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शनिवार, 31 जनवरी 2015

युवावस्था कब तक?

प्रायः लोगों की उत्कंठा होती है युवावस्था कब तक होती है?
बुजुर्ग लोग प्रायः सीधा उत्तर न देकर यह कह देते हैं कि जब तक उत्साह उमंग कायम है युवावस्था है? वैसे शारीरिक क्षमता और काम क्रिया की सक्रियता (उर्वरता नहीं) युवावस्था का प्रमुख मानदंड है।पुरुष के शुक्राणु तो जीवन के अंत तक सक्रिय रहते हैं। तो क्या वह मृत्युपर्यन्त युवा है? निश्चित ही नहीं? लेकिन पुरुषार्थ के सनातनी उद्देश्यों में 'काम' भी है।कहा गया है कि मनुष्य के सार्थक जीवन के चार उद्देश्यों में धर्म,अर्थ और मोक्ष के साथ काम भी है।
क्या है यहाँ 'काम' का अर्थ?
'काम' के अधीन -इच्छा ,दीवानगी ,भावविह्वलता, ऐन्द्रिय सुख ,सौंदर्यबोधयुक्त जीवन का निर्वाह ,लगाव ,सेक्स सहित या रहित प्रेम का भाव है.जीवन के चार प्रमुख उद्देश्य यानि पुरुषार्थ माने गये हैं।पहले नंबर पर धर्म, फ़िर अर्थ , काम और मोक्ष। वैसे सर्वोच्च उद्देश्य तो मोक्ष ही है और उसके बाद धर्म है। नैतिक आग्रहों के साथ जीवन जीना धर्म है।धनार्जन दूसरा किन्तु गौण लक्ष्य है. हिन्दू धर्म में जीवन की चार अवस्थाएं भी निर्धारित हैं -ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास!
अब तनिक इन चार अवस्थाओं (आश्रम ) को पुरुषार्थ की अवधारणा के साथ जोड़िये। एक सामंजस्य दीखता है। छात्र के लिए धर्म या नैतिक आचरण प्रमुख है ,गृहस्थ के लिए धर्म के साथ ही अर्थ और काम तथा वानप्रस्थ/ सन्यास के लिए धर्म और मोक्ष।
अब आईये इस प्राचीन व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के उम्र का कालक्रम देखें -
यह है -शैशव-0 -2 वर्ष,बाल्य -3 -12 वर्ष,फिर कौमार्य -(यहां दो वर्ग हैं )-अ -किशोर -13–15 वर्ष,ब -तरुण -16–19 वर्ष,अब इसके बाद आता है -यौवन, और रोचक बात यह कि इसके भी दो काल वर्ग हैं-यौबन -1 (तारुण्य यौवन )- 20–29 वर्ष,यौवन -2 (प्रौढ़ यौवन ) 30–59 वर्ष,अर्थात यौवन का विस्तार 20 से 59 वर्ष का हैऔर फिर ६० से वार्धक्य।यह वर्गीकरण कितना विज्ञान सम्मत है! अर्थात गृहस्थ(५९ वर्ष तक) युवा है -और धर्म अर्थ के साथ काम उसका प्राप्य अभीष्ट है!
बाटम लाईन: मनुष्य की युवावस्था 59 वर्ष तक है ! ६०+ वार्धक्य -वृद्धावस्था का आरम्भ।जिसमें वानप्रस्थ फिर सन्यास है। वानप्रस्थ दरअसल यौवन और सन्यास का संक्रमण काल है। किन्तु यह भी सोचिये यह वर्गीकरण हजारो वर्ष पुराना है। तब मेडिकल साइंस इतना उन्नत नहीं था। इसलिए अमिताभ का बहु प्रचारित डायलॉग "बुड्ढा होगा तेरा बाप " कोई अतिशयोक्ति तो नहीं!
पुनश्च: चूँकि नारी की उम्र चर्चा पर सभ्य जगत में निषेध है अतः मुखर रूप में नारी का उल्लेख यहाँ नहीं है मगर विद्वानों का कहना है कि यह प्राचीन वर्गीकरण नर नारी दोनों के लिए था।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान

विगत लगभग एक साल से नारी अस्मिता और सम्मान को तारतार करने के ऐसे अप्रिय और शर्मनाक मामले मीडिया के जरिये चर्चित हुए हैं कि हमें खुद के सभ्य  होने पर शंका होने लगी है।  सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि कठोर दंड के प्रावधानों के बावजूद भी इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है। ऐसा नहीं  है कि ये मामले अशिक्षित, गंवार और जाहिल लोगों के बीच के हैं बल्कि नारी की अस्मिता से खिलवाड़ का आरोप लोकतंत्र के लगभग सभी स्तम्भों के नुमाइंदों पर लगा है -जज ,विधायक-सांसद  ,अधिकारी और पत्रकार सभी इस के दायरे में है जो खासे पढ़े लिखे और शिक्षित हैं। आखिर सामजिक स्थापनाओं की एक अहम् कड़ी बल्कि कर्णधारों  पर ऐसे आरोपों  का सबब क्या है ?

.... और आधी दुनिया पर भारत में यह क़यामत क्यों बरपा हुयी है। इस अत्यंत ही विषम समस्या के  पहलुओं पर गहन विचार विमर्श और उनके कारणों और निवारण पर उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यवाही समय की मांग है।  मात्र  कानूनी प्रावधान -दंड व्यवस्था के बल पर इससे निजात मिलना मुश्किल लगता है।  इस समस्या के मूल कारणों के सभी सामाजिक ,आर्थिक और जैवीय पहलुओं को गम्भीरता से समझना होगा।  मीडिया ट्रायल या नारी समर्थकों की अति सक्रियता भी इसे प्रकारांतर से उभार ही रही हैं ऐसा लगता है। 

 मुझ पर अपनी बातों की बार बार पुनरावृत्ति के आरोप की कीमत पर भी जैवीय पहलुओं को यहाँ इंगित करना मैं जरूरी समझता हूँ -नारी का प्राचीन मानवीय सभ्यता में घर के भीतर तक सीमित रहने का रोल सभ्यता की प्रगति के साथ तेजी से बदला है।  अब नारी का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहकर उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत हो चला है -डेजमांड मोरिस जैसे विश्व प्रसिद्ध जैव व्यवहार विद के शब्दों में कहें तो नारी अब पुरुष के बाहरी विस्तृत  "आखेट के मैदान " में उसकी बराबर की सहभागी बन रही है।  यह एक बड़ा रोल रिवर्जल है। उसका नित एक्सपोजर अब एक बड़े " आखेट के मैदान" में हो रहा है।  और यहाँ उसका सामना विभिन्न हैसियत के पुरुषों से हो रहा है। 

मनुष्य का विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। पुरुष ऐसे जैवीय आकर्षणों या यूं कहिये "जैव कांपों" (बायो ट्रैप ) से बच नहीं पाता, सहज ही फंसता है ।  इस मामले में उसका आचरण ज्यादा मुखर  होता है।  प्रकृति ने उसे सम्भवतः ऐसा ही बनाया है क्योंकि ऐसा होने में उसके सामने कोई जैवीय या सामाजिक रिस्क नहीं है।जबकि नारी का लम्बा प्रसव काल और  शिशु के लम्बे समय तक पालन पोषण उसके लिए सबसे बड़ा बंधन है , इसलिए प्रकृति ने उसे विपरीत सेक्स के प्रति जब तक कि उसकी संतति के लालन पालन के लिए एक जिम्मेदार सहचर न मिल जाय प्रायः उदासीन ही बना रखा है।  मगर पुरुष की ऐसी  किसी बाध्यता के न होने से उसके यौनिक आग्रह प्रायः ज्यादा मुखर होते हैं।  यह एक बड़ी असहज स्थिति है.  जानवरों में तो मादा के चयन के लिए बाकायदा भयंकर शक्ति का प्रदर्शन होता है और जो सबसे बलिष्ठ होता है वही मादा को हासिल करता है।  वहाँ  पूरी तरह जैवीय -कुदरती व्यवस्था लागू है। मगर मनुष्य ने शादी विवाह के कई सामाजिक पद्धतियों को वजूद में ला दिया है।   वह आज भी एक तरह से अपनी उसी आदि आखेटक की भूमिका और बलिष्ठ नर होने का गाहे बगाहे प्रदर्शन का 'कु -प्रयास' कर बैठता है। 
 
 मनुष्य ने विकास क्रम में अपनी एक सामाजिक व्यवस्था  विकसित की है और कई कायदे क़ानून बनाये हैं।  स्त्री पुरुष के ऐसे ही जैवीय लिहाज से भी अनुचित संसर्गों से बचने के लिए धर्म में  स्त्री के पर्देदारी ,यौनिक दृष्टि से परिपक्व विपरीत लिंगियों यहाँ तक कि पिता पुत्री तक के एकांतवास पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।  धार्मिक साहित्य में स्त्री से दूर रहने के लिए ऐसे तमाम निषेध हैं और उसे जानबूझकर कर दुखों और अपयश की खान तक कह  डाला गया है।  कहा गया है कि नारी संसर्ग/प्रसंग पुरुष के ज्ञान -बुद्धि सभी को नष्ट भ्रष्ट कर देने वाला है।  इसका अभिप्राय केवल यही लगता है कि विज्ञ जन नारी से दूर रहें -उनके आकर्षण से बचें।  

पूरी दुनिया में नारी के पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर चलने के चलन ने हमें 'सभ्य युग' के  कई शिष्टाचार के पाठ भी पढ़ाये हैं।  कंधा से कंधा मिलाना महज एक अलंकारिक उक्ति है जबकि सामाजिक रहन सहन में उंगली भी छू जाय तो शिष्टाचार का तकाजा है कि तुरंत सारी बोला जाय।  मगर बायोट्रैप का क्या कहिये, बसों रेलों में ईव टीजिंग की घटनाएं होती रहती हैं।  जाहिर है पुरुषों के लिए जैव कांपों से खुद को बचने का सलीका अभी आया नहीं है।  बहुत प्रशिक्षण और कठोर पारिवारिक संस्कारीकरण की जरुरत बनी हुयी है. ऐसे में कार्य स्थल जो मनुष्य के आदिम आखेट स्थलों के नए स्वरुप हैं में नारियों को भी कई सुरक्षा और सावधानियों का अपनाना जरूरी है। यहाँ मैं नारीवादियों की उन्मुक्त रहन सहन के बड़े दावों से सहमत नहीं हूँ।  अनेक दुखद घटनाएं हमें बार बार चेता रही हैं कि आज कार्यस्थलों पर नारी के भी आचरण को मर्यादित रखने के प्रति सजग होना होगा। अनावश्यक प्रदर्शनों जिसके कि अनजाने ही गलत अर्थ -जैवीय संकेत निकलते हों के प्रति सावधानी अपेक्षित है।  

पुरुषों के लिए तो खैर कार्यस्थलों पर आचार विचार के लिए कठोर दण्ड के कानूनी प्रावधान लागू हो ही गए हैं मगर साफ़ दिख रहा है कि इससे भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।  इस समस्या की जड़ें कही और है और हम  कहीं और समाधान के प्रयास कर रहे हैं।  भारत में कार्यस्थलों पर विशाखा प्रावधानों के लागू होने के बाद तो स्थिति पुरुष सहकर्मियों के लिए काफी निषेधात्मक और चेतावनीपूर्ण हो गए हैं।महिला सहकर्मी के किस हाव भाव या उपक्रम को गलत समझ कर प्रतिवाद हो जाय यह भी असहज सम्भावना बनी हुयी है।  इसलिए आज पुरुष सहकर्मियों को भी कार्यस्थलों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरुरत है। बस काम से काम उनका मंतव्य हो, जैवीय 'काम' से बस दूर से ही नमस्कार! अन्यथा बस फजीहत ही फजीहत है। नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान! 

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

सहमति का सोलहवाँ साल?

मुझे साफ़ शफ्फाफ  याद है जब मैं हाईस्कूल में था मेरे एक सहपाठी ने मुझसे कुछ ऐसी बात फुसफुसाहट भरे लहजे में की थी जो तत्काल तो मेरी समझ में आई ही नहीं। मगर उसी ने  जब वही बात मुझे समझा समझा कर समझाई तो मैं असहज हो गया था और शायद ऐसी ही कुछ और छोटी बड़ी घटनाओं ने मिलकर मुझमें यौनिकता के समयगत विकास को आगे बढाया था . मैं उस समय यही कोई 15 वर्ष का था मगर दोस्त एक दो वर्ष ज्यादा उम्र का और समाज के कथित निचले तबके से आता था। वह मुझसे ज्यादा होशियार और परिपक्व था . उसे पता था कि मैं एक क्षेत्रीय ख्यातिलब्ध चिकित्सक परिवार से था , वह मुझसे वह "रामबाण' औषधि चुरा कर लाने की याचना कर रहा था जिससे गर्भ समापन होता था . 
मैं तब तक ऐसी किसी समस्या के बारे में ज्यादा नहीं जानता था . मैंने अपनी असमर्थता जता दी थी और उसके हाव भाव से ऐसा लगा था कि जो काम करने को मुझे वह कह रहा था वह किसी 'पाप' से कम न था . एक पापी सदृश लगा था वह और मुझे भी पाप की राह पर चलने को उकसा रहा था . उस समय यही सोचा था मैंने। कुछ महीने बाद मैंने उससे जाना कि वह शापित बिचारी भगवान को प्यारी हो गयी थी जिसके लिए उसे किसी रामबाण औषधि की तलाश थी .  उस घटना के कई वर्षों बाद जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध छात्र था तो वह मित्र बस यात्रा में अचानक  मिला - दोस्तों की नयी पुरानी बातें शुरू हुईं तो सारे परिप्रेक्ष्य का पता चला -जनाब कच्ची उम्र में ही अपने से भी कच्ची उम्र की ग्राम्या से प्रेम और यौन सम्बन्ध बना चुके थे -गर्भ का समापन झोला झाप डाक्टर ने किया और उस बिचारी की जान चली गयी थी . समय ज्यादा हो गया था -बदनामी के डर और यौन प्रतिबंधों ने एक मानव जीवन लील लिया था।  आज भी दूर सुदूर गाँवों में कमोबेस  ऐसी ही स्थिति है .
अब यौन कर्म के सहमति की नयी उम्र पुनर्निर्धारित हो गयी है -कम थी तो बड़ा हो हल्ला मचा . नैतिकतावादियों ने ग़दर मचा दिया . सेक्स  इतना बड़ा हौवा बस अपने महाद्वीप में हैं शायद -उसके सामाजिक -जैवीय, नैतिक  पक्ष तो हैं मगर आज तो विज्ञान की दुनिया है, हम कब अपनी सोच परिमार्जित करेगें? बच्चों को इस तरह के प्रतिबंधों से बांधने के बजाय उन्हें यौन शिक्षा देना ज्यादा जरुरी है -उनके मन से इनसे जुड़े अपराध बोध को दूर करना ज्यादा जरुरी है। किस उम्र में कोई सेक्स करे या न करे यह कतई प्रतिबन्ध का विषय नहीं होना चाहिए . यह कानून कितना प्रभावी होगा? समाज में और माँ बाप की चौबीसों पहर की चौकसी, समाज का सख्त पहरा -खाप वाले ऐसे ही बदनाम नहीं हैं . फिर भी क्या किशोर वयी सेक्स सम्बन्ध नहीं होंगें  ? भूले भटके कमसिन उम्र में अगर ऐसा हो गया तो बच्चों  क्या फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए?काल कोठारी में ढकेल देना चाहिए? यह ऐसा कौन सा अपराध हो गया ?आज भी सेक्स को पाप समझने की यह आदिम सोच कब बदलेगी?
 अब तो वयः संधि वाले किशोर अट्ठारह वर्ष से एक दिन भी छोटी हम उम्र किशोरी  को छू भर लिए तो अपराध हो जायेगा -यह कानूनी विकर्षण का आरोपित प्रयास जैवीय आकर्षण पर कितना कारगर होगा इसे साबित होने के  लिए इंतज़ार की कोई जरुरत नहीं है, जैवीय आकर्षण तो जान देने लेने तक का मामला हो जाता है। मैं कम उम्र के मासूम यौन सम्बन्ध की वकालत नहीं कर रहा हूँ बस यह कहना है कि इस तरह के प्रतिबन्ध कोई मायने नहीं रखते ,हाँ यौन शिक्षा ज्यादा जरुरी है . जो बच्चों को इस जैवीय आकर्षण के अनेकानेक सामाजिक और स्वास्थ्य के पहलुओं के  प्रति ज्यादा कारगर तरीके से सजग कर सकती  है ,यह बताने के बजाय कि यौन कर्म एक 'पाप कर्म' है यह बताना ज्यादा जरुरी है कि अपरिपक्व यौन सम्बन्धों से क्या समस्यायें हो सकती हैं? 
यह उनके लिए कतई किसी ग्लानि बोध का मामला  नहीं है और इसके कारण आत्महत्याएं तक करने की कोई जरुरत नहीं हैं,न ही खाप पंचायतों में मौत का फरमान सुनाने की  -ऐसे  मामले  घटित हो जाएँ भी तो आज एम टी पी का विकल्प तो है ही ? ऐसे मौकों पर बच्चों को मानसिक सपोर्ट की जरुरत होती है, मार्गदर्शन की जरुरत होती है, नहीं तो मेरे बाल मित्र के साथ घटी उक्त घटना की पुनरावृत्ति समाज में होती रहेगी . मासूम जानें जाती रहेगीं! अब तो अट्ठारह के पहले ऐसे कोई सम्बन्ध हो जाते हैं जिन्हें रोका जाना संभव नहीं दीखता तो ग्लानि बोध, पाप बोध के साथ ही अब अपराध  बोध भी बच्चों को आ ग्रसेगा? सेक्स सम्बन्ध को लेकर ऐसे प्रतिबन्ध मुझे तो बचकाने लगते हैं ,बेमानी लगते हैं जो मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीनते हैं!


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बलात्कारी सामूहिकता के दौर में सहमति की उम्र

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बचपन से ही पड़ती है यौन कुंठाओं की नींव (प्रौढ़ों को है यौन शिक्षा की ज्यादा जरुरत-२)



लड़के  या लडकी दोनों  किशोरावस्था के पहले से ही यौनिक अहसासों से गुजरने लगते हैं.यह बहुत कुछ मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते ही है .भारत जैसे गरम देश में यौन लक्षणों का प्रगटन भी जल्दी ही -१० वर्षों से ही आरंभ होकर १४-१५ वर्ष तक आते आते बिल्कुल स्पष्ट हो रहता है -यद्यपि बाह्य और आंतरिक  यौनांग अभी भी विकास की अवस्था में होते हैं ,मगर यौनिक अनुभूति  अब मुखर होने लगती है -यौन रसायनों का ऐसा प्रभाव होता है कि लड़के और लडकियां दोनों का विपरीत सेक्स की ओर झुकाव तीव्रतर होने लगता है ...ऐसे ही समय लड़के प्रायः परिवार के भी विपरीत लिंगी लोगों -माता पिता या समतुल्य व्यक्तियों का अधिक स्नेह सामीप्य चाहते हैं.यह सहज और स्वाभाविक है.ऐसे वक्त उनके जैवीय विकास और मनोविज्ञान की समझ अभिभावकों के लिए जरुरी है.ऐसे वक्त एक बेटे का माँ द्वारा अनदेखा किया जाना या उपेक्षित करना भावी जीवन में विपरीत लैंगिक आकर्षण के बजाय विकर्षण उत्पन्न कर सकता है. कई समलैंगिकों ने अपनी जीवनी में माँ या किन्ही मदर फिगर द्वारा बचपन के तिरस्कार को भी अपनी समलैंगिकता एक कारण बताया है और मनोविज्ञानियों ने इसकी पुष्टि की है. इसी तरह बेटियों का पिता के भी प्रति आकर्षण बहुत सहज और निर्मल भाव लिए होता है -वह पिता से प्यार दुलार ,अपनत्व की अपेक्षा रखती है -यहाँ केवल एक आकर्षण ,आईडल वरशिप का भाव होता हैजो  सहज है,वह भी पिता या किसी फादर फिगर  का स्नेह सामीप्य पाना चाहती है ..मगर कई बार इसे माँ बाप या अभिभावकों द्वारा सही ढंग से समझा  नहीं जाता और ऐसे सहज नैसर्गिक झुकाओं के प्रति बहुत ही रोषपूर्ण तिरस्कार का भाव दिखाया जाता है.ऐसे "अनुपयुक्त'' से  व्यवहार को ठीक से समझ  पाने के कारण माता  पिता प्रायः बच्चों को  तिरस्कृत करते है ,उपेक्षा करते हैं और यहीं से उसके अवचेतन में विपरीत लिंग के प्रति एक तरह का दुराग्रह जन्म ले लेता है ..यही वक्त है जब बच्चों को अधिक केयर ,स्नेह दुलार चाहिए ....
 किशोरावस्था के ठीक पूर्व के एक दो वर्षों और किशोरावस्था के  अनुभव किसी भी के भावी यौन व्यवहार को नियमित करने ,प्रभावित करने की माद्दा रखते हैं .चाहे वह समलैंगिकता हो या फिर विपरीत लैंगिक अरुचि .....एक शिक्षक  ने ११ वर्षीय  कक्षा  के छात्र को अपने साथ की लड़कियों से घुलमिल कर बात करते देख उसे बुलाया और बहुत डांटा..कहा कि लड़कियों से इस तरह बात करना अच्छे घरों के बच्चों को शोभा नहीं देता -बहुत खराब माना माना जाता है .बच्चे के कोमल मन पर इसका इतना दुष्प्रभाव हुआ कि वह लड़कियों की उपस्थिति मात्र से असहज होने लगा,उनसे दूर रहने लगा   -उसने बाद में स्वीकार किया कि एक उस घटना से ही उसका भावी यौन  जीवन  एबनार्मल होता  गया ..वह कुछ सालों तक समलैंगिकता की ओर मुड़ा और विवाह के उपरान्त ही  कुछ हद तक उसका यौन जीवन सहज हुआ मगर आज अपनी प्रौढावस्था में भी वह लड़कियों ,युवतियों के संपर्क -सम्बन्ध में असहजता का अनुभव करता है ....उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता... वह उन्हें मात्र सेक्स आब्जेक्ट  के ही रूप में देखता है .आकर्षित विकर्षित होता रहता है. एक शिक्षक के अविवेकपूर्ण निर्णय से कैसे किसी का पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है यह मात्र एक उदाहरण है मगर ऐसे अनेक उदाहरण भारतीय समाज में मिल जायेगें .अब  इन विषयों पर चर्चा 'सभ्य ' समाज में प्रत्यक्षतः ठीक नहीं मानी जाती और यहाँ असहज यौन व्यवहार पर  परामर्श का उतना चलन नहीं है इसलिए समाज की इन यौन ग्रंथियों का अमूमन कोई निवारण भी नहीं है ..

किशोरावस्था के दौरान के ही पहले यौन अनुभव जीवन के स्थाई भाव बनते हैं -एक 'सब्जेक्टने कहा कि उसे पहले स्खलन का अनुभव नर्तकी के कामुक नृत्य और उसके उन्नत वक्षों की गति को  देखकर हुआ था सो वह ताउम्र नारी वक्षों से ही  विशेष रूप से उद्वेलित होता रहा .किशोरावस्था या आरम्भिक युवावस्था के अप्रिय और अनचाहे यौन संसर्ग से भावी जीवन के सहज सेक्स के प्रति भी तीव्र विकर्षण ,दहशत की प्रतिक्रिया का एक स्थायी भाव मन में घर कर जाता है ....और अन्यथा पूरी तरह सामान्य जीवन जीने के बावजूद भी ऐसे लोगों की सेक्स लाईफ सामान्य नहीं रह पाती ....जोड़े के  एक पार्टनर के लिए सहचर /सहचरी का अनपेक्षित व्यवहार एक अबूझ पहली बन जाता है ....कई बार इनसे घर के टूटने और तलाक तक की नौबत आ जाती है .
अभी जारी है ....


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