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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

बिचारी कर्मनाशा!

अल्पना वर्मा जी ने मुझसे मेरी इस पोस्ट पर आग्रह किया था कि मैं खुद कर्मनाशा नदी को देखकर आने के बाद एक रिपोर्ट यहाँ डालूँ . वह संयोग कल पूरा हुआ और एक बार फिर मैं कर्मनाशा प्रसंग पर आपसे कुछ तफसील से साझा करना चाहता हूँ . सबसे पहले नदी के बारे में कुछ प्राथमिक बातें! कर्मनाशा नदी का उद्गम बिहार के कैमूर जिले के अधौरा व भगवानपुर स्थित कैमूर की पहाड़ी से हुआ है। यह  बक्सर के समीप गंगा नदी में विलीन हो जाती है।मगर अपने विस्तार में यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ,चंदौली और सोनभद्र जनपदों से गुजरती है और कुल 192 किमी का रास्ता तय करती है .इस नदी के बारे में जो बात हैरान करती है वह है इसका अभिशप्त होना ,अपवित्र होना . जबकि यह पतित पावनी गंगा की ही एक सहायिका है . कहाँ गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति की मान्यता और कहाँ इस नदी के स्पर्श मात्र से संचित पुण्यों के  स्खलित हो जाने का भय आज भी जन समुदाय में व्याप्त है .

अब कर्मनाशा को लेकर एक पौराणिक आख्यान भी आपको बताता चलूँ . सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता व सूर्यवंशी राजा त्रिवंधन के पुत्र सत्यव्रत, जो त्रिशंकु के रूप में विख्यात हुए उन्हीं के लार से यह नदी अवतरित हुयी। वर्णन है कि त्रिशंकु अपने कुल गुरु वसिष्ठ के यहाँ गये और उनसे सशरीर स्वर्ग लोक में भेजने का आग्रह किया। पर, वशिष्ठ ने यह कहते हुए उनकी इच्छा को ठुकरा दिया कि स्वर्गलोक में सदेह जाना सनातनी नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद वे वशिष्ठ पुत्रों के यहाँ पहुंचे और उनसे भी अपनी इच्छा जताई। लेकिन, वे भी गुरु वचन के अवज्ञा न करने की बात कहते हुए उन्हें चंडाल होने का शाप दे दिया। सो, वह वशिष्ठ के द्रोही महर्षि विश्वामित्र के यहाँ चले गये और उन्हें उकसाया।  विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। इस पर देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया और देवराज इन्द्र ने त्रिशंकु को नीचे धक्का दे दिया । त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए धरती पर गिरने लगे। विश्वामित्र ने ठहरो बोलकर पुन: उन्हें स्वर्गलोक भेजने का प्रयत्‍‌न किया। देवताओं व विश्वामित्र के तप के द्वंद में सिर नीचे किये त्रिशंकु आसमान में ही लटक गये। जिनके मुंह से लार टपकने लगी और उसी से एक नदी का उदय हुआ। कालांतर में  यही कर्मनाशा के नाम से जानी गयी। कर्मनाशा शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य कृष्णानंद जी 'शास्त्रीजी' का कहना है  कि जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मो के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है, वह कर्मनाशा कहलाती है।( सन्दर्भ:भारत कोश)..

 कर्मनाशा

गंगा के किनारे का वासी होकर जब मुझे यहाँ सोनभद्र आना हुआ तभी कर्मनाशा से साक्षात्कार का भी संयोग प्रबल हो गया था .यहाँ कर्मनाशा पर ही नगवां विकास खंड में एक बड़ा बाँध बना दिया गया है जो अत्यंत घने दुर्गम वन क्षेत्र में है और नक्सली प्रभावित होने से वहां अधिकारियों का आना जाना कम ही रहता है .यद्यपि विगत कई वर्षों से यहाँ कोई वारदात नहीं हुयी है और जंगल क्षेत्र में ही सेन्ट्रल पैरा मिलिट्री फ़ोर्स की एक पूरी छावनी  स्थायी तौर पर स्थापित  है मगर फिर भी वहां राबर्ट्सगंज मुख्यालय से अधिकारियों कर्मचारियों का आना जाना कम ही है . राबर्ट्सगंज से बाँध चालीस किमी पर है . कल सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता श्री के बी सिंह के सौजन्य से मुझे कर्मनाशा पर बने इस बाँध को देखने का सौभाग्य मिल ही गया .कहते हैं जब इसका निर्माण हुआ था तो यहाँ के घने जंगल में बाघ शेर तक प्रायः दिख जाते थे और दीगर वन्य जीवों की तो भरमार थी .ड्राइवर ने हमें वह जगहं दिखाई जहाँ १5 वर्षों पहले सीधे मार्ग पर ही उसने शेर को आराम फरमाते देखा था .खैर .....हम बाँध टाप पर पहुंचे और अवरूद्ध कर्मनाशा का विशाल जलाशय देखा . अधिशासी अभियंता श्री सिंह ने बताया कि इस बाँध के डाउन स्ट्रीम से निकली नहरों से हजारों किसानों की खेती आज हरी भरी है और उनकी आजीविका चलती है .
 नगवां में  कर्मनाशा पर बाँध

फिर यह नदी कैसे अपवित्र हुई? और ऊपर वर्णित आख्यान के पीछे का यथार्थ क्या है? मैं इसी का उत्तर पाने को व्यग्र रहा हूँ . इसी सिलसिले में कर्मनाशा ब्लॉग के लेखक सिद्धेश्वर सिंह जी से बात भी हुयी थी और उनका एक लेख  सृजनगाथा पर मुझे मिला। इसमें उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार शिवप्रसाद सिंह की लम्बी कहानी कर्मनाशा की हार का भी जिक्र किया है . सिद्धेश्वर सिंह जी के बचपन का एक अनुभव है -"मल्लाह को उतराई देने के लिये अक्सर पिताजी मुझे दो चवन्नियां इस हिदायत के साथ पकड़ा दिया करते थे कि इन्हें पानी में नहीं डालना है।क्यों? पूछने की हिम्मत तो नहीं होती थी लेकिन बालमन में यह सवाल  तो उठता ही था कि जब हम गाजीपुर जाते वक्त गंगाजी में सिक्के प्रवाहित करते हैं तो कर्मनाशा में क्यों नहीं? हां, एक सवाल यह भी कौंधता था कि गंगाजी की तर्ज पर कर्मनाशाजी कहने की कोशिश करने से डांट क्यों पड़ती है?" यह एक दृष्टांत ही काफी है यह बताने के लिए कि पौराणिक आख्यान आज भी जन मानस को कितना प्रभावित किये हुए हैं। आज भी बहुत से सनातनी इस नदी में स्नान नहीं करते . मेरी संकल्पना थी कि इसके पानी में हो सकता है कुछ विकारकारी प्रभाव हो और इसलिए विज्ञ पुरखो ने आख्यान की रचना कर  आम कार्य व्यवहार के लिए  इसे  प्रतिबंधित किया हो .मगर मुझे अपनी संकल्पना की पुष्टि के पक्ष में अभी तक तो  प्रमाण नहीं मिले हैं . फिर इस नदी के अभिशप्त होने का कारण?
बाँध से  बना विशाल जलाशय

ऐसा लगता है कि मगध में जब बौद्धों का आधिपत्य हुआ और उन्हें राजाश्रय मिला तो सनातनियों की शामत आ गयी . वैदिक ब्राह्मणों को उपेक्षित ही नहीं निर्वासित भी होना पड़ा होगा .बस प्रतिशोध की एक भाव भूमि तैयार हुयी होगी। लिहाजा गंगा के नित महिमा मंडन के साथ ही कर्मनाशा (जो निश्चय ही इसका मूल नाम नहीं रहा होगा ) का अवगुण वर्णन आरम्भ हुआ होगा क्योंकि कर्मनाशा को पार करने के बाद ही बौद्धों का प्रदेश प्रारंभ हो जाता था।कर्मनाशा अब पतित बन गयी थीं .गया आदि क्षेत्र आज भी प्रेत कर्म पिंड दान आदि के लिए ही घोषित बने हुए हैं .तो यह एक ऐसी घनघोर वैचारिक लड़ाई थी जिसकी भारी कीमत एक नदी को अपनी ख्याति देकर चुकानी पडी . कितना क्षोभजनक है यह? बिचारी कर्मनाशा!

रविवार, 7 अप्रैल 2013

हेरिटेज पर्यटन का एक दिनी आनंद -आईये साझा कीजिये!(सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-4)


इन दिनों बच्चे यहाँ राबर्ट्सगंज आये हुए हैं -बंगलूरु से कौस्तुभ और दिल्ली से प्रियेषा तो हम दूनो  परानी के एकाकी जीवन में थोडा स्पंदन हुआ  -इस स्पंदन का परिणाम यह रहा कि हमने एक दिन प्रकृति की गोंद में  गुलजार करने का कार्यक्रम बना लिया -मैंने सोचा एक पंथ दो काज हो जाएगा -सोनभद्र के पुनरान्वेषण की मेरी श्रृंखला के लिए एक और पोस्ट का जुगाड़ हो जाएगा  -यहाँ के कई स्थलों पर जाने को लेकर मंथन होता रहा मगर अंत में महुवरिया जाने को लेकर एका हुयी जो आज भी महुआ के पेड़ों से आच्छादित एक सघन वन क्षेत्र है .पता नहीं आप लोगों के साथ ऐसा होता है कि नहीं मगर मेरे परिवार में सहमति मुश्किल से ही बन पाती है -यह बच्चों को अनावश्यक स्वतंत्रता देने का एक  परिणाम लगता  है  :-( . सबमें सहमति बनने में ही समय और मानसिक ऊर्जा दोनों का काफी अपव्यय हो जाता है .बहरहाल तय पाया गया कि हम महुवरिया स्थित  कैमूर वन्य जीवन अभयारण्य को आज गुलजार करके रहेगें . स्थानीय वन विभाग की मदद ली गयी और उनके एक  स्टाफ को लेकर हम आज भी दुरूह से जंगली क्षेत्र में कृष्ण मृग घाटी की ओर  बढ़ चले . 
 साभार: वेबसायिट -पूर्वी उत्तर प्रदेश पर्यटन ( हम इस दृश्य की फोटोग्राफी कर पाने में कामयाब नहीं हुए ) 

राबर्ट्सगंज से घोरावल मार्ग पर 15 किमी चलकर शाहगंज बाज़ार है जहाँ से बाईं और वनाच्छादित कैमूर पर्वत श्रृंखला  है -सुबह पौने सात बजे चलकर हम साढ़े सात बजे तक जंगल में प्रवेश कर चुके थे -मुख्य आकर्षण था जल्दी से जल्दी कृष्ण मृगों की एक झलक देखना जो बढ़ती गर्मी के साथ शिला खण्डों की  ओट लेने वाली थी और वहां  पहुँच वे फिर नहीं दिखते  .ट्रैवेल एजेंसी  ने इस वन्य पर्यटन के लिए बोलेरो के साथ एक दक्ष ड्राइवर हमें दिया था जो  दुर्गम पहाडी स्थलों पर भी आराम से ऐसे ड्राइव कर रहा था की हमें हैरत हो रही थी -अचानक ऐसा लगता कि सामने तो कोई रास्ता ही नहीं है -मगर वन विभाग का गाईड झाड़ियों के बीच से आगे की राह दिखा देता .करीब 45 मिनट तक चलते रहने के बाद भी एक भी काला मृग नहीं दिखा .हम निराश होते जा रहे थे .

 मृगों को देखने के लिए दूरबीन मुफीद रही 

तभी वनकर्मी ने अचानक वाहन रुकवाई और हमें तुरंत नीचे उतरने को कहा -हिरन हिरन के उच्चारण से हम फ़ौरन गाडी से उतर पड़े -वह दूर के एक उपत्यका की ओर  इशारा कर देखने को कह रहा था -मुझे कुछ नहीं दिखा -मैं कहाँ कहाँ कहता रहा और वह बार बार उंगली का इशारा करते हुए वहां वहां की रट लगाए जा रहा था -बेटे ने पहले देखा और कहा हाँ हाँ है तो वो देखिये . मुझे नहीं दिखा .लगा जैसे आसमान में अभी के धूमकेतु देखने के असफल प्रयास की पुनरावृत्ति सी हो रही हो . मगर यहाँ तो पूरा जमीनी मामला था ...तब तक बेटी ने और फिर पत्नी ने भी देखने की हामी भर ली -मैंने अविश्वास से पत्नी के चेहरे की ओर देखा -वहां हर्ष का उफान देखकर लगा कि वे मृगों को सचमुच देख चुकी थीं -अरे अरे वे तो गिनती भी करती जा  रही थीं -कुल अट्ठारह! अब मुझे एक बहुत नागवार  लगने वाला पराजय बोध  सा हो आया -हुंह! मैंने भी आख्नें उसी ओर गड़ा दीं जिस ओर कई जोड़ी आँखें पहले से उठी हुयी थीं -और लो मुझे भी दिख गया-मगर  बैकग्राउंड में वे ऐसे छुपे से थे कि बिना अभ्यस्त आँखों के उनका दिखना मुश्किल ही था और वे बड़े छोटे भी लग रहे थे .....मैंने दूरबीन की मदद ली जिससे आसमान और परिवेश की ब्यूटी निहारने में अब तक की मेरी प्रवीणता थी  -अब पहली बार वन्य जीवों पर दूरबीन साध रहा था .
 पुष्पित पलाश के  बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं-साथ में डेजी भी ! 

वाह! अद्भुत !! नयनाभिराम !!! यह काले मृगों का एक झुण्ड था -मादाएं ज्यादा थी मगर दो नर थे जो बड़े ग्रेसफुल और मोहक लग रहे थे -उनका काला पृष्ठ भाग और नीचे का सफ़ेद हिस्सा अद्भुत कंट्रास्ट सौन्दर्य प्रगट कर रहा था -उन्हें पता लग गया था कि वे निगरानी में हैं। काले मृग के नर की सींग भी बहुत मोहक होती है।  इन्हें अंग्रेजी में ब्लैक बक - एंटीलोप कहते हैं यानि इनकी सींग कभी नहीं गिरती जबकि हिरणों की सींग हर वर्ष गिर जाती है -हिरन (डीयर ) और एंटीलोप में यही बड़ा फर्क है। अब  मैंने देखना चाहा कि पत्नी की गणना सही थी या नहीं -कम से कम पराजित होने के अनुभव की भरपाई का एक मौका था मेरे पास -मैंने गिनकर उनकी संख्या शुद्ध की और कहा 18 नहीं कुल 19 मृग हैं -उनकी बतायी संख्या से एक ज्यादा . उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया तो मुझे संतोष हुआ ,वैसे दूरबीन तो मेरे ही पास थी और उन्हें फिर से गिनने का मौका मैं देने की मूड में नहीं था . उस दल का नेतृत्व मादा कर रही थी -अचानक ही सबने तेज कुलांचे भरी और ये जा वो जा -जिधर से हम आये थे उधर ही पूरा दल लोप हो गया था ! हम अनिवर्चनीय आनन्द के मोड में थे -यहाँ रक्त पुष्पित पलाश के पेड़ों के बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं -एक मकसद तो पूरा हो गया था . अब क्या? ..  कुछ इसी  मुद्रा में मैंने वन पथ प्रदर्शक की ओर देखा .
                                       गहरी खाईं के छोर पर गुफा चित्रों का रोमांचक स्थल
वह बहुत मितभाषी था और स्थानीय डायिलेक्ट में जो बोल रहा था उसे भी समझने में काफी मशक्कत हो रही थी -जैसे वह भालू को भाल कह रहा था -वह जब भी कुछ कहता हम एक दूसरे के चेहरे को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लग जाते . उसका इशारा अब फिर से गाडी में बैठने के लिए था . अब हम लखनिया गुफा पाईंट पर पहुंचे जहाँ से सैकड़ों फीट नीचे की सपाट और 90 डिग्री की सीधी ढाल पर सोन नदी का विहंगम दृश्य था ....रहस्यानुभूति और रोमांच का भाव उत्पन्न करते इस दृश्य को हम मंत्रमुग्ध से निहारते रहे। हमने केव पेंटिंग्स के बारे में पूछा तो वनकर्मी ने उस सपाट सी बहुत खतरनाक खाईं के किनारे किनारे एक बड़ी सी छतरीनुमा चट्टान के नीचे जाने को कहा -मेरी तो हिम्मत नहीं हुयी -भारी शरीर लिए काफी झुक  कर जाना और वह भी खाईं के आख़िरी किनारे से ..न बाबा न ...जान है तो जहांन है -मगर बच्चे तो देखते देखते आँखों से ओझल भी हो गए और उनके ममत्व में माँ भी कहाँ रुकी -सब आँखों से ओझल बस मैं चिल्लाता रहा संभल के संभल के ....
  बूझो तो जाने! कौन सा जानवर बनाया था उस आदि चित्रकार ने  
उन्हें  गुफा चित्रकारी का आनन्द  लेते छोड़ हमारे पथ प्रदर्शक मुझे लेने लौट आये -मैंने उससे यह तहकीकात की कि पहले कभी भी कोई कैजुअलिटी आदि तो नहीं हुयी -कोई नीचे तो नहीं  गिरा -उसके यह बताने पर कि ऐसी कोई घटना कभी नहीं घटी मैं भी हिम्मत बांध बमुश्किल उंकरु -मुंकरु गुफा में प्रवेश तो कर गया -सामने ही दीवाल पर आदि मानवों द्वारा संभवतः पलाश के फूलों और मिट्टी से बनाएं रंग से भित्ति पर तरह तरह के चित्र उकेरे गए थे- जगली जानवरों के अनेक चित्र थे -बच्चे उनकी फोटो लेने में मशगूल थे -उनकी आनन्दित माँ किसी भी  खतरे से अनभिज्ञ रोमांचित दिख रही थीं  और मैं अपनी और सभी की सकुशल वापसी को लेकर व्यग्र था -आम भारतीय तनिक भी ऐडवेंचर प्रेमी नहीं है -मैं क्या खुद एक प्रमाण नहीं हूँ? बहरहाल धडकते दिल से मैं बाहर आया और फिर एक एक को चिल्ला चिल्ला कर वापस बुलाया -बेटे ने एक गुफा चित्र  फेसबुक पर लगाया है -आप बताईये कौन सा जानवर है -फेसबुक पर कई लाल बुझक्कड़ बूझ चुके हैं -मिजारिटी साही के पक्ष में हैं जबकि संतोष त्रिवेदी सूअर के पक्ष में हैं -आप भी तनिक बताईये -
अगला भाग अगली पोस्ट में !

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

अखंड प्रेम का एक खंडित प्रतीक - लोरिक पत्थर( सोनभद्र -एक पुनरान्वेषण यात्रा, 2 )

राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी पर एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर जिस पर वीर लोरिक पत्थर लिखा है यात्रियों  -पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर सहज ही आकर्षित करता है। मुझे भी इसके बारे में जिज्ञासा हुयी . जो कुछ जानकारी मिली आपसे अति संक्षेप में साझा कर रहा हूँ क्योकि इस पत्थर से जुड़ा  आख्यान वस्तुतः हजारो पक्तियों की गाथा लोरिकी है जिसे यहाँ के लोक साहित्यकार डॉ अर्जुन दास केसरी ने अपनी पुरस्कृत कृति लोरिकायन में संग्रहीत किया है . उत्तर प्रदेश में आल्हा के साथ ही लोरिकी एक बहुत महत्वपूर्ण लोकगाथा है .कहते हैं संस्कृत की मशहूर कृति मृच्छ्कटिकम  का प्रेरणास्रोत लोरिकी (लोरिकायन) ही है। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने डिस्कवरी आफ इंडिया में लोरिकी का उल्लेख किया है।पश्चिमी विद्वानों में बेवर ,बरनाफ ,जार्ज ग्रियर्सन आदि ने भी लोरिकी पर काफी कुछ लिखा है।

लोरिक दरअसल एक लोकविश्रुत नायक हैं जो बहुत बलशाली और आम जन के हितैषी के रूप में इस क्षेत्र में विख्यात हैं . उनका जन्म बलिया जनपद के गऊरा गाँव में होना बताया गया है। उनके काल निर्धारण को लेकर बहुत विवाद है -कोई कोई विद्वान् उन्हें ईसा  के पूर्व का बताते हैं तो कुछ उन्हें मध्ययुगीन  मानते हैं . यह भी कहा जाता है लोरिक की वंशावली राजा भोज से मिलती जुलती है। लोरिकायन पवांरो का काव्य माना जाता है और पवारों के वंश में (1167-1106) ही राजा भोज हुए थे। बहरहाल लोरिक जाति  के अहीर (आभीर ) थे जो एक लड़ाकू जाति(आरकियोलोजिकल  सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट  ,खंड आठ ) रही है। 
जनश्रुतियों के नायक लोरिक की कथा से सोनभद्र के ही एक अगोरी(अघोरी?)  किले का गहरा सम्बन्ध है ,यह किला अपने भग्न रूप में आज भी मौजूद तो है मगर है बहुत प्राचीन और इसके प्रामाणिक इतिहास के बारे में कुछ जानकारी नहीं है ,यह भी ईसा पूर्व का है किन्तु दसवीं शती के आस पास  इसका पुनर्निर्माण खरवार और चन्देल राजाओं ने करवाया। अगोरी दुर्ग के  ही नृशंस अत्याचारी   राजा मोलागत से लोरिक का घोर युद्ध हुआ था . कहीं कहीं ऐसी भी जनश्रुति है कि लोरिक को तांत्रिक शक्तियाँ भी सिद्ध थीं और लोरिक ने अघोरी किले पर अपना वर्चस्व कायम किया . अपने समय का तपा हुआ ,अत्यंत क्रूर राजा मोलागत लोरिक द्वारा पराजित हुआ , और इस युद्ध का हेतु एक प्रेम कथा बनी थी -लोरिक और मंजरी (या चंदा? ) की प्रेम कथा।

अगोरी के राजा मोलागत के अधीन ही महरा नाम का अहीर रहता था . महरा की ही आख़िरी सातवीं संतान थी मंजरी जिस पर मोलागत की बुरी नजर पडी थी और वह उसे महल में ले जाने का दबाव डाल  रहा था। इसी दौरान उसके पिता महरा को लोरिक के बारे में जानकारी हुई और मंजरी की शादी लोरिक से तय कर दी गयी . लोरिक को पता था कि बिना मोलागत को पराजित किये वह मंजरी को विदा नहीं करा पायेगा। युद्ध की तैयारी के  साथ बलिया से बारात सोनभद्र के मौजूदा सोन(शोण)  नदी तट  तक आ गयी । राजा मोलागत ने तमाम उपाय किये कि बारात सोन को न पार कर सके ,किन्तु बारात नदी पार  कर अगोरी किले तक जा पहुँची ,भीषण युद्ध और रक्तपात हुआ -इतना खून बहा कि अगोरी से निलकने वाले नाले का नाम ही रुधिरा नाला पड़ गया और आज भी इसी नाम से जाना जाता है ,पास ही नर मुंडों का ढेर लग गया -आज भी नरगडवा नामक   पहाड़ इस जनश्रुति को जीवंत बनाता खडा है .कहीं  शोण (कालांतर का नामकरण सोन ) का नामकरण भी तो उसके इस युद्ध से रक्तिम हो जाने से तो नहीं हुआ? 
अघोरी किले का एक मौजूदा दृश्य 

मोलागत और उसकी सारी सेना और उसका अपार बलशाली इनराव्त हाथी भी मारा गया -इनरावत हाथी का वध लोरिक करता है और सोंन  नदी में उसके शव को फेंक देता है -आज भी हाथी का एक प्रतीक प्रस्तर किले के सामने सोंन  नदी में दिखता है। लोरिक मोलागत और उसके कई मित्र राजाओं से हुए युद्ध के  प्रतीक चिह्न किले के आस पास मौजूद है .जिसमें  राजा निर्मल की पत्नी जयकुंवर   का उसके पति के लोरिक द्वारा मारे जाने के उपरान्त  उसके  सिर  को लेकर सती होने के प्रसंग से जुड़ा एक बेर का पेड़ सतिया का बेर और युद्ध के दौरान ही बेहद  निराश मंजरी द्वारा कुचिला का फल (जहर ) खाने का उपक्रम करना और उसके हाथ से लोरिक का कुचिला का फल फेक देना और आज भी केवल  अगोरी के इर्द गिर्द ही कुचिला के पेड़ों का मिलना रोचकता लिए है। 

मंजरी की विदाई के बाद डोला मारकुंडी  पहाडी पर पहुँचाने  पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के  आपार बल को एक बार और देखने  के लिए  चुनौती देती है और कहती है कि वे अपने प्रिय हथियार  बिजुलिया खांड (तलवार नुमा हथियार) से एक विशाल  शिलाखंड को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें -लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए -यह खंडित शिला आज उसी अखंड प्रेम की  जीवंत कथा कहती प्रतीत होती है -मंजरी ने खंडित शिला को अपने मांग का  सिन्दूर भी लगाया।  यहाँ गोवर्द्धन पूजा और अन्य अवसरों पर मेला लगता है -लोग कहते हैं कि कुछ अवसरों पर शिला का सिन्दूर  चमकता है -मैं फिर देखने का प्रयास करूंगा और प्रत्यक्ष कारण भी जानने की चेष्टा करूँगा . जब मैंने फोटो लिया तो शाम हो रही थी और मुझे कथित सिंदूरी चमक का  स्थान नहीं दिखा , लौटते वक्त इस पोस्ट का शीर्षक सहसा कौंध गया -अखंड प्रेम का खंडित प्रतीक! 

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)


मुझे  निकाल के कहीं पछता  रहे हों  न  आप 
महफ़िल में  इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)
यह शेर आज तब याद आया जब इस नए स्थान - राबर्ट्सगंज में नेट से कनेक्ट होने पर मुझे सहसा ब्लागिंग की सुधि आयी . इतना लम्बा अंतराल पिछले पांच वर्षों में किन्ही दो  पोस्ट के बीच नहीं हुआ था . जब गत 21 नवम्बर को सारे तामझाम, सर सामान और एक अदद धर्मपत्नी तथा  एक विदेशी नस्ल की कुतिया -पाम-स्पिट्ज(डेजी के साथ यहाँ बनारस से सरे शाम पहुंचा तो अंतर्जाल से लगभग  कट चुका था ..हाँ मोबाईल से/ का एक गर्भनाल सम्बन्ध अवश्य बना था मगर वह नाकाफी था .....लगा किसी सूनसान जनहीन द्वीप पर आ पहुंचा हूँ . कटे होने और गैर जुड़ाव की यह अनुभूति नयी किस्म की थी ....और यह सिलसिला लम्बा चला .नए स्थान पर अनुकूलन और व्यवस्थित होने की प्राथमिकतायें कुछ ऐसी रहीं कि विलासितापूर्ण ब्लागिंग के लिए कई मौका नहीं मिला . आते ही तेल नून लकड़ी के नवीन संस्करणों -गैस कनेक्शन ,आर ओ ,इनवर्टर ,दूधवाले ,अखबारवाले ,महरी की जुगाड़/व्यवस्था फिर डिश  टीवी कनेक्शन , बैंक खाता आदि  में ऐसा जी हलकान रहा कि हम अपना ही नहीं कई अन्य  पसंदीदा ब्लॉग फिलहाल भूल गए और साथ ही कई ब्लागरों को भी  ....मजे की बात वे ब्लॉगर भी मुझे भूल गए -हाँ कुछ फेसबुकिये  मित्र जरुर सम्बन्धों के आशा दीप टिमटिमाये रहे ......और मुझे नेट कनेक्ट करने के  तरीके बताते रहे .....फिलहाल  रिलायंस नेट कनेक्ट डाटाकार्ड एक जगहं से उधारी पर ले यह पोस्ट लिख रहा हूँ . हाँ खुद का अप्लाई कर दिया है ,एक हप्ते का वक्त लगना बताया गया है . 
नए स्थान पर जमने में अभी समय लगेगा ,नए लोग नए मिजाज। मगर लग अच्छा रहा है -पिछड़ा इलाका है तो लोगों की सरलता सहजता संदूषित नहीं हुयी है और खाने पीने के सामान भी अपेक्षया बहुत कम संदूषित  है ....पत्नी यहाँ के दूध और सब्जियों की मुग्ध भाव से प्रशंसा कर रही हैं .उनके विशेषाग्रह पर बचपन से ही दूध से नाक भौ सिकोड़ने वाला मैं भी यहाँ थोडा दूध पीने लगा हूँ -पियो  ग्लास भर दूध की तर्ज पर ......सब्जियों में निश्चय ही ताजगी भरा अलग सा स्वाद है . अब इतना सब इंतजाम होने के बाद बस ब्लागिंग की कमी रह गयी  थी सो वह भी आज से राह पर आ गयी -जिन्दगी की गाडी तेजी से पटरी पर लौटने लगी है . 
इस बीच केवल संतोष त्रिवेदी जी ने फोनियाया और हाल चाल पूछा .....कमाल के ब्लॉगर हैं वर्ना आज की इस भागमभाग की दुनिया में किसे किसकी फ़िक्र रहती है . गहन रिश्तों के वायदे करने वाले भी न जाने कहाँ मुकर  गए ....आप यहाँ तभी तक हैं जब तक हैं और दिख रहे हैं -अन्यथा कोई आपकी सुधि लेने वाला नहीं है .....नए ब्लागरों को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए ....और अपेक्षाएं नहीं पालनी चाहिए ...अंतर्जाल आंनद के लिए कोई बैकुंठ नहीं है,असली दुनिया से भी इस मामले में गया गुजरा है . कितने मित्रों से इसलिए पहले से भी दुआ सलाम बंद है -और इन पांच साला ब्लागिरी में दुआ सलाम बंद वाली लिस्ट भी बढ़ती गयी है -कभी किसी ने कहा था क़ि आपकी आँखें बहुत गहराई  वाली सुन्दरता लिए हैं,किसी ने मेरी एक प्रोफाईल फोटो जो अब लगभग दस वर्ष पुरानी है मगर कहीं कहीं अब भी दिख जाती है -अरे वही सूट टाई वाली को देखकर मर मिटने का अभिनय किया था  :-) ....तब से सूट पहनना बंद ही कर दिया :-( ....किसी किसी ने  इमरजेंसी का तकाजा देकर कुछ इमदाद भी झटक लिया था ...वे सभी अब तटस्थ हो लिए हैं .....मगर यह सब मैं बनारस की गंगा मैया को समर्पित कर आया हूँ .....
सोनांचल में एक नयी ताजगी के साथ एक नयी ब्लागिंग पारी शुरू करते हुए मुझे एक नौसिखियापन सा लग रहा है :-) मैं वापस लौट आया हूँ ......हो सकता है मेरा यहाँ अनुपस्थित रहना किसी को सचमुच खला ही हो ... :-) यह बात अब तक मुंह से निकल पायी हो तो अब भी कोई देर नहीं हुयी है ...मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा ...सुस्वागतम! 

रविवार, 2 सितंबर 2012

छूटी काशी, अब ब्लागिंग के ब्रह्मचर्य की ओर .......


पिछले दिनों बहुत कुछ पार्श्व में मेरे साथ जो घटित हो रहा था उससे अलग यहाँ दिख रहा था ....ब्लागर सम्मलेन के  चमक धमक के पीछे मेरे ट्रांसफर की भी अंतर्कथा चालू थी -और अंततः मैंने कल सोनभद्र जनपद में योगदान दे दिया जिसे भारत की ऊर्जा राजधानी होने का गौरव प्राप्त है -यह बात दीगर है कि वहां   ऐसा कोई अहसास नहीं हुआ -एक नागरिक ने कहा कि चिराग तले अँधेरे की कहावत नहीं सुनी आपने साहब? सो आज रविवार मनाने फिर काशी में हैं ..और अब जल्दी ही बैग बैगेज वहां शिफ्ट हो जाना है -और नए जगह  पर जहाँ पर्याप्त बिजली न हो, कनेक्टिविटी की समस्यायें हों तो फिर मेरे ब्लागिंग का वानप्रस्थ या ब्रह्मचर्य जो भी मान लें आप, आना तो स्वाभाविक है .महज आशंकाएं है ये और वैसे भी नयी जगह पर दैनन्दिनी सेट होने में समय तो लग ही जाता है ....
काशी (बनारस ) भला कौन छोड़ना चाहता है .जब तक खुद भोले बाबा न छोड़ दें -ऐसी बनारसियों की मान्यता है ....कहा भी गया है काश्याम मरणात मुक्तिः ...फिर अन्यत्र मरने कौन जायेगा? ....एक कहावत और भी है -चना चबैना गंगजल जो पुरवे करतार काशी कबहूँ न छोडिये विश्वनाथ दरबार....कौन कम्बख्त  छोड़ना ही चाहता था मगर सरकारी सेवाओं में स्थानान्तरण एक अनिवार्य और अपरिहार्य शर्त है ....जहां आदेश हो जाए मुंडी वहीं टेकनी होगी ..भले ही मत्था बाबा के दरबार में टिका  रहे .... मगर एक बात जो अच्छी नहीं हुयी वह गंगा के सामीप्य से सोनभद्र की कर्मनाशा तक का प्रवास!  -गंगा जो आह्लाददायिनी हैं और जिनके बारे में कहा ही जाता है कि गंगा तव दर्शनात मुक्तिः .....गंगा जो मोक्षदायिनी हैं उनका दामन छोड़कर कर्मनाशा जो संचित पुण्यों -कर्मों का नाश करने वाली मानी गयीं है का सानिध्य बड़ा अजीब सा लग रहा है -
मनुष्य का स्वाध्याय अर्जित ज्ञान यहीं पाप तुल्य हो जाता है -न मालूम होता मुझे यह सब तो कितना अच्छा होता -ऐसे निगेटिव विचार तो न आते ....मगर  कर्मनाशा का यह पुराण पता है तो मन तनिक संतप्त होगा ही भले ही हम विज्ञान के मनई ठहरे .. :-) गंगा जहाँ विष्णु पद से स्रवित, ब्रह्मा के कमंडल से होकर शिव की जटाओं से छूटती धरावतरित होती हैं -कर्मनाशा के बारे में पुराकथा है कि वे मुंह के बल आकाश में उलटे लटके त्रिशंकु के लार से बनी हैं और सारे पुण्य कर्म इसके सानिध्य सम्पर्क से नष्ट हो जाते हैं -मुझे बस यही राहत है कि मेरी झोली में कोई पुण्य कर्म संचित नहीं है . :-) 
कर्मनाशा की कथा पर अभी उसी दिन सिद्धेश्वर  जी से फोन पर बातें हो रही थी -क्या कारण है कि एक पूरी नदी ही अभिशप्त हो गयी?  मैंने उन्हें आमंत्रित किया है कि चलिए कर्मनाशा : एक पुनरान्वेषण यात्रा हम वहां बसने पर आयोजित करेगें और यह शोध करेगें  कि यह नदी क्यों अभिशप्त मान ली गयी -कोई पर्यावरण दोष? या फिर जलीय संघटन का विकार?? क्या कर्मनाशा के अभिशप्त पुराण कथा से उसे अब मुक्त किया जाना  संभव है?यानि कर्मनाशा उद्धार? जब पाषाणवत अहल्या का उद्धार संभव है तो वेगवती तरल कर्मनाशा का क्यों नहीं ? क्या पता उसे भी कलयुगी किसी राम की प्रतीक्षा हो?
 हम आते है कर्मनाशा तनिक तू धीरज रख और साथ में कुछ सिद्ध प्रसिद्ध सिद्धेश्वर सरीखे जनों को भी ले आयेगें -तुम्हारा जनम जनम का आतप अब  शायद अब मिट जाए! जो पाठक कर्मनाशा के बारे में और जिज्ञासु हों वे यहाँ जा सकते हैं और इस अभिशप्त नदी की कथा पढ़ सकते हैं(यहाँ भी देखें!) -गरुण पुराण में जीव की मोक्ष यात्रा में इसे बड़ा  बाधक माना गया है और मनुष्य देही (आत्मा )  के त्रयोदश (तेहरवीं ) संस्कार में इसे पार कराने के तरह तरह के अनुष्ठान पंडित- महापात्र करते हैं -गोदान और फिर उसी गैया की  पूछ पकड़ कर कर्मनाशा को पार कराने का हास्यास्पद उपक्रम होता है ....निष्कर्षतः गंगा लोक परलोक तक महिमा मंडित हैं और कर्मनाशा शापित ......यह सनातनियों का कुचक्र तो है मगर क्यों? 
अरे मैं तो कर्मनाशा में ही उलझ गया ....यह कहना था कि क्या पता नयी जगहं पर मेरी ब्लागिंग को भी ग्रहण न लग जाए और यह विलंबित होने लगे तो यही मान लीजियेगा कि मेरी ब्लागिंग के ब्रह्मचर्य या वानप्रस्थ जो भी कह लें आप, समय आ गया है -अब हम टंकी वंकी जैसी शब्दावली का प्रयोग तो करने से रहे यह मेरे स्तर के अनुरूप नहीं है :-)  -इसलिए यह तो नहीं कहूँगा कि अब तो टंकी पर चढ़ने का वक्त आ गया! वैसे भी ऊँचाई पर या कोई भी चढ़ान  अब दिन ब  दिन मुश्किल होती जा रही है :-) ......ज्ञानी जन यह व्यथा सहज ही समझ जायेगें! पता नहीं अगली पोस्ट कब आयेगी तब तक मेरा तसव्वुर ब्लागिंग के ब्रह्मचर्य में रमे एक सम्मानित ब्लॉगर के रूप में होनी चाहिए :-) नादान दोस्तों और दानेदार दुश्मनों से बस यही इल्तिजा है :-) हाँ सोनभद्र पर अगली पोस्ट का इंतज़ार भी करते रहें! 

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