी  पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि मैं उन्हें दोष नहीं देता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को  आंक नहीं पाए थे जबकि मैंने इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का  ध्यान आकर्षित किया था। आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ....

सचमुच फेसबुक की अब ब्लॉग से कोई तुलना ही नहीं रह गयी है .यह अलग बात है कि मुझ जैसे कई ब्लॉगर अभी भी अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे  हुए हैं -अब जैसे मुझे तो अभी भी किसी के लौट कर आने का शिद्दत से इंतज़ार है -जिससे यहीं पहली मुलाक़ात हुयी थी तो यह मेरे लिए मुक़द्दस जगहं है -मैं कयामत तक उनका यहीं इंतज़ार करूँगा! अब अनूप शुकुल वगैरह यहाँ क्यों टिके हुए हैं यह तो वही जानें अन्यथा अब इस पुराने शुराने माध्यम में रखा ही क्या रह गया है। वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं! 

बहरहाल यह  हेतु नहीं था इस पोस्ट का ..मैं एक दूसरी बात कहने आया था। दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं   .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर  लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते! हाँ अगर मुद्रण माध्यम कुछ मानदेय आदि दे रहे हों तो बात कुछ समझ में आती है। मगर इसके लिए ब्लॉग लेखन को तिलांजलि दे दी जाय बात समझ में नहीं आती .हम केवल चंद  पैसों के लिए तो यहाँ नहीं आये थे और यह बात मैंने तभी कही थी जब गुजश्ता  ब्लागिंग काल के त्रिदेवों में से एक आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी ब्लागिंग से कमाई का जरिया ढूंढते नज़र आते थे . 
पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर  लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। 
मित्रों आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ -यह काउंटर प्रोडक्टिव है! आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

शुक्रवार, 21 जून 2013

काश कोई कृष्ण आज भी होता!

गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !

सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा  है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना  होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल  पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक  देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला! 

रविवार, 16 जून 2013

भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!

पितृ दिवस पर एक मित्र ने कुछ चुटीला सुनाया ...पत्नी ने अतिरिक्त प्यार का इज़हार करते हुए पति से पूछा कि अजी ये सत्य और विश्वास में क्या फर्क है? पति विद्वान था इस फर्क को समझता था मगर उसके सामने चुनौती थी कि वह किन शब्दों में और कैसे पत्नी को यह फर्क समझाए कि उसे आसानी से समझ में आ जाय . सहसा उसके चेहरे पर एक कूट मुस्कान तैर गयी ..उसने जवाब दिया -
"सुमुखि, अब ये सोनू और मोनू तुम्हारे बच्चे हैं यह तो सत्य है मगर ये मेरे बच्चे हैं यह मुझे यह विश्वास है" :-)
 
पितृत्व को लेकर इतिहास में कितने ही विवाद दर्ज हैं.यद्यपि मातृत्व से भी जुड़े मसले हुए हैं मगर उनका निपटारा आसान रहा है . राजा ने बच्चे की दावेदारी को झगड़ रही  माताओं के लिए फैसला सुनाया कि बच्चे के दो टुकड़े करके आधा आधा हिस्सा दोनों को दे दिया जाय ...वास्तविक माँ चीत्कार कर उठी "मुझे नहीं चाहिए बच्चा ,इसे ही दे दिया जाय " ..और राजा ने इसी माँ को बच्चा सौंप दिया . हो गया फैसला और बिल्कुल सही भी! मगर पितृत्व के दावे बड़े जटिल होते रहे . जिनका शर्तिया निपटारा डी एन ऐ फिंगर प्रिंटिंग टेकनिक की मानो बाट जोह रहा था .पिछले शताब्दी के आख़िरी दशक में यह तकनीक लोकप्रिय होनी शुरू हुई और अब तो पूरी दुनिया में पितृत्व /मातृत्व के निपटारे के लिए यही सबसे विश्वसनीय तकनीक है जिसे ज्यादातर देशों में कानूनी मान्यता भी प्राप्त है . अपने यहाँ भी कई मामले इसी तकनीक ने सुलझाये हैं तंदूर से तिवारी काण्ड तक!

अपने देश के पितृ-सत्तात्मक समाज में पिता की महिमा तो जग जाहिर है . यहाँ जीवन के बाद के जीवन में भी पिता का महात्म्य बरकरार है .एक पूरा आधा महीना ही पितृ-पक्ष कहलाता है और एक ख़ास दिन पितृ विसर्जन . मातृ पक्ष की कोई व्यवस्था नहीं है -एक दिन भी नहीं! भला हो पश्चिमी जगत का कि अब पितृ और मातृ दिवस दोनों का वजूद है . मजे की बात यह है कि पितृ विसर्जन दिवस तो है मगर हमारे यहाँ पिता अपने जीवन काल में प्रत्येक दिन पूज्यनीय और प्रातः स्मरणीय हैं किसी एक दिन नहीं -हाँ उनके दिवंगत होने के बाद भी वंशज उन्हें साल में कभी तो याद करलें इसलिए पितृ-पक्ष की व्यवस्था की गई .पश्चिमी दुनिया में तो पिता जीते जी ही परित्यक्त और बिसरा उठते हैं इसलिए कम से कम एक दिन तो उनकी याद सम्मान का हो इसलिए ही यह फादर्स डे का विचार वजूद में आया -मगर जब हम इसका हिन्दी तर्जुमा करके पितृ-दिवस कहते हैं तो मुझे तो पितृ विसर्जन का बोध हो उठता है .

यह संस्कृति का फर्क है . यहाँ पिता रोज पूज्य हैं वहां दैनंदिन उपेक्षित पिता के लिए बस एक दिन मुक़र्रर है! मगर अब हम भी पश्चिम के अन्धानुकरण में तेजी से लगे हैं -अपने मूल्य हमें पिछड़ेपन के द्योतक लगते हैं और फादर्स डे जैसे विचार आधुनिकता के .....हम तेजी से अपने जड़ों से कट रहे हैं -नयी पीढी फेसबुक पर जोरशोर से फादर्स डे मना रही है . काफी भावुक है .....मैंने उन्हें यह कहकर समझाया भी कि ....अरे अरे ....मित्रों इतना भाव विह्वल भी मत हो जाईये ..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं —

मंगलवार, 11 जून 2013

भारतीय समाज की विवशताएँ!


पहले तो मैंने इस पोस्ट  के लिए भारतीय समाज की विडंबनाएं शीर्षक चुना था .मगर विचारों के प्रवाह में सहसा सूझा कि जिन्हें मैं विडंबनाएं समझ रहा हूँ दरअसल वे हमारी विवशतायें हैं . हम तमाम अंधविश्वासों में मुब्तिला हैं . आज भी किसी को 'छोटी माता' ( चिकन पाक्स ) के निकलने पर मनौती मानी जाती है, कुछ " अंगऊ" (दैवीय सत्ता को समर्पित करने के लिए अग्रिम के रूप में नगदी सोना या कोई भी सम्पदा को सहेजना ) निकालते  हैं और शीतला माई के मंदिर तक भागे जाते हैं . बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा नहीं देते .चाहे वह अभिव्यक्ति की हो या शिक्षा की या  निर्णय की स्वतंत्रता ...हम झूठी मान मर्यादा के लिए आनर किलिंग जैसे नृशंस कृत्य तक उतर आते हैं . ऐसे अनेक मौजूदा परिदृश्य हैं जो  आज की इस तार्किक दुनिया में क्या किसी विडम्बना से कम है? मगर हम इस परिदृश्य के मूल कारणों की अगर पड़ताल करें तो भारतीय समाज की विवशताएँ उजागर होती हैं और मन पीड़ा से भर उठता है. 
हमें कई समस्याओं के उदगम को समझने के लिए अपने अतीत में जाना होगा?आखिर गलती  कहाँ हुई और हम कहाँ सांस्कृतिक लिहाज से एक सभ्य समाज नहीं बन पाए . पहले तो वर्ण व्यवस्था जो स्वभावगत कर्म के आधार पर लोगों के कार्य विभाजन को मान्यता देती थी कालांतर में जन्म आधारित जाति को जन्म दे गई
समाज की कथित "ऊंच " और "नींच" जातियों का वजूद स्थापित होता गया . .आज भी यह कितना हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कितने ही ब्राह्मण आज भी जनेऊ और चुटिया को ही ब्राह्मणत्व का प्रमाण मानते हैं . आज इस  दुर्भाग्यपूर्ण और अवैज्ञानिक सामाजिक संरचना को अब तो राजनीतिक संबल मिल गया है .एक पार्टी जो ब्राह्मणों को जूते मारने के उद्घोष से सत्ता में आयी थी अब उसी सत्ता को संभालने के लिए ब्राह्मणों का चरण चुम्बन कर रही है . मतलब अब जाति व्यवस्था और भी स्थापित हो गयी . इस जातिगत व्यवस्था को तोड़ पाना आज की एक बड़ी चुनौती और विवशता है . कभी समाजिक मार्गदर्शकों ने इस जातिगत व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए "ऊंच " और "नींच" जातियों के बीच 'रोटी और बेटी " के सम्बन्ध का आह्वान किया गया था . मगर आज यह आह्वान अपना दम ख़म खो चुका हैं। 
अब इससे कौन इन्कार करेगा कि तमाम विकासोन्मुख योजनाओं के बावजूद भारत में भयंकर गरीबी हैं ,अशिक्षा है और स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है . और इसके साथ /बावजूद भी मान मर्यादा और 'इज्जत' के  मूर्खतापूर्ण विचार हैं . लडकी घर की 'इज्जत' है अगर उसके साथ कुछ हुआ तो एक गरीब विपन्नता के बोझ  से जो पहले से ही कराह रहा है 'इज्जत' गवाने का एक अतिरिक्त बोझ भला कैसे उठा सकता है ? लिहाजा वह बेटी/बेटियों की स्वतंत्रता का बचपन से ही गला घोटने लगता है . 
न जाने इस दहेज़ व्यवस्था का  उद्भव कब से हुआ मगर इस आर्थिक संघात ने भी बेटियों की स्थिति को कमजोर बनाया है . एक वह देश जो नारियों का दर्जा देवी देवताओं के बराबर देता था आज नारी को  समाज के निचले पांवदान पर उतार चुका  है। आज 'इज्जत' और दहेज़ का भय एक बड़ी विवशता बन चुका है. हद तो यह है कि किसी दूसरी जाति के साथ प्रेम या विवाह भी जातिगत कथित सम्मान पर भारी पड़ता है .आज भी शादी -व्याह को जातिगत बंधन से मुक्त नहीं किया जा सका है -जबकि विभिन्न जातियों में अंतर्विवाह से वंश की सबलता के प्रामाणिक 'जीनिक ' कारण मौजूद हैं . 
यौन कुंठाओं की तो पूछिए मत .आज बच्चों और युवाओं से बढ़कर प्रौढ़ों को यौन शिक्षा की जरुरत है -यह भी एक भयमूलक कारण है जो लड़कियों को लड़कों सदृश स्वच्छन्दता देने से रोकती है . बड़े -बूढों द्वारा सेक्स के प्रति बनाए गए सामाजिक परिवेश में लड़के और लडकियां दोनों ही यौन -कुंठित हो तमाम यौन अपराधो में संलिप्त हो उठते हैं . मेरा मानना है एक वर्जनाहीन समाज में यौन अपराध कम होंगें! चिकित्सा सुविधाओं /शिक्षा का घोर अभाव और निर्धनता आज भी लोगों को बीमारियों के इलाज के लिए ओझा -सोखा और देवी माता के पास ले जाने को विवश करता है . अब ये सारे परिदृश्य हमारे भारतीय समाज की विडंबनाएं हैं या विवशताएँ इसका निर्णय आप ही करें! लगता है भारतीय समाज का पुनर्निर्माण अब असंभव हो चला है !


रविवार, 2 जून 2013

जीवन की गुणवत्ता

मनुष्य कैसा जीवन जी रहा है और उसे कैसा जीवन जीना चाहिए इस प्रश्न का जवाब धर्म और दार्शनिकता के नज़रिए से दिया जाता रहा है . और भी कई नज़रिए हो सकते हैं . धर्म की बात करें तो जीवन के चार मूल लक्ष्यों/ पुरुषार्थ की कसौटी पर मानव जीवन की सफलता असफलता आंकी जाती रही है -ये हैं धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष . इनका उचित अर्जन ही मनुष्य के जीवन की सफलता मानी गयी है . इनमें भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है मगर राहत की बात है की मोक्ष की धारणा काल्पनिक ही है . चार्वाक ने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है -और इस अवधारणा की समझ को सरल कर दिया . महात्मा बुद्ध की माने तो मानव जीवन के मूल में दुःख ही दुःख है और मनुष्य के जीवन का बड़ा अभीष्ट सुख की प्राप्ति है .जब जीवन दुःख भरा है तो निश्चित ही मृत्यु मोक्ष से कम नहीं . कवी ने भी कहा है निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल .यहाँ कवि जीवन की आपाधपी और कष्ट की अनुभूति को ही उजागर कर रहा है .
यह युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा सजाया संवारा जा रहा है . आज प्रौद्योगिकी ने मनुष्य की सुख सुविधा के कितने ही इंतजाम किये हैं . आज अल्प काल मृत्यु के मामले बहुत घट गए हैं मनुष्य की सामान्य आयु बढी है . कई रोग बढे हैं तो कई लाईलाज रहे रोगों पर नियंत्रण भी कर लिया गया है ,बड़ी माता और तावन जैसी बीमारियाँ छू मंतर होगई हैं . प्रसव मृत्यु दर काफी कम हुयी है . यात्राएं आसान हो गयी हैं .दो जून का भोजन एक बड़ी आबादी को उपलब्ध है . अगर सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को हम सही कर पाए तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को और भी सुखमय कर देगी .. हो सकता है रामराज्य का हमारा चिर कालिक स्वप्न भी साकार हो जाय -अल्प मृत्यु नहिं कवनऊ पीरा सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा ....मगर शायद हम सुख का एक सीमित अर्थ लगा लेते हैं -भौतिक सुख सुविधा को ही हम सुख मान लेते हैं! आध्यात्मविदों की बात हमें यहाँ सच लगती है कि सुख कहीं बाहर नहीं वह तो भीतर हैं अंतर्मन में है -उसकी खोज बाहर नहीं भीतर होनी चाहिए! और यह पूरा विषय ही आध्यात्म का हो जाता है ,
तो क्या बेशुमार धन दौलत ही सुख का आधार है . जाहिर तौर पर तो यही लगता है . मगर मैंने देखा है कि गाँठ के पूरे कितने लोग छदम बाबाओं पीरों की शरण में जा जैसे तैसे कमाए धन को लुटाते रहते हैं .पक्के अन्धविश्वासी हैं . हर पल डरते रहते हैं कि उनका वैभव कहीं भरभरा न जाए . क्या यह सुखपूर्ण जीवन है ?. हमारे पुरखों ने कितने ही सुनहले नियम बनाये हैं जिन पर चल कर हम भले ही सुखद कम मगर एक सार्थक जीवन जी सकते हैं . मगर अब वे नियम कहीं खो गए जल्दी मिलते नहीं .कोई पूछता भी नहीं . सार्थक जीवन के जो कुछ मूल मन्त्र थे उनमें दया ,परोपकार ,सत्य के प्रति आग्रह आदि थे. और ये मूल्य हैं . किसी विद्वान ने कहा है कि उपलब्धियों से भरे जीवन की अपेक्षा हमें गुणवत्ता पूर्ण जीवन को ज्यादा तरजीह देना चाहिए . पर यह जीवन की गुणवत्ता कैसे बढ़ायी जाय?
मेरे मन में यह प्रश्न कौंधता रहा है। और दैनंदिन जीवन में मिलने वाले लोगों को देख समझ कर तो यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि जीवन जो बहुत दीर्घकालिक नहीं होता और फिर भी हम एक अंधी दौड़ लगाये हुए हैं में गुणवत्ता का समावेश कैसे हो सके ....आपके कुछ विचार हो तो साझा करें -हम उन विचारों को अगली पोस्ट में संश्लेषित कर प्रस्तुत कर सकेगें . आप भौतिक समृद्धि के अलावा जीवन में किन और चीजों को वरीयता देगें या दे रहे हैं ? आप खुद के जीवन को कितना सार्थक मानते हैं ? आपने कोई ऐसा काम अब तक किया है जिसकी कोई उत्तरजीविता हो? यानी जिसे लोग याद कर सकें? और नहीं तो कब करेगें समय तो पंख लगाये उड़ता ही जा रहा है ?क्या हमें खुद का जीवन जीना ही भारी लग रहा है? क्या हम सचमुच इतना असहाय हो गए हैं ? इस भूलभुलैया से निकलना मुश्किल सा हो गया है ?आपके लिए ये प्रश्न उत्तर देने में सहायक हो सकते हैं!

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

दिल को दहलाती दरिन्दगी

दिल्ली में दुबारा दरिन्दगी की वीभत्स दास्तान ने मन विचलित कर दिया है . इन दिनों मीडिया में ऐसी शर्मनाक घटनाओं का काफी कवरेज हो रहा है -क्या इन घटनाओं में अचानक बेतहाशा वृद्धि हुयी है? ऐसा नहीं है -निर्भया काण्ड के बाद इन घटनाओं को बस ज्यादा कवरेज मिल रहा है . सामान्य मनोविज्ञान ऐसा होता है कि किसी घटना के प्रमुखता से प्रचारित होने पर हम वैसी घटना की आस पास की पुनरावृत्ति की नोटिस लेने लग जाते हैं .पहले भी ये घटनाएँ घट रही थीं मगर मीडिया ने उन्हें निर्भया काण्ड के बाद ज्यादा फोकस और कवर किया है. हाँ मीडिया वीभत्स घटनाओं को कभी कभी और भी वीभत्सता प्रदान कर देता है . मगर अभी घटी दिल्ली की घटना को बयाँ करने में शब्द तक नाकाफी हैं . फिर मीडिया को भी क्या दोष देना? दिल्ली ही नहीं इन दिनों सारे देश से ऐसे समाचार मिल रहे हैं जो संवेदनशील लोगों को अवसादग्रस्त कर देने के लिए काफी हैं . निश्चय ही ये घटनाएं बहुत ही अमानवीय और घृणित है और आश्चर्य होता है कि कुछ नराधम किस सीमा तक जा सकते हैं। मगर ये असामान्य घटनाएँ हो क्यों रही है?
क्या नैतिक शिक्षा का अभाव हो चला है? लोग इंटरनेट पर बिखरी अश्लीलता से प्रेरित होकर ऐसा कर रहे हैं? या ये जन्मजात अपराधी हैं? नैतिक शिक्षा जब ज्यादा प्रभावी रही होगी तब क्या ऐसे वीभत्स यौन अपराध नहीं होते रहे होंगे ? यह यही देश है जहां सद्यजात बच्ची को मार देने के तरह तरह के फार्मूले अपनाए जाते रहे हैं . अजन्में फीमेल गर्भ के समापन में वैज्ञानिक विधियों का दुरूपयोग अब भी थमा नहीं है यद्यपि आज ऐसे कृत्य पर सख्त कानूनी पाबंदी और दंड के प्रावधान हैं . यह सब तो पहले से ही चल रहा है फिर हम किस और कैसी नैतिक शिक्षा की दुहाई दे रहे हैं? वह कितनी कारगर होगी? तो फिर क्या इंटरनेट ,विज्ञापन या फ़िल्में ही इसके लिए जिम्मेवार हैं? कुछ हद तक तो यह हो सकता है मगर इन्हें तो बहुत लोग देखते हैं मगर सभी कहाँ ऐसे घिनौने कृत्य करते हैं? तब? कारण दूसरा है!
न जाने किस  किस मनःस्थिति में  हताशा या आक्रोश में ब्लागजगत में विचित्र बात भी कही गयी एक पोस्ट में कि दरिन्दे यदि चाहें तो बड़े लोगों के साथ दुराचार कर भले कर लें मगर बच्चियों को छोड़ दें -"वे अपनी काम-पिपासा ,अपने हमउम्र वालों के साथ ही शांत करें. इन मासूम बच्चियों को बख्श दें"  इससे तो मुझे मिथकीय कहानियां याद आयीं जिनमें राक्षसों को संतुष्ट रखने और पूरी बस्ती को बचाने को रोज किसी को उसके हवाले कर दिया जाता था -बलि भी इसी मानसिकता की देन है -यह तो हास्यास्पद बात हुयी कम से कम विज्ञान के इस युग में! मुझे लगता है ऐसे कृत्य करने वाले जन्मजात अपराधी हैं . मैंने अपने एक साईंस फिक्शन में भविष्य के एक ऐसे समाज का खाका  खींचा है जो अपराध मुक्त है -मतलब वहां जीरो अपराध हैं .ऐसा इसलिए हो पाता है कि गर्भधारण के एक पखवारे के बाद से ही बच्चे के जींस की स्क्रीनिंग शुरू हो जाती है और समग्र रूप से उनके प्रत्येक विकारयुक्त जीन का विश्लेषण किया जाता है अगर विकारग्रस्त जीन का सुधार संभव हुआ तो ठीक वर्ना उसे जन्म देने की अनुमति नहीं दी जाती . हाँ जन्म लेने के पहले भी कोई भूल चूक की दुबारा तिबारा जांच होती है और अगर कोई आपराधिक जीन तब भी पहचान में आता है तो ऐसे बच्चे को जन्म तो लेने देते हैं मगर उसे एक निर्वासित जीवन के लिए "काला पानी" सदृश द्वीप आदि पर भेज दिया जाता है .मतलब ऐसे जीनिक अपराधियों को मुख्यधारा में रहने का अधिकार ही नहीं होता .
क्या अब हमारे पास सचमुच ऐसा ही विकल्प शेष है ? क्या ऐसी प्रौद्योगिकी जो अब असंभव नहीं रह गयी है के प्रति हम जन समर्थन के लिए आगे आयेगें? जिस प्रकृति के यौन अपराध हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अपराधी जन्मजात विकृतियाँ लिए हुए हैं और मुख्य समाज में उन्हें रहने का कोई हक़ नहीं है! हमें इसका कोई जड़तोड़ इलाज करना ही होगा ताकि न रहे बांस न बजे बासुरी . मुझे इसके अलावा कोई कारगर हल दीख नहीं रहा .क़ानून से डरने वालों के लिए क़ानून है जीनिक अपराधियों पर क़ानून का शिकंजा शायद ही कामयाब हो सके ? क्या सोचते हैं आप ?

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

हंगामा है क्यूं बरपा? डोयिचे वेले पुरस्कारों पर दो टूक!

हिन्दी ब्लॉगर अपनी औकात एक बार फिर दिखा दिए.डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कारों में इस बार हिन्दी के शामिल होते ही बखेड़ा खड़ा हो गया है . जो वैश्विक समुदाय के सामने यह फिर साबित करता है कि हिन्दी वाले और अब खासकर हिन्दी के ब्लॉगर कभी परिपक्व नहीं हुए और न  होंगें .हिन्दी के साथ विवाद का चोली दामन का सम्बन्ध बना हुआ है और शुद्ध हिन्दी में कहें कि यह एक अन्योनाश्रित सम्बन्ध बन गया है . डोयिचे वेले की तरफ से कहीं कुछ गलत नहीं हुआ . और न परिकल्पना की ही ओर  से कुछ गलत था . यह हम हैं जो अपनी निजी खुन्नसों और निहितार्थों के चलते इन्हें विवादास्पद बनाते हैं . हिन्दी भाई कई लोग तो ऐसे होते हैं कि सम्मान पुरस्कारों की तब तक आलोचना करते हैं जब तक कि वही सम्मान उन्हें खुद नहीं मिल जाता . फिर चुप लगा जाते हैं .
डोयिचे वेले अंतर्जाल सक्रियता पर एक वैश्विक पुरस्कार आयोजन पहले से भी करती आयी है .बस इस बार उसमें हिन्दी जुड़ गयी और कुछ श्रेणियों में नामांकन मांगे गए . इसकी पहली सूचना ज्यादातर लोगों को खुशदीप जी की पोस्ट से मिली थी, सक्रिय लोगों ने नामांकन कर दिए . मैं नामांकन के जरिये पुरस्कार -सम्मान के पक्ष में कभी नहीं रहा -यह मुझे भीख का कटोरा लेकर कुछ मांगने जैसा लगता है भले ही कोई दूसरा ही आपका  नामांकन क्यों न करे . मगर यह मेरा अपना बहुत निजी विचार है मगर तमाम चयन की प्रक्रियाओं में यह भी एक प्रक्रिया है और मैं इसी रूप में इसे लेता हूँ . हाँ सम्मान तो जो सम्मान लायक हो -किसी क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया हो उसे अपने स्रोतों के माध्यम से सम्मानकर्ता व्यक्ति /संस्था को चुन लेना चाहिए - मगर नोबेल पुरस्कार तक नामांकन मांगते हैं तो अगर डोयिचे वेले ने भी यही रास्ता अपनाया तो यह उसका निर्णय है,उसकी शर्त है . कतिपय हिन्दी ब्लागरों ने चुपके से अपने ब्लागों को नामित कर दिया या करा दिया . कुछ लोगों ने दूसरे ब्लागों को घोषित तौर पर नामांकित किया -वास्तव में किया या खुद अपना कर गए कौन जानता है? :-)  . अब यह तो भारतीय सूचना आधिकार के तहत डोयिचे वेले से पूछा भी नहीं जा सकता और उसे बताने की भी कोई बाध्यता नहीं है . अब जो ब्लॉग नामांकित हुए होंगें उन ही में से कुछ चयनित भी होने थे सो हो गये. हमें भी शुरू में और अब भी लगता है कि चयनित ब्लागों से कितने ही बहुत बेहतर ब्लॉग छूट गए हैं मगर क्या कीजियेगा जब वे नामांकित ही नहीं हुए . 
एक मैं ही अकेला नकचढ़ा फक्कड़ थोड़े ही हूँ जो खुद नामांकन से दूर रहा . विज्ञान / भ्रमण की कटेगरी में उन्मुक्त सरीखा ब्लॉग जहाँ प्रामाणिक प्रथम स्रोत की जानकारी  लिए है और जहां  बेहतरीन पोडकास्ट भी है  या मेरा अपना साईब्लाग ही है विज्ञान संचार के समर्पित प्रयास हैं . मगर ये तो नामंकित ही नहीं हुये. हाँ तस्लीम को अवश्य नामांकित किया गया  और यह भी एक नियमित ब्लॉग है जिसमें शुरुआती योगदान मेरा भी कुछ कम नहीं रहा -नामकरण,अवधारणा और लगभग सौ शुरुआती पहेलियों जिनसे यह ब्लॉग निगाह में आया- मैं केवल इसलिए इससे जुडा रहा क्योकि आम आदमी तक विज्ञान संचार मेरे अस्थि -मज्जा में समाहित है . इसकी आरंभिक पहेलियों के जरिये ब्लागरों में विज्ञान में अभिरूचि जगाने का बीड़ा मैंने उठाया था -यहाँ यहाँ यहाँ और अनेक पोस्टों में यह इतिहास दर्ज है .
सर्प संसार में आज भी साँपों से जुड़े अपने फर्स्ट हैण्ड अनुभवों को निरंतर साझा करता रहता हूँ . मेरे करीब के लोग जानते हैं कि सापों में मेरी बहुत रूचि है .लोगों को याद होगा एक ब्लॉग भारतीय भुजंग था जिसकी माडरेटर लवली कुमारी हुआ करती थीं मगर उन्होंने पता नहीं किस रुष्टता से यह ब्लॉग बंद कर दिया और मेरे कितनी ही पोस्टें पब्लिक डोमेन से हट गयीं। मैंने उसे अनुरोध भी किया कि मुझसे व्यक्तिगत रुष्टता की सजा आप पाठकों को क्यों दे रही हैं -यह तो अन्याय है पर उन्होंने मेरी एक न सुनी और ब्लॉग ही बंद कर दिया . मैं अंततः  व्यक्ति को महत्वपूर्ण नहीं मानता उसके काम को प्राथमिकता देता हूँ . अब भारतीय भुजंग से मेरी छुट्टी के बाद मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि मेरे वे पाठक बिचारे जो भारतीय भुजंग से जुड़े थे और कितनों के मेरे पास फोन तक आते थे उनके लिए कुछ किया जाना चाहिए .अब चूंकि मैं अन्य तमाम कामों में उलझा रहता हूँ और मेरी दूसरी आदत है लोगों को विज्ञान लेखन में प्रोत्साहित करते रहने का मैंने जाकिर जी से यह अनुरोध किया और इस तरह सर्प संसार अस्तित्व में आया .
खुशदीप जी की ही दूसरी पोस्ट से मुझे बाब्स के लिए हिन्दी की श्रेणियों में चयनित ब्लागों की जानकारी हुयी तो मुझे आश्चर्यमिश्रित आह्लाद हुआ कि अच्छे कार्य कभी न कभी पहचाने जरुर जाते हैं . मैंने तुरंत फोन पर जाकिर जी को बधाई दी , मगर उसके बाद की घटी घटनाएँ मुझे पीड़ित कर गयीं और ऐसे अनुभव मेरे साथ होते ही रहे हैं अनगनित . सो मुझमें इम्युनिटी आ  गयी हैं -हुआ यह कि जाकिर जी के सौजन्य से लखनऊ के अखबारों में जाकिर जी के फोटो सहित यह समाचार छापे  गए कि उनके दो ब्लागों को बाब्स  पुरस्कारों के लिए चुन लिया गया है -आदि आदि , मुझे धक्का लगा -दोनों ही सामूहिक ब्लॉग हैं और ईमानदारी तो सभ्य/अकादमिक जगत में बरती ही जानी चाहिए -खबर तब भी बनती और डॉ जाकिर अली 'रजनीश का सम्मान भी कुछ कम न होता . वैसे भी ब्लॉग के माडरेटर वहीं हैं -बान जाने का उनका ही हक़ है और वे जायेगें भी .सर्प संसार के लिए भी यद्यपि उन्होंने मुझे जाने का आग्रह किया है मगर मैं तो उन्हें ही अधिकृत करता . मगर यहाँ जाकिर भाई से मानव स्वभावगत चूक हुयी। और उसी दिन मैंने अपने स्वभावगत मजबूरी से इस पुरस्कार अभियान से  खुद को तटस्थ कर लिया . मुझे हमेशा आगे देखने की आदत है.
मगर इस मुद्दे पर  फुरसतिया महराज मुझे  कोंचते जा रहे हैं और पोस्ट दर पोस्ट लिखते जा रहे हैं .अजीब सा गलचौर सा माहौल बन रहा है। लाबीयिंग चगल रही है .और तस्लीम तथा नारी को एक दूसरे के नाकारात्मक वोट (नेगेटिव वोटिंग ) मिल रहे हैं -मतलब जिसे नारी (कृपया पढ़ें सुश्री रचना सिंह ) अन्यान्य कारणों से पसंद नहीं है वो तस्लीम को वोट कर रहा है और जिसे तस्लीम(कृपया पढ़ें डॉ जाकिर अली 'रजनीश' ) पसंद नहीं वह नारी को वोट दे रहा है .खेमेबाजी प्रत्यक्ष हो गयी है. काश ये ब्लॉग सकारात्मक वोट ही हासिल करते और इतने खराब भी नहीं हैं  . इस खेमेबाजी के चलते मोर्चाये हुए लिंक भी उभर आये या उधिरा गए हैं जो चिटठा चर्चा की नवीनतम पोस्ट पर देखे जा सकते हैं .
 अब जबकि मैं तटस्थता से निकल आया हूँ तो यह स्पष्ट कर दूं (ताकि कोई मुगालता किसी को न रहे) कि सबसे अच्छे नामंकित हिन्दी ब्लॉग  में मैं तस्लीम को और मोस्ट क्रिएटिव ब्लॉग में सर्प संसार को और निजी ब्लागों में दुधवा लाईव को समर्थन कर रहा हूँ और मित्रों से इन्हें वोट करने की अपील करता हूँ!
अंत में निष्कर्षतः मैं यह अवश्य कहता हूँ कि डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कार के आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं और मैं उनका व्यक्तिगत रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने हिन्दी को एक मौका दिया है , उनकी प्रक्रिया में सायास कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं की गयी है -मुझे खुशदीप जी  के इस कथन पर हैरत है कि ये पुरस्कार फिक्स्ड हैं . हाँ एक आदमी अगले चौबीस घंटों में दुबारा वोट कर सकता है और अपनी कई आई डी से कर सकता है यह उचित नहीं है -यह तो फिर थोक के भाव में लोगों से वोट कराने का मामला बन जाता है . मगर यही प्रक्रिया तो और भी भाषाओं के साथ है ! मैं जूरी से अपील करता हूँ कि हिन्दी वालों की हाय हाय से विचलित हुए बिना वे अपने निर्णय को अंजाम देगें!

रविवार, 3 मार्च 2013

कितना भटक गया इंसान :-(

धर्म के प्रवक्ताओं को वैज्ञानिकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कंधे से कंधा मिलाकर दुनियां और मानवता की बढ़ोत्तरी में दिन रात सहयोग की भावना से जुटे रहते हैं -जबकि धर्म कर्म के अनुयायी ज्यादातर समय एक दूसरे के धर्म की निंदा में बिताते हैं और उनके  अपमान में ही समय जाया करते रहते हैं!और नतीजा सामने हैं विज्ञान ने जहाँ मानव की सुख सुविधा में एक बड़ा योगदान दिया है वहीं धर्म अपने मार्ग से भटक गया है जबकि मूल उद्येश्य इसका भी बहुजन हिताय और बहुजन सुखाया ही था। 
धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं मगर बने हुए हैं विरोधी। क्योंकि दोनों की प्रकृति में कुछ मूलभूत अंतर रहा है। विज्ञान में असहमतियों को खुले दिमाग से देखा समझा जाता है और कमियों को निरंतर सुधारने की प्रवृत्ति होती है जबकि धर्म में इसका ठीक उलटा आचरण है .यहाँ विरोधों और असहमतियों को लेकर तुरंत तलवारे खिंच जाती हैं .कट्टर लोग कट्टे तक निकाल लेते हैं . यहाँ तुरंत फतवे जारी हो जाते हैं .मगर विज्ञान की दुनिया में फतवे जारी नहीं होते .अगर किसी ने किसी की त्रुटि की ओर  ध्यान दिलाया तो उसका संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाती है,संशोधन होते हैं, आवश्यकतानुसार भूल सुधार होते हैं  . विज्ञान की अपनी एक पद्धति है जो  जिज्ञासा के अन्तःप्रेरण से आरम्भ होकर विभिन्न संभावनाओं /विकल्पों का सत्यापन सतत प्रयोग परीक्षण के जरिये कर सत्य के उदघाटन को प्रतिबद्ध होता है . धर्म के भटके स्वरुप में सत्य की घोषणा पहले ही की हुयी रहती है .यह घोषणा मुल्ला मौलवियों पंडितों ,पादरियों के मुखारविंद से होती है -जिसके विरोध का मतलब आपका बहिष्कार और कभी कभी तो सर तक कलम कर देने के फरमानों तक है . इसके विपरीत वैज्ञानिक कोई ऐसे परम पद पर आसीन नहीं है . अगर कोई वैज्ञानिक अनजाने की गयी त्रुटि के चलते गलत साबित होता है तो अपने समुदाय में उसे बिसरा भले दिया जाय कोई फतवा जारी नहीं होता .
                                                क्या सचमुच हुआ था नरसिंह अवतार?
धर्म या विज्ञान दोनों का उद्येश्य मानवता का कल्याण ही होना चाहिए यद्यपि विज्ञान की पद्धति में ऐसा कोई आवश्यक प्रतिबन्ध नहीं है . धर्म की नींव ही मानव कल्याण के सर्वतोभद्र कामना पर टिकी हैं . लेकिन आज धर्म इस अपने इस साध्य को साधने के बजाय मात्र पूजा पाठ के साधन तक सिमट गया है .मात्र पूजा पाठ ,अजान ,नमाज के साथ ही  मानव कल्याण के लिए उठाया गया एक छोटा कदम भी ईश्वर की एक बड़ी इबादत हो सकती है यह सच स्वीकार करने में हम पीछे रह जा रहे हैं . धर्म का अभ्युदय मानव कल्याण की सोच से ही हुआ मगर कालांतर में वह अपने मूल मार्ग से भटक गया है . हमारे कई समाज सुधारक पीर संतों ने समय समय पर हमें चेताया भी मगर धर्म और कट्टरता,धर्म  और कूप मंडूकता ,धर्म और अंधविश्वास का ऐसा सम्बन्ध स्थापित हो गया है जो टूटे नहीं टूट रहा है .
आज विद्वानों के बीच मान्य तथ्य है कि मनुष्य का निम्न श्रेणी के जीवों से विकास हुआ है -वह एक विकसित जीव है -न कि स्वर्ग से अधोपतित कोई देव -मगर फिर भी हम अवतारवाद को सच साबित करने में तुले हैं , हम आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते कि चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के पूर्व अवतारवाद का जिक्र केवल हमें अपने पूर्वजों की उस दृष्टि को दर्शाता है जो विकास की एक आरम्भिक सोच को दर्शाती है .यहाँ भी मछली से कछुआ और अदि अवतारों से होते हुए पशु और मनुष्य के संयुक्त रूप की नरसिंह अवतार  में बड़ी सुन्दर कल्पना की  गयी है -अब हम अपने पूर्वजों के इस सुन्दर वैचारिक योगदान की स्वीकृति और सराहना के बजाय अवतारों को ही सच मानने की मूर्खता पर उतर आते हैं . और जब पढ़े लिखे लोग भी ऐसा करते हैं तो मुझे दुःख होता है . जाहिर है उनके ज्ञान अध्ययन और विवेक में कहीं घोर कमी रह गयी है -ऐसे लोग निरक्षर लोगों से भी ज्यादा अहितकारी है समूचे समाज के लिए  . अगर यही लोग यह बात करते कि विकासवाद के सोच का उद्गम हमारे धर्म चिंतन में भी है तो कितनी पते की बात होती . मगर वे तो अवतारों को ही सच मान बैठते हैं . यह अंधश्रद्धा मानवता के लिए खतरनाक है .
धर्मों की ठीक से न समझी गयी बातों से कट्टरता उपजती,फैलती है - हिन्दू धर्म में कट्टरता कहीं नहीं है -विश्व में भारत ही वह भाव भूमि है जहाँ अनीश्वरवादी चिंतन तक का पुष्पन पल्लवन हुआ -सनातन धर्म चिंतन/दर्शन से जैन, बुद्ध दर्शन और कालांतर में इस्लाम के भी विचार पनपे -कहीं पृथक से नहीं आये -वेदान्त के कर्मकांडों को उपनिषदीय चिंतन ने तिरोहित किया -आज हिन्दू वह भी है जो किसी ईश्वर के वजूद को नहीं मानता और वह भी जो चौबीसों घंटे पूजापाठ में रत रहता है . हिन्दू होना विनम्र होना है किसी की भी पूजा पद्धति की खिल्ली न उड़ाना एक श्रेष्ठ हिन्दू का गुण है -शराब पियें या न पियें आप हिन्दू हैं ,मंदिर जाएँ या न जाएँ आप हिन्दू हैं ,मांस खायें न खायें आप हिन्दू हैं ,भगवान् को गाली दें या स्तुति करें आप हिन्दू हैं -इतना सृजनशील और संभावनाओं से भरा और कोई धर्म विश्व में दूसरा नहीं है -आप सभी से अनुरोध है इसे कट्टरता का जामा न पहनाएं -कोई मेरा सम्मान करे या न करे मैं हिन्दू ही रहूँगा ! मुझे हिन्दू होने का फख्र है क्योंकि इस महान धर्म ने मुझे कई बंधनों से आजाद किया है ...मुझे दुःख होता अगर मैं हिन्दू न हुआ होता और तब मुझे ईश्वर को मानने पर विवश होना पड़ता :-)
सबसे विनम्र निवेदन है धर्मों के रगड़ों झगड़ों को अलविदा कहकर विज्ञान सम्मत चिंतन को अपनाएँ!मानवता पर रहम करें!

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं। संदर्भ: मिड लाईफ क्राईसिस!

पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर अपडेट किया -"कभी कभी मन बहुत अवसाद ,जड़ता और नकारात्मकता से भर उठता है -चिकित्सक इसे पुरुष रजोनिवृत्ति (मेल मीनोपाज ) भी कहते हैं! क्या सचमुच मेल मीनोपाज एक हकीकत है या फिर चिकित्सकीय भ्रम? मेरे समवयी मित्रों आप कभी इस मनोभाव से गुजरते हैं ? आप इसे दूर करने का क्या उपाय करते हैं?"जैसा कि अपेक्षित था मित्रों की सदभावनाएँ बरसनी शुरू हो गई। मित्रों ने मजाक भी किया " हर शाम रेड वाईन के दो बड़े पेग लें ठीक रहेंगे" -   मैंने कहा   मैं तो असुर हूँ भाई इसे तो न ले सकूंगा! हाँ कोई प्यारा सा साथ  मिले तो यह कुफ्र भी कबूल है, बहुत हो गया मुसलमा बने हुए :-) किसी मित्र ने नियमित व्यायाम सुझाया तो किसी ने ग़ज़ल सुनने -सुनाने की सलाह और किसी ने रचनात्मक लेखन (जैसे यह विधा कभी आजमाई ही न हो मैंने :-) ) डाक्टर से मिलने की भी सलाह दी गयी। एक मित्रा(णी) ने यहाँ तक सलाह दे ड़ाला कि इधर उधर की ताका झांकी और राग विराग के बजाय ईश्वर में मन लगाईये -योग कीजिये -ध्यानावस्थित रहिये! रसिक मित्र वीरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने तो एक पूरा वृत्तान्त ही पुरुष रजोनिवृत्ति पर चेंप दिया। एक संक्षिप्त सी प्रतिक्रिया आयी कि "सर्च मिडलाईफ क्राइसिस" ..मैंने ढूँढा तो विकीपीडिया ने स्वागत किया .जैसा कि मेरी रचना प्रक्रिया का यह हिस्सा है नयी जानकारी मैं मित्रों से साझा करता हूँ-यह विवरण यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत है -विस्तार से विकीपीडिया पर पढ़ ही सकते हैं।
मैंने बात पुरुष रजोनिवृत्ति से शुरू की थी। महिलाओं में रजस्राव बंद होने के बाद की उम्र बहुत से हार्मोनल असंतुलन और 'मूड स्विंग' की होती है .इसी के समतुल्य कुछ भावनात्मक असंतुलन की स्थिति जो पुरुषों में 45 वर्ष के बाद शुरू होती है को नाम मिल गया "पुरुष रजोनिवृत्ति" -जो एक 'मिसनामर ' भले ही है मगर कतिपय लक्षणों की उपस्थिति के चलते यह नामकरण प्रचलन में है . मिड लाईफ क्राईसिस भी पुरुष या स्त्री के 40-60 वर्ष के बीच की अवस्था में आने वाला एक समय है जब कई ऐसे भावनात्मक उद्वेग पैदा होते हैं जो विचलित करने वाले हैं -मगर यह पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है। यह समय काल ऐसा है कि  वह जीवन के उस पड़ाव पर होता है जब उसके शेष जीवन की अवधि कम हो रहती है और वह अपना मूल्यांकन शुरू करता है -क्या खोया क्या पाया? कितना सफल हुआ वह समवयी मित्रों/लोगों में, जीवन में सफलता या असफलता के परिप्रेक्ष्य में तथा नौकरी की संतुष्टि/असंतुष्टि,विवाह और रोमांटिक सम्बन्धों की स्थति, और खुद का आकर्षक -अनाकर्षक दिखना,यौनिक संतुष्टि -असंतुष्टि ,यौन परफार्मेंस में गिरावट आदि आदि भी महत्वपूर्ण कारक पाए गए हैं .मुझे लगता है इसमें कुछ कारण अवश्य महत्पूर्ण है।
इस त्रासदी से बचने के   लिए लोगबाग़ कई अधीर और हास्यास्पद प्रयास भी करते हैं -खुद को सजाने संवारने , प्रदर्शन के कई और जुगाड़ -नयी गाड़ियां या वैभव के दिखावे वाले सामानों को खरीदना,अपनी वैवाहिक संगिनी से इतर नए सम्बन्ध ढूंढना . और जीनवादियों (जेनेटिसिस्ट) की माने तो अनुर्वरक (नान रिप्रोडकटिव) हो चुकी पत्नी के उम्र की तुलना में उर्वरकतायुक्त(रिप्रोडकटिव) घानिष्टता की साध आदि आदि .
अब इस मिडलाईफ क्राइसिस से बचने के उपाय आखिर हैं क्या? कई सुझाव हैं -मनो चिकित्सक से संपर्क के अलावा जीवन शैली के बदलाव की सिफारिश है .मगर मुझे लगता है इसके अलावा मनुष्य को अपनी निजी स्वार्थपरता को त्याग कर समाजोपयोगी कार्य कलापों में रूचि लेना भी आत्मसंतुष्टि का संबल बन सकता है -और भारतीय आध्यात्म चिंतन में अभिरुचि -जीवन की निस्सारता की अवधारणा, मनुष्य के निमित्त मात्र होने का बोध आदि ऐसे समय बहुत लाभदायी हो सकते हैं . जीवन में तरह तरह की अपेक्षाएं पाल कर लोग दुखी होते हैं और अवसाद में भी चले जाते हैं . यही वह अवसर है जब बुद्धं शरणम गच्छ का आह्वान अर्थपूर्ण हो उठता है . 
अतिशय भौतिकता मनुष्य को अंततः पलायन की और ले जाती हैं -कृष्ण ने ऐसे ही उहापोह के समय अर्जुन से कहा -सर्व धर्मं परितज्य मामेकं शरणं ब्रज ..मतलब किसी एक परम सत्ता को समर्पण .....सम्पूर्ण भक्ति! मगर आप कदाचित अनीश्वरवादी हैं तो भी यह तो समझ ही सकते हैं कि मनुष्य के हाथ में सब कुछ नहीं है -पुरुष समग्र जीवन के परिप्रेक्ष्य में परिस्थितियों का भी दास होता ही है। वैसे भी मिड लाईफ क्राईसिस महिलाओं में मात्र 3-4 वर्ष और पुरुषों में दसेक वर्ष की पायी गयी है -अब इतना भी झेल लेना कौन सी बड़ी बात है -लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

कौन सा भारत,किसका भारत?


बलात्कार भारत में नहीं इण्डिया में होते हैं भागवत  के इस बयान ने  एक बार फिर इंडिया दैट इज  भारत के निहितार्थों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया . यहाँ मैं बलात्कार कहाँ होते हैं इस विषय का विवेचन करने नहीं जा रहा हूँ बल्कि कुछ बातें आपसे इस विषय पर साझा करना चाहता हूँ कि यह भारत बनाम इण्डिया का मामला है क्या?बात भारत और इण्डिया की ही नहीं हिन्दुस्तान की भी है . मतलब देश एक नाम तीन तीन .गोली एक आदमी तीन की तर्ज पर . मगर निशाना कहाँ है? एक देश के तीन तीन  नाम  क्यों हैं .  क्या ऐसा विश्व के किसी और देश के बारे में भी है -फिर भारत ही के साथ ऐसी विडंबना क्यों?  
हमारे संविधान निर्माण करने वाले महानुभावों ने भी इस बिंदु पर विचार न किया हो ऐसा कैसे कहा जा सकता है? आखिर वे विद्वान ,अच्छे खासे पढ़े लोग थे. बहरहाल यह सामान्य सी बात तो हम सभी को पता ही है कि भारतीय सभ्यता मूलतः सिन्धु नदी की सभ्यता है जिसकी कभी सात सहायक नदियाँ हुआ करती थीं और नाम था सप्तसिन्धु -यहीं सिन्धु घाटी की प्राचीनतम सभ्यता पनपी मगर दुर्भाग्य से कुछ पुरात्तात्विक अवशेषों के अलावा इस सभ्यता के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। जैसे कौन थे सैन्धव? क्या वे द्रविण-भारत के मूल वासी  थे? अनार्य थे ? आदि आदि .यह पूरी की पूरी सभ्यता का  नामों निशाँ तक मिट गया और आर्य भारत में स्थापित हो गए . मगर वे भी सिन्धु के आँचल में ही आबाद हुए.पारसियों और आर्यों के  चोली दामन के साथ के तमाम अंतर्साक्ष्य मौजूद हैं -इरानी आदि ग्रन्थ अवेस्ता और आर्यों के ऋग्वेद में अद्भुत साम्य है। अब इरानी जुबान में 'स' का उच्चारण 'ह; है तो आर्यों के समय से ही सिन्धु नदी के किनारे बसने वाले हिन्दू कहलाये और इसी आधार पर यह देश हिन्दुस्तान कहलाया . पहले यह एक भौगोलिक नामकरण था -कालांतर में आर्यों के विस्तार से यह सांस्कृतिक भी बना -हम हिन्दुस्तान के वासी हुए आज भी चाहे हमारा धर्म ,पूजा पद्धतियाँ कुछ भी हों -हिन्दू ,मुस्लिम, सिख ,ईसाई, पारसी सभी हिन्दुस्तानी हुए या कुछ और छूट ले लें तो ये सभी भौगोलिक लिहाज से हिन्दू हैं !
यूनानियों ने सिंधु / हिन्दु (Hindu) से एच हटाया और नदी का नया नामकरण दे दिया इंडोस (indos) -लैटिन में इंडोस बन गया इंडस (Indus) और यूरोपीय लोगों ने इस नदीय सभ्यता के लोगों के  देश का नया नामकरण कर डाला -इंडिया! और यह शेष दुनिया में ऐसा चल पडा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भी इसी नाम को प्राथमिकता दे दी . मगर सबसे बड़ी पहेली -भारत की पहेली तो आज भी बरकरार ही है? इस देश का नाम भारत क्यों पड़ा?आज के ज्यादातर  बच्चे हो सकता है इसका जवाब न दे सकें मगर हमारी पीढी के लोग दन  से कहेगें कि शकुंतला -दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत/भारतवर्ष पड़ा . मगर यह सही नहीं है . 
दुष्यंत शकुंतला का काल ऋग्वेद के बहुत बाद का  है। और ऋग्वेद में 'भरतों' का बहुत बार उल्लेख है!  दरअसल मनु के वंश में एक प्रतापी राजा भरत हुआ है -मत्स्य पुराण में उल्लेख है -'मनुर्भरत उच्यते' -मनु को ही भरत की संज्ञा दी गयी है . यह कहा गया -'वर्ष तत भारतं स्मृतं' अर्थात मनु से ही भारत नाम आया है . दरअसल ऋग्वेद में जो 'भरताः' नाम  आया है वह मनु के वंशज का है न कि दुष्यंत के बेटे भरत का . आर्यों की दो शाखाएं हैं सूर्यवंशी आर्य और चन्द्र वंशी आर्य .वे भरत जिनके नाम  पर इस देश का नामकरण हुआ उनका सम्बन्ध सूर्यवंशी आर्यों से है न कि चंद्रवंशी आर्यों से ...दुष्यंत चंद्रवंशी आर्य हैं .मजे की बात यह भी है कि राम के भाई भरत भी हैं मगर उनके नाम पर भारत का नाम पड़ा यह भी कहीं उल्लिखित नहीं है। आशा है यह पहेली अब कुछ सुलझी होगी या और उलझ गयी ? :-) 
  

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