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मंगलवार, 25 नवंबर 2014

प्रेम पत्रों का विसर्जन!

 प्रौद्योगिकी की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति ने मनुष्य के निजी और सामाजिक कार्यव्यवहार पर काफी प्रभाव  डाला है और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है।  आज एक मित्र से इस पहलू पर काफी रोचक विचार विमर्श हुआ और उन्ही के अनुरोध पर यह नई ब्लॉग पोस्ट लिखी भी जा रही है।  जी हाँ मनुष्य के जीवन के एक निजी अहम पहलू पर भी प्रौद्योगिकी ने गहरा  असर डाला है और वह है प्रेम. एक समय था जब हर  घर में न तो लैंडलाइन फोन थे और  मोबाइल का  तो दूर दूर तक कोई अता  पता ही न था। और तब प्रेमी प्रेमिका के बीच खतोकिताबत का ही एक सहारा था जिससे इज़हारे मुहब्बत और इश्क़ का सिलसिला चलता था। और वह था सुन्दर सुलेख खतों का आदान प्रदान जिसके जरिये ही मुहब्बत  परवान चढ़ती थी । मेरे मित्र  ने तफ्सील से ज़िक्र किया कि कैसे सुन्दर सुन्दर रंगीन कागजों और लिफाफों का जुगाड़ होता था और लगभग रोज ही एक प्रेम पत्र मेल बाक्स के हवाले हो  जाता था या फिर माशूक /माशूका के घर की दूरी ज्यादा न हुयी तो दीगर  सन्देश वाहकों का इंतज़ाम किया जाता था।
मेरे मित्र का  किस्सा भी बहुत कुछ मेरे जैसा ही है कि जिनसे ख़तो  किताबत हुयी वे कोई और नहीं नव परिणीता पत्नी ही थीं  और उन्हें तो साधिकार प्रेम पत्र लिखने का  सामजिक लाइसेंस मिल गया था। बेशर्मी भी अगर रही हो तो उसकी पूरी स्वीकार्यता थी।  एक पूरा प्रणयकाल(कोर्टशिप पीरियड )  ही इन प्रेम पत्रों के आदान प्रदान में बीत जाता था और तब कहीं जाकर एकाध साल बाद गौना (पति पत्नी का मिलन -सेकेण्ड सेरेमनी ) होता था तब तक उभय हृदयों का  अपरिचय पूरी तरह से मिट चुका होता था। मिलन बस एक औपचारिकता भर रह जाती थी -प्रेम पत्रों  में ह्रदय उड़ेल  दिया जाता था -कस्मे वादे होते थे -जन्म जन्मांतर तक साथ रहने की कसमें खाईं जाती थीं -एक दूसरे के प्रति समर्पण अपने उत्कर्ष पर जा पहुंचता था।

 मित्र ने अपने अतीत को याद करते हुए मुझे भी कितनी ही भूली बिसरी यादें ताजा करा दीं।  यह भी कहा कि  घर घर फोन और मोबाइल हो जाने से बिचारी नयी पढ़ी का यह सुख उनसे छिन गया है - यह कहते हुए उनके चेहरे पर जो भाव था वह ठीक से पढ़ा नहीं जा  सका कि वे नयी पीढ़ी के प्रति वास्तव में अफ़सोस कर रहे थे या फिर उन पर कटाक्ष कर रहे थे. हाँ अपने समय की प्रेम प्रधानता की गौरवानुभूति उनके चेहरे पर स्पष्ट थी। जो मजा कागज़ के प्रेम पत्रों  के लिखने पढने में है भला मोबाइल नेट संस्कृति में  कहाँ? लिखती  हूँ खत खून से स्याही न समझना मरती हूँ तुम्हारे याद में जिन्दा न समझना को पढ़ने का अहसास एक अलौकिकता का बोध कराता था।  उफ़ बीत गए वो रूमानी दिन ..  

बहरहाल मित्रों के बीच का यह अतीत -संवाद एक जगहं आकर ठहर गया -
मित्र ने कहा कि वे प्रेम पत्र तो आज  भी पड़े हुए हैं बहुत ही संभाल कर और सुरक्षित -क्या  किया जाय उनका? ऐसे तो कूड़े में फेंका नहीं जा सकता।  उनका तो एक डीसेंट डिस्पोजल होना चाहिए।  एक सम्मानपूर्ण विसर्जन।  तभी उन्हें याद आया कि मैं तो ब्लॉग लिखता हूँ तो यह समस्या तनिक ब्लॉग पर डाल दूँ -यह बहुत संभव है कि समान वयी  दूसरे मित्रों का भी यही धर्म संकट हो या फिर उनके सामने इसका कोई सम्मानजनक हल हो।  मैंने तो उन्हें सुझा दिया है कि चलिए संगम क्षेत्रे  एक सामूहिक प्रेम पत्र विसर्जन कार्यक्रम ही आयोजित कर लिया जाय और पवित्र संगम की अपार जलराशि में  प्रेम की  इस धरोहर को अर्पित कर दिया जाय।  आपके पास भी अगर कोई और  उदात्त विचार हों तो मित्र की मदद सकते हैं।  

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

परिणय बसंत बत्तीसी!

 न न यह कोई कविता नहीं है .. बस आज विवाह के सकुशल बत्तीस साल पूरे हो गए हैं तो यह बसन्त बत्तीसी  उसी के उपलक्ष्य में है .  बत्तीसी सही सलामत है ,दन्त नख क्षत क्षमता भी  उसी परम शक्ति की कृपा से दुरुस्त है :-) -रात से ही कितने छुट्टा विचार दिमाग में उछल कूद कर रहे हैं -सोचा इस बासंती अवसर पर आपसे साझा कर लूं।बात बत्तीसी से शुरू हुई है तो जाहिर है कथा भी शुरू होगी जीवन के उदन्त काल से जब हम उदन्त मार्तंड हुआ करते थे। छुट्टा जीवन था...वे दिन भी क्या दिन थे -दूध के दांत वाली सहज मुस्कान के दिन! फिर हम बंधन में बध गए माह फरवरी 18 ,वर्ष 1981..इलाहाबादी दिन पूरे होने को आये थे......स्वच्छन्दता के दुधिया दांतों पर बन आयी . हम बाण भट्ट बनते बनते रह गए -बस छुट्टापन के नाम पर केवल छुट्टा विचार ही रह गए कितनी ही कसक फसक लिए ....मनुष्य का मानो यह स्वभाव ही है जब वह स्वछन्द होता है तो कहीं बंधना चाहता है और जब बंधा होता है तो छूटना ...अब मेरी इस बात का कम से कम आज तो कोई निहितार्थ न निकाला जाय! कल की बात और है :-) 


हम तो  जनम जनम के  स्वच्छन्दतावादी है , छुट्टा ख़याल, छुट्टा जीवन के हिमायती -मगर मेरे युवा और चिर युवा मित्र उलाहना देते हैं कि खुद तो गुड खाए और हमें मना कर रहे हैं .अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि भैया अनुभव की बात बिना गुड खाए कैसे की जा सकती है -अरे मुझे मुझ जैसा कोई गुरु समय से मिला गया होता तो हम उसके अनुभव से लाभान्वित न हो गए होते? ..सभी तो यही चाहते भये  जब हम फंसे तो ये बच्चू कैसे छूट जाएँ . अरे युवा मित्रों, छुट्टा जीवन के आह्लाद का आनंद देखना हो तो छुट्टे गाय बैलों को तनिक देखो -कितने हृष्ट पुष्ट नज़र आते हैं उनकी तनिक मरियल से दिखने वाले बैलों और गायों से तुलना करो! दूर नहीं जाना यहीं फेसबुक पर ही देखो! अरे बुद्धू अब भी नहीं समझे तो निरे वो ही हो ...बाकी बातें हम आगे भी कर सकते हैं आज तो गाँठ का दिन है -आज तो बंधने का पर्व है -स्वाधीनता की बाक़ी बातें कल कर लेगें .और मित्रगण चाहेगें तो टिप्पणियों में खुला विमर्श भी!

बहरहाल हम अपनी और इनकी बात कर रहे थे ....शुक्रगुजार हैं  इनके कि  इनके ही बस कि  बात है  बिना शरद के आत़प को सहे बत्तीस परिणय बसंत आज  पूरे हुए ....अब तो आभार ब्लॉगवुड कि अक्ल की दाढ़ें भी निकल आईं पिछले पाँच वर्षों में ही  -अब आगे के जीवन के बारे में आपकी शुभेच्छाओं की कामना है! कई मित्र मित्राणियों के चेहरे याद आ रहे हैं आज -उम्मीद है उनकी शुभकामनाओं का संबल आगे के जीवन के लिए जरुर मिलेगा .......

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

तू हाँ कर या ना कर?


अपनी  फेसबुक भित्ति पर एक प्रखर नारीवादी विदुषी ने विवाह नाम्नी सुदृढ़ सामजिक  व्यवस्था पर  कटाक्ष करते हुए लिखा "  . कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि .... मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :).." यह एक टिपिकल नारीवादी चिंतन है जो विवाह की पारम्परिक व्यवस्था पर जायज/नाजायज सवाल उठाता रहा है. यहाँ के विवाह के  फिजूलखर्चों ,दहेज़ ,बाल विवाह आदि का मैं भी घोर विरोधी रहा हूँ मगर नारीवाद हमें वह राह दिखा रहा है जहाँ विवाह जैसे सम्बन्धों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न उठने शुरू हो गए हैं -और यह मुखर चिंतन लिविंग रिलेशनशिप से होता हुआ पति तक को भी "पेनीट्रेशन" का अधिकार देने न देनें को लेकर जागरूक और संगठित होता दिख रहा है . क्या ऐसे अधिकार की वैयक्तिक स्वतंत्रता की इज़ाज़त दी जा सकती है -क्या समाज के हितबिंदु इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगें ? धर्म तो विवाह को केवल प्रजनन के पवित्र दायित्व से जोड़ता है -अगर 'पेनीट्रेशन' नहीं तो फिर तो प्रजनन का प्रश्न  नहीं और प्रजनन नहीं तो फिर प्रजाति का विलुप्तिकरण तय .  क्या कोई भी धर्म और समाज या क़ानून समाजिक सरोकारों के ऊपर/अपरंच  जाकर ऐसे दिमागी फितूरों को वैयक्तिक/नागरिक आधिकारों के रूप में स्वीकृति  प्रदान कर सकता है? मामला गंभीर है और एक प्रबुद्ध विमर्श की मांग करता है.  
मैं अपने विचार यहाँ रख रहा हूँ जो समाज जैविकी(Sociobilogy)  के नजरिये से है और कोई आवश्यक नहीं कि मेरा इससे निजी मतैक्य अनिवार्यतः हो भी? अकेले मनुष्य प्रजाति में  यौन भावना का प्राबल्य या प्रजनन किसी ख़ास माहों तक सीमित न होकर सदाबहार है . हमारी नजदीकी चिम्पांजी मादा भी छठे छमासे ही हीट में आती है ..मगर मनुष्य के मामले में यह बारहोमास है .और प्रत्येक माह में अंड स्फोटन(ovulation)  के साथ ही मनुष्य -मादा के गर्भधारण की संभावनाएं बलवती हो उठती हैं -इस ग्रह पर अरबों जनसँख्या उसकी इसी अति प्रजननशीलता की ही देन है -यहाँ नारी या पुरुष किसी भी वक्त संयोग करते हैं गर्भधारण की तिथियों से दीगर भी ..... निश्चित ही मात्र प्रजनन ही मनुष्य के मामले में हेतु नहीं है कोई और भी कारक है जो जोड़े को साथ बनाए रखता है और गहन आत्मीय/यौन  सम्बन्ध ही जोड़े के लिए सीमेंट का काम करता है ..मगर क्यों यह जोड़ा सीमेंटेड होना चाहिए? इसलिए कि विद्रूप नैसर्गिक सत्य यह है कि जैव- विकास की  सीढी में न जाने क्यों प्रकृति ने मनुष्य प्रजाति की मादा को ही वात्सल्य देखभाल (पैरेंटल केयर ) का नब्बे फीसदी तक का उपहार /ठेका  देकर नारी को बिचारी बना दिया ...मनुष्य शावक पट्ठा(!) बरसों बरस तक मां  की छाती पर मूंग दलता रहता है ..दुग्धपान से डायपर बदलाव के  बहुत बाद तक भी वह मां पर पूरी /बुरी तरह आश्रित रहता है -और बाप बस उसे कभी कभार निर्मिमेष निगाहों से पलता बढ़ता देखता और औपचारिकता स्वरुप कभी कभार कुछ प्यार पुचकार करता रहता है ताकि कम से कम यह आभास तो होता ही रहे की साहबजादे उसी की औलाद हैं :-) अब सभी डी एन ऐ जांच  के लिए तो जाने से रहे ... :-) 
बच्चे  के बाप कहीं अपने दायित्वों से खिसक न लें इसलिए मनुष्य के मामले में प्रकृति ने सेक्स को और भी "सेक्सियर" -आनंददायक बना डाला -ले पट्ठे तुझे साथ रहना है तो भरपूर मजे लेता रह  और संतान की अपनी जिम्मेदारियों से  मत भाग ....मनुष्य नर  के ऊपर प्रकृति ने वात्सल्य देखभाल की  उतनी विवशता डाली ही नहीं.....न तो मानसिक स्तर पर ही और न ही शारीरिक स्तर पर ....उसके चूचक भी अवशेषी होकर सिमट सिकुड़ गए नहीं तो कम से कम प्लेसेबो दुग्धपान की राहत कभी कभार तो  बच्चे को देते ही ...... :-) 
अब उक्त परिप्रेक्ष्य में जरा सोचिये भारत ही नहीं पूरे विश्व के किसी भी भूभाग या संस्कृति में शादी एक नारी के लिए कितनी जरुरी है -मुख्यतः एक कारण से -एक तो  बच्चों के बड़ा होने तक जच्चा बच्चा  दोनों को  किसी  आपदा की स्थितियों में पुरुष का तन मन धन से तात्कालिक और दूरगामी सहयोग देना और इस तरह वंश रक्षा की निरापदता सुनिश्चित करना ....विवाह जैसी संस्था इसी जैवीय और सांस्कृतिक जरुरत को ही पूरा करती है. एक सामाजिक   संस्था के रूप में भी वह यह भी सुनिश्चित  करती है कि बच्चा पैदा कर बंदा कहीं और न सटक ले ...कुछ तो लाज भय रहेगा ...अगर मनचाहा कुदरती आनंद न भी मिल रहा हो तो बेचारा  सामजिक/कानूनी  भय और संकोच वश वैवाहिक जीवन को निबाहते रहने को अभिशप्त हो रहता है -और यह नारी के ही पक्ष में एक छुपा हुआ वरदान है . पुरुष को एक ओर गहन वात्सल्य देखभाल से मुक्त कर प्रकृति ने काम भावना को बुलंद कर दिया ताकि वह कम से कम  नारी बिचारी से जुड़ा रहे ....अन्यथा समागम के बाद उसका काम ख़त्म ..और वह बीजारोपण के लिए आगे भटक /सटक लेगा .
शादी इसलिए जरुरी है .हाँ अगर बच्चे पैदा करने का  मातृत्व बोध क्षरित हो गया लगता है (जैसा कि अभी तक नहीं है )  तो फिर विवाह जरुरी नहीं तथापि पश्चिमी देशों में यही हो रहा है -कई कई तलाक और पुनर्विवाह! नैसर्गिक इंस्टिंक्ट बस वही है -पुरुष  रुकना नहीं चाहता और नारी को वात्सल्य देखभाल से निवृत्ति नहीं है .पश्चिम में इसलिए ही आजीवन बिन व्याहे और विवाहेत्तर सम्बन्ध,तलाक  का  आंकडा बढ़ रहा है . आखिर भारत क्या चाहता है ? 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

डिजिटल युग में इजहारे मुहब्बत ....


पिछली लगातार तीन पोस्टें भारी गुजर गयीं ,,अब कुछ हल्कानी(तर्ज तूफानी) भी हो जाय .... :-) 
डिजिटल युग के एक प्रेमी का उल्लेख यहाँ है जिसने अपनी माशूका को जो मेसेज भेजे उससे १२०० पृष्ठों का मजमून बना और प्रेम पत्रों की सिमट रही दुनिया की याद करा गया .अब प्रेम पत्र कहाँ  लिखे जाते हैं?. अब तो प्रेम की अभिव्यक्ति टेक्स्ट मेसेजों में शोभित हो रही है -अब वे खुशबूदार रंग रंगीले प्रेम  पृष्ठ तो गुजरे जमाने के  अध्याय हो चुके-अब उनकी अमानत भी शायद कहीं सहेजी  हों -महापुरुषों के प्रकाशित प्रेमपत्रों को छोड़कर ..मैंने अपने तो सहेजे हुए हैं मगर अब उन्हें माँ  गंगा को समर्पित कर देने का वक्त आ गया है -मानव  ज़िन्दगी के बहुत ही अन्तरंग पहलुओं को भी टेक्नोलोजी ने कितना बदल डाला है ....
आज फेसबुक ,ट्विटर जैसी कई अन्य सोशल साईटों ने प्रेम के इजहार से लेकर उसके फलने फूलने तक का सारा जिम्मा संभाल लिया है ...बस थोड़ी सजगता जरुरी है .शेप्स एंड मेंस मैगज़ीन के हाल के एक अंक में हुए सर्वे के मुताबिक़ चुने गए लोगों में से पैसठ फीसदी से अधिक लोगों ने प्रेम का इज़हार डिजिटल माध्यमों से किया .अब चुनाव के यहाँ  ज्यादा मौके हैं . और रिजेक्शन के भी ...इंटरनेट अब लोगों की पोल पट्टी भी खोल रहा है .आप किसी के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं -मसलन उसकी रुचियों ,उसके नाक नक्श, उसके कार्य आदि तो यह सजरा इंटरनेट के खंगालने से मिल जाएगा -यहाँ रोमियो को ढूंढना किसी जूलियट के लिए मुश्किल नहीं है ....और अब सारी वसुधा आपके सामने हैं ....आनुवंशिकीविद भी कहते हैं जितना ही जीनों की दूरी होगी उनके सम्मिलन  से जीनी विवधता उतनी ही बढ़ेगी और आगामी पीढी अन्तःप्रजनन आदि दोषों से उतनी ही मुक्त होगी -संकर ओज वाली देदीप्यमान संताने जन्म  लेगीं ...
मैंने यह गुरु दीक्षा अपने एक चेले को क्या दे दी वह यहाँ की सुन्दरियों/भारतीय अंतर्जाल, ब्लॉग सुन्दरियों  को तुरत फुरत छोड़ छाड़ एक अमेरिकन हूर को ही पटा लिया ..अच्छी बात हुयी दोनों की शादी हो गयी और अब वे साथ साथ अमेरिका में रह रहे हैं -जाति पांति का रूढिगत बंधन टूटा सो अलग .....हाँ यहाँ कथित निम्न सामाजिक स्तर का वरण अमेरिका के एक बड़े ऊंचे घराने की बाला ने कर लिया ....अभी तक वंशावली वृद्धि की खुशखबरी तो नहीं सुनायी दी ..नालायक का यही अभीष्ट  यही होना था मगर  पता नहीं कर क्या रहा है? दो साल तो बीत गए... अभी अपने अली भाई भी उस दंपत्ति को खोज बैठे तो मुझसे जोड़ी की वास्तविकता का शिनाख्त करा बैठे ..एक दिन अचानक उनका बहुत ही संक्षिप्त  सन्देश मिला -यही है? साथ में एक लिंक ..मैंने रिफ्लेक्स एक्शन में प्रतिप्रश्न किया -"क्या यही है ?" ?उन्होंने कहा लिंक देखिए ..मैंने देखा और पुष्टि कर दी ..अब अली भाई यह शिनाख्त क्यों करा रहे थे वही जाने आज तक तो साफ़ साफ़ बताये नहीं ....समाजविद हैं ऐसे अध्ययन करना उनकी पेशागत जरुरत है .
तो आज प्रेम प्रणय के जितने अवसर अंतर्जाल दे रहा है पुराने सभी नई पंडित मुल्ला के दिन लदते  भये  हैं.प्रेम- प्रणय परिणय के मामले भी महज दो जिंदगियों से जुड़े हैं -पुराना जुमला है -मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ....यह कितना हास्यास्पद है कि जीवन संगी बनना दो जनों को है और उनके बजाय कितने और लोग रिश्ते ढूंढ रहे हैं -माँ बाप बिचारे हलकान हैं सो अलग ....अंतर्जाल युग के युवाओं को भी यह आजादी क्यों न हो? यहाँ  अवसरों  की  भरमार है -रिश्ते ही रिश्ते कोई भी चुन लो ....मगर फाईनल चयन के पहले काफी जांच पड़ताल तो जरुरी है अन्यथा कितने ही कैसोनोवा और मियाँ रंगीले यहाँ  घूम रहे हैं जिन्हें जीवन साथी ही नहीं बाकी सभी कुछ चाहिए ....
अंतर्जाल के प्रेम युग में आप सभी  गैर विवाहितों का स्वागत है ....अब विवाहितों को भी ऐसा कोई निषेध नहीं ..वे मन -रंजन तो कर ही सकते हैं ....कोई मनाही थोड़े ही है बस मन मिलने की बात है :-) 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

परिणय बत्तीसी: सुहाना सफ़र और सलामत बत्तीसी!

वह प्रथम मिलन: संध्या -अरविन्द!  
देखते देखते दस बीस नहीं बत्तीस वर्ष बीत गए ....गनीमत यही कि खुदा के फज़ल से अभी बत्तीसी सलामत है..१८ फरवरी १९८१ की उस गुनगुनी शाम और गुलाबी निशा की यादें आज भी तरोताजा हैं, हाँ बारीक डिटेल्स यानी कोहबर और सोहबत की बातें  जरुर विस्मृत हुई  हैं ....यह पूरी तरह से एक अरेंज्ड मैरेज थी .....पिता पितामह चाचा आदि श्रेष्ठ जनों ने जो आज्ञां दी सर माथे ले ली थी ....उसके पहले के एकाध क्रश और क्रैश का गला घोटकर :)  ...मैंने विवाह पूर्व के कतिपय कैजुअल रागात्मक सम्बन्धों के  दरम्यान यह बात बहुत साफ़ करके रखी थी कि विवाह का स्वतंत्र निर्णय मैं नहीं ले पाऊंगा ..यद्यपि दूसरों को इसके लिए प्रोत्साहित करता था और अपने एक मित्र की कोर्ट मैरेज में मैंने भी बखूबी उत्प्रेरण का दायित्व निभाया था......
  परिणय के साक्षी मित्रगण 
मगर खुद अपने बारे में ऐसा निर्णय इस लिए नहीं ले पा  रहा था कि परिवार में कुछ वर्षों पहले ही बिना पारिवारिक सम्मति के  एक इंटर रेलिजन विवाह हो चुका था और परिवार के कई सदस्य इससे संतप्त थे -ख़ास कर मेरे पितामह जिन्हें मैं बेहद चाहता था ..फिर दुबारा कम से कम उन्हें दुखी करना नहीं चाहता था..उन्हें अपनी खोयी साध पोते की शादी में पूरी करनी थी सो उन्हें मैं इसका पूरा अवसर उन्हें देना चाहता था ..यह उनका हक़ था ....और किन तरीकों से पितामह ऋण से उरिण हुआ जा सकता है ...  साथ ही  एक पूर्व पारिवारिक घटना के संघात की भरपाई भी करना मेरा जैसे मकसद सा था -जैसे त्याग का एक जनून सा तारी हो गया था  मुझ पर ..और इसलिए  मां बाप नियोजित इस विवाह प्रस्ताव को शिरोधार्य कर लिया था मैंने ...

....पितामह और परिजनों ने सचमुच अपनी साध पूरी की और पूरी सज धज के साथ बारात निकली थी ..बरात में दो दो रियासतों के राजा -राजा जौनपुर और राजा सिंगारामउ गए थे जो की एक विरल घटना मानी गयी थी -कारण कि रियासतों के वैमनस्य के कारण वे कभी साथ साथ नहीं होते थे ....मित्रगण इसे एक सामंतवादी नजरिये का नाम देगें और शायद उनकी यह सोच सही भी है ..मैं भी उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था और बहुत सी बातें मुझे भी नागवार लगती थी मगर मैं तो त्याग की प्रतिमूर्ति बना बैठा था न ....सो चुप ही रहा हर समय... 

मगर मुझे आज भी लगता है कि बिना कोर्टशिप के विवाह कैसा? गनीमत यही थी कि प्रचलित रस्म के मुताबिक़ मेरा गौना(वधू की विदाई )  लगभग एक वर्ष बाद होना था सो मैंने एक जिम्मेवार पति के दायित्व को बखूबी निभाया ...उन दिनों गौने के पहले ससुराल आना जाना एक टैब्बू था सो मैंने पत्राचार का रास्ता निकाला..हर रोज श्रीमती जी को एक पत्र  लिखने लगा ..और निरंतर यह अनुरोध   कि वे भी मुझे निरंतर पत्र लिखें ...आखिर शुरुआती संकोच के बाद उनके पत्र  लेखन का सिलसिला नियमित हो चला था औंर गौने के दिन आते आते एक दूसरे के प्रति हमारे अपरिचय का फासला मिट चुका था ..प्राणी शास्त्र /व्यवहार विज्ञान के अध्ययन ने मुझे मनुष्य की मूलभूत जैवीय आवश्यकताओं के बारे में काफी कुछ समझा रखा था और एक बात जो जेहन में बराबर घूमती रहती थी वह यह थी कि मनुष्य के मामले में कोर्टशिप अवधि अमूमन एक वर्ष की होती है ....मतलब हमारे बीच यह अवधि सफलतापूर्वक बीत गयी थी भले ही गहन पत्राचार के जरिये ही ...और प्रत्यक्षे किम प्रमाणं? आज ३२ वर्ष बीत गए हैं और हमारे बीच की सहमति सामंजस्य के प्रति जन परिजन भी प्रायः ईर्ष्यालु हो उठते हैं ....
आज कुछ घंटों पहले का एनीवर्सरी  फोटो 

हम तब तक जिम्मेदारियों के बोझ का साझा निर्वहन भलीभांति नहीं कर सकते हैं  जबतक जोड़ बंध मजबूत न हों और वे कैसे मजबूत हो सकते हैं मुझे लगता है कि उसे एक प्राणिविद से बेहतर शायद ही कोई समझ सकता हो .... :) भले ही हमारे  अली भाई अपने  समाजविज्ञान की अपनी विद्वता बघारें और सुश्री प्रिय आराधना चतुर्वेदी अपना पांडित्य ..जैवीयता के बंध गहरे होते हैं यह मैं आपसे पूरी ईमानदारी के साथ शेयर करना चाहता हूँ -यह  बेसिक/आधारशिला है  और बाद में समाज विज्ञान और मनुजता की दीगर विशिष्टताएं भी आ जुड़ती  हैं ....आज हम मिया बीबी, हमारे  बच्चे एक गहरे बंधन से जुड़े हैं और अपने जीवन से सर्वथा संतुष्ट और तमाम आपा धापी, विरोधाभास   और जीवन की अपरिहार्य ,समस्याओं के बावजूद भी हम एक इकाई हैं .....
आज शाम हम पुष्प प्रदर्शनी देखने गए तो जामियास  वू सा लगा !

संध्या  धुर आस्तिक हैं तो मैं नास्तिक हूँ ..मगर हाँ मैं एक दूसरे तरीके का नास्तिक हूँ ..मुझे अपनी संस्कृति ,संस्कारों पर गर्व है और ईश्वर के अस्तित्व को लेकर मैं अपने उपनिषदों के नेति नेति की विचारधारा का समर्थक हूँ ...ईश्वर को न तो प्रकल्पित किया जा सकता है और  न ही रूपायित ही ....यहाँ मैं इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा के करीब हूँ मगर इस्लाम के परवर्ती विचारों और कूपमंडूकता से मुझे  सख्त नफरत है, उसी तरह से जैसे हिन्दू धर्म के पौरोहित्यवाद और पंडावाद का मैं विरोध करता हूँ -मगर क्या करियेगा ..कबीलाई समूहों की प्रवृत्ति हमारे जीनों में रची बसी है और इसलिए अपने को अलग थलग दिखाते रहने की जैवीय प्रतिबद्धता ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँट  के रखा है और यह मनुष्य प्रजाति के खात्में के साथ ही शायद  ख़त्म होगा.... अरे अरे यह कैसा लेक्चर देने लगा मैं ..आज तो हमारी परिणय बत्तीसी है ....

आप महानुभावों की शुभकामनाओं,आशीर्वाद और कुछ प्रियजनों की मीठी ईर्ष्या की भी दरकार है आज तो, ...और आप सभी हम दोनों को इनसे धन्य और परिपूर्ण  करेगें ऐसी आशा है ...... 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

काश तुम मेरी वैलेंटाईन होती...!

तुम्हे पता है इन दिनों मैं कितना व्यस्त हूँ ..बावजूद इसके अपने प्रेम का इज़हार करने का कुछ समय चुरा ही लिया  -धरती के भूगोल के इस हिस्से में प्रेम के  नए महापर्व के पूर्व दिवस पर....यह पत्र  मैं गोपन भेज सकता था मगर न जाने क्यों यह मन हो आया कि इसे सार्वजनिक दृश्य पटल पर रखूँ ...प्यार कोई गुनाह नहीं फिर डरना भी क्यों ....कभी कभी ऐसा भी होता है जो बात अकेले में कहने में संकोच  होता है उसे सार्वजनिक करने में उतनी मशक्कत नहीं होती .... यह सहानुभूति और जन सहमतियाँ बटोरने का कारगर नुस्खा भी रहा है ...टंकी रोहण का धर्मेन्द्र का शोले दृश्य भला किसी को भूल सकता है .....

अब लोगों को शायद  गुमान हो या न भी हो मगर यह पत्र केवल तुम्हारे लिए है ......तुम कौन? कभी मैंने इसका उत्तर दिया था -तुम जो मात्र शरीर ही नहीं एक शाश्वत कामना हो .....अब उम्र के इस पड़ाव पर सहसा ही यह अहसास हो चला है कि प्यार केवल और केवल सूफियाना ही होता है ....और जो सूफियाना हो वही दरअसल सच्चा प्यार है ....देह की हिस्सेदारी तो महज कुदरत की चालबाजी है जो केवल अपनी लीला का विस्तार चाहती है और कितनों को ही बसंत के फसंत में फंसाती है -बड़ी ठगिनी है रे यह कुदरत......मगर इस देह फांस के बाद भी जो बच रहता है वही तो है न प्यार!  

मैंने सोचा कल पता नहीं हो या न हो यह इज़हार आज ही कर संतुष्ट हो लूं ....वैसे भी कल परसों यू पी के इलेक्शन में मरने की भी फुरसत नहीं रहेगी ...लोग कयास लगायेगें कि यह बासंती सन्देश किसके लिए है मगर तुम्हे तो किंचित भी डाउट नहीं होना चाहिए ...जानेमन यह तुम्हारे और केवल तुम्हारे लिए है ....मुझे उन लोगों की अस्मिता और स्टीरियो टाईप सोच पर तरस आता है जो प्यार के मनोभावों को महज इसलिए जगजाहिर नहीं करते कि आखिर लोग क्या कहेगें ..दुनिया क्या सोचेगी ..इमेज का क्या होगा ? उनसे केवल यही सवाल है कि प्यार में भला कौन सी भद्दगी है या गन्दगी छुपी है? और वैलेंटाईन दिवस से बेहतर कौन सा दिन हो सकता है ऐसी अभिव्यक्ति का -वैसे भी वैलेंटाईन दिवस और बसंत का आह्वान साथ होने में महज कोई संयोग नहीं दीखता ....हमारे कुछ साथी न जाने क्यों इस अवसर पर आक्रामक हो उठते हैं ..प्यार मनुहार पर आक्रोशित हो उठते हैं ....मुझे नहीं लगता कि मानवीयता और मानवता का इतना उत्कृष्ट प्रदर्शन कोई और होता हो ....कहीं  यह  कुछ दिशाहीन मित्रों की कोई अपनी ही संकीर्णता तो नहीं जो अवसर पर मुखरित हो उठती हो ? कहीं  वे प्यार के चिर प्रवंचित तो नहीं  ..सहानुभूति है उनसे ....मुझे लगता है उन्हें भी रेड रोजेज चाहिए ..ढेर सारे रेड रोजेज... काश वे प्यार के अहसास से लबरेज हो पाते....

मैंने अपने मन की बात कह दी है ..मुझे तुम्हारे जवाब की अधीरता से प्रतीक्षा रहेगी .यहीं या मेरे मेल पर .....
तुम्हे और मेरे सभी मित्रों और दुश्मनों को भी वैलेंटाईन दिवस की अनेक अशेष शुभकामनाएं! 

गुरुवार, 9 जून 2011

पहुँचना एक ब्लॉगर की शादी में इकलौते ब्लॉगर का .....

राष्ट्रीय शोक से कुछ उबरा हूँ तो आज सुध आयी एक ब्लॉगर के वैवाहिक समारोह की जिसमें केवल एक ब्लॉगर ही सभी ब्लागरों की नुमाईंदगी करता दिखा ...अब अपने मिथिलेश जी कोई ऐसे वैसे ऐरे गैरे ब्लॉगर भी नहीं हैं ..सबसे युवा ब्लागर का ख़िताब उन्हें मिल चुका है और अब २१ वर्ष होते ही उन्हें सामाजिक बंधन में बाँध दिया गया है ..इतनी कम उम्र में विवाह का मैं पक्षधर नहीं था मगर काफी किचाहिन(देशज भदेस शब्द)  और किच किच के बाद होनी होकर ही रही -और जब मां बाप राजी तो अगले की क्या बिसात! मिथिलेश ब्लॉगर के अलावा एक आज्ञाकारी पुत्र भी हैं -संस्कारों और पारिवारिक ,पारम्परिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े! मेरा उनसे वादा था मैं उनकी शादी में जरूर सम्मिलित होउंगा ..और मैंने वायदा तो निभाया ...उनके निमत्रण कार्ड में एक बाल आकांक्षा भी उद्धृत थी -मेले चाचा की छादी  में जलूल जलूल से आना ...निधी, नैनशी.... लिहाजा जैसे भी पहुंचा तो, गिरते पड़ते कैसे भी ....जबकि उस दिन यानि  २१ मई को जबरदस्त लगन थी ..एक साथ तीन बारातों में शामिल होने की हैट्रिक पूरी करते जब मिथिलेश की बरात में पहुंचा तो सुबह हो गयी थी ..

वर वधू और पार्श्व में सालियां .

हैरत यह रही मैंने खुद को वहां ब्लागरों की जमात से  अकेला पाया ..मिथिलेश मेरे बेटे कौस्तुभ से भी कम उम्र के हैं ....और मैं उम्र के उत्तरार्ध को अग्रसर एक ब्लॉगर ..क्या ही अच्छा होता कि वहां खुशी के पलों में मिथिलेश के समवयी  ब्लॉगर मित्र दिखते ..कम से कम मुझे तो कंपनी मिलती ..अब मिथिलेश तो सामाजिक दबावों के बोझ से वैसे ही दबे थे,जिस समय  मैं वहां पहुंचा सुबह हो चुकी थी और ये महाशय कोहबर की शर्तों के बीच के परी देश में थे...मगर मेरे आने की खबर मिलते  ही भागे भागे आये .....और यह  मुझे कहाँ भाया? बच्चों के परी देश की सपनीली  दुनिया  में मेरे पहुँचने से विघ्न!  बहरहाल आगत स्वागत हुआ ....मिथिलेश की लगभग  सभी उँगलियों में सोने की सद्य आरोहित अंगूठियाँ सुशोभित हो रही थीं .निश्चित ही  एक सास की तरफ से ....एक सरहज की ओर से और एक ....मेरी नजर अपनी अंगूठियों पर से न हटते देख मिथिलेश जी ने हाथों को हठात छुपा लिया  ..न जाने क्यों? अरे मैं दे नहीं पाया तो क्या मांग लेता  कोई एक ? मगर बच्चों के मन का क्या कहिये ..अपना खिलौना भी वे बड़े ट्रस्ट वाले को ही देते हैं ....

मैंने विवाह कार्ड में ही देख लिया था मिथिलेश के भाग्यशाली परिवार में अभी उनके प्रपितामह भी हैं -श्रीधर दूबे जी और पितामह श्री विनयधर  दूबे तथा पिता जी श्री सरोजधर दुबे ..सभी बरात में मौजूद ..एक साथ चार पीढियां!यह एक सुखद /प्रशान्तिदायक अनुभव था .... बारात पारम्परिक जोश  खरोश के साथ मिर्जापुर जिले के बीदापुर गाँव के  प्रतिष्ठित पाण्डेय परिवार को गौरवान्वित कर रही थी....

चलते चलते एक फोटो सेशन ...बाएं से श्री सरोजधर दुबे (मिथिलेश के पिता जी ) ,दुल्हे राजा और मैं.

अब सुबह के ९ बजने जा रहे थे..बरात की विदाई की तैयारियां चल रही थी -इसका संकेत भी अक्षत देने की रस्म से हो गया  था ..दुल्हन की विदाई होनी नहीं थी ..क्योकि वहां गौने की परम्परा थी ...मतलब बिना दुल्हन के ही बरात को बैरंग लौटना  था(समझे ललित भाई!)   ....मैं भी  रात्रि जागरण से हुयी थकान  से भरा  था ...सभी को यथायोग्य सम्मान ,शुभकामनाएं और बधाई देकर लौटने को उद्यत हुआ तो मिथिलेश जी के पिता जी ने मुझे विदाई के रस्म बतौर  वधू पक्ष से एक बड़ी मान राशि दिलाई -विदाई!  .. अकिंचन ,किंकर्तव्यविमूढ़ ,अप्रस्तुत  मेरे सामने उसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था ....परम्पराओं के सामने और शुभ अवसर पर  ..ज्यादा ना  नुकर बुरा माना जाता है ...मेरा सारथी भी लाभान्वित किया गया ....

चिरंजीवी मिथिलेश जी और  परिणीता  सौभाग्यवती सुमन को बहुत बधाई और आशीष!   

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

भोपाल यात्रा और लौटकर पर्ल परिणय वर्ष का अनुभव -आह्लाद!

भोपाल की यथा प्रस्तावित यात्रा मिनट टू मिनट वैसी ही बीती जैसी संकल्पित थी ...हाँ रेल की लेट लतीफी ने सुबह के आरम्भिक कार्यक्रम में मेरी भागीदारी थोड़ी विलंबित अवश्य करा दी ...रेल के साथ तो जैसे मेरी  पुरानी अनबन है ...ऐसी कोई रेल नहीं जिसमें बैठा मैं होऊँ और वह हो लेट नहीं ..लौटते वक्त फेसबुक पर टिपटिपाया मैंने ....जाते वक्त कामायनी एक्सप्रेस से और लौटते वक्त वाया इटारसी, महानगरी एक्सप्रेस से ... ...ये दोनों ही वाराणसी और मुम्बई के बीच की फेमस ट्रेने हैं मगर इतनी दूरी की ट्रेन होने के बावजूद भी इनमें आज तक पैंट्री -रसोईं यान नहीं है ..इन ट्रेनों के बारे में यात्रियों के अनुभव बड़े कटु हैं -गर्मी के दिनों में स्टेशनों के लम्बे अंतरालों के बीच बिना पानी के यात्री तडप उठते हैं -इन दोनों ट्रेनों में लगातार मांग के बावजूद भी आज तक पैंट्री की व्यवस्था नहीं हुयी है ...मैं खुद भी जाते और आते वक्त ढंग की चाय पीने को तरस गया ....एक और गट फीलिंग हुयी कि लालू के बाद शायद ट्रेनों की सामान्य साफ़ सफाई व्यवस्था भी इस रूट पर प्रभावित हुयी है -टू  ऐ सी कोच के टायलेट में टिशू पेपर तक नहीं और लिक्विड सोप डिस्पेंसर भी खाली ....किसका डिपार्टमेंट है यह ? निश्चित ही अपने ज्ञान दत्त जी और प्रवीण पाण्डेय जी का तो नहीं ...और रेल के हर मामले के लिए उनकी भी क्या जिम्मेदारी -अपने काम को वे दुरुस्त रखते हैं पूरे रेल का ठेका तो उन्होंने लिया नहीं ..हाँ ममता जी के पास जरूर है इसका ठेका मगर वे ब्लॉग तो पढ़ती नहीं और किसी से पढवाती भी नहीं होंगी -ब्लॉग जैसे अनुत्पादक चीज से इन बड़े लोगों का भला क्या लेना देना? 

भोपाल की आईसेक्ट नाम की संस्था पिछले दो दशकों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी को समर्पित एक पत्रिका निकाल   रही है, नाम है इलेक्ट्रानिकी आपके लिए ..मैं इसमें लिखता रहा  हूँ इसलिए पत्रिका के दो सौवें अंक के लोकार्पण पर मुझे और देश के कई प्रसिद्द विज्ञानं संचारकों को इस पत्रिका के सम्पादक और वन मैंन  शो आईसेक्ट संस्था के श्री संतोष चौबे जी ने आमंत्रित किया था इस अवसर पर भविष्य की दुनियां परिवाद में शिरकत के लिए ...भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन से मैं पहले अपनी मित्र के यहाँ गया ..वहां फ्रेश हो,नाश्ता पानी और  सज धज कर कार्यक्रम  के वेन्यू स्कोप कैम्पस को निकलने  को तैयार हो गया ..मित्र ने कहा कि चेहरा रुखा रुखा सा लग रहा है क्रीम लगा लीजिये,.." मेरा चेहरा स्थायी रूप से ऐसा ही है और क्रीम मैं कभी नहीं लगाता " के संक्षिप्त उत्तर से उनके चेहरे पर विस्मय को उभारते हुए मैं निकल पडा . पत्रिका का लोकार्पण कार्यक्रम भव्य था ,भोजन दिव्य था और परिवाद बुद्धिगम्य -यहाँ पूरी रिपोर्ट है ...रवि रतलामी जी के गृह आमंत्रण को मैं स्वीकार नहीं कर सका क्योकि मेरा पहले से कार्यक्रम तयशुदा और सार्वजनिक हो चुका था ...मैंने उनसे क्षमा मांग ली....

सायंकाल परिवाद के समापन पर भोजपुर के  मंदिरों का भ्रमण आयोजित था मगर मैं वहां न जाकर तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से सुब्रमणियन साहब के यहाँ पत्नी शोक पर संवेदना व्यक्त करने गया ...वे बैंक के एक उच्च अधिकारी होने के बावजूद प्राचीन भारतीय इतिहास ,सिक्कों ,शिलालेखों ,पुरातत्व के शौकिया विद्वान् रहे हैं -ऐसे लोगों से मिलना मुझे बहुत आत्मीय अनुभव दे जाता है -कोई और अवसर होता तो उनके अर्जित ज्ञान से भी लाभान्वित होता मगर फिर भी विन्ध्य पर्वत मालाओं के स्थान पर कभी समुद्र ठांठे मारता था इसके प्रमाण स्वरुप इन्ही स्थलों से उनके जुटाए समुद्री शेल्स -शंखों के फासिल्स हमने देखे और उन्होंने मुझे माहाभारत काल के भारत पर पंडित माधवराव सप्रे द्वारा अनूदित अद्भुत पुस्तक हिन्दी महाभारत मीमांसा की प्रति भेट की ...कर्मकांडों के लोकाचार को निभाते हुए मैंने उनके बहुत आग्रह के बाद भी कुछ खाया नहीं ,बस चाय पी और हाँ थोड़ी देर में ही हमें सोमेश सक्सेना जी ने भी ज्वाईन कर लिया जो मेरी विज्ञान कहानियों  के एक पुराने   पाठक और प्रशंसक रहे हैं और ब्लॉगजगत में अब उनकी धमाकेदार इंट्री हो चुकी है ....वे बहुत सुदर्शन ,मितभाषी और मोहक व्यक्तित्व के (कुमार ) स्वामी हैं अपना तखल्लुस वे अब यही कर देगें ऐसी इल्तिजा है ...बहुत कम बात हो पायी उनसे मगर लगा ऐसे व्यक्ति से तो अहर्निश अनन्तकाल तक बतियाते रह सकते हैं ...मेरे अगले कार्यक्रम का समय हो रहा था इसलिए मैंने भारी मन से दोनों जने से विदा  ली ....

 भोपाल में पुरानी यादों का एक जखीरा ...बजरिये ग्रामोफोन 
सौजन्य:मास्टर कार्तिकेय जैन  

अगले तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से मुझे एक वैलेंटाईन भोज में हिस्सा लेना था और शेष शाम वहां सुरुचिपूर्ण भोजन और पुरानी  यादों को शेयर करते हुए ,ग्रामोफोन पर गाने सुनते हुये बीता... ग्रामोफोन पर गाने सुनना एक अद्भुत सा सुखद काल विपर्यय  (अनाक्रोनिज्म ) और पुरसकूं माहौल सृजित करता है ....एक विलक्षण और दुर्लभ होता ...अनुभव ....अगले दिन मित्र की परिवहन सुविधा सौजन्य से इटारसी आकर महानगरी एक्सप्रेस पकड़कर वापस बनारस आकर फिर दुनियादारी में तल्लीन हो गया हूँ ......
 पुनश्च:
डॉ.दराल साहब के स्नेहादेश पर आज अपनी परिणय त्रिदशाब्दि   -मुक्ता परिणय वर्ष (पर्ल एनिवेर्सरी ) की यह इन्द्रधनुषी छवि यहाँ लगा रहा हूँ आप सभी आदरणीय अग्रजों के आशीष और प्रिय अनुजों की शुभकामनाओं के लिए ....



परिणय त्रिदशाब्दि -चित्र परिचय 
बाएं से -सबसे छोटी बहन ज्योत्स्ना,मैं ,पत्नी संध्या ,अनुज मनोज की पत्नी डॉ.छाया मिश्र ,अनुज डॉ मनोज और मेरे बहनोई, दिल्ली प्रवासी इंजीनियर  दीपक मिश्र जी 
यह हमारे लिए परम आह्लादकारी रहा कि आज सभी इस मौके पर अपने स्नेह और शुभकामना के लिए इकट्ठे हुए ..(चित्र सौजन्य :प्रियेषा मिश्र } केक भी आया और गुलदस्ते भी ...


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

परिणय के वर्ष हुए आज उनतीस ना कोई खटपट हुई ना रिश्ते छत्तीस .....

सुधियों  के वातायन में उनतीस वर्ष पीछे लौटता हूँ -इलाहाबाद विश्विद्यालय के ताराचंद छात्रावास में था उन दिनों एक शोधार्थी ..पिता जी ने लडकी देखी और शादी तय कर दी बिना मुझसे जाने बूझे ,पूंछे पछोरे ....मैं कुछ स्पष्ट नहीं था इन मामलों में -मुझे महज फोटो दिखाई गयी -न भी दिखाई गयी होती तो भी इनकार थोड़े ही करता -माँ बाप बच्चों के दुश्मन थोड़े ही होते हैं -और मैं इन बातों को कभी उतनी गंभीरता से लेता भी नहीं था -क्योंकि साधारण सा एक गवईं संस्कार का युवक था -मगर बहुत सांसारिक बातों में मेरा मन न तब लगता था और न आज ही ..आज भी मेरा एक अंतर्जगत है तब भी था ....उसे केवल खुद से ही साझा करना होता है -वही आत्म शक्ति देता है दुनियावी बातों ,रीति रिवाजों ,बिडम्बनाओं और परिस्थितियों से समंजन स्थापित करने का -मेरे जैसे अंतर्जगतीय जीवन में जीने वाले लोग पलायनवादी भी हो जाते हैं मगर तमाम असफलताओं और दुनियावी जीवन के धोखे खाने के बाद भी पलायन मैंने नहीं सीखा -और यहीं भूमिका में अवतरित होती हैं संध्या मिश्र (पहले शुक्ल ) ,मीरजापुर शहर के स्वतन्त्रता सेनानी श्री विद्यासागर शुक्ल की बेटी और मेरी १९८१ से सहचरी ..(संयोगात समीर जी की भी  ससुराल  मीरजापुर है ) ....
                                                 उनतीस वर्षों के अहसास डिनर के साथ साथ 

आज हमारे विवाह के उनतीस वर्ष पूरे हुए ....अभी रजत जयंती तो मानो  कल की ही  बात हो जब परिजनों का ढेर सा स्नेह और आशीर्वाद मिला था ..समय कितने तेजी से भागता है लेकिन अहसास थम से गए होते हैं .मुझे आज भी लगता है कि जैसे विवाह के इतने वर्ष बीते ही न हो और हम आज भी नव दम्पति सरीखे ही हैं -वही ऊर्जा  और वही उत्साह बल्कि और बढ़ता हुआ -ऐसा संभवतः इसलिए भी कि अब जिम्मेदारियां समापन की  ओर है और हम एक दूसरे के लिए और समर्पित हो रहे हैं .याद नहीं आता हममे कभी कोई तकरार अधिकतम  एक दिनी अवधि से ऊपर भी  गयी  हो -थोड़ी अनबन जरूर होती रही है गाहे बगाहे मगर कोई भी खटपट लम्बी  अवधि की नहीं -इसका श्रेय उन्ही को है ...उनकी क्षमाशीलता और उदारता सचमुच भारतीय नारी को   मूर्तिमान करती है ...

                                             हमारी डेजी भी रही है पिछले दस वर्षों से हमारे साथ 

स्मृतियाँ धुंधलाती जाती हैं ,चित्र नहीं ..... तो कुछ चित्र भी आज के कुछ मधुर पलों के यहाँ लगा रहा हूँ ...समयुगीन जीवन की घोर आपाधापी और अनेक दुश्चिंताओं के बीच हर दम्पति को अपने लिए, सहचरी /सहचर  के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए -जान बूझ कर भी ...भले ही कभी  कुछ "मेक  बिलीव"  सा लगे तब भी -जीवन की चिरन्तनता/नैरन्तर्य के लिए जीवन के प्रति मोहबद्धता बेहद जरूरी है -और उसके अवसर आपको लपकते रहते चाहिए, छीनते  रहने चाहिए इस बेदर्द होती दुनिया से ......
                                                              कुछ उपहार सविनय विनिमय 
आप की शुभकामनाओं की दरकार है .

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