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शनिवार, 28 सितंबर 2013

वर्धा सम्मलेन:कुछ बचा खुचा ,द लास्ट सपर और क्वचिदन्यतोपि! (समापन किश्त )

 किश्तें -पहली ,दूसरी ,तीसरी ,चौथी , पांचवीं और अब आगे पढ़िए आख़िरी किश्त..........
अब सिद्धार्थ शंकर जी का अनुरोध कि जो कुछ बचा खुचा  है उसे भी मैं पूरा कर दूं को आखिर कैसे अनदेखा कर सकता हूँ ? इनके बारे में कवि गोष्ठी में मैंने कहा था " तात जनक तनया यह सोई धनुष जज्ञ जेहिं कारण होई " :-) चलिए कुछ और यादगार बातें आपसे साझा कर लेता हूँ . कुलपति महोदय -विभूति नारायण राय जी के स्नेहिल सानिध्य ने मन को गहरे छुआ .उनके बारे में थोड़ी चर्चा पहले भी हो चुकी है। एक व्यक्ति के रूप में वे बहुत सहज हैं और प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करते रहते हैं .भारतीय पुलिस सेवा ने इन्हें एक वह दृष्टि भी दी है जिससे एक नज़र में ही लोगों को पहचान लेते हैं . मैंने इनकी इस क्षमता का साक्षात किया है और चकित हुआ हूँ! इस बार मिलते ही इन्होने मुझसे एक शख्स के बारे में पूछा और मैंने बता दिया कि वे उस शख्स के बारे में बिलकुल सही थे. मैं चूँकि इस मामले में बचपन से ही बड़ा बोदा हूँ -बहुत ही जल्दी लोगों का विश्वास कर लेता हूँ , प्रभावित हो जाता हूँ और धोखे खाता हूँ . काश मुझे भी राय साहब जैसी दृष्टि मिली होती तो जीवन के कितने कटु अनुभवों से बच गया होता .
 सूत्रधार  सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
सम्मलेन की दूसरे दिन राय साहब हम लोगों को नजीर हाट ले गए .वर्धा विश्वविद्यालय परिसर के भीतर हर जगहं एक विशिष्ट सा सौन्दर्य बोध और कलात्मकता बिखरी हुई है . हर्षवर्धन की निगाह ने भी इसे कैद किया है . नजीर हाट में कुलपति जी के सौजन्य से लोगों ने -संतोष त्रिवेदी ,अन्ना भाई , सिद्धार्थ जी सभी ने कुछ खाया पीया - मुझे एक मिठाई जिसे वहां गोरस कहा जा रहा था और हम लोगों की तरफ बनारस में नान खटाई कहते हैं पसंद आयी . मनीषा को काली चाय की तलब थी मगर वो मिली नहीं -याद नहीं उन्होंने कुछ खाया भी या नहीं . कुछ मित्रों ने दूध भी छक के पिया मगर मैंने मना कर दिया कि अब दूध पीने की मेरी उम्र न रही . सबके खा पी लेने के बाद कुलपति महोदय ने दुकानदार से कहा कि अभी तो मेरी जेब में पैसे ही नहीं हैं -तुम हिसाब भेज देना कल भिजवा देगें . दुकानदार बहुत कातर भाव में आ गया -"नाथ आज मैं काह न पावा" की भाव भंगिमा बन गयी उसकी -मैंने कहा कि ऐसे दानिशमंद तुम्हारी दुकान पर बार बार आयें और उधार करें तो तुम्हारा सचमुच उद्धार हो जाय .
राय साहब ने अपने आवास पर एक रात्रि भोज पंचायत आख़िरी दिन को आमंत्रित किया उसमें सिद्धार्थ एवं रचना त्रिपाठी जी ,इष्टदेव सांकृत्यायन , मनीषा पाण्डेय और यह खाकसार भी था . यह वर्धा का हमारा आख़िरी सपर ( दिन का आख़िरी खाना) था . भोजन के पूर्व लैंगिक भेद विमर्श के साथ तुलसी की भी अनाहूत चर्चा शुरू हो गयी . मनीषा को इस बात पर आश्चर्य था कि आज भी क्यों हिन्दी के विभागों में अन्य कितने विषयों के बजाय (अब जैसे लैंगिक विभेद ही ) तुलसी पर शोध जारी है . मैं तो तुलसी भक्त हूँ तो हठात अपनी उग्र प्रतिक्रिया को रोका -मनीषा, अब मैं आपको कैसे समझाऊँ राम चरित मानस एक अनुपम विश्व साहित्य है, मगर इसका भान बिना पढ़े नहीं हो सकता -आज के अनेक युवा अपने देशज समृद्ध साहित्य की उपेक्षा कर पश्चिमी साहित्य पर लहालोट होते रहते हैं . गांधी जी ने अपने देशज साहित्य का विपुल अध्ययन किया था और पश्चिमी साहित्य का भी खूब अनुशीलन किया था . मुझे लगता है पश्चिमी जीवन दृष्टि और भारतीय जीवन दर्शन के बीच का एक संतुलन अधिक उपयुक्त है .
फिर वी सी साहब का वह बहुश्रुत छिनाल प्रसंग छिड़ गया -हिम्मती मनीषा ने सपाट और बेबाक पूछ लिया कि कोई नारी अगर सौ पुरुषों के साथ हम बिस्तर होती भी है तो किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? वातावरण तनिक असहज सा हुआ . राय साहब ने पूरे प्रसंग को स्पष्ट किया -यह बात भी आई कि छिनार शब्द का अंग्रेजी में गलत अनुवाद "वैश्या' हो गया और व्यर्थ का हो हल्ला मचा -एक बार फिर सबने छिनार/छिनाल शब्द की सोदाहरण व्याख्याएं की -मैंने कहा यहाँ जेंडर भेद नहीं है क्योंकि पुरुष के लिए भी समानार्थी शब्द छिनार है . बहरहाल गर्मागर्म चर्चाओं के बाद गर्मागर्म और घर के बने सुस्वादु भोजन ने सभी को संतृप्त किया -चिकेन का प्रेपरेशन मनीषा का ख़ास पसंद था . बीती रात चेले संतोष ने इसका रसास्वादन किया था तो गुरु का भी इसे चखने का फर्ज बनता था , शाकाहारी व्यंजन भी बहुत सुस्वादु बने थे . खान पान को लेकर मेरा कोई विशेषाग्रह नहीं मगर सार्वजनिक तौर पर शाकाहार पसंद करता हूँ ! त्रिपाठी दंपत्ति तो गांधियन शाकाहारी/अन्नाहारी हैं। मुझे याद नहीं सांकृत्यायन जी ने क्या खाया था? मगर जब रात साढ़े दस बजे हम सभी को कुलपति महोदय ने विदा किया तो सभी के चेहरे पर एक चिर संतृप्ति का भाव था . विचारों के साथ ही पेट को भी पर्याप्त और रुचिकर भोजन मिल गया था .
अब बस!

मोहिं वर्धा बिसरत नाहीं!

इसके पहले की पोस्ट
वर्धा संस्मरणों के लिहाज से बहुत समृद्ध है. महात्मा गांधी और निकट ही विनोबा भावे के पवनार स्थित आश्रमों ने इसे विश्व पर्यटन के मानचित्र पर ला दिया है। आयोजकों ने ब्लागरों के पर्यटन का भी पूरा खयाल रखा और दूसरे दिन प्रातः विश्वविद्यालय की बस से हम सभी वर्धा आश्रम पहुंचे , लगा हम एक ऐसे जगहं आ गए हैं जो धरती की संरचनाओं से बहुत अलग सा है -और यहाँ के वासी गांधी जी भी इस धरा के कहाँ लगते हैं? वर्धा आश्रम का परिवेश और प्राचीनता में भी आधुनिकता का बोध कराने वाले पर्ण कुटीर और गांधी जी की दिनचर्या से जुडी अनेक वस्तुए ,स्वछता सभी कुछ मिलाकर एक दैवीय वातावरण का सृजन कर रहे थे . हम सभी अभिभूत थे . कैमरों के फ्लैश दनादन चमक रहे थे और कितने ही संभावित संयोगों और पोज में ब्लागरों की फोटुयें खींची जा रही थी . जिसमें एक तो यह है जो अंतर्जाल पर खूब सर्कुलेट हो रही है।
मुझे गांधी की वह कुटिया ख़ास तौर पर विभोर कर गयी जिसमें सांप पकड़ने का एक ख़ास डंडानुमा उपकरण और बड़ा सा डब्बा रखा हुआ है और यह लिखा हुआ है कि गांधी जी साँपों तक को नहीं मारते थे और पकड़ कर पहले डब्बे में बंद करते और बाद में जंगल में छुड़वा देते . इसके ठीक विपरीत अब वर्धा विश्वविद्यालय में निकलने वालें साँपों को निकलते ही मार देने के बारे में मैंने सुना तो यहाँ भी लगा कि वर्धा ही नहीं पूरे भारत भूमि पर इस 'तुच्छ' से मामले में भी गांधी कितने अप्रासंगिक से हैं . आह गांधी! मैंने आश्रम से चलते चलते गांधी सस्ता साहित्य स्टाल से उनकी आत्मकथा खरीदी हालांकि अपने छात्र जीवन में मैंने इसे पढ़ा था मगर तब दृष्टि विकसित नहीं थी। इन दिनों उसी का पारायण कर रहा हूँ .

समयाभाव के कारण हम पवनार नहीं जा पाए और पिछले ब्लॉगर सम्मलेन में आये लोग वहां तक गए थे जिनमें कई इस बार भी थे तो उनकी रूचि ही नहीं थी . वर्धा आश्रम के लिए निकलते समय ही रास्ते में वंदना अवस्थी दुबे जी पतिदेव के साथ रास्ते में मिलीं  -हम बस में ही बैठे थे बस सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने बाहर उतर कर अटेंड किया .बस के भीतर से कुछ लोगों ने आवाजें दी कि वे भी वर्धा आश्रम के लिए ब्लॉगर समूह को ज्वाईन करें मगर मालूम हुआ कि आश्रम जाने के पहले वे ग्रीन रूम जाना ज्यादा प्रिफर करेगीं . मैंने सिद्धार्थ जी को सहेजा कि विलंबित ब्लागरों के लिए अब एक संयोजक के रूप में उन्हें ज्यादा अतिरिक्त ध्यान श्रम करना होगा . तो उन्होंने उत्साह से कहा कि संयोजक-आयोजक को तो यह सब झेलना ही पड़ता है और अभी तो कई के आने का सिलसिला जारी है . सभी ने सिद्धार्थ जी की प्रबंधकीय क्षमता और धैर्य क्षमता की सराहना की है और मैंने भी उनसे बहुत कुछ सीखा है .

हम ब्लागिंग विमर्श के अगले सत्र को समय से आरम्भ करने हेतु जल्दी ही आश्रम से चलकर वापस विश्वविद्यालय आ गए . और पहला सत्र ब्लागिंग और साहित्य पर आरम्भ हुआ . मैं ब्लॉग को केवल माध्यम तक ही नहीं मानता . और भी कई आयाम हैं जो ब्लागों को एक विशिष्ट पहचाना देते हैं -खास फार्मेट और फार्म ,स्टाईल और पोस्ट की लम्बाई का भी एक अनुशासन, यह अंतर्जाल डायरी एक विधा भी है यह मेरी स्थापना है. सभी ब्लॉग नहीं मगर कुछ ब्लॉग अवश्य 'विधागत ब्लॉग श्रेणी' में आते हैं -मैंने यह भी कहा कि ब्लॉग विधाओं की एक विधा भी एक ख़ास अर्थ में है क्योकि यह कितने ही पारम्परिक विधाओं -कविता, कहानी, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि का एक समुच्चय भी है . इस पर बहुत गर्मीगर्मा हुई -हर्षवर्धन ने एकदम से इस प्रस्तावना को खारिज कर दिया तो मानो अनूप जी इसी ताक में बैठे थे -कहा कि अब हर्षवर्धन के इस वक्तव्य के बाद यह बहस ही ख़त्म हो गयी है -मंच से मुझे लगा कि अरे अभी तो यह शुरू ही नहीं हुयी तो ख़त्म कैसे हो गयी -और मैंने सहज ही अनूप जी को टोका -अरे आपने तो फ़तवा ही जारी कर दिया . अनूप जी नयी संभावनाओं को ऐसे ही उत्साहित करते हैं -इसमें नया कुछ नहीं था . लोग मुस्कुराये और बात आगे बढ़ गयी . अब सिद्धार्थ जी ने सभी ब्लॉगर प्रतिभागियों का आह्वान किया है कि सभी कुछ फिर से संयत और सुगठित उन्हें लिख कर भेज सकते हैं और समस्त विमर्श समग्र रूप से अंतर्जाल पर तो संकलित और सन्दर्भणीय हो सकता है .

बातें तो और भी बहुत सी हैं - 'मोहिं वर्धा  बिसरत नाहीं'  किस्म की, मगर अनूप जी इति वार्ताः कर चुके हैं और महाजनों येन गतः सा पन्थाः के मुताबिक़ मुझे भी अब इस श्रृंखला को विराम देना होगा . आगे छिट पुट और स्फुट बातें अगर ज्यादा मन को मथेंगी तो एक और पोस्ट का जुगाड़ हो जायेगा .हम बहुत लोगों से ठीक से नहीं मिल बैठ गपिया पाए इसका मलाल है -फिर कभी मित्रों! हाँ एक कृतज्ञता ज्ञापन सोशल सायिन्सेज और मीडिया फैकल्टी के डीन और मेरे पुरातन मित्र डॉ अनिल राय अंकित जी को जिन्होंने मेरी अनेक सुख सुविधाओं का अतिरिक्त ध्यान रखा . सम्मलेन को मैं सौ के पूर्णाक में नब्बे अंक दूंगा -कुछ अंक चाय अभाव और छोटी मोटी संवाद हीनता से जुड़े व्यवधान के लिए काट रहा हूँ . बाकी तो टंच व्यवस्था रही हर लिहाज से . और हाँ मेरा कांफ्रेंस बैग किसने हथियाया? और ब्लॉगर प्रतिभागियों की सूची किसी के पास है तो कृपया शेयर करें . अब तो चिटठा समय संकलक का बेसब्री से इंतज़ार है .

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

वर्धा सम्मलेन पार्ट 4...कुछ और अब तक अनकहा!

 पार्ट -1,  पार्ट -2, पार्ट -3
कुलपति महोदय ने सुबह चाय पर ही जोर देकर कहा था कि मिनट टू मिनट प्रोग्राम पहले ही तैयार होकर लोगों में बट जाना चाहिए .समय कम था लिहाजा सिद्धार्थ जी के साथ मैं भी बैठकर पल प्रतिपल कार्यक्रम को अंतिम रूप देने लगा . ...उद्घाटन सत्र के बाद मैंने एक चाय ब्रेक की बात कही तो सिद्धार्थ जी ने कहा कि तनवीर प्रेक्षागृह में तो वी सी साहब ने चाय पर रोक लगा रखी है और उसी वक्त मुझे एक डेजा वू सा हो आया .वर्धा के पहले सम्मलेन में बेड टी का मसला उछला और लोगों ने उसे इतना हयिलायिट किया था कि मुझे असहजता सी होती जब इस बात को लेकर लोग मेरी चुटकी लेते . वर्धा प्रथम के बाद अब यह नया चाय प्रसंग सामने था . मैं असहज होने लगा . मैंने सिद्धार्थ जी को कहा कि उद्घाटन सत्र के बाद चाय पान तो एक परिपाटी है .मगर वी सी साहब की निषेधाज्ञा के आगे मैं भी निरुत्तर हो रहा . शायद बात यह थी कि वहां चाय पीने के बाद लोग कप -कुल्हड़ इधर उधर फेंक देते थे जिससे परिसर गन्दा हो जाता था . सो, वी सी साहब ने तनवीर प्रेक्षगृह में चाय पर पूर्ण पाबंदी लगा दी थी .
 वही हुआ जिसकी आशंका थी -उद्घाटन सत्र के बाद लोग चाय ढूंढते नज़र आये . जिन अनूप जी ने  वर्धा के पहले सम्मलेन में इस मुद्दे को उठाने पर आसमान सिर उठा, पानी पी पीकर मुझ पर चुटकी ली -वे अब खुद मुझसे चाय के बारे में पड़ताल कर रहे थे .मैं तटस्थ हो लिया . अब झेलिये न, खूब  उडाई थी मेरी खिल्ली  . भोजनावकाश के बाद के सत्र के पश्चात भी वहां चाय नहीं मुहैया हुयी . शायद लोगों की चाय विषयक पृच्छाओं से तंग आकर सिद्धार्थ जी ने क्राईसिस मैनेज किया और दूसरे  दिन एक सत्रावसान के बाद मंच से चाय ब्रेक की घोषणा कर दी . लोग इतनी तेजी से बाहर लपके जैसे पिछले दिन की भी कसर पूरी कर लेना चाहते हों . मगर इस बार तो एक और गहरी संवाद हीनता थी जो लोगों को एक घंटे तो जरुर ही चाय के लिए बिठाए रही -मगर इसका एक उज्जवल पक्ष यह रहा कि प्रेक्षागृह की औपचारिक बतकही यहाँ अब अनौपचारिक हो गयी थी .छोटे छोटे मनचाहे दलों और कैमरों के चमकते फ़्लैश में कई चेहरे चमक दमक रहे थे .अनूप जी नवयुवा ब्लागरों को ब्लागिंग के गुर समझा रहे थे .एक ब्लॉगर को मेरे पास भी लाये परिचय कराने के लिए -अहोभाग्य! :-) इस बार तो बेड टी के लिए हर मेहमान कक्ष में पांच सितारा इंतजाम था मगर सम्मलेन स्थल पर चाय फिर एक मुद्दा बनी -क्यों अनूप जी, बनी या नहीं?
मैं सम्मलेन के अकादमीय पहलुओं की तो अभी चर्चा ही नहीं कर हूँ - अब तक और लोगों की कई बेहतरीन पोस्ट आ चुकी हैं . एक संक्षिप्त किन्तु सार गर्भित पोस्ट तो चेले की है . शकुंतला शर्मा ने विवेच्य विषय बिन्दुओं को अच्छा समेटा है . अनूप शुक्ल जी ने अब तक विविध पहलुओं को समोए दो पोस्ट, यहाँ और यहाँ लिख मारी है , तो मुझे नहीं लगता कि अब उनका पिष्ट पेषण किया जाय . हाँ दूसरे दिन चर्चा में ब्लागिंग एवं साहित्य के सत्र की कुछ टटकी यादें है जिन्हें मैं साझा कर लूं . इस चर्चा के पैनेल में मैं भी था और सत्र संचालक इष्टदेव सांकृत्यायन थे -मेरे शरीर सौष्ठव की तुलना में एक क्षीण काया पुरुष! .. तो उन्होंने माईक संभाला और मंचीय गुरुता बनी रहे इसलिए उनके ठीक बगल में मैंने अपना आसन जमाया . मगर फिर भी एक गड़बड़ हो गयी . इष्टदेव जी ने मेरे ठीक बगल में बैठने को ललित शर्मा जी को आमंत्रित कर लिया -यानी दो दो मूछों के विद्वान साथ हो लिए -अब चोटी के विद्वान् तो फिर भी साथ बैठ लें मगर न जाने क्यूं मुझे यह लगा कि दो मूछों के विद्वानों को अलग अलग बैठना चाहिए . मैंने सत्र संचालक से प्रतिवाद भी किया मगर उन्होंने इसकी कोई नोटिस ही नहीं ली बस कई इंच की मुस्कान बिखेर दी -खैर मैंने पूरी कोशिश जारी रखी कि ललित जी की मूछें मुझसे टकराने न पायें अन्यथा जाने क्या न  हो जाता ..... :-) 
 और बस ठीक उसी समय हाल में मनीषा पाण्डेय ने  प्रवेश किया ...और सीधे अग्रिम लाईन में मेरे ठीक सामने विराजमान हुईं . ठीक उसी तरह हमारे बीच स्वागत की भाव भंगिमा का आदान प्रदान हुआ जैसा कि वर्धा के  इलाहाबाद के पहले सम्मलेन में हुआ था - पता नहीं तब या अब भी मुझे वे पहचानती जानती थीं या नहीं मगर उनका यह शिष्टाचार मुझे तब भी और इस बार भी बहुत  अच्छा लगा . बिल्कुल वही सिचुएशन/ लोकेशन तब भी थी -मैं मंचासीन था और वे अगली पंक्ति में बैठी थी, अगले सत्र में इन्होने भी मंच -माईक संभाला और लैंगिक विभेद के मुद्दे पर बेलौस और  बिंदास बोलीं . अब मैं श्रोता था -मनीषा ने किसी बात पर कहा कि वे सोशल साईटों पर खुद के नियोक्ता का पता नहीं देतीं -अकस्मात मेरे  मुंह से तेज आवाज में निकल पड़ा -'को नहिं जानत है जग में प्रभु .....नाम तिहारो " लोग मुस्कुराए और ऐसा लगा मनीषा सकुचाईं भीं . मनीषा में कथनी और करनी मतलब पाखण्ड नहीं दीखता और यह बड़ी बात है . 
 मनीषा मगर  बहुत भुलक्कड़ या  बेपरवाह सी  दिखीं . उतरना था सेवाग्राम और चली गयीं लगभग सौ किमी दूर बल्लारशाह और इसलिए कार्यक्रम में देर से पहुँचीं -अपना बेशकीमती कैमरा विश्वविद्यालय में न जाने कहाँ छोड़ आयीं और शाम को कुलपति महोदय की  चाय पर जब मैंने संतोष को कुहनियाया कि चेले मनीषा के साथ एक ग्रुप फोटो कर लो तो उन्हें सहसा कैमरे की याद आयी और वे सरपट  बाहर को भागीं .कई पलों के बाद जाकर माजरा समझ में आया -कुलपति जी ने कहा अब मसला हमारे विश्वविद्यालय की साख का है -एक एक पल बोझिल हो रहा था -कुलपति जी ने फोन  पर ही कैमरा बरामदगी के निर्देश दे रखे थे और करीब आधे घंटे बाद मनीषा विजयी मुस्कान के साथ कैमरा लिए फिर कमरे में आ पहुँची -सबने राहत की सांस ली और मनीषा ने दनादन कई फोटो  उतार डाली मानों कैमरे की बरामदगी को सेलिब्रेट  कर रही हों .मनीषा सरीखी प्रतिभा पर मुझे बस यही उद्धरण याद आ रहा है -  देयर इज नो जीनियस विदाउट द मिक्सचर आफ मैडनेस :-) 
जारी है .......

मंगलवार, 28 मई 2013

बात सम्मान और पुरस्कारों की ....

कभी कभी कुछ अजब गजब होने लगता है. जैसा कि पिछले दिनों मेरे साथ हुआ है. पुरस्कारों /सम्मानों के मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है .सर्प संसार को मिले डोयिचे बेले, जर्मनी के बाब्स पुरस्कार से हम अभी ठीक से उबर भी न पाए थे कि विज्ञान परिषद् प्रयाग ने छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल श्री शेखर दत्त जी के कर कमलों से संस्था के सौ साल होने के उपलक्ष्य में हमें शताब्दी सम्मान भी थमा दिया .हम अभी सम्मान जनित विनम्रता के दुहरे बोझ से दबे थे कि ज़ाकिर अली ' रजनीश' ने अभी अभी अन्तरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त तस्लीम संस्था की ओर से एक और सम्मान थमा दिया है . 
महामहिम के हाथों शताब्दी सम्मान

बहुत लोग ऐसा मानते हैं जिनमें मैं भी शामिल हूँ कि जब किसी को ज्यादा सम्मान पुरस्कार मिलने लग जायं तो यह माना जाने लगता है कि उसका सृजन काल अब अवसान तक आ पहुंचा . काश मेरे बारे में लोग ऐसी धारणा न बना लें -अभी मेरा सक्रिय सृजन काल चल ही रहा है . प्रत्यक्षम किम प्रमाणं . आज कल पुरस्कार सम्मान भी संदेह की निगाह से देखे जाते हैं और सेटिंग गेटिंग का फार्मूला यहाँ भी चलता है मगर मैं ईश्वर को हाज़िर नाज़िर मानकर यह कहना चाहता हूँ कि मुझे मिले इन पुरस्कारों की मुझे भनक तक न थी . अभी एक मजेदार वाकया हुआ -गोरखपुर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित साईंस ब्लॉगर कार्यशिविर के उदघाटन सत्र के आख़िरी पलों में मेरे मोबाईल पर कोई महत्वपूर्ण काल आ गई और उसी वक्त ज़ाकिर अली जी ने कोई उद्घोषणा कर डाली जिसे मैंने सुना नहीं .जैसे ही काल खत्म हुयी मैंने पाया कि डायस के अतिथिगण उठ कर खड़े हैं और मैं अभी भी बैठा ही हूँ -यह तो अशिष्टता थी ..मैं भी किंचित हडबडी से उठकर माजरा भांपने लगा तब तक एक अतिथि डॉ मनोज पटैरिया जी ने और तदनन्तर डॉ रामदेव शुक्ल जी ने मुझे बधाई दे डाली . मैं सकपकाया ...पूछने की धृष्टता तक कर बैठा कि किस लिए ? तभी अतिथि द्वय मुझे एक सार्टिफिकेट और स्मृति चिह्न पकडाते हुए कहते भये कि मुझे तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान से नवाज़ा जा रहा है . मैं अप्रस्तुत असहज सा रह गया . बल्कि मुझे तब तक यह डाउट था कि यह पुरस्कार मेरे लिए नहीं संभवतः डॉ पटैरिया के लिए था . मैंने उनसे यह कहा भी कि नहीं नहीं यह आपके लिए है तो उन्होंने सार्टिफिकेट का मुखड़ा मेरे सामने कर दिया ....और इसके पहले कि मैं पूरा माजरा समझ पाता पुरस्कार मेरे हाथ में था और कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे…. जाकिर भाई ,कम से कम कह कर तो देते .....
 तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान

एक मजेदार बात तो रह ही गयी ..जिस वर्कशाप बैग में अभी अभी मिले इस तीसरे सम्मान -सार्टिफिकेट को रखा था उसे घर पहुँच कर खोल कर देखा तो सार्टिफिकेट नदारद था ....अरे यह क्या हुआ ? अचानक दिमाग में कौंधा कि मेरे और डॉ पटैरिया का बैग एक जैसा ही था और हम एक ही होटल में रुके थे तो कहीं बैग तो नहीं बदल गए ? यही हुआ होगा -डॉ पटैरिया जी मैं डायस पर कह नहीं रहा था कि यह सम्मान आपके लिए था सो वह आपके साथ गया :-)
लोग बाग़ पुरस्कार और सम्मान के लिए बहुधा कहने लगे हैं कि भैया पुरस्कार में अगर कुछ नगद नारायण हो तो दे दो सम्मान अपने पास रख लो  ..घर की गृहणियां भी अब सम्मान चिह्नों को हिकारत की नज़र से देखती हैं -बेफालतू घर के कोंने कोने को कब्जियाते जा रहे हैं -एक व्यंगकार की पत्नी ने (जैसा कि उसने बताया) कहा कि इससे बेहतर तो आंटे की एक छोटी बोरी ही मिली होती जो कम से कम इस्तेमाल में तो आ जाती ..... उधर सम्मानों को उचित ठहराने वाले कहते हैं कि आखिर पद्म सम्मानों में ही नगद राशि कहाँ मिलती है ? यह विवाद थमेगा नहीं -ऐसे में जो कुछ मिल जाय सम्मान सहित ग्रहण करते रहा जाय -अब सम्मान सहित तो विष भी स्वीकार कर लेने की अपनी सनातन संस्कृति रही है ! 
 मित्रों इस पोस्ट को पढ़ भर लीजिये -बधाई देने की कौनो जरुरत नहीं -उसका कोटा पूरा हो चुका है !

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

सोनभद्र सफारी के वे अविस्मरणीय क्षण (सोनभद्र पुनरान्वेषण श्रृंखला -5 )

झाड़ियों झुरमुटों से रेंगती हमारी जीप अब हमें सोन प्वाईंट ले आयी जहाँ से सोन नदी बहुत सुन्दर दिखती है -ख़ास तौर पर शाम को सूर्य के अस्त होने का नज़ारा बड़ा दिलकश होता है यहाँ .मगर  एक और स्थल बहुत मजेदार है यहीं जिसे इको(echo-point)  प्वाईंट कहते हैं -पारिस्थितिकी वाला इको नहीं बल्कि अनुगूंज वाला इको . यहाँ भी एक विशाल गहरी खायीं हैं जिसके उस पार के पहाडी काफी ऊँची है -यहाँ से आवाज लगाने पर प्रतिध्वनि बिना गुणवत्ता में खराबी के वापस लौटती है -ध्वनि के इस अनुगूंज का आनन्द उठाने लोग आते रहते हैं . हमने भी खूब चीख पुकार मचाई -कई ब्लागरों का नाम लेकर पुकारा और प्रतिध्वनि सुनी? काश एक का नाम वहीं गुम हो गया होता सदा सदा के लिए :-) मगर नहीं मेरी आशाओं को धता बताते हुए वह नाम उतनी ही तेजी से मेरी ओर लपकता हुआ बार बार वापस आया ! यह ध्वन्यात्मक खेल ज्यादा देर नहीं चला और जल्दी ही इसमें रूचि ख़त्म होने को  आयी . अब भूख भी लग आयी थी .हम वापस डांक बगले की ओर  लौटने लगे .
इको(echo-point)

रास्ते में अब तक अनदेखी एक प्यारी सी चिड़िया दिखी . पहले तो वह तीतरनुमा दिखी मगर फिर फुर्र से उड़कर काफी ऊंचाई पर पहुँच गयी -उड़ते वक्त दिखा कि वह जोड़े में थी -तीतर को इतना ऊपर अमूमन उड़ते मैंने नहीं देखा था . इसलिए इस चिड़िया को लेकर जिज्ञासा बढ़ चली . बिटिया ने उड़ने से ठीक पहले जीप के बंद शीशे से ही एक तस्वीर उतार ली थी .आप क्या इस चिड़िया को पहचानने में मेरी मदद करेगें? पेंडुकी/घुघूती /फाख्ता? नहीं नहीं यह तो चेस्ट नेट बेलीड सैंड ग्राउज( भात तीतर ) निकली -थैंक्स सालिम अली ,थैंक्स गूगल!

   कौन सी चिड़िया?   
जीप आगे बढी तो ठीक बीच रास्ते एक गीदड़ साहब आराम फरमाते मिले -हमने उनकी आरामतलबी में खलल डाल दिया था . वे बहुत अलसाए से उठे तो मगर बीच रास्ते ही ठस हो गए -हमारे मुंह से बरबस ही निकल पड़ा बड़ा ढीठ सियार है यह तो! बिटिया को भी फोटो उतारनी थी सो जीप रुकी और उसने इत्मीनान से फोटो उतारने का वक्त दिया -फिर मानो यह मंशा थी  उसकी कि भाई फोटो सोटो  तो उतार ली, अब रास्ता नापो -मगर हमें तो उसी रास्ते से आगे जाना था .लिहाजा कुछ देर की जिच के बाद वे खरामा खरामा  रास्ते से हट के किनारे लग लिए .
 श्रृंगाल सर!

डांक बंगले पर पहुँचने के पहले एक म्यूजियम भी देखा गया -प्राकृतिक चित्रण केंद्र . मतलब नेचुरल हिस्ट्री कलेक्शन सेंटर -यहाँ कुछ दुर्लभ वन्य जीवन के चित्र और मृत जानवरों के संरक्षित अवशेष आदि दिखे -कांसेप्ट तो बहुत अच्छा था मगर इसका विकास उस तरीके से नहीं हो पाया जो इसके संस्थापक की सोच रही होगी -सरकारी सेवाओं में लीक से हट कर कल्पनाशील और सुरुचिपूर्णता लिए कम ही आफीसर होते  हैं . 
 विजिटर्स बुक में भी अपने विचार दर्ज कर दिए ताकि सनद रहे
इस वन्य विहार को व्यावसायिक पर्यटन के एक आकर्षक केंद्र में बदला जा सकता है -प्रवेश शुल्क भी लगाया जा सकता है -एक साथ इतने मनोरंजन के स्थल को संजोये यह वन क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है . एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति ही इसे इस दुर्दशा से उबार सकती है . या तो इसे निजी प्रबंधकों को ही सौंप देना चाहिए  . डांक बंगले में हम वन विभाग के स्थानीय सद्भाव,शिष्टाचार से सेवित हुए और धन्यवाद ज्ञापन किया . आज की हमारी सफारी पूरी हो गयी थी . अब हमें सांस्कृतिक पर्यटन पर विन्ध्याचल पहाड़ियों पर पहुंचना था तो हमने कैमूर पर्वत श्रृंखला को टा टा बाय बाय कहा और आगे चल पड़े .

रविवार, 7 अप्रैल 2013

हेरिटेज पर्यटन का एक दिनी आनंद -आईये साझा कीजिये!(सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-4)


इन दिनों बच्चे यहाँ राबर्ट्सगंज आये हुए हैं -बंगलूरु से कौस्तुभ और दिल्ली से प्रियेषा तो हम दूनो  परानी के एकाकी जीवन में थोडा स्पंदन हुआ  -इस स्पंदन का परिणाम यह रहा कि हमने एक दिन प्रकृति की गोंद में  गुलजार करने का कार्यक्रम बना लिया -मैंने सोचा एक पंथ दो काज हो जाएगा -सोनभद्र के पुनरान्वेषण की मेरी श्रृंखला के लिए एक और पोस्ट का जुगाड़ हो जाएगा  -यहाँ के कई स्थलों पर जाने को लेकर मंथन होता रहा मगर अंत में महुवरिया जाने को लेकर एका हुयी जो आज भी महुआ के पेड़ों से आच्छादित एक सघन वन क्षेत्र है .पता नहीं आप लोगों के साथ ऐसा होता है कि नहीं मगर मेरे परिवार में सहमति मुश्किल से ही बन पाती है -यह बच्चों को अनावश्यक स्वतंत्रता देने का एक  परिणाम लगता  है  :-( . सबमें सहमति बनने में ही समय और मानसिक ऊर्जा दोनों का काफी अपव्यय हो जाता है .बहरहाल तय पाया गया कि हम महुवरिया स्थित  कैमूर वन्य जीवन अभयारण्य को आज गुलजार करके रहेगें . स्थानीय वन विभाग की मदद ली गयी और उनके एक  स्टाफ को लेकर हम आज भी दुरूह से जंगली क्षेत्र में कृष्ण मृग घाटी की ओर  बढ़ चले . 
 साभार: वेबसायिट -पूर्वी उत्तर प्रदेश पर्यटन ( हम इस दृश्य की फोटोग्राफी कर पाने में कामयाब नहीं हुए ) 

राबर्ट्सगंज से घोरावल मार्ग पर 15 किमी चलकर शाहगंज बाज़ार है जहाँ से बाईं और वनाच्छादित कैमूर पर्वत श्रृंखला  है -सुबह पौने सात बजे चलकर हम साढ़े सात बजे तक जंगल में प्रवेश कर चुके थे -मुख्य आकर्षण था जल्दी से जल्दी कृष्ण मृगों की एक झलक देखना जो बढ़ती गर्मी के साथ शिला खण्डों की  ओट लेने वाली थी और वहां  पहुँच वे फिर नहीं दिखते  .ट्रैवेल एजेंसी  ने इस वन्य पर्यटन के लिए बोलेरो के साथ एक दक्ष ड्राइवर हमें दिया था जो  दुर्गम पहाडी स्थलों पर भी आराम से ऐसे ड्राइव कर रहा था की हमें हैरत हो रही थी -अचानक ऐसा लगता कि सामने तो कोई रास्ता ही नहीं है -मगर वन विभाग का गाईड झाड़ियों के बीच से आगे की राह दिखा देता .करीब 45 मिनट तक चलते रहने के बाद भी एक भी काला मृग नहीं दिखा .हम निराश होते जा रहे थे .

 मृगों को देखने के लिए दूरबीन मुफीद रही 

तभी वनकर्मी ने अचानक वाहन रुकवाई और हमें तुरंत नीचे उतरने को कहा -हिरन हिरन के उच्चारण से हम फ़ौरन गाडी से उतर पड़े -वह दूर के एक उपत्यका की ओर  इशारा कर देखने को कह रहा था -मुझे कुछ नहीं दिखा -मैं कहाँ कहाँ कहता रहा और वह बार बार उंगली का इशारा करते हुए वहां वहां की रट लगाए जा रहा था -बेटे ने पहले देखा और कहा हाँ हाँ है तो वो देखिये . मुझे नहीं दिखा .लगा जैसे आसमान में अभी के धूमकेतु देखने के असफल प्रयास की पुनरावृत्ति सी हो रही हो . मगर यहाँ तो पूरा जमीनी मामला था ...तब तक बेटी ने और फिर पत्नी ने भी देखने की हामी भर ली -मैंने अविश्वास से पत्नी के चेहरे की ओर देखा -वहां हर्ष का उफान देखकर लगा कि वे मृगों को सचमुच देख चुकी थीं -अरे अरे वे तो गिनती भी करती जा  रही थीं -कुल अट्ठारह! अब मुझे एक बहुत नागवार  लगने वाला पराजय बोध  सा हो आया -हुंह! मैंने भी आख्नें उसी ओर गड़ा दीं जिस ओर कई जोड़ी आँखें पहले से उठी हुयी थीं -और लो मुझे भी दिख गया-मगर  बैकग्राउंड में वे ऐसे छुपे से थे कि बिना अभ्यस्त आँखों के उनका दिखना मुश्किल ही था और वे बड़े छोटे भी लग रहे थे .....मैंने दूरबीन की मदद ली जिससे आसमान और परिवेश की ब्यूटी निहारने में अब तक की मेरी प्रवीणता थी  -अब पहली बार वन्य जीवों पर दूरबीन साध रहा था .
 पुष्पित पलाश के  बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं-साथ में डेजी भी ! 

वाह! अद्भुत !! नयनाभिराम !!! यह काले मृगों का एक झुण्ड था -मादाएं ज्यादा थी मगर दो नर थे जो बड़े ग्रेसफुल और मोहक लग रहे थे -उनका काला पृष्ठ भाग और नीचे का सफ़ेद हिस्सा अद्भुत कंट्रास्ट सौन्दर्य प्रगट कर रहा था -उन्हें पता लग गया था कि वे निगरानी में हैं। काले मृग के नर की सींग भी बहुत मोहक होती है।  इन्हें अंग्रेजी में ब्लैक बक - एंटीलोप कहते हैं यानि इनकी सींग कभी नहीं गिरती जबकि हिरणों की सींग हर वर्ष गिर जाती है -हिरन (डीयर ) और एंटीलोप में यही बड़ा फर्क है। अब  मैंने देखना चाहा कि पत्नी की गणना सही थी या नहीं -कम से कम पराजित होने के अनुभव की भरपाई का एक मौका था मेरे पास -मैंने गिनकर उनकी संख्या शुद्ध की और कहा 18 नहीं कुल 19 मृग हैं -उनकी बतायी संख्या से एक ज्यादा . उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया तो मुझे संतोष हुआ ,वैसे दूरबीन तो मेरे ही पास थी और उन्हें फिर से गिनने का मौका मैं देने की मूड में नहीं था . उस दल का नेतृत्व मादा कर रही थी -अचानक ही सबने तेज कुलांचे भरी और ये जा वो जा -जिधर से हम आये थे उधर ही पूरा दल लोप हो गया था ! हम अनिवर्चनीय आनन्द के मोड में थे -यहाँ रक्त पुष्पित पलाश के पेड़ों के बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं -एक मकसद तो पूरा हो गया था . अब क्या? ..  कुछ इसी  मुद्रा में मैंने वन पथ प्रदर्शक की ओर देखा .
                                       गहरी खाईं के छोर पर गुफा चित्रों का रोमांचक स्थल
वह बहुत मितभाषी था और स्थानीय डायिलेक्ट में जो बोल रहा था उसे भी समझने में काफी मशक्कत हो रही थी -जैसे वह भालू को भाल कह रहा था -वह जब भी कुछ कहता हम एक दूसरे के चेहरे को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लग जाते . उसका इशारा अब फिर से गाडी में बैठने के लिए था . अब हम लखनिया गुफा पाईंट पर पहुंचे जहाँ से सैकड़ों फीट नीचे की सपाट और 90 डिग्री की सीधी ढाल पर सोन नदी का विहंगम दृश्य था ....रहस्यानुभूति और रोमांच का भाव उत्पन्न करते इस दृश्य को हम मंत्रमुग्ध से निहारते रहे। हमने केव पेंटिंग्स के बारे में पूछा तो वनकर्मी ने उस सपाट सी बहुत खतरनाक खाईं के किनारे किनारे एक बड़ी सी छतरीनुमा चट्टान के नीचे जाने को कहा -मेरी तो हिम्मत नहीं हुयी -भारी शरीर लिए काफी झुक  कर जाना और वह भी खाईं के आख़िरी किनारे से ..न बाबा न ...जान है तो जहांन है -मगर बच्चे तो देखते देखते आँखों से ओझल भी हो गए और उनके ममत्व में माँ भी कहाँ रुकी -सब आँखों से ओझल बस मैं चिल्लाता रहा संभल के संभल के ....
  बूझो तो जाने! कौन सा जानवर बनाया था उस आदि चित्रकार ने  
उन्हें  गुफा चित्रकारी का आनन्द  लेते छोड़ हमारे पथ प्रदर्शक मुझे लेने लौट आये -मैंने उससे यह तहकीकात की कि पहले कभी भी कोई कैजुअलिटी आदि तो नहीं हुयी -कोई नीचे तो नहीं  गिरा -उसके यह बताने पर कि ऐसी कोई घटना कभी नहीं घटी मैं भी हिम्मत बांध बमुश्किल उंकरु -मुंकरु गुफा में प्रवेश तो कर गया -सामने ही दीवाल पर आदि मानवों द्वारा संभवतः पलाश के फूलों और मिट्टी से बनाएं रंग से भित्ति पर तरह तरह के चित्र उकेरे गए थे- जगली जानवरों के अनेक चित्र थे -बच्चे उनकी फोटो लेने में मशगूल थे -उनकी आनन्दित माँ किसी भी  खतरे से अनभिज्ञ रोमांचित दिख रही थीं  और मैं अपनी और सभी की सकुशल वापसी को लेकर व्यग्र था -आम भारतीय तनिक भी ऐडवेंचर प्रेमी नहीं है -मैं क्या खुद एक प्रमाण नहीं हूँ? बहरहाल धडकते दिल से मैं बाहर आया और फिर एक एक को चिल्ला चिल्ला कर वापस बुलाया -बेटे ने एक गुफा चित्र  फेसबुक पर लगाया है -आप बताईये कौन सा जानवर है -फेसबुक पर कई लाल बुझक्कड़ बूझ चुके हैं -मिजारिटी साही के पक्ष में हैं जबकि संतोष त्रिवेदी सूअर के पक्ष में हैं -आप भी तनिक बताईये -
अगला भाग अगली पोस्ट में !

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

मीडिया मुगलों के बीच एक दिन.........



विगत 15-17 फरवरी को महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान,महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के संयुक्त तत्वावधान में एक तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी,
"प्रिंट एवं सोशल मीडिया:चुनौतियां एवं संभावनाएं " के उद्घाटन सत्र एवं पहले दिन के दो अकादमीय सत्रों में उपस्थित रहने का गौरव मिला . भोजन पश्चात के दूसरे सत्र में मुझे बीज वक्तव्य देना था -यानि कि  
की नोट एड्रेस -अब बीज वक्तव्य को तो पहले होना चाहिए था मगर उसे छात्रों के शोध पत्रों के पढ़ने के बाद रखा गया था . और मेरे बीज वक्तव्य के बाद सत्राध्यक्ष महोदय को अपना अध्यक्षीय संबोधन भी देना था -भोजन के बाद का सहज आलस्य लोगों पर तारी भारी था और सत्र का सञ्चालन एक बहुत ही उदारमना के हाथों था तो उन्होंने शोध पत्रों के पढ़ने के लिए समय देने में जो दरियादिली दिखाई कि शाम हो आयी और सभागार से लोग उठकर जाने लगे -ऐसे में बीज वक्तव्य?
 संगोष्ठी के पहले...........

मुझे बीज वक्तव्य के लिए जो विषय मिला था वह था -"सोशल मीडिया: प्रासंगिकता एवं भविष्य" -इस सत्र में कुल दस शोध चिह्नित हुए थे मगर पढ़े गए आधा दर्जन। कुछ की क्वालिटी तो सचमुच बहुत अच्छी थी .सबसे अधिक इस्तेमाल में आने वाली सोशल नेट्वर्किंग साईट फेसबुक के चर्चे रहे। इसके राजनैतिक इस्तेमालों और दुरुपयोग की चर्चाएँ भी हुईं। एक शोध पत्र  ने तो लगभग यह साबित कर ही दिखाया था कि ये सोशल नेट्वर्किंग साईटे अपसंस्कृति फैला रही हैं -अब इसमें बिचारी साईट का क्या दोष? श्रेष्ठ संस्कृति या अपसंस्कृति फैलाने वाले कोई हैं तो वे तो हमी लोगों में से हैं . इलाज तो इनके दिमाग का होना चाहिए .

बहरहाल मेरे साथ संयोगात सोनभद्र के ही राष्ट्रपति पदक प्राप्त शिक्षक श्री ओमप्रकाश त्रिपाठी जी अध्यक्ष पद का गौरव बढ़ा रहे थे . मैंने मात्र दो मिनट जिसमें एक मिनट तो औपचारिक संबोधन में चला गया अपनी बात रख दी -श्रोताओं ने बख्श दिए जाने की खुशी में जोरदार ताली बजायी . मुझे इस संगोष्ठी में बतौर ब्लॉगर एवं विज्ञान संचारक की हैसियत से बुलाया गया था और मुद्रित सामग्रियों में यही अंकित था . मुझे खुशी हुयी कि अब धुर और धुरंधर मास/ मेनस्ट्रीम मीडिया के कार्यक्रमों में ब्लागरों को भी धर पकड़ बुलाया जा रहा है .वैसे इस कार्यक्रम के सर्वे सर्वा आदरणीय राम मोहन पाठक जी एक बड़े ही समादृत भारतीय मीडिया मुग़ल हैं और यह उन्ही की कृपा  रही कि मैं इस संगोष्ठी में शिरकत कर सका .हाँ जाने की शर्तें मेरी थीं और यह पाठक जी की विनम्रता ही है कि मुंहफट होने की मेरी उद्दंडता का  उन्होंने तनिक भी ध्यान नहीं दिया .

संगोष्ठी का जीवंत कार्यक्रम जाहिरा तौर पर उद्घाटन सत्र में ही निपट चुका था . हिन्दुस्तान अखबार समूह के मुखिया और एक फायर ब्राण्ड वक्ता शशि शेखर जी ने बला का भाषण दिया . उन्होंने बड़ी अच्छी अच्छी बातें बतायीं -फ्रेंच क्रान्ति के सबक पढाये -एक बड़ी अच्छी बात उन्होंने कही कि नये मीडिया पर अंकुश न लगायें जाय वह अपने आप खुद को संभाल लेगी-इंसानियत एक बार फिर अपना रास्ता तलाश रही है उसे वक्त मिलना ही चाहिए . पहले भी ऐसी कई संक्रातियों में मनुष्यता ने अपनी राह बनाई है।हाँ उनकी सबसे अधिक आलोचना हुई जब उनसे पेड न्यूज,सरोगेट न्यूज आदि पर सवाल किये गए -उन्होंने इनका स्पष्ट विरोध तो किया मगर कहा कि आखिर समाज में जब चारो ओर गिरावट है तो मीडिया से ही इतनी अपेक्षा क्यों ,फिर मीडिया के लोग 'प्रोफेसनल ट्रुथ टेलर " हैं . अब सबका सत्य अलग अलग हो सकता है . उनकी इस बात पर मुझे तत्क्षण याद आया था,भई सत्य तो हमेशा एक है -ऋग्वेद ने कहा - एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति!
मैं पहले दिन ही गोष्ठी से निजी कारणों से लौट आया -बाकी लोग अब लौट रहे हैं! एक अच्छा अनुभव रहा -आयोजकों, मुझे बुलाने के लिए बहुत आभार!

शनिवार, 17 नवंबर 2012

भाग दरिद्दर!

इस बार भी दीपावली पैतृक आवास(चूडामणिपुर, बख्शा  -नौपेडवा,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश ) पर मनाने का मौका मिला .सालाना त्यौहार अपने पैतृक आवास पर मनाना मुझे अच्छा लगता है . बड़े मिश्रित अनुभव रहे . पिछले वर्ष से शुरू हुयी बाल रामलीला इस वर्ष  बच्चों के और भी उल्लास के चलते अविस्मरणीय बनी . इस बार का प्रसंग था लंका दहन का . इस प्रसंग में बच्चों ने हनुमान के लंका में प्रवेश, लंकिनी से वार्ता और उसकी मुक्ति ,विभीषण से भेंट ,सीता को रावण द्वारा धमकाना ,हनुमान द्वारा श्रीराम की मुद्रिका गिराना ,उनके  द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना ,अक्षयकुमार का वध ,मेघनाथ द्वारा हनुमान को ब्रह्मपाश में  बाँधना ,हनुमान रावण संवाद ,लंकादहन और माँ सीता से कोई स्मृति चिह्न माँगना और लौट कर उसे श्रीराम को सौंपना आदि दृश्य बहुत ही बढियां ढंग से अभिनीत किया . 
मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा 
हनुमान की सर्वश्रेष्ठ भूमिका कर सरिता मिश्र ने प्रथम पुरस्कार जीता 
इस कार्यक्रम के पीछे की सोच यह है कि समाज में श्रेष्ठ सांस्कृतिक और पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण बनाने की दिशा में बच्चों से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए -कैच देम  यंग। इस दिशा में बाल रामलीला की शुरुआत एक विनम्र प्रयास भर है . कुछ चित्रों का आप भी दृश्य लाभ उठायें . जागरण ने भी चित्र के साथ खबर छापी .
बाल कलाकार टीम
 निर्देशक कीर्ति मिश्र,दृश्य समन्वयक प्रियेषा मिश्र,पार्श्व ध्वनि - स्वस्तिका, सोनी आदि 


प्रियेषा ने गाँव के बच्चों से घुलमिल कर रावण का पुतला भी बनाया और मुझसे पुतले के साथ अपना फोटो लेने का आग्रह किया . पुतला दहन के बाद  पैतृक  आवास मेघदूत  को सजाने संवारने का काम शुरू हुआ . इस बार हमसभी ने पटाखे से दूरी बनायी मगर चयनित फुलझडियों -अनार ,चरखियां ,स्वर्गबाण अदि आईटमों का मर्यादित प्रदर्शन किया गया -यह काम बच्चों को देने के बजाय आउटसोर्स कर एक प्रोफेसनल आतिशबाज को दिया गया . खूब मजा आया .
आतिशबाजी 

जाप ध्यान भी हुआ,प्रसाद बांटे गए। एक लोक परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन अपने व्यवसाय या जो भी काम आप करते हों अवश्य करना चाहिए जिसे 'दिवाली जगाना' कहते हैं कि वह काम आप अगली दिवाली तक निर्विघ्न करते रहें.  इस लिहाज से तो मुझे जो कुछ काम करने थे वे  एक भी नहीं हो पाए,ब्लागिंग भी नहीं :-) सबसे बुरी बात यह हुयी कि मेरे फेसबुक अकाउंट से करीब दो दर्जन मोबाईल  फोटो अपलोड आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए और मुझे विचलित कर गए .कारण अभी तक समझ में नहीं आया ,फेसबुक को  प्राब्लम रिपोर्ट किया मगर अभी तक जवाब नहीं आया है , मतलब मेरी दिवाली नहीं जगी . माता जी ने आँख में काजल इस बार भी घुड़क कर लगा ही दिया यह डरा कर कि अगर नहीं लगवाता तो अगले जन्म में छंछून्दर हो जाऊंगा . मुझे सहसा डार्विन की याद आयी और होठों पर बरबस मुस्कराहट आ गयी . रिवर्स एवोलूशन :-)
भाग  दरिद्दर! 
....देर से सोये ही थे कि  अल्लसुबह नींद कुछ धप्प धप्प ढब ढब की आवाज से खुल गयी .गृहिणी एक प्राचीनतम परम्परा का निर्वहन कर रही थीं हँसियाँ से सूप पीट पीट कर घर के अतरे कोने से दरिद्दर को भागा रही थीं . अब दीवाली की आराध्य देवी लक्ष्मी के आने पर दरिद्दर को घर से बाहर हो जाने की यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति कहाँ से अनुचित है! मनुष्य उत्सव- अनुष्ठान प्रेमी है -वह कोई भी अनुष्ठान का मौका ऐसे ही गवाना नहीं चाहता . दरिद्दर भगाने का यह उपक्रम यहाँ पूर्वांचल में बहुत प्रचलित है . गाँव घर की लक्ष्मियाँ सूप पीट पीट कर गृह दारिद्र्य को गाँव से बाहर खदेड़ आती हैं . कहीं कहीं यह उपक्रम एकादशी की रात में करते हैं।

दिवाली की अगली रात से कार्तिक का शुक्ल पक्ष आरंभ हो रहा था सो कार्तिक महात्म्य की एक पर्म्पारा के मुताबिक़ हम सब ने आवला के पेड़ के नीचे सामूहिक भोज भात -आहारा का आयोजन भी किया . बारबीक्यू की तर्ज पर ....

आप सभी के यहाँ से  दुःख -दारिद्र्य भाग जाए दीपोत्सव की यही सर्वतोभद्र कामना है ........

बुधवार, 29 अगस्त 2012

अन्तराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन और परिकल्पना सम्मान: आँखों देखी!

मुझे पता था कि एक ब्लॉग मंडली (खल मंडली नहीं कह रहा इसलिए यह  मन में भी न लाईयेगा )   एक दिन पहले ही लखनऊ  पहुँच रही है और मुझसे भी अपेक्षा थी कि मैं पहले ही पहुँच जाऊं मगर कोई मोटिवेशन ही न था सो सबेरे वाली गाडी (बनारस) से पकड़ी और लखनऊ पौने दस बजे पहुँच गया ...मैं टुकड़ों टुकड़ों फेसबुक पर कुछ अपडेट डालता जा रहा था .और दूसरों के पढता जा रहा था ..चेला चीनी  संतोष त्रिवेदी  (गुरु गुड रह गए चेला चीनी हो गए ) भी फेसबुक पर कुछ लिख पढ़ रहे थे ...मैंने रास्ते में ही नोटबुक पर कुछ लिख पढ़ लिया था कि कहीं कुछ बोलना ही न पड़ जाय ..अब मुझ जैसा वरिष्ठ गरिष्ठ ब्लॉगर यह कह कर कैसे छूट सकता है कि अगर बोलवाना था तो पहले बताना  था न....और मेरी आशंका भी सच निकली ...कोई आदरणीय अतिथि नहीं आये तो मुझे भी  अचानक  ऐन वक्त उदघाटन सत्र के विशिष्ट डायस पर स्थानापन्न तौर पर बुला लिया गया और मैंने कुछ औपचारिक ना  नुकर करके यह सुअवसर हाथ से जाने न दिया ....हालांकि मंच पहले से ही सुशोभित था और शिखा वार्ष्णेय जी की उपस्थिति उसे एक अंतर्राष्ट्रीय गरिमा भी प्रदान कर रही थी ..वे जितना सुन्दर फोटुओं में लगती हैं वास्तविक रूप में उससे अधिक सुन्दर और सौम्य हैं ....और उनके बगल में बैठना भी मेरे लिए कोई कम  सौभाग्य नहीं था  ..हालांकि मैं हिचकिचा रहा था और मंच तक पहुंचते ही जैसे ही एक आख़िरी कुर्सी पर पसरा  था कि संचालक दिल्लीवासी ब्लॉगर डॉ .हरीश अरोड़ा ने घुड़क दिया कि संचालक की सीट रिक्त रखी जाय (अब संचालक को बैठने को का काम?) ..

बाएं से सुभाष राय ,शिखा वार्ष्णेय ,मैं सत्राध्यक्ष शैलेन्द्र सागर ,मुख्य अतिथि उद्भ्रांत जी 
बहरहाल बेआबरू होकर कुर्सी छोड़ा तो उससे बेहतर जगहं मिल गयी -शिखा जी के बगल और बिलकुल डायस-मध्य की जगहं ..हालांकि शिखा जी ने तनिक भी लिफ्ट  नहीं दी और अपनी तटस्थ गरिमामयी उपस्थिति बनाए रखने में सफल होती रहीं... यह कुछ वैसा ही है जैसा कि प्लेन के सफ़र में बगल के यात्री भी अक्सर  पूरी यात्रा तक कुछ नहीं बोलते -यह एक वह परिप्रेक्ष्य है जो  हाई सोशल आर्डर के निरंतर इम्पेर्सोनल होते जाने की कहानी कहता है ...मैंने अपनी एक विज्ञान कथा मोहभंग में इस पूरे भाव चित्र को काफी पहले ही शब्द दिए हैं ....आज मंच के  डिग्नैटेरीज भी इसी संस्कृति का निर्वहन करने लगे हैं ....और अपनी धीर गंभीर उपस्थिति बनाए रखने को विवश होकर रह गए हैं ..दूसरी ओर अपने संतोष त्रिवेदी जैसी जीवंत शख्सियत है जिनकी  निजी स्पेस में बार बार घुसपैठ  असहज सी तो करती है मगर यह भी याद दिलाती रहती है हम अभी मशीन नहीं हुए, हाड़ मांस के ही प्राणी हैं -और मुझे मंच पर जाने का मौका मिलते ही यह भी लगा कि चलो कुछ देर तो चेले चीनी के नोच खरोंच  से पीछा छूटा..मगर उनकी यह लागी ऐसी है कि छूटती नहीं अपने नौके कैमरे के साथ मंच पर भी आ पहुंचे और हे भगवान कैसी कैसी तस्वीरें खिंचवाई हैं तूने उनसे, यह तो बाद में पता चलेगा ....उनका कैमरा और वे खुद पूरे हाल और मंच तक चक्कर घिन्नी की तरह घूमते रहे और कोई आश्चर्य नहीं कि महराज के कैमरे से कुछ चित्र ब्लैकमेलिंग वालों की चान्दी न  बन जायं -खबरदार चेले राम ऐसी कोई हिमाकत करोगे तो ठीक नहीं होगा ....
सचमुच यह एक सम्मान समारोह ही था,सम्मलेन या विमर्श सत्र आदि कहना सटीक नहीं है  -बिल्कुल परिकल्पना ब्लॉगर सम्मान !..किसी ने कहा ब्लागर कम्युनिटी का आस्कर -ठीक भी है -ईश्वर ऐसा ही करें!और इसमें किंचित भी कोई असंगति नहीं ..कोई भी नयी विधा जब पुष्पित पल्लवित होने लगती है तो ऐसे समारोह उत्सव आनुसंगिक हो उठते हैं ..जो इनसे मुंह बिचका रहे हैं वे अपरिपक्व अनुभवहीन लोग हैं,गुड का स्वाद नहीं लिए हैं :-)  और इनमें किसी भी कारण से सम्मिलित न हो पाने की खीज मिटा रहे हैं ... 
बहरहाल  मैं जब ठीक दस बजे पहुंचा तो ज़ाकिर  जी काफी ऊपर दीवाल पर स्पाईडर मैंन सरीखा चढ़ कर बैनर टांग रहे थे ..वो तो जब वे कूद कर सम्मुख हुए तो मैंने सहसा पहचाना, अरे ये तो अपने ज़ाकिर मियाँ हैं ...अब हलके फुल्के लोगों से रश्क होता है दन से कहीं भी चढ़ और उतनी ही फुर्ती से उतर भी लेते हैं ..मैंने उन्हें प्यार  की झिड़की दी ये स्पाट ब्याय का भी काम? बोले ब्लागिंग के लिए कुछ भी,कभी भी कहीं भी  :-) अब ऐसा जज्बा हो तो भला क्या मुश्किल है? :-) हाल में घुसा तो रवि रतलामी जी ,सिद्धेश्वर जी ,अमित श्रीवास्तव जी ,डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी ,अपने आशु काव्य प्रतिभा के धनी और टिप्पणीकार रविकर जी कुछ उन पहलों में से थे जिनसे भर अंकवार मुलाक़ात हुयी .....चेले चीनी तो खैर थे ही ...फिर तो लोग आते गए और हम गलबहियां मिलते गए ..किसी और को भी गलबहियां -घेरे में लेने को मन था और निगाहें हाल में बार बार उसे ढूंढ रही थीं  ,बहरहाल  उसकी भी उपस्थिति हो आयी तो राहत रूह की अनुभूति हुई . ..मगर तब तक कार्यक्रम शुरू हो गया और हम मंच पर धर दिए गए .....
अब  मंच  से देखा देखी मंचीय गरिमा के अनुकूल नहीं थी सो हम तटस्थ और प्रत्यक्षतः निर्विकार भी हो लिए ..अडोस पड़ोस के गुरुतर गाम्भीर्य का भी तो हमें ध्यान  रखना था ..वामभागी  अध्यक्ष जी फिर भी मुझसे डिस्टर्ब होते रहे और बार बार मेरे फोन काल आने पर बुदबुदाते रहे और संतोष त्रिवेदी पर भी काफी कुपित होते रहे कि वे आखिर मेरी ही इतनी  फोटो क्यों उतारते जा रहे -चेला हैं न गुरु का ध्यान तो रखेगा ही ..मगर वे गुरु के साथ क्या क्या  गुल कैमरे में खिलाये हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा ..हम मंच से ही उन्हें घुड्कियाते भी रहे ..मगर बन्दर बालक एक सुभाऊ ...पूरे चिबिल्ले हैं संतोष त्रिवेदी! अब उन्होंने क्या क्या कैमरे के फोकस में रखा और उसके हवाले किये हम आपसे बता भी नहीं सकते ;-) ....
बाहर कुदरत मेहबान थी -फुहारें थीं ..और भीतर सभागार में भी सम्मान बरस रहा था ...झोलियाँ खुलती गयीं और सम्मान भरते रहे... मैं उदघाटन सत्र का स्थानापन्न डायस अतिथि बना था  और पहली बार भाग्य ने साथ दिया अंत तक डटे रहे ...... :-) अच्छा पास पड़ोस -सानिध्य हो तो हटना भी कौन कम्बख्त चाहता है :-) ..मगर मेरे लिए और भी आमंत्रण थे और मुझे उन्हें अटेंड करना ही था ...जैसी कि आशंका थी संचालक महोदय ने मेरी प्रशस्त काया और भारी भरकम मंचीय उपस्थिति को भी नज़र अंदाज कर मुझे वैसे ही पहले बोलने को बुला लिया जैसे कवि सम्मेलनों में सबसे  पहले जूनियर कवि को कविता पाठ के लिए बुलाया जाता है . ..
 कुछ विषय प्रवर्तन सा  करने के  मुगालते में मैं रहा ...मूड बना तो वह भी लिखेगें यहीं ....हाँ  मुझे पता नहीं क्यों रह रह कर अहसास होता रहा कि मैं ब्लागरों के सम्मलेन के बजाय किसी कवि सम्मलेन में आ फंसा हूँ ... :-) अखंड सम्मान का जो सिलसिला चला तो लंच का समय हो आया और उद्घाटन सत्र ही चलता रहा ... समय कम पडा तो एक चर्चा सत्र ही निरस्त हो गया -कई ब्लॉगर कुछ न कह पाने के कारण मायूस हुए ..कुछ उचित ही नाराज हो गए ....खिसियाये और चलता बने ..बाबा रे कहाँ कहाँ से आये थे लोग -कोई गोआ तो कोई हैदराबाद! आडियेंस सुश्री रचना सिंह जी, यशस्वी ब्लागर (नारी ) की प्रतीक्षा करते रहे,उन्हें भी सम्मानित होना था -वर्षों से ब्लागिंग क्रीज पर बिना हिट विकेट बनी हुई हैं वे  -मैं खुद उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था . उनका नाम  एक विमर्श सत्र में भी था -मगर वे नहीं आयीं!अपराह्न सत्र में कवितायें भी मंच पर सस्वरित हुईं ...मैं चौका .... कवि सम्मलेन और ब्लॉगर सम्मलेन में फर्क रखना होगा --एक कवयित्री ग़ज़ल सुनाईं और मैं हाल में उसे तरन्नुम में गुनगुनाता रहा और चेले को पकड़ के सुनाता रहा और चेले भी गज़ब ..गज़लकारा ब्लॉगर को ही बोल उठे  कि आपसे अच्छा तो मिसिर जी गा रहे थे ..हद हो संतोष .... .
सम्मानित कुछ शिष्ट विशिष्ट 
रवीन्द्र प्रभात ने इस समारोह को सफल बनाने में अतिशय / भयंकर मानसिक और शारीरिक श्रम किया और ज़ाकिर ने भी -उन्हें साधुवाद! अब सम्मान पर भी कुछ कह  लूं ....सम्मान मिलना अच्छी बात है मगर उसका अतिशय विज्ञापन बौद्धिक जनों में आत्म प्रचार का सन्देश ले जाता है ..आत्मप्रचार निरी बेशर्मी  मानी जाती है पढ़े लिखे गुनीजनों में   ...
कई सिद्ध प्रसिद्ध ब्लॉगर लखनऊ ब्लागर मीट में आये मगर जितना आये उनसे भी मुलाक़ात वहीं रहकर भी नहीं हो पायी :-( .....कारण हम उनके ब्लॉग से परिचित हैं उनसे जुड़े चेहरों से नहीं... और मजे की बात यह कि जिनके चेहरों से परिचित हैं उनके ब्लॉग से परिचित नहीं .. काश एक परिचय सत्र होता! हाँ बहुत से जो ब्लागर किन्ही भी कारणों से नहीं आये उनकी दबी साध उन्हें रह रह कचोट रही है और वे अपने विचारों से दूसरों को फेसबुक पर चिकोट रहे हैं ..कोई भी एक दिवसी और वह भी बिना सरकारी इमदाद का ब्लॉगर जलसा सारे ब्लागरों को समेट नहीं सकता..मगर एक दिन में ही जितना कुछ  अटाया/समाया गया इस समारोह  में वह दो दिन का काम था...सूत्रतः यही कह सकता हूँ जो नहीं आये भले रहे ..... और वे सम्मान तोषी नहीं हैं -वैसे भी अब बाकी अगले में सिमट ही जायेगें ...मनवा धीर धर... :-) मगर रवीन्द्र जी, पुरखों बूढों को सम्मान के बजाय क्या ही अच्छा होता हम कोई ऐसी प्रणाली विकसित करें जिससे नयी प्रतिभाएं सम्मानित हों और प्रोत्साहित हों -आने वाल कल उनका है .....बाकी तो मूड बना तो फिर कुछ लिखेगें ....हाँ युगों बाद बहुत संतृप्त होकर लौटने (लुटने न पढ़ें कृपया )की अनुभूति है -देखिये कब तक कायम रहती है :-)
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रविवार, 5 अगस्त 2012

फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे- कामुकता की पराकाष्ठा का साहित्य (पुस्तक परिचय )


फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे एक रत्यात्मकता  (इरोटिक-हे मूढ़मने! इरोटिक बोले तो पोर्नोग्राफी नहीं ) से ओतप्रोत ई एल जेम्स रचित औपन्यासिक कृति है जो पिछले २०११ से,प्रकाशन वर्ष से ही चर्चा में है -बेस्टसेलर है . यह एक  त्रिखंडी (ट्रायोलाजी) कृति है . उपन्यास में लोकेशन सिएटल है जहाँ एक कालेज छात्रा एनास्टासिया स्टीले और एक व्यवसायी टैक्यून  क्रिस्चियन ग्रे का प्यार(?)  पलता है. उपन्यास भले ही अश्लीलता(पोर्नो )/घासलेटी साहित्य का लेबल लिए नहीं है मगर एक आम भारतीय पाठक/पाठिकाओं  के लिए जो सेक्स को प्रत्यक्षतः एक निषिद्ध कर्म ही समझते हैं  यह  उसी कटेगरी की कृति है .उबकाऊ और किंचित घृणित भी .  यह पुस्तक  मूलतः  पश्चिमी पाठकों के लिए है जो सेक्स को और सेक्सियर बनाने के तामझाम में लगे रहते हैं और रति क्रिया में नित नयी नूतनता / नवीनता देने में  मानो हरवक्त तत्पर बने रहते हैं -वहां  सेक्स एक सत चित आनंद है, एक उत्सव धर्मिता है -  विपुल शेड्स लिए हुए  हैं ....सहज सामान्य सेक्स भी  और विकृत भी .....जहाँ अनेक सेक्स फंतासियों का दौरदौरा है ,समूह यौनिक आनंद का रिवाज है ,सी सी और मीठी/तीखी  मार के बीच यौनिक आनंद का खेल है आदि आदि .....
मगर मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ -दरअसल हुआ यह कि विगत दिनों मुझे अपनी आधी दुनिया के एक मित्र का यह अनुरोध मिला कि मैं दो कृतियाँ पढूं और उन पर पोस्ट लिखूं और उन्होंने मुझे यह कहकर और भी उकसाया कि कई और श्रेष्ठ ब्लागरों ने कितनी सुन्दर और समग्र पुस्तक समीक्षायें अपने ब्लागों पर की हैं,एक ने तो अभी हाल में ही  -तो फिर मैं क्यों नहीं ऐसा कुछ करता? अब  आप सब यह जानते ही हैं कि ऐसे उदाहरण /उलाहने /ताने मेल इगो को कितना हर्ट करते हैं  ...धर्मवीर भारती की आत्मकथात्मक गुनाहों का देवता एक बार पढ़ा था अब फिर पढने की चाह है यद्यपि उनकी पूर्व पत्नी सुश्री कांता भारती की कृति रेत की मछली भी उन  लोगों द्वारा अनिवार्यतः पढी जानी चाहिए जो 'गुनाहों  का देवता' को पढ़ते हैं क्योंकि  यह  'गुनाहों का देवता' का ही दूसरा अविभाज्य पहलू है . फिलहाल इन कृतियों पर यहाँ लिखना मुल्तवी है मगर वो क्या कहते हैं न कि आशिक लिफाफा देखकर मजमून भांप जाते हैं तो किताबी कीड़े किताब का रिव्यू देख उसके बारे में काफी कुछ जान जाते हैं -तो मैंने शेड्स आफ ग्रे की कुछ समीक्षायें यहीं अंतर्जाल पर पढीं और फिर सोचा आपका श्रम बचाने को आपसे उन्हें शेयर कर ही लूं ...मित्र ने जो सन्देश भेजा तो मैंने समझा कि वे फिफ्टी शेड्स आफ गे जैसा कुछ कह रही हैं औरत मैं तुरंत ही विमुख  हो गया था  -क्योंकि मुझे इस शब्द से ही एलर्जी होती गयी है ..मगर बाद में लगा कि मुझे चीजों /शब्दों को ध्यान से देखना चाहिए -अब उम्र भी तो ऐसे बचकानी हडबडी / जल्दीबाजी की नहीं रही .... 

हाँ तो मैं बात इस उपन्यास की कर रहा था ...यह यौनिक दृष्टान्तों -दृश्यों से भरपूर कृति है और इसलिए ख्यात कुख्यात भी ....मानो कामसूत्र के इक्कीसवी सदी के संस्करण का रुतबा पाने की होड़ में पुस्तक कितनी ही यौनिक पद्धतियों -आसनों का चित्रण करती चलती है जिसमें परपीड़क यौनिक आनंद (बाँडेज/डिसिप्लिन /सैडिज्म /मैसोकिज्म=बीडीएसएम् ) आदि के भी विवरण /दृश्य हैं . किताब की कई करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं और ३७ देशों को इसके प्रकाशन के अधिकार भी मिल चुके हैं . हेनरी पाटर के भी रिकार्ड ध्वस्त हुए ... 
कहानी की शुरुआत कालेज छात्रा एनास्टासिया(अना) स्टीले से होती है जो अपने सबसे प्रिय मित्र कैथरीन कैवनाघ के साथ रहती है, जो कालेज पत्रिका के लिए नियमित कुछ लिखती रहती है . एक दिन जुकाम होने के कारण वह खुद न जाकर एनास्टासिया को  सफलता के शिखर पर पहुंचे अमेरिकी व्यवसायी क्रिस्चियन ग्रे का इंटरव्यू करने को भेजती है . इंटरव्यू के समय ही ग्रे अना को भा जाते हैं मगर इंटरव्यू पूरा नहीं हो पाता...फिर अना उसकी मित्र कैथरीन तथा एक और फोटोग्राफर  इंटरव्यू और फोटो सेशन के लिए ग्रे के पास फिर पहुंचते हैं .यहीं से अना और ग्रे की लव स्टोरी शुरू होती है मगर उनमें कई संवाद -अवरोध होते रहते हैं ...
अना को बार बार लगता है कि ग्रे " बस प्यार कर लिए जाने वाला छोकरा सरीखा  नहीं है" अना का  पहले भी जोस नामक व्यक्ति से अफेयर रह  चुका  है .. अना ग्रे को मन ही मन प्यार करने लगती है मगर ग्रे को तो बस अपनी यौन वासना की पूर्ति की भूख है उसे प्यार से कोई लेना देना नहीं है ..वह अपनी सेक्स -फंतासियों को अना के साथ चरितार्थ करना चाहता है ...इन्ही उधेडबुनों के बीच कहानी आगे बढ़ती है .......ग्रे की कामुक वृत्तियाँ असामान्य हैं -वह अना से कई तरह के वादे  लेता है जैसे धनिष्ठ क्षणों में वह उसकी आँखों में नहीं  देखेगी...  स्वयं उसे स्पर्श नहीं करेगी. वह इस फंतासी को मूर्त रूप देना चाहता है कि जैसे उसका पहला संसर्ग अक्षत यौवना से हो रहा हो ....(कौन कहता है भारतीय ही पुरातन पंथी हैं ?) अना इन यौन अत्याचारों के बाद भी ग्रे से प्यार करती है . क्योकि स्वयं उसकी विर्जिनिटी एक ऐसी महिला ने भंग कर दी थी जो शादी शुदा थी .. और यही ग्रंथि उसके मन में घर कर गयी थी ...
अना और ग्रे का सम्बन्ध केवल कामुकता का सम्बन्ध है रोमांटिक नहीं ....ग्रे  उसके साथ अजीबोगरीब यौन क्रियाओं का अनुबंध करता चलता है जिसमें एक यह भी कि यह सब वह गोपनीय रखेगी ....इस सम्बन्ध का शिखर बिंदु वह होता है जब अना कहती है कि जिस  भी कामुक कृत्य की अति  ग्रे चाहता है  अपनी इच्छा पूरी कर ले ....यहाँ तक कि ग्रे को वह खुद अपने शरीर पर बेल्ट से मार खाने को उकसा कर कमोद्वेलित होती है ....मगर अना धीरे धीरे ऐसे सम्बन्ध से ऊबती,उकता  जाती है और इस सम्बन्ध का अंत दोनों के  स्थाई विछोह में होता है . 
मुझे नहीं लगता भारतीय पाठक इस पुस्तक को पसंद करेगें ....आशीष श्रीवास्तव ने इसके बारे में फेसबुक पर लिखा "वेस्ट आफ टाईम एंड रिसोर्सेज.. " ..और मैं भी उनसे सहमत हूँ ....वासना का इतना  भोंडा रूप हमारे मानस को तो रास नहीं आ सकता ..मगर यहाँ भी तो कान्वेंट संस्कृति ने ऐसे सांस्कृतिक आघात के द्वार खोल ही रखे हैं -हम  छात्र जीवन में  सही गलत बहुत कुछ ऐसी किताबों से सीखते हैं और चूंकि स्वभावतः मनुष्य जिज्ञासु और अन्वेषी होता है इसलिए इन्हें भी एक बार तो कम से कम आजमाना चाहता है .....और होता  अंततः वही है जो इस पुस्तक का अंत है -मोहभंग और स्थाई विछोह......आश्चर्य है उपन्यास पूरी दुनिया में कालेज छात्राओं और ३५ वर्ष से ऊपर की महिलाओं में खासकर लोकप्रिय हो रहा है .....शायद आधी दुनिया से मुझे इस पुस्तक की सिफारिश इसलिए ही प्राप्त हुयी हो ....आप से भी गुजारिश है कि बस इस उपन्यास के बारे में यह रिपोर्ट ही काफी होनी चाहिए ....डोंट वेस्ट योर टाईम एंड रिसोर्सेज ......!


मंगलवार, 13 सितंबर 2011

आया है लौट के कोई शामे अवध गुजारकर!

बनारस की सुबह और अवध (लखनऊ) की शाम  का अलौकिक अहसास है.कल शाम तक लखनऊ में था ...एक पूरी शाम और एक अधूरी शाम वहां गुजारने को मिली .....आपसे शामे अवध के चंद अहसासात साझा करने हैं ....परसों की शाम तो सचमुच यादगार थी ....मैं बनारस के उस नवाबी संकुल में था जो वहां की पारम्परिक संस्कृति का  महक  लिए हुए थी .....एक ओर ललित कला अकादमी ,सामने राष्ट्रीय कत्थक संस्थान और इसके विपरीत दिशा में भारतेंदु नाट्य अकादमी और बिलकुल बीच में आज का समारोह स्थल  -जयशंकर प्रसाद सभागार जो  ठसाठस भरा हुआ था ....अवसर था रवीन्द्र प्रभात जी की नव प्रकाशित पुस्तक 'हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास' के विमोचन का जिसमें मैं भी आमंत्रित था .....कार्य्रक्रम अपने उरूज पर था और मैं कार्यक्रम और  तकरीरों की माईक्रोब्लागिंग फेसबुक पर निरंतर करता जा रहा था .....मैंने जब लिखा की हिन्दी ब्लागिंग के इतिहास पुस्तक का अभी अभी विमोचन प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार मुद्राराक्षस द्वारा किया गया तो अभिषेक मिश्र ने दन से टिपियाया कि क्या हिन्दी ब्लागिंग इतनी पुरानी हो गयी है कि उसका इतिहास लेखन भी शुरू हो गया?

जाने माने साहित्यकार मुद्रा राक्षस द्वारा 'हिन्दी ब्लागिंग के इतिहास' का विमोचन 
सवाल सहज था ...मैंने जवाब दिया-इतिहास का मतलब दिक्कालीय परिवेश और घटनाओं के  दस्तावेजीकरण का है और इसके लिए इंतज़ार किया जाना प्रमाणिकता को बनाए रखने के लिहाज से जरुरी नहीं है ...इतिहास  द्रष्टा द्वारा सीधे खुद लिखने के बजाय जब भी कालान्तर में लोगों द्वारा बिखरे हुए साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर लिखा जाता है प्रमाणिकता के साथ समझौता करना पड़ता है .....अकबर महान थे यह हमें पाठ्य पुस्तकें और दरबारी इतिहास से मालूम होता है मगर लोकगीतों में आज भी अकबर को अत्याचारी बताया गया है ....कहना केवल यह है कि इतिहास का वस्तुनिष्ठ प्रस्तुतीकरण उसके समकालीन दस्तावेजीकरण से ज्यादा सटीक तरीके से हो सकता है ..अभिषेक जी बड़े जल्दी ही इस गूढ़ वाणी को शिरोधार्य कर लिए ..इसलिए फेसबुक पर आगे बहस रुक गयी मगर सभागार का कार्यक्रम चलता रहा ....रवीन्द्र प्रभात जी की मेधावी पुत्री द्वय ने बहुत ही सुन्दर पावर प्वाईंट प्रेजेंटेशन के जरिये हिन्दी ब्लागिंग के अद्यावधि इतिहास की मनोरम झांकी मय मील के पत्थरों सहित प्रस्तुत की .....पूरा सभागार मंत्रमुग्ध सा था ...पिन ड्राप वाला सन्नाटा ...और प्रस्तुति के ख़त्म होते हुए ही भरपूर करतल ध्वनि ....
निश्चय ही एक अविस्मरणीय  अनुभव था .....इसी अवसर पर एक विचार मंथन सत्र भी वैकल्पिक नव -मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर था और साहित्य के छ्टे हुए चिन्तक उस पर विचार विमर्श कर रहे थे-मुझे आश्चर्य यह लगा कि ब्लागिंग पर बोलने के लिए वहां सब खाटी के साहित्यकार-प्रिंट मीडिया के धुरंधर ,साहित्यकार आलोचक   तो थे मगर  ब्लॉगर न थे  -शायद इतिहास लेखन ने रवीन्द्र जी को यह शिद्दत से अहसास दिला दिया हो कि ब्लॉगर अभी साहित्यकार के सामने बौना है -और शायद यह सच भी है ...मुझे भी जब आमंत्रण दिया गया था तो यह भी बता दिया गया था कि मुझे वहां बोलना नहीं है ....मैं वैसे भी इन मामलों में वीतराग ही रहता हूँ मगर तब मुझे यह खटका भी था फिर मुझे आमंत्रित करने का मकसद क्या है ....क्या केवल मित्रगत सदाशयता?
जो भी हो मैं पिछले वर्ष दिल्ली के परिकल्पना सम्मान में नहीं जा पाया था तो कुछ नैतिक आग्रह भी बलवती हो उठा था कार्यक्रम में पहुंचने का और फिर रवीन्द्र प्रभात जी का निरंतर अनुरोध कि मैं अवसर और सभागार की शोभा बढाऊँ.....मगर ब्लागिंग पर आयोजित इस कार्यक्रम में नामचीन साहित्यकारों ,आलोचकों के जमावड़े में मैं अपनी लघुता का अहसास शिद्दत से करता रहा ....वक्ताओं के क्रम में अयाचित इंट्री दिलाने के लिए रवीन्द्र जी एक बार मेरे पास आकर धीरे से फुसफुसाए भी कि संक्षिप्त में कुछ बोलना हो तो बोलिए ..मगर तब तक मैं लघुता के बोध से इतना धराशायी हो चुका था कि सर आवर्ती दोलन  की मुद्रा में हिल उठा ...हिम्मत ही नहीं बची थी ...हालत यह थी कि सभागार की शोभा बढ़ाने की कौन कहे मैं अब खुद सभागार की गुरुता से शोभित हो रहा था -लोगों ने बड़ी विचारणीय बाते कहीं .....भ्रष्टाचार की आवाज बुलंद करने में,दलित और सताए लोगों की पीड़ा मुखरित करने में वैकल्पिक मीडिया की भूमिका रेखांकित की गयी ....अंतर्जालीय जानकारियों की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता का मुद्दा भी उठाया गया ....और सम्पादन और अंकुश की तरफदारी भी की गयी और वह भी एक सम्मानित सम्पादक द्वारा जो ब्लागिंग में भी सक्रिय रहे हैं ...

 कुल मिलाकर एक यादगार अनुभव रहा .. हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास  बकौल रवीन्द्र प्रभात पर उस रात ही एक सरसरी नजर डाली -निश्चय ही इस ऐतिहासिक कृति के लिए घोर परिश्रम किया गया है ...रवीन्द्र जी साधुवाद के पात्र हैं ..उन्होंने इतिहास लेखन  के साथ ही लखनऊ के पारम्परिक मीडिया में ब्लागिंग का परचम फहरा दिया है ..हम भी उन्ही के झंडे तले ही हैं -पुस्तक की मैंने पहले से  ही एडवांस बुकिंग करा रखी थी ताकि विमोचन के बाद एक प्रति हासिल करने में किसी तरह की असहजता न महसूस हो ....किसी की चिरौरी विनती न करनी पड़े ......पुस्तक पर आगे लिखूंगा ..अभी तक के लिए केवल इतना ही कि पुस्तक में तथ्यों का समावेश करने में लेखक की पारखी दृष्टि से कई सूक्ष्म प्रेक्षण भी छूटा नहीं हैं -पढ़ते वक्त यह आनन्दित करती है और ज्ञानवर्धन तो करती ही है ....हिन्दी ब्लागिंग का यह समकालीन दस्तावेजीकरण एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान है और वह भी एक एकल योगदान ........एक काबिले तारीफ़ काम!
रवीन्द्र प्रभात जी बहुत बहुत बधाई! 
आयोजन के सह आयोजक रणधीर  सिंह सुमन को विशेष आभार जिन्होंने मेरा बहुत ख़याल रखा और मुझे बहुत बढियां  नाश्ता कराया ..
नवाबों के शहर में मेरे दूसरे दिन की आपबीती अभी बाकी है ......


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