आज फ़ुरसतिया यानि अपने अनूप शुक्ल महराज को ब्लागिंग करते नौ साल बीत गए . उन्होंने नौ शब्दों से अपनी पारी शुरू की थी और आज नौ साल पूरे हुए तो वे थोडा संजीदे और अतीतरागी बन उठे हैं -और यह सहज ही है. मेरे मन में यह देख एक उपमा उपजी है -नौ वर्ष के ब्लागिंग के गर्भकाल की . मनुष्य का गर्भकाल भी नौ माह का है और आज फ़ुरसतिया के भी जब ब्लागिंग के नौ साल हुए तो यह अवसर ऐसे ही हाथ से जाने देने का तो नहीं है . हम इस अवसर को ब्लागिंग के इतिहास में अमर बना देना चाहते हैं . क्यों न अनूप जी के महनीय ब्लागिंग अवदान को देखते हुए इस अवसर पर उनके ही इस नौ साला मानक को एक सार्थक,सकारात्मक रूप दे दिया जाय . आखिर ब्लागिंग के नौ साल को ऐसे ही हंसी ठिठोली करते काट देना कोई मामूली बात तो नहीं है . तो यह मानक ब्लागिंग का गर्भकाल माना जायेगा और इतने समय जो यहाँ टिका रह जाय समझिये वही धाकड़ ब्लागर है . वही पहचान और प्रतिष्ठा के काबिल है - बाकी तो अजन्में शिशु से हैं . अनूप जी की किलकारियां आज यहाँ ध्वनित हैं -कोई तो सोहर आदि का आयोजन करो न भाईयों, लुगाईयों .
पूरा हुआ ब्लागिंग का गर्भकाल: बधाई
फुरसतिया जी सचमुच जीवट के ब्लॉगर निकले .एक एक फन्ने खां और लौह संकल्पनाएँ आयीं और चली गयीं .अनेक झंझावात आये,चिल्ल पों मची ,निकल बाहर देख लेगें के उदघोष तक गूंजें मगर फ़ुरसतिया अपने व्यंग बाणों का समर्पित और और अनवरत संधान करते ही रहे -भले ही कभी कभार थोडा शिथिल हुयें हों मगर इनकी तुरीण व्यंग -बाणों से कभी खाली नहीं हुई . एक समय था जब ब्लागिंग के त्रिदेव में इनके साथ दो और देव थे मगर अब ये हैं अकेले हैं . और अकेले ही काफी हैं . मैंने भी कई बार इनके आघात प्रघात झेले हैं और खुद को धन्य मानता हूँ कि अपना भी गर्भकाल निकट आ रहा है . मगर इसके लिए मुझे कई शास्त्रोक्त कर्मकांड आदि कराने पड़े हैं . :-) अन्यथा इनके तिक्त बाणों के सामने टिक पाना आसान नहीं है .
आखिर ऐसा क्या है फ़ुरसतिया में? कुछ तो है यह उनके धुर विरोधी भी मानते हैं -लेखन की एक मौलिकता है,स्टाईल है और सबसे बढ़कर ब्लागिंग के प्रति समर्पण है और छपास की उत्कट अभिलाषा भी जो इन दिनों मुद्रण माध्यमों में उनके दनादन लेख भेजने से प्रमाणित हो रही है -जबकि वे ऐसी भयंकर भूल क्यों कर रहे हैं यह समझ में नहीं आ रहा है -क्या पूत के पाँव ऐसे ही दिखने थे? फुरसतिया जनाब एक वक्त खुद मुद्रण माध्यम से बिदकते थे और उन ब्लागरों की खिंचाई किया करते थे जो अंतर्जाल से मुद्रण माध्यम की ओर लपकते थे… मगर आज वे उसी पर मार्ग पर खुद चल पड़े हैं . मैं दंग हूँ ! बात मानिए फ़ुरसतिया जी यह उलटा दांव लगा बैठे हैं आप! छि छि ब्लॉग जगत में जन्मने के बाद फिर उसी बासी ,बिकाऊ, सड़ी गली गिरवी पत्र पत्रिकाओं के गलीज में लौटना? संपादकों से रिरियाना? रचना छपवाने के लिए मनुहार और टकटकी लगाकर छपने का इंतज़ार? फिर काहें को ब्लॉगर हुए आप? मुद्रण जगत से ब्लॉग जगत में आना तो समझ में आता है मगर यहाँ से उल्टा फिर उसी घुटन भरे माहौल में लौटना? यह कैसा पौरुष? आप भी अब यहाँ से चल निकलने के फिराक में हैं?
आखिर हमारा कोई मूल्य ,सिद्धांत वैगेरह है भी? ब्लागरों के अगुओं में आप रहे हैं मगर अब आप को भी कागजी ग्लेज भाने लगा है ? न न यह आपके लिए कतई शोभनीय नहीं है . मुझे पता है कुछ ब्लॉगर थोड़े से पारिश्रमिक की मोह में अखबारों से आस लगा बैठे हैं। मगर आपके साथ तो ऐसा भी नहीं है -हर माह के लखपती वैसे ही हैं आप! या फिर यह समझा जाय कि लद चुके ब्लागिंग के दिन और अब पलायन के दिन है .....चल उड़ जा रे पंछी यह देश .........
सुबह ही फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पढी थी तो ये सारे विचार मन में घुमड़ रहे थे . एक ब्लॉगर उद्विग्न था यह सब सुनाने को ....सहज उदगार ,बेलौस बात ,और झटपट पोस्ट ही ब्लॉगर पहचान है. और यह पहचान कम से कम मैं तो खोने वाला नहीं . लोग अब ठकुर सुहाती को छोड़ यहाँ और कुछ नहीं चाहते -कोई मुद्दा भी हो तो भी बगल से सटक लेते हैं . ये ब्लागिंग के लिए और ब्लॉगर के लिए भी शुभ लक्षण नहीं है . अब तो लोग लड़ते झगड़ते भी नहीं ..माहौल कितना कब्रिस्तानी सा हो गया है न? वो जीवन्तता और वह मनसायनपन कहाँ गया? फ़ुरसतिया जी यहाँ की जिम्मेदारी ऐसे ही न छोड़ जाईये -आप अब ब्लॉग - दशक पुरुष बनने की राह पर हैं। शुभकामनाएं और बधाई!
फुरसतिया जी सचमुच जीवट के ब्लॉगर निकले .एक एक फन्ने खां और लौह संकल्पनाएँ आयीं और चली गयीं .अनेक झंझावात आये,चिल्ल पों मची ,निकल बाहर देख लेगें के उदघोष तक गूंजें मगर फ़ुरसतिया अपने व्यंग बाणों का समर्पित और और अनवरत संधान करते ही रहे -भले ही कभी कभार थोडा शिथिल हुयें हों मगर इनकी तुरीण व्यंग -बाणों से कभी खाली नहीं हुई . एक समय था जब ब्लागिंग के त्रिदेव में इनके साथ दो और देव थे मगर अब ये हैं अकेले हैं . और अकेले ही काफी हैं . मैंने भी कई बार इनके आघात प्रघात झेले हैं और खुद को धन्य मानता हूँ कि अपना भी गर्भकाल निकट आ रहा है . मगर इसके लिए मुझे कई शास्त्रोक्त कर्मकांड आदि कराने पड़े हैं . :-) अन्यथा इनके तिक्त बाणों के सामने टिक पाना आसान नहीं है .
आखिर ऐसा क्या है फ़ुरसतिया में? कुछ तो है यह उनके धुर विरोधी भी मानते हैं -लेखन की एक मौलिकता है,स्टाईल है और सबसे बढ़कर ब्लागिंग के प्रति समर्पण है और छपास की उत्कट अभिलाषा भी जो इन दिनों मुद्रण माध्यमों में उनके दनादन लेख भेजने से प्रमाणित हो रही है -जबकि वे ऐसी भयंकर भूल क्यों कर रहे हैं यह समझ में नहीं आ रहा है -क्या पूत के पाँव ऐसे ही दिखने थे? फुरसतिया जनाब एक वक्त खुद मुद्रण माध्यम से बिदकते थे और उन ब्लागरों की खिंचाई किया करते थे जो अंतर्जाल से मुद्रण माध्यम की ओर लपकते थे… मगर आज वे उसी पर मार्ग पर खुद चल पड़े हैं . मैं दंग हूँ ! बात मानिए फ़ुरसतिया जी यह उलटा दांव लगा बैठे हैं आप! छि छि ब्लॉग जगत में जन्मने के बाद फिर उसी बासी ,बिकाऊ, सड़ी गली गिरवी पत्र पत्रिकाओं के गलीज में लौटना? संपादकों से रिरियाना? रचना छपवाने के लिए मनुहार और टकटकी लगाकर छपने का इंतज़ार? फिर काहें को ब्लॉगर हुए आप? मुद्रण जगत से ब्लॉग जगत में आना तो समझ में आता है मगर यहाँ से उल्टा फिर उसी घुटन भरे माहौल में लौटना? यह कैसा पौरुष? आप भी अब यहाँ से चल निकलने के फिराक में हैं?
आखिर हमारा कोई मूल्य ,सिद्धांत वैगेरह है भी? ब्लागरों के अगुओं में आप रहे हैं मगर अब आप को भी कागजी ग्लेज भाने लगा है ? न न यह आपके लिए कतई शोभनीय नहीं है . मुझे पता है कुछ ब्लॉगर थोड़े से पारिश्रमिक की मोह में अखबारों से आस लगा बैठे हैं। मगर आपके साथ तो ऐसा भी नहीं है -हर माह के लखपती वैसे ही हैं आप! या फिर यह समझा जाय कि लद चुके ब्लागिंग के दिन और अब पलायन के दिन है .....चल उड़ जा रे पंछी यह देश .........
सुबह ही फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पढी थी तो ये सारे विचार मन में घुमड़ रहे थे . एक ब्लॉगर उद्विग्न था यह सब सुनाने को ....सहज उदगार ,बेलौस बात ,और झटपट पोस्ट ही ब्लॉगर पहचान है. और यह पहचान कम से कम मैं तो खोने वाला नहीं . लोग अब ठकुर सुहाती को छोड़ यहाँ और कुछ नहीं चाहते -कोई मुद्दा भी हो तो भी बगल से सटक लेते हैं . ये ब्लागिंग के लिए और ब्लॉगर के लिए भी शुभ लक्षण नहीं है . अब तो लोग लड़ते झगड़ते भी नहीं ..माहौल कितना कब्रिस्तानी सा हो गया है न? वो जीवन्तता और वह मनसायनपन कहाँ गया? फ़ुरसतिया जी यहाँ की जिम्मेदारी ऐसे ही न छोड़ जाईये -आप अब ब्लॉग - दशक पुरुष बनने की राह पर हैं। शुभकामनाएं और बधाई!










