अल्पना वर्मा जी ने मुझसे मेरी इस पोस्ट पर आग्रह किया था कि मैं खुद कर्मनाशा नदी को देखकर आने के बाद एक रिपोर्ट यहाँ डालूँ . वह संयोग कल पूरा हुआ और एक बार फिर मैं कर्मनाशा प्रसंग पर आपसे कुछ तफसील से साझा करना चाहता हूँ . सबसे पहले नदी के बारे में कुछ प्राथमिक बातें! कर्मनाशा नदी का उद्गम बिहार के कैमूर जिले के अधौरा व भगवानपुर स्थित कैमूर की पहाड़ी से हुआ है। यह बक्सर के समीप गंगा नदी में विलीन हो जाती है।मगर अपने विस्तार में यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ,चंदौली और सोनभद्र जनपदों से गुजरती है और कुल 192 किमी का रास्ता तय करती है .इस नदी के बारे में जो बात हैरान करती है वह है इसका अभिशप्त होना ,अपवित्र होना . जबकि यह पतित पावनी गंगा की ही एक सहायिका है . कहाँ गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति की मान्यता और कहाँ इस नदी के स्पर्श मात्र से संचित पुण्यों के स्खलित हो जाने का भय आज भी जन समुदाय में व्याप्त है .
अब कर्मनाशा को लेकर एक पौराणिक आख्यान भी आपको बताता चलूँ . सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता व सूर्यवंशी राजा त्रिवंधन के पुत्र सत्यव्रत, जो त्रिशंकु के रूप में विख्यात हुए उन्हीं के लार से यह नदी अवतरित हुयी। वर्णन है कि त्रिशंकु अपने कुल गुरु वसिष्ठ के यहाँ गये और उनसे सशरीर स्वर्ग लोक में भेजने का आग्रह किया। पर, वशिष्ठ ने यह कहते हुए उनकी इच्छा को ठुकरा दिया कि स्वर्गलोक में सदेह जाना सनातनी नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद वे वशिष्ठ पुत्रों के यहाँ पहुंचे और उनसे भी अपनी इच्छा जताई। लेकिन, वे भी गुरु वचन के अवज्ञा न करने की बात कहते हुए उन्हें चंडाल होने का शाप दे दिया। सो, वह वशिष्ठ के द्रोही महर्षि विश्वामित्र के यहाँ चले गये और उन्हें उकसाया। विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। इस पर देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया और देवराज इन्द्र ने त्रिशंकु को नीचे धक्का दे दिया । त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए धरती पर गिरने लगे। विश्वामित्र ने ठहरो बोलकर पुन: उन्हें स्वर्गलोक भेजने का प्रयत्न किया। देवताओं व विश्वामित्र के तप के द्वंद में सिर नीचे किये त्रिशंकु आसमान में ही लटक गये। जिनके मुंह से लार टपकने लगी और उसी से एक नदी का उदय हुआ। कालांतर में यही कर्मनाशा के नाम से जानी गयी। कर्मनाशा शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य कृष्णानंद जी 'शास्त्रीजी' का कहना है कि जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मो के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है, वह कर्मनाशा कहलाती है।( सन्दर्भ:भारत कोश)..
गंगा के किनारे का वासी होकर जब मुझे यहाँ सोनभद्र आना हुआ तभी कर्मनाशा से साक्षात्कार का भी संयोग प्रबल हो गया था .यहाँ कर्मनाशा पर ही नगवां विकास खंड में एक बड़ा बाँध बना दिया गया है जो अत्यंत घने दुर्गम वन क्षेत्र में है और नक्सली प्रभावित होने से वहां अधिकारियों का आना जाना कम ही रहता है .यद्यपि विगत कई वर्षों से यहाँ कोई वारदात नहीं हुयी है और जंगल क्षेत्र में ही सेन्ट्रल पैरा मिलिट्री फ़ोर्स की एक पूरी छावनी स्थायी तौर पर स्थापित है मगर फिर भी वहां राबर्ट्सगंज मुख्यालय से अधिकारियों कर्मचारियों का आना जाना कम ही है . राबर्ट्सगंज से बाँध चालीस किमी पर है . कल सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता श्री के बी सिंह के सौजन्य से मुझे कर्मनाशा पर बने इस बाँध को देखने का सौभाग्य मिल ही गया .कहते हैं जब इसका निर्माण हुआ था तो यहाँ के घने जंगल में बाघ शेर तक प्रायः दिख जाते थे और दीगर वन्य जीवों की तो भरमार थी .ड्राइवर ने हमें वह जगहं दिखाई जहाँ १5 वर्षों पहले सीधे मार्ग पर ही उसने शेर को आराम फरमाते देखा था .खैर .....हम बाँध टाप पर पहुंचे और अवरूद्ध कर्मनाशा का विशाल जलाशय देखा . अधिशासी अभियंता श्री सिंह ने बताया कि इस बाँध के डाउन स्ट्रीम से निकली नहरों से हजारों किसानों की खेती आज हरी भरी है और उनकी आजीविका चलती है .
अब कर्मनाशा को लेकर एक पौराणिक आख्यान भी आपको बताता चलूँ . सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता व सूर्यवंशी राजा त्रिवंधन के पुत्र सत्यव्रत, जो त्रिशंकु के रूप में विख्यात हुए उन्हीं के लार से यह नदी अवतरित हुयी। वर्णन है कि त्रिशंकु अपने कुल गुरु वसिष्ठ के यहाँ गये और उनसे सशरीर स्वर्ग लोक में भेजने का आग्रह किया। पर, वशिष्ठ ने यह कहते हुए उनकी इच्छा को ठुकरा दिया कि स्वर्गलोक में सदेह जाना सनातनी नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद वे वशिष्ठ पुत्रों के यहाँ पहुंचे और उनसे भी अपनी इच्छा जताई। लेकिन, वे भी गुरु वचन के अवज्ञा न करने की बात कहते हुए उन्हें चंडाल होने का शाप दे दिया। सो, वह वशिष्ठ के द्रोही महर्षि विश्वामित्र के यहाँ चले गये और उन्हें उकसाया। विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। इस पर देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया और देवराज इन्द्र ने त्रिशंकु को नीचे धक्का दे दिया । त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए धरती पर गिरने लगे। विश्वामित्र ने ठहरो बोलकर पुन: उन्हें स्वर्गलोक भेजने का प्रयत्न किया। देवताओं व विश्वामित्र के तप के द्वंद में सिर नीचे किये त्रिशंकु आसमान में ही लटक गये। जिनके मुंह से लार टपकने लगी और उसी से एक नदी का उदय हुआ। कालांतर में यही कर्मनाशा के नाम से जानी गयी। कर्मनाशा शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य कृष्णानंद जी 'शास्त्रीजी' का कहना है कि जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मो के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है, वह कर्मनाशा कहलाती है।( सन्दर्भ:भारत कोश)..
कर्मनाशा
गंगा के किनारे का वासी होकर जब मुझे यहाँ सोनभद्र आना हुआ तभी कर्मनाशा से साक्षात्कार का भी संयोग प्रबल हो गया था .यहाँ कर्मनाशा पर ही नगवां विकास खंड में एक बड़ा बाँध बना दिया गया है जो अत्यंत घने दुर्गम वन क्षेत्र में है और नक्सली प्रभावित होने से वहां अधिकारियों का आना जाना कम ही रहता है .यद्यपि विगत कई वर्षों से यहाँ कोई वारदात नहीं हुयी है और जंगल क्षेत्र में ही सेन्ट्रल पैरा मिलिट्री फ़ोर्स की एक पूरी छावनी स्थायी तौर पर स्थापित है मगर फिर भी वहां राबर्ट्सगंज मुख्यालय से अधिकारियों कर्मचारियों का आना जाना कम ही है . राबर्ट्सगंज से बाँध चालीस किमी पर है . कल सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता श्री के बी सिंह के सौजन्य से मुझे कर्मनाशा पर बने इस बाँध को देखने का सौभाग्य मिल ही गया .कहते हैं जब इसका निर्माण हुआ था तो यहाँ के घने जंगल में बाघ शेर तक प्रायः दिख जाते थे और दीगर वन्य जीवों की तो भरमार थी .ड्राइवर ने हमें वह जगहं दिखाई जहाँ १5 वर्षों पहले सीधे मार्ग पर ही उसने शेर को आराम फरमाते देखा था .खैर .....हम बाँध टाप पर पहुंचे और अवरूद्ध कर्मनाशा का विशाल जलाशय देखा . अधिशासी अभियंता श्री सिंह ने बताया कि इस बाँध के डाउन स्ट्रीम से निकली नहरों से हजारों किसानों की खेती आज हरी भरी है और उनकी आजीविका चलती है .
नगवां में कर्मनाशा पर बाँध
फिर यह नदी कैसे अपवित्र हुई? और ऊपर वर्णित आख्यान के पीछे का यथार्थ क्या है? मैं इसी का उत्तर पाने को व्यग्र रहा हूँ . इसी सिलसिले में कर्मनाशा ब्लॉग के लेखक सिद्धेश्वर सिंह जी से बात भी हुयी थी और उनका एक लेख सृजनगाथा पर मुझे मिला। इसमें उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार शिवप्रसाद सिंह की लम्बी कहानी कर्मनाशा की हार का भी जिक्र किया है . सिद्धेश्वर सिंह जी के बचपन का एक अनुभव है -"मल्लाह को उतराई देने के लिये अक्सर पिताजी मुझे दो चवन्नियां इस हिदायत के साथ पकड़ा दिया करते थे कि इन्हें पानी में नहीं डालना है।क्यों? पूछने की हिम्मत तो नहीं होती थी लेकिन बालमन में यह सवाल तो उठता ही था कि जब हम गाजीपुर जाते वक्त गंगाजी में सिक्के प्रवाहित करते हैं तो कर्मनाशा में क्यों नहीं? हां, एक सवाल यह भी कौंधता था कि गंगाजी की तर्ज पर कर्मनाशाजी कहने की कोशिश करने से डांट क्यों पड़ती है?" यह एक दृष्टांत ही काफी है यह बताने के लिए कि पौराणिक आख्यान आज भी जन मानस को कितना प्रभावित किये हुए हैं। आज भी बहुत से सनातनी इस नदी में स्नान नहीं करते . मेरी संकल्पना थी कि इसके पानी में हो सकता है कुछ विकारकारी प्रभाव हो और इसलिए विज्ञ पुरखो ने आख्यान की रचना कर आम कार्य व्यवहार के लिए इसे प्रतिबंधित किया हो .मगर मुझे अपनी संकल्पना की पुष्टि के पक्ष में अभी तक तो प्रमाण नहीं मिले हैं . फिर इस नदी के अभिशप्त होने का कारण?
बाँध से बना विशाल जलाशय
ऐसा लगता है कि मगध में जब बौद्धों का आधिपत्य हुआ और उन्हें राजाश्रय मिला तो सनातनियों की शामत आ गयी . वैदिक ब्राह्मणों को उपेक्षित ही नहीं निर्वासित भी होना पड़ा होगा .बस प्रतिशोध की एक भाव भूमि तैयार हुयी होगी। लिहाजा गंगा के नित महिमा मंडन के साथ ही कर्मनाशा (जो निश्चय ही इसका मूल नाम नहीं रहा होगा ) का अवगुण वर्णन आरम्भ हुआ होगा क्योंकि कर्मनाशा को पार करने के बाद ही बौद्धों का प्रदेश प्रारंभ हो जाता था।कर्मनाशा अब पतित बन गयी थीं .गया आदि क्षेत्र आज भी प्रेत कर्म पिंड दान आदि के लिए ही घोषित बने हुए हैं .तो यह एक ऐसी घनघोर वैचारिक लड़ाई थी जिसकी भारी कीमत एक नदी को अपनी ख्याति देकर चुकानी पडी . कितना क्षोभजनक है यह? बिचारी कर्मनाशा!







