राय शुमारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राय शुमारी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

हंगामा है क्यूं बरपा? डोयिचे वेले पुरस्कारों पर दो टूक!

हिन्दी ब्लॉगर अपनी औकात एक बार फिर दिखा दिए.डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कारों में इस बार हिन्दी के शामिल होते ही बखेड़ा खड़ा हो गया है . जो वैश्विक समुदाय के सामने यह फिर साबित करता है कि हिन्दी वाले और अब खासकर हिन्दी के ब्लॉगर कभी परिपक्व नहीं हुए और न  होंगें .हिन्दी के साथ विवाद का चोली दामन का सम्बन्ध बना हुआ है और शुद्ध हिन्दी में कहें कि यह एक अन्योनाश्रित सम्बन्ध बन गया है . डोयिचे वेले की तरफ से कहीं कुछ गलत नहीं हुआ . और न परिकल्पना की ही ओर  से कुछ गलत था . यह हम हैं जो अपनी निजी खुन्नसों और निहितार्थों के चलते इन्हें विवादास्पद बनाते हैं . हिन्दी भाई कई लोग तो ऐसे होते हैं कि सम्मान पुरस्कारों की तब तक आलोचना करते हैं जब तक कि वही सम्मान उन्हें खुद नहीं मिल जाता . फिर चुप लगा जाते हैं .
डोयिचे वेले अंतर्जाल सक्रियता पर एक वैश्विक पुरस्कार आयोजन पहले से भी करती आयी है .बस इस बार उसमें हिन्दी जुड़ गयी और कुछ श्रेणियों में नामांकन मांगे गए . इसकी पहली सूचना ज्यादातर लोगों को खुशदीप जी की पोस्ट से मिली थी, सक्रिय लोगों ने नामांकन कर दिए . मैं नामांकन के जरिये पुरस्कार -सम्मान के पक्ष में कभी नहीं रहा -यह मुझे भीख का कटोरा लेकर कुछ मांगने जैसा लगता है भले ही कोई दूसरा ही आपका  नामांकन क्यों न करे . मगर यह मेरा अपना बहुत निजी विचार है मगर तमाम चयन की प्रक्रियाओं में यह भी एक प्रक्रिया है और मैं इसी रूप में इसे लेता हूँ . हाँ सम्मान तो जो सम्मान लायक हो -किसी क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया हो उसे अपने स्रोतों के माध्यम से सम्मानकर्ता व्यक्ति /संस्था को चुन लेना चाहिए - मगर नोबेल पुरस्कार तक नामांकन मांगते हैं तो अगर डोयिचे वेले ने भी यही रास्ता अपनाया तो यह उसका निर्णय है,उसकी शर्त है . कतिपय हिन्दी ब्लागरों ने चुपके से अपने ब्लागों को नामित कर दिया या करा दिया . कुछ लोगों ने दूसरे ब्लागों को घोषित तौर पर नामांकित किया -वास्तव में किया या खुद अपना कर गए कौन जानता है? :-)  . अब यह तो भारतीय सूचना आधिकार के तहत डोयिचे वेले से पूछा भी नहीं जा सकता और उसे बताने की भी कोई बाध्यता नहीं है . अब जो ब्लॉग नामांकित हुए होंगें उन ही में से कुछ चयनित भी होने थे सो हो गये. हमें भी शुरू में और अब भी लगता है कि चयनित ब्लागों से कितने ही बहुत बेहतर ब्लॉग छूट गए हैं मगर क्या कीजियेगा जब वे नामांकित ही नहीं हुए . 
एक मैं ही अकेला नकचढ़ा फक्कड़ थोड़े ही हूँ जो खुद नामांकन से दूर रहा . विज्ञान / भ्रमण की कटेगरी में उन्मुक्त सरीखा ब्लॉग जहाँ प्रामाणिक प्रथम स्रोत की जानकारी  लिए है और जहां  बेहतरीन पोडकास्ट भी है  या मेरा अपना साईब्लाग ही है विज्ञान संचार के समर्पित प्रयास हैं . मगर ये तो नामंकित ही नहीं हुये. हाँ तस्लीम को अवश्य नामांकित किया गया  और यह भी एक नियमित ब्लॉग है जिसमें शुरुआती योगदान मेरा भी कुछ कम नहीं रहा -नामकरण,अवधारणा और लगभग सौ शुरुआती पहेलियों जिनसे यह ब्लॉग निगाह में आया- मैं केवल इसलिए इससे जुडा रहा क्योकि आम आदमी तक विज्ञान संचार मेरे अस्थि -मज्जा में समाहित है . इसकी आरंभिक पहेलियों के जरिये ब्लागरों में विज्ञान में अभिरूचि जगाने का बीड़ा मैंने उठाया था -यहाँ यहाँ यहाँ और अनेक पोस्टों में यह इतिहास दर्ज है .
सर्प संसार में आज भी साँपों से जुड़े अपने फर्स्ट हैण्ड अनुभवों को निरंतर साझा करता रहता हूँ . मेरे करीब के लोग जानते हैं कि सापों में मेरी बहुत रूचि है .लोगों को याद होगा एक ब्लॉग भारतीय भुजंग था जिसकी माडरेटर लवली कुमारी हुआ करती थीं मगर उन्होंने पता नहीं किस रुष्टता से यह ब्लॉग बंद कर दिया और मेरे कितनी ही पोस्टें पब्लिक डोमेन से हट गयीं। मैंने उसे अनुरोध भी किया कि मुझसे व्यक्तिगत रुष्टता की सजा आप पाठकों को क्यों दे रही हैं -यह तो अन्याय है पर उन्होंने मेरी एक न सुनी और ब्लॉग ही बंद कर दिया . मैं अंततः  व्यक्ति को महत्वपूर्ण नहीं मानता उसके काम को प्राथमिकता देता हूँ . अब भारतीय भुजंग से मेरी छुट्टी के बाद मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि मेरे वे पाठक बिचारे जो भारतीय भुजंग से जुड़े थे और कितनों के मेरे पास फोन तक आते थे उनके लिए कुछ किया जाना चाहिए .अब चूंकि मैं अन्य तमाम कामों में उलझा रहता हूँ और मेरी दूसरी आदत है लोगों को विज्ञान लेखन में प्रोत्साहित करते रहने का मैंने जाकिर जी से यह अनुरोध किया और इस तरह सर्प संसार अस्तित्व में आया .
खुशदीप जी की ही दूसरी पोस्ट से मुझे बाब्स के लिए हिन्दी की श्रेणियों में चयनित ब्लागों की जानकारी हुयी तो मुझे आश्चर्यमिश्रित आह्लाद हुआ कि अच्छे कार्य कभी न कभी पहचाने जरुर जाते हैं . मैंने तुरंत फोन पर जाकिर जी को बधाई दी , मगर उसके बाद की घटी घटनाएँ मुझे पीड़ित कर गयीं और ऐसे अनुभव मेरे साथ होते ही रहे हैं अनगनित . सो मुझमें इम्युनिटी आ  गयी हैं -हुआ यह कि जाकिर जी के सौजन्य से लखनऊ के अखबारों में जाकिर जी के फोटो सहित यह समाचार छापे  गए कि उनके दो ब्लागों को बाब्स  पुरस्कारों के लिए चुन लिया गया है -आदि आदि , मुझे धक्का लगा -दोनों ही सामूहिक ब्लॉग हैं और ईमानदारी तो सभ्य/अकादमिक जगत में बरती ही जानी चाहिए -खबर तब भी बनती और डॉ जाकिर अली 'रजनीश'  का सम्मान भी कुछ कम न होता . वैसे भी ब्लॉग के माडरेटर वहीं हैं -बान जाने का उनका ही हक़ है और वे जायेगें भी .सर्प संसार के लिए भी यद्यपि उन्होंने मुझे जाने का आग्रह किया है मगर मैं तो उन्हें ही अधिकृत करता . मगर यहाँ जाकिर भाई से मानव स्वभावगत चूक हुयी। और उसी दिन मैंने अपने स्वभावगत मजबूरी से इस पुरस्कार अभियान से  खुद को तटस्थ कर लिया . मुझे हमेशा आगे देखने की आदत है.
मगर इस मुद्दे पर  फुरसतिया महराज मुझे  कोंचते जा रहे हैं और पोस्ट दर पोस्ट लिखते जा रहे हैं .अजीब सा गलचौर सा माहौल बन रहा है। लाबीयिंग चगल रही है .और तस्लीम तथा नारी को एक दूसरे के नाकारात्मक वोट (नेगेटिव वोटिंग ) मिल रहे हैं -मतलब जिसे नारी (कृपया पढ़ें सुश्री रचना सिंह ) अन्यान्य कारणों से पसंद नहीं है वो तस्लीम को वोट कर रहा है और जिसे तस्लीम(कृपया पढ़ें डॉ जाकिर अली 'रजनीश' ) पसंद नहीं वह नारी को वोट दे रहा है .खेमेबाजी प्रत्यक्ष हो गयी है. काश ये ब्लॉग सकारात्मक वोट ही हासिल करते और इतने खराब भी नहीं हैं  . इस खेमेबाजी के चलते मोर्चाये हुए लिंक भी उभर आये या उधिरा गए हैं जो चिटठा चर्चा की नवीनतम पोस्ट पर देखे जा सकते हैं .
 अब जबकि मैं तटस्थता से निकल आया हूँ तो यह स्पष्ट कर दूं (ताकि कोई मुगालता किसी को न रहे) कि सबसे अच्छे नामंकित हिन्दी ब्लॉग  में मैं तस्लीम को और मोस्ट क्रिएटिव ब्लॉग में सर्प संसार को और निजी ब्लागों में दुधवा लाईव को समर्थन कर रहा हूँ और मित्रों से इन्हें वोट करने की अपील करता हूँ!
अंत में निष्कर्षतः मैं यह अवश्य कहता हूँ कि डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कार के आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं और मैं उनका व्यक्तिगत रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने हिन्दी को एक मौका दिया है , उनकी प्रक्रिया में सायास कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं की गयी है -मुझे खुशदीप जी  के इस कथन पर हैरत है कि ये पुरस्कार फिक्स्ड हैं . हाँ एक आदमी अगले चौबीस घंटों में दुबारा वोट कर सकता है और अपनी कई आई डी से कर सकता है यह उचित नहीं है -यह तो फिर थोक के भाव में लोगों से वोट कराने का मामला बन जाता है . मगर यही प्रक्रिया तो और भी भाषाओं के साथ है ! मैं जूरी से अपील करता हूँ कि हिन्दी वालों की हाय हाय से विचलित हुए बिना वे अपने निर्णय को अंजाम देगें!

गुरुवार, 22 मार्च 2012

एक फेसबुकिया परिचर्चा

इन दिनों एक दुर्लभ किस्म की आजादी का लाभ उठा रहा हूँ....जो शादीशुदा लोगों के लिए वरदान है मगर प्रत्यक्ष नहीं छुपा हुआ वरदान ...पत्नी मायके गयी हुयी हैं ....पिछली पोस्ट पर इस आजादी की  उद्घोषणा कर चुका हूँ ...तब से बनारसी गंगा का  लाखो टन पानी राजघाट से आगे निकल गया है ...और अब आजादी का समापन भी नज़दीक आन पहुंचा है ....आम दुनियावी शिष्टाचार में गृहिणी के घर से लम्बे समय तक बाहर रहने पर लोग बाग़ सबसे पहले यही पूछ लेते हैं कि भई खाना  पानी कैसे हो रहा है ..जैसे हम कोई ढोर गंवार हैं जिसे सानी पानी चोकर भूसा कोई और देगा तभी जिन्दा रहेंगे  -हम खूंटे में बंधे कोई जनावर तो हैं नहीं .....यह बात भी आपत्तिजनक है कि लोग अर्धांगिनी को केवल खाना बनाने की अपरिहार्यता के रूप में देखते हैं -बस जैसे पत्नी का केवल  यही एक काम  हो ..भारतीय सोच समाज बदलने से रहा ....

मुझे पता है कि कुछ मित्र मन में सोच रहे होंगे कि मैं फिर वही पकाऊ विषय लेकर बैठ गया ...भैया अगर भोगा हुआ यथार्थ ही असली साहित्य का स्रोत  है तो मुझे साहित्यिक सेवा से काहें रोक रहे हैं ..? इन दिनों अपने खालिस अनुभवों को आपसे साझा कर मुझे कुछ तो साहित्यिक अवदान का पुण्य लेने दें :) अब बात लम्बी न खींच कर इसी विषय पर  फेसबुक परिचर्चा का उल्लेख कर दूं जिसे मैंने मित्रों के बीच आयोजित किया था और ढेरो छुट्टा विचार प्राप्त हुए थे....विषय था - "पत्नी का मायके में रहना पति के लिए छुपा हुआ वरदान है"... गिरिजेश भोजपुरिया  ने विषय देखते ही एक लिंक पकड़ा दिया और परिचर्चा से फारिग हो लिए ....ढेर सारे मित्रों ने बड़े उर्वर विचार रखे ....मजे की बात यह कि जिन्होंने सबसे गूढ़ और विस्तृत विचार रखे वे खुद शादी शुदा नहीं हैं -मैंने पूछा प्रभु बिना सेब का स्वाद चखे इतना विषद और सुदीर्घ अनुभव आपको कैसे हुआ तो उन्होंने बड़े फिलासिफियाना अंदाज में जवाबा दिया कि अंतर्बोध और अंतर्ज्ञान भी कुछ चीज होती है ...मुझे अंतर्बोध पर व्याख्यान नहीं सुनना था इसलिए उनके द्वारा उछाले गए इस विषय को हठात परे धकेलते हुए मूल परिचर्चा के विषय पर ही लोगों को फोकस करने की गुजारिश की ....आप भी कुछ अनमोल विचार ग्रहण करें ...सबसे पहले तो उन्ही मित्र महानुभाव के विचार जो अभी तक कुंवारे हैं -गदह पचीसी के आस पास हैं ..आप इनके विचार पढ़कर  भारत की युवा शक्ति  से वाकिफ हो सकते हैं. नाम है ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ..कृतित्व की बानगी यहाँ मिल ही जायेगी व्यक्तित्व से उनके फेसबुक प्रोफाईल पर जाकर परिचय प्राप्त कर सकते हैं -
"वैसे ये बात कभी पति पत्नी के सामने स्वीकार नहीं कर सकता की पत्नी का घर जाना वरदान है अतः इसे छुपा हुआ कहना ही सही होगा ........ अब ये वरदान है, इस की पुष्टि के लिए पति को मिलने वाली निम्नलिखित स्वतंत्रता उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है...........
१. पत्नी घर पर हो तो पड़ोस की भाभी जी से हंस कर बात करना, दफ़ा ३०७ के तहत आता है........ न हो तो अच्छा है.
२. घर पर रोजाना उपयोग के समान ढूढ़ने नहीं पड़ते या इसके लिए पत्नी को चिल्ला कर आवाज़ नही लगानी पड़ती, ये सारे समान (कंघा, बनियान, तौलिया आदि) बिस्तर पर उपलब्ध होते है....... या सामने मेज या कुर्सी पर उपलब्ध होते है.
३. किसी भी मित्र (म./पु.)को घर पर बुलाने की स्वतंत्रता....... अगर सुरा की इच्छा हो तो घर पर ही माहौल बन सकता है.
४.खाना बनाने मे थोड़ी दिक्कत होती है, पर इसी बहाने सही पड़ोस वाली भाभी जी हाल चाल ज़रूर पूंछ लेती है. और उनसे जान पहचान बढ़ाने का मौका मिल जाता है. और उनकी सहानभूति भी मिलती है. अब बात होगी तो आगे भी बढ़ेगी.
५. वैसे कुछ दिनों बाद पत्नी की याद भी आती है, खास करके जब कपड़ों का हुजूम इकठ्ठा हो जाता है........ पर लगता है की कुछ और दिन मज़े ले लिए जाए पता नही ये दिन कब आए, .......... और ये तो सोने पर सुहागा हो जाए अगर वो देर से आए......... एक तो एंज़ोय करने कुछ और दिन.. उसपर उसको घुड़की पिलाने का मौका मिल जाए." 


किस नतीजे पर पहुंचे आप? मतलब ज्ञानेंद्र जी के अंतर्बोध के मामले में? ...अपने पुराने संगी राज भाटिया जी भी विषयाकर्षण से बंच नहीं पाए ,देखिये कैसे दुखती रंग पर उंगली धरते भये ....
" पत्नी मायके गई हे तभी वरदान है  जब घर के काम काज के लिये अपनी छोटी बहिन को छोड गई हों ....:) वर्ना तो आफ़त है ... और  मेरे जैसे के लिये तो बिना पत्नी के रहना नामुमकिन है ... क्योकि मुझे अपने किसी भी समान का कुछ पता नही.... " ...
मित्र अजय त्यागी ने तो एक कविता ही ठोक दी ....
पत्नी गयीं मायके 
ओये मौजा ही मौजा 
भाई मौजा ही मौजा 
ऍमये ओम्मे करिए 
भाई मौजा ही मौजा 
पड़ोसन आये रोटी लाये 
संग बैठकर वो बतलाये 
भाई मौजा ही मौजा 
दिन बीता और रात हो आये 
घुटना मोड़ पेट में सोये ...
बीवी जब वापस आये 
सास की भेजी मिठायी लाये 
भाई मौजा ही मौजा 

आप भी इस परिचर्चा में भाग लेना चाहेंगे? :)  

सोमवार, 5 सितंबर 2011

ब्लॉग:महज माध्यम या विधा भी?

यह सवाल मैंने मित्रों से पूछा कि क्या ब्लागिंग महज अभिव्यक्ति का एक माध्यम भर है या इसकी कुछ विधागत विशिष्टतायें भी हैं ...अभी भी मुझे संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया है ..इसलिए इस  प्रश्न पर विचार मंथन के लिए आप सभी को निमंत्रण ...पहले हम अपनी अल्प समझ को यहाँ प्रस्तुत कर दें ..मीडिया शब्द के उल्लेख से हमारे सामने प्रिंट मीडिया ,ब्राडकास्ट मीडिया ,डिजिटल मीडिया की एक तस्वीर उभरती है....और जब हम विधा की बात करते हैं तो  कविता ,कहानी ,नाटक ,निबंध ,रूपक ,साक्षात्कार,समाचार लेखन /वाचन   आदि  आदि का बोध हो उठता है .... अब हमारे  पारम्परिक प्रिंट  या ब्राडकास्ट माध्यमों में इन्ही विधाओं की ही परिधि में जन संवाद होता है ...उद्येश्य चाहे मनोरंजन हो  या ज्ञानार्जन . अपने इन्ही पारम्परिक माध्यमों को मुख्य मीडिया /मेनस्ट्रीम मीडिया कहा जाता रहा है .अब जिस मीडिया का नया परचम लहराने लगा है वह डिजिटल मीडिया है ....और इस नए माध्यम ने  पारम्परिक माध्यम के कान काटने और पर कतरने शुरू कर दिए हैं ..फिर भी  इसे वैकल्पिक मीडिया का संबोधन मिला है. 



आज सोशल नेटवर्क -फेसबुक ,ट्विटर ,ब्लॉग जगत ,चैट समूह सभी द्रुत और दुतरफा संवाद के माध्यम बन चले है. आपसी विचार विमर्श का स्कोप यहाँ बहुत विकसित हो चला है और दिन ब दिन यह और समर्थ और सशक्त होता जा रहा है क्योकि यह नया मीडिया बेहतर तरीके से प्रौद्योगिकी क्षम है ..एक नया समाज मूर्तमान हो रहा है जहाँ संवाद के मायने ही बदल गए हैं ...जहाँ सम्वाद के नए नियम ,नए शिष्टाचार विकसित हो रहे हैं और जहाँ भौगोलिक सीमा रेखायें मिट चुकी हैं ....१९७७ में जान बर्गर ने वेबलाग शब्द का संबोधन अंतर्जाल पर 'लगभग बिना दमड़ी लगाये, कुछ लिख कर छापने (के पृष्ठों) के लिए'  किया ,,,,पीटर मेर्होल्ज़ ने १९९९ में इन्हें ब्लॉग का नाम दे दिया .माना जाता है कि सोशल नेट्वर्किंग भी एक तरह की माईक्रो ब्लागिंग है -मगर फेसबुक ने तो अब अपने यूजरों को बहुत स्पेस उपलब्ध करा दिया है ...अब यह ट्विटर सरीखा ही नहीं है जहां शब्दों पर तगड़ा सेंसर है -मगर हाँ यहाँ मेसेज ही मीडिया बन बैठा है -ट्विटर को लोग 'मेसेज मीडिया' के नाम से भी पुकारने लगे हैं!  


 ब्लागिंग भी एक अंतर्जालीय मीडिया  है जिसके जरिये निजी या दीगर जानकारियाँ ,सन्देश, विचार ,दृष्टिकोण लोगों से साझा किये जा रहे हैं  ....यहाँ सब कुछ अपने हाथ में है -'कम खर्च वालानसी'  का मामला है ...और चित्र ,वीडियो ,पोडकास्ट सभी सुविधाओं से लैस है ...गावों में भी अब इसकी पहुँच तेजी से बढ़ रही है .....एकल ब्लागों के अलावा अनगिनत सामुदायिक ब्लॉग,विषयाधारित ब्लॉग भी आज वजूद में है ...अभिव्यक्ति का एक पूरा इन्द्रधनुषी साम्राज्य मुखरित हो चला है ..मगर क्या ब्लॉग महज अभिव्यक्ति के माध्यम ही हैं या फिर अपनी अभिव्यक्ति की विशिष्टता के चलते ये एक विधा का भी बोध करा रहे हैं? ...ब्लॉग का मतलब बस पारम्परिक विधाओं को मंच देना भर है या ब्लागिंग की अपनी भी कोई खास  खूबी है? ....जैसे ट्विटर पर मेसेज ही मीडिया बन उठा है .....

हम ब्लॉग को ब्लॉग ही बनाये रखें और उसे पारम्परिक विधाओं से एक अलग पहचान दें -जैसे ब्लॉगर आज नयी कटेगरी है -कवि,लेखक ,सम्पादक ,निबंधकार से आगे की एक नयी जमात जो अपने कथ्य की विशिष्टता के खातिर जानी जाती है .....बेलौस बिंदास कहने की क्षमता के कारण जो अपना पहचान बना रही है ..यहाँ पारम्परिक विधाओं की आरोपित,बंधनयुक्त  शिष्टता नहीं है बल्कि स्वयंस्फूर्त विचार विनिमय का उल्लास है .....और जो अभी भी ब्लागिंग के इस  तेवर/क्षमता  को नहीं पहचान पा रहे हैं वे इस पावरफुल माध्यम /विधा का समुचित दोहन नहीं कर पा रहे हैं....वैसे भी जब डायरी लेखन साहित्य की एक स्थापित विधा है तो फिर अंतर्जाल -डायरी लेखन क्यों नहीं?

मजे की बात है कि अंतर्जालीय मीडिया की प्रौद्योगिकीय गति इतनी तीव्र हो चली है कि यहाँ जवाब पहले मिल रहे हैं सवाल बाद में पूछे जा रहे हैं ....मैं तो ब्लॉग को अभिव्यक्ति की एक नयी विधा भी मानता हूँ ..मेरे लिए ब्लॉग कम कहे में अधिक समझना है ,तीव्रतर संवाद की मारकता लिए है ,प्रस्तुति में नूतनता लिए है ,कलेवर में अपूर्व सुन्दरता लिए हैं ...क्षणे  क्षणे यन्नवतामुपैति...... दूसरे ब्लागों को लिंक कर एक नयी पद्धति -अर्थगामिता की पहल है .....तो फिर  यह एक नवीन विधा क्यों नहीं है -हम क्यों इसे बस अभिव्यक्ति का एक माध्यम कहकर  इसकी असीम सम्भावनाओं को खारिज किये दे रहे हैं ....कल्चर कैट की उद्घोषणा उल्लेखनीय है " a poem is a genre and a sonnet is a subgenre; a blog is a genre and a warblog is a subgenre.'


आज फिलहाल इतना ही,आगे आपके विचार एक नयी चर्चा,नयी बहस की भावभूमि तैयार करेगें  -यही उम्मीद है!



शनिवार, 13 दिसंबर 2008

रायशुमारी का नतीजा -क्या भारत को पी ओ के के आतंकी ठिकानों पर आक्रमण कर देना चाहिए ?

रायशुमारी का सांख्यिकीय नतीजा -७६ प्रतिशत का कहना है कि जी हाँ हमें पाक के आतंकी ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए ,केवल २३ प्रतिशत इसके पक्ष में नहीं हैं उनकी अपनी अपनी आशंकाएं हैं ! यह एक प्रतिनिधि सर्वेक्षण कहा जायेगा क्योकि इस ब्लॉग पर टिप्पणीकर्ता रैंडम रूप से आए हैं -यह जनमत संग्रह दरसल भारत के मूड को प्रगट करता है .भारत पर आतंकी आक्रमण के फौरन बाद जिस सदमे / सकते की स्थिति में हम थे अब उससे उबर रहे हैं और सबसे अच्छी बात यह कि हम अब आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के प्रति और दृढ़ प्रतिज्ञ हैं ! मुम्बई के गेट वे आफ इंडिया पर हो रहे अहर्निश जन प्रदर्शनों ने हमारे संकल्प को पूरी मजबूती के साथ दुनियाके सामने रखा है । हम अब शायद पहले से भी कहीं बहुत अधिक एक राष्ट्र के रूप में एकजुट हो गए हैं ! इस संदेश को भारतीय संसद ने ही नहीं पूरी दुनिया ने सही तरीके से ले लिया है -हम अब कुछ भी नानसेंस बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं .अगर पाकिस्तान अब भी नही चेत्तता और आतंकी गतिविधियों पर पूर्ण विराम नहीं लगाता तो एक सबक सिखाने वाला युद्ध निश्चित है -इसे हमारे देश के मध्यमार्गी (प्र )बुद्ध जन भी अब रोक नहीं पायेंगे !
आज पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर है और उसे अपनी खस्ता हालत के मद्देनजर सदबुद्धि दिखानी होगी .उसे वांछित आतंकियों को सौंपना ही होगा -इससे कम कुछ भी स्वीकार्य नही है .पर जो दिख रहा है वह यह कि अभी भी वह अपनी हेकडी से बाज नही आ रहा -अभी भी वह आतंकी घटनाओं में पाकिस्तानियों के होने का प्रमाण माँगता जा रहा है जबकि पकडे आतंकी का पिता चिल्ला चिला कर उसका बाप होने का दावा कर रहा है और पाकिस्तान का मीडिया भी इसकी पुष्टि कर रहा है -क्या केवल भारत द्वारा एक पूरी ताकत से किया आक्रमण ही प्रमाण की कमीं को पूरा कर सकेगा ? ज़रा रायशुमारी में प्राप्त टिप्पणियों पर गौर तो करें -संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि अब हमारे सब्र का बाँध टूंट चुका है और हम अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे .और भारत में भी यदि किसी ने भी बुद्धि विवेक छोड़ कर आचरण अपनाया तो उसकी खैर नहीं है -वह चाहे हमारे नपुंसक छद्म धर्म निरपेक्षी हों या देश की मुख्य धारा और राष्ट्रीय भावना से वंचित अन्य धर्मावलम्बी ! यहाँ धर्म की कोई बात ही नही है -यहाँ मात्र एक संप्रभुता संपन्न देश जिसकी आबादी लगभग सवा अरब है के मान प्रतिष्टा की बात है ! और हमने अब तय कर लिया है कि किसी भी उद्दंडता का हम मुँहतोड़ जवाब देंगे ! हमारी मंशा से लोग परिचित हो जांय और किसी भी तरह के मुगालते में न रहें -आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारी लडाई अब निर्णायक दौर में है .
आज सबसे बडा दायित्व मुसलमान भाईयों पर आ गया है -मैं जानता हूँ कि हमारे अनेक मुसलमान भाई असंदिग्ध रूप से अपने देश के साथ हैं पर सभी मुसलामानों के बारे में ऐसा विश्वास यहाँ के बहुसंख्यकों को नहीं है ,यह एक यथार्थ है जीससेमुंह नही मोडा जा सकता -आम ख़ास मुसलमान भाईयों को भी जाने अनजाने भी ऐसे किसी भी सदिग्ध आचरण से बचना होगा ,अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी जिससे कोई ग़लत संकेत उनके बहुसंख्यक भाईयों में जाय .यह उनके लिए भी एक अग्नि परीक्षा का समय है । हमारे यहाँ संदेह के चलते कई कई अनर्थ हो चुके हैं -यहाँ तक कि लोक कथाओं में हनुमान को अपना वक्ष दोफाड़ कर दिखाना पडा है कि वहां सीता राम ही बसते हैं -आज इतनी कठिन परीक्षा तो कोई दे नही सकता ,इसलिए पूरी जिम्मेदारी और संयम की जरूरत है .हाँ बहुसंख्यकों को भी पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी मिश्रित परम्परा के अनुरूप मुसलमान भाईयों के सम्मान में कोई कमी नही आने देनी चाहिए .और बिला वजह और हर बात पर उन पर शक करने भी किसी भी तरह जायज नहीं है -मौके की नजाकत वे भी समझ रहें हैं और वे किसी भी चूक का मौका निश्चित रूप से नही देंगे !
मैं तो बहुत चाहता था कि रायशुमारी की कुछ चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं को यहाँ पुनः उद्धृत करुँ पर ब्लॉग की प्रवृत्ति और मौजूदा कलेवर के अनुरूप यह ठीक नही होगा -हाँ आगे हम चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं को सम्मिलित करते हुए एक विवेचना अवश्य करेंगे !
फिलहाल एक बानगी के तौर पर अब तक प्राप्त अन्तिम प्रतिक्रया टिप्पणी यहाँ जस का तस् उद्धृत कर रहा हूँ -
दुश्मन देश स्थित आतंक के अड्डों पर हमले के लिए इजरायल जैसी राजनैतिक ईच्छा-शक्ति और प्रतिबधता चाहिए जो बिना किसी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की परवाह किए अपने देश हित में कार्यवाही करता है.जिन यहूदियों को हिटलर ने नेस्तनाबूद कर दिया , जिनको एक सूखे बंजर का टुकडा रहने के लिए मिला, आज वो कौम कृषि यन्त्र और खासकर सिंचाई यंत्रो में विश्व में अग्रणी है !
उन पर एक गोली चलाओ -- जवाब में वो आप पर पुरी मैगजीन खाली कर देंगे ! स्पस्ट रूप से जब हमें इसी महाद्वीप में रहना है तो इजरायल वाली नीति ही कारगर होगी.. जैसे को तैसा ....
-मीनू खरे

रविवार, 30 नवंबर 2008

एक रायशुमारी -क्या भारत को बिना ऑर समय गवाए पी ओ के के आतंकी ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए?

मित्रों ,मैंने यह रायशुमारी केवल आपकी भावनाओं को मुखर करने और आपके सलाह मशवरे के लिए की है .चूंकि इसके लिए जो गजेट ब्लॉग के हाशिये पर है उसमें केवल हां या ना का ही आप्शन है अतः यह सहायक पोस्ट भी इसलिए कि ब्लॉग दुनिया कुछ और भी तफसील से कहना चाहे तो कह सके ताकि एक जनमत बन सके और हमारे आका जो पता नहीं इस समय क्या कर रहे हैं जन भावनाओं से परिचित हो सकें ।
मेरा तो दृढ मत है कि अब तक भारतीय वायुसेना को यह आर्डर मिल जाने चाहिए थे कि वह पाक अधिकृत आतंकी ठिकानों पर बेलौस पूरी शक्ति के साथ आक्रमण कर दे -पर हमारा नेतृत्व फिर नपुंसकता ,क्लैव्यता की राह पकड़ रहा है -हमारे ऊपर आक्रमण हुए कई दिन बीत रहे -आखिर इन सत्ता भोगियों को स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लेने में क्या अड़चन आ रही है?
पूरा देश इस समय अपमान की घूँट पिए ,कुछ न कर पाने के आक्रोश में डूबा है -क्या जन भावनाएं हमारे ही चुने हुए नेताओं की समझ में नहीं आतीं .आज याद आ रही है इंदिरा जी की जिन्होंने ऐसे ही मौकों पर तुंरत सटीक निर्णय लिए और अपने देश के शौर्य और प्रतिष्ठा को पूरी दुनिया में बनाए रखा .एक काबिल बाप की काबिल बेटी तो थी हीं वे और उससे बढ़ कर एक लौह महिला ,प्रधानमंत्री भी थीं ! आखिर हमारा वर्तमान नेतृत्व क्यों उनसे कुछ सीख नही लेता ! क्या हमारे प्रधान मंत्री सचमुच ही वही है जो वे दीखते हैं ? यानी ब्रिह्न्नला ? वे आखिर कर क्या रहे हैं ?क्या उन्होंने इस मसले पर फौरन राष्ट्रपति से बात की ? और हमारी श्रद्धेय राष्ट्रपति जी क्या कर रही है ?? मुझे एक नागरिक होने के नाते यह जानने का हक़ है -मगर मुझे कुछ पता नहीं चल रहा है ? क्या आपको पता है ? क्या वे अभी भी अपनी रोजाना की दिनचर्या में ही व्यस्त हैं ? यदि हम राजनीतिक -सरकारी निर्णय में किन्ही कारणों से हो रही देर की बात को इग्नोर भी कर दे तो क्या राष्ट्रपति जी की भी ऐसी ही कोई विवशता है जो यह राष्ट कभी समझ पायेगा ? क्या हमारे राष्ट्रपति जी ने सेना अध्यक्षों को बुलाकर उनसे सलाह मशविरा किया ? और यदि हाँ तो फिर देर क्यों ? क्यों अमूल्य समय गवायाँ जा रहा है ? यह निर्णायक क्षण है -सरकार को जन भावनाओं के अनुरूप कार्यवाही से क्या रोक रहा है ? पूरा देश साथ है -टक टकी बांधे दिल्ली की ओर ताक रहा है -निर्णय में विलंब क्यों ? क्या अमेरिका और ब्रिटेन हमारा युद्ध लडेंगे ? क्या हम आज इतने वेवश और शक्ति हीन हैं -हम शक्ति और तकनालोजी के मामले में पूरी दुनिया में अग्रपंक्ति में आज खड़े हैं .हम इतना दीन हीन क्यों दिख रहे हैं ? हे सोनिया ,हे मनमोहन अगर तुम्हे अपनी लाज ,देश की लाज और अपनी डूबती पार्टी की लुटिया बचानी है तो सामने आकर हमारा नेतृत्व करो नहीं तो दिल्ली को खाली करो ! समय बहुत कम है. कूटनीतिक गतिविधियाँ शुरू हो चुकी हैं -और देरी तुम्हे एक सही निर्णय से रोक देगी और तुम सब इतिहास से सबक न लेने की भूलों की फेहरिस्त में एक और इजाफा कर खुद कालातीत हो जाओगे !
पता तो चले कि देर क्यों हो रही है -क्या इसलिए कि पाकिस्तान जवाबी हमला कर देगा ? क्या इसलिए कि यह युद्ध नाभकीय हो जायेगा ? कि इसलिए कि मुस्लिम वोट बैंक खिसक जायेगा ? ऐसा कौन सा मुस्लिम है जो अपने देश पर हुए हमले के परिताप को सह पा रहा है -यह तुम्हारे नपुंसक सलाहकारों की गलत् राय है -पूरा देश साथ है !
इस समय न हम हिन्दू है ना मुसलमान ,न सिख ना ईसाई -हम एक राष्ट्र है -यह पूरा राष्ट्र अपील कर रहा है मरो या करो !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव