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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

ब्लागिंग का 'गर्भकाल' और फुरसतिया को बधाई!

आज फ़ुरसतिया यानि अपने अनूप शुक्ल महराज को ब्लागिंग करते नौ साल बीत गए . उन्होंने नौ शब्दों से अपनी पारी शुरू की  थी और आज नौ साल पूरे हुए तो वे थोडा संजीदे और अतीतरागी बन उठे हैं -और यह सहज ही है. मेरे मन में यह देख एक उपमा उपजी है -नौ वर्ष के ब्लागिंग के गर्भकाल की . मनुष्य का गर्भकाल भी नौ माह का है और आज फ़ुरसतिया के भी जब ब्लागिंग के नौ साल हुए तो यह अवसर ऐसे ही हाथ से जाने देने का तो नहीं है . हम इस अवसर को ब्लागिंग के इतिहास में अमर बना देना चाहते हैं . क्यों न अनूप जी के महनीय ब्लागिंग अवदान को देखते हुए इस अवसर पर उनके ही इस नौ साला मानक को एक सार्थक,सकारात्मक रूप दे दिया जाय . आखिर ब्लागिंग के नौ साल को ऐसे ही हंसी ठिठोली करते काट देना कोई मामूली बात तो नहीं है . तो यह मानक ब्लागिंग का गर्भकाल माना जायेगा और इतने समय जो यहाँ  टिका रह जाय समझिये वही धाकड़ ब्लागर है . वही  पहचान और प्रतिष्ठा के काबिल है - बाकी तो अजन्में शिशु से हैं . अनूप जी की किलकारियां आज यहाँ ध्वनित हैं -कोई तो सोहर आदि का आयोजन करो न भाईयों, लुगाईयों .
                                                       पूरा हुआ ब्लागिंग का गर्भकाल: बधाई 
फुरसतिया जी सचमुच जीवट के ब्लॉगर निकले .एक एक फन्ने खां और लौह संकल्पनाएँ आयीं और चली गयीं .अनेक झंझावात आये,चिल्ल पों मची ,निकल बाहर देख लेगें के उदघोष तक गूंजें मगर फ़ुरसतिया अपने  व्यंग बाणों  का समर्पित और और अनवरत संधान करते ही रहे -भले ही कभी कभार थोडा शिथिल हुयें हों मगर इनकी तुरीण  व्यंग -बाणों से कभी खाली नहीं हुई . एक समय था जब ब्लागिंग के त्रिदेव में इनके साथ दो और देव थे मगर अब ये  हैं अकेले हैं . और अकेले ही काफी हैं . मैंने भी कई बार इनके आघात प्रघात झेले हैं और खुद को धन्य मानता हूँ कि अपना  भी गर्भकाल निकट आ रहा है . मगर इसके लिए मुझे कई शास्त्रोक्त कर्मकांड आदि कराने पड़े हैं . :-) अन्यथा इनके तिक्त बाणों के सामने टिक पाना आसान नहीं है .
आखिर ऐसा क्या है फ़ुरसतिया में? कुछ तो है यह उनके धुर विरोधी भी मानते हैं -लेखन की एक मौलिकता है,स्टाईल है और सबसे बढ़कर ब्लागिंग के प्रति  समर्पण है और छपास की उत्कट अभिलाषा भी जो इन दिनों  मुद्रण माध्यमों में उनके दनादन लेख भेजने से प्रमाणित हो रही है -जबकि वे ऐसी भयंकर भूल क्यों कर रहे हैं यह समझ में नहीं आ रहा है -क्या पूत के पाँव ऐसे ही दिखने थे? फुरसतिया जनाब एक वक्त खुद मुद्रण माध्यम से बिदकते थे और उन  ब्लागरों की खिंचाई किया करते थे जो अंतर्जाल से मुद्रण माध्यम की  ओर लपकते थे… मगर आज वे उसी  पर मार्ग पर खुद चल पड़े हैं . मैं दंग हूँ ! बात मानिए फ़ुरसतिया जी यह  उलटा दांव लगा बैठे हैं आप! छि छि  ब्लॉग जगत  में जन्मने के बाद फिर उसी बासी ,बिकाऊ, सड़ी गली गिरवी पत्र पत्रिकाओं के गलीज में लौटना? संपादकों से रिरियाना? रचना छपवाने के लिए मनुहार और टकटकी लगाकर छपने का इंतज़ार? फिर काहें को ब्लॉगर हुए आप? मुद्रण जगत से ब्लॉग जगत में आना तो समझ  में आता है मगर यहाँ से उल्टा फिर उसी घुटन भरे माहौल में लौटना? यह कैसा पौरुष? आप भी अब यहाँ से चल निकलने के फिराक में हैं?
आखिर हमारा कोई  मूल्य ,सिद्धांत वैगेरह है भी? ब्लागरों के अगुओं में आप रहे हैं मगर अब आप को भी कागजी ग्लेज भाने  लगा है ? न न यह आपके लिए कतई शोभनीय नहीं है . मुझे पता है कुछ ब्लॉगर थोड़े से पारिश्रमिक की मोह में अखबारों से आस लगा बैठे हैं। मगर आपके साथ तो ऐसा भी नहीं है -हर  माह के लखपती वैसे ही हैं आप! या फिर यह समझा जाय कि लद चुके  ब्लागिंग के दिन और अब पलायन के दिन है .....चल उड़ जा रे पंछी यह देश .........
सुबह ही फ़ुरसतिया जी की पोस्ट पढी थी तो ये सारे विचार मन में घुमड़ रहे थे . एक  ब्लॉगर उद्विग्न था यह सब सुनाने  को ....सहज उदगार ,बेलौस बात ,और झटपट पोस्ट ही ब्लॉगर पहचान है. और यह पहचान कम से कम मैं तो खोने वाला नहीं . लोग अब ठकुर सुहाती को छोड़ यहाँ और कुछ नहीं चाहते -कोई मुद्दा भी हो तो भी बगल से सटक लेते हैं . ये ब्लागिंग  के लिए और ब्लॉगर के लिए भी शुभ लक्षण नहीं है . अब तो लोग लड़ते झगड़ते भी नहीं ..माहौल कितना कब्रिस्तानी सा हो गया है न? वो जीवन्तता और वह मनसायनपन कहाँ गया? फ़ुरसतिया जी यहाँ की जिम्मेदारी ऐसे ही न छोड़ जाईये -आप अब ब्लॉग - दशक पुरुष बनने की राह  पर हैं। शुभकामनाएं और बधाई! 
 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

फागुनी अहसास को जगाता एक कविता संग्रह!

सुनीता शानू जी के नए कविता -संग्रह 'मन पखेरू उड़ चला फिर ' की मानार्थ प्रति मिली तो शीर्षक ने मन में बहुत उमड़ घुमड़ मचाया। अभी तक तो प्राण पखेरू का रूढ़ प्रयोग हिन्दी में दुखद संदर्भों में  आया है मगर यहाँ  मन पखेरू के उड़ने के सर्वथा नए प्रयोग ने चौका सा दिया . यहाँ मन का पखेरू शरीर के प्रतिबंधों से दूर उन्मुक्त विचरण के लिए उड़ चला है .बंधनों से चिर आजादी का यह भाव और इस नए बिम्ब प्रयोग को स्वीकार करने में कोई असहजता संग्रह को पढ़ने के  बाद  नहीं बची थी  . किताबों की समीक्षार्थ/ मानार्थ प्रतियाँ मिलने पर मैं उन्हें आदतन तुरंत नहीं पढता बल्कि अपनी स्टडी मेज या फिर ड्राईंग/लिविंग कक्ष की मेज (यहाँ राबर्ट्सगंज में टू इन वन या इन आल इन वन ही कहिये ) पर छोड़ कई दिन निहारता रहता हूँ . फिर बहुत ही अहतराम से उठा पढने में मुब्तिला हो उठता हूँ . अभी कल ही संग्रह की अंतिम कविता तक पहुंचा  हूँ .

कविता संग्रह बहुत ही मौके से मिला है मुझे -फागुनी बयारों के बीच फागुनी कविताओं ने कहर ही ढा दिया है समझिये :-) .मैंने अपने मन को गहरे स्पर्श कर गयी एक कविता को फेसबुक पर भी शेयर किया . देखिये मैं हिन्दी साहित्य का मनई तो हूँ नहीं तो मुझे समीक्षा कर्म वगैरह आता नहीं और उसके प्रतिमानों और अनुशासनों से सर्वथा अनभिज्ञ भी  हूँ इसलिए इसे कृति की समीक्षा न माना जाय .यह एक सुहृद के प्रति मेरी कृतज्ञता ज्ञापन का बस विनम्र उपक्रम भर है -सुनीता शानू जी से विगत वर्ष मेरी भेंट  लखनऊ के ब्लॉगर परिकल्पना दशक सम्मान में हुयी थी -उनकी विनम्रता, सहजता,सरलता ने क्षणों में ही अपरिचय की औपचारिकताओं को छू मंतर कर दिया था . तब मुझे यह बिल्कुल भान नहीं था कि मैं एक उदीयमान प्रतिभाशाली कवयित्री के चंद घंटों के सानिध्य में मैं हूँ-वे दिल्ली लौटीं और फिर उनकी स्मृति उनकी फागुनी कविताओं के साथ सहसा लौट आयी हैं .
मन पखेरू का मूल स्वर उन्मुक्तता/जड़ बंधनों से आज़ादी का तो हैं मगर डोर को पूरी तरह से स्वच्छंद छोड़ देने की हिमायती भी कवयित्री नहीं है। उनकी कविता डोर की अंतिम पंक्तियां यही तो कहती हैं - 'सच है डोर से बंधी होती तो पूरा न सही होता उसका भी अपना एक आकाश' ...संग्रह की आख़िरी कई कविताओं ने ख़ास प्रभावित किया जो  मेरी अपनी पसंद है -कवयित्री या प्रकाशक/सम्पादक ने कविताओं के चयन क्रम को अपने ढंग से रखा होगा . आनंद कृष्ण जी की इस पुस्तक से सम्बन्धित समीक्षा संग्रह के शुरू में ही है और यह इतनी सम्पूर्ण है कि उसके बाद किसी के लिए भी समीक्षा के लिए कुछ  बचता ही नहीं . उन्हें इस संग्रह  की कविताओं में एक संभावनाशील कवयित्री की पदचाप सुनायी दी है और मैं उनसे सहमत हुए बिना नहीं रह सकता . सुनीता जी ने प्रेम की सघन अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति नहीं की है बल्कि कई सामाजिक विडंबनाओं को भी सटीक उकेरा है -इस लिहाज से कन्यादान, ऐ कामवाली,माँ   रचनाएं बहुत सशक्त बन पडी है . संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है कविताओं का अपने पाठकों से सहज संवाद -इन कविताओं में अमूर्तता नहीं है,निर्वैयक्तिकता नहीं है.  जीवन के पल प्रतिपल के अनुभवों से लबरेज हैं ये कवितायें!
 कृति 
हिन्द -युग्म ने बहुत सलीके से और एक स्लीक लुक के साथ इस कविता संग्रह को प्रकाशित किया है -प्रशंसा के मेरे दो शब्द प्रकाशक के लिए भी हैं। मुझे एक लम्बे समय बाद एक कविता संग्रह ऐसा मिला है जिसकी अधिकाँश कविताओं ने मुझसे सहज संवाद किया है। अंत में वो फेसबुक वाली कविता आपको पढ़ाना चाहता हूँ-

खामोशी
आँखों ने आँखों से
कह दिया सब कुछ
मगर जुबां खामोश रही

जब दिल ने
दिल की सुनी आवाज
धड़कन खामोश रही
तुम्हारे प्यार की
खुशबू से तृप्त
उठती गिरती साँसे देख
पलकें खामोश रहीं
कृतिकार 
और वहां मेरा कमेन्ट था- सारे पहरेदार या तो मौकाए वारदात पर सोये रहे या गुनाह के खामोश भागीदार हुए। :-)  सुनीता शानू जी को उनके प्रथम कविता संग्रह के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई!

शनिवार, 24 मार्च 2012

चिट्ठाकार चर्चा की नीरवता को तोड़तीं अमृता तन्मय!

बहुत दिन बीते चिट्ठाकार चर्चा में  किसी सुधी  चिट्ठाकार की चर्चा नहीं हो पाई ..एक नीरवता सी छाई रही है यहाँ...यह नीरवता अकारण  नहीं है ...एक तो शायद वह शुरुआती उमंग रोमांच नहीं रहा ब्लागिंग का -अर्थशास्त्र के ला आफ डिमनिशिंग रिटर्न की भांति इस विधा की अब वह शुरुआती चाहना नहीं रही और कुछ इस  टैब्बू से मैं आशंकित रहा जिसमें एक मोहतरमा लागर  ने सरे आम मुझे यह कह डाला  था कि मैं जिसे भी चिट्ठाकार चर्चा में शामिल करता हूँ उससे मेरे सम्बन्ध ख़राब हो जाते हैं -मुझे भी हैरत हुयी जब मैंने सिंहावलोकन में आंशिक रूप से इस बात को सच पाया . मैं इतना ही कहूँगा कि मानव जीवन ,भावनाएं और व्यवहार बहुआयामी और बहुत जटिल हैं ...अब किसी की प्रोफाईल को सम्मिलित करने का मतलब यह भी नहीं कि उसके साथ मेरा कोई सप्तपदी का अनुबंध हो गया और मैं आजीवन उससे बड़ा ही उदारतापूर्ण, सहिष्णु सम्बन्ध बनाए ही रखूँ ...और सारी बात का ठीकरा मेरे ही सर पर फोड़ दिया जाय यह भी कहाँ का न्याय है ....दूजे यह बात भी है कि कुछ ऐसे भी मित्रगण रहे हैं जिनसे मेरे टाप के और गहन सम्बन्ध रहे मगर उन्हें मैं अन्यान्य कारणों से अपने इस प्रिय स्तम्भ में नहीं ले पाया हूँ -कुछ तो ब्लागजगत को भी छोड़ चुके हैं और इस धरा पर कहाँ हैं अब यह भी नहीं मालूम -गुमनामी की अंधियारे में खो गए ..और मुझे बच्चन जी की यह सीख याद कराते रहते हैं,जो बीत गयी से बात गयी ...और नीड़ का  निर्माण फिर फिर .....ओह प्रस्तावना इत्ती लम्बी क्यों हो रही है ..लाजिमी है इतना दिन का अंतराल रहा है जो ...मगर आज उस अंतराल की पूरी भरपाई करने ब्लागजगत की एक खालिस कवयित्री आयी हैं ....अमृता तन्मय....

मगर किंचित संकोच भी है कि चिट्ठाचर्चा में इस चिट्ठा -कवयित्री को शामिल करने की सहमति/अनुमति उनसे नहीं ले पाया ....क्योकि उनसे संपर्क का कोई सूत्र नहीं मिला ..उनका ब्लॉगर  परिचय पृष्ठ केवल उनका नाम बताता है और वह भी शायद उनका काव्य नाम है ,वास्तविक नहीं ..फिर उनका जेंडर फीमेल बताता  है और लोकेशन पटना, इण्डिया बताता है ...आशा है ये विवरण सही हैं ...उन्हें चिट्ठाकार चर्चा  में लेने का एक  गूढार्थ भी है -अब चूंकि उनसे कोई खतो किताबत,चर्चा परिचर्चा नहीं है इसलिए सम्बन्ध खराब होने की संभावना भी नहीं है ...और यह भी कि इस तरह मेरे इस स्तम्भ से जुडा टैब्बू ख़त्म हो जाय सो इस कवयित्री का यहाँ शामिल होना  एक शुभकारी टोटका -अनुष्ठान भी है ....

मेरी हे कवयित्री कविता आपने पढी होगी ..उससे दीगर अगर कुछ कवयित्रियाँ यहाँ है तो उनमें एक अमृता तन्मय भी है ...इनकी कविताओं में मैंने श्रृंगार  वियोग से अलग का फ्लेवर पाया है और वह इनके काव्यकर्म को एक पृथक पहचान देता है -आध्यात्मिक भाव का संस्पर्श  ...और प्रकृति के कई बिम्बों को लेकर भावाभिव्यक्ति! उनकी यह ताजी कविता, बस  कोई   पढ़ते ही मन में सहसा ही कौंधा कि क्यों न मैं इस काव्य कर्म प्रवीण कवयित्री का सादर आह्वान यहाँ अपने इस लम्बे समय से नीरवता ओढ़े स्तम्भ में करूं.. आलोच्य कविता में एक बहुव्यापी रिक्तता की ओर कविमन संकेत करता है -मतलब कहीं न कहीं कोई, कुछ सूक्ष्म सी  अपूर्णता है जो सम्पूर्णता के, समुच्चय के सुख की चरमता को हठात रोके हुए हैं  ..अगर वह सूक्ष्म अपूर्णता पूरी हो जाय तो बस बात ही बन जाय ..यह एक अकेली कविता ही कवयित्री के काव्य कर्म को  एक समादृत स्थान दिलाने में समर्थ है -इसमें भाव प्रवणता तो है ही मगर शिल्प और साहत्यिक बोध के आधार पर भी यह एक अद्भुत और लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कविता है .....

मेरे पूर्व के चिट्ठाकार चर्चा में व्यक्तित्व निरूपण को एक अनिवार्य घटक के रूप में लिया जाता रहा है ..मैंने स्वीकार किया है कि चिट्ठाकार चर्चा की अभ्यर्थता में मात्र कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व का  समावेश मेरे लिए अपरिहार्य रहा है ...मगर आज की चिट्ठाकार चर्चा इस अर्थ में भी अपवाद है ..मुझे कवयित्री के व्यक्तित्व का कुछ अता पता नहीं ...मात्र किसी के रचना कर्म से उसके व्यक्तित्व का निरूपण एक जोखिम भरा  काम है और ऐसा कोई जोखिम उठाने का कोई मतलब भी नहीं ...एक आशंका  भी रहती है कि महान कवि कवयित्रियों में कृतित्व और व्यक्तित्व का साम्य प्रायः  नहीं पाया गया है ....और ऐसी कोई प्रत्याशा भी शायद अनौचित्यपूर्ण है ....वो देशी कहावत है न -आम खाने से मतलब होना चाहिए आम के  पेड़ से नहीं!

अमृता तन्मय को मैंने चिट्ठा कवि लिखा है -मतलब वे ब्लागजगत में और शायद  अन्यत्र भी किसी अन्य विधा में योगदान नहीं कर रहीं ,यहाँ  तक कि अपने काव्य चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों का जवाब भी  नहीं देती..महज कवितायें ही लिखती हैं.. यही उनका मुख्य व्यसन /टशन है . और हाँ वे क्वचिदन्यतोपि की नियमित पाठिका हैं ..और इसलिए भी मेरी कृतज्ञता आखिर उनके प्रति क्यों न हो ....

अन्य ब्लागों पर भी अमृता की  सार्थक अभिव्यक्तिपूर्ण टिप्पणियाँ देखने को मिलती रहती हैं ...वे एक सजग पाठिका भी हैं ..केवल आत्मकेंद्रित, आत्म मुग्धा ब्लॉगर ही नहीं ....मैं उन्हें उदीयमान कवयित्री कहने से हिचक रहा हूँ क्योकि मेरी दृष्टि में वे काव्य कर्म के उस  मुकाम पर पहुँच गयी हैं जहां किसी को महज उदीयमान कहना उचित नहीं .....वे लम्बे समय से ब्लागजगत में अविकल साहित्य सेवा कर रही हैं और आपमें से अधिकाँश उनके  काव्य लालित्य से परिचित भी होंगे ....मैं अमृता की कई कवितायें आपको  पढाना चाहता हूँ मगर उन्होंने अपने ब्लॉग पर ताला जड़ रखा है -मैं कापी पेस्ट नहीं कर  पा रहा हूँ ...मगर सर्दियों में उनकी लिखी  एक और कविता  पढने की जोरदार सिफारिश करते हुए इस संभावनाशील कवयित्री के काव्य कर्म के आस्वादन  का आह्वान करता हूँ ....
शुभकामनाएं अमृता!  



मंगलवार, 1 नवंबर 2011

अभी उनसे दोस्ती के जुमा जुमा चंद हफ्ते ही बीते हैं........

जी हाँ ,अभी उनसे दोस्ती के जुमा जुमा चंद हफ्ते  ही तो  बीते हैं ...आदमी बहुत उखमजी किस्मके हैं ,डूब डूब कर पानी पिए हैं ....बहते पानी के साथ और न जाने कितनी नौकाओं में कितने लोगों के साथ सैर सफ़र कर चुके हैं ....उस क्षेत्र से हैं जहां से हिन्दी के कई उद्भट विद्वान राष्ट्र स्तर पर सुशोभित और समादृत हो चुके हैं ..विवरण वे खुद इस लेख में अपनी टिप्पणी में दें यह उनसे करबद्ध निवेदन है ...बशर्ते इस पोस्ट के बाद वे टिप्पणी करने की मनस्थिति में रह पायें!मुझे याद है अभी कुछ महीने पहले ही मेरी एक पोस्ट पर वे कोई प्रशंसात्मक टिप्पणी तो किये मगर मुझे मठाधीश के अत्यंत अप्रिय संबोधन से संबोधित किये ....और मैंने उन्हें अपनी नाराजगी से तुरंत ही अवगत करा  दिया और यह भी जता दिया कि यह उपाधि श्रीयुत अनूप शुक्ल फ़ुरसतिया जी के लिए लिए ब्लॉग जगत द्वारा पहले ही सर्वाधिकार सुरक्षित किया जा  चुका है और कुछ भी हो यह उपाधि उनसे छीनकर मुझे देने से उनकी शान में गुस्ताखी तो नाकाबिले बर्दाश्त है मेरे लिए..तब वे बोले कि वे इस पर समझौता करने को कतई तैयार नहीं हैं और फुरसतिया के साथ मुझे भी वे इसी उपाधि से नवाजते रहेगें ....अब देखिये न कैसे मुंहफट इन्सान भी हैं ये महाशय !

अब आपके मन में इस महान शख्सियत के बारे में जिज्ञासा प्रस्फुटित हो चुकी होगी ..मगर इस लिहाज से कि धैर्य का फल मीठा होता है अभी अपनी जिज्ञासा पर अंकुश बनाए रखिये ...मेरे दिल्ली के अप्रिय प्रसंगों की एक लम्बी फेहरिस्त है और उसमें भी एक नयी आमद इन्ही महानुभाव ने करायी है ....वह यह कि दिल्ली की बोल चाल की भाषा बड़ी कटु है बड़े छोटों का कोई लिहाज नहीं है यहाँ ...वैसे दिल्ली के इस अप्रिय प्रसंग से मैं सौभाग्यवश सर्वथा अपरिचित ही रहा क्योंकि आज तक मेरे किसी भी दिल्ली के मित्र ने मुझसे दिल्लीनुमा अबे तबे की शैली में कभी बात नहीं की ....मगर अपने आज के चरित नायक इसका निर्वहन बड़ी सहजता से करते हैं -क्या कर रहे हो? ,फलां पोस्ट पढ़ा? चलो बाद में बात करते हैं ...रात ज्यादा हो गयी सो जाओ ...कल बात करना ....सुनो क्या कर रहे हो ....जैसे जुमलों का इस्तेमाल वे सहजता से करते हैं ...शुरू शुरू में और यदा कदा आज भी यह बातचीत की शैली से समझिये मेरा कुछ सुलग सा जाता है, मगर क्या करें इन दिनों तो यही महाशय यारों के यार की रेस में हैं तो कुछ कहते भी नहीं बनता ..मैंने अपनी समस्या अमरेन्द्र  जी के सामने रखी,उनसे गिड़गिड़ाया   तक कि भैया उनकी इस आदत के प्रति आप ही उन्हें सचेत कर कुछ तब्दीली का प्रयास करें  मगर वे भी लगता है धनुहा धर दिए हैं और उन्ही की तरफदारी करते हैं ..कहते हैं वे दिल्ली की आम बोलचाल की भाषा बोलते हैं और उनका ह्रदय मासूमियत से भरा है और  इसे झेलते रहिये ...अब मैं कैसे समझाऊँ इस भाषा से मेरा वास्ता बहुत कम पडा है और मैं इसे बिलकुल भी झेल नहीं पाता....

फिर मैं इस शख्सियत को झेलता क्यों हूँ? कारण इनकी अकादमीय प्रतिभा है और बेलौस बिंदास बोलने का जज्बा है ....महोदय कभी जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबार के नियमित लेखक रहे हैं और अब भी गाहे बगाहे लिखते हैं वहां मगर अब ज्यादातर ब्लागजगत के अच्छे लेखों की अनुशंसा करते हैं छपने के लिए ....एक महीन संवेदना के धनी व्यक्ति हैं जिनका निदर्शन और दर्शन उनकी रचनाओं में होता है ...शेर वेर तो ऐसा लिखते हैं कि बस बलि जाऊं इनकी अंदाजे बयां पर और तो और वे भौकते भौंकतियों का ऐसा मुंह बंद  कराते हैं कि एकलव्य जैसा धनुर्धर भी शर्मसार हो जाय उनकी इस काबिलियत पर ....अब क्या ब्लॉग जगत को यह भी बताना पड़ेगा कि एक बार  एकलव्य ने एक बुरी तरह भौंकते कुत्ते (ग्रन्थों में जब  इसी जेंडर का उल्लेख है तो मैं भी कोई रिस्क क्यों लूं?:)  ) के मुंह को बाणों से ऐसा भर दिया कि उसकी भौंक तो बंद हो गयी मगर उसका बाल तक बांका न हुआ ...ऐसी प्रतिभाओं का जाहिर हैं ब्लागजगत में भी बेहद जरुरत है ....और मैं अपने इस चरित नायक की इस काबिलियत से पूरी तरह मुतमईन हूँ और इस पर मुझे फख्र भी है ...मेरे आराध्य चार्ल्स डार्विन के एक अनुयायी हक्सले साहब को लोग डार्विन का बुलडाग कहते थे...तो आखिर मुझे भी एक ऐसे भक्त और समर्पित फालोवर के सानिध्य से फख्र क्यों न हो?


बैसवारी के संतोष त्रिवेदी 
अब तक आपकी जिज्ञासा ब्रह्मान्ड की आख़िरी परत को दरेच रही होगी तो सुन लीजिये यह शख्सियत कोई और नहीं अपने प्रिय संतोष त्रिवेदी जी हैं जो आज इस ब्लॉग के स्तम्भ चिट्ठाकार चर्चा के अतिथि बने हैं .....वे बैसवारी के हैं ...और बैसवारी के बारे में वे आपको और विस्तार से बतायें तो मेरा भी और ज्ञानार्जन हो जाएगा...हम तो अभी तक बस बसवारी के बारे में जानते रहे हैं जो गाँवों में यत्र तत्र आज भी दिख जाती है और बच्चों को वहां जाने से मनाही रहती है ..कारण कि वहां तरह तरह के सांप गोजरों का जमावड़ा होता है .....संतोष त्रिवेदी की  तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया जाय:)  

शनिवार, 24 सितंबर 2011

एक इलाहाबादी ब्लॉगर से मुलाक़ात

वे कहने भर के इलाहाबादी  हैं, हैं बनारसी,यहीं  बनारस में शिक्षा दीक्षा हुयी और अब रोजी रोटी के चक्कर  में  इलाहाबाद में रम  गए हैं ....शिक्षा-दीक्षा के लिहाज से मैं भी इलाहाबाद का शुक्रगुजार हूँ मगर रोजी रोटी का जुगाड़ फिलहाल बनारस में है -इस तरह यह एक रेसिप्रोकल फार्मूले का रिश्ता है जो जयकृष्ण राय तुषार जी से कायम हुआ और अभी जब मैं पिछले दिनों माननीय हाईकोर्ट गया तो इस युवा रचनाकार /ब्लॉगर से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ....जहां ये राज्य विधि अधिकारी के पद को सुशोभित कर रहे हैं ...इनके दो ब्लॉग हैं सुनहरी कलम से और छान्दसिक अनुगायन  -इन दोनों ब्लागों पर एक नज़र डालते ही आप समझ जायेगें कि ये पक्के साहित्यिक ब्लॉग हैं और कई नामी  गिरामी कवि और कवयित्रियों की रचनाएं वहां आपको रसास्वादन के लिए मिल जायेगीं....

मगर मेरी ब्लॉग- मुलाकात इनसे इनके ब्लॉग पर एक संस्मरण से हुयी थी जिसमें इन्होने मेरी एक विश्वविद्यालयीय सीनिअर और अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग में   प्रोफ़ेसर डॉ. अनिता गोपेश जी के विदेश संस्मरण को प्रकाशित किया था-इस संस्मरण के पढने और उस पर मेरे कमेन्ट को भी पढने की सिफारिश कर रहा हूँ ... अगर नारीवाद का मेरा कोई पहला परिचय हुआ था तो इन्ही डॉ. गोपेश जी के व्यक्तित्व से ही जो पिछली सदी  के आठवें दशक में रोबीली, एक बिंदास महिला की इमेज लिए हम सभी सहपाठियों से मिली थीं -बड़ी उन्मुक्त विचार की थीं और आज भी हैं ...मैं उनसे तब भी डरता था और आज भी डरता हूँ जबकि मुझे मालूम है मुझे वे बड़ा सम्मान देती हैं बावजूद इसके कि मैं उनका जूनियर हूँ -उस दिन भी जयकृष्ण जी ने उनसे जब मोबाईल पर बात करायी थी तो उनके बातों से उसी स्नेह-सम्मान की अनुभूति हुयी थी-मजे की बात यह कि हम घोर विज्ञान के छात्र होने के नाते उस समय यह नहीं जानते थे  कि उनका कार्य व्यवहार एक सच्चे नारीवाद का प्रतिबिम्बन कर रहा था -वह तो ब्लॉग जगत में आकर ही यह मालूम हुआ कि मैडम जी जो भी थीं या अभी भी  हैं उसी को एक सच्चा  नारीवादी कहते हैं ...उन्हें एक अतिरिक्त सलाम ..मैंने उनसे एक ब्लॉग बनाने का अनुरोध किया है और वे अगर आ गयीं तो पक्का समझिये यहाँ की कई छद्म नारीवादियों की छुट्टी हो जायेगी -सूरत और सीरत में यहाँ उनसा न कोई(उनके ऊपर-लिंकित संस्मरण पृष्ठ पर जाकर खुद देख लीजिये न ) !जयकृष्ण भाई ने मुझसे वादा किया है कि उनका ब्लॉग वे जरुर बनवायेगें -एक ब्लॉगर का वादा रहा यह! 

जयकृष्ण जी एक मजे हुए गीत/गजलकार हैं -अभी अभी ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए शहरयार साहब ने ज्ञानोदय में छपी उनकी गजल को सराहा है .मेरी दरख्वास्त है कि वे आपको उस रचना से रूबरू करायें ...अब ऐसे शख्सियत का और क्या परिचय दिया जाय. उनकी एक गजल  आपको पढवाता हूँ -

हमीं से रंज ,ज़माने से उसको प्यार तो है 

चलो कि  रस्मे मोहब्बत पे एतबार तो है 

मेरी विजय पे न थीं  तालियाँ न दोस्त रहे 
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतजार तो है 

हजार नींद में एक फूल छू गया था हमें 
हजार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है 

गुजरती ट्रेनें रुकीं खिड़कियों से बात हुई 
उस अजनबी का हमें अब भी इंतजार तो है 

तुम्हारे दौर में ग़ालिब ,नज़ीर ,मीर सही 
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है 

अब अपने मुल्क की सूरत जरा बदल तो सही 
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अख्तियार तो है 

हमारा शहर तो बारूद के धुंए से भरा 
तुम्हारे शहर का मौसम ये खुशगवार तो है 
बहुत बहुत शुभकामनाएं जयकृष्ण जी .....

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

नवाबों के शहर में दूसरा दिन और अजीम शख्सियतों से मुलाक़ात


संतोष त्रिवेदी जी लखनऊ में मेरे प्रवास के पल पल की जानकारी ले रहे थे..कहाँ कहाँ गए किससे किससे मिले क्या क्या खाया आदि आदि ..भले और सहृदय मानुष है ...सच्चे और निष्कपट ...मगर ऐसी भी घुसपैठ क्या भाई जी कि  रिजर्व टाईम और प्राईवेट क्षणों में भी राहत नहीं ....रवीन्द्र प्रभात जी के पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के बाद मैंने अपने डेरे का रुख किया ...जाना तो हजरत गंज चाहता था 'गंजिंग' का आनन्द लेने मगर  किसी का साथ न होने से यह इच्छा फलीभूत न हो सकी ..मायूसी लिए डेरे पर लौट आया ....संतोष जी को भी सूचित कर दिया ...फेसबुक पर लगातार मेरे पोजीशन अपडेट हो रही थी ..इस  भुलावे में कि कोई और हाल चाल तो पूछे ..मगर सन्नाटा रहा ....हौसले और हकीकत का यही फर्क है ..अब तो मेरी इस पोजीशन -अपडेट तकनीक के चलते यह कहने वाले भी कम होते गए हैं कि भाई आपने पहले बता दिया होता तो हम पलक पावंडे न बिछा देते ..अब सिद्धार्थ त्रिपाठी जी की जरुर इस आशय की टिप्पणी पिछली पोस्ट पर आयी है ..अब वे कहेगें कि उनको तो फेसबुक छोड़े अरसा हो गया है ..बहरहाल ... :)मगर वे भी तो वर्धा में हैं लखनऊ में उनके होने की तसव्वुर भी मैं कैसे करता ... निश्चय ही ब्लॉग जगत के रिश्तों की शुरुआती गर्मी पर अब तुषारपात होने लग गया है मगर अभी भी मानवीयता का परचम लिए खड़े  कुछ लोग अपवाद हैं ...उन्हें सलाम! 
मुझे उत्तर प्रदेश प्रशासन एवं प्रबंध अकादमी पहुंचना था, सो मैं जल्दी ही नहा धो नाश्ता वाश्ता करके वहां दस बजे के पहले ही पहुँच गया ....वहां मेरे शासकीय दायित्व के दीगर जो सबसे बड़ा लाभ हुआ -गुरु और गोविन्द से एक साथ मिल जाने के अनिर्वचनीय आनंद का .....संस्थान के अतिरिक्त निदेशक  हेमंत कुमार जी, ऐसे गुरु जिनसे मिलते ही उन्होंने गोविन्द से भी मिला दिया जो इस बार मेरे लखनऊ प्रवास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ...गोविन्द बोले तो मनीष शुक्ल जी जो उसी संस्थान में एक बड़े ओहदे पर हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वे  ब्लॉगर भी हैं -सोने पर सुहागा ....वे एक गहन अनुभूति  वाले शायर हैं ....गौतम राजरिशी साहब से अभी हाल की ही उनकी दोस्ती भी है जिसकी प्रगाढ़ता का अहसास मुझे उनसे मेजर साहब के बारे में बातचीत से हुआ और इसमें क्या दो राय कि ब्लागजगत में शायरी को एक नया तेवर और मुकाम देने में मेजर साहब का कितना योगदान है ..वे एक सृजन, साहित्य प्रेमी पहले हैं और फ़ौजी बाद में ....
पहले गुरु जी की बात -हेमंत कुमार जी प्रशासनिक ढाँचे में रहने के बाद और बावजूद भी गहरे रचनाधर्मिता से पूरी शिद्दत के साथ जुड़े हुए हैं ..जिसका प्रमाण है उनकी अनेक पुस्तकें जो साहित्य की कई विधाओं -कहानी,कविता ,यात्रा वृत्तांत ,संस्मरण,व्यंग की नुमाईंदगी करती हैं ..उनकी सूटकेस में जिन्दगी  यात्रा संस्मरण की एक नायाब कृति है ....जिसका अवगाहन आपको अपनी ही दुनिया के बड़े चुटीले और मार्मिक पड़ावों को दिखाता जाता है ...इसकी चर्चा यहीं फिर कभी होगी ...उन्होंने मिलने पर एक नया तोहफा दिया है 'लाल फीता' यह संभवतः व्यवस्था के कार्य व्यवहार के प्रति एक व्यंगकार की प्रतिक्रिया है ..अभी मैंने इसे पढ़ा नहीं ..पढ़कर साझा करूँगा और इंशा अल्लाह इस शख्सियत के बारे में विस्तार से लिख सकूंगा ...अभी तो आपको अपने गिरधर गोविन्द से मिला दूं ..
मनीष शुक्ल जैसा आप यहाँ देख सकते हैं -गहरी अनुभूति और अभिव्यक्ति की परिपक्वता लिए एक रचनाकार और उससे भी बढ़कर एक बढियां इंसान हैं ....मैंने ज्यादातर शुक्ल लोगों को शुक्ल पक्ष का ही पाया है ..विद्वता अथवा / और श्रेष्ठता के शिखर पर ..मेरी पत्नी खुद  शुक्ल खानदान से हैं -इसलिए भी शुक्ल लोगों के प्रति मेरा पहला रिएक्शन अदब और भय मिश्रित सम्मान का ही रहता है  अब अपवाद तो हर जगह हैं :)  ... .. आज के पोस्ट के मेरे नायक मनीष जी के समय की व्यस्तता के कारण  चंद पलों की उनसे हुयी मुलाक़ात ने ही इस मिलन को यादगार बना दिया -वित्त विभाग से सीधे जुड़कर भी उनकी 'साधारणता' की 'असाधारणता' ,सादा जीवन और विचारों की समृद्धता और प्रकारांतर से वित्त को धता बताती उनकी  प्रत्यक्ष वित्तीय 'विपन्नता ' या उसे ज्यादा तवज्जो  न देने की उनकी प्रतिबद्धता ने मुझे गहरे प्रभावित किया ...चलते चलते उन्होंने एक पत्रिका उन्होंने मुझे थमाई -'लफ्ज़' जिसमें उनकी और गौतम राजरिशी जी की ताजातरीन गजलें छपी हैं ..जिनका अस्वादन/शेरो सुखन में मुब्तिला   मैंने वापसी रेलयात्रा सहज की बिता दी  ...उनकी एक ग़ज़ल भी हो जाय यहाँ -
गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं.
तनावर जिस्म गाड़े जा रहे हैं,

यक़ीनन कोई वीराना सजेगा.
घरौंदे फिर उजाड़े जा रहे हैं,

तुम्हें बदनाम तक होने न देंगे.
हर इक तहरीर फाड़े जा रहे हैं,

बहुत रोओगे हमको याद करके.
तुम्हें इतना बिगाड़े जा रहे हैं,

खिजां की उम्र भी आने को है अब.
चले आओ कि जाड़े जा रहे हैं,



मनीष शुक्ल
मनीष जी से गुजारिश  है  कि अपने ब्लॉग पर नियमित हों और हमें अपने नायाब शेरो /शायरी /गजलों से रुबरूं कराते रहें ....हम इंतज़ार करेगें!   

बुधवार, 24 अगस्त 2011

डॉ.अमर कुमार: अंतर्ध्यान हुआ ब्लागजगत का दुलारा स्फिंक्स ...एक श्रद्धांजलि!

श्रद्धांजलि 
यह स्तब्धकारी सूचना संतोष त्रिवेदी जी ने कल शाम को दी और इसे सत्यापित किया डॉ.दराल साहब ने  ...मन बेहद उद्विग्न हो गया ....ब्लॉग जगत में अपनी जीवंत मौजूदगी का हमेशा अहसास दिलाने वाली शख्सियत हम सभी का साथ छोड़ चुकी थी ..मैं अक्सर सतीश सक्सेना जी से उनके बारे में बोलते बतियाते उन्हें ब्लॉग जगत का स्फिंक्स कहा करता था -मगर डरावने नहीं दुलारा किस्म वाला स्फिंक्स ..कारण यह भी कि उन्हें कोई ठीक से समझ नहीं पाया ,कम से मैं तो बिलकुल भी नहीं और इसलिए उन्हें एक रहस्यमय वजूद वाले व्यक्तित्व का दर्जा मैंने दिया था, स्फिंक्स कहकर -मगर एक सबका प्यारा दुलारा सा स्फिंक्स ....उनका अध्ययन का एक बड़ा विषद क्षेत्र था .....चिकित्सा तो उनका कर्म ही था मगर उससे हटकर साहित्य और जीवन के लालित्य में उनकी रूचि अपनी ओर आकर्षित करती थी ....वे ब्लॉग जगत में अपनी ख़ास स्टाईल की टिप्पणियों के कारण  विख्यात थे जिन्हें काजल कुमार ने 'बीहड़ ' कहा है -क्योकि वे बहुत प्राकृत होती थीं ....देशी शब्द मुहावरों से लबरेज .....और प्रायः इटालिक्स में भी .....   

वे कब कैंसर से पीड़ित हुए नहीं पता ....जिजीविषा ऐसी कि कभी बताया तक नहीं ..जब अस्पताल से लौटे तब ज्यादातर लोग जान  पाए उनकी असाध्य बीमारी के बारे में ..मगर विनोद प्रियता देखिये कि आते ही शरद पवार जी की फोटो चेप कर कहते  भये  कि आपरेशन के बाद मेरा थोबड़ा ऐसा हो गया है ..... उनकी टिप्पणियाँ कभी कभार तो ऐसी बहुअर्थी हो जाती थीं कि समझने में बहुतों के छक्के छूट जाते थे ... बिलकुल बाणभट्ट की  कादम्बरी की भांति ....इसलिए ही सतीश जी से  बातचीत में उन्हें स्फिंक्स कहकर मैं किनारा कर लेता था कि इस  रहस्यमय व्यक्तित्व को ज्यादा जानने का प्रयास बेमानी है ....विगत आम के मौसम में मुझे उन्होंने अपनी बाग़ के चौसा आमों के रसास्वादन का न्योता दिया था ..अब अवसान इतना निकट है कौन जानता था ..वे ठीक भी तो हो चले थे..पर कल अचानक हालत बहुत खराब हो गयी और शाम को वे अपने दैहिक वजूद से मुक्त हो लिए ....मगर उनकी यशः काया हमारे साथ बनी रहेगी! उनके इस आकस्मिक अवसान से सारा ब्लागजगत मर्माहत है ..संतोष त्रिवेदी जी ने उन्हें यहाँ श्रद्धांजलि दी है ...अनुराग शर्मा जी ने उनके शोक श्रद्धांजलियों के संकलन का बीड़ा यहाँ उठाया है ..फेसबुक पर उनके लिए श्रद्धांजलियों का तांता लगा हुआ है ...चिट्ठाचर्चा पर भी शोक आयोजन है! नारी पर भी शोक प्रस्ताव  है!


उनके इस तरह से सहसा चले जाने से बेहद स्तब्ध और दुखी हूँ  ....ईश्वर उनकी आत्मा शान्ति दे और परिवार को इस हादसे से उबरने की शक्ति ... .

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दिल्ली का दूसरा दिन -ब्लॉगर साथियों से मुलाक़ात...बेदिल दिल्ली में डॉ.दराल की दरियादिली!

अब कोई ब्लॉगर शहर में हो और वहां के ब्लागरों से उसकी  मुलाकात न हो(कृपया अब  इसे मुक्कालात न पढ़ें) यह तो असम्भव ही था ..भारतीय समाज  अब सर्वथा एक नए सामजिक सम्बन्ध -बात व्यवहार को साक्षात कर रहा है ..और यह है ब्लॉगर मिलन....अपनी नीतिगत कार्ययोजना के तहत मैंने अपना कार्यक्रम पहले ही अपने ब्लाग पर डाल दिया  था जिससे प्रायः इस असहज सवाल /औपचारिकता  से बचा जा सके कि अरे पहले बताया होता तो हम भी मिल लेते आपसे ....वैसे भी दिल्ली जैसी अतिव्यस्त महानगरी में किसी के लिए किसी के पास समय नहीं रहता ..अपने लिए और अपनों के लिए भी जब  लोगों के पास पर्याप्त समय और संसाधन नहीं है ...तो ऐसे में क्यों किसी को धर्मसंकट में डाला ही जाय ...


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यू पी भवन में जमी चौकड़ी 
एक अद्भुत संयोग यह हो रहा था कि कैंटन ,अमरीका से वीरेन्द्र शर्मा ऐलियास वीरुभाई भी मेरे दिल्ली पहुचने के साथ ही वहां  पहुँच रहे थे और इस अवसर को मुझे बिना उनसे मिले गवाना नहीं है यह मन संकल्पित कर चुका था ....उम्र की वानप्रस्थ अवस्था पर पहुँच कर भी वीरुभाई अजस्र ऊर्जा से भरे हैं और उनका मुखमंडल अलौकिक आभा से देदीप्यमान {इस ब्लॉग पर हिन्दी मुफ्त में सिखायी जाती है :)} रहता है और बतरस के ऐसे धनी कि बस सुनते जाईये , उनके पास सुनाने  के लिए संस्मरणों का खजाना रीतेगा नहीं .....उनकी इस विशिष्टता से शाम को सम्पन्न एक छोटी किन्तु न्यारी सी ब्लागर मीट में डॉ .टी एस दराल जी और सतीश सक्सेना जी भी दो चार हुए ....बेदिल दिल्ली में डॉ दराल   की दरियादिली देखने को मिली जब उन्होंने मुझे सायं भोज के लिए आमंत्रित किया -बहुत ही विनम्र ,मिलनसार ,एक भद्र नागरिक के सारभूत व्यक्तित्व हैं डॉ दराल ..शाम को वे और यारों के यार ब्लॉगर सतीश सक्सेना जी मुझे लेने उत्तर प्रदेश भवन आये ..तब तक वीरुभाई भी पधार चुके थे जहां हम ब्लागजगत के कई वर्जित  क्षेत्रों की चर्चा में मशगूल थे ....
इंडिया गेट पर एकल फोटो: सौजन्य सतीश भाई!

बातों ही बातों में वीरुभाई ने टी एस दराल साहब का पूरा नाम पूछ लिया तो  डॉ साहब तनिक संकोच में निरुत्तर से ही रहे ...और हम कना प्लेस पर कहीं शाम गुजारने चल पड़े ....रास्ते में इण्डिया गेट पर मित्रवर सतीश जी ने मुझे केंद्र बिंदु में रख  ऐसा फोटो सेशन किया कि कुछ समय के लिए मुझे लगने लगा  जैसे मैं कोई राष्ट्रीय नेता, अभिनेता  हूँ ...और मेरा एक फोटो फोलिओ तैयार हो रहा है ..मैं यह भी चाहता था कि वीरुभाई फोकस में रहें और यह बात मुझे असहज भी कर रही थी ,असमंजस में डाल  रही थी (क्षमा वीरुभाई ...सतीश भाई के उत्साह के आगे मैं लाचार था ...) ..शूटिंग के दौरान ही डॉ दराल साहब ने इण्डिया गेट की दीवार पर ऊपर लिखे एक नाम की और इशारा किया, किसी की तारीफ़ थी वहां ..अपने डॉ दराल  साहब  की ही तो ...विश्वास नहीं तो यह लिंक देखिये !
वीरुभाई और डॉ. दराल के बीच सैंडविच हुए हम 

वीरुभाई को अपनी 'फुलनेम   जिज्ञासा'  का उत्तर मिल गया था ..तो प्रश्नोत्तर के इस नायाब लहजे की सूझ थी डॉ दराल साहब की और इसकी खातिर मुझे भी इण्डिया गेट को करीब से देखने का बोनस मिल गया था...शाम तो सचमुच हसीन थी....और उसे ब्लडी मेरी ने और भी हसीं बना दिया था ...ब्लडी मेरी के बारे में मेरी जिज्ञासा को काबिल दोस्त सतीश भाई ने विधिवत शांत किया(सबसे नीचे बाएं कोने पर ब्लडी मेरी का चित्र है!)इस नायाब पेय पर ज्ञानवर्धन पर मेरी त्वरित प्रतिक्रया थी कि कितना कुछ जानना समझना शेष रह गया है   इस दुनियां  में:)      ....
सिविल सेवा अधिकारी संस्थान से बाहर निकलते ही सतीश जी ने शूट किया  
वीरुभाई के चहकने ने भी मुझे ब्लडी  मेरी की ओर  प्रशंसा भाव से देखने को उत्सुक  किया ....वीरुभाई का ज्ञान विज्ञान विषयों और खासकर चिकित्सा  पर ज्ञान बहुत अद्यतन है ..यह आप उनके ब्लाग -राम राम भाई पर जाकर भी देख सकते हैं ....कितने ही  विषयों की विविधता पर उनकी लेखनी समान रूप से चलती है ....इन दिनों वे साईंस ब्लागर्स असोसिएशन के ब्रांड अम्बेसडर बने हुए हैं ....हमें उन के ज्ञान और सानिध्य पर फख्र है ...जुग जुग जिए महानुभाव ....हजार वर्ष!

खाने का इंतज़ार 
मुझे एक अस्पष्ट सा आईडिया था कि हमारी यह लघु ब्लॉगर मी कना प्लेस पर होनी थी इसलिए वहीं अपनी किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में मौजूद  अभिषेक मिश्र से मैंने पहले तो रुकने को कहा था ..उन्होंने इंतज़ार भी किया मगर बाद में मैंने वेन्यू अलग होने की बात उन्हें बताई ..सारी अभिषेक.... फिर कभी .....अब वेन्यू था -सिविल सेवा अधिकारी संस्थान और वहां यद्यपि थोडा शोर अवश्य था मगर खान पान की गुणवत्ता लाजवाब थी ...भोजन भी यम यम ...डॉ दराल साहब के इस औदार्य और ब्लॉगर नवाजी के लिए शुक्रिया शब्द बेहद औपचारिक है इसलिए इसे देने से  कतरा  रहा हूँ .......आनंद  आ गया था आज दिल्ली में दो दिनों के बाद .... तनाव शैथिल्य की यह सौगात बस यादों में पैबस्त हो गयी है ....शाम को सतीश जी ने हमें अपने अवस्थान स्थल पर छोड़ा और डॉ दराल और वीरुभाई को लेकर आगे बढ़ गए थे ..आगे की दास्ताँ वीरुभाई भी कभी सुनाएगें ही...
.....जारी है दिल्ली दास्तान ...

शनिवार, 11 जून 2011

एक बेचैन आत्मा से मुलाक़ात!

इस ब्लॉग के लम्बे समय से सूने चल रहे स्तम्भ चिट्ठाकार चर्चा को आज गुले गुलजार करने तशरीफ़ लाये हैं देवेन्द्र पाण्डेय जी जो बेचैन आत्मा के नाम से ब्लॉग जगत में खासे मशहूर हैं ....जब पहले से ही मशहूर हैं तो फिर यहाँ  उनकी चर्चा क्यों? मैं पहले भी बताता रहा हूँ कि किसी चिट्ठाकार की यहाँ चर्चा के पीछे उसके प्रति खुद मेरी अपनी सोच ,अपने रुख का उजागर करना होता है और कुछ तो उसके प्रति सम्मान -उदगार की अभिव्यक्ति का भी भाव रहता है .यह उसके अवदानों की  एक कृतज्ञ अभिस्वीकृति(अक्नालेज्मेंट) भी  है ....यद्यपि मुझ पर यह आरोप है कि मैं खुद अपनी ही गढ़ी मूर्तियों को कालांतर में अपवित्र -अपमानित करने की प्रवृत्ति रखता हूँ ....अन्यत्र यह कहा जा चुका है कि मैंने  इस स्तम्भ के कम से कम तीन चिट्ठाकारों के साथ ऐसा किया है..... ....अब कहने का क्या ,कुछ लोगों की हमेशा नक नकाने की आदत जो होती है ...

बात पिछले लोकसभा के चुनावों की है .सभागार  में हजार से भी ज्यादा अधिकारी चुनावों के संचालन की दीक्षा ले रहे थे.....जैसे ही मध्याह्न  अंतराल /अवकाश हुआ अधिकारियों के हुजूम से एक आम चेहरा डायस की ओर लपका और ठीक पास आकर बुदबुदाया -मैं बेचैन आत्मा ..और तत्क्षण ही वह ख़ास बन गया ..अरे ये तो अपने प्रिय ब्लॉगर बेचैन(आत्मा )  जी निकले जो अब अपनी सुडौल देह और निराकार बेचैन आत्मा दोनों के साथ मेरे सामने आ उपस्थित थे....अब तक आनंद की यादें पर  अपने जीवंत संस्मरण और बेचैन आत्मा पर अपनी काव्य प्रतिभा का वे लोहा मनवा चुके थे-तो यह था हमारा पहला मिलन ...दुबारा वे घर पर एक लघु और संक्षिप्त सी ब्लॉगर संगोष्ठी में शिरकत  करने आये और अपनी व्यंजन  प्रियता (gourmet होने का  ) का संकेत दे गए ...

मेरा अपना अनुभव है कि कविता /कविताई का निपुण व्यक्ति प्रायः अच्छा गद्यकार होता है मगर गद्यकार को कवि होते कम ही देखा है मैंने .....मगर देवेन्द्र जी इन दोनों विधाओं में सिद्धहस्त हैं ...सच कहूं तो उनका ब्लॉग आनंद  की यादें जो आत्म संस्मरणात्मक है ,मुझे बहुत प्रभावित करता है ..बचपन की यादों और अतीत के बनारसी परिवेश का इतना प्यारा और प्रामाणिक विवरण मैंने कम ही पाया है ....उनकी कवितायें भी इसी तरह बहुत मौलिक और विभोर करने वाली होती हैं ....उनमें एक हास्यकार (ह्यूमरस- ता) का भी  आवेग  कभी कभी उभरता है ....मगर संस्मरण और कविता उनकी सृजनशीलता के स्थाई भाव हैं ..

 एक सरल ,हंसमुख व्यक्तित्व  के मालिक तो वे हैं ही जबकि हैं वित्त/अकाउंटिंग  जैसे रूखे सूखे विषय के जानकार ...आज ब्लॉग जगत में उनका होना एक अच्छी बात है और उससे भी अच्छी बात है कि वे सतत सक्रिय रहकर अपने रचना कर्म से हमें कृत कृत्य कर रहे हैं ...अहर्निश अशेष शुभकामनाएं!




सोमवार, 13 दिसंबर 2010

ब्लागरों के ब्लॉगर और यारों के यार सतीश सक्सेना से मुलाक़ात ....दिल्ली प्रवास का दूसरा दिन!

सात दिसम्बर की सुबह दिल्ली बहुत ठण्ड थी ...पारा ६ डिग्री नीचे तक उतर चुका था ....टीवी के जरिये .इस ठण्ड की खबर के बावजूद भी मैं ठंड नहीं रख सका और बाबत ब्लॉगर मीट के सतीश सक्सेना जी को फोन कर डाला  ...उनकी वही परिचित दुःख हारण तारण उमंगपूर्ण आवाज सुनायी पडी ...वे मिलने को उत्साहित दिखे ...तय पाया गया कि सभी होटल रायल पैलेस या फिर निकटस्थ सम्मलेन के वेन्यू पर ही ९ की सुबह १० बजे इकट्ठे हो जायं ....इसके पहले मैं जिन जिन से अलग भी बात कर चुका था वे अन्यान्य कारणों से ९ के पहले उपलब्ध नहीं थे ..सतीश जी ने कहा कि वे ९ को तो आयेगें ही मगर इसके पहले भी मुझसे मिलना चाहेगें ..अगला इतने प्रेम से मिलना चाहे तो  मुझे मिलने में क्या दुविधा ..जाकर जेपर सत्य सनेहू तेहिं ता मिलई न कछु संदेहू ....आज कांफ्रेंस का उदघाटन सत्र था इसलिए हम सब पूरे औपचारिक तौर पर तैयार होकर जल्दी ही सम्मलेन स्थल पर पहुँच गए ....

आम जन के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार पर यह भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन था ....प्रतिभागियों में काफी उत्साह था ....५० से भी अधिक देशों के प्रतिभागी उपस्थित हुए थे ...काफी गहमा गहमी थी ..उदघाटन हमारे सर्वप्रिय पूर्व राष्ट्रपति  कलाम साहब ने किया और युवाओं को विज्ञान संचार के मुहिम से जोड़ने का आह्वान किया ....साईंस ब्लागर्स असोशिएसन और साईब्लॉग पर इसकी रपटें  पढी जा सकती है ...

विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार के इस विशाल और अन्तर्ऱाष्ट्रीय सम्मलेन को भी अपने अहम् और संकीर्ण नजरिये के चलते कुछ विज्ञान संस्थानों  /परिषदों ने बायकाट कर रखा था क्योकि सबको सेन्ट्रल चेयर की दरकार थी ....जबकि इसकी वेबसाईट पर सभी शर्ते ,भागीदारी के नियम स्पष्ट रूप से इंगित थे और यह साईट निरंतर अपडेट होती रही है मगर शायद कुछ लोगों की गलतफहमी या अहमन्यता थी कि उनका हाथ पकड़कर मुख्य कुर्सी तक लाकर बिठाया जाएगा ..आयोजकों ने ऐसे संकीर्ण मानसिकता वालों को घास तक नहीं डाला और एक भव्य सफल कार्यक्रम करके दिखा दिया ...लोग ठगे भकुए से बने देख रहे हैं ..बंधुओं क्या बिना मुर्गों  के  बाग़ दिए  सूरज नहीं निकलता है ? ....अब मुर्गों/मूर्खों  को कौन बताये ? 

मुझे एक समान्तर सायंकालीन सत्र विज्ञान कथाओं के जरिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार पर कोआर्डिनेट करना था ....उसके पहले सतीश जी का फोन आ गया था कि वे मुझसे मिलने ही नहीं बल्कि लेने आयगें और हमने बिना विचारे झट से हाँ कर दी थी ....अब मुझे क्या पता था कि वे ठीक उसी समय आ जायेगें  जब मैं अपने सत्र संचालन के मध्य में था ....ऐसे गलत वक्त साईलेंट मोबाईल  थरथराया ..अन्तःप्रेरणा से जान गया कि सतीश जी हैं ....बिल्कुल वही थे...बोले कि वे बाहर इंतज़ार कर रहे हैं ..मैं फुसफुसाया बस आधे घंटे और ...वे मौके की नजाकत समझ गए और कहा कि ठीक है आधे घंटे बाद आते हैं ....लगभग  दो तिहाई विदेशी प्रतिभागियों से भरे  व्याख्यान हाल में जाकिर अली रजनीश ने भी साईंस फिक्शन इन ब्लाग्स पर अपना परचा पढ़ा .....बहरहाल आधे घंटे में सत्र का समय समाप्त हो गया ....आडियेंस दूसरे लेक्चर हालों की ओर लपक उठी और मैं मुख्य द्वार की ओर ..

जैसे ही मुख्य द्वार पर पहुंचा एक कार तेजी से भीतर घुसी -अन्तःप्रज्ञा ने तुरंत सचेत किया कि सतीश जी हैं ,हाँ वही थे... उन्होंने  भीतर से हाथ हिलाया और गेट पर ही कार रोककर दरवाजा खोल दिया ...और पीछे से आई कार का हार्न बज उठा ..मैंने उन्हें आगे बढ़ाकर  कार रोकने का इशारा किया ,थोड़े से असमंजस के बाद उन्होंने कार बढाई और आगे जाकर रोक दी ....सतीश जी सचमुच मुझे कांफ्रेंस स्थल से बलान्नयित करने का दृढ इरादा लेकर आये थे-इस प्रेमानुराग के चलते मैंने कांफ्रेंस डिनर को मारी गोली और चल पड़े इस यारों के यार और ब्लागरों के ब्लॉगर के साथ ...जाकिर अली रजनीश साथ में  थे उन्हें  शैलेश भारतवासी के यहाँ जाना था जहाँ वे ठहरे थे....सतीश ने उन्हें लिफ्ट दिया और शाम के भोज का गिफ्ट भी ..
यारों के यार और ब्लागरों के ब्लॉगर

हम पहली बार मिल रहे थे मगर अपरिचय की कोई दीवार नहीं ....खूब हंसी ठट्ठा हुआ ,ब्लागजगत के नामी गिरामियों की चर्चा हुई ....और उन्होंने एक जोरदार दावत मोतीमहल में दी ...उन्होंने मुझसे कुछ गोपन सवाल जवाब किये और मैंने उनका खुला जवाब दिया ..मेरे पास गोपन कुछ नहीं है ....कोई दुश्मन है या दोस्त एलानियाँ कहता हूँ जबकि कुछ नीति विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन में गोपनीयता का अपना महत्व है और कभी कभार यह बेहद जरुरी है (जुलियन असान्जे ,सुन रहे हो न बास ) ....सतीश जी ..अरे अरे अभी ही सब  कह दूंगा तो उनके बारे में अपने चिट्ठाकार स्तम्भ में फिर क्या कहूँगा ...यारो के यार ने मुझे होटल पर रात्रि के दस बजे के आस पास छोड़ा और जाकिर को छोड़ने आगे बढ गए ....होटल में पहुंचते ही बनारस के शीतला घाट पर हुए हादसे की खबर सुन कर सन्न रह गया ...अब ब्लॉगर मीट का क्या होगा? मुझे तो वापस भागना होगा ....परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी हो गयीं थीं ....

 जारी है ....


 


गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

मिथिलेश दुबे की याद है किसी को ?

आज मिथिलेश जी का फोन आया तो मुझे अच्छा लगा ,इतने  दिनों बाद उत्साह और ऊर्जा से लबरेज इस युवा ब्लॉगर की आवाज सुनायी दी ..मगर उसके बाद जो कुछ वे रौ  में कहते गए  सुन सुन कर मन व्यथित हुए बिना नहीं रहा ..उनके पिछले दो माह कठिन कष्ट के बीते हैं ...उन्होंने बताया कि  लखनऊ में उन्हें  डेंगू  हुआ और हालत क्रिटिकल होने पर उन्हें अपोलो हास्पिटल दिल्ली ले जाया गया ...उनकी सबसे बड़ी और उचित पीड़ा यह है कि उनके हमदम दोस्त ब्लागरों तक ने भी उनकी सुधि नहीं ली ...खबर मिलने पर कतरा कर निकल गए ...प्लेटलेट की कमी आखिर घर से लोगों के आने पर रक्तदान के बाद  दूर हुई ...और एक बार यह फिर पुष्टि हुई कि रक्त का सम्बन्ध ज्यादा घना होता है ....ब्लड इज थिकर दैन  वाटर बहरहाल वे इन दिनों कारपेट नगरी भदोहीं में अपने पैतृक घर पर स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं .

मिथिलेश ने अपने कुछ दोस्त ब्लागरों का नाम लेकर भी गिनाया और बताया कि खून देने की बात कौन कहे वे उन्हें देखने तक नहीं आये ..मैंने उन्हें एक बुजुर्ग की हैसियत से सलाह  दी और कहा कि मिथिलेश अब आपको जीवन की सीखें मिलनी शुरू हुई हैं ..एक तरह से यह दुनिया ऐसी ही है ,खुदगर्ज लोगों की ..चाहे वे ब्लॉगर हो अथवा न हों ....उन्होंने यह कहा कि बीमारी से ठीक होने पर किसी भी ब्लॉगर को यानि मुझे उनका यह पहला फोन है -सहसा एक ग्लानि बोध ने  मुझे  भी ग्रसित किया .मैंने ही कहाँ उनका कुशल क्षेम पूछा इन दिनों ..मैंने खुद को पंचायत चुनावों के नाम पर माफ़ किया और उन्हें अपनी  इस व्यस्तता की बात बतायी ...मगर सच कहता हूँ मुझे याद तो मिथिलेश की आई थी मगर हाँ फोन उन्हें नहीं कर सका ...और इसके पहले उनका ही फोन आ गया ..उन्होंने यह भी बताया  कि सतीश सक्सेना जी के मेल और काल्स जरुर आये मगर वे उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं थे-सुन रहे हैं न सतीश भाई! मान  गए आपको बन्धु! औरों के बारे में तो बस यही कहा जा सकता है कि कोई मजबूरी रही होगी वर्ना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता ......

 मिथिलेश धर दुबे 


  मिथिलेश जी से मैं साक्षात रूबरू हो चुका हूँ ..पहले विश्वास नहीं होता था कि वे सबसे कम उम्र के युवा ब्लागर हैं ...देखा तो सौ फीसदी इत्मीनान हो गया ..एक सुदर्शन ,मेरे बेटे की उम्र का नौजवान मेरे सामने था -गदह पचीसी की ओर खरामा खरामा पग बढ़ाता हुआ .....देश दुनिया ,जान  जहान के बारे में एक मासूम सी उनकी सोच से कहीं कुछ कचोट भी अनुभूत हुई थी मुझे ..कितना कुछ दुनिया को अभी जानना समझना है बच्चे को ...लेकिन उनका निश्छल व्यक्तिव उस समय मुखर था और मैंने उन्हें ढेर सारा आशीष देकर विदा किया था ...दुनिया को तो पूरी तरह हम भी आज तक नहीं समझ पाए हैं कितने अपनों  ने कैसे  कैसे दुःख पहुचाये हैं ,पीठ में छुरे घोपे हैं ..यह तो अभी बच्चा है ...और बच्चों के लिए तो दिल में हमेशा स्नेह ही उमड़ता रहा है ..आशीष ही ह्रदय से रेडियेट होता है ...

मिथिलेश जी  का बार बार ब्लॉग जगत की हाल चाल और नए तूफानों की जानकारी की  उत्कंठा से यह लग रहा था कि जनाब अब पूरी तरह  ठीक हो गए हैं ...मैंने उन्हें महफूज जी के गोलीकांड के बारे में भी बताया -लगा जैसे उनका खुद का दुःख दूर हो गया हो ...उनकी हाल चाल ,गोली कहाँ लगी छर्रे कितने लगे यह सब पूछते रहे ..यह तो अच्छा हुआ कि महफूज भाई ने मुझे यह सब जानकारी तफसील से दे दी थी इसलिए मुझे बताने में हिचक नहीं हुई ..फिर वे  वापस  ब्लॉग जगत के नए धमाकों पर केन्द्रित हो गए ...वाह रे मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव वह दुनियादारी से खफा होकर भी उसी का होकर बना रहता है .. मैंने उन्हें सहेजा कि भइया मेरे ,अभी आराम करो ,स्वास्थ्यलाभ करो .. छोडो ब्लागिंग वलागिंग ..जब वे नहीं माने तो मैंने उनके ही वेश्याओं पर एक लेख के जुमले में जवाब दे डाला -सुनो मिथिलेश ,ब्लागिंग मुई क्या है कि यह एक वैश्या की जवानी है जो हमेशा सदाबहार दिखती है ....जबकि होती कुछ और है ..अभी इससे दूर रह सको तभी खैर है ...हा हा ...अब वे शरमा के चुप हो लिए थे.....और मैं यही चाहता भी था ...

आप चाहें तो मिथिलेश जी का कुशल क्षेम इस नंबर पर -09457582334 जान सकते हैं ...वैसे वे अब स्वस्थ हैं और ब्लॉग जगत में धमाकेदार वापसी करने की नीयत रखते हैं .....कायनात सावधान हो ले ....

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

हैट्स आफ अल्पना जी ....ब्लॉग जगत आपके अवदानों से कृत कृत्य है!

गीत उन्मन है गजल चुप है औ रुबाई है उदास ..ऐसे माहौल में नीरज को बुलाया जाय ...(ब्लॉग जगत के नए  जेहादियों लानत है तुम पर,कम से कम मेरी एक रात तुमने बर्बाद कर दी है ... ) ......और मैं आह्वान करता हूँ अल्पना वर्मा जी का -मेरी एक और प्रिय चिट्ठाकार जो  अब किसी परिचय का मुहताज नहीं हैं .यहाँ इतनी देर से उनके  आह्वान पर मैं खुद भी थोडा अचम्भित हूँ -उन्ही से शिकायत करता हूँ  -बड़ी देर कर दी मेहरबां   आते आते ..होता है होता है ...कभी कभी ऐसा भी हो जाता है ...अब वे इतने दिनों से हमारी सहयोगी हैं -साईंस ब्लॉगर असोसिएशन की जिम्मेदारियों  का भार  शुरुआती दौर  में अल्पना जी के कन्धों पर भी था और उन्होंने जितनी गम्भीरता और नियमितता  से इसका निर्वहन किया कि मैं उनके प्रति एक सम्मान भरी  कृतज्ञता से आप्लावित होता रहा ...बहुत कम लोग हैं जो किसी भी कार्य को टीम -अभियान की गति देने में कुशलता से जुट जाते हैं-अल्पना जी साईंस के काज को समर्पित एक ऐसी ही प्रखर कामरेड हैं ...सबाई परिवार उनके इस व्यक्तित्व से बखूबी परिचित है और चिर  कृतज्ञ  भी ...

मैं चिट्ठाकार चर्चा में अल्पना जी को सम्मिलित  करने को कई बार उन्मुख हुआ पर शायद  तस्वीर पूरी बन नहीं पाती थी ....या वे खुद संभवतः किसी अलौकिक प्रेरणा के चलते यहाँ आह्वानित (गिरिजेश भैया ,मुक्ति ये शब्द गलत तो नहीं ? )  नहीं हो पा  रही थीं या फिर देवी आह्वान का मेरा ही अनुष्ठान किसी अनजान कमी का शिकार हो रहा था ,कौन जाने ? तभी वह तस्वीर भी दिख गई जो ऊपर है - कहते हैं कि वह तो बहुत पहले से ही वहां थी ....रही होगी मैंने  देखी नहीं या मुझे दिखी नहीं ...? ये सब अनुत्तरित  प्रश्न  ही हैं -लेकिन जब मैंने देखी  तस्वीर  तो पीत वसना  अल्पना जी को अकस्मात कह बैठा -आप भारतीय सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति दिख रही हैं और उनकी -  "शुक्रिया " का औपचारिक जवाब आ जाने से मैं आश्वश्त  हो गया कि उन्होंने यह  काम्प्लीमेंट  स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत कर दिया है -यद्यपि उन्होंने अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए अपने धन्यवाद ज्ञापन में यह जोड दिया -" अपनी प्रशंसा आखिर किसे अच्छी नहीं लगती " अब इस बात से कौन मुतमईन नहीं होगा?   ..मगर मेरा आह्वान -यज्ञ पूरा हुआ तो मुझे बड़ी राहत मिल गई थी -देवी आह्वान पूरा हो चुका था -आज यह प्रतिष्ठापन भी ...  बिहारी मैंने तुम्हे भी  मात दे दी ...
लिखन बैठि जाकी सबिह, गहि-गहि गरब गरूर।
भये न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥*
अल्पना जी हैं तो प्रवासी  भारतीय मगर उनका मन प्राण अपनी जन्मभूमि में बसता है -यह उदगार उनकी रचनाओं ,पोस्टों से अक्सर ध्वनित होता है .उनके  मुख्य ब्लॉग व्योम के पार पर  उनकी कविताओं और आलेखों से उनकी सोच की गहराई और प्रतिभा का सहज ही अहसास हो जाता है.उनकी प्रमुख रचनाओं के लिंक उनके ब्लॉग पृष्ठों पर दृष्टव्य हैं .-रानी लक्ष्मी बाई पर उनका लेख उनकी शोध वृत्ति और गहरे परिश्रम को भी इंगित करता है .मगर उनकी सबसे बड़ी खासियत है अपनी प्रतिभा का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रक्षेपण न करना ...बैद्धिक आग्रहों को दुराग्रहों में न बदलना ...अपनी साधना को चुपचाप अंजाम दिए जाना -वाद विवादों में न पड़ना जिससे कि रचनात्मक ऊर्जा का अपक्षय न हो  ...उनके दूसरे ब्लागों -गुनगुनाती धूप ,   भारत दर्शन से उनकी बहुमुखी  प्रतिभा का पता  चलता है .भारत दर्शन तो जैसे उनके मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम  को ही समर्पित है .वे खुद कहती हैं -
'यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है.
पहेली साम्राज्ञी तो वे है हीं -वे कहीं तो पहेली बुझाती हैं तो कहीं पहेलियों को  पलक झपकते सुलझा लेती हैं -तस्लीम की कई पहेलियाँ वे चुटकियाँ बजाते हल करती आई  हैं -उनकी इस प्रखर मेधा से मेरा परिचय तब हुआ था जब उन्होंने एक बड़ी कठिन सी पहेली का तत्क्षण जवाब दे  मेरा दर्प तोड़  दिया था (ओह !) जब मैंने एक पत्थरनुमा संरचना पर बुजेरिगर चिड़ियों की  चोंच मारती तस्वीर तस्लीम पर लगायी थी  तो उन्होंने उस पत्थर के बाबत सटीक जानकारी देकर मुझे स्तब्ध सा किया था -और ब्लॉग जगत को हल्के में न लूं यह ताकीद भी करा दी थी ...  दर्प टूटने के क्षणों की कसक आज भी महसूस होती है और तब से पहेलियों के बूझने के खेल में मेरे और उनके बीच  तू डाल डाल और मैं पात पात का खेल बदस्तूर जारी है .  अपनी इसी  बहुआयामी प्रतिभा से वे कितने ही सम्मान /अलंकरण से विभूषित हुई  हैं ..सुर संगीत की उनकी काबिलियत पर मैं नाकाबिल हूँ कुछ कह पाने में ..कोई संगीत परखी ही इस पर कुछ बोले  तो ज्यादा मुफीद होगा -हाँ गाहे बगाहे मैं उनके गाये गीतों को सुनता हूँ और आनंदित   होता हूँ ,फ़िल्मी गीतों का उनका चयन हमेशा सुरुचिपूर्ण होता है और उनके संवेदना के स्तर को दर्शाता है . उनकी कविताओं का लगभग नियमित पाठक हूँ और उनकी सोच की परिपक्वता और गहराई का प्रशंसक रहा हूँ ...
आज पहली बार ऐसा लग रहा है कि मेरे पास इस चिट्ठाकार की आलोचना के लिए न कोई शब्द है न भाव ...हैट्स आफ  अल्पना जी ....ब्लॉग जगत आपके अवदानों से कृत कृत्य है -बढती चलिए !
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*भाव -अर्थ=
‘‘लिखन बैठी जाकी सबी, गहि-गहि गरब गरूर,
भये न केते जगत के चतुर चितेरे कूर’’
-बिहारी
बिहारी नायिका के सौन्दर्य-चित्रण के लिए बड़े-बड़े और गर्वीले कलाकारों को बुलाया गया, किन्तु क्षण-क्षण परिवर्तित होते हुए उसके रूप को कोई भी चित्रकार-चित्रत नहीं कर सका। सारे कलाकार विफल होकर लौट गए। सौन्दर्य को परिभाषित करने में संस्कृत-साहित्य की एक उक्ति ही, इस घटना के लिए समीचीन जान पड़ती है-
‘‘क्षणै-क्षणै यन्नवतामुपैति तदैव रूपं रमणीयताया’’
(जो क्षण-क्षण परिवर्तित हो, वही रमणी का रूप है।)
क्या किसी नारी का ऊपरी परिधान, उसकी साज-सज्जा, उसका बाह्य रूप-रंग एक क्षण में परिवर्तित होता है ? क्षण-क्षण परिवर्तित होने वाली तो अगाध गहराइयों में छिपी हुई अरूप और निराकार भावनाएँ हैं, जो सहस्त्रों भावों-अनुभावों के रूप में सदा गतिवान रहती हैं। मन के इन्हीं सुन्दर भावों से नारी लावण्यमयी बनती है, जिस असाधारण लावण्य को आज तक न कोई परिभाषित कर सका है और न कोई चित्रकार चित्रित कर सकता है।
नारी अपने प्रकृतिप्रदत्त सहज संवेदनीय गुणों से अभिभूत इस सृष्टि का फूल है, जो उसके अन्तर्मन में अक्षुण्ण रूप में लिखा हुआ है। काँटो की चुभन से दूर जो नीरस, सूखा और एक ठूँठ मात्र है। जिसका अन्तर्मन सुन्दर है, वह सदा सुन्दर है। आन्तरिक सौन्दर्य से मण्डित नारी अक्षुण्ण सौन्दर्य की अधिष्ठात्री है। नारी ! तुम कितनी सुन्दर हो !


चिट्ठाकार चर्चा

सोमवार, 19 जुलाई 2010

पाबला जी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की शुभकामना दीजिये ..

अभी जैसे कल की ही बात हो जब अपने पाबला जी (कौन नहीं जानता ब्लॉग जगत  के इस सरदार को! ) अपने अवकाश पर्यटन के लिए चल पड़े थे..वे पहले बनारस आने वाले थे मगर कतिपय अपरिहार्य परिस्थितियों में उन्हें अपनी यात्रा का रूट बदलना पड़ा .बीच बीच में लोगों के जन्म दिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की घोषणा करने वाला ब्लॉग लगता है अपने तयशुदा /प्री प्रोग्रामिंग के चलते उनकी उपस्थिति का अहसास दिलाता जा रहा था मगर वे अपने पर्यटन टूर पर अग्रसर थे या चलते हुए ही इन पोस्ट को प्रकाशित कर रह थे क्योंकि इनका प्रकाशन तो तिथि बद्ध था ...  सामाजिक सरोकारों की यह प्रतिबद्धता अनुकरणीय है ! 

कल ही उनका फोन आया और उन्होंने मेरे दुःख और क्षोभ की स्थिति में सांत्वना के दो शब्द देने का समय निकाल लिया जबकि खुद अस्पताल में हैं -एक हादसा हो गया उनके साथ -भीषण हादसा ही  कहेगें .वापसी यात्रा में नाडेड के पास उनकी रफ़्तार से भागती वैन में आग लग  गयी ...और ब्रेक ने भी काम करना बंद कर दिया ...चलती वैन से आनंन फानन कूद कर मुसाफिरों ने जांन   बचाई -बेटी तो बाल बाल बच गयी ,खरोंच भी नहीं आई मगर पाबला साहब आंशिक रूप से जाल भी गए और चोटें  भी आयीं ...वें देखते देखते धू  धू कर जली और राख में तब्दील हो गयी .एक फ़िल्मी नजारा साकार हो गया ...
मैं तो सुन कर ही सिहर उठा और उन्हें बार बार आराम करने का अनुग्रह किया ..शीघ्र स्वास्थ्यलाभ की शुभकामनाएं दी ...मगर वे तो मेरे ही दुःख से दुखी थे...ऐसा ही होता है भ्राता भाव !वे वापसी में अब वर्धा प्रवासी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी से भी नहीं मिल पाए इसका उन्हें मलाल था ..

आप भी उन्हें शीघ्र स्वास्थ्यलाभ की शुभकामना देना न भूलें ...यद्यपि उनकी उँगलियों  में जले कटे की चोट है और वे अपना लैपटाप भी नहीं उपयोग में ला पा रहे है आप फोन पर उनसे बात तो कर ही सकते हैं -मगर कृपया लम्बी वार्ता ...आप तो खुद समझदार हैं ...




०९४२५५५३२३४ नंबर है उनका ....

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

शहरी चोले में गवईं मन उर्फ़ सतीश पंचम ....चिट्ठाकार चर्चा! .

सतीश जी से जान  पहचान कोई बहुत पुरानी  तो नहीं मगर अब तो एक अंतरंगता सी हो गयी है ..जब पिछले दिनों वे बनारस आये तो उनके व्यक्ति (त्व ) से भी रूबरू हो गया ,रचनाओं से तो उन्हें पहले से ही जानता था .. मुम्बईया  सतीश 'भैया'  हैं तो वैसे अपने मुलुक के ही मनई ,अपने जार जवार के ,ठेठ जौनपुरी मगर उनका लालन पालन मुम्बई में हुआ है तो ऊपरी तौर से देखने पर सहसा उनके शहराती होने का भरम हो सकता है .मगर तनिक भी उनके करीब होने पर  मन से उनकी  वही गवईं सहजता इम्प्रेस करने लगती है -जबरिया नागरी मिथ्याचारों से दूर हैं अपने सतीश भाई !
 सतीश जी 'देवायन ' ,१६ काटन मिल कालोनी चौकाघाट में तशरीफ़ लाये ...

मैंने कहा न कि उनका मन आज भी गवईं वितानों और बिम्बों में सकून पाता है ...जरा यह आत्म परिचय तो देखिये जिसने समान मनसा आराधना चतुर्वेदी का भी मन  ललचा दिया था  ....
अच्छा लगता है मुझे,
कच्चे आम के टिकोरों से नमक लगाकर खाना,
ककडी-खीरे की नरम बतीया कचर-कचर चबाना।
इलाहाबादी खरबूजे की भीनी-भीनी खुशबू ,
उन पर पडे हरे फांक की ललचाती लकीरें।
अच्छा लगता है मुझे।
आम का पना,
बौराये आम के पेडो से आती अमराई खूशबू के झोंके,
मटर के खेतों से आती छीमीयाही महक ,
अभी-अभी उपलों की आग में से निकले,
चुचके भूने आलूओं को छीलकर
हरी मिर्च और नमक की बुकनी लगाकर खाना,
अच्छा लगता है मुझे
केले को लपेट कर रोटी संग खाना,
या फिर गुड से रोटी चबाना।
भुट्टे पर नमक- नींबू रगड कर,
राह चलते यूँ ही कूचते-चबाना।
अच्छा लगता है मुझे।
 
अब उनके इस परिचय से जैसे मैं किसी लम्बी आत्म विस्मृति से जागा और अपने को देर से पहचान पाया ..अरे मैं भी तो यही हूँ ....तत त्वम् असि ...वही हूँ ...बिल्कुल ...और कितना शुक्रगुजार मैं इस शख्सियत का जिसने मेरे खुद होने का मुझे अहसास दिलाया नहीं तो कबका मैं आज की इस दुनियावी आपाधापी में खो सा गया था ....

सतीश जी की साहित्य में गहरी रूचि है -जो  मानवीयता  का प्रत्यक्ष प्रमाण है ...उनकी साहित्यिक समीक्षायें सफ़ेद घर पर अक्सर आती रहती हैं और मेरी साहित्यिक जमापूजी में भी अभिवृद्धि करती रहती हैं ...यह एक और कारण है कि मैं उनका कृतज्ञ हूँ -सतीश जी की ओर  मेरा ध्यानाकर्षण तब हुआ था जब उन सरीखा एक और मानवीय व्यक्तित्व उनसे मोहमयी नगरी में जा मिला था ...और उस महामिलन का  प्रतिपल विवरण अपने ब्लॉग पृष्ठ पर अंकित कर गया था ...तब से मैंने सतीश जी को सीरियसली लेना शुरू किया और उत्तरोत्तर उनसे  तादात्म्य बनाता ही गया ...लिहाजा वे भी मुझसे मिलने का कार्यक्रम ज्यादा मुल्तवी नहीं कर पाए और एक अल्लसुबह बनारस  आ ही गए ...साथ में आम भी चूसे  जो मेरा एक प्रिय शगल है ....लोग कहते हैं जो मेरे साथ आम खा लेता है वह मेरा और मैं उसका बन के रह जाते हैं ..सुदामा और कृष्ण के बीच का चावल बन जाता है यह आम ....इस ब्लॉग जगत में कितने ही खूबसूरत लोग हैं जिनके साथ मैं आम खाना क्या चूसना पसंद करूंगा! नाम बताना जरूरी है क्या?

इस बार सतीश जी अपने गाँव आये तो बिचारे को बिच्छू ने डंक मार दिया ...जैसे  उनके गवईं बनने में कोर कसर रह गयी हो ...तो यह संस्कार-अनुष्ठान भी पूरा हो गया ...और इस मामले में सतीश जी मुझसे बाजी मार ले गए ...हाय मुझे अभी तक किसी बिच्छू ने क्यों नहीं संस्कारित किया ...मैं तो फिर जन्मना ही गवईं रह गया ...यहाँ सतीश जी से जलन हो हो रही है ....अब वे कर्मणा गवईं हो गए और मैं बपुरा जन्मना ही गवईं बना रहा हूँ ...सतीश जी के शहरी और  गवईं संस्कारों का मिक्सचर कभी कभी उनके लिए असहज स्थितियां ला देता है ..कहते हैं कि 'मजे से ईयर प्लग लगाये गानों के तराने सुनता रहता हूँ और तभी घर आ जाता है और बच्चे देख ना ले इसलिए झटपट कानों से उसे अलग कर छुपा लेता हूँ ..'वाह जैसे बच्चे अपने पापा की करतूतों को जानते न हों!

एक ब्लॉगर के रूप में सतीश जी के  सफ़ेद घर का कंटेंट  ''व्हाईट हाऊस ' की भव्यता (केवल भव्यता ही!)  की  प्रतीति कराता है भले ही उसकी अंतर्कथाओं से दूर हो ,यद्यपि यहाँ भी कुछ कथाएं हैं ....और हम उनका लुत्फ़ उठा चुके हैं ..मसलन उनकी एक कथा समीक्षा में आप शहरी और गवईं रतिलीला का एक मूलभूत फर्क अनुभूत कर सकते हैं ....चूंकि गाँव और शहर का द्वंद्व /अंतर्द्वंद्व उनके मन मस्तिष्क को कुरेदता रहता है सो जाहिर है वह उनके रचना कर्म और अन्तींद्रिय संसार का हिस्सा बनता रहता  है  ..
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आप तो पहले से ही इस संभावनाशील ब्लॉगर से परिचित होंगे  आज मेरे नजरिये से भी इन्हें देख परख लिए  ..जिससे कभी यह न कह सकें कि आपने तो कभी बताया नहीं ...और पहले  परिचित न भी हुए हों तो उनके ओढनियाँ ब्लागिंग की परिभाषा  और इस पारिभाषिक शब्द ने जरूर आपको इनके पास पहुँचाया  होगा !


रविवार, 6 जून 2010

मिलिए एक समर्पित टिप्पणीकार से ...दिव्या श्रीवास्तव यानि जील जेन ....

आप में से कई लोगों के ब्लॉग के टिप्पणी बाक्स में  जीन जेल (जो कहती हैं कि उन्हें आप खुद  खोजिये ,आखिर दुधमुहे बच्चे तो हैं नहीं आप -और एक दिलखीन्चू  मजाकिया सा इशारा-Its your job to discover, cannot spoonfeed you.....)  की टिप्पणी दिखी होगी ....इनका कोई ब्लॉग नहीं है मगर इनकी टिप्पणियाँ ही किसी ब्लॉग से कम नहीं है .आखिर कौन हैं जील जेन ? इसका जवाब उन्होंने एकाध जगहं केवल इसलिए दिया कि लोग उन्हें बेनामी न समझ बैठें! सबसे पर्याप्त जवाब उन्होंने दिया नवोत्पल पर,एक थर्ड परसन के रूप में ....

"Her name is Divya, She is born and brought up in Lucknow. Medical education from BHU-Varanasi. After spending some time in Lucknow, Faizabad, Gwalior, Indore and Delhi, She is now settled in Bangkok."(इसका हिंदी अनुवाद जरूरी नहीं लगता !) इनका ही  एक क्षद्म /निक नाम भी  है -जील जेंन  ! लोरेटो कान्वेंट लखनऊ की पढी हैं .आंग्ल भाषा पर कमांड है -देवनागरी में नहीं लिखतीं मगर हिन्दी मातृभाषा होने के नाते अच्छी तरह जानती हैं ..यह तो उनका एक स्थूल परिचय हुआ -मगर मैं यहाँ उनकी चर्चा उनके विचारों और सोच की स्पष्टता के लिए करना चाह रहा हूँ ....उनमें भारतीयता के बोधक संस्कार कूट कूट के भरे हुए हैं और वे मानवीय मूल्यों के प्रति सचेष्ट दीखती हैं ...उन्हें नर नारी की उन्मुक्त स्वच्छन्दता नहीं भाती ...उन्हें उन्मुक्त वर्जनाहीन समाज से चिढ सी लगती है .....मेरे मन में काफी दिनों से था कि मैं उनकी टिप्पणियों का एक संकलन प्रस्तुत करुँ और मैं यह सोच ही रहा था कि प्रतुल वशिष्ठ जी  ने बाजी मार ली ...उन्होंने अपने ब्लॉग पर दिव्या जी की एक टिप्पणी का पूरा हिन्दी अनुवाद ही छाप  दिया .और अनुवाद भी इतना त्रुटिहीन और प्रवाहपूर्ण -कि मैं उसे यहाँ उधृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा   रहा हूँ -
"मेरा पूर्ण विश्वास है कि लज्जा नारी का सौन्दर्य है किन्तु यह उसकी सुरक्षा नहीं है. एक स्त्री का रक्षात्मक कवच उसकी बुद्धिमत्ता तथा सजगता है जो कि शिक्षा, लालन-पालन एवं सचेतना से परिपूर्ण होता है.

आनंदानुभूति के लिये स्त्री को किसी प्रकार के "अलंकरण" की आवश्यकता नहीं होती है. पुरुष द्वारा, स्त्री को मूर्ख बनाए जाने की परम्परा सदियों से जारी है. चाटुकारिता, अनुशंसा, प्रशंसा आदि के द्वारा पुरुष नारी को मानसिक तौर पर कमज़ोर बनाकर उसे अपनी ओर करने का प्रयास करता रहता है. और यह विरले ही देखने में आता है कि वह अपनी बुद्धि का प्रयोग पुरुष को पहचानने में करे.

उसका लज्जा रूपी कवच ही उसका शत्रु बन जाता है. ऐसे में केवल उसकी बुद्धिमत्ता ही उसे भावावेग से दूर रखते हुए उसकी सुरक्षा कर सकती है.

"बुद्धि" एक सचेत एवं समझदार स्त्री का सर्वोपरि गुण है जो जीवन को हर परिस्थिति में उसकी सुरक्षा करता है. उसे जीवनयापन हेतु किसी प्रकार के अलंकरण की आवश्यकता नहीं होती है.

उसे अपनी स्थिति का आभास होना आवश्यक है. स्त्री को शिक्षा, ज्ञान तथा सजगता, सचेतता का अर्जन अवश्य ही करना चाहिए. उसे अपने साथ पर गर्व होना चाहिए, उसे स्वयं की प्रशंसा करनी चाहिए उसे स्वयं से प्रेम होना चाहिए. जब कोई स्वयं से प्रेम करता है तो उसे किसी अलंकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती है.

वैसे भी कहा जाता है "सुन्दरता निहारने वाले की दृष्टि में होती है" केवल धीर-गंभीर व सभ्य पुरुष ही नारी में "लज्जा" का भाव उत्पन्न कर सकता है. क्योंकि नारी में नारीत्व जागृत करने की क्षमता केवल एक परिपूर्ण पुरुष [पुरुषत्व से परिपूर्ण] में ही होती है. पुरुष, नारी से सदैव समर्पण चाहता है जो कि उसमें [नारी के प्रति] अन्मंस्यकता का भाव जागृत करता है अथवा ये उसके क्रोध का कारण बन जाता है और वह [नारी] इनकार कर देती है. किन्तु इसके विपरीत प्रेम और परवाह करने वाला [loving and caring] पुरुष नारी को प्रेम की अनुभूति देता है जो नारी को स्वयं समर्पण के लिये उत्प्रेरित करता है, जिसमें समाहित होता है पुरुष के प्रति पूर्ण अटूट विश्वास.

 "survival of the fittest " वही है जिसके पास बुद्धि है और जो सजग है. अतः मात्र "बुद्धिमत्ता" ही मनुष्य का "कवच" है फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष".
 
आप देखिये  कि किस तरह  उन्होंने नारी के बारे में परम्परागत सोच के बजाय नारी का आभूषण केवल लज्जा  न मानकर शिक्षा और बुद्धि को मान्यता दी है .... और लगे हाथ उन्होंने एक नारी की दृष्टि में एक श्रेष्ठ पुरुष की आकांक्षा को भी चिन्हित किया है ...वे नारी को पुरुषों के द्वारा अपने वश में करने के हथकंडों के प्रति भी यत्र तत्र आगाह करती चलती हैं -मुझे लगता है कि उनके विचार नर नारी के दैनिक आचरण और जीवन दर्शन की दिशा में महत्वपूर्ण हैं ...उन्हें इस बात की  कोफ़्त भी है कि उनकी बातों पर  बहुत से चिट्ठाकारों ने  अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है या संवाद को बनाने /बढ़ाने में रूचि नहीं ली है ..मगर दिव्या जी को  यह समझना चाहिए कि यह हिन्दी ब्लॉग जगत है -यहाँ ज्यादातर बात -व्यवहार हिन्दी में है -अगर अभी तक वे व्यापक तौर पर यहाँ संवाद नहीं बना पाई हैं तो इसका कारण केवल इतना है कि वे देवनागरी में  संवाद नहीं करतीं ...हिन्दी के कई आग्रही ऐसे हैं (जो अनुचित भी नहीं है ) जो अंगरेजी को जानते हुए भी हिन्दी में संवाद पसंद करते हैं ..मुझे दिव्या जी की अंगरेजी  बहुत प्यारी और प्रवाहमयी लगती है -उन लोगों की तरह नहीं जो कई बार यह जताने के लिए अंगरेजी में लिखते/लिखती हैं कि मुझे भी अंगरेजी आती है -मुझे हल्के में मत लो ..(जैसे मैं ) .....दिव्या जी की अंगरेजी सहज है हिन्दी भी वे बहुत अच्छा लिखती हैं मगर रोमन में ..जो कि बहुत से लोगों को ,उचित ही नहीं भाती ...मुझे खुद भी जबकि मैं चैट प्रायः रोमन हिन्दी में ही करता हूँ -खुद को कोसता हूँ -मगर जब आप औपचारिक संबोधन करें तो रोमन वाली हिन्दी निश्चित ही खटकने वाली है ...मैंने दिव्या जी से वायदा किया है कि मैं उनकी टिप्पणियाँ हिन्दी भावानुवाद करके संकलित करूंगा! यह श्रम साध्य कार्य है -उनकी यत्र तत्र बिखरी टिप्पणियाँ बटोरना खाली समय की मांग करता है .
 
आपसे यह गुजारिश है कि यदि आपके पास उनकी कोई टिप्पणी हो तो कृपा कर टिप्पणी में अथवा मुझे मेल से भेजने का अनुग्रह करें -मैंने दिव्या जी से भी यही आग्रह किया तो उनकी रूचि इसमें नहीं दिखी -नारी मन का भी कोई थाह नहीं मिलता ....वे सदैव की तरह अबूझ पहेलियाँ ही रही हैं ..कभी कभी तो लगता है सृजनकर्ता ब्रह्मा ने उनके मन -सृजन की   प्रोग्रामिंग कुछ ऐसी कर दी कि   खुद ही पासवर्ड भूल गए और अपनी इस भूल को उन्होंने पुरुषों में आरोपित कर दिया -आज तक बिचारा पुरुष उसी पासवर्ड को खोजने में हैरान परीशां रहा है -यह सिमसिम सहजता से खुलता  नहीं दिखता -हैकरों के बस का ही है -....और हैकरों को मैं मानवीय नहीं मानता ....
 
मुझे आपकी टिप्पणियों और मेल में दिव्या जी की टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा जो इस पोस्ट की अगली कड़ी बन सकेगी ..

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